आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) : परिचय
➣ आज़ाद हिंद फ़ौज (Indian National Army – INA) द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने के उद्देश्य से गठित एक सशस्त्र भारतीय राष्ट्रीय सेना थी।
➣ इसका प्रारंभिक गठन दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय युद्धबंदियों के बीच कैप्टन मोहन सिंह के नेतृत्व में हुआ और बाद में सुभाष चंद्र बोस ने इसका पुनर्गठन करके इसे व्यापक स्वतंत्रता-संघर्ष की सैन्य शक्ति के रूप में विकसित किया।
➣ INA का इतिहास दो प्रमुख चरणों में समझा जा सकता है। प्रथम चरण में 1942 में मोहन सिंह के नेतृत्व में भारतीय युद्धबंदियों को संगठित करके INA का गठन किया गया, जबकि द्वितीय चरण में 1943 के बाद सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में इसका पुनर्गठन, विस्तार और सैन्य अभियान संचालित किए गए।
➣ सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में INA ने Indian Independence League और बाद में आज़ाद हिंद सरकार के साथ मिलकर भारत की स्वतंत्रता के लिए राजनीतिक तथा सैन्य संघर्ष को आगे बढ़ाया।
➣ INA के इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सुभाष चंद्र बोस ने दक्षिण-पूर्व एशिया पहुँचने से पहले जर्मनी में भी भारतीय सैनिकों का एक सैन्य संगठन विकसित किया था।
➣ इसे सामान्यतः Indian Legion, Free India Legion या Azad Hind Legion कहा जाता था। इस सेना में मुख्यतः भारतीय युद्धबंदी सैनिक और यूरोप में रहने वाले भारतीय स्वयंसेवक शामिल थे।
➣ जर्मनी में गठित इस सेना को जर्मन सेना (Wehrmacht) में औपचारिक रूप से 950th (Indian) Infantry Regiment या Infanterie-Regiment 950 (indisches) के नाम से संगठित किया गया था। इसे सामान्यतः Indian Legion के नाम से जाना जाता था।
अप्रैल 1943 से यह नाम जर्मन सैन्य अभिलेखों में औपचारिक रूप से प्रयुक्त हुआ। बाद में 1944 में इस इकाई को Waffen-SS के अधीन कर दिया गया।➣ जर्मनी की Indian Legion और दक्षिण-पूर्व एशिया की Indian National Army को एक ही सैन्य संगठन नहीं मानना चाहिए। दोनों अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में विकसित हुए थे, लेकिन दोनों का व्यापक उद्देश्य ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारतीय स्वतंत्रता के लिए सैन्य संघर्ष करना था।
➣ दक्षिण-पूर्व एशिया में गठित INA ही आगे चलकर सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में दिल्ली चलो के आह्वान के साथ भारत की पूर्वी सीमा तक पहुँची और 1944 में मणिपुर के मोइरांग में आज़ाद हिंद का ध्वज फहराने जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ी।
➣ इस प्रकार आज़ाद हिंद फ़ौज भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सशस्त्र राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय एकता और विदेशी सहायता के माध्यम से औपनिवेशिक शासन को चुनौती देने के प्रयास का महत्वपूर्ण उदाहरण थी।
➣ इसकी सैन्य सफलता सीमित रही, लेकिन इसके सैनिकों और बाद के INA Trials ने भारतीय जनमत और स्वतंत्रता आंदोलन पर महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रभाव डाला।
पृष्ठभूमि
➣ आज़ाद हिंद फ़ौज (Indian National Army – INA) के गठन की पृष्ठभूमि मुख्यतः द्वितीय विश्वयुद्ध (1939–1945) के दौरान दक्षिण-पूर्व एशिया में तेजी से बदलती सैन्य और राजनीतिक परिस्थितियों से तैयार हुई।
जापान ने 1941–42 में मलाया, सिंगापुर और बर्मा की ओर तीव्र सैन्य अभियान चलाया, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में ब्रिटिश भारतीय सेना के सैनिक जापानियों के हाथों युद्धबंदी बन गए।द्वितीय विश्वयुद्ध और दक्षिण-पूर्व एशिया की परिस्थितियाँ
➣ द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रारंभ के बाद ब्रिटिश साम्राज्य ने अपने एशियाई उपनिवेशों की रक्षा के लिए भारतीय सैनिकों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया। दक्षिण-पूर्व एशिया में मलाया, सिंगापुर और बर्मा ब्रिटिश साम्राज्य की महत्वपूर्ण सामरिक चौकियाँ थीं और इन क्षेत्रों की रक्षा में भारतीय सैनिकों की बड़ी संख्या तैनात थी।
➣ दिसंबर 1941 से जापान ने दक्षिण-पूर्व एशिया में तीव्र सैन्य अभियान शुरू किया। जापानी सेना ने मलाया प्रायद्वीप पर तेजी से आगे बढ़ते हुए ब्रिटिश सेनाओं को पीछे हटने के लिए मजबूर किया। इसके बाद जापान की सैन्य प्रगति बर्मा तथा अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्रों तक फैल गई।
➣ दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रिटिश सैन्य स्थिति के तेजी से कमजोर होने से वहाँ मौजूद भारतीय सैनिकों के सामने ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हुई जिसमें उन्हें पहली बार संगठित रूप से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारतीय स्वतंत्रता के उद्देश्य से जोड़ने का अवसर मिला। इसी परिस्थिति ने आगे चलकर INA के गठन का आधार तैयार किया।
मलाया और सिंगापुर में भारतीय सैनिकों की स्थिति
➣ जापानी आक्रमण के समय मलाया में लगभग 70,000 भारतीय सैनिक ब्रिटिश सेना के अंतर्गत तैनात थे। इन सैनिकों में विभिन्न भारतीय रेजिमेंटों के जवान शामिल थे, जो जापानी सेना के विरुद्ध मलाया अभियान में लड़ रहे थे।
➣ ब्रिटिश भारतीय सेना में कार्यरत कुछ भारतीय अधिकारियों और सैनिकों के मन में ब्रिटिश सैन्य व्यवस्था में नस्ली भेदभाव तथा भारतीयों के साथ असमान व्यवहार को लेकर असंतोष था। इस असंतोष ने बाद में जापानी संपर्क और भारतीय स्वतंत्रता के विचार के लिए कुछ सैनिकों में अनुकूल वातावरण तैयार किया।
➣ मलाया में ब्रिटिश सेना की पराजय के बाद भारतीय सैनिकों का एक बड़ा भाग पीछे हटते हुए सिंगापुर पहुँचा। अंततः 15 फरवरी 1942 को सिंगापुर ने जापानी सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। यह घटना INA के इतिहास में निर्णायक मोड़ बनी।
ब्रिटिश भारतीय सेना के भारतीय युद्धबंदी
➣ सिंगापुर के पतन के बाद बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक जापानियों के युद्धबंदी (Prisoners of War – POWs) बन गए। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार लगभग 55,000 भारतीय सैनिक जापानी कब्जे में आए थे।
➣ 17 फरवरी 1942 के आसपास जापानियों ने सिंगापुर के फैरर पार्क (Farrer Park) में भारतीय युद्धबंदियों को एकत्र किया। यहाँ जापानी खुफिया अधिकारी कैप्टन इवाइची फूजीवारा और कैप्टन मोहन सिंह ने भारतीय सैनिकों को ब्रिटिश सेना के प्रति अपनी निष्ठा छोड़कर भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने का आह्वान किया।
➣ सभी भारतीय युद्धबंदियों ने INA में शामिल होना स्वीकार नहीं किया। कुछ सैनिक INA में शामिल हुए, जबकि अन्य को जापानियों द्वारा विभिन्न प्रकार के श्रम कार्यों में लगाया गया और उन्हें कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। इसलिए भारतीय युद्धबंदियों को एक समान समूह के रूप में देखना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है।
➣ भारतीय सैनिकों के INA में शामिल होने के पीछे कई कारण थे – भारत की स्वतंत्रता की आकांक्षा, ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष, ब्रिटिश सेना में नस्ली भेदभाव का अनुभव तथा जापान की ओर से एशिया को पश्चिमी औपनिवेशिक शासन से मुक्त कराने के प्रचार जैसे तत्व इसमें शामिल थे।
जापान की दक्षिण-पूर्व एशिया में विजय
➣ 1941–42 में जापान की तीव्र सैन्य सफलताओं ने दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया। जापानी सेना ने मलाया पर तेजी से अधिकार किया और 15 फरवरी 1942 को सिंगापुर पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद जापानी सेना बर्मा की ओर भी आगे बढ़ी।
➣ जापान की विजय ने दक्षिण-पूर्व एशिया में रहने वाले भारतीय समुदाय और भारतीय युद्धबंदियों के बीच भारतीय स्वतंत्रता के लिए संगठित आंदोलन की संभावनाएँ बढ़ा दीं। इसी समय भारतीय राष्ट्रवादियों ने विदेश स्थित भारतीय समुदायों और सैनिकों को एक राजनीतिक तथा सैन्य संगठन के अंतर्गत संगठित करने का प्रयास शुरू किया।
➣ इसी व्यापक परिस्थिति में कैप्टन मोहन सिंह और जापानी अधिकारी इवाइची फूजीवारा के बीच संपर्क विकसित हुआ तथा भारतीय युद्धबंदियों को एक स्वतंत्र भारतीय सैन्य संगठन में संगठित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। यही प्रक्रिया आगे चलकर प्रथम आज़ाद हिंद फ़ौज के गठन का आधार बनी।
आज़ाद हिंद फ़ौज का प्रथम गठन – मोहन सिंह
प्रथम INA के गठन की प्रक्रिया
➣ आज़ाद हिंद फ़ौज (Indian National Army – INA) का पहला रूप सुभाष चंद्र बोस के आने से पहले ही दक्षिण-पूर्व एशिया में विकसित हो चुका था।
➣ इस प्रक्रिया में कैप्टन मोहन सिंह की केंद्रीय भूमिका रही। वे ब्रिटिश भारतीय सेना की 1/14 पंजाब रेजिमेंट से संबद्ध अधिकारी थे और मलाया अभियान के दौरान जापानियों के युद्धबंदी बने।
➣ युद्धबंदी बनने के बाद उनका संपर्क जापानी खुफिया अधिकारी कैप्टन इवाइची फूजीवारा से हुआ। फूजीवारा दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय राष्ट्रवादी तत्वों और भारतीय सैनिकों के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए जापानी खुफिया संगठन Fujiwara Kikan का नेतृत्व कर रहे थे।
➣ फूजीवारा का उद्देश्य भारतीय सैनिकों और राष्ट्रवादियों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जापान के युद्ध प्रयास से जोड़ना था। दूसरी ओर, मोहन सिंह भारतीय सैनिकों की शक्ति का उपयोग भारत की स्वतंत्रता के लिए करना चाहते थे।
➣ इन दोनों के बीच सहयोग से भारतीय युद्धबंदियों को एक संगठित भारतीय सैन्य बल में बदलने की योजना आगे बढ़ी।
➣ 15 फरवरी 1942 को सिंगापुर के पतन के बाद बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक जापानियों के युद्धबंदी बने। इन्हें फैरर पार्क (Farrer Park), सिंगापुर में एकत्र किया गया।
➣ यहाँ भारतीय सैनिकों को ब्रिटिश सेना के प्रति अपनी पूर्व निष्ठा छोड़कर भारत की स्वतंत्रता के उद्देश्य से एक भारतीय सेना में शामिल होने का विचार प्रस्तुत किया गया। इसके बाद मोहन सिंह के नेतृत्व में भारतीय युद्धबंदियों को क्रमबद्ध रूप से संगठित करने का कार्य शुरू हुआ।
➣ यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सभी भारतीय युद्धबंदी INA में शामिल नहीं हुए थे। INA का आधार उन सैनिकों से बना जो भारत की स्वतंत्रता के लिए एक अलग भारतीय सैन्य संगठन में शामिल होने के लिए तैयार थे।
➣ इस प्रकार भारतीय युद्धबंदियों की विशाल संख्या ने प्रथम INA के लिए मानव संसाधन उपलब्ध कराया, जबकि मोहन सिंह और Fujiwara Kikan ने उसके प्रारंभिक संगठन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।
➣ धीरे-धीरे यह संगठन एक स्वतंत्र भारतीय सैन्य बल का रूप लेने लगा। इस प्रकार सिंगापुर का पतन, भारतीय युद्धबंदियों का एकत्रीकरण, मोहन सिंह का नेतृत्व तथा Fujiwara Kikan का सहयोग – इन सभी ने मिलकर प्रथम INA के गठन की परिस्थितियाँ तैयार कीं।
प्रथम INA का उद्देश्य, स्वरूप और संकट
➣ 1 सितंबर 1942 को सिंगापुर में प्रथम आज़ाद हिंद फ़ौज का औपचारिक गठन कैप्टन मोहन सिंह के नेतृत्व में हुआ। इसका मुख्य आधार जापानी नियंत्रण में आए भारतीय युद्धबंदी सैनिक थे।
➣ इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष करना और भारतीय सैनिकों को स्वतंत्रता आंदोलन की सैन्य शक्ति में परिवर्तित करना था।
➣ मोहन सिंह की दृष्टि में INA को केवल जापानी सेना की एक सहायक इकाई नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाली एक राष्ट्रीय भारतीय सेना होना चाहिए था। इसलिए वे INA के संगठन, उसके सैनिकों की भर्ती तथा उसके सैन्य उपयोग में भारतीय नेतृत्व और पर्याप्त स्वायत्तता पर जोर देते थे।
➣ प्रारंभिक INA अभी निर्माण की अवस्था में थी और उसके सामने कई व्यावहारिक समस्याएँ थीं। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि INA का नियंत्रण किसके हाथ में रहेगा और जापानी सेना के साथ उसका संबंध किस प्रकार निर्धारित होगा। मोहन सिंह और जापानी अधिकारियों के बीच इन प्रश्नों पर धीरे-धीरे मतभेद बढ़ने लगे।
➣ मोहन सिंह चाहते थे कि INA का उपयोग स्पष्ट रूप से भारतीय स्वतंत्रता के उद्देश्य के लिए किया जाए, जबकि जापानी पक्ष अपने व्यापक सैन्य हितों के अनुरूप INA का उपयोग करना चाहता था।
➣ इन मतभेदों के कारण प्रथम INA का संगठनात्मक आधार कमजोर हुआ और अंततः दिसंबर 1942 में प्रथम INA का संकट उत्पन्न होकर उसका विघटन हो गया।
➣ प्रथम INA का यह पहला चरण असफल होने के बावजूद इसका ऐतिहासिक महत्व बहुत बड़ा था। इसने यह सिद्ध किया कि दक्षिण-पूर्व एशिया में मौजूद भारतीय सैनिकों और प्रवासी भारतीयों को संगठित करके ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक भारतीय सैन्य शक्ति खड़ी की जा सकती है।
➣ बाद में सुभाष चंद्र बोस ने इसी विरासत को ग्रहण करके INA को नए रूप में संगठित किया।
| तथ्य | जानकारी |
|---|---|
| प्रथम INA के प्रमुख भारतीय नेता | कैप्टन मोहन सिंह |
| प्रमुख जापानी अधिकारी | इवाइची फूजीवारा |
| जापानी खुफिया संगठन | Fujiwara Kikan |
| सिंगापुर का पतन | 15 फरवरी 1942 |
| भारतीय युद्धबंदियों का प्रमुख एकत्रीकरण | फैरर पार्क, सिंगापुर |
| प्रथम INA का औपचारिक गठन | 1 सितंबर 1942 |
| प्रथम INA का मुख्य आधार | भारतीय युद्धबंदी सैनिक |
| मुख्य उद्देश्य | भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष |
| प्रथम INA का संकट और विघटन | दिसंबर 1942 |
रास बिहारी बोस और इंडियन इंडिपेंडेंस लीग
दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और इंडियन इंडिपेंडेंस लीग
➣ द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापानी सेनाओं के दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रवेश के साथ इस क्षेत्र में रहने वाले भारतीयों के बीच भारत की स्वतंत्रता के लिए राजनीतिक संगठन बनाने की संभावना बढ़ी।
➣ मलाया, बर्मा, थाईलैंड, सिंगापुर और अन्य क्षेत्रों में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते थे, जिनमें से अनेक ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से सहानुभूति रखते थे।
➣ जापानी कब्जे वाले क्षेत्रों में भारतीय राष्ट्रवादियों ने स्थानीय स्तर पर Indian Independence League (IIL) की शाखाएँ स्थापित करना शुरू किया।
➣ इन संगठनों का उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशिया में रहने वाले भारतीयों को एक व्यापक राजनीतिक आंदोलन के अंतर्गत संगठित करना और भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्थन जुटाना था।
