इंडिया हाउस
➣ इंडिया हाउस की स्थापना 1 जुलाई 1905 ई. में श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा लंदन (इंग्लैंड) में की गई थी।
प्रारम्भ में इसकी स्थापना भारतीय छात्रों के लिए एक छात्रावास के रूप में की गई, लेकिन शीघ्र ही यह विदेश में भारतीय क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया।➣ इंडिया हाउस ने उन भारतीय छात्रों और युवाओं को एक मंच प्रदान किया, जो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाना चाहते थे। यहाँ राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार, क्रांतिकारी साहित्य का अध्ययन तथा स्वतंत्रता से संबंधित विषयों पर नियमित चर्चा होती थी।
➣ विनायक दामोदर सावरकर, मदनलाल धींगरा, वी.वी.एस. अय्यर, लाला हरदयाल तथा अन्य अनेक क्रांतिकारी किसी न किसी रूप में इंडिया हाउस से जुड़े रहे। इसी कारण इसे विदेश में भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है।
स्थापना की पृष्ठभूमि
➣ 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एक नए चरण में प्रवेश कर चुका था। प्रारम्भिक वर्षों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की उदारवादी नीति के माध्यम से ब्रिटिश सरकार से संवैधानिक सुधारों और प्रशासनिक रियायतों की मांग की जा रही थी,
➣ लेकिन इन प्रयासों से भारतीयों की अपेक्षाएँ पूरी नहीं हुईं। परिणामस्वरूप अनेक युवाओं का विश्वास केवल संवैधानिक तरीकों से स्वतंत्रता प्राप्त करने में कम होने लगा।
➣ इसी बीच लॉर्ड कर्ज़न की दमनकारी नीतियों, विशेषकर बंगाल विभाजन (1905), ने पूरे देश में तीव्र असंतोष पैदा कर दिया। इसके विरोध में स्वदेशी आंदोलन और बहिष्कार आंदोलन प्रारम्भ हुए, जिससे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में उग्र राष्ट्रवाद को नई गति मिली।
➣ उधर, उच्च शिक्षा के लिए बड़ी संख्या में भारतीय विद्यार्थी इंग्लैंड पहुँच रहे थे। वे वहाँ भारत की राजनीतिक स्थिति पर विचार-विमर्श तो करते थे, लेकिन उन्हें संगठित करने वाला कोई स्थायी राष्ट्रवादी केंद्र नहीं था।
➣ विदेश में ऐसा कोई मंच भी उपलब्ध नहीं था, जहाँ भारतीय छात्र स्वतंत्र रूप से राष्ट्रवादी विचारों का आदान-प्रदान कर सकें और भारत की स्वतंत्रता के लिए संगठित प्रयास कर सकें।
➣ इन राजनीतिक और वैचारिक परिस्थितियों ने विदेश में एक ऐसे राष्ट्रवादी केंद्र की आवश्यकता उत्पन्न की, जो भारतीय छात्रों और युवाओं को एकजुट कर भारत की स्वतंत्रता के लिए जनमत तैयार कर सके।
➣ इसी आवश्यकता ने आगे चलकर विदेश में भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया।
श्यामजी कृष्ण वर्मा
➣ श्यामजी कृष्ण वर्मा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख राष्ट्रवादी विचारक, क्रांतिकारी, विद्वान तथा समाज सुधारक थे।
➣ उनका जन्म 4 अक्टूबर 1857 ई. को मांडवी (कच्छ, गुजरात) में हुआ था। वे संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे और अपने ज्ञान के कारण देश-विदेश में सम्मानित थे।
➣ श्यामजी कृष्ण वर्मा स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचारों से गहराई से प्रभावित थे। वे मानते थे कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति के लिए स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और स्वशासन आवश्यक हैं। यही विचार आगे चलकर उनके राष्ट्रवादी दृष्टिकोण का आधार बने।
