आधुनिक भारत के क्रांतिकारी संगठन : उग्र राष्ट्रवाद और सशस्त्र क्रांति

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क्रांतिकारी आंदोलन का उदय और विकास

➣ 19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों और 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर एक ऐसी धारा विकसित हुई, जिसने ब्रिटिश शासन को केवल संवैधानिक सुधारों या शांतिपूर्ण राजनीतिक तरीकों से समाप्त करना पर्याप्त नहीं माना

➣ इस धारा के समर्थकों का विश्वास था कि विदेशी शासन को भारत से हटाने के लिए अधिक सक्रिय और संघर्षपूर्ण उपायों की आवश्यकता है। इसी विचारधारा से भारत में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का विकास हुआ।

क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि

➣ प्रारंभिक राष्ट्रवादी आंदोलन की सीमित राजनीतिक उपलब्धियों, ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों और भारतीयों के प्रति उसके भेदभावपूर्ण व्यवहार ने युवा राष्ट्रवादियों के एक वर्ग को अधिक उग्र राजनीतिक मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया।

1885 के बाद के राजनीतिक आंदोलनों से उन्हें यह अनुभव हुआ कि केवल प्रार्थना-पत्र, भाषण और संवैधानिक मांगों के माध्यम से औपनिवेशिक शासन पर पर्याप्त दबाव नहीं बनाया जा सकता।

➣ अंग्रेजी शासन की आर्थिक शोषणकारी नीतियों ने भी भारतीयों में असंतोष को बढ़ाया। लॉर्ड बेकन के इस विचार कि अधिक दरिद्रता और आर्थिक असंतोष क्रांति को जन्म दे सकता है, को भारत की परिस्थितियों में भी प्रासंगिक माना गया।

गोविंद रानाडे की Essays on Indian Economics तथा रमेश चंद्र दत्त की Economic History of India जैसी कृतियों ने ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों और उनके दुष्परिणामों की कड़ी आलोचना की।

➣ 1890 के दशक में बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओं के उग्र राष्ट्रवादी विचारों, सार्वजनिक गणपति उत्सव और शिवाजी उत्सव जैसे आयोजनों तथा राष्ट्रीय चेतना के प्रसार ने युवाओं के बीच सक्रिय राष्ट्रवाद की भावना को मजबूत किया।

चापेकर बंधुओं जैसी घटनाओं ने भी यह दिखाया कि कुछ युवा ब्रिटिश अधिकारियों के विरुद्ध प्रत्यक्ष कार्रवाई का रास्ता अपनाने लगे थे।

➣ तत्कालीन अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं ने भी भारतीय उग्र राष्ट्रवादी तत्वों को प्रभावित किया। मिस्र, फारस और तुर्की में जनता की राजनीतिक सफलताओं, 1896 में अबीसीनिया द्वारा इटली की पराजय तथा 1905 में जापान द्वारा रूस की पराजय ने भारतीयों में यह विश्वास मजबूत किया कि यूरोपीय शक्तियों को भी चुनौती दी जा सकती है।

➣ विशेष रूप से जापान की रूस पर विजय ने एशियाई राष्ट्रवादियों में आत्मविश्वास पैदा किया।

लॉर्ड कर्जन की प्रतिक्रियावादी नीतियों ने भी भारतीय युवाओं में तीव्र असंतोष पैदा किया। कर्जन के लगभग सात वर्ष के शासनकाल को समकालीन राजनीतिक संदर्भ में शिष्टमंडलों, भूलों तथा आयोगों का काल भी कहा गया।

➣ कर्जन की नीतियों में कलकत्ता कॉरपोरेशन अधिनियम, विश्वविद्यालय अधिनियम और बंगाल विभाजन विशेष रूप से महत्वपूर्ण थे। इन नीतियों को भारतीयों ने प्रशासन में भारतीय भागीदारी को सीमित करने और राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने के प्रयास के रूप में देखा।

➣ 1905 में बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन ने इस प्रवृत्ति को और गति दी। आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में युवाओं का राजनीतिकरण हुआ और बंगाल, महाराष्ट्र तथा पंजाब सहित कई क्षेत्रों में ऐसे गुप्त समूह बनने लगे, जो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संगठित क्रांतिकारी गतिविधियों की तैयारी कर रहे थे।

➣ भारत में उग्र राष्ट्रवाद के विकास में बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और विपिन चंद्र पाल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इन नेताओं के नेतृत्व में स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और आत्मनिर्भरता जैसे विचारों को बल मिला तथा युवाओं में अधिक सक्रिय राष्ट्रवाद की भावना विकसित हुई।

बंगाल क्रांतिकारी विचारधारा का एक प्रमुख केंद्र बना। यहाँ विपिन चंद्र पाल ने युवाओं के बीच राष्ट्रवादी विचारों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी कारण उन्हें बंगाल में तिलक का सेनापति भी कहा जाता था।