➣ इस आंदोलन को एक व्यापक अखिल-एशियाई रूप देने में रास बिहारी बोस की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
➣ वे लंबे समय से जापान में रह रहे भारतीय क्रांतिकारी थे और जापानी नेतृत्व तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के भारतीय राष्ट्रवादियों के बीच एक महत्वपूर्ण संपर्क-सूत्र बने।
➣ 1942 में विभिन्न भारतीय स्वतंत्रता लीगों को एक केंद्रीय संगठन के अंतर्गत लाने का प्रयास तेज हुआ। रास बिहारी बोस के नेतृत्व में IIL धीरे-धीरे दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का राजनीतिक मंच बनने लगा।
➣ इसका उद्देश्य केवल प्रवासी भारतीयों को संगठित करना नहीं था, बल्कि एक ऐसे राजनीतिक संगठन का निर्माण करना था जो भारत की स्वतंत्रता के लिए सैन्य और राजनीतिक दोनों स्तरों पर कार्य कर सके।
टोक्यो सम्मेलन (1942)
➣ मार्च 1942 में टोक्यो में Indian Independence Conference आयोजित किया गया। इसकी अध्यक्षता रास बिहारी बोस ने की।
➣ इस सम्मेलन में दक्षिण-पूर्व एशिया तथा जापान में सक्रिय भारतीय राष्ट्रवादी प्रतिनिधियों के बीच भारत की स्वतंत्रता के लिए संगठित आंदोलन की दिशा पर विचार किया गया।
➣ टोक्यो सम्मेलन में यह विचार प्रमुख था कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का अंतिम उद्देश्य भारत की पूर्ण स्वतंत्रता होना चाहिए और किसी भी प्रकार का विदेशी प्रभुत्व स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। इसी सम्मेलन ने विभिन्न भारतीय स्वतंत्रता संगठनों के बीच अधिक व्यापक समन्वय की दिशा तैयार की।
➣ सम्मेलन में सुभाष चंद्र बोस को दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व संभालने के लिए आमंत्रित करने का निर्णय भी लिया गया। उस समय सुभाष चंद्र बोस जर्मनी में थे और बाद में 1943 में दक्षिण-पूर्व एशिया पहुँचकर इस आंदोलन का नेतृत्व संभालेंगे।
बैंकॉक सम्मेलन (1942)
➣ 15 जून 1942 को बैंकॉक में भारतीय स्वतंत्रता लीग के विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों का सम्मेलन शुरू हुआ।
➣ इसमें मलाया, बर्मा, थाईलैंड, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो, फिलीपींस, जापान, हांगकांग तथा अन्य क्षेत्रों से प्रतिनिधि शामिल हुए। सम्मेलन लगभग नौ दिनों तक चला और इसका उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशिया के भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को अधिक संगठित स्वरूप देना था।
➣ बैंकॉक सम्मेलन में रास बिहारी बोस को भारतीय प्रतिनिधियों ने अध्यक्ष के रूप में स्वीकार किया। उनकी दीर्घकालीन क्रांतिकारी गतिविधियों तथा जापानी नेतृत्व से संपर्क के कारण उन्हें आंदोलन के लिए प्रभावी नेतृत्वकर्ता माना गया।
➣ सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि भारत की स्वतंत्रता के लिए चल रहे राजनीतिक आंदोलन को एक संगठित सैन्य शक्ति की आवश्यकता है।
➣ इसी संदर्भ में आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) को Indian Independence League की सैन्य शाखा के रूप में स्थापित करने का निर्णय लिया गया।
➣ बैंकॉक सम्मेलन में Council of Action का गठन भी किया गया। इसके अध्यक्ष रास बिहारी बोस बने और इसमें मोहन सिंह सहित अन्य भारतीय प्रतिनिधि शामिल थे। इस प्रकार राजनीतिक संगठन IIL और सैन्य संगठन INA के बीच औपचारिक संबंध स्थापित करने का प्रयास किया गया।
INA और Indian Independence League का संबंध
➣ Indian Independence League (IIL) मुख्यतः एक राजनीतिक संगठन था, जबकि Indian National Army (INA) उसका सैन्य अंग बनाया गया था।
IIL का कार्य दक्षिण-पूर्व एशिया के भारतीयों को राजनीतिक रूप से संगठित करना, स्वतंत्रता आंदोलन के लिए संसाधन और समर्थन जुटाना तथा आंदोलन की व्यापक दिशा निर्धारित करना था। दूसरी ओर INA का उद्देश्य सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से ब्रिटिश शासन को भारत से हटाने के लिए सैन्य शक्ति तैयार करना था।➣ इस व्यवस्था में IIL राजनीतिक नेतृत्व प्रदान करता था और INA सैन्य शक्ति के रूप में कार्य करती थी। दोनों को अलग-अलग संगठन होने के बावजूद भारत की स्वतंत्रता के एक ही व्यापक उद्देश्य से जोड़ा गया था।
➣ हालांकि शुरुआत से ही दोनों संगठनों के बीच नेतृत्व, अधिकार और जापानी हस्तक्षेप को लेकर मतभेद मौजूद थे। विशेष रूप से मोहन सिंह INA की स्वायत्तता पर जोर देते थे, जबकि जापानी पक्ष INA के उपयोग को अपने व्यापक सैन्य हितों से जोड़ना चाहता था। इन तनावों ने 1942 के अंत में प्रथम INA के संकट को जन्म दिया।
➣ इस प्रकार रास बिहारी बोस के नेतृत्व में IIL ने दक्षिण-पूर्व एशिया के भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को राजनीतिक मंच प्रदान किया और बैंकॉक सम्मेलन के बाद INA को उसका सैन्य आधार बनाने का प्रयास किया।
| तथ्य | जानकारी |
|---|---|
| प्रमुख नेता | रास बिहारी बोस |
| Indian Independence League | दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का राजनीतिक संगठन |
| टोक्यो सम्मेलन | मार्च 1942 |
| टोक्यो सम्मेलन की प्रमुख भूमिका | भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के व्यापक संगठन और पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य पर जोर |
| सुभाष चंद्र बोस को आमंत्रण | दक्षिण-पूर्व एशिया में आंदोलन का नेतृत्व संभालने के लिए |
| बैंकॉक सम्मेलन | 15 जून 1942 से |
| बैंकॉक सम्मेलन की प्रमुख उपलब्धि | INA को IIL की सैन्य शाखा बनाने का निर्णय |
| Council of Action | रास बिहारी बोस के नेतृत्व में गठित |
| IIL और INA का संबंध | IIL = राजनीतिक संगठन, INA = सैन्य शाखा |
प्रथम INA का संकट और विघटन
मोहन सिंह और जापानी नेतृत्व के बीच मतभेद
➣ प्रथम INA के गठन के बाद इसके सामने सबसे बड़ी समस्या जापानी सेना के साथ उसके संबंध और नियंत्रण की थी। मोहन सिंह चाहते थे कि INA एक स्वतंत्र भारतीय सैन्य संगठन के रूप में कार्य करे और उसका उपयोग स्पष्ट रूप से भारत की स्वतंत्रता के उद्देश्य से किया जाए।
➣ दूसरी ओर, जापानी नेतृत्व INA को अपने व्यापक सैन्य हितों के अनुरूप उपयोग करना चाहता था। यही अंतर धीरे-धीरे गंभीर राजनीतिक और सैन्य विवाद में बदल गया।
➣ मोहन सिंह को आशंका थी कि जापान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को केवल ब्रिटिशों के विरुद्ध युद्ध में अपने हितों के लिए इस्तेमाल करना चाहता है।
➣ वे चाहते थे कि INA को भारतीय नेतृत्व के अधीन रखा जाए तथा उसे जापानी सेना के अधीन एक सामान्य सहायक बल न बनाया जाए। जापान की भारत संबंधी नीति और उसके वास्तविक उद्देश्यों को लेकर IIL के कई नेताओं में भी अविश्वास उत्पन्न हो गया था।
➣ समस्या केवल मोहन सिंह और जापानी अधिकारियों के बीच ही नहीं थी। Indian Independence League की Council of Action के अधिकांश सदस्य भी जापानी हस्तक्षेप से चिंतित थे।
➣ उन्हें लगा कि जापानी सरकार IIL और INA की स्वायत्तता को सीमित करना चाहती है। दिसंबर 1942 की शुरुआत में Council of Action के अधिकांश सदस्यों ने इसी कारण अपने पदों से इस्तीफा दे दिया।
➣ इस स्थिति ने मोहन सिंह और रास बिहारी बोस के बीच भी तनाव बढ़ाया। मोहन सिंह को लगता था कि आंदोलन की स्वतंत्रता और INA की स्वायत्तता पर्याप्त रूप से सुरक्षित नहीं है।
➣ दूसरी ओर, रास बिहारी बोस जापान के सहयोग को पूरी तरह समाप्त करने के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि उस समय INA को सैन्य संसाधन और संगठनात्मक आधार उपलब्ध कराने में जापानी समर्थन महत्वपूर्ण था।
➣ अंततः मोहन सिंह और जापानी नेतृत्व के बीच संबंध पूरी तरह बिगड़ गए। मोहन सिंह ने INA को जापानी नियंत्रण में रखने की व्यवस्था का विरोध किया और INA को भंग करने का प्रयास किया। इससे प्रथम INA का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया।
मोहन सिंह की गिरफ्तारी और प्रथम INA का विघटन
➣ मोहन सिंह द्वारा INA को भंग करने का प्रयास करने के बाद रास बिहारी बोस ने उन्हें INA के कमांडर पद से हटा दिया।
➣ इसके बाद 29 दिसंबर 1942 को मोहन सिंह को जापानी अधिकारियों द्वारा नज़रबंद (house arrest) में रखा गया। इस घटना के साथ प्रथम INA का नेतृत्व संकट निर्णायक चरण में पहुँच गया।
➣ मोहन सिंह के हटाए जाने के बाद INA की गतिविधियाँ लगभग ठप हो गईं। संगठन के अनेक सैनिकों ने INA छोड़ दिया और प्रथम INA प्रभावी रूप से निष्क्रिय हो गई।
इस प्रकार दिसंबर 1942 तक मोहन सिंह के नेतृत्व में निर्मित प्रथम INA का पहला चरण समाप्त हो गया।➣ प्रथम INA का यह विघटन केवल नेतृत्व के व्यक्तिगत विवाद का परिणाम नहीं था। इसके पीछे भारतीय स्वतंत्रता के उद्देश्य और जापानी सामरिक हितों के बीच टकराव, INA की स्वायत्तता का प्रश्न तथा IIL के भीतर जापान के प्रति बढ़ता अविश्वास प्रमुख कारण थे।
➣ इसलिए प्रथम INA का संकट भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन और जापानी साम्राज्यवादी हितों के बीच संबंधों की जटिलता को भी दर्शाता है। हालांकि प्रथम INA अपने प्रारंभिक रूप में समाप्त हो गई, लेकिन इसका विचार समाप्त नहीं हुआ।
➣ बाद में सुभाष चंद्र बोस के दक्षिण-पूर्व एशिया आगमन के बाद इसी आंदोलन और उपलब्ध मानव संसाधन के आधार पर INA को नए नेतृत्व और अधिक संगठित स्वरूप में पुनर्गठित किया गया।
| तथ्य | जानकारी |
|---|---|
| मुख्य विवाद | INA की स्वायत्तता और जापानी नियंत्रण |
| मोहन सिंह की प्रमुख मांग | INA को भारतीय स्वतंत्रता के उद्देश्य के लिए स्वतंत्र भारतीय सेना के रूप में रखना |
| Council of Action में संकट | अधिकांश सदस्यों ने दिसंबर 1942 की शुरुआत में इस्तीफा दिया |
| मोहन सिंह द्वारा किया गया कदम | INA को भंग करने का प्रयास |
| मोहन सिंह को कमांडर पद से हटाया गया | दिसंबर 1942 |
| मोहन सिंह को House Arrest | 29 दिसंबर 1942 |
| प्रथम INA का परिणाम | INA की गतिविधियाँ ठप और संगठन का विघटन |
| बाद का विकास | सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में INA का पुनर्गठन |
सुभाष चंद्र बोस का दक्षिण-पूर्व एशिया आगमन
जर्मनी से जापान की यात्रा और जापान में राजनीतिक गतिविधियाँ
➣ सुभाष चंद्र बोस ने भारत की स्वतंत्रता के लिए विदेशों में समर्थन जुटाने के उद्देश्य से 1941 में भारत से निकलकर जर्मनी का रुख किया था।
➣ जर्मनी में उन्होंने Free India Centre की स्थापना की, भारतीय युद्धबंदियों से Indian Legion का संगठन किया तथा रेडियो के माध्यम से भारत के स्वतंत्रता संघर्ष का प्रचार किया।
➣ जर्मनी के यूरोप स्थित युद्धक्षेत्र से भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रभावी सैन्य कार्रवाई करना कठिन था। दूसरी ओर, जापान दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रिटिश क्षेत्रों के विरुद्ध तेजी से आगे बढ़ रहा था और भारत की पूर्वी सीमा के निकट पहुँच चुका था। इसलिए बोस ने अपना मुख्य कार्यक्षेत्र जर्मनी से पूर्वी एशिया स्थानांतरित करने का निर्णय लिया।
➣ 9 फरवरी 1943 को बोस अपने सहयोगी अभिद हसन सफरानी के साथ एक जर्मन पनडुब्बी में सवार होकर जापान की ओर रवाना हुए।
➣ लगभग तीन महीने की अत्यंत कठिन समुद्री यात्रा के दौरान उन्होंने हिंद महासागर में एक जापानी पनडुब्बी में स्थानांतरण किया और वहाँ से जापान की ओर आगे बढ़े।
➣ इस यात्रा के कारण वे यूरोप से पूर्वी एशिया पहुँच सके, जहाँ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को भारत के निकट एक नए सैन्य आधार से आगे बढ़ाने की संभावना थी।
➣ मई–जून 1943 में बोस जापान पहुँचे। जापान में उन्होंने वहाँ के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व से बातचीत शुरू की तथा भारत की स्वतंत्रता के लिए जापानी सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया।
➣ उनका उद्देश्य स्पष्ट था कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को जापानी युद्ध-नीति का मात्र उपकरण न बनाकर भारतीय नेतृत्व में स्वतंत्र राजनीतिक और सैन्य अभियान के रूप में विकसित किया जाए।
➣ बोस ने जापानी प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो (Hideki Tojo) सहित जापानी नेतृत्व के साथ बातचीत की। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और INA के लिए जापानी समर्थन प्राप्त करने के साथ-साथ INA की संगठनात्मक स्वायत्तता के प्रश्न पर भी जोर दिया।
➣ जापानी नेतृत्व ने बोस को दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित करने के लिए सहयोग देने की दिशा में सहमति व्यक्त की।
➣ जापान में रहते हुए बोस ने रेडियो प्रसारणों और सार्वजनिक राजनीतिक गतिविधियों के माध्यम से भारतीयों को स्वतंत्रता के लिए संगठित होने का संदेश दिया।
➣ उनका मानना था कि भारत की स्वतंत्रता के लिए विदेशों में एक ऐसी दूसरी राजनीतिक और सैन्य मोर्चेबंदी आवश्यक है, जो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रत्यक्ष कार्रवाई कर सके।
दक्षिण-पूर्व एशिया में नेतृत्व ग्रहण और नेताजी के रूप में उदय
➣ जापान में आवश्यक राजनीतिक समर्थन प्राप्त करने के बाद बोस 2 जुलाई 1943 को सिंगापुर पहुँचे। उनके आगमन का दक्षिण-पूर्व एशिया के भारतीय समुदाय ने व्यापक उत्साह के साथ स्वागत किया।
➣ यहाँ पहले से मौजूद Indian Independence League (IIL) और INA के कार्यकर्ताओं को एक ऐसे नेता की आवश्यकता थी जो राजनीतिक आंदोलन और सैन्य संगठन दोनों को प्रभावी दिशा दे सके।
➣ 4 जुलाई 1943 को सिंगापुर में आयोजित सभा में रास बिहारी बोस ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व सुभाष चंद्र बोस को सौंप दिया।
➣ इसके साथ ही सुभाष चंद्र बोस ने Indian Independence League के नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाली और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेता बन गए।
➣ अगले दिन 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के Padang में INA के सैनिकों को संबोधित करते हुए बोस ने सेना के सामने दिल्ली चलो (Delhi Chalo) का आह्वान किया। इसी अवसर के बाद INA को बोस के नेतृत्व में नए सैन्य अभियान के लिए पुनर्गठित करने की प्रक्रिया तेज हुई।
➣ बोस के नेतृत्व में INA को केवल युद्धबंदियों के संगठन के रूप में नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता के लिए संगठित राष्ट्रीय सेना के रूप में विकसित करने का प्रयास किया गया।
➣ उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया में रहने वाले भारतीयों से सैनिकों, धन और अन्य संसाधनों के रूप में स्वतंत्रता संघर्ष में योगदान देने का आह्वान किया।