➣ उच्च शिक्षा और सार्वजनिक जीवन के दौरान उन्हें इंग्लैंड में रहने तथा कार्य करने का अवसर मिला। वहाँ उन्होंने देखा कि भारत से उच्च शिक्षा के लिए आने वाले अनेक भारतीय छात्र देश की राजनीतिक स्थिति को लेकर चिंतित तो थे,
➣ लेकिन उनके पास ऐसा कोई साझा मंच नहीं था, जहाँ वे संगठित होकर राष्ट्रवादी विचारों का आदान-प्रदान कर सकें। अधिकांश छात्र अपनी पढ़ाई तक ही सीमित रहते थे और भारतीय स्वतंत्रता से जुड़े विषयों पर खुलकर चर्चा करने या संगठित गतिविधियाँ चलाने का कोई स्थायी केंद्र उपलब्ध नहीं था।
➣ श्यामजी कृष्ण वर्मा का मानना था कि यदि विदेश में रह रहे भारतीय छात्रों और युवाओं को एक मंच पर संगठित किया जाए, तो वे न केवल भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना को मजबूत कर सकते हैं,
➣ बल्कि ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों में भी भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में प्रभावी जनमत तैयार कर सकते हैं। इसी विचार ने उन्हें विदेश में भारतीय राष्ट्रवादी गतिविधियों को संगठित रूप देने की दिशा में कार्य करने के लिए प्रेरित किया।
इंडिया हाउस की स्थापना (1905)
➣ विदेश में भारतीय छात्रों और राष्ट्रवादी युवाओं को संगठित करने की अपनी योजना को साकार करने के लिए श्यामजी कृष्ण वर्मा ने सबसे पहले 18 फरवरी 1905 ई. को इंडियन होमरूल सोसायटी की स्थापना की।
➣ इस संस्था का उद्देश्य भारत में स्वशासन की मांग का समर्थन करना तथा इंग्लैंड में भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में जनमत तैयार करना था।
➣ इसके कुछ ही महीनों बाद 1 जुलाई 1905 ई. को उन्होंने लंदन के हाईगेट क्षेत्र में स्थित 65, क्रॉमवेल एवेन्यू में इंडिया हाउस की स्थापना की।
➣ प्रारम्भ में यह भारतीय छात्रों के लिए एक छात्रावास था, जहाँ वे कम खर्च में रहकर अपनी शिक्षा पूरी कर सकते थे। आगे चलकर यह विदेश में भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
➣ इंडिया हाउस का उद्घाटन प्रसिद्ध ब्रिटिश समाजवादी नेता हेनरी एम. हाइंडमैन ने किया। इस अवसर पर दादाभाई नौरोजी, मैडम भीकाजी कामा तथा अनेक भारतीय और ब्रिटिश समर्थक उपस्थित थे।
➣ उद्घाटन समारोह में हाइंडमैन ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में ब्रिटेन के प्रति निष्ठा, भारत के प्रति विश्वासघात के समान है। यह कथन उस समय के उग्र राष्ट्रवादी विचारों का प्रतीक माना जाता है।
इंडिया हाउस के संस्थापक एवं प्रमुख सदस्य
| व्यक्तित्व | इंडिया हाउस से संबंध एवं योगदान |
|---|---|
| श्यामजी कृष्ण वर्मा | इंडिया हाउस के संस्थापक। उन्होंने इंडियन होमरूल सोसायटी और The Indian Sociologist के माध्यम से विदेश में भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन को संगठित किया। |
| विनायक दामोदर सावरकर | 1906 ई. में इंडिया हाउस से जुड़े। उन्होंने इसकी गतिविधियों को नई दिशा दी तथा राष्ट्रवादी साहित्य के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। |
| वी.वी.एस. अय्यर | इंडिया हाउस के प्रमुख क्रांतिकारी सदस्य एवं सावरकर के सहयोगी। उन्होंने संगठन की राष्ट्रवादी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। |
