वल्लभी का मैत्राक वंश (475–776 ई.) : गुप्तोत्तर काल का प्रमुख पश्चिमी भारतीय राजवंश

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत वल्लभी का मैत्राक वंश (475–776 ई.)

➣ गुप्तवंश के अंतिम दिनों में जिस समय पूर्वोतर भारत में नई राजनीतिक शक्तियों का उदय हो रहा था पश्चिम में सौराष्ट्र में भी नई शक्तियों राजनीतिक रंगमंच पर आई।

➣ मैत्रक वंश का शासन मालवा (मध्य प्रदेश) और राजस्थान में भी फैल गया था, लेकिन बाद में मैत्रकों को दक्कन के चालुक्यों और कन्नौज के शासक हर्ष से पराजित होना पड़ा।

हर्ष वर्धन की मृत्यु के बाद मैत्रक फिर से उठ खड़े हुए, लेकिन 712ई. से सिंध में स्थापित हो चुके अरबों ने अंतिम मैत्रक राजा शिलादित्य चतुर्थ को मार डाला और 780 ई. में उनकी राजधानी को ध्वस्त कर दिया।

➣ सौराष्ट्र गुप्तों का अधीनस्थ प्रदेश था परंतु स्कंदगुप्त की मृत्यु के पश्चात यह प्रदेश गुप्तों से स्वतंत्र हो गया था। बुद्धगुप्त के शासनकाल में मैत्रक सरदार भट्टार्क ने अपनी स्वतंत्र सत्ता (475 ई.) स्थापित कर ली थी।

➣ ऐसा प्रतीत होता है कि भट्टारक गुप्तों का अधीनस्थ प्रशासक या सामंत था। वह सेनापति के पद पर था। इसलिए पुष्यमित्र शुंग के समान राजा बनने पर भी वहा सेनापति ही कहलाता रहा।

➣ उसने अपनी राजधानी वल्लभी में स्थापित की। उसका पुत्र धरसेन प्रथम भी सेनापति ही कहलाया।

द्रोणासिंह इस वंश का प्रथम शासक हुआ जिसने महाराज की उपाधि धारण की। उसने संभवत: गुप्त राजा भानुगुप्त की मृत्यु के पश्चात अपनी पूर्ण स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली।

नरसिंहगुप्त बालादित्य ने परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए उसकी स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार कर लिया।

➣ हूणों के पराभव और यशोधर्मन के अंत के बाद मैत्रकों रको अपनी शक्ति के विस्तार का अवसर प्राप्त हो गया जिसका लाभ इन लोगों ने उठाया। 6वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मैत्रकों की एक शाखा ने पश्चिमी मालवा पर भी अपना अधिकार कर लिया।

➣ मैत्रकों का पहला तिथियुक्त अभिलेख गुप्त संवत 206 (526 ई.) का है। इसमें ध्रुवसेन प्रथम को महाराज, महाप्रतिहार, महादंडनायक तथा महाकार्तिक की उपाधियों से विभूषित किया गया है। उसने मैत्रकों की शक्ति का और अधिक विस्तार किया।

➣ मैत्रको का सबसे शक्तिशाली शासक ध्रुवसेन द्वितीय था। उसके अभिलेख 640ई. स्वीकार कर ली थी। प्रयाग सम्मेलन पर उपास्थित राजाओं में उसका उल्लेख भी ह्वेनसांग करता है।

हर्षवर्द्धन ने अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कर वर्द्धनों और मैत्रकों की मैत्री को सुदृढ़ किया। उसी के समय में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने वल्लभी की यात्रा की थी।

➣ ध्रुवसेन के पश्चात मैत्रक वंश में अन्य कई राजा भी हुए। इनमें धरसेन चतुर्थ एक शक्तिशली शासक था। उसका संघर्ष गुर्जरों से हुआ था

➣ उसने संभवत: भड़ौच पर अधिकार किया। उसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य ध्रुवसेन द्वितीय के बाद मैत्रकों की गिरती हुई स्थिति को पुनस्थापित करना था।

➣ उसने 645-650 ई. के मध्य शासन किया तथा परमभट्टारक, महाराजिराज और परमेश्वर जैसी गौरवपूर्ण उपाधियाँ धारण किया था।

धरसेन चतुर्थ के पश्चात मैत्रकों की शक्ति पुनः कमजोर पड़ गई। गुर्जरों का दबाव उन पर बढ़ता जा रहा था।

चालुक्य. गुर्जर प्रतिहार और राष्ट्रकूटों के उदय तथा अरबों के आक्रमण के बाद मैत्रकों की शक्ति नाममात्र के लिए बच गई। बाद में अरबों ने वल्लभी पर अधिकार कर लिया।

वल्लभी शिक्षा केंद्र (वल्लभी विश्वविद्यालय)

वल्लभी विश्वविद्यालय गुप्तोत्तर काल का पश्चिम भारत का एक अत्यंत प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र था, जो वर्तमान गुजरात के वल्लभी नगर में स्थित था।

➣ इसका विकास मुख्यतः मैत्रकी वंश के शासकों के संरक्षण में हुआ। 6वीं से 8वीं शताब्दी के बीच यह विश्वविद्यालय भारत के प्रमुख शिक्षण संस्थानों में गिना जाता था।

➣ वल्लभी विशेष रूप से प्रशासनिक शिक्षा और बौद्ध अध्ययन के लिए प्रसिद्ध था। बौद्ध धर्म के अलावा राजनीति शास्त्र, न्यायशास्त्र, व्याकरण, तर्कशास्त्र, अर्थशास्त्र की भी शिक्षा दी जाती थी।

➣ वल्लभी विश्वविद्यालय की एक विशेषता यह थी कि यहाँ बौद्ध तथा ब्राह्मण दोनों परंपराओं की शिक्षा दी जाती थी, जिससे यह धार्मिक सहिष्णुता और बहुआयामी शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र बना।

➣ चीनी यात्री ह्वेनसांग ने वल्लभी को समृद्ध और उच्च शिक्षा का केंद्र बताया था। ह्वेनसांग और इत्सिंग ने इसकी तुलना नालंदा विश्वविद्यालय से की थी। बाद में अरब आक्रमणों और राजनीतिक अस्थिरता के कारण इसका पतन हो गया।

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