व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940) : परिचय
➣ व्यक्तिगत सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण चरण था, जिसे महात्मा गांधी ने 1940 में शुरू किया।
➣ यह आंदोलन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत को भारतीयों की सहमति के बिना युद्ध में शामिल करने के विरोध में शुरू किया गया था।
➣ इस आंदोलन का उद्देश्य तत्काल बड़े पैमाने पर जनआंदोलन खड़ा करना नहीं था। गांधीजी ने इसके माध्यम से भारतीयों के अभिव्यक्ति के अधिकार और ब्रिटिश सरकार की युद्ध नीति के प्रति असहमति को शांतिपूर्ण ढंग से सामने रखने का प्रयास किया।
➣ व्यक्तिगत सत्याग्रह की विशेषता यह थी कि इसमें एक साथ सामूहिक रूप से आंदोलन करने के बजाय एक-एक व्यक्ति सत्याग्रह करता था। इस कारण इसे व्यक्तिगत सत्याग्रह कहा गया।
➣ इस सत्याग्रह के प्रथम सत्याग्रही आचार्य विनोबा भावे और द्वितीय सत्याग्रही जवाहरलाल नेहरू थे। बाद में देश के विभिन्न हिस्सों में अनेक लोगों ने इसमें भाग लिया और ब्रिटिश सरकार ने बड़ी संख्या में सत्याग्रहियों को गिरफ्तार किया।
पृष्ठभूमि
➣ इसकी पृष्ठभूमि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बनी उन राजनीतिक परिस्थितियों में तैयार हुई, जब ब्रिटिश सरकार ने भारत को युद्ध में शामिल तो कर लिया, लेकिन भारतीयों को अपने राजनीतिक भविष्य का निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया।
द्वितीय विश्व युद्ध में भारत को बिना सहमति शामिल किया जाना
➣ सितंबर, 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने भारतीय नेताओं से परामर्श किए बिना भारत को भी ब्रिटेन की ओर से युद्धरत राष्ट्र घोषित कर दिया। कांग्रेस ने इसे भारतीय जनमत की उपेक्षा माना और इसका विरोध किया।
➣ गांधीजी और कांग्रेस का मानना था कि यदि ब्रिटेन लोकतंत्र और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए युद्ध लड़ रहा है, तो उसे भारत को भी राजनीतिक स्वतंत्रता और अपने भविष्य का निर्णय लेने का अधिकार देना चाहिए। ब्रिटिश सरकार के रवैये से कांग्रेस और सरकार के बीच राजनीतिक तनाव बढ़ गया।
➣ ब्रिटिश सरकार के इस निर्णय के विरोध में कांग्रेस के आठ प्रांतों के मंत्रिमंडलों ने 1939 में अपने पदों से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के संबंध और अधिक तनावपूर्ण हो गए।
कांग्रेस की मांगें और अगस्त प्रस्ताव (1940)
➣ मार्च, 1940 में मौलाना अबुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन आयोजित हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध और भारत को बिना भारतीयों की सहमति के युद्ध में शामिल किए जाने के प्रश्न पर कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार की नीति का विरोध किया।
➣ कांग्रेस युद्ध के दौरान ब्रिटेन को सहयोग देने के लिए तैयार थी, लेकिन इसके बदले उसने दो प्रमुख मांगें रखीं- पहली, युद्ध के बाद भारत के राजनीतिक भविष्य का निर्णय करने के लिए संविधान सभा का गठन किया जाए और दूसरी, तत्काल केंद्र में उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार स्थापित की जाए। ब्रिटिश सरकार इन मांगों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुई।
➣ इसी राजनीतिक गतिरोध के बीच वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने 8 अगस्त, 1940 को अगस्त प्रस्ताव प्रस्तुत किया। कांग्रेस ने इसे स्वीकार नहीं किया, क्योंकि इसमें तत्काल उत्तरदायी शासन और सत्ता हस्तांतरण की उसकी मांग पूरी नहीं हुई थी। गांधीजी ने भी प्रस्ताव को अपर्याप्त माना।