| मदनलाल धींगरा | इंडिया हाउस से जुड़े प्रमुख क्रांतिकारी। बाद में वे अभिनव भारत से भी जुड़े और 1909 ई. की घटना के बाद इंडिया हाउस ब्रिटिश सरकार के निशाने पर आ गया। |
| मैडम भीकाजी कामा | इंडिया हाउस की प्रमुख सहयोगी। उन्होंने यूरोप में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का प्रचार किया और 1907 ई. में स्टुटगार्ट सम्मेलन में भारतीय राष्ट्रवादी ध्वज फहराया। |
| सरदार सिंह राणा | विदेश में भारतीय क्रांतिकारियों के प्रमुख सहयोगी। उन्होंने यूरोप में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को सक्रिय समर्थन दिया। |
| लाला हरदयाल | इंडिया हाउस से जुड़े राष्ट्रवादी नेता। आगे चलकर वे गदर आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए। |
इंडिया हाउस के उद्देश्य
➣ इंडिया हाउस की स्थापना केवल भारतीय छात्रों के लिए छात्रावास उपलब्ध कराने के उद्देश्य से नहीं की गई थी। मुख्य उद्देश्य विदेश में रह रहे भारतीय छात्रों और राष्ट्रवादी युवाओं को एक मंच पर संगठित कर भारत की स्वतंत्रता के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना था।
- विदेश में रह रहे भारतीय छात्रों एवं युवाओं को एक साझा राष्ट्रवादी मंच प्रदान करना।
- भारतीयों में स्वशासन (Home Rule) तथा राष्ट्रीय चेतना का प्रचार-प्रसार करना।
- ब्रिटिश शासन की नीतियों से भारतीय छात्रों को अवगत कराना तथा उनमें देशभक्ति की भावना को मजबूत करना।
- भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों में जनमत तैयार करना।
- राष्ट्रवादी विचारों के आदान-प्रदान, अध्ययन और संगठन के लिए एक स्थायी केंद्र उपलब्ध कराना।
- भारतीय छात्रों के बीच आपसी सहयोग, एकता और नेतृत्व क्षमता का विकास करना।
➣ यद्यपि इंडिया हाउस की शुरुआत एक छात्रावास के रूप में हुई थी, लेकिन समय के साथ यह विदेश में भारतीय राष्ट्रवाद और क्रांतिकारी गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
इंडिया हाउस की प्रमुख गतिविधियाँ
➣ शीघ्र ही इंडिया हाउस केवल एक छात्रावास तक सीमित नहीं रहा। यह भारतीय छात्रों, राष्ट्रवादियों और क्रांतिकारियों का प्रमुख मिलन-स्थल बन गया, जहाँ स्वतंत्रता, स्वराज्य और ब्रिटिश शासन के विरोध से संबंधित विचारों पर नियमित चर्चा होने लगी।
➣ इंडिया हाउस में विभिन्न प्रांतों से आए भारतीय छात्र, राष्ट्रवादी नेता और क्रांतिकारी एक-दूसरे के संपर्क में आते थे। इससे उनके बीच विचारों का आदान-प्रदान बढ़ा और राष्ट्रीय एकता की भावना मजबूत हुई। यह स्थान भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा और संगठन का केंद्र बन गया।
➣ यहाँ राष्ट्रवादी साहित्य का अध्ययन, पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं का वितरण तथा स्वतंत्रता से संबंधित व्याख्यानों का आयोजन भी किया जाता था। इन गतिविधियों का उद्देश्य भारतीय युवाओं में राष्ट्रीय चेतना जागृत करना और उन्हें देश की स्वतंत्रता के लिए तैयार करना था।
➣ समय के साथ इंडिया हाउस की गतिविधियाँ केवल वैचारिक चर्चाओं तक सीमित नहीं रहीं। यह अनेक क्रांतिकारियों के बीच संपर्क स्थापित करने, संगठन को मजबूत करने तथा विदेश में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा देने का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