➣ सुभाष चंद्र बोस के प्रभावशाली नेतृत्व के साथ उन्हें व्यापक रूप से नेताजी कहकर संबोधित किया जाने लगा। यह संबोधन दक्षिण-पूर्व एशिया में उनके राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व की पहचान बन गया।
➣ बाद के INA और IIL प्रचार में नेताजी नाम का व्यापक प्रयोग हुआ और उनके व्यक्तित्व को भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के केंद्रीय नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया।
➣ इस प्रकार सिंगापुर में 1943 में बोस का आगमन INA के इतिहास में निर्णायक मोड़ था। प्रथम INA के विघटन के बाद जिस संगठन का भविष्य अनिश्चित हो गया था, उसे बोस ने नए राजनीतिक नेतृत्व, व्यापक जनसमर्थन और स्पष्ट सैन्य लक्ष्य के साथ पुनर्जीवित करने की दिशा में आगे बढ़ाया।
| तथ्य | जानकारी |
|---|---|
| जर्मनी से पूर्वी एशिया की यात्रा | 1943 |
| समुद्री यात्रा की शुरुआत | 9 फरवरी 1943 |
| यात्रा का विशेष तथ्य | जर्मन पनडुब्बी से जापानी पनडुब्बी में स्थानांतरण |
| जापान आगमन | मई–जून 1943 |
| जापानी प्रधानमंत्री | हिदेकी तोजो |
| सिंगापुर आगमन | 2 जुलाई 1943 |
| IIL का नेतृत्व ग्रहण | 4 जुलाई 1943 |
| रास बिहारी बोस की भूमिका | सुभाष चंद्र बोस को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व सौंपा |
| दिल्ली चलो का आह्वान | 5 जुलाई 1943 |
| नेताजी | सुभाष चंद्र बोस के लिए व्यापक रूप से प्रयुक्त सम्मानसूचक संबोधन |
सुभाष चंद्र बोस द्वारा आज़ाद हिंद फ़ौज का पुनर्गठन
INA का पुनर्गठन और विस्तार
➣ जुलाई 1943 में सुभाष चंद्र बोस द्वारा दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व संभालने के बाद आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) को एक अधिक संगठित, व्यापक और प्रभावी सैन्य शक्ति के रूप में विकसित करने का कार्य तेज हुआ।
➣ यद्यपि INA के संगठनात्मक सुधारों की शुरुआत रास बिहारी बोस के नेतृत्व में फरवरी 1943 से हो चुकी थी, लेकिन सुभाष चंद्र बोस ने इसे बड़े पैमाने पर विस्तारित किया।
➣ बोस का उद्देश्य INA को केवल जापानी सेना के साथ लड़ने वाले भारतीय युद्धबंदियों के समूह तक सीमित रखना नहीं था। वे इसे भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्पित राष्ट्रीय सेना के रूप में विकसित करना चाहते थे। इसके लिए सैनिकों के संगठन, प्रशिक्षण, अनुशासन और भर्ती व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित किया गया।
➣ पहले INA से जुड़े अनेक पूर्व भारतीय युद्धबंदी सैनिकों को पुनः संगठित किया गया। इसके साथ-साथ दक्षिण-पूर्व एशिया के भारतीय समुदायों से नए स्वयंसेवकों को भी INA में शामिल किया गया। इस प्रकार INA का सामाजिक आधार केवल पूर्व ब्रिटिश भारतीय सैनिकों तक सीमित नहीं रहा।
➣ INA में शामिल भारतीयों की संख्या सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व के बाद तेजी से बढ़ी और दक्षिण-पूर्व एशिया में इसकी सदस्य संख्या लगभग 45,000 तक पहुँच गई।
➣ इसमें पूर्व ब्रिटिश भारतीय सेना के सैनिकों के अलावा मलाया के श्रमिक, बर्मा के व्यापारी तथा थाईलैंड सहित अन्य क्षेत्रों में रहने वाले भारतीय समुदायों के लोग भी शामिल थे।
सैन्य संगठन, अनुशासन और भर्ती
➣ बोस ने INA को एक नियमित सैन्य संगठन के अनुरूप विकसित करने पर विशेष ध्यान दिया। सैनिकों को सैन्य प्रशिक्षण, शारीरिक अभ्यास और अनुशासन प्रदान किया गया। INA के सदस्यों के लिए सैन्य प्रशिक्षण के साथ-साथ राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता के उद्देश्य से जुड़े वैचारिक प्रशिक्षण पर भी जोर दिया गया।
➣ INA के सैनिकों के लिए केवल युद्धक क्षमता पर्याप्त नहीं मानी गई। संगठन के भीतर देशभक्ति, राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता के प्रति समर्पण विकसित करने के लिए विशेष प्रशिक्षण और भाषणों की व्यवस्था की गई।
➣ रास बिहारी बोस के समय आरंभ किया गया यह वैचारिक प्रशिक्षण सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में भी जारी रहा और INA को एक साझा राष्ट्रीय उद्देश्य से जोड़ने का माध्यम बना।
➣ भर्ती के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया में बसे भारतीय समुदायों को संगठित किया गया। भारतीय युद्धबंदी सैनिक INA के महत्वपूर्ण आधार बने, जबकि बाद में प्रवासी भारतीय नागरिकों को भी सेना में शामिल किया गया।
➣ इस प्रकार INA एक ऐसे संगठन में बदलने लगी जिसमें सैनिक और नागरिक – दोनों स्तरों पर भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के लिए योगदान करने की व्यवस्था थी।
➣ रास बिहारी बोस द्वारा शुरू किए गए सुधारों के दौरान कुआलालंपुर में Bharat Youth Training Centre जैसे संस्थानों के माध्यम से युवाओं को सैन्य प्रशिक्षण दिया गया।
➣ चार महीने का प्रशिक्षण पूरा करने के बाद योग्य युवाओं को INA में शामिल किया जाता था। अप्रैल 1943 के अंत तक मलाया तथा सिंगापुर क्षेत्र के लगभग 1,000 नागरिक युवाओं को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जा चुका था।
➣ बोस ने INA में विभिन्न क्षेत्रों, भाषाओं और धार्मिक समुदायों से आने वाले भारतीयों को एक साझा राष्ट्रीय पहचान के अंतर्गत संगठित करने का प्रयास किया। इस प्रकार INA को क्षेत्रीय, भाषाई और धार्मिक विभाजनों से ऊपर एक भारतीय राष्ट्रीय सेना के रूप में प्रस्तुत किया गया।
INA की स्वायत्तता और जापान के साथ संबंध
➣ सुभाष चंद्र बोस जापान से सहयोग प्राप्त करने के पक्ष में थे, क्योंकि जापान दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रिटिश शक्ति के विरुद्ध प्रमुख सैन्य शक्ति था। फिर भी वे INA को केवल जापानी सेना की अधीनस्थ इकाई के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहते थे। उनका उद्देश्य जापानी सैन्य सहायता का उपयोग भारतीय स्वतंत्रता के लिए करना था।
➣ इसलिए INA और जापानी सेना के संबंधों में सहयोग तथा स्वायत्तता दोनों महत्वपूर्ण तत्व बने रहे। जापान से हथियार, प्रशिक्षण, परिवहन और अन्य सैन्य सहायता प्राप्त हुई, जबकि बोस INA को भारतीय नेतृत्व के अधीन एक अलग राष्ट्रीय सैन्य संगठन के रूप में बनाए रखना चाहते थे।
➣ बोस के नेतृत्व में INA को भारत की ओर सैन्य अभियान में भाग लेने के लिए तैयार किया गया। उनका लक्ष्य था कि भारतीय सैनिक जापानी सेना के साथ आगे बढ़ते हुए भारत की भूमि पर प्रवेश करें और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष करें। इसी व्यापक सैन्य लक्ष्य ने बाद में बर्मा, मणिपुर और इम्फाल क्षेत्र के अभियानों में INA की भूमिका का आधार तैयार किया।
➣ सुभाष चंद्र बोस ने INA के सैन्य संगठन को एक व्यापक राजनीतिक आंदोलन से भी जोड़े रखा। इस व्यवस्था में Indian Independence League राजनीतिक आधार प्रदान करती थी और INA सशस्त्र संघर्ष का माध्यम थी।
➣ आगे चलकर आज़ाद हिंद सरकार की स्थापना ने इस राजनीतिक और सैन्य ढाँचे को और अधिक औपचारिक रूप दिया।
| तथ्य | जानकारी |
|---|---|
| INA के नेतृत्व का हस्तांतरण | जुलाई 1943 – रास बिहारी बोस से सुभाष चंद्र बोस को |
| INA के प्रारंभिक सुधार | फरवरी 1943 में रास बिहारी बोस के नेतृत्व में |
| सुभाष चंद्र बोस की प्रमुख भूमिका | INA का विस्तार, सैन्य संगठन और स्वतंत्रता-संघर्ष के लिए व्यापक लामबंदी |
| INA की सदस्य संख्या | बोस के नेतृत्व के बाद लगभग 45,000 |
| भर्ती के प्रमुख स्रोत | पूर्व भारतीय युद्धबंदी सैनिक और दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रवासी भारतीय |
| युवा प्रशिक्षण | Bharat Youth Training Centre, Kuala Lumpur |
| प्रशिक्षण अवधि | लगभग चार महीने |
| जापान के साथ संबंध | सैन्य सहयोग के साथ INA की स्वायत्तता बनाए रखने का प्रयास |
| मुख्य लक्ष्य | भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष |
आज़ाद हिंद फ़ौज का संगठन और प्रमुख सैन्य इकाइयाँ
INA की संरचना और प्रमुख सैन्य इकाइयाँ
➣ सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) को एक संगठित सैन्य बल का रूप दिया गया। इसके लिए सेना मुख्यालय, विभिन्न सैन्य इकाइयों, प्रशिक्षण संस्थानों, खुफिया व्यवस्था तथा विशेष अभियान दलों का विकास किया गया।
➣ INA की संगठनात्मक संरचना समय के साथ बदलती रही और इसके विभिन्न चरणों में इसकी इकाइयों की संख्या तथा व्यवस्था में परिवर्तन हुआ।
➣ INA के प्रमुख सैन्य ढाँचे में गुरिल्ला रेजिमेंट/ब्रिगेड महत्वपूर्ण थीं। उपलब्ध संगठनात्मक विवरणों के अनुसार INA की प्रमुख इकाइयों में सुभाष ब्रिगेड, गांधी ब्रिगेड, आज़ाद ब्रिगेड और नेहरू ब्रिगेड शामिल थीं। इनके अतिरिक्त बहादुर ग्रुप विशेष अभियानों और अग्रिम क्षेत्रों में कार्य करने वाली महत्वपूर्ण इकाई थी।
➣ INA की 1st Division का नेतृत्व मेजर जनरल मोहम्मद ज़मान कियानी के हाथों में था। इसके अंतर्गत प्रमुख गुरिल्ला रेजिमेंट को संगठित किया गया। इन इकाइयों का उद्देश्य आवश्यकता के अनुसार भारतीय-बर्मी सीमा और भारत की ओर होने वाले सैन्य अभियानों में भाग लेना था।
| इकाई | मुख्य जानकारी |
|---|---|
| सुभाष ब्रिगेड | INA की प्रथम गुरिल्ला रेजिमेंट। इसका नेतृत्व कर्नल शाहनवाज़ खान से जुड़ा था। इसमें तीन पैदल सेना बटालियन थीं। |
| गांधी ब्रिगेड | INA की द्वितीय गुरिल्ला रेजिमेंट। इसका नेतृत्व कर्नल इनायत जान कियानी से जुड़ा था। इसमें दो पैदल सेना बटालियन थीं। |
| आज़ाद ब्रिगेड | INA की तृतीय गुरिल्ला रेजिमेंट। इसका नेतृत्व कर्नल गुलज़ारा सिंह के हाथों में था। इसमें तीन बटालियन थीं। |
| नेहरू ब्रिगेड | INA की चतुर्थ गुरिल्ला रेजिमेंट। बाद के चरण में इसका नेतृत्व लेफ्टिनेंट कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों से जुड़ा रहा। |
| बहादुर ग्रुप | यह विशेष अभियान और गुप्त कार्रवाई से जुड़ा दल था। इसका कार्य शत्रु की अग्रिम पंक्तियों के पीछे टोही, सैन्य जानकारी एकत्र करना, प्रचार तथा विशेष सैन्य अभियान करना था। |
➣ इन इकाइयों का नामकरण भी INA के राष्ट्रवादी उद्देश्य को दर्शाता था। सुभाष ब्रिगेड, गांधी ब्रिगेड, आज़ाद ब्रिगेड और नेहरू ब्रिगेड जैसे नामों के माध्यम से सेना के भीतर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख व्यक्तित्वों और राष्ट्रीय एकता की भावना को स्थापित करने का प्रयास किया गया।
प्रमुख ब्रिगेड और उनका कार्य
➣ सुभाष ब्रिगेड INA की 1st गुरिल्ला रेजिमेंट थी और इसका नेतृत्व कर्नल शाहनवाज़ खान ने किया।
➣ यह INA की प्रमुख सैन्य इकाइयों में शामिल थी और 1944 के भारत-बर्मा सीमा अभियान में सक्रिय रही। इसके सैनिकों ने जापानी सेना के साथ आगे बढ़ते हुए मणिपुर और इम्फाल क्षेत्र की दिशा में अभियान में भाग लिया।
➣ गांधी ब्रिगेड को 2nd गुरिल्ला रेजिमेंट के रूप में संगठित किया गया था और इसका नेतृत्व कर्नल इनायत जान कियानी से जुड़ा था।
➣ यह भी INA की पहली डिवीजन का महत्वपूर्ण हिस्सा थी और इम्फाल अभियान के दौरान अग्रिम मोर्चे पर तैनात रही। इसके सैनिकों ने तामू–पालेल क्षेत्र सहित मणिपुर के विभिन्न हिस्सों में अभियान में भाग लिया।
➣ आज़ाद ब्रिगेड INA की 3rd गुरिल्ला रेजिमेंट थी और इसका नेतृत्व कर्नल गुलज़ारा सिंह ने किया। इसमें तीन बटालियन शामिल थीं। 1944 के भारत अभियान के दौरान इसे INA की पहली डिवीजन के हिस्से के रूप में जापानी सेनाओं के साथ विभिन्न मोर्चों पर लगाया गया।
➣ नेहरू ब्रिगेड को 4th गुरिल्ला रेजिमेंट के रूप में जाना जाता था। इसके नेतृत्व में समय के साथ परिवर्तन हुआ और बाद के चरण में गुरबख्श सिंह ढिल्लों से इसका संबंध प्रमुख रूप से मिलता है। यह INA की नियमित गुरिल्ला सैन्य इकाइयों में शामिल थी।
➣ इस प्रकार इन चारों प्रमुख ब्रिगेडों ने INA के संगठित सैन्य ढाँचे का आधार तैयार किया। इनमें से कुछ इकाइयाँ सीधे अग्रिम मोर्चों पर लड़ती थीं, जबकि अन्य को परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों में तैनात किया जाता था। 1944 के इम्फाल अभियान में INA की विभिन्न इकाइयों ने जापानी सेनाओं के साथ मिलकर अभियान में भाग लिया।
बहादुर ग्रुप – विशेष अभियान इकाई
➣ बहादुर समूह INA की एक विशेष अभियान इकाई थी, जिसका उद्देश्य सामान्य पैदल सेना के युद्ध से अलग विशेष प्रकार के सैन्य कार्यों को अंजाम देना था।
➣ इसे शत्रु की अग्रिम पंक्तियों के पीछे जाकर सैन्य जानकारी एकत्र करने, टोही करने, प्रचार करने, संपर्क स्थापित करने और विशेष सैन्य अभियानों के लिए तैयार किया गया था।
➣ बहादुर समूह के सदस्य अग्रिम जापानी सैन्य टुकड़ियों के साथ आगे बढ़ते थे और भारतीय क्षेत्र में प्रवेश से पहले महत्वपूर्ण सैन्य सूचनाएँ एकत्र करने तथा भारतीय सैनिकों और स्थानीय लोगों के बीच स्वतंत्रता आंदोलन का प्रचार करने में सहायता करते थे। इस प्रकार यह INA की विशेष सैन्य कार्रवाइयों और गुप्तचर गतिविधियों से जुड़ी महत्वपूर्ण इकाई थी।
➣ 1944 के सैन्य अभियान के दौरान बहादुर समूह से जुड़े दलों ने भारत की सीमा के भीतर भी गतिविधियाँ कीं। कर्नल शौकत मलिक के नेतृत्व में बहादुर समूह के एक दल ने 14 अप्रैल 1944 को मोइरांग में INA का ध्वज फहराया। इसे भारत की भूमि पर INA की उपस्थिति की महत्वपूर्ण घटनाओं में माना जाता है।
➣ इस प्रकार बहादुर समूह का महत्व केवल प्रत्यक्ष युद्ध में भाग लेने तक सीमित नहीं था। यह INA की गुप्तचर, टोही, प्रचार और विशेष सैन्य कार्रवाइयों का महत्वपूर्ण साधन था और इसकी भूमिका नियमित गुरिल्ला ब्रिगेडों से अलग थी।
INA के संगठन की विशेषताएँ
➣ INA का संगठन केवल लड़ाकू इकाइयों तक सीमित नहीं था। इसके अंतर्गत सेना मुख्यालय, खुफिया संगठन, प्रशिक्षण संस्थान, चिकित्सा तथा प्रशासनिक व्यवस्थाएँ भी विकसित की गई।
➣ INA में अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए अलग व्यवस्था की गई तथा नागरिक स्वयंसेवकों के लिए भी प्रशिक्षण संस्थान स्थापित किए गए।
➣ INA का संगठन समय के साथ उसकी सैन्य आवश्यकताओं के अनुसार विकसित होता रहा। इसके सैनिकों की संख्या और संगठनात्मक संरचना में भी अलग-अलग चरणों में परिवर्तन हुआ।
➣ इसलिए विभिन्न अवधियों की संगठनात्मक संरचना को एक समान मानना उचित नहीं है। फिर भी सुभाष ब्रिगेड, गांधी ब्रिगेड, आज़ाद ब्रिगेड और नेहरू ब्रिगेड INA की सबसे महत्वपूर्ण सैन्य इकाइयों में माने जाते हैं।
| तथ्य | जानकारी |
|---|---|
| INA की प्रमुख guerrilla formations | Subhas, Gandhi, Azad और Nehru Brigades |
| Subhas Brigade | 1st गुरिल्ला रेजिमेंट |
| Subhas Brigade के प्रमुख कमांडर | कर्नल शाहनवाज़ खान |
