भारत छोड़ो आंदोलन (1942) : परिचय
➣ भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह निर्णायक जनआंदोलन था, जिसमें महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन से तत्काल भारत छोड़ने की मांग की।
➣ यह आंदोलन ऐसे समय शुरू हुआ जब द्वितीय विश्व युद्ध के कारण भारत की राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही थीं।
➣ इस आंदोलन की शुरुआत अगस्त 1942 में हुई और बहुत कम समय में यह देश के विभिन्न हिस्सों में फैल गया।
ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के लगभग पूरे शीर्ष नेतृत्व को शुरुआत में ही गिरफ्तार कर लिया, लेकिन इसके बावजूद आंदोलन अलग-अलग क्षेत्रों में जनता, विद्यार्थियों, श्रमिकों और भूमिगत कार्यकर्ताओं के माध्यम से जारी रहा।➣ भारत छोड़ो आंदोलन का सबसे प्रसिद्ध संदेश करो या मरो था। यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने कठोर दमन के माध्यम से आंदोलन को नियंत्रित कर लिया, फिर भी इस आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत में ब्रिटिश शासन को लंबे समय तक बनाए रखना अब संभव नहीं था।
पृष्ठभूमि
ब्रिटिश सरकार की नीतियों से असंतोष
➣ द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं या केंद्रीय विधानमंडल से सलाह लिए बिना भारत को भी युद्ध में शामिल घोषित कर दिया।
➣ कांग्रेस का तर्क था कि यदि ब्रिटेन लोकतंत्र और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए युद्ध लड़ रहा है, तो उसे पहले भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता देने की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। ब्रिटिश सरकार की ओर से ऐसा आश्वासन न मिलने से कांग्रेस और सरकार के बीच मतभेद बढ़ गए।
➣ इस असंतोष के कारण 1939 में कांग्रेस के प्रांतीय मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दे दिया। इससे ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस के बीच राजनीतिक सहयोग की संभावना और कमजोर हो गई तथा राष्ट्रीय आंदोलन अधिक निर्णायक रुख की ओर बढ़ने लगा।
अगस्त प्रस्ताव और क्रिप्स मिशन की विफलता
➣ युद्ध के दौरान भारतीय सहयोग प्राप्त करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने अगस्त प्रस्ताव और बाद में क्रिप्स मिशन के माध्यम से संवैधानिक आश्वासन देने का प्रयास किया।
➣ लेकिन इन प्रस्तावों में तत्काल सत्ता हस्तांतरण और पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता की स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी। कांग्रेस इन्हें भारत की तत्काल राजनीतिक आकांक्षाओं के लिए अपर्याप्त मानती थी।
➣ विशेष रूप से क्रिप्स मिशन की विफलता ने भारतीय नेताओं को यह विश्वास दिलाया कि ब्रिटिश सरकार युद्ध की गंभीर परिस्थितियों में भी भारत को वास्तविक राजनीतिक अधिकार देने के लिए तैयार नहीं है।
➣ इससे कांग्रेस के भीतर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध निर्णायक जनआंदोलन की मांग तेज हो गई।
युद्धकालीन परिस्थितियाँ और बढ़ता जन-असंतोष
➣ द्वितीय विश्व युद्ध के कारण भारत की आर्थिक और सामाजिक स्थिति भी खराब होती गई। महँगाई, आवश्यक वस्तुओं की कमी, आपूर्ति की समस्याएँ और युद्ध का आर्थिक बोझ आम जनता की कठिनाइयों को बढ़ा रहे थे। इससे ब्रिटिश शासन के प्रति जनता का असंतोष और गहरा हुआ।
➣ इसके साथ ही जापान की तेज सैन्य प्रगति और बर्मा पर उसके कब्जे ने भारत की सामरिक स्थिति को अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया।
➣ ब्रिटिश शासन की कमजोर होती स्थिति और भारत को बिना राजनीतिक अधिकार दिए युद्ध में झोंके जाने के विरोधाभास ने भारतीयों में यह भावना मजबूत की कि अब ब्रिटिश शासन के अंत की मांग को निर्णायक रूप से उठाया जाना चाहिए।
➣ इससे पहले गांधीजी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह जैसे सीमित अहिंसक आंदोलनों के माध्यम से भारतीयों की राजनीतिक असहमति व्यक्त की थी।
➣ लेकिन युद्ध की बदलती परिस्थितियों और क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद यह स्पष्ट हो गया कि केवल सीमित विरोध से ब्रिटिश सरकार पर पर्याप्त दबाव नहीं बनाया जा सकता। अब आवश्यकता एक ऐसे व्यापक जनआंदोलन की थी, जो ब्रिटिश शासन से भारत छोड़ने की स्पष्ट मांग करे।
भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव और प्रारंभ
वर्धा प्रस्ताव (जुलाई 1942)
➣ 14 जुलाई, 1942 को वर्धा में आयोजित कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में भारत छोड़ो आंदोलन से संबंधित प्रस्ताव पारित किया गया।
➣ इस बैठक की अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आजाद ने की थी। इस प्रस्ताव में ब्रिटिश शासन के तत्काल अंत तथा भारत में सत्ता के हस्तांतरण की मांग को निर्णायक रूप दिया गया।
➣ वर्धा की बैठक में महात्मा गांधी, मौलाना अबुल कलाम आजाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सरोजिनी नायडू, जे. बी. कृपलानी, आसफ अली, जी. बी. पंत, प्रफुल्ल चंद्र घोष, सैयद महमूद तथा अन्य प्रमुख कांग्रेस नेता उपस्थित थे।
