वाकाटक वंश (250–500 ई.) : गुप्तकालीन दक्षिण भारत का शक्तिशाली राजवंश

भारतीय इतिहास प्राचीन भारत वाकाटक वंश (250–500 ई.)
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अजंता गुफाओं के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध (दक्कन की प्रमुख शक्ति) : वाकाटक राजवंश

शासक शासनकाल परिचय / प्रमुख तथ्य
विंध्यशक्ति 255 – 275 ई. वाकाटक वंश का संस्थापक, दक्खन (मध्य भारत) में स्वतंत्र शक्ति की स्थापना की। प्रारंभिक स्तर पर राज्य को मजबूत करने का कार्य किया।
प्रवरसेन प्रथम 275 – 335 ई. वाकाटक वंश का सबसे शक्तिशाली प्रारंभिक शासक। विशाल साम्राज्य विस्तार किया और “सम्राट” जैसी उपाधियाँ धारण कीं।
रुद्रसेन प्रथम 335 – 360 ई. गुप्त साम्राज्य से वैवाहिक संबंध स्थापित किए। वाकाटक-गुप्त संबंधों की शुरुआत इसी काल में मानी जाती है।
पृथ्वीसेन प्रथम 360 – 385 ई. साम्राज्य की स्थिरता बनाए रखी और दक्खन क्षेत्र में प्रभाव को मजबूत किया।
रुद्रसेन द्वितीय 385 – 390 ई. कम समय का शासन, गुप्त वंश से संबंध और मजबूत हुए (प्रभावित शासन काल)।
प्रवरसेन द्वितीय 410 – 440 ई. राजधानी को परिवर्तित/विकसित किया और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत किया। कला और निर्माण कार्यों को प्रोत्साहन दिया।
नरेंद्रसेन 440 – 460 ई. कमजोर राजनीतिक स्थिति का काल, बाहरी दबाव और आंतरिक अस्थिरता बढ़ी।
पृथ्वीसेन द्वितीय 460 – 480 ई. वाकाटक वंश को पुनः स्थिर करने का प्रयास किया, लेकिन शक्ति पहले जैसी नहीं रही।
हरिषेण 475 – 510 ई. वाकाटक वंश का अंतिम महत्वपूर्ण शासक। अजंता गुफाओं के संरक्षण और बौद्ध कला के विकास से जुड़ा माना जाता है। इसके बाद वंश का पतन हो गया।

➣ वाकाटक वंश सातवाहनों के उपरान्त दक्षिण की महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरा। वाकाटक छठी शताब्दी के मध्य तक चालुक्य वंश के उदय होने तक दक्कन में सबसे महत्त्वपूर्ण शक्तिशाली साम्राज्य था।

दक्षिणापथ में शासन करने वाले समस्त राजवंशों में वाकाटक वंश सर्वाधिक सम्मानित एवं सुसंस्कृत था। उन्होंने कभी-कभी मध्य भारत के कुछ क्षेत्रों में अपनी सत्ता स्थापित की।

➣ लेख प्रमाणों एवं पुराणों के आधार पर यह कहा जाता है कि वाकाटक शासन तीसरी शताब्दी के अन्त में प्रारम्भ हुआ और पाँचवीं शताब्दी के अन्त तक चलता रहा।

➣ मगध के चक्रवर्ती गुप्तवंश के समकालीन इस राजवंश ने मध्य भारत तथा दक्षिण भारत के ऊपरी भाग में शासन किया। एक तरह से वाकाटक वंश गुप्त साम्राज्य से पहले अस्तित्व में आ चूका था और, अंत गुप्तोत्तर काल के साथ (लगभग 500 ई. के आसपास)

➣ इस राजवंश में विष्णुवृद्धि गोत्र के ब्राह्मण थे तथा उनका मूल निवास स्थान बरार (विदर्भ) में था। उनके सिक्कों पर गंगा की आकृति का अंकन है। यही उनका राजचिह्न था।

➣ वाकाटक नरेश ब्राह्मण धर्मावलम्बी थे। इस वंश के राजाओं ने अश्वमेघ, वाजपेय आदि अनेक वैदिक यज्ञों का अनुष्ठान किया था। उनकी उपाधियाँ परममाहेश्वर तथा परमभागवत थीं।

संस्थापकविंध्यशक्ति (पुराणों अनुसार)
राजधानीनन्दीवर्धन (नागपुर) बाद में प्रवरपुर
राजचिन्हसिक्कों में गंगा की आकृति का अंकन

➣ वाकाटकों के दो शाखाओं (विंध्यशक्ति की मूल शाखा, बेसिम की शाखा) के शासन का उल्लेख मिलता है। बेसिम शाखा संस्थापक प्रवरसेन का पुत्र सर्वसेन था।