| Gandhi Brigade | 2nd गुरिल्ला रेजिमेंट |
| Gandhi Brigade के प्रमुख कमांडर | कर्नल इनायत जान कियानी |
| Azad Brigade | 3rd गुरिल्ला रेजिमेंट |
| Azad Brigade के प्रमुख कमांडर | कर्नल गुलज़ारा सिंह |
| Nehru Brigade | 4th गुरिल्ला रेजिमेंट |
| Nehru Brigade से जुड़े प्रमुख कमांडर | गुरबख्श सिंह ढिल्लों |
| Bahadur Group | विशेष अभियान, टोही, खुफिया जानकारी एकत्र करना और प्रचार |
| INA की 1st Division के कमांडर | मोहम्मद ज़मान कियानी |
| मोइरांग में INA का ध्वज | 14 अप्रैल 1944, कर्नल शौकत मलिक के नेतृत्व में |
रानी झाँसी रेजिमेंट
गठन, उद्देश्य और कैप्टन लक्ष्मी सहगल की भूमिका
➣ रानी झाँसी रेजिमेंट आज़ाद हिंद फ़ौज की महिला सैन्य इकाई थी, जिसका गठन 1943 में सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में किया गया।
➣ इसका नाम 1857 के विद्रोह की प्रसिद्ध वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के नाम पर रखा गया। इसका उद्देश्य भारतीय महिलाओं को संगठित करके उन्हें भारत की स्वतंत्रता के लिए चल रहे सशस्त्र संघर्ष में शामिल करना था।
➣ सुभाष चंद्र बोस ने दक्षिण-पूर्व एशिया में INA का नेतृत्व संभालने के बाद महिलाओं को भी स्वतंत्रता-संघर्ष की सैन्य गतिविधियों में शामिल करने पर जोर दिया।
➣ जुलाई 1943 में उन्होंने महिला रेजिमेंट के गठन की घोषणा की। 12 जुलाई 1943 को इसके गठन की औपचारिक घोषणा की गई और इसे रानी झाँसी रेजिमेंट के नाम से संगठित किया गया।
➣ इस रेजिमेंट की कमान डॉ. लक्ष्मी स्वामीनाथन को सौंपी गई, जो बाद में कैप्टन लक्ष्मी सहगल के नाम से प्रसिद्ध हुईं। वे पेशे से चिकित्सक थीं और सिंगापुर में रहकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी थीं। बोस के सिंगापुर आगमन के बाद वे Indian Independence League तथा INA की गतिविधियों से सक्रिय रूप से जुड़ गईं।
➣ लक्ष्मी सहगल ने केवल रेजिमेंट की कमान ही नहीं संभाली, बल्कि महिलाओं की भर्ती, संगठन और प्रशिक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ उन्होंने विभिन्न सामाजिक वर्गों से आने वाली भारतीय महिलाओं को एक सैन्य संगठन के अंतर्गत संगठित किया। उन्हें आज़ाद हिंद सरकार में बाद में महिला मामलों की मंत्री की जिम्मेदारी भी दी गई।
➣ रानी झाँसी रेजिमेंट का गठन बोस की उस व्यापक नीति का हिस्सा था जिसके अंतर्गत वे स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय महिलाओं की सक्रिय और समान भागीदारी चाहते थे।
➣ इसलिए यह केवल एक प्रतीकात्मक महिला संगठन नहीं था, बल्कि सैन्य प्रशिक्षण और युद्ध संबंधी भूमिकाओं के लिए तैयार की गई वास्तविक इकाई थी।
महिला सैनिकों की भर्ती, प्रशिक्षण और INA में भूमिका
➣ रानी झाँसी रेजिमेंट में भर्ती मुख्यतः दक्षिण-पूर्व एशिया में रहने वाली भारतीय महिलाओं से की गई। इनमें मलाया और सिंगापुर के भारतीय समुदायों की महिलाएँ शामिल थीं।
➣ बड़ी संख्या में स्वयंसेविकाएँ मलाया के रबर बागानों में काम करने वाले भारतीय परिवारों से आती थीं, जबकि रेजिमेंट के अधिकारी वर्ग में शिक्षित मध्यम और उच्च वर्ग की महिलाएँ भी शामिल थीं। इस प्रकार रेजिमेंट में विभिन्न सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि की महिलाओं की भागीदारी दिखाई देती थी।
➣ रेजिमेंट का प्रारंभिक प्रशिक्षण सिंगापुर में आयोजित किया गया। इसमें सैन्य कवायद, शारीरिक अभ्यास, लंबी दूरी की पदयात्रा और हथियारों का प्रशिक्षण शामिल था।
➣ महिलाओं को राइफल, हथगोले तथा संगीन के प्रयोग का प्रशिक्षण दिया गया। बाद में कुछ सैनिकों को बर्मा में जंगल युद्ध का अतिरिक्त प्रशिक्षण भी दिया गया।
➣ प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल सैनिकों को हथियार चलाना सिखाना नहीं था, बल्कि उनमें अनुशासन, शारीरिक क्षमता, राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता के प्रति समर्पण विकसित करना भी था। इस प्रकार महिलाओं को एक संगठित सैन्य इकाई के अनुशासन और कार्यप्रणाली के अनुरूप तैयार किया गया।
➣ रेजिमेंट का प्रारंभिक प्रशिक्षण केंद्र सिंगापुर में था। बाद में रंगून और बैंकॉक में भी प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए गए। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार 1943–45 के दौरान लगभग 1,500 भारतीय महिलाओं ने इस रेजिमेंट में किसी न किसी रूप में भाग लिया।
➣ रानी झाँसी रेजिमेंट में केवल लड़ाकू भूमिका पर ही जोर नहीं था। लगभग 200 कैडेटों को नर्सिंग का प्रशिक्षण दिया गया और उनसे चाँद बीबी नर्सिंग कोर का गठन किया गया। इस प्रकार रेजिमेंट ने सैन्य सेवा के साथ-साथ चिकित्सा एवं परिचर्या के क्षेत्र में भी INA की सहायता की।
➣ 1944 के इम्फाल अभियान के दौरान रानी झाँसी रेजिमेंट की एक टुकड़ी को बर्मा के मेइम्यो क्षेत्र की ओर भेजा गया। कुछ महिला कर्मियों को INA के अस्पतालों में नर्सिंग और चिकित्सा सहायता के कार्य में लगाया गया।
➣ इम्फाल अभियान की विफलता और INA-जापानी सेनाओं की पीछे हटने की स्थिति के कारण रेजिमेंट को व्यापक अग्रिम युद्धक भूमिका नहीं मिल सकी।
➣ पीछे हटने के दौरान रानी झाँसी रेजिमेंट की महिलाओं ने घायल सैनिकों की देखभाल, चिकित्सा सहायता और पीछे हटती INA इकाइयों के सहयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे स्पष्ट होता है कि रेजिमेंट की भूमिका केवल प्रत्यक्ष युद्ध तक सीमित नहीं थी।
➣ इस प्रकार रानी झाँसी रेजिमेंट ने सैनिक प्रशिक्षण, चिकित्सा सेवा, स्वतंत्रता आंदोलन के लिए महिलाओं की लामबंदी और INA की सहायक सेवाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
ऐतिहासिक महत्व
➣ रानी झाँसी रेजिमेंट का सबसे बड़ा ऐतिहासिक महत्व यह था कि इसने भारतीय महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन की सक्रिय सैन्य भूमिका में प्रस्तुत किया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान यह दुनिया की अपेक्षाकृत दुर्लभ all-female combat formations में से एक थी।
➣ रेजिमेंट में हिंदू, मुस्लिम और सिख महिलाओं के साथ-साथ अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि की महिलाएँ शामिल थीं। इससे INA द्वारा प्रस्तुत सर्वभारतीय राष्ट्रीय एकता के विचार को भी बल मिला।
➣ रानी झाँसी रेजिमेंट ने यह संदेश दिया कि भारत की स्वतंत्रता केवल पुरुष सैनिकों या राजनीतिक नेताओं का संघर्ष नहीं था, बल्कि महिलाएँ भी राष्ट्रीय मुक्ति के लिए सैन्य और राजनीतिक स्तर पर सक्रिय भूमिका निभा सकती हैं। इसी कारण INA के इतिहास में इसका स्थान विशिष्ट है।
| तथ्य | जानकारी |
|---|---|
| रेजिमेंट का नाम | रानी झाँसी रेजिमेंट |
| गठन | 1943 |
| औपचारिक घोषणा | 12 जुलाई 1943 |
| नाम किसके नाम पर | रानी लक्ष्मीबाई (झाँसी की रानी) |
| कमांडर | डॉ. लक्ष्मी स्वामीनाथन (कैप्टन लक्ष्मी सहगल) |
| प्रमुख भर्ती क्षेत्र | दक्षिण-पूर्व एशिया के भारतीय समुदाय |
| मुख्य प्रशिक्षण केंद्र | सिंगापुर। बाद में रंगून और बैंकॉक |
| प्रशिक्षण | सैन्य कवायद, लंबी दूरी की पदयात्रा, राइफल, हथगोले, संगीन और जंगल युद्ध |
| Chand Bibi Nursing Corps | लगभग 200 कैडेटों से संबंधित |
| इम्फाल अभियान | 1944 में रेजिमेंट की टुकड़ियाँ बर्मा क्षेत्र तक पहुँचीं |
| ऐतिहासिक महत्व | INA में महिलाओं की संगठित सैन्य भागीदारी का प्रमुख उदाहरण |
आज़ाद हिंद सरकार(1943)
स्थापना, सुभाष चंद्र बोस की भूमिका और सरकार की संरचना
➣ 21 अक्टूबर 1943 को सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर के कैथे थिएटर में आज़ाद हिंद की अंतरिम सरकार (Provisional Government of Free India) की स्थापना की घोषणा की।
➣ इसे अर्ज़ी हुकूमत-ए-आज़ाद हिंद के नाम से भी जाना जाता है। इसका उद्देश्य भारत की स्वतंत्रता के लिए चल रहे राजनीतिक और सैन्य संघर्ष को एक औपचारिक सरकारी स्वरूप प्रदान करना था।
➣ इस सरकार में सुभाष चंद्र बोस ने राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री और युद्ध मंत्री के पद संभाले। वे आज़ाद हिंद फ़ौज के सर्वोच्च सेनापति भी थे। इस प्रकार आज़ाद हिंद सरकार के राजनीतिक नेतृत्व और INA के सैन्य नेतृत्व दोनों का केंद्रीय नेतृत्व बोस के हाथों में रहा।
➣ आज़ाद हिंद सरकार में मंत्रियों, सैन्य प्रतिनिधियों, राजनीतिक सलाहकारों और विधिक सलाहकारों को शामिल किया गया था।
ए. एन. सरकार इसके विधिक सलाहकार तथा रास बिहारी बोस सर्वोच्च सलाहकार के रूप में जुड़े थे। इस प्रकार सरकार ने राजनीतिक, सैन्य और विधिक कार्यों के लिए अलग-अलग स्तरों पर संगठन विकसित करने का प्रयास किया।➣ आज़ाद हिंद सरकार का राजनीतिक आधार Indian Independence League और सैन्य आधार आज़ाद हिंद फ़ौज थी। इस व्यवस्था के माध्यम से बोस ने स्वतंत्रता आंदोलन को एक ऐसी वैकल्पिक भारतीय सरकार के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया, जो भारत की स्वतंत्रता के लिए राजनीतिक और सैन्य दोनों स्तरों पर संघर्ष कर रही थी।
➣ आज़ाद हिंद सरकार ने स्वयं को भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत अंतरिम राष्ट्रीय सरकार के रूप में प्रस्तुत किया। इसका उद्देश्य विदेशी शक्तियों के साथ सरकार के स्तर पर राजनीतिक संबंध और सहयोग स्थापित करना तथा INA के माध्यम से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष को आगे बढ़ाना था।
उद्देश्य, युद्ध की घोषणा और Axis शक्तियों द्वारा मान्यता
➣ आज़ाद हिंद सरकार का मुख्य उद्देश्य भारत से ब्रिटिश शासन और उसके सहयोगियों को सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से हटाना तथा स्वतंत्र भारत के लिए एक स्थायी राष्ट्रीय सरकार की स्थापना करना था।
➣ बोस की उद्घोषणा (proclamation) में सरकार को भारत की मुक्ति के लिए संघर्ष प्रारंभ और संचालित करने वाली अंतरिम सत्ता के रूप में प्रस्तुत किया गया।
➣ सरकार की स्थापना के बाद बोस ने भारतीयों से स्वतंत्रता-संघर्ष के लिए सैनिक, आर्थिक और राजनीतिक समर्थन देने का आह्वान किया।
➣ दक्षिण-पूर्व एशिया में रहने वाले भारतीयों ने INA Fund के लिए धन और स्वर्णाभूषण दान किए। इससे आज़ाद हिंद आंदोलन के लिए व्यापक नागरिक लामबंदी को भी बल मिला।
➣ 23 अक्टूबर 1943 को जापान ने आज़ाद हिंद सरकार को औपचारिक रूप से मान्यता दी। इसके बाद जर्मनी, इटली, क्रोएशिया, बर्मा, थाईलैंड, फिलीपींस, मंचुकुओ और नानकिंग की राष्ट्रवादी सरकार सहित अन्य सरकारों ने भी इसे मान्यता दी। इस मान्यता ने आज़ाद हिंद सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक औपचारिक राजनीतिक अस्तित्व प्रदान करने का प्रयास किया।
➣ आज़ाद हिंद सरकार ने ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की। यह घोषणा 24 अक्टूबर 1943 को सार्वजनिक रूप से प्रसारित की गई। इस प्रकार सरकार ने स्वयं को ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध चल रहे युद्ध में एक सक्रिय पक्ष के रूप में प्रस्तुत किया।
➣ युद्ध की घोषणा का उद्देश्य केवल ब्रिटिश शासन का विरोध करना नहीं था, बल्कि यह स्पष्ट करना भी था कि आज़ाद हिंद सरकार भारत की स्वतंत्रता के लिए सैन्य संघर्ष को अपना आधिकारिक साधन मानती है। इसके परिणामस्वरूप INA के सैन्य अभियान को सरकार के राजनीतिक उद्देश्य से जोड़ दिया गया।
➣ आज़ाद हिंद सरकार की स्थापना के साथ सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को विदेशी भूमि पर एक वैकल्पिक भारतीय सरकार के रूप में प्रस्तुत किया।
➣ यद्यपि यह सरकार जापानी सैन्य सहायता पर निर्भर थी और उसका वास्तविक क्षेत्रीय नियंत्रण सीमित था, फिर भी इसका प्रतीकात्मक और राजनीतिक महत्व INA आंदोलन के संदर्भ में महत्वपूर्ण रहा।
| तथ्य | जानकारी |
|---|---|
| आज़ाद हिंद सरकार की स्थापना | 21 अक्टूबर 1943 |
| स्थापना का स्थान | Cathay Theatre, Singapore |
| पूरा नाम | Provisional Government of Free India |
| अन्य नाम | Arzi Hukumat-e-Azad Hind |
| Head of State | सुभाष चंद्र बोस |
| Prime Minister | सुभाष चंद्र बोस |
| Minister of War | सुभाष चंद्र बोस |
| INA से संबंध | आज़ाद हिंद फ़ौज इसकी सैन्य शक्ति थी |
| जापान द्वारा मान्यता | 23 अक्टूबर 1943 |
| ब्रिटेन और अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा | 24 अक्टूबर 1943 |
| मुख्य उद्देश्य | भारत से ब्रिटिश शासन को हटाकर स्वतंत्र भारत की स्थापना |
| Supreme Adviser | रास बिहारी बोस |
| Legal Adviser | ए. एन. सरकार |
अंडमान-निकोबार और आज़ाद हिंद सरकार
जापान द्वारा द्वीपों का हस्तांतरण और आज़ाद हिंद सरकार का अधिकार
➣ द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापानी सेना ने 23 मार्च 1942 से अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पर कब्ज़ा कर लिया।
➣ जापानी नियंत्रण के बाद यह द्वीप ब्रिटिश शासन से अलग एक ऐसे क्षेत्र में बदल गया, जिसका उपयोग जापान ने अपने सैन्य और सामरिक हितों के लिए किया।
➣ 6 नवंबर 1943 को जापान के प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो ने टोक्यो में Greater East Asia Conference के अवसर पर घोषणा की कि अंडमान-निकोबार द्वीप समूह को आज़ाद हिंद की अंतरिम सरकार को सौंप दिया जाएगा। इससे इन द्वीपों को सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाले स्वतंत्र भारत के राजनीतिक दावे से जोड़ने का अवसर मिला।
➣ हालांकि द्वीपों का प्रशासन पूरी तरह आज़ाद हिंद सरकार के स्वतंत्र नियंत्रण में नहीं आया। जापानी सैन्य अधिकारियों का वास्तविक प्रभाव बना रहा।
➣ इसलिए अंडमान-निकोबार पर आज़ाद हिंद सरकार का अधिकार मुख्यतः राजनीतिक और प्रतीकात्मक था, जबकि जापानी सेना महत्वपूर्ण प्रशासनिक तथा सैन्य नियंत्रण बनाए हुए थी। इसी कारण इस हस्तांतरण को पूर्ण और निर्विवाद संप्रभु सत्ता के हस्तांतरण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
सुभाष चंद्र बोस की यात्रा और शहीद तथा स्वराज नामकरण
➣ सुभाष चंद्र बोस 29 दिसंबर 1943 को अंडमान पहुँचे। अगले दिन, 30 दिसंबर 1943 को उन्होंने पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान (Gymkhana Ground) में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराया।
➣ यह घटना INA और आज़ाद हिंद सरकार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक उपलब्धि थी, क्योंकि भारतीय ध्वज पहली बार उस क्षेत्र में फहराया गया जो ब्रिटिश शासन से जापानी कब्जे के बाद अलग हो चुका था।
➣ बोस ने अंडमान का नाम शहीद और निकोबार का नाम स्वराज रखा। इन नामों के माध्यम से उन्होंने एक ओर स्वतंत्रता के लिए बलिदान देने वाले भारतीयों को सम्मान दिया और दूसरी ओर स्वतंत्र भारत के लक्ष्य को प्रतीकात्मक रूप से सामने रखा।