विनायक दामोदर सावरकर की भूमिका
➣ विनायक दामोदर सावरकर 1906 ई. में श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा प्रदान की गई शिवाजी छात्रवृत्ति के माध्यम से कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड पहुँचे।
➣ लंदन आने के बाद वे इंडिया हाउस से जुड़ गए और शीघ्र ही वहाँ के सबसे प्रभावशाली राष्ट्रवादी नेताओं में गिने जाने लगे। सावरकर के आगमन के बाद इंडिया हाउस की गतिविधियों को नई दिशा मिली।
➣ सावरकर का मानना था कि भारत की स्वतंत्रता केवल याचिकाओं और संवैधानिक सुधारों से प्राप्त नहीं की जा सकती। इसलिए वे भारतीय युवाओं में साहस, आत्मविश्वास और राष्ट्रभक्ति की भावना विकसित करने पर विशेष बल देते थे।
➣ इसी दौरान सावरकर ने इंडिया हाउस में रहते हुए 1857 के विद्रोह का गहन अध्ययन किया और उसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सिद्ध करने का प्रयास किया।
➣ इसी आधार पर उन्होंने The Indian War of Independence, 1857 नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी। ब्रिटिश सरकार ने इसके प्रकाशन और भारत में वितरण पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन इसकी प्रतियाँ गुप्त रूप से भारत पहुँचाई जाती रहीं।
The Indian Sociologist
➣ The Indian Sociologist एक अंग्रेज़ी मासिक पत्रिका थी, जिसका प्रकाशन जनवरी 1905 ई. में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने प्रारम्भ किया। इसका उद्देश्य भारत में स्वशासन (Home Rule), राष्ट्रीय चेतना तथा स्वतंत्रता के विचारों का प्रचार-प्रसार करना था।
➣ इस पत्रिका के माध्यम से ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना की जाती थी तथा भारतीयों को अपने अधिकारों और स्वतंत्रता के प्रति जागरूक किया जाता था। इसमें प्रकाशित लेख भारतीय छात्रों और राष्ट्रवादियों को ब्रिटिश शासन का विरोध करने तथा राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए प्रेरित करते थे।
➣ The Indian Sociologist केवल इंग्लैंड तक सीमित नहीं रही। इसकी प्रतियाँ गुप्त रूप से भारत और अन्य देशों में भी भेजी जाती थीं, जिससे विदेशों में चल रहे भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन की जानकारी व्यापक स्तर पर पहुँची।
➣ पत्रिका में प्रकाशित राष्ट्रवादी विचारों के कारण ब्रिटिश सरकार ने इसे राजद्रोह फैलाने वाला प्रकाशन माना और इसकी प्रतियों के वितरण पर कड़ी निगरानी रखी। इसके बावजूद यह विदेश में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रचार का एक प्रभावशाली माध्यम बनी रही।
मैडम भीकाजी कामा एवं इंडिया हाउस
➣ मैडम भीकाजी कामा विदेश में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की अग्रणी राष्ट्रवादी नेता थीं। वे श्यामजी कृष्ण वर्मा, सरदार सिंह राणा, विनायक दामोदर सावरकर तथा इंडिया हाउस से जुड़े अन्य भारतीय क्रांतिकारियों के निकट संपर्क में थीं।
➣ यद्यपि वे इंडिया हाउस की स्थायी सदस्य नहीं थीं, फिर भी वे उसकी राष्ट्रवादी गतिविधियों की प्रबल समर्थक थीं और भारतीय क्रांतिकारियों को वैचारिक, आर्थिक तथा नैतिक सहयोग प्रदान करती थीं।
➣ विदेश में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित करने के उद्देश्य से 1905 ई. में उन्होंने सरदार सिंह राणा तथा मुंचेरशाह बुर्जोरजी गोडरेज के साथ मिलकर पेरिस इंडियन सोसायटी की स्थापना की।