➣ इसके अतिरिक्त शिक्षित भारतीयों को सरकारी रोजगार से दूर रखने की नीति, उपनिवेशों में भारतीयों के साथ किया जाने वाला दुर्व्यवहार, जातीय कटुता तथा भारतीयों के साथ किया जाने वाला अभद्र व्यवहार भी ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष और उग्र राष्ट्रवाद को बढ़ाने वाले कारक बने।

प्रारंभिक गुप्त समितियों से संगठित क्रांतिकारी संगठनों तक

➣ प्रारंभिक दौर में क्रांतिकारी गतिविधियाँ मुख्यतः गुप्त समितियों और छोटे समूहों के रूप में सामने आईं। इनका उद्देश्य युवाओं को संगठित करना, शारीरिक एवं सैन्य प्रशिक्षण देना, राष्ट्रवादी साहित्य का प्रचार करना और आवश्यकता पड़ने पर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रत्यक्ष कार्रवाई करना था।

➣ बंगाल में अनुशीलन समिति और युगांतर तथा महाराष्ट्र में अभिनव भारत जैसे संगठनों ने इस प्रारंभिक चरण को संगठित रूप दिया।

➣ इस विकास के परिणामस्वरूप भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में अनेक क्रांतिकारी संगठन सामने आए। इनमें से कुछ संगठन मुख्यतः भारत में सक्रिय थे, जबकि कुछ ने विदेशों में रहकर स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित करने का प्रयास किया।

गदर आंदोलन और बर्लिन कमेटी जैसे प्रयासों ने विदेशों में रह रहे भारतीयों को भारत की स्वतंत्रता के लिए संगठित करने तथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह की संभावनाएँ तलाशने का प्रयास किया।

➣ 1920 के दशक में क्रांतिकारी आंदोलन का स्वरूप एक नए चरण में पहुँचा। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) जैसे संगठनों ने क्रांतिकारी गतिविधियों को अधिक संगठित राजनीतिक उद्देश्य से जोड़ा।

➣ बाद में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के माध्यम से क्रांतिकारी आंदोलन में समाजवादी विचारों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा।

➣ इस प्रकार क्रांतिकारी आंदोलन धीरे-धीरे छोटी गुप्त समितियों से आगे बढ़कर अधिक संगठित राजनीतिक और वैचारिक संगठनों के रूप में विकसित हुआ।

➣ इन संगठनों की स्थापना, प्रमुख नेताओं और गतिविधियों को समझने के लिए उन्हें भारत में सक्रिय तथा विदेशों में सक्रिय संगठनों के रूप में अलग-अलग देखना उपयोगी होगा।

क्रांतिकारी आंदोलन की प्रमुख विशेषताएँ

➣ भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन कोई एक संगठन या एक निश्चित विचारधारा तक सीमित नहीं था। अलग-अलग क्षेत्रों और समय में इसके संगठनों के उद्देश्य, कार्य-पद्धति और वैचारिक प्रभाव अलग रहे। फिर भी इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएँ थीं-

  • ब्रिटिश शासन का सशस्त्र प्रतिरोध – अनेक क्रांतिकारी संगठनों ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध हथियारबंद संघर्ष को आवश्यक माना।
  • गुप्त संगठन और समितियाँ – शुरुआती संगठनों ने भूमिगत ढंग से काम किया तथा सदस्यों को गुप्त रूप से संगठित और प्रशिक्षित किया।
  • युवाओं की प्रमुख भूमिकाविद्यार्थियों और युवा राष्ट्रवादियों ने इन संगठनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • विदेशी क्रांतिकारी आंदोलनों का प्रभावयूरोप, रूस और आयरलैंड के राष्ट्रवादी एवं क्रांतिकारी आंदोलनों ने भारतीय क्रांतिकारियों के विचारों को प्रभावित किया।
  • राष्ट्रवादी साहित्य और प्रचारपुस्तकों, समाचार-पत्रों, पर्चों और गुप्त साहित्य के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना तथा क्रांतिकारी विचारों का प्रसार किया गया।
  • संगठित विद्रोह की योजना – आगे चलकर कुछ संगठनों ने केवल व्यक्तिगत कार्रवाइयों के बजाय व्यापक सशस्त्र विद्रोह की तैयारी पर भी जोर दिया।