➣ बोस की अंडमान यात्रा केवल ध्वजारोहण तक सीमित नहीं थी। इस यात्रा का उद्देश्य यह प्रदर्शित करना भी था कि आज़ाद हिंद सरकार भारत की भूमि पर अपना दावा प्रस्तुत कर रही है। इससे INA के भारत की ओर बढ़ने के अभियान को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक आधार मिला।
आज़ाद हिंद सरकार के प्रतीकात्मक अधिकार
➣ बोस की यात्रा के बाद आज़ाद हिंद सरकार ने अंडमान-निकोबार में अपने राजनीतिक अधिकार को अधिक ठोस रूप देने का प्रयास किया। बोस ने मेजर जनरल आर्कोट डोरायस्वामी लोगानादन को अंडमान-निकोबार के लिए Chief Commissioner नियुक्त किया। वे 18 फरवरी 1944 को अंडमान पहुँचे और उनके साथ प्रशासनिक अधिकारी तथा कर्मचारी भी आए।
➣ इसके बाद आज़ाद हिंद सरकार ने द्वीपों में नागरिक प्रशासन स्थापित करने का प्रयास किया। Indian Independence League के स्थानीय सदस्यों तथा INA से जुड़े भारतीयों ने भी प्रशासनिक गतिविधियों में भाग लिया।
➣ इस प्रकार आज़ाद हिंद सरकार ने केवल राजनीतिक दावा ही नहीं किया, बल्कि सीमित स्तर पर अपना प्रशासनिक ढाँचा स्थापित करने का प्रयास भी किया।
➣ फिर भी इन द्वीपों पर आज़ाद हिंद सरकार की सत्ता सीमित और जापानी सैन्य शक्ति पर निर्भर थी। जापानी सेना का वास्तविक प्रभाव बना रहा और स्थानीय प्रशासन पर उसका नियंत्रण महत्वपूर्ण था।
➣ इसलिए अंडमान-निकोबार को आज़ाद हिंद सरकार के प्रतीकात्मक राजनीतिक अधिकार और सीमित प्रशासनिक उपस्थिति का उदाहरण माना जाना अधिक उचित है।
➣ अंडमान-निकोबार की घटना का ऐतिहासिक महत्व इस बात में था कि आज़ाद हिंद आंदोलन को पहली बार ऐसी भूमि मिली जिसे वह ब्रिटिश भारत से मुक्त क्षेत्र के रूप में प्रचारित कर सकता था। इससे बोस के नेतृत्व में बनने वाली स्वतंत्र भारत की सरकार की राजनीतिक वैधता और INA के सैनिकों के मनोबल को बढ़ाने में मदद मिली।
| तथ्य | जानकारी |
|---|---|
| जापानी कब्ज़ा | 23 मार्च 1942 |
| द्वीपों को आज़ाद हिंद सरकार को देने की घोषणा | 6 नवंबर 1943 |
| बोस का अंडमान आगमन | 29 दिसंबर 1943 |
| पोर्ट ब्लेयर में ध्वजारोहण | 30 दिसंबर 1943 |
| अंडमान का नया नाम | शहीद |
| निकोबार का नया नाम | स्वराज |
| Chief Commissioner | मेजर जनरल ए. डी. लोगानादन |
| लोगानादन का अंडमान आगमन | 18 फरवरी 1944 |
| आज़ाद हिंद सरकार का अधिकार | मुख्यतः राजनीतिक/प्रतीकात्मक, सीमित प्रशासनिक उपस्थिति के साथ |
| बाद में आधिकारिक नाम | शहीद द्वीप और स्वराज द्वीप – 2018 में पुनः नामकरण |
INA के आदर्श, नारे और प्रतीक
INA के प्रमुख नारे और उनका महत्व
➣ आज़ाद हिंद फ़ौज के नारे केवल सैनिकों का उत्साह बढ़ाने के साधन नहीं थे, बल्कि वे उसके राष्ट्रवाद, त्याग, अनुशासन और भारत की स्वतंत्रता के लक्ष्य को व्यक्त करते थे। इनमें सबसे प्रसिद्ध नारे जय हिंद, दिल्ली चलो और तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा थे।
➣ जय हिंद INA का प्रमुख अभिवादन और राष्ट्रीय नारा बन गया। इसके विकास का संबंध आबिद हसन सफरानी से जोड़ा जाता है, जिन्होंने ऐसा अभिवादन सुझाया जो जाति, क्षेत्र और धर्म से ऊपर सभी भारतीयों को जोड़ सके। सुभाष चंद्र बोस ने इसे स्वीकार किया और INA में व्यापक रूप से लोकप्रिय बनाया।
➣ जय हिंद का महत्व इसकी सर्वसमावेशी प्रकृति में था। इसमें किसी विशेष धर्म, जाति या क्षेत्र का उल्लेख नहीं था। इसलिए यह INA की उस राष्ट्रीय भावना के अनुकूल था जिसमें सैनिकों की पहचान सबसे पहले भारतीय के रूप में की जाती थी।
➣ 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर में INA के सैनिकों को संबोधित करते हुए सुभाष चंद्र बोस ने दिल्ली चलो (Delhi Chalo) का आह्वान किया।
➣ इसका उद्देश्य INA के सैनिकों को भारत की ओर सैन्य अभियान और ब्रिटिश शासन के अंतिम केंद्र दिल्ली की ओर बढ़ने के लक्ष्य से जोड़ना था। बोस ने इसे INA के युद्ध-आह्वान के रूप में प्रस्तुत किया।
➣ तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा सुभाष चंद्र बोस के सबसे प्रसिद्ध आह्वानों में से एक था। इसका आशय यह था कि भारत की स्वतंत्रता के लिए भारतीयों को त्याग, बलिदान और सक्रिय संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा।
➣ इसका संबंध बोस के 4 जुलाई 1944, रंगून के भाषण से जोड़ा जाता है, जिसमें उन्होंने स्वतंत्रता के लिए भारतीयों के बलिदान और सैन्य संघर्ष की आवश्यकता पर जोर दिया।
➣ इन नारों ने INA को केवल एक सैन्य संगठन के बजाय स्वतंत्रता के लिए समर्पित राष्ट्रीय आंदोलन की पहचान देने में सहायता की। जय हिंद ने राष्ट्रीय एकता, दिल्ली चलो ने सैन्य लक्ष्य और तुम मुझे खून दो… ने त्याग और बलिदान की भावना को अभिव्यक्त किया।
INA का ध्वज और प्रतीक
➣ INA से जुड़ा ध्वज मूल भारतीय तिरंगे पर आधारित था। इसके मध्य में चरखे के स्थान पर दौड़ता हुआ/उछलता हुआ बाघ (Springing Tiger) प्रदर्शित किया गया और Azad Hind का प्रयोग किया जाता था। यह प्रतीक सशस्त्र संघर्ष और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध सक्रिय प्रतिरोध की भावना को व्यक्त करता था।p>
➣ बाघ INA की सैन्य शक्ति, साहस और संघर्षशीलता का प्रमुख प्रतीक बन गया। चरखे के स्थान पर बाघ का प्रयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय था, क्योंकि इससे INA की पहचान सशस्त्र स्वतंत्रता-संघर्ष से जुड़ती थी।
➣ Azad Hind का अंकन इस बात को दर्शाता था कि यह ध्वज स्वतंत्र भारत की कल्पना और आज़ाद हिंद आंदोलन का प्रतीक था। यही प्रतीक आज़ाद हिंद सरकार और INA से संबंधित अन्य चिह्नों में भी दिखाई देता है।
➣ INA के प्रतीकों में केवल ध्वज ही महत्वपूर्ण नहीं था। जय हिंद का अभिवादन, तिरंगा, बाघ का प्रतीक और दिल्ली चलो का आह्वान मिलकर एक ऐसी राष्ट्रीय सैन्य पहचान बनाते थे जिसका केंद्र भारत की स्वतंत्रता था।
राष्ट्रीय एकता और धार्मिक-सामुदायिक समन्वय
➣ INA की एक महत्वपूर्ण विशेषता उसकी सर्वभारतीय और धार्मिक रूप से समावेशी संरचना थी। इसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सैनिक एक साथ शामिल थे। सैनिकों की पहचान को धार्मिक समुदायों के बजाय भारतीय राष्ट्रीयता के आधार पर संगठित करने का प्रयास किया गया।
➣ INA में जाति और समुदाय के आधार पर अलग-अलग सैन्य इकाइयाँ बनाने की औपनिवेशिक परंपरा को समाप्त करने का प्रयास किया गया। सैनिकों के लिए सामूहिक भोजन और साझा सैन्य जीवन जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से सामाजिक दूरी और जातिगत भेदभाव को कम करने की कोशिश की गई। इस प्रकार सैन्य अनुशासन के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता को भी संगठन का महत्वपूर्ण आधार बनाया गया।
➣ धार्मिक सद्भाव को व्यवहार में भी प्रदर्शित करने के उदाहरण मिलते हैं। INA के हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई अधिकारी तथा सैनिक धार्मिक स्थलों पर एक-दूसरे के साथ जाते थे।
➣ सिंगापुर के Chettiar Temple से जुड़ी घटना में विभिन्न समुदायों के अधिकारियों की संयुक्त उपस्थिति को INA के धार्मिक समन्वय के प्रतीक के रूप में देखा गया है।
➣ जय हिंद जैसे अभिवादन का चयन भी इसी राष्ट्रीय एकता की भावना से जुड़ा था। इसका उद्देश्य ऐसा साझा संबोधन विकसित करना था जो किसी विशेष जाति या समुदाय से न जुड़ा हो और सभी भारतीयों को एक समान राष्ट्रीय पहचान के अंतर्गत संबोधित कर सके।
➣ INA की राष्ट्रीय एकता की भावना का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बाद में लाल किला मुकदमों में भी दिखाई दिया, जहाँ शाहनवाज़ खान (मुस्लिम), प्रेम कुमार सहगल (हिंदू) और गुरबख्श सिंह ढिल्लों (सिख) को एक साथ अभियुक्त बनाया गया। इन तीनों की संयुक्त उपस्थिति ने INA की बहुधार्मिक राष्ट्रीय पहचान को भारतीय जनमानस में और अधिक प्रभावशाली बनाया।
➣ इस प्रकार INA के आदर्शों का केंद्र राष्ट्रीय एकता, धार्मिक-सामुदायिक समन्वय, त्याग, अनुशासन और पूर्ण स्वतंत्रता था। इसके नारे और प्रतीक इसी व्यापक विचारधारा को सैनिकों तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के भारतीय समुदायों तक पहुँचाने के महत्वपूर्ण माध्यम बने।
| तथ्य | जानकारी |
|---|---|
| प्रमुख अभिवादन/नारा | जय हिंद |
| जय हिंद से संबंधित प्रमुख नाम | आबिद हसन सफरानी। सुभाष चंद्र बोस ने इसे INA में लोकप्रिय बनाया |
| दिल्ली चलो | 5 जुलाई 1943 को INA के सैनिकों के सामने बोस का आह्वान |
| तुम मुझे खून दो… | सुभाष चंद्र बोस का बलिदान और स्वतंत्रता के लिए आह्वान |
| Azad Hind ध्वज का प्रमुख प्रतीक | Springing Tiger |
| बाघ का प्रतीक | साहस, सैन्य शक्ति और सक्रिय प्रतिरोध का प्रतीक |
| INA की राष्ट्रीय भावना | धर्म, जाति और क्षेत्र से ऊपर भारतीय राष्ट्रीयता |
| धार्मिक समुदाय | हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सैनिकों की भागीदारी |
| राष्ट्रीय एकता का प्रसिद्ध उदाहरण | शाहनवाज़ खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों |
आज़ाद हिंद फ़ौज के सैन्य अभियान – 1944
जापानी U-Go Offensive और INA की भारत की ओर प्रगति
➣ 1944 में आज़ाद हिंद फ़ौज को पहली बार बड़े पैमाने पर भारत की दिशा में होने वाले सैन्य अभियान में भाग लेने का अवसर मिला। यह अभियान जापानी 15th Army द्वारा चलाए गए U-Go Offensive का हिस्सा था।
➣ इसका मुख्य उद्देश्य उत्तर-पूर्वी भारत में स्थित इम्फाल और कोहिमा के सामरिक क्षेत्रों पर अधिकार करना, ब्रिटिश-भारतीय सेना की आपूर्ति व्यवस्था को बाधित करना तथा बर्मा की रक्षा को मजबूत करना था।
➣ जापानी सेना के इस अभियान की योजना को लेफ्टिनेंट जनरल रेन्या मुतागुची ने आगे बढ़ाया। जनवरी 1944 में जापानी Imperial General Headquarters ने उत्तर-पूर्वी भारत की ओर अभियान के लिए निर्देश जारी किए और 8 मार्च 1944 से U-Go Offensive को वास्तविक रूप से आगे बढ़ाया गया।
➣ जापानी 15th, 31st और 33rd Divisions को क्रमशः इम्फाल और कोहिमा की दिशा में लगाया गया।
➣ इस अभियान में INA की भूमिका जापानी सेना के साथ सहयोग करने की थी। बोस चाहते थे कि INA को भारत की सीमा के भीतर स्वतंत्र रूप से राष्ट्रीय सेना के रूप में आगे बढ़ने का अवसर मिले।
➣ जनवरी 1944 में जापानी अधिकारियों के साथ हुई रणनीतिक चर्चाओं में INA की भूमिका निर्धारित की गई और इसके कुछ प्रमुख formations को अग्रिम मोर्चों की ओर भेजा गया।
➣ U-Go Offensive के आरंभ के साथ INA की विभिन्न इकाइयाँ बर्मा से भारत की ओर बढ़ीं। उनका उद्देश्य केवल प्रत्यक्ष युद्ध करना नहीं था, बल्कि जापानी अग्रिम सेना का सहयोग करना, भारतीय क्षेत्र में प्रवेश करना, ब्रिटिश भारतीय सैनिकों से संपर्क स्थापित करना और भारतीय जनता में स्वतंत्रता आंदोलन के लिए समर्थन पैदा करना भी था।
अराकान क्षेत्र में INA की भूमिका
➣ U-Go Offensive के साथ जापानी सेना ने अराकान क्षेत्र में एक सहायक सैन्य अभियान चलाया, जिसे सामान्यतः Ha-Go अभियान से जोड़ा जाता है।
➣ इसका उद्देश्य मित्र राष्ट्रों का ध्यान और सैनिक शक्ति इम्फाल क्षेत्र से हटाना था। INA की कुछ इकाइयों को भी इस मोर्चे पर लगाया गया।
➣ INA की सुभाष ब्रिगेड की पहली बटालियन को कालादान घाटी की दिशा में भेजा गया। इसके कमांडर मेजर पित्री शरण रतूड़ी के नेतृत्व में इस बटालियन ने जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश तथा मित्र राष्ट्रों की अग्रिम चौकियों के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई की। इस अभियान के दौरान INA के सैनिकों ने कठिन पर्वतीय और घने जंगल वाले क्षेत्रों में आगे बढ़ते हुए अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन किया।
➣ अराकान अभियान के दौरान INA की पहली बटालियन आगे बढ़ते हुए मोदोक (Mowdok) तक पहुँची, जो उस समय भारतीय सीमा के निकट स्थित महत्वपूर्ण क्षेत्र था।
➣ 3 मई, 1944 को INA के सैनिकों ने मोदोक पर हमला किया और वहाँ से महत्वपूर्ण रसद सामग्री प्राप्त की। इसके बाद INA की एक कंपनी ने कुछ समय तक वहाँ अपनी स्थिति बनाए रखी।
➣ अराकान क्षेत्र में INA को गंभीर प्राकृतिक और सैन्य कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। मानसून, भोजन की कमी, बीमारी तथा कमजोर आपूर्ति व्यवस्था के कारण सैनिकों की स्थिति लगातार कठिन होती गई। अंततः जापानी सेना के पीछे हटने के साथ INA की इकाइयों को भी पीछे हटना पड़ा।
मणिपुर, इम्फाल और कोहिमा की ओर INA की प्रगति
➣ INA की मुख्य सैन्य शक्ति का एक बड़ा भाग मणिपुर और इम्फाल की दिशा में होने वाले U-Go Offensive में लगाया गया।
➣ INA की 1st Division की इकाइयों ने जापानी सेना के साथ मिलकर बर्मा से चिंदविन नदी पार की और भारत की सीमा की ओर बढ़ीं। कुछ INA इकाइयों का कार्य जापानी अग्रिम सेना के लिए पार्श्व सुरक्षा, संचार और टोही जैसी सहायता देना था।
➣ इम्फाल इस पूरे अभियान का प्रमुख लक्ष्य था। जापानी सेनाओं ने उत्तर, दक्षिण और पूर्व से इम्फाल के मैदान को घेरने का प्रयास किया।
➣ INA की इकाइयाँ भी इस व्यापक अभियान में शामिल थीं, लेकिन इम्फाल पर मुख्य आक्रमण और घेराबंदी की जिम्मेदारी जापानी divisions के पास थी। इसलिए इम्फाल की लड़ाई को केवल INA का सैन्य अभियान मानना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है।
➣ इम्फाल के उत्तर में स्थित कोहिमा भी जापानी U-Go Offensive का महत्वपूर्ण लक्ष्य था। जापानी 31st Division को कोहिमा की दिशा में भेजा गया।
➣कोहिमा पर अधिकार होने से दीमापुर–इम्फाल मार्ग (Dimapur–Imphal Road) को काटना संभव हो सकता था, जो इम्फाल में मित्र राष्ट्रों की आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग था।
➣ कोहिमा में अप्रैल 1944 के दौरान अत्यंत भीषण लड़ाई हुई। ब्रिटिश और भारतीय सैनिकों ने मजबूत प्रतिरोध किया तथा मित्र राष्ट्रों ने हवाई और स्थल मार्ग से तेजी से आपूर्ति पहुँचाई। इससे जापानी सेना का आगे बढ़ना रुक गया और धीरे-धीरे उसका अभियान कमजोर पड़ने लगा।
भारतीय क्षेत्र में INA की उपस्थिति और मोइरांग
➣ 1944 के अभियान का सबसे महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक पक्ष यह था कि INA के सैनिक भारतीय भूमि पर पहुँचे। मणिपुर में Bahadur Group के एक दल ने आगे बढ़कर मोइरांग क्षेत्र में प्रवेश किया। इस दल का नेतृत्व कर्नल शौकत मलिक कर रहे थे।
14 अप्रैल 1944 को मोइरांग में INA का ध्वज फहराया गया।
➣ इस घटना का INA के लिए अत्यंत बड़ा राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक महत्व था, क्योंकि स्वतंत्र भारत के नाम पर संगठित भारतीय सेना ने पहली बार ब्रिटिश शासन वाले भारतीय भूभाग के एक हिस्से में अपना ध्वज स्थापित किया। मोइरांग में INA का कार्यालय भी स्थापित किया गया।