➣ यह संस्था यूरोप में भारतीय राष्ट्रवादियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गई, जहाँ से ब्रिटिश शासन की नीतियों का विरोध किया जाता था तथा विभिन्न सभाओं, लेखों और प्रचार-प्रसार के माध्यम से भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में अंतरराष्ट्रीय जनमत तैयार करने का प्रयास किया जाता था।
➣ मैडम कामा का मानना था कि भारत की स्वतंत्रता का प्रश्न केवल भारत या इंग्लैंड तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाना आवश्यक है, ताकि विश्व समुदाय भी ब्रिटिश शासन की वास्तविकता से परिचित हो सके। इसी उद्देश्य से उन्होंने यूरोप के अनेक देशों में आयोजित सम्मेलनों और सभाओं में भाग लेकर भारत की स्वतंत्रता का प्रभावी पक्ष रखा।
➣ 1907 ई. में ब्रिटिश सरकार द्वारा बढ़ती निगरानी और राजद्रोह के आरोपों की आशंका के कारण श्यामजी कृष्ण वर्मा इंग्लैंड छोड़कर पेरिस (फ्रांस) चले गए।
➣ इसके बाद यूरोप में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी और अधिक सक्रिय रूप से मैडम भीकाजी कामा, सरदार सिंह राणा तथा अन्य भारतीय राष्ट्रवादियों ने संभाली।
➣ उन्होंने फ्रांस, जर्मनी तथा अन्य यूरोपीय देशों में आयोजित सभाओं और सम्मेलनों में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की आलोचना की तथा भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने का अभियान जारी रखा।
मैडम भीकाजी कामा इंडिया हाउस की स्थायी सदस्य नहीं थीं, बल्कि उसकी राष्ट्रवादी गतिविधियों की प्रमुख समर्थक थीं। वे पेरिस इंडियन सोसायटी की संस्थापक एवं प्रमुख सदस्य थीं।
स्टुटगार्ट सम्मेलन (1907) में भारतीय ध्वज फहराना
➣ इसी अभियान के दौरान 22 अगस्त 1907 ई. को जर्मनी के स्टुटगार्ट नगर में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन आयोजित हुआ।
➣ इस सम्मेलन में विश्व के अनेक देशों से समाजवादी नेता, श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधि और राजनीतिक कार्यकर्ता शामिल हुए थे। मैडम भीकाजी कामा तथा सरदार सिंह राणा ने भारतीय प्रतिनिधियों के रूप में इसमें भाग लिया।
➣ सम्मेलन का उद्देश्य विश्वभर में श्रमिकों के अधिकारों, साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद जैसे मुद्दों पर विचार-विमर्श करना था। मैडम कामा ने इस सम्मेलन को भारत की स्वतंत्रता का मुद्दा विश्व समुदाय के सामने रखने का उपयुक्त अवसर माना।
➣ अपने संबोधन में उन्होंने ब्रिटिश शासन द्वारा भारत में किए जा रहे आर्थिक शोषण, राजनीतिक दमन तथा भारतीय जनता की दयनीय स्थिति का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने उपस्थित प्रतिनिधियों से भारत की स्वतंत्रता का समर्थन करने का आह्वान भी किया।
➣ अपने भाषण के अंत में मैडम भीकाजी कामा ने भारत का एक राष्ट्रवादी ध्वज फहराया। यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की एक ऐतिहासिक घटना थी, क्योंकि पहली बार किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत के राष्ट्रवादी ध्वज को विश्व मंच पर प्रदर्शित किया गया।