➣ अगस्त प्रस्ताव की अस्वीकृति के बाद कांग्रेस के भीतर ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाने के लिए बड़े आंदोलन की मांग उठने लगी। लेकिन गांधीजी तत्काल व्यापक जनआंदोलन के पक्ष में नहीं थे।
तत्काल सामूहिक आंदोलन से परहेज़
➣ अगस्त प्रस्ताव की अस्वीकृति के बाद कांग्रेस के भीतर कुछ वामपंथी तथा उग्रवादी धड़े तुरंत एक व्यापक सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने के पक्ष में थे। लेकिन गांधीजी ने इसके बजाय एक अत्यंत सीमित और नियंत्रित व्यक्तिगत सत्याग्रह का सुझाव दिया।
➣ गांधीजी के इस निर्णय के पीछे दो प्रमुख कारण थे। पहला, उन्हें आशंका थी कि बड़े पैमाने पर जन-आंदोलन के दौरान हिंसा हो सकती है। वे ऐसे समय में ब्रिटेन के लिए कठिनाई पैदा नहीं करना चाहते थे, जब वह स्वयं नाज़ीवाद के विरुद्ध युद्ध लड़ रहा था।
➣ दूसरा, वे यह स्पष्ट करना चाहते थे कि भारत का संघर्ष ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध है, न कि युद्ध में ब्रिटेन को सैन्य रूप से नुकसान पहुँचाने के लिए।
➣ गांधीजी चाहते थे कि भारतीयों को युद्ध के समर्थन या विरोध में अपनी बात कहने की स्वतंत्रता मिले। इसलिए व्यक्तिगत सत्याग्रह के माध्यम से भारतीयों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को सामने रखा गया।
➣ इस प्रकार व्यक्तिगत सत्याग्रह स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए तत्काल व्यापक जनविद्रोह नहीं था। यह गांधीजी द्वारा चुने गए सीमित सत्याग्रहियों के माध्यम से एक-एक करके, अनुशासित और अहिंसक तरीके से विरोध दर्ज कराने की सुनियोजित रणनीति थी।
व्यक्तिगत सत्याग्रह का प्रारभ
➣ 13 अक्टूबर, 1940 को कांग्रेस कार्यसमिति ने गांधीजी की व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा की योजना को मंजूरी दी। इसके बाद गांधीजी ने आचार्य विनोबा भावे को पहला सत्याग्रही चुना।
➣ प्रत्येक चयनित सत्याग्रही से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह एक निर्धारित तथा संक्षिप्त घोषणा-वाक्य के माध्यम से सार्वजनिक रूप से युद्ध का विरोध करे। इस घोषणा का सार था – युद्ध-प्रयासों के लिए न एक पाई, न एक व्यक्ति, जो आगे चलकर इस आंदोलन के प्रमुख नारे के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
➣ इस प्रक्रिया में सत्याग्रही पहले संबंधित प्रशासन को अपने इरादे की सूचना देता था, फिर सार्वजनिक स्थान पर युद्ध-विरोधी भाषण देता तथा गिरफ्तारी को स्वेच्छा से स्वीकार करता था। इससे संपूर्ण प्रक्रिया पारदर्शी, अहिंसक तथा अनुशासित बनी रहती थी।
व्यक्तिगत सत्याग्रह के उद्देश्य
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दावा: भारतीयों को ब्रिटिश सरकार की युद्ध नीति और भारत की युद्ध में भागीदारी के विरोध में अपनी राय स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने के अधिकार का दावा करना।
- युद्ध में भारत की अनैच्छिक भागीदारी का विरोध: भारतीयों की सहमति के बिना भारत को द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल किए जाने के विरुद्ध शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज करना।
- औपनिवेशिक शासन और वैश्विक युद्ध में अंतर स्पष्ट करना: यह स्पष्ट करना कि भारत का संघर्ष ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध है, न कि नाज़ीवाद के विरुद्ध चल रहे युद्ध में ब्रिटेन को बाधा पहुँचाने के लिए।
- अगस्त प्रस्ताव की अस्वीकृति का विरोध: अगस्त प्रस्ताव द्वारा कांग्रेस की मांगों को पूरा नहीं किए जाने के प्रति असंतोष को शांतिपूर्ण और प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करना।
- भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों को सामने रखना: यह स्पष्ट करना कि भारतीयों को अपनी राजनीतिक राय व्यक्त करने तथा अपने राजनीतिक भविष्य के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार है।