भारत में प्रमुख क्रांतिकारी संगठन

क्रांतिकारी संगठन एवं स्थापना प्रमुख स्थान प्रमुख संस्थापक/नेता प्रमुख विशेषता
व्यायाम मंडल (1896–97) पूना दामोदर हरि चापेकर, बालकृष्ण हरि चापेकर, वासुदेव हरि चापेकर भारत का पहला क्रांतिकारी संगठन। युवाओं में शारीरिक प्रशिक्षण और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रतिरोध की भावना विकसित करने पर जोर।
मित्र मेला (1899) नासिक विनायक दामोदर सावरकर, गणेश दामोदर सावरकर गुप्त क्रांतिकारी संगठन। आगे चलकर अभिनव भारत का आधार बना।
अनुशीलन समिति (1902) कलकत्ता प्रमथनाथ मित्र, सतीशचंद्र बसु आदि बंगाल में प्रारंभिक क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख संगठन।
अभिनव भारत (1904)महाराष्ट्र विनायक दामोदर सावरकर, गणेश दामोदर सावरकर मित्र मेला का विकसित रूप। सशस्त्र क्रांति की विचारधारा से जुड़ा गुप्त संगठन।
स्वदेश बंधव समिति (1905) बरिसाल अश्विनी कुमार दत्त स्वदेशी आंदोलन के दौरान स्वदेशी, बहिष्कार और जन-संगठन को बढ़ावा दिया।
युगांतर समूह (1906) कलकत्ता, बंगाल बारिंद्र कुमार घोष, अरविंद घोष आदि बंगाल की प्रमुख क्रांतिकारी धारा। सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों पर जोर।
ढाका अनुशीलन समिति (1906) ढाका, पूर्वी बंगाल पुलिन बिहारी दास पूर्वी बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियों और गुप्त शाखाओं का व्यापक नेटवर्क।
भारत माता सोसाइटी (1906/1907) लाहौर, पंजाब अजीत सिंह, सूफी अम्बा प्रसाद आदि ब्रिटिश-विरोधी जन-जागरण, प्रचार और पंजाब के किसान आंदोलन को संगठित करने वाली क्रांतिकारी संस्था।
हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) (1924) उत्तर भारत सचिंद्रनाथ सान्याल, रामप्रसाद बिस्मिल, जोगेश चंद्र चटर्जी आदि सशस्त्र क्रांति के माध्यम से गणराज्य की स्थापना का लक्ष्य।
नौजवान भारत सभा (1926) लाहौर भगत सिंह, भगवतीचरण वोहरा आदि युवाओं में राजनीतिक, सामाजिक और क्रांतिकारी चेतना फैलाने का संगठन।
हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) (1928) दिल्ली एवं उत्तर भारत चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह आदि समाजवादी गणराज्य की स्थापना को क्रांतिकारी संघर्ष का लक्ष्य बनाया।
इंडियन रिपब्लिकन आर्मी, चटगाँव शाखा (1930) चटगाँव सूर्य सेन सशस्त्र विद्रोह की योजना तथा चटगाँव शस्त्रागार कांड से संबंधित संगठन।

भारत माता सोसाइटी एक क्रांतिकारी संगठन था, लेकिन इसकी प्रमुख गतिविधियाँ बम-विस्फोट या राजनीतिक हत्याओं जैसी प्रत्यक्ष हिंसक कार्रवाइयों के बजाय ब्रिटिश-विरोधी प्रचार, जन-संगठन और किसान आंदोलन को संगठित करने पर केंद्रित थीं।

प्रमुख क्रांतिकारी घटनाएँ, षड्यंत्र एवं कार्रवाइयाँ

घटना संबंधित संगठन/समूह प्रमुख क्रांतिकारी
रैंड-आयरस्ट हत्या (1897) व्यायाम मंडल दामोदर हरि चापेकर, बालकृष्ण हरि चापेकर
मुजफ्फरपुर बम कांड (1908) युगांतर समूह खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चाकी
अलीपुर षड्यंत्र मामला (1908–1909) अनुशीलन समिति एवं युगांतर समूह अरविंद घोष, बारिंद्र कुमार घोष, उल्लासकर दत्त आदि
मदनलाल धींगरा द्वारा सर कर्जन वायली की हत्या (1909) इंडिया हाउस मदनलाल धींगरा
नासिक षड्यंत्र कांड (1909) अभिनव भारत अनंत लक्ष्मण कान्हेरे, गणेश सावरकर आदि
ढाका षड्यंत्र केस (1910) ढाका अनुशीलन समिति पुलिन बिहारी दास एवं अन्य क्रांतिकारी
विनायक दामोदर सावरकर की गिरफ्तारी (1910) अभिनव भारत विनायक दामोदर सावरकर
हावड़ा षड्यंत्र केस (1910–1911) अनुशीलन समिति जतिंद्रनाथ मुखर्जी (बाघा जतिन) एवं अन्य
हार्डिंग बम कांड / दिल्ली षड्यंत्र कांड (1912) बंगाल के क्रांतिकारी नेटवर्क रासबिहारी बोस, बसंत कुमार विश्वास आदि
रोडा शस्त्र लूट (1914) युगांतर एवं संबद्ध क्रांतिकारी समूह अनुकूल मुखर्जी, हरीदास दत्त, श्रीशचंद्र पाल आदि
बालासोर अभियान / अंतिम संघर्ष (1915) युगांतर बाघा जतिन, चित्तप्रिय राय चौधरी आदि
गदर विद्रोह का प्रयास (1915) गदर पार्टी एवं भारतीय क्रांतिकारी नेटवर्क रासबिहारी बोस, करतार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगले आदि
बनारस षड्यंत्र (1915) अनुशीलन समिति एवं गदर से जुड़े क्रांतिकारी नेटवर्क शचीन्द्रनाथ सान्याल, रासबिहारी बोस आदि
काकोरी कांड (1925) हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खाँ, राजेंद्र लाहिड़ी, चंद्रशेखर आजाद आदि
सांडर्स हत्या (1928) हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद आदि
केंद्रीय विधान सभा बम कांड (1929) HSRA भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त
लाहौर षड्यंत्र कांड (1929–1931) HSRA भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु आदि
चटगाँव शस्त्रागार कांड (1930) इंडियन रिपब्लिकन आर्मी, चटगाँव शाखा सूर्य सेन, गणेश घोष, लोकनाथ बाल आदि
पहाड़तली यूरोपीय क्लब हमला (1932) चटगाँव क्रांतिकारी समूह प्रीतिलता वाडेदार