➣ मोइरांग की घटना को बोस के दिल्ली चलो अभियान की वास्तविक प्रगति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया। INA के सैनिकों और समर्थकों के लिए यह केवल सैन्य उपलब्धि नहीं थी, बल्कि यह संदेश था कि स्वतंत्रता के लिए संगठित भारतीय सेना अब भारत की भूमि तक पहुँच चुकी थी।
➣ अराकान में मौडॉक और मणिपुर में मोइरांग की घटनाएँ INA के भारत में प्रवेश के दो महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। हालांकि दोनों स्थानों पर INA का नियंत्रण लंबे समय तक कायम नहीं रह सका।
| तथ्य | जानकारी |
|---|---|
| मुख्य जापानी अभियान | U-Go Offensive |
| अभियान का प्रमुख जापानी कमांडर | लेफ्टिनेंट जनरल रेन्या मुतागुची |
| अभियान का आरंभ | मार्च 1944 |
| मुख्य जापानी सेना | 15th Japanese Army |
| INA की प्रमुख भूमिका | जापानी सेना के साथ सहयोग, अग्रिम अभियान, टोही, flank protection तथा भारतीय क्षेत्र में राष्ट्रवादी लामबंदी |
| अराकान में प्रमुख INA इकाई | Subhas Brigade की 1st Battalion |
| अराकान में INA की महत्वपूर्ण उपलब्धि | Mowdok तक पहुँचना और वहाँ कुछ समय स्थिति बनाए रखना |
| मणिपुर में INA की प्रमुख घटना | 14 अप्रैल 1944 – मोइरांग में INA का ध्वज फहराया गया |
| मोइरांग अभियान का नेतृत्व | कर्नल शौकत मलिक के नेतृत्व वाला Bahadur Group |
| कोहिमा का सामरिक महत्व | Dimapur–Imphal Road को काटने के लिए महत्वपूर्ण |
| इम्फाल–कोहिमा परिणाम | जापानी–INA अभियान की विफलता और पीछे हटना |
| मुख्य विफलता के कारण | रसद संकट, भोजन की कमी, बीमारी, मानसून और मित्र राष्ट्रों की हवाई आपूर्ति |
INA की पराजय और विघटन
इम्फाल–कोहिमा की विफलता और बर्मा की ओर पीछे हटना
➣ 1944 का इम्फाल–कोहिमा अभियान जापानी सेना और INA के लिए निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इम्फाल पर कब्ज़ा करने तथा उत्तर-पूर्वी भारत में आगे बढ़ने का जापानी प्रयास सफल नहीं हो सका।
➣ मित्र राष्ट्रों ने अपनी बेहतर हवाई आपूर्ति, सुदृढ़ रसद व्यवस्था और अतिरिक्त सैनिकों की सहायता से जापानी अग्रिम को रोक दिया। जुलाई 1944 तक जापानी सेना और उसके साथ कार्य कर रही INA इकाइयों को पीछे हटना पड़ा।
➣ अभियान की विफलता का सबसे गंभीर प्रभाव रसद और आपूर्ति पर पड़ा। जापानी सेनाएँ अपनी लंबी supply lines के कारण पर्याप्त भोजन, दवाइयाँ, गोला-बारूद और अन्य आवश्यक सामग्री अग्रिम मोर्चों तक नहीं पहुँचा पा रही थीं।
➣ दूसरी ओर, मित्र राष्ट्र अपनी सेनाओं को बड़ी मात्रा में हवाई मार्ग से आपूर्ति करने में सक्षम थे।
➣ INA की स्थिति इन परिस्थितियों में और कठिन हो गई। INA की इकाइयाँ जापानी सहायता पर काफी हद तक निर्भर थीं और लंबे समय तक कठिन जंगल तथा पहाड़ी क्षेत्रों में रहने के कारण सैनिक भूख, बीमारी, थकान और कमजोर आपूर्ति से प्रभावित हुए। National Army Museum के अनुसार INA के सैकड़ों सैनिक भुखमरी और बीमारी के कारण मारे गए।
➣ इम्फाल अभियान की विफलता के बाद जापानी सेना ने बर्मा की ओर क्रमिक वापसी शुरू की और INA की इकाइयों को भी उसके साथ पीछे हटना पड़ा। इस वापसी ने INA की आक्रामक सैन्य क्षमता को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया और भारत में आगे बढ़ने की योजना वस्तुतः समाप्त हो गई।
1945 का बर्मा अभियान और INA की अंतिम सैन्य कार्रवाई
➣ 1945 में मित्र राष्ट्रों ने बर्मा को पुनः अपने नियंत्रण में लेने के लिए व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया। ब्रिटिश और भारतीय सेनाएँ चिंदविन पार करके आगे बढ़ीं तथा इरावदी नदी के पार पुलहेड स्थापित किए।
➣ मार्च 1945 में मांडले और मेइक्तिला पर मित्र राष्ट्रों ने अधिकार कर लिया और मई की शुरुआत तक रंगून भी उनके नियंत्रण में आ गया।
➣ इस चरण में INA पहले की तुलना में अत्यंत कमजोर स्थिति में थी। जापानी सेना लगातार पीछे हट रही थी और INA के पास पर्याप्त हथियार, भोजन, परिवहन तथा चिकित्सा सामग्री नहीं थी। फिर भी 1945 में INA की कुछ इकाइयों को बर्मा में जापानी सेना की वापसी को रोकने के लिए लड़ाई में लगाया गया।
➣ INA की 2nd Division ने मध्य बर्मा में इरावदी नदी के क्षेत्र में ब्रिटिश भारतीय सेना का सामना किया। National Army Museum के अनुसार लगभग 800 INA सैनिकों की एक टुकड़ी ने इरावदी के एक हिस्से की रक्षा करने का प्रयास किया, लेकिन कुछ ही घंटों के संघर्ष के बाद उसे पीछे हटना पड़ा।
➣ इसके बाद INA की अंतिम प्रमुख सैन्य स्थिति Mount Popa क्षेत्र में बनी। यहाँ भी INA मित्र राष्ट्रों की बेहतर सैन्य क्षमता और लगातार पीछे हटती जापानी सेना के सामने टिक नहीं सकी। माउंट पोपा के बाद INA का संगठन तेजी से बिखरने लगा।
➣ इस प्रकार 1945 का बर्मा अभियान INA के लिए एक नियमित सैन्य शक्ति के रूप में उसके अंतिम चरण का प्रतिनिधित्व करता है। अब उसका मुख्य उद्देश्य भारत की ओर आगे बढ़ना नहीं, बल्कि पीछे हटती जापानी सेना के साथ अपने सैनिकों को बचाना और संगठन को बनाए रखना रह गया था।
जापान की पराजय और INA का आत्मसमर्पण
➣ 1945 के मध्य तक जापान की सैन्य स्थिति अत्यंत कमजोर हो चुकी थी। बर्मा में जापानी सेनाएँ पराजित हो रही थीं और दक्षिण-पूर्व एशिया में मित्र राष्ट्र लगातार आगे बढ़ रहे थे।
➣ अंततः जापान ने 15 अगस्त 1945 को अपने बिना शर्त आत्मसमर्पण की घोषणा की। 2 सितंबर 1945 को टोक्यो खाड़ी में USS Missouri पर औपचारिक आत्मसमर्पण दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर हुए।
➣ जापान की पराजय के साथ INA का सैन्य आधार समाप्त हो गया। चूँकि INA जापानी सैन्य सहायता और संसाधनों पर निर्भर थी, जापानी आत्मसमर्पण के बाद उसके लिए संगठित युद्ध जारी रखना संभव नहीं रहा। INA की विभिन्न इकाइयों ने अलग-अलग स्थानों पर आत्मसमर्पण किया या मित्र राष्ट्रों द्वारा गिरफ्तार कर ली गईं।
➣ इम्फाल क्षेत्र में पहले ही लगभग 1,500 INA सैनिक पकड़े जा चुके थे। बाद में सितंबर 1945 में मलाया और बैंकॉक क्षेत्र में लगभग 7,000 INA सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया।
➣ इसके अतिरिक्त रंगून से मई से अक्टूबर 1945 के बीच 10,000 से अधिक INA सैनिकों को भारत वापस लाया गया।
➣ INA के गिरफ्तार अथवा आत्मसमर्पण करने वाले सैनिकों को दक्षिण-पूर्व एशिया से भारत लाया गया। इनमें से अनेक सैनिकों से पूछताछ की गई और ब्रिटिश सरकार ने उनके राजनीतिक तथा सैन्य संबंधों की जाँच की।
➣ बाद में इन बंदियों और अधिकारियों का मुद्दा INA Trials के रूप में सामने आया, जिसने भारतीय राजनीति और जनमत पर व्यापक प्रभाव डाला।
➣ इस प्रकार 1945 में जापान की पराजय और INA के सैनिकों का आत्मसमर्पण INA के सैन्य इतिहास का अंतिम चरण था।
➣ सैन्य अभियान विफल होने के बावजूद INA की गतिविधियों और उसके सैनिकों के मुकदमों ने भारत में स्वतंत्रता के पक्ष में नई राजनीतिक प्रतिक्रिया को जन्म दिया। इसलिए INA की सैन्य पराजय और उसके राजनीतिक प्रभाव को अलग-अलग समझना आवश्यक है।
| तथ्य | जानकारी |
|---|---|
| इम्फाल–कोहिमा अभियान का परिणाम | जापानी–INA अभियान की विफलता और बर्मा की ओर वापसी |
| INA की प्रमुख कमजोरी | भोजन, दवाइयों, हथियारों और परिवहन की कमी |
| मित्र राष्ट्रों की प्रमुख बढ़त | बेहतर रसद और हवाई आपूर्ति |
| मांडले पर मित्र राष्ट्रों का अधिकार | मार्च 1945 |
| रंगून पर मित्र राष्ट्रों का अधिकार | मई 1945 |
| 1945 में INA की प्रमुख अंतिम लड़ाई | इरावदी नदी क्षेत्र और Mount Popa |
| इरावदी में INA की टुकड़ी | लगभग 800 सैनिक |
| जापान का आत्मसमर्पण घोषित | 15 अगस्त 1945 |
| जापान का औपचारिक आत्मसमर्पण | 2 सितंबर 1945 |
| इम्फाल में पकड़े गए INA सैनिक | लगभग 1,500 |
| सितंबर 1945 में मलाया और बैंकॉक में आत्मसमर्पण | लगभग 7,000 सैनिक |
| रंगून से भारत लौटाए गए INA सैनिक | 10,000 से अधिक (मई–अक्टूबर 1945) |
| अगला महत्वपूर्ण चरण | INA Trials / लाल किला मुकदमे |
लाल किला मुकदमे (INA Trials)
प्रथम लाल किला मुकदमा और INA अधिकारियों पर आरोप
➣ द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश सरकार ने आज़ाद हिंद फ़ौज के अनेक अधिकारियों और सैनिकों के विरुद्ध सैन्य तथा कानूनी कार्रवाई शुरू की।
➣ इनमें सबसे प्रसिद्ध मुकदमे दिल्ली के लाल किले में चलाए गए, जिन्हें सामान्यतः INA Trials या Red Fort Trials कहा जाता है।
प्रथम प्रमुख मुकदमे की कार्यवाही 5 नवंबर 1945 को शुरू हुई।
➣ प्रथम लाल किला मुकदमे में आज़ाद हिंद फ़ौज के तीन वरिष्ठ अधिकारियों – मेजर जनरल शाहनवाज़ खान, मेजर जनरल प्रेम कुमार सहगल और कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों – को संयुक्त रूप से अभियुक्त बनाया गया।
➣ ये तीनों INA की विभिन्न सैन्य इकाइयों में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके थे। इन तीनों को साथ में मुकदमे के लिए चुनना भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण साबित हुआ, क्योंकि वे क्रमशः मुस्लिम, हिंदू और सिख समुदायों का प्रतिनिधित्व करते दिखाई दिए।
➣ ब्रिटिश सरकार ने इन अधिकारियों पर Indian Penal Code की धारा 121 के अंतर्गत राजा के विरुद्ध युद्ध छेड़ने का आरोप लगाया। इसके अतिरिक्त उन पर हत्या तथा हत्या के लिए उकसाने से जुड़े आरोप भी लगाए गए।
➣ अभियोजन पक्ष का मूल तर्क यह था कि ये अधिकारी ब्रिटिश भारतीय सेना में सेवा कर चुके थे, बाद में INA में शामिल होकर जापान के साथ मिलकर ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध युद्ध में भाग लिया और इस प्रकार ब्रिटिश सम्राट के विरुद्ध युद्ध किया।
➣ अभियुक्तों के बचाव पक्ष ने इस तर्क को चुनौती दी। उनका कहना था कि वे किसी सामान्य विद्रोही सेना के सदस्य नहीं थे, बल्कि Provisional Government of Free India की सेना के सैनिक थे और उनका संघर्ष भारत की स्वतंत्रता के लिए था।
➣ इसलिए आज़ाद हिंद सरकार के अधीन INA को एक वैध राष्ट्रीय सेना और उनके युद्ध को युद्ध-ए-आज़ादी के रूप में देखा जाना चाहिए।
➣ मुकदमे की कानूनी रक्षा के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक विशेष INA रक्षा समिति (INA Defence Committee) गठित की। इसमें प्रसिद्ध विधिवेत्ताओं और वकीलों को शामिल किया गया।
➣ भूलाभाई देसाई ने प्रमुख बचाव वकील के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जबकि सर तेज बहादुर सप्रू, आसफ अली, जवाहरलाल नेहरू और अन्य विधिज्ञ भी इस रक्षा प्रयास से जुड़े। नेहरू स्वयं Defence Committee के सदस्य बने।
➣ जवाहरलाल नेहरू ने भी INA Defence Committee के सदस्य के रूप में इस मुकदमे में भाग लिया। कई वर्षों बाद उन्होंने पुनः वकालत की पोशाक पहनकर अदालत में INA अधिकारियों की ओर से पैरवी की। नेहरू का अदालत में इस प्रकार उपस्थित होना INA अभियुक्तों के प्रति राष्ट्रीय समर्थन का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया।
➣ Defence Committee की स्थापना 21 सितंबर 1945 को कांग्रेस कार्यसमिति के प्रस्ताव के बाद हुई थी। इसका तत्काल उद्देश्य शाहनवाज़ खान, सहगल और ढिल्लों की कानूनी रक्षा करना था, लेकिन बाद में समिति का कार्य अन्य INA बंदियों की सहायता, पूछताछ, राहत तथा उनके मामलों की जानकारी जुटाने तक विस्तृत हो गया।
भारतीय जनता की प्रतिक्रिया और राजनीतिक प्रभाव
➣ INA मुकदमों ने पूरे भारत में असाधारण जन-उत्साह और सहानुभूति पैदा की। युद्धकालीन सेंसरशिप हटने के बाद INA के संघर्ष और मुकदमों से जुड़ी खबरें बड़े पैमाने पर सामने आईं और तीनों अभियुक्तों को अनेक भारतीयों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लड़ने वाले राष्ट्रीय नायकों के रूप में देखना शुरू किया।
➣ देश के अलग-अलग हिस्सों में INA Defence Fund के लिए धन एकत्र किया गया। सामान्य नागरिकों के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक समूहों ने भी अभियुक्तों की सहायता के लिए समर्थन दिया।
➣ जवाहरलाल नेहरू ने नवंबर 1945 में उल्लेख किया कि मुकदमों ने जनता की कल्पना पर असाधारण प्रभाव डाला था और रक्षा कोष के लिए विभिन्न क्षेत्रों से धन आने लगा था।
➣ INA मुकदमों का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह रहा कि विभिन्न राजनीतिक धाराओं के बीच इस मुद्दे पर व्यापक एकता दिखाई दी। कांग्रेस ने अभियुक्तों की रक्षा का नेतृत्व किया, जबकि मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा और सिख लीग जैसे संगठनों ने भी INA के प्रति उत्पन्न जनभावना के कारण समर्थन व्यक्त किया।
➣ इस समर्थन का महत्व इसलिए भी बढ़ गया क्योंकि शाहनवाज़ खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों की संयुक्त पहचान ने INA को धार्मिक और सामुदायिक एकता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया।
➣ एक मुस्लिम, एक हिंदू और एक सिख अधिकारी का एक साथ मुकदमा भारतीय जनता के बीच INA की सर्वभारतीय छवि को और मजबूत करने वाला तत्व बना।
➣ मुकदमों ने भारतीय सेना और जनता के बीच संबंधों को भी प्रभावित किया। जवाहरलाल नेहरू ने दिसंबर 1945 में कहा कि INA के इतिहास और वर्तमान मुकदमों ने भारतीय सेना को जनता के अधिक निकट ला दिया। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि सेना केवल औपनिवेशिक सरकार की संस्था नहीं, बल्कि भारतीय समाज का भी हिस्सा है।
➣ प्रथम मुकदमे में तीनों अधिकारियों को दोषी ठहराया गया और उन्हें सेना से बर्खास्तगी, वेतन तथा भत्तों की जब्ती और आजीवन निर्वासन की सजा सुनाई गई। लेकिन व्यापक जन-प्रतिक्रिया और राजनीतिक परिस्थितियों के बीच यह सजा तत्काल प्रभाव से रद्द कर दी गई और तीनों अधिकारी मुक्त कर दिए गए।
➣ जनवरी 1946 में तीनों अधिकारियों की रिहाई के बाद जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि उनके मुकदमे ने भारत को गहराई से प्रभावित किया था और जनता की अभूतपूर्व एकता ने इस परिणाम में भूमिका निभाई।
➣ इस प्रकार INA मुकदमे केवल कानूनी कार्रवाई नहीं रहे, बल्कि वे राष्ट्रीय भावना और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राजनीतिक दबाव का महत्वपूर्ण केंद्र बन गए।
➣ इस प्रकार लाल किला मुकदमों का महत्व INA सैनिकों की कानूनी रक्षा से कहीं अधिक था। इन मुकदमों ने भारतीय जनमत को तीव्र रूप से आंदोलित किया, राजनीतिक दलों को एक साझा मुद्दे पर लाया और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय भावना को मजबूत किया।