- स्वतंत्रता आंदोलन को सक्रिय बनाए रखना: तत्काल व्यापक जनआंदोलन शुरू किए बिना भी ब्रिटिश सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाए रखना और राष्ट्रीय आंदोलन को निष्क्रिय होने से बचाना।
- तत्काल स्वतंत्रता प्राप्ति इसका उद्देश्य नहीं था: व्यक्तिगत सत्याग्रह का उद्देश्य तत्काल स्वतंत्रता प्राप्त करना नहीं था, बल्कि सीमित और प्रतीकात्मक तरीके से भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों तथा ब्रिटिश शासन के प्रति असहमति को व्यक्त करना था।
प्रमुख सत्याग्रही और उनका क्रम
➣ इस आंदोलन का औपचारिक शुभारंभ 17 अक्तूबर, 1940 को हुआ, जब गांधीजी के अत्यंत निकट सहयोगी तथा नैतिक-दार्शनिक विद्वान आचार्य विनोबा भावे को प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही के रूप में व्यक्तिगत रूप से चुना गया।
➣ विनोबा भावे ने वर्धा के निकट स्थित गांव पवनार में एक सार्वजनिक सभा में युद्ध-विरोधी भाषण दिया, जिसमें उन्होंने ब्रिटेन के युद्ध-प्रयासों की आलोचना करते हुए भारत के स्वतंत्रता के अधिकार की पुष्टि की। भाषण देने के तुरंत बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तथा कारावास की सज़ा सुनाई गई।
➣ विनोबा भावे के चयन का प्रतीकात्मक महत्व यह था कि गांधीजी ने जानबूझकर एक अपेक्षाकृत कम प्रसिद्ध, परंतु नैतिक रूप से अत्यंत सुदृढ़ व्यक्ति को प्राथमिकता दी, ताकि यह स्पष्ट संदेश जाए कि यह सत्याग्रह किसी व्यक्ति-विशेष की राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि एक शुद्ध नैतिक तथा सैद्धांतिक विरोध है।
➣ विनोबा भावे के पश्चात गांधीजी ने जवाहरलाल नेहरू को द्वितीय सत्याग्रही के रूप में चुना, जो इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक महत्व प्रदान करने की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण निर्णय था।
➣ नेहरू अपना विरोध औपचारिक रूप से प्रारंभ कर पाते, उससे पहले ही सरकार ने 31 अक्तूबर, 1940 को इलाहाबाद के निकट छेओकी रेलवे स्टेशन पर उन्हें डिफेंस ऑफ इंडिया नियमों के उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार कर लिया – यह गिरफ्तारी उनके पूर्व में दिए गए तथाकथित राजद्रोहात्मक भाषणों के आधार पर की गई थी। उन्हें साढ़े चार वर्ष के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गई।
➣ नेहरू का गोरखपुर मुकदमे में दिया गया वक्तव्य अत्यंत प्रसिद्ध हुआ, जिसमें उन्होंने कहा था – मैं आपके समक्ष, महोदय, राज्य के विरुद्ध कुछ अपराधों के लिए मुकदमे का सामना करने वाले एक व्यक्ति के रूप में खड़ा हूं। आप राज्य के प्रतीक हैं… मैं भारतीय राष्ट्रवाद का प्रतीक हूं।” उनकी गिरफ्तारी ने संपूर्ण राष्ट्र को स्तब्ध कर दिया।
➣ नेहरू के पश्चात गांधी आश्रम के एक अंतेवासीब्रह्म दत्त को तृतीय सत्याग्रही के रूप में चुना गया। उन्होंने भी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार युद्ध-विरोधी वक्तव्य देकर गिरफ्तारी को आमंत्रित किया।
| प्रमुख सत्याग्रही | क्रम | गिरफ्तारी / स्थान |
|---|---|---|
| आचार्य विनोबा भावे | प्रथम | 17 अक्टूबर, 1940 को पवनार में |
| जवाहरलाल नेहरू | द्वितीय | 31 अक्टूबर, 1940 को छेओकी रेलवे स्टेशन के निकट |
| ब्रह्म दत्त | तृतीय | – |
व्यक्तिगत सत्याग्रह का विस्तार
➣ प्रारंभिक तीन प्रतीकात्मक सत्याग्रहियों के पश्चात यह आंदोलन क्रमिक रूप से विस्तृत किया गया। पहले कांग्रेस कार्यसमिति तथा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्यों को, फिर प्रांतीय तथा स्थानीय कमेटियों के सदस्यों को और अंततः सामान्य पंजीकृत कांग्रेस कार्यकर्ताओं को इसमें भाग लेने की अनुमति दी गई। इस प्रकार संपूर्ण प्रक्रिया पर केंद्रीय नियंत्रण बना रहा।