➣ इस समय पाटलिपुत्र में जिस शक्तिशाली गुप्त साम्राज्य का विकास हो रहा था, उसके सम्मुख वाकाटकों की शक्ति कमजोर पड़ गयी थी। संभवत: ये गुप्त साम्राज्य के अन्तर्गत अधीनस्थ राजाओं के रूप में रह गये थे।

विंध्यशक्ति (255 – 275 ई.) : वाकाटक वंश की स्थापना

➣ वाकाटक राज्य का संस्थापक विंध्यशक्ति था। संभवतः वह सातवाहनों का अधीनस्थ कोई पदाधिकारी या महत्वपूर्ण सरदार था।

➣ पुराणों के अतिरिक्त अजंता अभिलेखों में भी उसे वाकाटक शक्ति का संस्थापक माना गया है तथा उसकी तुलना इंद और विष्णु से की गई है।

➣ विंध्यशक्ति विष्णुवृद्धि गोत्र का ब्राह्मण था। शिलालेख में उसे वाकाटक वंशकेतु कहा गया है

➣ इससे प्रतीत होता है कि वह ब्राह्मण धर्म को मानने वाला था। उसने कोई विशिष्ट राजकीय उपाधि धारण नहीं की थी ।

➣ उसने पूर्वी मालवा में अपनी शक्ति स्थापित की तथा बाद में विंध्य के पार सातवाहनों के प्रदेशों पर अधिकार किया।

प्रवरसेन प्रथम (275 – 335 ई.) : साम्राज्य विस्तार

➣ वाकाटकों की शक्ति का विस्तार विंध्यशक्ति के पुत्र प्रवरसेन प्रथम ने किया। उसने सभी दिशाओं में विजय अभियान किए।

➣ प्रवरसेन के समय में वाकाटक शक्ति का विस्तार मध्य भारत में बुंदेलखंड से लेकर दक्षिण में हैदराबाद तक था। प्रवरसेन ने शको के अनेक क्षेत्रों पर भी अधिकार कर लिया।

➣ वाकाटकों में एकमात्र वही ऐसा शासक था जिसने महाराजा की उपाधि धारण की थी । उसने धर्ममहाराज की उपाधि भी धारण की।

➣ प्रवरसेन ने ब्राह्मण धर्म की महत्ता स्थापित की। उसने चार अश्वमेध, सात सोम यज्ञ एवं एक वाजपेय यज्ञ भी किया। उसे प्रवीर भी कहा जाता है।

➣ जिस समय वाकाटकों का उदय हो रहा था उसी समय मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश में नाग वंश का भी उत्थान हो रहा था।

➣ प्रवर सेन प्रथम ने भारशिव नागवंश के प्रसिद्ध राजा भवनाग की पुत्री के साथ अपने पुत्र गौतमी पुत्र का विवाह किया।

➣ समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में दक्षिण के जिन राज्यों का उल्लेख हुआ है उस सूची में वाकाटकों का नाम नहीं मिलता। यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि रूद्रसेन शैव मतावलंबी था।

➣ प्रवरसेन ने अपना राज्य अपने पुत्रों में प्रशासनिक सुविधा के लिए विभक्त कर दिया था। इसमें दो भाग मुख्य थे।

➣ एक भाग: प्रवरसेन के बड़े पुत्र गौतमीपुत्र का केंद्र नागपुर के निकट नंदिवर्धन था।

➣ दूसरा भागः सर्वसेन के अधीन जिसका केंद्र बरार में वत्सगुल्म था। आगे इसी से बेसिम की शाखा का उदय हुआ।

➣ आधुनिक उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दक्षिणापथ, गुजरात और काठियावाड़ क्षेत्र इस समय तक वाकाटक साम्राज्य में सम्मिलित थे।

रुद्रसेन प्रथम (335 – 360 ई.) : गुप्तों से वैवाहिक संबंध

➣ प्रवरसेन के बाद रूद्रसेन प्रथम वाकाटक राजा बना। वह प्रवरसेन के बड़े पुत्र गौतमीपुत्र का पुत्र था।

➣ प्रवरसेन की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारियों में प्रतिस्पर्धा आरंभ हुई। शासक बनते ही उसे अपने विरोधियों और प्रतिद्वंद्वियों से सामना करना पड़ा।

➣ गौतमीपुत्र की मृत्यु पहले ही हो गई थी। उसी का पुत्र रूद्रसेन प्रवरसेन का उत्तराधिकारी बना।

➣ अन्य तीन पुत्र जो वस्तुत: गर्वनर (प्रशासक) के रूप में राज्य के तीन भागों पर राज्य कर रहे और स्वतंत्र शासक बन गए।

➣ रूद्रसेन ने अपने नाना भवनाग की सहायता से अपने दो चाचाओं के राज्य पर विजय प्राप्त कर उनका राज्य समाप्त कर दिया।