क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े प्रमुख पत्र एवं समाचार-पत्र

पत्र/समाचार-पत्र संपादक संबंधित संगठन
इंडियन सोशियोलॉजिस्ट (1905) श्यामजी कृष्ण वर्मा इंडिया हाउस
वंदे मातरम् (1906) अरविंद घोष युगांतर/बंगाल की क्रांतिकारी धारा
संध्या (1906) ब्रह्मबांधव उपाध्याय बंगाल की क्रांतिकारी धारा
युगांतर (1906) बारिंद्र कुमार घोष, भूपेंद्रनाथ दत्त युगांतर समूह
काल (1906) कृष्णाजी प्रभाकर खाडिलकर महाराष्ट्र की क्रांतिकारी धारा
भारत माता (1907) श्याम दास वर्मा भारत माता सोसाइटी
स्वराज्य (1907) शांति नारायण भटनागर भारत माता सोसाइटी से संबंधित
पेशवा (1908) सूफी अम्बा प्रसाद भारत माता सोसाइटी
फ्री हिंदुस्तान (1908) तारकनाथ दास अनुशीलन समिति। यूनाइटेड इंडिया हाउस
मदन की तलवार (1909) वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय पेरिस स्थित भारतीय क्रांतिकारी समूह
गदर (1913) लाला हरदयाल गदर पार्टी
कीर्ति (1926) संतोष सिंह। बाद में सोहन सिंह जोश गदर एवं क्रांतिकारी-किसान धारा

विदेशों में प्रमुख भारतीय क्रांतिकारी संगठन

संगठन/केंद्र एवं स्थापना प्रमुख स्थान प्रमुख संस्थापक/नेता प्रमुख भूमिका
इंडियन होम रूल सोसाइटी (1905) लंदन श्यामजी कृष्ण वर्मा भारत में स्वशासन की मांग और ब्रिटिश-विरोधी राष्ट्रवादी विचारों का विदेशों में प्रचार।
इंडिया हाउस (1905) लंदन श्यामजी कृष्ण वर्मा। बाद में विनायक दामोदर सावरकर आदि भारतीय विद्यार्थियों और क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों का प्रमुख केंद्र।
पेरिस इंडियन सोसाइटी (1905) पेरिस मैडम भीकाजी कामा आदि भारतीय स्वतंत्रता के प्रचार तथा विदेशों में क्रांतिकारी गतिविधियों को सहयोग।
पैन-आर्यन एसोसिएशन (1907) अमेरिका तारकनाथ दास आदि भारतीय राष्ट्रवादियों को संगठित करने और भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रचार करने का प्रयास।
इंडो-जापानी एसोसिएशन (1907) जापान भारतीय राष्ट्रवादी कार्यकर्ता जापान में भारतीय राष्ट्रवादी गतिविधियों और संपर्कों का केंद्र।
हिंदुस्तान एसोसिएशन ऑफ द पैसिफिक कोस्ट (1913) अमेरिका सोहन सिंह भकना, लाला हरदयाल आदि विदेशों में भारतीयों को संगठित करने वाला संगठन, जो आगे चलकर गदर पार्टी का आधार बना।
गदर पार्टी (1913) सैन फ्रांसिस्को, अमेरिका सोहन सिंह भकना, लाला हरदयाल, काशी राम आदि भारत में सशस्त्र क्रांति के लिए विदेशों में भारतीय प्रवासियों को संगठित करना।
बर्लिन कमेटी / इंडियन इंडिपेंडेंस कमेटी (1914–15) बर्लिन, जर्मनी वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, चंपकरमन पिल्लै, भूपेंद्रनाथ दत्त आदि प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी की सहायता से भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह की योजना।
काबुल की अस्थायी सरकार-ए-हिंद (1915) काबुल, अफगानिस्तान राजा महेंद्र प्रताप, मौलाना बरकतुल्लाह आदि विदेश में भारत की स्वतंत्रता के लिए अस्थायी सरकार स्थापित करने का प्रयास।