➣ नवंबर, 1940 के मध्य तक केंद्रीय व प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी तथा कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों को भी निर्धारित संक्षिप्त घोषणा पढ़कर गिरफ्तारी देने की अनुमति दे दी गई।
➣ क्रिसमस अवकाश के लिए गांधीजी द्वारा आंदोलन को स्थगित करने से पहले ही 29 भूतपूर्व मंत्री, कार्यसमिति के 11 सदस्य, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के 176 सदस्य तथा केंद्रीय व प्रांतीय विधानसभाओं के 400 सदस्य गिरफ्तारी दे चुके थे।
➣ दिसंबर, 1940 में गांधीजी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह के पहले चरण को कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया। इसके बाद जनवरी, 1941 में सत्याग्रह को पुनः शुरू किया गया और इसमें भाग लेने वाले सत्याग्रहियों की संख्या बढ़ने लगी। गांधीजी के नेतृत्व में आंदोलन का क्रम और भागीदारी नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ती रही।
➣ सत्याग्रह में भागीदारी को जानबूझकर सीमित रखा गया था। केवल कांग्रेस के सदस्य ही व्यक्तिगत सत्याग्रह की पेशकश कर सकते थे। यह आंदोलन सामान्य जन-भागीदारी के लिए खुला अभियान न होकर संगठनात्मक अनुशासन और केंद्रीय नियंत्रण के अंतर्गत चलाया गया।
➣ व्यक्तिगत सत्याग्रह का प्रभाव उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से अधिक रहा। यहाँ कांग्रेस समितियों को सत्याग्रह समितियों में परिवर्तित करने का निर्देश दिया गया, जिससे सत्याग्रह को संगठित रूप से आगे बढ़ाया जा सके।
➣ व्यक्तिगत सत्याग्रह धीरे-धीरे देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचा। मई, 1941 तक लगभग 25,000 सत्याग्रहियों को गिरफ्तार किया जा चुका था। इससे स्पष्ट होता है कि आंदोलन सीमित और नियंत्रित होने के बावजूद व्यापक कांग्रेस संगठन तक पहुँच गया था।
➣ व्यक्तिगत सत्याग्रह का प्रसार होने के बावजूद इसका स्वरूप पहले के सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसे व्यापक जनआंदोलन का नहीं था। गांधीजी ने इसे व्यक्तिगत सत्याग्रह के रूप में ही नियंत्रित रखा और सत्याग्रहियों को क्रमशः आगे बढ़ने की अनुमति दी।
व्यक्तिगत सत्याग्रह का अंत
➣ दिसंबर, 1941 में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में बड़ा परिवर्तन आया। जापान के युद्ध में प्रवेश और दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रिटिश स्थिति कमजोर होने के कारण भारत की सुरक्षा का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो गया।
➣ इसी समय ब्रिटिश सरकार ने सत्याग्रहियों को रिहा करना शुरू किया और दिसंबर के प्रारंभ तक सभी सत्याग्रहियों की रिहाई की घोषणा की गई।
➣ 4 दिसंबर, 1941 तक जवाहरलाल नेहरू सहित व्यक्तिगत सत्याग्रह के अनेक बंदियों को जेल से रिहा कर दिया गया। इसके बाद दिसंबर, 1941 से कांग्रेस की गतिविधियाँ एक नए राजनीतिक चरण में प्रवेश करने लगीं।
➣ इस प्रकार 1941 के अंत तक व्यक्तिगत सत्याग्रह का चरण समाप्त हो गया। इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध की परिस्थितियाँ और भारत की सुरक्षा का प्रश्न भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गए।
➣ आगे चलकर क्रिप्स मिशन (1942) की असफलता और ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण कांग्रेस ने अधिक निर्णायक संघर्ष की दिशा में कदम बढ़ाया, जिसका परिणाम भारत छोड़ो आंदोलन के रूप में सामने आया।
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