➣ इस ध्वज के ऊपरी भाग में आठ कमल के पुष्प अंकित थे, जो तत्कालीन भारत के प्रमुख प्रांतों का प्रतीक माने जाते हैं। मध्य भाग में बड़े अक्षरों में वन्दे मातरम् लिखा गया था, जबकि निचले भाग में सूर्य और अर्धचंद्र के चिन्ह बनाए गए थे, जो भारत की सांस्कृतिक विविधता और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक थे।
➣ स्टुटगार्ट सम्मेलन की इस घटना ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई। यूरोप और अन्य देशों में भारत की स्वतंत्रता का प्रश्न गंभीरता से उठाया जाने लगा तथा विदेशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों का मनोबल बढ़ा। इससे इंडिया हाउस के प्रभाव में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
मदनलाल धींगरा एवं इंडिया हाउस
➣ मदनलाल धींगरा उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए थे। लंदन में उनका संपर्क इंडिया हाउस से हुआ, जो उस समय भारतीय छात्रों और राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं का प्रमुख केंद्र था। यहीं से उनका परिचय उन व्यक्तियों और विचारों से हुआ, जो ब्रिटिश शासन का संगठित विरोध कर रहे थे।
इंडिया हाउस से संबंध
➣ इंडिया हाउस में मदनलाल धींगरा का संपर्क विनायक दामोदर सावरकर, वी.वी.एस. अय्यर तथा अन्य भारतीय क्रांतिकारियों से हुआ। यहाँ नियमित रूप से भारत की राजनीतिक स्थिति, ब्रिटिश नीतियों, स्वशासन तथा स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े विषयों पर चर्चा होती थी। इन बैठकों में मदनलाल धींगरा भी भाग लेने लगे।
➣ इंडिया हाउस में रहते हुए उन्होंने राष्ट्रवादी साहित्य का अध्ययन किया और वहाँ संचालित विभिन्न गतिविधियों में भाग लिया। इसी वातावरण में उनके राजनीतिक विचारों में परिवर्तन आया तथा वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ गए।
अभिनव भारत से संबंध
➣ इंडिया हाउस में रहते हुए मदनलाल धींगरा का संपर्क विनायक दामोदर सावरकर के माध्यम से अभिनव भारत के क्रांतिकारी नेटवर्क से भी हुआ। इसके बाद वे अभिनव भारत की विचारधारा और गतिविधियों से जुड़े तथा संगठन के उद्देश्यों का समर्थन करने लगे।
➣ आगे चलकर उन्होंने 1 जुलाई 1909 ई. को सर विलियम हट कर्ज़न वायली की हत्या की। इस घटना के बाद ब्रिटिश सरकार ने इंडिया हाउस की गतिविधियों पर कड़ी निगरानी शुरू कर दी।
ब्रिटिश सरकार की कार्रवाई एवं इंडिया हाउस का पतन
➣ जुलाई 1909 ई. को मदनलाल धींगरा द्वारा सर विलियम हट कर्ज़न वायली की हत्या के बाद उसने इंडिया हाउस को क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र मानते हुए उसके विरुद्ध दमनात्मक कार्रवाई तेज कर दी।
➣ ब्रिटिश सरकार ने इंडिया हाउस में आयोजित बैठकों, भारतीय छात्रों की गतिविधियों, पत्राचार तथा राष्ट्रवादी साहित्य के प्रकाशन और वितरण पर कड़ी निगरानी रखनी शुरू कर दी।
The Indian Sociologist जैसी राष्ट्रवादी पत्रिकाओं के वितरण पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया गया तथा ब्रिटिश विरोधी साहित्य को जब्त किया जाने लगा। इसके कारण इंडिया हाउस के लिए पहले की तरह खुले रूप में कार्य करना कठिन होता गया।➣ सरकारी दबाव बढ़ने के साथ ही इंडिया हाउस से जुड़े अनेक भारतीय छात्रों और क्रांतिकारियों को प्रशासनिक निगरानी, पूछताछ तथा अन्य दमनात्मक उपायों का सामना करना पड़ा।