हिंदुस्तान एसोसिएशन ऑफ द पैसिफिक कोस्ट और गदर पार्टी दो अलग-अलग क्रांतिकारी आंदोलन नहीं थे। 1913 में अमेरिका में स्थापित हिंदुस्तान एसोसिएशन ऑफ द पैसिफिक कोस्ट आगे चलकर गदर पार्टी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इंडिया हाउस और इंडियन होम रूल सोसाइटी दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, लेकिन दोनों एक ही संस्था नहीं थे। इंडियन होम रूल सोसाइटी की स्थापना श्यामजी कृष्ण वर्मा ने की थी, जबकि इंडिया हाउस लंदन में भारतीय विद्यार्थियों और राष्ट्रवादियों का प्रमुख केंद्र था। आगे चलकर विनायक दामोदर सावरकर जैसे क्रांतिकारी भी इससे जुड़े।

बर्लिन कमेटी और इंडियन इंडिपेंडेंस कमेटी प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान 1914 में बनी बर्लिन कमेटी बाद में इंडियन इंडिपेंडेंस कमेटी के नाम से जानी गई। इसका उद्देश्य जर्मनी की सहायता से भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी गतिविधियों और सशस्त्र विद्रोह को बढ़ावा देना था।

काबुल की अस्थायी सरकार-ए-हिंद कोई क्रांतिकारी संगठन नहीं था। यह 1915 में काबुल में स्थापित भारत की एक अस्थायी सरकार थी, जिसका उद्देश्य विदेशों से भारत की स्वतंत्रता के लिए राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन जुटाना था।

विदेश स्थित क्रांतिकारी संगठनों से जुड़ी प्रमुख गतिविधियाँ

प्रमुख गतिविधि (स्थान, वर्ष) क्रांतिकारी नाम संबंधित संगठन
स्टुटगार्ट सम्मेलन में भारतीय ध्वज फहराना (जर्मनी, 1907) मैडम भीकाजी कामा पेरिस इंडियन सोसाइटी
सर कर्जन वायली की हत्या (लंदन, 1909) मदनलाल धींगरा इंडिया हाउस
सावरकर का मार्सेय से भागने का प्रयास (मार्सेय, 1910) विनायक दामोदर सावरकर इंडिया हाउस / अभिनव भारत
कोमागाटा मारू घटना (वैंकूवर, 1914) बाबा गुरदित सिंह गदर पार्टी से संबंधित
गदर योजना (पंजाब, 1914–15) लाला हरदयाल, करतार सिंह सराभा, रासबिहारी बोस आदि गदर पार्टी
एनी लार्सन एवं एस.एस. मैवरिक शस्त्र योजना (अमेरिका, 1914) चंद्रकांत चक्रवर्ती, हेरम्बलाल गुप्त आदि गदर पार्टी / बर्लिन कमेटी
हिंदू-जर्मन षड्यंत्र (अमेरिका एवं भारत, 1914–17) लाला हरदयाल, चंद्रकांत चक्रवर्ती, वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय आदि गदर पार्टी / बर्लिन कमेटी
लाहौर षड्यंत्र मुकदमे (पंजाब, 1915) करतार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगले आदि गदर पार्टी
रेशमी रुमाल आंदोलन (उत्तर प्रदेश–अफगानिस्तान, 1913–15) मौलाना महमूद हसन, मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी आदि देवबंद क्रांतिकारी नेटवर्क
काबुल मिशन (अफगानिस्तान, 1915) राजा महेंद्र प्रताप, मौलाना बरकतुल्लाह, मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी आदि काबुल की अस्थायी सरकार-ए-हिंद / बर्लिन कमेटी

विदेशों से प्रकाशित प्रमुख क्रांतिकारी पत्र एवं समाचार-पत्र

पत्र/समाचार-पत्र (वर्ष) संपादक संबंधित संगठन स्थान
इंडियन सोशियोलॉजिस्ट (1905) श्यामजी कृष्ण वर्मा इंडियन होम रूल सोसाइटी / इंडिया हाउस लंदन, बाद में पेरिस
स्वदेश सेवक (1907) गुरदत्त कुमार स्वदेश सेवक गृह वैंकूवर, कनाडा
फ्री हिंदुस्तान (1908) तारकनाथ दास यूनाइटेड इंडिया हाउस वैंकूवर, कनाडा
बंदे मातरम् (1909) मैडम भीकाजी कामा, लाला हरदयाल पेरिस इंडियन सोसाइटी पेरिस
मदन की तलवार (1909) वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय पेरिस इंडियन सोसाइटी / भारतीय क्रांतिकारी नेटवर्क बर्लिन
तलवार (1910) वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय भारतीय क्रांतिकारी नेटवर्क बर्लिन
गदर (1913) लाला हरदयाल। बाद में रामचंद्र गदर पार्टी सैन फ्रांसिस्को, अमेरिका