➣ परंतु सर्वसेन अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाए रखने में सफल हुआ। रूद्रसेन ने वाकाटकों की शक्ति को बनाए रखने का प्रयास किया।

➣ उसने संभवतः गुप्तों से मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित कर लिया जिससे समुद्रगुप्त ने उसके राज्य को छोड़ दिया।

➣ रूद्रसेन प्रथम ने अपने वंश के वैष्णव धर्म को छोड़कर शैव धर्म को स्वीकार कर लिया। इसे वाकाटक लेखों में महाभैरव का उपासक कहा गया है।

➣ रुद्रसेन के शासन काल के अन्तिम वर्षों में गुजरात और काठियावाड़ में फिर शक-महाक्षत्रपों का शासन हो गया।

पृथ्वीसेन प्रथम (360 – 385 ई.) : सत्ता सुदृढ़ीकरण

➣ वाकाटकों की मुख्य शाखा में रूद्रसेन का उत्तराधिकारी पृथ्वीसेन प्रथम बना। उसे धर्म विजयी कहा गया है तथा इसकी तुलना युधिष्ठिर से की गई है।

➣ उसने बेसिम की शाखा के शासक विंध्यसेन (विंध्यशक्ति) से सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखा तथा उसे कुंतल पर अधिकार करने में सहायता प्रदान किया।

➣ गुप्त सम्राटों की यह प्रबल इच्छा थी कि गुजरात-काठियावाड़ से शक महाक्षत्रपों के शासन का अन्त कर भारत को विदेशी आधिपत्य से सर्वथा मुक्त कर दिया जाए।

वाकाटक राजा इस कार्य में उनके सहायक हो सकते थे, क्योंकि उनके राज्य की सीमाएँ शक महाक्षत्रपों के राज्य से मिलती थीं।

सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह पृथ्वीसेन के पुत्र रूद्रसेन द्वितीय से कर दिया।

➣ इस वैवाहिक संबंध से दोनों राजवंशों को लाभ हुआ, परंतु अधिक लाभ गुप्तों को हुआ। इस विवाह से गुप्त-वाकाटक गठबन्धन ने पश्चिमी भारत में शको की शक्ति का उन्मूलन किया।

रुद्रसेन द्वितीय (385 – 390 ई.) : अल्पकालीन शासन

पृथ्वीसेन का उत्तराधिकारी रूद्रसेन द्वितीय हुआ। वह चंद्रगुप्त द्वितीय का दामाद था। वह एक शक्तिशाली शासक था।

➣ उसने अपनी पत्नी के प्रभाव में आकर बौद्धधर्म त्याग दिया और वैष्णव धर्म को अपना लिया।

➣ दुर्भाग्यवश शासक बनने के कुछ समय बाद लगभग 390 ई. में रुद्रसेन द्वितीय की मृत्यु हो गई।

➣ रूद्रसेन की मृत्यु के पश्चात उसकी पत्नी प्रभावती गुप्त अपने बड़े नाबालिग पुत्र दिवाकरसेन की संरक्षिका बनी।

➣ उसके संरक्षिका के रूप में प्रभावती गुप्त ने अपने पिता चंद्रगुप्त द्वितीय के सहयोग से लगभग 13 वर्षों तक शासन किया।

➣ प्रभावती गुप्त ने चंद्रगुप्त द्वितीय ने शकों पर विजय प्राप्त कर गुजरातकाठियावाड़ को अपने साम्राज्य में मिला दिया।

लगभग 403 ई. में दिवाकरसेन की भी मृत्यु हो गई। कालांतर में प्रभावतीगुप्त ने अपने दूसरे पुत्र दामोदरसेन की संरक्षिका के रूप में राज्य करना आरंभ किया।

प्रवरसेन द्वितीय (410 – 440 ई.) : प्रशासनिक सुधार एवं कला विकास

➣ इस वंश की मूल शाखा का अंतिम शक्तिशाली शासक प्रवरसेन द्वितीय था, उसका आरंभिक नाम दामोदरसेन था। उसने प्रवरसेन की उपाधि धारण की।

➣ वह एक कुशल प्रशासक था। लेकिन उसकी अभिरूचि युद्ध से अधिक शांति के कार्यों, विशेषतया साहित्य और कला के विकास में थी। उसने सेतुबंध नामक काव्य की रचना की थी।

➣ समकालीन गुप्त शासक चन्द्रगुप्त द्वितीय के राजकवि कालिदास ने प्रवरसेन द्वितीय के राजदरबार में रहकर सेतुबंध में संशोधन कर अपना काव्य मेघदूत लिखा था।