➣ आगे 1946 में भारतीय सशस्त्र बलों के भीतर उत्पन्न असंतोष के संदर्भ में भी INA और उसके मुकदमों का प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता है।
अन्य INA मुकदमे और कैप्टन अब्दुल रशीद
➣ प्रथम लाल किला मुकदमे में शाहनवाज़ खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों को दोषी ठहराया गया और उन्हें आजीवन निर्वासन (Transportation for Life) की सजा सुनाई गई।
➣ हालांकि, व्यापक जनदबाव और राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह सजा लागू नहीं की गई और Commander-in-Chief जनरल क्लॉड ऑकनलेक ने तीनों को रिहा करने का निर्णय लिया।
➣ प्रथम मुकदमे के बाद भी INA के अधिकारियों और सैनिकों के विरुद्ध मुकदमे जारी रहे। इनमें कैप्टन अब्दुल रशीद का मामला विशेष रूप से महत्वपूर्ण था। उन्हें INA में रहते हुए भारतीय सैनिकों के साथ क्रूरता से संबंधित आरोप में 7 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा दी गई।
➣ जवाहरलाल नेहरू ने फरवरी 1946 में इस कठोर सजा की आलोचना करते हुए इसके पुनर्विचार और अन्य INA मामलों को समाप्त करने की मांग की।
➣ अब्दुल रशीद की सजा के विरोध में फरवरी 1946 में कलकत्ता में व्यापक आंदोलन हुआ। छात्रों, श्रमिकों और विभिन्न राजनीतिक संगठनों ने विरोध-प्रदर्शनों तथा हड़तालों में भाग लिया। इस आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम एकता का भी उल्लेखनीय प्रदर्शन हुआ और यह विरोध कई दिनों तक जारी रहा।
➣ इन प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें हुईं तथा पुलिस गोलीबारी में अनेक लोग मारे गए। गांधीजी को भेजी गई समकालीन सूचना में 53 लोगों की मृत्यु और 500 से अधिक लोगों के घायल होने की बात कही गई थी।
➣ रशीद अली दिवस के रूप में हुए विरोध ने यह दिखाया कि INA से संबंधित मुकदमे अब केवल सैनिकों के कानूनी मामलों तक सीमित नहीं रहे थे, बल्कि वे व्यापक जन-असंतोष और ब्रिटिश-विरोधी राजनीतिक आंदोलन का केंद्र बन चुके थे।
➣ फरवरी 1946 के इन्हीं घटनाक्रमों के तुरंत बाद 18 फरवरी 1946 को रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह शुरू हुआ। इस प्रकार INA मुकदमों और उनके विरुद्ध जनप्रतिक्रिया ने 1946 के व्यापक राजनीतिक एवं सैन्य असंतोष के वातावरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
| तथ्य | जानकारी |
|---|---|
| स्थान | लाल किला, दिल्ली |
| प्रथम प्रमुख INA Trial शुरू | 5 नवंबर 1945 |
| मुख्य अभियुक्त | शाहनवाज़ खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों |
| मुख्य आरोप | राजा के विरुद्ध युद्ध छेड़ना (Waging War against the King) |
| अन्य आरोप | हत्या और हत्या के लिए उकसाना |
| मुख्य बचाव पक्ष के वकील | भूलाभाई देसाई |
| INA Defence Committee | 21 सितंबर 1945 के कांग्रेस कार्यसमिति प्रस्ताव के बाद गठित |
| जवाहरलाल नेहरू की भूमिका | INA Defence Committee के सदस्य |
| अन्य प्रमुख विधिवेत्ता | सर तेज बहादुर सप्रू, आसफ अली आदि |
| राजनीतिक समर्थन | कांग्रेस, मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा और सिख लीग सहित विभिन्न राजनीतिक शक्तियों का समर्थन |
| पहले मुकदमे का परिणाम | दोषसिद्धि के बाद सजा, लेकिन सजा तत्काल remit कर दी गई और तीनों मुक्त हुए |
| ऐतिहासिक प्रभाव | व्यापक जनसहानुभूति, राष्ट्रीय एकता और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राजनीतिक दबाव |
नेताजी का अंतिम चरण एवं रहस्य
जापान की पराजय के बाद नेताजी की योजना
➣ 15 अगस्त, 1945 को जापान द्वारा आत्मसमर्पण की घोषणा के बाद सुभाष चंद्र बोस के सामने आज़ाद हिंद फ़ौज और स्वतंत्रता संघर्ष के भविष्य का गंभीर प्रश्न उत्पन्न हो गया।
➣ जापान की पराजय के कारण INA को प्राप्त सैन्य और राजनीतिक समर्थन समाप्त हो गया तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में बोस की स्थिति तेजी से कमजोर होने लगी।
➣ जापान के आत्मसमर्पण के बाद बोस ने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष को किसी नए अंतरराष्ट्रीय आधार से जारी रखने की संभावना पर विचार किया।
➣ उपलब्ध विवरणों के अनुसार उनका उद्देश्य ऐसी शक्ति तक पहुँचना था जो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उनके संघर्ष को आगे बढ़ाने में सहायता कर सके।
➣ इसी योजना के अंतर्गत बोस ने दक्षिण-पूर्व एशिया से निकलने का प्रयास किया। वे साइगॉन (वर्तमान हो ची मिन्ह सिटी) पहुँचे और वहाँ से जापानी नियंत्रण वाले क्षेत्र के रास्ते आगे जाने की योजना बनाई। उनके साथ INA के अधिकारी कर्नल हबीबुर रहमान भी थे।
➣ अगस्त 1945 के मध्य में बोस ने दक्षिण-पूर्व एशिया से प्रस्थान किया। उपलब्ध अभिलेखों में उनके अंतिम यात्रा मार्ग और विभिन्न पड़ावों के संबंध में कुछ मतभेद मिलते हैं,
➣ लेकिन सामान्यतः यह माना जाता है कि उनका अंतिम लक्ष्य जापानी नियंत्रण से बाहर किसी ऐसे क्षेत्र तक पहुँचना था जहाँ से वे अपने राजनीतिक संघर्ष को पुनर्गठित कर सकें।
18 अगस्त, 1945 की कथित विमान दुर्घटना
➣ 18 अगस्त, 1945 को ताइहोकू (वर्तमान ताइपेई, ताइवान) के निकट एक जापानी सैन्य विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटना को नेताजी की मृत्यु से जोड़ा जाता है। विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद उसमें सवार यात्रियों में गंभीर रूप से घायल लोगों को अस्पताल ले जाया गया।
➣ उपलब्ध जांच विवरणों के अनुसार बोस को भी इस दुर्घटना में गंभीर चोटें आईं। उनके साथ यात्रा कर रहे कर्नल हबीबुर रहमान ने बाद में इस घटना और बोस की अंतिम अवस्था के संबंध में बयान दिया। आधिकारिक रूप से स्वीकार किए गए इस विवरण के अनुसार बोस ने दुर्घटना में लगी चोटों के कारण उसी दिन दम तोड़ दिया।
➣ दुर्घटना और मृत्यु की इस कहानी के अनुसार नेताजी का अंतिम संस्कार ताइहोकू में किया गया और उनकी अस्थियाँ बाद में टोक्यो के Renkoji Temple में रखी गईं। यह विवरण बाद की सरकारी जांचों में भी प्रमुख आधार रहा।
➣ हालांकि दुर्घटना से संबंधित दस्तावेजों, प्रत्यक्षदर्शी बयानों और विभिन्न परिस्थितियों को लेकर समय-समय पर प्रश्न उठते रहे। इसी कारण नेताजी की मृत्यु का प्रश्न स्वतंत्र भारत में लंबे समय तक एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक रहस्य बना रहा।
नेताजी की मृत्यु और उसके बाद का रहस्य
➣ स्वतंत्र भारत सरकार ने नेताजी की मृत्यु के संबंध में कई बार जाँच कराई। 1956 की शाहनवाज़ समिति के बहुमत ने निष्कर्ष निकाला कि नेताजी की मृत्यु ताइहोकू की विमान दुर्घटना में हुई थी।
➣ समिति के एक सदस्य सुरेश चंद्र बोस ने हालांकि इससे असहमति व्यक्त की और अलग रिपोर्ट प्रस्तुत की। भारत सरकार ने बहुमत के निष्कर्ष को स्वीकार किया।
➣ इसके बाद न्यायमूर्ति जी. डी. खोसला आयोग ने भी नेताजी की मृत्यु को विमान दुर्घटना से जोड़ा। आयोग के अनुसार नेताजी ताइहोकू विमान दुर्घटना में लगी चोटों के कारण मारे गए और उनकी अस्थियाँ टोक्यो ले जाई गईं। फिर भी इस निष्कर्ष से विवाद समाप्त नहीं हुआ।
➣ नेताजी की मृत्यु के संबंध में आगे भी सार्वजनिक और राजनीतिक स्तर पर जाँच की माँग होती रही। इसके परिणामस्वरूप न्यायमूर्ति मनोज कुमार मुखर्जी आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने उपलब्ध साक्ष्यों और पहले की जांचों की पुनः समीक्षा की।
➣ मुखर्जी आयोग ने अपने निष्कर्ष में कहा कि नेताजी की मृत्यु कथित विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी। आयोग ने यह भी निष्कर्ष दिया कि Renkoji Temple में रखी अस्थियाँ नेताजी की नहीं थीं।
➣ हालांकि भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग के इस निष्कर्ष को स्वीकार नहीं किया। इस प्रकार नेताजी की मृत्यु को लेकर सरकारी तथा जांच आयोगों के निष्कर्षों में मतभेद बना रहा।
परीक्षा की दृष्टि से सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यह है कि भारत सरकार द्वारा स्वीकार किए गए शाहनवाज़ समिति और खोसला आयोग के निष्कर्ष के अनुसार नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त, 1945 को ताइहोकू की विमान दुर्घटना में हुई, जबकि मुखर्जी आयोग ने इस निष्कर्ष को अस्वीकार किया।
अन्य सम्बंधित महत्वपूर्ण तथ्य
आज़ाद हिंद बैंक (1944–45)
➣ 5 अप्रैल 1944 को रंगून (वर्तमान यांगून, म्यांमार) में आज़ाद हिंद बैंक का उद्घाटन किया गया। उस समय रंगून आज़ाद हिंद सरकार और आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) की गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र था।
➣ बैंक का उद्देश्य आज़ाद हिंद सरकार की आर्थिक आवश्यकताओं को व्यवस्थित करना, प्रवासी भारतीयों से प्राप्त धन और अन्य आर्थिक सहयोग को सुरक्षित रखना तथा सरकार और आज़ाद हिंद फ़ौज की प्रशासनिक एवं सैन्य गतिविधियों के लिए वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराना था।
➣ दक्षिण-पूर्व एशिया में रहने वाले भारतीय व्यापारियों, मजदूरों और अन्य प्रवासी भारतीयों ने आज़ाद हिंद आंदोलन को आर्थिक सहयोग दिया। उन्होंने नकद धन, सोना, आभूषण और अन्य मूल्यवान वस्तुएँ प्रदान कीं। इस सहयोग ने आज़ाद हिंद सरकार और INA की गतिविधियों के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ आज़ाद हिंद बैंक की स्थापना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि आज़ाद हिंद सरकार अपने आर्थिक संसाधनों को एक संगठित वित्तीय व्यवस्था के माध्यम से संचालित कर सके। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने दक्षिण-पूर्व एशिया के भारतीय समुदाय से आर्थिक सहयोग जुटाने पर विशेष जोर दिया था।
➣ बैंक के संचालन और प्रबंधन से संबंधित स्रोतों में देबनाथ दास का नाम प्रमुख रूप से मिलता है। बैंक के नाम को लेकर विभिन्न स्रोतों में आज़ाद हिंद बैंक, इंडियन नेशनल बैंक और नेशनल बैंक ऑफ़ आज़ाद हिंद जैसे नामों का उल्लेख मिलता है। इसलिए इन नामों को एक ही संस्था से संबंधित विभिन्न संदर्भों के रूप में समझना चाहिए।
➣ आज़ाद हिंद बैंक से संबंधित एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इसके माध्यम से आज़ाद हिंद सरकार की मुद्रा और वचनपत्र जारी किए गए। इन पर Bank of Independence, Jai Hind तथा आज़ाद हिंद आंदोलन से जुड़े प्रतीक और संदेश दिखाई देते थे। कुछ नोटों पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस का चित्र तथा स्वतंत्र भारत से संबंधित अंकन भी मिलता है।
➣ बैंक का उपयोग केवल सरकारी धन रखने तक सीमित नहीं था। उपलब्ध युद्धकालीन विवरणों से संकेत मिलता है कि निजी भारतीयों के खाते भी बैंक में थे और भारतीय समुदाय की जमा राशि भी इसकी वित्तीय गतिविधियों का हिस्सा थी। इससे स्पष्ट होता है कि बैंक आज़ाद हिंद आंदोलन की व्यापक आर्थिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ था।
➣ 1945 में जापान और आज़ाद हिंद फ़ौज की सैन्य स्थिति कमजोर होने तथा ब्रिटिश सेनाओं के बर्मा की ओर बढ़ने के साथ बैंक की गतिविधियाँ भी प्रभावित होने लगीं।
➣ मई 1945 में ब्रिटिश सेनाओं द्वारा रंगून पर पुनः कब्ज़ा किए जाने के बाद आज़ाद हिंद बैंक का संचालन समाप्त हो गया और उसकी संपत्तियाँ तथा अभिलेख ब्रिटिश अधिकारियों के नियंत्रण में चले गए।
| स्थापना/उद्घाटन | 5 अप्रैल 1944, रंगून |
| संबंधित संस्था | आज़ाद हिंद सरकार और आज़ाद हिंद फ़ौज |
| प्रमुख उद्देश्य | आज़ाद हिंद आंदोलन के लिए वित्तीय संसाधनों का प्रबंधन |
| आर्थिक सहयोग | दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रवासी भारतीयों का योगदान |
| प्रमुख सहयोग | नकद धन, सोना और आभूषण |
| प्रमुख नाम | देबनाथ दास |
| मुद्रा संबंधी भूमिका | आज़ाद हिंद सरकार के नोट और वचनपत्र जारी किए गए |
| नोटों से जुड़े अंकन | Bank of Independence और Jai Hind |
| बैंक की गतिविधियों का अंत | 1945 में जापानी पराजय और रंगून पर ब्रिटिश नियंत्रण के बाद (मई 1945) |
| ऐतिहासिक महत्व | आज़ाद हिंद सरकार की आर्थिक एवं वित्तीय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा |
आज़ाद हिंद रेडियो(1942)
➣ आज़ाद हिंद रेडियो (Azad Hind Radio) नेताजी सुभाषचंद्र बोस के स्वतंत्रता आंदोलन का एक अत्यंत प्रभावशाली प्रचार और संचार माध्यम था।
➣ इसकी शुरुआत 7 जनवरी 1942 को बर्लिन से हुई और बाद में दक्षिण-पूर्व एशिया में आज़ाद हिंद आंदोलन के विस्तार के साथ इसके प्रसारण का केंद्र भी बदलता गया।
➣ नेताजी रेडियो के माध्यम से भारत के लोगों, ब्रिटिश भारतीय सेना के सैनिकों, दक्षिण-पूर्व एशिया में बसे भारतीयों तथा विदेशों में रहने वाले भारतीयों से सीधे संवाद करते थे। उनकी रणनीति स्पष्ट थी – ब्रिटिश सरकार द्वारा नियंत्रित सूचना-तंत्र के बाहर से भारतीयों तक स्वतंत्रता का संदेश पहुँचाना।
➣ रेडियो कार्यक्रमों का आरंभ बहादुर शाह ज़फ़र से जुड़ी एक प्रसिद्ध पंक्ति से किया जाता था – जब तलक ईमान की… – जिसका उद्देश्य 1857 की स्मृति, भारतीय प्रतिरोध और ब्रिटिश-विरोधी भावना को वर्तमान स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ना था।
➣ आज़ाद हिंद रेडियो की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उसकी बहुभाषिकता थी। प्रसारण विभिन्न भारतीय भाषाओं में किए जाते थे, जिनमें हिंदी, बंगाली, तमिल, उर्दू, अंग्रेज़ी, मराठी, पंजाबी, पश्तो आदि शामिल थीं। अलग-अलग स्रोतों में प्रसारणों की भाषा-सूची में कुछ अंतर मिलता है।
➣ नेताजी के रेडियो भाषणों में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की आलोचना, पूर्ण स्वतंत्रता की मांग, राष्ट्रीय एकता, सशस्त्र संघर्ष, त्याग, अनुशासन और भारतीयों को एकजुट करने जैसे विषय बार-बार आते थे।
➣ ब्रिटिश प्रचार द्वारा उनके बारे में फैलाई गई अफवाहों का जवाब भी वे स्वयं रेडियो पर देते थे। उदाहरण के लिए, 25 मार्च 1942 के एक प्रसारण में उन्होंने अपने जीवित होने की खबर स्वयं दी और ब्रिटिश प्रचार को चुनौती दी।
➣ 25 मार्च 1942 के क्रिप्स मिशन पर प्रसारण में उन्होंने ब्रिटिश नीति को divide and rule अर्थात् फूट डालो और शासन करो की नीति बताया। उन्होंने यह तर्क दिया कि ब्रिटेन युद्ध में भारत की शक्ति और संसाधनों का उपयोग अपने साम्राज्यवादी हितों के लिए कर रहा है।
➣ 20 अप्रैल 1942 के India has one enemy प्रसारण में नेताजी ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को भारत की स्वतंत्रता का मुख्य शत्रु बताया और कहा कि भारत को स्वतंत्रता और गुलामी के बीच अपना रास्ता चुनना होगा। उसी भाषण में उन्होंने एक स्वतंत्र भारत की कल्पना न्याय, समानता और बंधुत्व पर आधारित समाज के रूप में प्रस्तुत की।