क्रांतिकारी आंदोलन में महिलाओं की भूमिका

➣ भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी शुरुआत में सीमित दिखाई देती है, लेकिन 1920 और 1930 के दशक में अनेक महिलाओं ने गुप्त संगठन, क्रांतिकारी गतिविधियों, हथियारों की व्यवस्था, संदेश पहुँचाने और प्रत्यक्ष कार्रवाइयों में सक्रिय भूमिका निभाई। बंगाल में महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही।

प्रमुख महिला क्रांतिकारी

महिला क्रांतिकारी संबंधित संगठन/आंदोलन प्रमुख गतिविधि एवं योगदान
प्रीतिलता वाडेदार इंडियन रिपब्लिकन आर्मी, चटगाँव शाखा सूर्य सेन के नेतृत्व वाले चटगाँव क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ीं। 1932 में पहाड़तली यूरोपियन क्लब पर क्रांतिकारी कार्रवाई का नेतृत्व किया। गिरफ्तारी से बचने के लिए सायनाइड खाकर अपना जीवन समाप्त किया।
कल्पना दत्त इंडियन रिपब्लिकन आर्मी, चटगाँव शाखा सूर्य सेन के नेतृत्व वाले चटगाँव क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ीं। चटगाँव शस्त्रागार कांड के बाद क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहीं और ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार की गईं।
बीना दास बंगाल की क्रांतिकारी गतिविधियाँ 1932 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर गोली चलाने का प्रयास किया। इसके बाद गिरफ्तार कर उन्हें कठोर दंड दिया गया।
शांति घोष बंगाल की क्रांतिकारी गतिविधियाँ सुनीति चौधरी के साथ मिलकर 1931 में कुमिल्ला के जिला मजिस्ट्रेट चार्ल्स स्टीवंस की हत्या की। उस समय दोनों बहुत कम उम्र की थीं।
सुनीति चौधरी बंगाल की क्रांतिकारी गतिविधियाँ शांति घोष के साथ मिलकर 1931 में चार्ल्स स्टीवंस की हत्या की। यह घटना बंगाल में महिला क्रांतिकारियों की प्रत्यक्ष भागीदारी का महत्वपूर्ण उदाहरण थी।
दुर्गा भाभी (दुर्गा देवी वोहरा) HSRA भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों को सहयोग दिया। 1928 में भगत सिंह को लाहौर से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लिया।
सुचेता कृपलानी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय रहीं और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भूमिगत गतिविधियों में भाग लिया। हालांकि उनका योगदान मुख्यतः व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ा था, न कि किसी विशिष्ट क्रांतिकारी संगठन से।

महिलाओं की व्यापक भागीदारी

➣ भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में महिलाओं की भागीदारी किसी एक आंदोलन, क्षेत्र या कार्य-पद्धति तक सीमित नहीं रही। क्रांतिकारी गतिविधियों में प्रत्यक्ष भागीदारी के साथ-साथ महिलाओं ने राजनीतिक प्रचार, गुप्त संपर्क, संगठन निर्माण, आश्रय, साहित्य के प्रसार, चिकित्सा सेवा और सैन्य गतिविधियों में भी योगदान दिया।

➣ विदेशों में भी भारतीय महिलाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मैडम भीकाजी कामा ने यूरोप में रहते हुए भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में प्रचार किया और विदेशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों के बीच महत्वपूर्ण संपर्क स्थापित किए।

➣ उन्होंने पेरिस से भारतीय राष्ट्रवादी साहित्य के प्रचार में सहयोग दिया तथा 1907 में स्टुटगार्ट में भारतीय स्वतंत्रता का ध्वज फहराकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्वतंत्रता का प्रश्न उठाया था।

➣ द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान महिलाओं की भागीदारी एक अधिक संगठित रूप में सामने आई। आजाद हिंद फौज में रानी झाँसी रेजिमेंट का गठन महिलाओं की सैन्य भागीदारी का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण था।

➣ इस रेजिमेंट में दक्षिण-पूर्व एशिया, विशेषकर मलाया और सिंगापुर में रहने वाली भारतीय मूल की महिलाओं ने भाग लिया। उन्हें सैन्य प्रशिक्षण दिया गया और आजाद हिंद आंदोलन के साथ सक्रिय रूप से जोड़ा गया।