➣ उसे नयी राजधानी प्रवरपुर बनाने का श्रेय भी दिया जाता है।

➣ उसने अपने पुत्र नरेंद्र का विवाह कुंतल नरेश की पुत्री अजित भट्टारिका से किया। इस वैवाहिक संबंध से वाकाटकों की स्थिति मजबूत हुई।

➣ प्रवरसेन वैष्णव धर्म को मानने वाला था।

नरेन्द्रसेन (440 – 460 ई.) : साम्राज्य विस्तार

➣ प्रवरसेन का उत्तराधिकारी नरेंद्रसेन हुआ। प्रवरसेन के पश्चात वाकाटकों की शक्ति का पतन आरंभ हो गया।

➣ उसके शासनकाल में नल राजा भवदत्तवर्मन ने वाकाटकों पर आक्रमण किया।

➣ आरंभिक चरण में वाकाटकों को पराजित होना पड़ा। परंतु बाद में नरेंद्रसेन ने नलोको कुछ प्रदेशों पर विजय प्राप्त कर ली।

➣ नरेंद्रसेन ने मालवा, मेकल और कोसल पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। उसने बेसिम शाखा के वाकाटकों से भी सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखा।

पृथ्वीसेन द्वितीय (460 – 480 ई.) : पतन की शुरुआत

➣ वाकाटक वंश का अंतिम ज्ञात शासक पृथ्वीसेन-II था। बालघाट लेख में उसे परमभागवत कहा गया है।

➣ उसे नलों और त्रैकुटकों के साथ संघर्ष करना पड़ा। इस संघर्ष ने वाकाटकों की शक्ति क्षीण कर दी।

➣ बेसिम वंश के शासकों ने 5वीं शताब्दी के अंत तक वाकाटकों के मूल शाखा पर अधिकार कर लिया।


अजन्ता की 16वीं तथा 17वीं गुफाओं का निर्माण पृथ्वी सेन द्वितीय के समय हुआ।

वाकाटकों की बेसिम शाखा : –

➣ बेसिम शाखा का संस्थापक प्रवरसेन का पुत्र सर्वसेन था। उसे बरार (विदर्भ) और उत्तरी हैदराबाद का प्रशासक नियुक्त किया गया था।

रूद्रसेन प्रथम के समय में वह स्वतंत्र शासक बन बैठा।

➣ सर्वसेन का उत्तराधिकारी विंध्यसेन (विंध्यशक्ति) हुआ। उसने पृथ्वीसेन प्रथम की सहायता से महाराष्ट्र पर विजय प्राप्त की।

प्रवरसेन और देवसेन इस वंश के अन्य शासक थे। बेसिम शाखा का सबसे महत्वपूर्ण शासक हरिषेण था।

हरिषेण (475 – 510 ई.) : अजन्ता गुफाओं का संरक्षण

➣ यह बेसिम शाखा का अंतिमशक्तिशाली शासक हुआ। राज्यारोहण के समय मुख्य शाखा के पृथ्वी सेन-द्वितीय की मृत्यु हुई, पृथ्वीसेन का कोई पुत्र नहीं था।

➣ उसकी मृत्यु 550 ई. में हुई, निर्बल उत्तराधिकारियो के कारण दक्षिण में चालुक्यों ने अधिकार कर लिया।

स्थापत्य-कला

➣ वाकाटक विशेष रूप से कला एवं बौद्ध स्थापत्य के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है। इस वंश के शासकों ने अजंता गुफाओं के निर्माण और चित्रकला को संरक्षण प्रदान किया।

➣ इस वंश के शासकों ने विशेष रूप से अजंता गुफाओं की कई बौद्ध गुफाओं, चैत्यगृहों (प्रार्थना स्थल) और विहारों (मठों) के निर्माण एवं संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

अजन्ता की विहार गुफ़ा संख्या 16,17 एवं चैत्य गुफ़ा संख्या 19 का निर्माण वाकाटकों के समय में ही हुआ। गुफ़ा 16 का निर्माण हरिषेण के मंत्री वराहदेव ने करवाया था।

➣ भवन निर्माण कला एवं मूर्तिकला की दृष्टि से विदर्भ का टिगावा एवं नचना का मंदिर उल्लेखनीय है। टिगोवा मंदिर में गंगा, यमुना की मूर्तियां स्थापित हैं।

जेम्स फ़र्गुसन ने गुफ़ा संख्या 19 को भारत के बौद्ध कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण बताया है।

🧠 : प्रारंभिक गुफाओं का निर्माण मुख्यतः सातवाहन वंश के समय (लगभग 2वीं शताब्दी ई.पू. – 1वीं शताब्दी ई.) हुआ। बाद में वाकाटक वंश के शासकों, विशेषकर राजा हरिषेण के काल में, अजंता गुफाओं का विस्तार, भित्ति चित्रकला और विहार निर्माण अपने उत्कर्ष पर पहुँचा।

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