कई प्रमुख सदस्य इंग्लैंड छोड़कर फ्रांस तथा अन्य यूरोपीय देशों में चले गए, जबकि कुछ ने अपनी गतिविधियाँ गुप्त रूप से जारी रखीं। परिणामस्वरूप इंडिया हाउस का संगठनात्मक ढाँचा धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा।➣ कुछ वर्षों के भीतर इंडिया हाउस अपनी पूर्व सक्रियता बनाए नहीं रख सका और उसकी गतिविधियाँ लगभग समाप्त हो गईं।
यद्यपि एक संगठन के रूप में इसका प्रभाव कम हो गया, लेकिन विदेश में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में इसका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।अक्सर होने वाले सामान्य भ्रम
➣ इंडिया हाउस की स्थापना 1 जुलाई 1905 ई. को हुई थी, जबकि इंडियन होमरूल सोसायटी की स्थापना 18 फरवरी 1905 ई. को हुई थी।
➣ इंडिया हाउस और इंडियन होमरूल सोसायटी एक ही संस्था नहीं थे। इंडियन होमरूल सोसायटी एक राजनीतिक संगठन था, जबकि इंडिया हाउस भारतीय छात्रों का छात्रावास एवं राष्ट्रवादी गतिविधियों का केंद्र था।
➣ हेनरी एम. हाइंडमैन (Henry M. Hyndman) इंडिया हाउस के संस्थापक नहीं थे। उन्होंने केवल इसके उद्घाटन समारोह में भाग लिया था।
➣ इंडिया हाउस की स्थापना लंदन (इंग्लैंड) में हुई थी, जबकि स्टुटगार्ट सम्मेलन जर्मनी में आयोजित हुआ था।
➣ श्यामजी कृष्ण वर्मा ने The Indian Sociologist का प्रकाशन प्रारम्भ किया था, इसका संपादन या प्रकाशन सावरकर ने शुरू नहीं किया था।
➣ इंडिया हाउस विदेश में भारतीय क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था, लेकिन यह स्वयं कोई गुप्त क्रांतिकारी संगठन नहीं था।
➣ इंडिया हाउस की स्थापना श्यामजी कृष्ण वर्मा ने की थी, जबकि इसके प्रमुख नेता के रूप में विनायक दामोदर सावरकर प्रसिद्ध हुए।
➣ The Indian Sociologist का प्रकाशन जनवरी 1905 ई. में प्रारम्भ हुआ था, अर्थात यह इंडिया हाउस की स्थापना से भी पहले प्रकाशित होने लगी थी।
➣ शिवाजी छात्रवृत्ति के माध्यम से विनायक दामोदर सावरकर 1906 ई. में इंग्लैंड पहुँचे और बाद में इंडिया हाउस से जुड़े।
➣ विनायक दामोदर सावरकर इंडिया हाउस के संस्थापक नहीं थे। वे 1906 ई. में इससे जुड़े और इसकी गतिविधियों को नई दिशा दी।
➣ मैडम भीकाजी कामा ने जो ध्वज 1907 ई. में स्टुटगार्ट सम्मेलन में फहराया था, वह वर्तमान भारत का राष्ट्रीय ध्वज नहीं था, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक प्रारम्भिक राष्ट्रवादी ध्वज था।
➣ मैडम भीकाजी कामा इंडिया हाउस की स्थायी सदस्य नहीं थीं, बल्कि वे पेरिस इंडियन सोसायटी की संस्थापक एवं प्रमुख नेताओं में से एक थीं।
➣ मदनलाल धींगरा का संबंध इंडिया हाउस और अभिनव भारत दोनों से था, इसलिए दोनों संगठनों को एक ही संस्था समझना गलत है।
➣ कर्ज़न वायली हत्याकांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने इंडिया हाउस पर निगरानी और दमनात्मक कार्रवाई तेज कर दी, जिससे इसकी गतिविधियाँ धीरे-धीरे समाप्त हो गईं।
➣ इंडिया हाउस का मूल उद्देश्य भारतीय छात्रों को संगठित करना और राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार करना था, लेकिन आगे चलकर यह विदेश में भारतीय क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया।
➣ इंडिया हाउस एक छात्रावास भी था और राष्ट्रवादी गतिविधियों का केंद्र भी; इसे केवल छात्रावास या केवल क्रांतिकारी संगठन मानना सही नहीं है।
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