➣ आजाद हिंद फौज से जुड़ी महिलाओं ने चिकित्सा, नर्सिंग, राहत और संगठनात्मक सहायता जैसे कार्यों में भी योगदान दिया। इस संदर्भ में चाँद बीबी नर्सिंग कॉर्प्स का उल्लेख किया जा सकता है, जिसने महिला भागीदारी को एक अलग सेवा-आधारित रूप दिया।

➣ भारतीय इतिहास में इससे पहले भी अनेक महिलाओं ने शासन, युद्ध और राजनीतिक प्रतिरोध में सक्रिय भूमिका निभाई थी। रजिया सुल्तान, रानी दुर्गावती, चाँद बीबी, अहिल्याबाई होल्कर, रानी लक्ष्मीबाई और बेगम हजरत महल जैसी महिलाओं के उदाहरण भारतीय समाज में महिलाओं की राजनीतिक और सैन्य भूमिका की पुरानी परंपरा को दर्शाते हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसी व्यापक परंपरा ने नए राजनीतिक और राष्ट्रवादी संदर्भ प्राप्त किए।

महिलाओं की भागीदारी का महत्व

➣ महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने स्वतंत्रता आंदोलन के सामाजिक आधार को व्यापक बनाया। क्रांतिकारी आंदोलनों के संदर्भ में महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी, क्योंकि भूमिगत गतिविधियों में उनके सहयोग से संदेशों का आदान-प्रदान, सुरक्षित आश्रय, संपर्क व्यवस्था और गुप्त गतिविधियों को सहायता मिली।

➣ महिलाओं की भागीदारी का एक महत्वपूर्ण प्रभाव यह भी था कि स्वतंत्रता का विचार समाज के अलग-अलग वर्गों और क्षेत्रों तक पहुँचा। विदेशों में रहने वाली भारतीय महिलाओं, दक्षिण-पूर्व एशिया की भारतीय समुदाय की महिलाओं तथा भारत के भीतर सक्रिय महिलाओं ने अलग-अलग परिस्थितियों में एक ही व्यापक उद्देश्य—भारतीय स्वतंत्रता—से स्वयं को जोड़ा।

➣ इसके बावजूद क्रांतिकारी और सशस्त्र आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी संख्या की दृष्टि से पुरुषों की तुलना में सीमित रही। सामाजिक रूढ़ियाँ, शिक्षा और संसाधनों की कमी, पारिवारिक प्रतिबंध तथा ब्रिटिश दमन ने महिलाओं की व्यापक भागीदारी के सामने अनेक बाधाएँ उत्पन्न कीं।

➣ फिर भी उपलब्ध उदाहरण यह स्पष्ट करते हैं कि भारतीय महिलाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन में केवल सहायक भूमिका नहीं निभाई। परिस्थितियों के अनुसार उन्होंने राजनीतिक कार्यकर्ता, क्रांतिकारी, प्रचारक, सैनिक, नर्स और संगठनकर्ता के रूप में भी अपनी भूमिका निभाई।

क्रांतिकारी संगठनों का वैचारिक विकास

➣ भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की विचारधारा एक जैसी और स्थिर नहीं रही। समय के साथ इसके उद्देश्यों और कार्य-पद्धति में बदलाव आया। प्रारंभिक दौर में क्रांतिकारियों का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय प्रतिरोध और भारत की स्वतंत्रता था।

➣ आगे चलकर इस आंदोलन में सशस्त्र क्रांति, गणतंत्रवाद और समाजवाद जैसे विचार भी शामिल होते गए। इस प्रकार क्रांतिकारी आंदोलन का वैचारिक विकास एक क्रमिक प्रक्रिया थी।

प्रारंभिक गुप्त क्रांतिकारी समितियाँ

➣ क्रांतिकारी आंदोलन के प्रारंभिक चरण में संगठन मुख्यतः गुप्त समितियों के रूप में बने। इन समितियों का उद्देश्य युवाओं को संगठित करना, उनमें राष्ट्रवादी भावना विकसित करना, शारीरिक एवं सैन्य प्रशिक्षण देना तथा आवश्यकता पड़ने पर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रत्यक्ष कार्रवाई करना था।

➣ बंगाल में अनुशीलन समिति और युगांतर तथा महाराष्ट्र में अभिनव भारत जैसे संगठनों ने इस विचारधारा को संगठित रूप दिया। इन संगठनों में देशभक्ति, त्याग, अनुशासन और ब्रिटिश शासन के प्रतिरोध पर विशेष जोर था।

➣ इस प्रारंभिक चरण में क्रांतिकारी विचार मुख्यतः राष्ट्रवादी और औपनिवेशिक-विरोधी थे। इनका अंतिम लक्ष्य भारत को विदेशी शासन से मुक्त कराना था, लेकिन उस समय तक भविष्य के स्वतंत्र भारत की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को लेकर कोई एक स्पष्ट वैकल्पिक विचारधारा विकसित नहीं हुई थी।