➣ जून 1942 के एक संबोधन में उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों को स्वतंत्रता के अग्रदूत बताया और बलिदान के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने सैनिकों से कहा कि स्वतंत्रता कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे केवल मांगने से प्राप्त किया जा सके। उसके लिए कठिन संघर्ष और त्याग आवश्यक है।
➣ नेताजी रेडियो का इस्तेमाल ब्रिटिश रेडियो प्रचार को सीधे चुनौती देने के लिए भी करते थे। आज़ाद हिंद रेडियो के प्रसारणों में वे BBC को व्यंग्यात्मक रूप से Bluff and Bluster Corporation और All India Radio को Anti-Indian Radio कहते थे।
➣ इसका उद्देश्य श्रोताओं को यह बताना था कि ब्रिटिश नियंत्रण वाले रेडियो से आने वाली हर सूचना को बिना सवाल किए स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
➣ आज़ाद हिंद रेडियो का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसारण महात्मा गांधी को संबोधित संदेश था। प्रचलित और प्रकाशित पाठ के अनुसार 6 जुलाई 1944 को नेताजी ने रेडियो से गांधीजी को संबोधित करते हुए उन्हें Father of our Nation कहा और भारत की मुक्ति के लिए चल रहे संघर्ष में उनका आशीर्वाद और शुभकामनाएँ माँगीं।
➣ यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि नेताजी और गांधीजी स्वतंत्रता प्राप्ति के तरीके को लेकर अलग-अलग विचार रखते थे – गांधीजी अहिंसक जनआंदोलन के पक्षधर थे, जबकि नेताजी सशस्त्र संघर्ष को भी आवश्यक मानते थे। फिर भी नेताजी ने गांधीजी के राष्ट्रीय नेतृत्व और सम्मान को स्वीकार किया।
➣ इस प्रसारण में नेताजी ने अपने ऊपर लगाए जाने वाले देशद्रोही या विदेशी शक्तियों के हाथों इस्तेमाल होने के आरोपों का भी जवाब दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य व्यक्तिगत सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन से भारत की मुक्ति था।
➣ इस प्रकार आज़ाद हिंद रेडियो को नेताजी के स्वतंत्रता अभियान का आवाज़ वाला मोर्चा कहा जा सकता है। जहाँ उनके समर्थक राजनीतिक और सैन्य स्तर पर सक्रिय थे, वहीं रेडियो के माध्यम से नेताजी भारतीयों के विचार, मनोबल और राष्ट्रीय चेतना को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे।
| स्थापना/प्रारंभ | 7 जनवरी 1942 |
| प्रारंभिक केंद्र | बर्लिन |
| प्रमुख नेता | सुभाषचंद्र बोस |
| मुख्य उद्देश्य | ब्रिटिश प्रचार का विरोध और स्वतंत्रता का संदेश |
| प्रमुख विशेषता | बहुभाषिक प्रसारण |
| महत्वपूर्ण प्रसारण | India has one enemy – 20 अप्रैल 1942 |
| गांधीजी को संबोधन | 6 जुलाई 1944 |
| गांधीजी के लिए संबोधन | Father of our Nation |
| BBC के लिए बोस का व्यंग्यात्मक नाम | Bluff and Bluster Corporation |
| All India Radio के लिए | Anti-Indian Radio |
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य- Onliner
➣ प्रथम आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) का औपचारिक गठन 1 सितंबर, 1942 को सिंगापुर में कैप्टन मोहन सिंह के नेतृत्व में किया गया था।
➣ इवाइची फूजीवारा जापानी सेना के खुफिया अधिकारी थे। उनके नेतृत्व वाली Fujiwara Kikan ने भारतीय युद्धबंदियों और भारतीय राष्ट्रवादियों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ सिंगापुर के पतन के बाद लगभग 55,000 भारतीय सैनिक जापानी युद्धबंदी बने, जिनमें से अनेक को बाद में INA के संगठन में शामिल किया गया।
➣ फैरर पार्क, सिंगापुर में भारतीय युद्धबंदियों को एकत्र करके उन्हें भारत की स्वतंत्रता के लिए एक भारतीय सेना के रूप में संगठित करने का प्रयास किया गया।
➣ रास बिहारी बोस ने दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को राजनीतिक आधार देने तथा Indian Independence League (IIL) को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ Indian Independence League दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख राजनीतिक संगठन था, जबकि INA उसकी सैन्य शाखा के रूप में विकसित की गई।
➣ टोक्यो सम्मेलन (1942) और बैंकॉक सम्मेलन (1942) ने दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित करने तथा INA को राजनीतिक आंदोलन से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ प्रथम INA का संकट मुख्यतः मोहन सिंह और जापानी नेतृत्व के बीच INA की स्वायत्तता, नियंत्रण और जापानी हस्तक्षेप को लेकर उत्पन्न मतभेदों के कारण हुआ।
➣ 29 दिसंबर, 1942 को मोहन सिंह को जापानी अधिकारियों द्वारा नज़रबंद में रखा गया। इसके बाद प्रथम INA का संगठन प्रभावी रूप से निष्क्रिय हो गया।
➣ सुभाष चंद्र बोस फरवरी 1943 में जर्मनी से पूर्वी एशिया की ओर रवाना हुए और जर्मन तथा जापानी पनडुब्बियों के माध्यम से जापान पहुँचे।
➣ सुभाष चंद्र बोस 2 जुलाई, 1943 को सिंगापुर पहुँचे और 4 जुलाई, 1943 को रास बिहारी बोस से Indian Independence League का नेतृत्व ग्रहण किया।
➣ 5 जुलाई, 1943 को सिंगापुर में INA के सैनिकों को संबोधित करते हुए सुभाष चंद्र बोस ने प्रसिद्ध दिल्ली चलो का आह्वान किया।
➣ सुभाष चंद्र बोस ने INA को केवल पूर्व युद्धबंदी सैनिकों के संगठन तक सीमित न रखकर राष्ट्रीय सेना के रूप में विकसित करने का प्रयास किया और दक्षिण-पूर्व एशिया के भारतीय समुदायों से व्यापक समर्थन प्राप्त किया।
➣ INA की प्रमुख सैन्य इकाइयों में सुभाष ब्रिगेड, गांधी ब्रिगेड, आज़ाद ब्रिगेड और नेहरू ब्रिगेड शामिल थीं।
➣ Bahadur Group INA की विशेष अभियान इकाई थी, जिसका संबंध टोही, खुफिया, प्रचार और अग्रिम क्षेत्रों में विशेष कार्रवाइयों से था।
➣ रानी झाँसी रेजिमेंट INA की महिला सैन्य इकाई थी, जिसका गठन 1943 में किया गया था। इसका नाम रानी लक्ष्मीबाई के नाम पर रखा गया था।
➣ रानी झाँसी रेजिमेंट की प्रमुख कमांडर डॉ. लक्ष्मी स्वामीनाथन (कैप्टन लक्ष्मी सहगल) थीं।
➣ आज़ाद हिंद सरकार (Provisional Government of Free India) की स्थापना 21 अक्टूबर, 1943 को सिंगापुर में सुभाष चंद्र बोस ने की थी।
➣ आज़ाद हिंद सरकार में सुभाष चंद्र बोस ने Head of State, Prime Minister और Minister of War के पद संभाले।
➣ 23 अक्टूबर, 1943 को जापान ने आज़ाद हिंद सरकार को मान्यता दी। बाद में अन्य Axis समर्थक सरकारों ने भी इसे मान्यता प्रदान की।
➣ 24 अक्टूबर, 1943 को आज़ाद हिंद सरकार ने ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की।
➣ 6 नवंबर, 1943 को जापान ने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह को आज़ाद हिंद सरकार को सौंपने की घोषणा की।
➣ सुभाष चंद्र बोस 29 दिसंबर, 1943 को अंडमान पहुँचे और 30 दिसंबर, 1943 को पोर्ट ब्लेयर में भारतीय ध्वज फहराया।
➣ सुभाष चंद्र बोस ने अंडमान को शहीद और निकोबार को स्वराज नाम दिया था।
➣ 1944 का U-Go Offensive जापानी सेना का भारत की ओर प्रमुख अभियान था, जिसमें INA ने जापानी सेना के साथ सहयोग किया।
➣ INA की कुछ इकाइयों ने अराकान क्षेत्र में अभियान में भाग लिया और Mowdok तक पहुँचने में सफलता प्राप्त की।
➣ 14 अप्रैल, 1944 को कर्नल शौकत मलिक के नेतृत्व में INA के दल ने मोइरांग, मणिपुर में आज़ाद हिंद का ध्वज फहराया।
➣ इम्फाल–कोहिमा अभियान 1944 में जापानी सेना और INA के लिए निर्णायक सैन्य असफलता साबित हुआ। रसद संकट, भोजन की कमी, बीमारी, मानसून और मित्र राष्ट्रों की बेहतर हवाई आपूर्ति इसकी विफलता के प्रमुख कारणों में थे।
➣ इम्फाल–कोहिमा अभियान की विफलता के बाद जापानी सेना और INA की इकाइयों को बर्मा की ओर पीछे हटना पड़ा, जिससे INA की सैन्य शक्ति तेजी से कमजोर हुई।
➣ 1945 में जापान की पराजय के साथ INA का सैन्य आधार समाप्त हो गया और उसके अनेक सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया या मित्र राष्ट्रों द्वारा गिरफ्तार किए गए।
➣ प्रथम प्रमुख लाल किला मुकदमे की शुरुआत 5 नवंबर, 1945 को हुई। इसमें शाहनवाज़ खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों प्रमुख अभियुक्त थे।
➣ इन तीनों INA अधिकारियों पर मुख्य रूप से राजा के विरुद्ध युद्ध छेड़ने (Waging War against the King) का आरोप लगाया गया था। इनके विरुद्ध हत्या और हत्या के लिए उकसाने से जुड़े आरोप भी लगाए गए थे।
➣ INA Defence Committee का गठन 21 सितंबर, 1945 को कांग्रेस कार्यसमिति के प्रस्ताव के बाद किया गया था। इसका प्रारंभिक उद्देश्य शाहनवाज़ खान, सहगल और ढिल्लों की कानूनी रक्षा करना था।
➣ भूलाभाई देसाई INA मुकदमों में प्रमुख बचाव पक्ष के वकील थे। जवाहरलाल नेहरू, सर तेज बहादुर सप्रू और आसफ अली सहित कई प्रमुख विधिवेत्ता Defence Committee से जुड़े थे।
➣ INA के मुद्दे पर कांग्रेस, मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा और सिख लीग सहित विभिन्न राजनीतिक शक्तियों ने समर्थन व्यक्त किया। इससे INA मुकदमे राष्ट्रीय एकता और ब्रिटिश-विरोधी जनभावना का महत्वपूर्ण केंद्र बन गए।
➣ शाहनवाज़ खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों की संयुक्त उपस्थिति INA की बहुधार्मिक और सर्वभारतीय राष्ट्रीय पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक बनी।
➣ INA Trials का महत्व केवल अभियुक्तों की कानूनी रक्षा तक सीमित नहीं रहा। इन मुकदमों ने भारतीय जनता के बीच INA के प्रति सहानुभूति, राष्ट्रीय भावना और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राजनीतिक दबाव को तेज किया।
➣ 5 जनवरी, 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने शाहनवाज़ खान, ढिल्लों और सहगल की रिहाई पर कहा कि भारत के लोगों की अभूतपूर्व एकता ने इस परिणाम में भूमिका निभाई थी।
➣ जापान ने आत्मसमर्पण की घोषणा 15 अगस्त, 1945 को की थी। इसके बाद नेताजी ने दक्षिण-पूर्व एशिया से निकलकर स्वतंत्रता संघर्ष को आगे जारी रखने का प्रयास किया।
➣ नेताजी का अंतिम ज्ञात अभियान जापान के आत्मसमर्पण के बाद दक्षिण-पूर्व एशिया से बाहर निकलने का प्रयास था।
➣ कर्नल हबीबुर रहमान नेताजी के साथ उनकी अंतिम यात्रा में थे और बाद में विमान दुर्घटना तथा नेताजी की अंतिम अवस्था के संबंध में महत्वपूर्ण गवाह बने।
➣ 18 अगस्त, 1945 को ताइहोकू में हुई कथित विमान दुर्घटना को नेताजी की मृत्यु से जोड़ा जाता है।
➣ 1956 की शाहनवाज़ समिति के बहुमत ने नेताजी की मृत्यु विमान दुर्घटना में होने का निष्कर्ष दिया था।
➣ सुरेश चंद्र बोस ने शाहनवाज़ समिति के बहुमत के निष्कर्ष से असहमति व्यक्त की थी।
➣ जी. डी. खोसला आयोग ने भी ताइहोकू विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु होने के निष्कर्ष की पुष्टि की।
➣ मुखर्जी आयोग ने विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु के निष्कर्ष को स्वीकार नहीं किया और Renkoji Temple की अस्थियों को भी नेताजी की अस्थियाँ नहीं माना।
➣ भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग के निष्कर्ष को स्वीकार नहीं किया।
कुछ महत्वपूर्ण भ्रम-बिंदु
➣ आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) की स्थापना सुभाष चंद्र बोस ने नहीं की थी। प्रथम INA का औपचारिक गठन 1 सितंबर, 1942 को कैप्टन मोहन सिंह के नेतृत्व में हुआ था, जबकि सुभाष चंद्र बोस ने 1943 ई. में इसका पुनर्गठन और विस्तार किया।
➣ रास बिहारी बोस और सुभाष चंद्र बोस एक ही व्यक्ति नहीं थे। दोनों अलग-अलग क्रांतिकारी थे और रास बिहारी बोस ने 1943 में दक्षिण-पूर्व एशिया के भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व सुभाष चंद्र बोस को सौंपा।
➣ Indian Independence League (IIL) और आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) एक ही संगठन नहीं थे। IIL राजनीतिक संगठन था, जबकि INA उसका सैन्य अंग थी।
➣ प्रथम INA और सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली INA को एक ही चरण नहीं मानना चाहिए। प्रथम INA का नेतृत्व मोहन सिंह ने किया था और दिसंबर 1942 में उसके संकट एवं विघटन के बाद 1943 में बोस ने INA को नए रूप में संगठित किया।
➣ रानी झाँसी रेजिमेंट केवल एक प्रतीकात्मक महिला संगठन नहीं थी। यह INA की वास्तविक महिला सैन्य इकाई थी, जिसकी कमान कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने संभाली थी।
➣ जय हिंद को केवल सुभाष चंद्र बोस द्वारा बनाया गया नारा कहना उचित नहीं है। इसका संबंध आबिद हसन सफरानी से माना जाता है, जबकि नेताजी ने इसे व्यापक रूप से लोकप्रिय बनाया।
➣ दिल्ली चलो और तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा एक ही समय के नारे नहीं थे। दिल्ली चलो 1943 में INA के सैन्य अभियान से जुड़ा आह्वान था, जबकि तुम मुझे खून दो… बोस के बाद के भाषणों में त्याग और बलिदान के आह्वान के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
➣ आज़ाद हिंद सरकार और INA भी एक ही संस्था नहीं थीं। आज़ाद हिंद सरकार राजनीतिक/अंतरिम सरकार थी, जबकि INA उसकी सैन्य शक्ति के रूप में कार्य करती थी।
➣ 21 अक्टूबर, 1943 को आज़ाद हिंद सरकार की स्थापना हुई थी। यह तारीख INA के गठन की तारीख नहीं है। प्रथम INA का औपचारिक गठन इससे पहले 1 सितंबर, 1942 को हो चुका था।
➣ अंडमान-निकोबार पर आज़ाद हिंद सरकार का अधिकार पूर्ण और स्वतंत्र प्रशासनिक नियंत्रण के समान नहीं था। जापानी सेना का वहाँ महत्वपूर्ण वास्तविक नियंत्रण बना रहा, इसलिए इसे मुख्यतः राजनीतिक और प्रतीकात्मक अधिकार के रूप में समझना चाहिए।
➣ सुभाष चंद्र बोस ने अंडमान और निकोबार के नाम क्रमशः शहीद और स्वराज रखे थे। इन्हें 2018 में दिए गए Shaheed Dweep और Swaraj Dweep नामकरण से अलग समझना चाहिए।
➣ इम्फाल–कोहिमा अभियान को केवल INA का स्वतंत्र सैन्य अभियान नहीं माना जाना चाहिए। यह मुख्यतः जापानी U-Go Offensive का हिस्सा था, जिसमें INA ने जापानी सेना के साथ सहयोगी भूमिका निभाई।
➣ मोइरांग में 14 अप्रैल, 1944 को INA का ध्वज फहराना महत्वपूर्ण था, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि INA ने पूरे मणिपुर पर स्थायी नियंत्रण स्थापित कर लिया था। यह भारतीय भूमि पर INA की महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक उपस्थिति थी।
➣ लाल किला मुकदमे केवल एक व्यक्ति का मुकदमा नहीं था। प्रथम प्रमुख मुकदमे में शाहनवाज़ खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों को संयुक्त रूप से अभियुक्त बनाया गया था।
➣ इन अधिकारियों पर मुख्य आरोप केवल सामान्य अर्थ में राजद्रोह नहीं था। प्रमुख कानूनी आरोप राजा के विरुद्ध युद्ध छेड़ना (Waging War against the King) था। साथ में हत्या और हत्या के लिए उकसाने के आरोप भी लगाए गए थे।
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