सशस्त्र क्रांति की धारणा

➣ प्रारंभिक क्रांतिकारियों का एक महत्वपूर्ण विश्वास था कि ब्रिटिश शासन केवल संवैधानिक मांगों से समाप्त नहीं होगा। इसलिए उन्होंने सशस्त्र संघर्ष को स्वतंत्रता प्राप्ति का एक प्रभावी साधन माना। बम निर्माण, हथियारों का संग्रह, सैन्य प्रशिक्षण और गुप्त संगठन इसी सोच का हिस्सा थे।

➣ इस विचारधारा में व्यक्तिगत साहस और बलिदान को विशेष महत्व मिला। ब्रिटिश अधिकारियों पर हमले, सरकारी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना तथा क्रांतिकारी साहित्य का प्रचार इसी व्यापक रणनीति से जुड़े थे।

➣ हालांकि सभी क्रांतिकारी संगठनों की कार्य-पद्धति समान नहीं थी और समय के साथ आंदोलन के भीतर भी रणनीति को लेकर बदलाव आया।

➣ प्रथम विश्वयुद्ध के समय गदर आंदोलन और अन्य क्रांतिकारी प्रयासों में व्यक्तिगत कार्रवाइयों से आगे बढ़कर व्यापक विद्रोह की योजना बनाने की प्रवृत्ति दिखाई दी।

➣ बाद में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) ने भी सशस्त्र संघर्ष को एक संगठित राजनीतिक उद्देश्य से जोड़ने का प्रयास किया।

गणतांत्रिक विचार

➣ क्रांतिकारी विचारधारा का अगला महत्वपूर्ण चरण गणतांत्रिक विचार का विकास था। क्रांतिकारियों के लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल ब्रिटिश अधिकारियों को भारत से हटाना नहीं था, बल्कि ऐसी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना भी था जिसमें भारत पर विदेशी राजशाही या औपनिवेशिक सत्ता का नियंत्रण न हो।

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) ने इस विचार को अधिक स्पष्ट राजनीतिक रूप दिया। इसके नाम में ही Republican शब्द यह संकेत देता है कि संगठन स्वतंत्र भारत को एक गणतांत्रिक व्यवस्था के रूप में देखता था। इसका लक्ष्य ब्रिटिश शासन को समाप्त करके भारत में एक संघीय गणराज्य स्थापित करना था।

➣ इस चरण में क्रांतिकारी आंदोलन केवल ब्रिटिश अधिकारियों के विरुद्ध प्रत्यक्ष कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्वतंत्र भारत की राजनीतिक संरचना पर भी विचार करने लगा। यही परिवर्तन आगे चलकर क्रांतिकारी आंदोलन को अधिक स्पष्ट राजनीतिक और वैचारिक दिशा देने वाला बना।

समाजवादी विचारों का प्रवेश

➣ 1920 के दशक में विश्व स्तर पर हो रहे राजनीतिक परिवर्तनों, विशेषकर रूसी क्रांति और समाजवादी विचारों के प्रसार का प्रभाव भारतीय क्रांतिकारियों के एक वर्ग पर पड़ा।

➣ इस दौर में कुछ क्रांतिकारी यह मानने लगे कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है; स्वतंत्र भारत में आर्थिक और सामाजिक शोषण को समाप्त करना भी आवश्यक है।

भगत सिंह और उनके साथियों ने क्रांतिकारी आंदोलन को इसी व्यापक दृष्टिकोण से जोड़ने का प्रयास किया। 1928 में HRA का पुनर्गठन करके हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) बनाया गया। संगठन के नाम में Socialist शब्द का जुड़ना क्रांतिकारी आंदोलन में समाजवादी विचारों के बढ़ते प्रभाव को स्पष्ट करता है।

➣ इस चरण में क्रांति का अर्थ केवल ब्रिटिश सत्ता को हटाना नहीं रह गया था। क्रांतिकारियों के एक वर्ग के लिए इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था स्थापित करना था जिसमें शोषण, आर्थिक असमानता और सामाजिक अन्याय को समाप्त किया जा सके। भगत सिंह के विचारों में यह परिवर्तन विशेष रूप से स्पष्ट दिखाई देता है।

➣ इस प्रकार भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की वैचारिक यात्रा को मोटे तौर पर गुप्त राष्ट्रवादी समितियों, सशस्त्र क्रांति, गणतांत्रिक व्यवस्था, समाजवादी क्रांति के विकासक्रम में समझा जा सकता है। हालांकि सभी क्रांतिकारी संगठन इस क्रम में समान रूप से आगे नहीं बढ़े और उनके विचारों में पर्याप्त अंतर भी था।

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