➣ वर्धा में प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान गांधीजी ने कांग्रेस के भीतर इसके महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि कांग्रेस इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करती, तो वे देश की बालू से ही कांग्रेस से भी बड़ा आंदोलन खड़ा कर देंगे। इस कथन से गांधीजी की उस समय की राजनीतिक दृढ़ता और जनशक्ति पर उनके विश्वास का पता चलता है।
बंबई में प्रस्ताव की अंतिम स्वीकृति
➣ वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा पारित प्रस्ताव को अंतिम रूप से स्वीकार करने के लिए 7 अगस्त, 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (AICC) की बैठक शुरू हुई। इसकी अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आजाद ने की।
➣ प्रस्ताव पर विस्तृत चर्चा और कुछ संशोधनों के बाद 8 अगस्त, 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने भारत छोड़ो प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। सरदार वल्लभभाई पटेल सहित कांग्रेस के प्रमुख नेताओं ने प्रस्ताव का समर्थन किया। इसके साथ ही ब्रिटिश शासन के विरुद्ध निर्णायक जनसंघर्ष शुरू करने का रास्ता साफ हो गया।
➣ इसी ऐतिहासिक अधिवेशन में महात्मा गांधी ने स्पष्ट किया कि अब कांग्रेस का लक्ष्य केवल सीमित संवैधानिक सुधार प्राप्त करना नहीं, बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना है। उन्होंने कहा कि वे स्वतंत्रता से कम किसी भी चीज से संतुष्ट नहीं होंगे।
➣ गांधीजी ने आंदोलन की दिशा स्पष्ट करते हुए यह भी कहा कि यदि ब्रिटिश सरकार नमक कर या शराबबंदी जैसे कुछ सुधारों की पेशकश करे, तब भी भारतीयों का लक्ष्य उससे कहीं बड़ा है-भारत की पूर्ण स्वतंत्रता। इस प्रकार आंदोलन को किसी एक आर्थिक या प्रशासनिक मांग के बजाय राष्ट्रीय स्वतंत्रता के अंतिम संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया।
करो या मरो का आह्वान
➣ 8 अगस्त, 1942 की रात ग्वालिया टैंक मैदान में गांधीजी ने भारतीय जनता को अपना प्रसिद्ध करो या मरो मंत्र दिया। इसका आशय यह था कि भारतीय या तो भारत को स्वतंत्र कराएँगे या स्वतंत्रता के प्रयास में अपने प्राण न्योछावर कर देंगे।
➣ गांधीजी के लिए करो या मरो का अर्थ हिंसा करना नहीं था। इसका मूल भाव यह था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए भारतीयों को अहिंसक संघर्ष में पूरी शक्ति लगा देनी चाहिए और किसी भी परिस्थिति में अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटना चाहिए।
➣ गांधीजी ने आंदोलन की शुरुआत से पहले विभिन्न वर्गों के लिए अलग-अलग संदेश भी दिए। उन्होंने सरकारी कर्मचारियों से नौकरी न छोड़ते हुए कांग्रेस के प्रति अपनी निष्ठा घोषित करने, सैनिकों से अपने देशवासियों पर गोली चलाने से इनकार करने, छात्रों से तभी पढ़ाई छोड़ने जब वे स्वतंत्रता तक अपने निर्णय पर दृढ़ रह सकें तथा देशी रियासतों के शासकों से अपनी प्रजा की संप्रभुता स्वीकार करने का आह्वान किया।
➣ गांधीजी का यह संदेश महत्वपूर्ण था क्योंकि वे आंदोलन को केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रखना चाहते थे। वे सरकारी कर्मचारी, सैनिक, विद्यार्थी, रियासतों की जनता और सामान्य नागरिक-सभी को स्वतंत्रता संघर्ष से जोड़ना चाहते थे।
भारत छोड़ो आंदोलन का प्रारंभ (9 अगस्त, 1942)
➣ 8 अगस्त, 1942 को भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित होने के बाद आंदोलन के लिए राजनीतिक निर्णय हो चुका था। इसके अगले दिन 9 अगस्त, 1942 से भारत छोड़ो आंदोलन ने देशव्यापी रूप ग्रहण करना शुरू किया।
➣ इस प्रकार वर्धा प्रस्ताव (14 जुलाई, 1942) से शुरू हुआ राजनीतिक निर्णय बंबई में AICC की स्वीकृति (8 अगस्त, 1942) और उसके बाद 9 अगस्त, 1942 के देशव्यापी आंदोलन में बदल गया। आगे ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया और नेताओं की गिरफ्तारियों ने आंदोलन को एक नए चरण में पहुँचा दिया।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| वर्धा प्रस्ताव की तिथि | 14 जुलाई 1942 |
| वर्धा में प्रस्ताव किसने पारित किया? | कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) |
| वर्धा बैठक की अध्यक्षता | मौलाना अबुल कलाम आजाद |
| वर्धा प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य | ब्रिटिश शासन का तत्काल अंत और भारत में सत्ता के हस्तांतरण की मांग। |
| वर्धा प्रस्ताव में प्रमुख नेता | महात्मा गांधी, मौलाना अबुल कलाम आजाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सरोजिनी नायडू, जे. बी. कृपलानी, आसफ अली आदि। |
| वर्धा में गांधी का महत्वपूर्ण कथन | यदि कांग्रेस प्रस्ताव स्वीकार नहीं करती, तो वे “देश की बालू से ही कांग्रेस से भी बड़ा आंदोलन खड़ा कर देंगे।” |
| AICC की बैठक | 7 अगस्त 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में शुरू हुई। |
| भारत छोड़ो प्रस्ताव की अंतिम स्वीकृति | 8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (AICC) ने प्रस्ताव स्वीकार किया। |
| AICC बैठक की अध्यक्षता | मौलाना अबुल कलाम आजाद |
| भारत छोड़ो प्रस्ताव का प्रमुख लक्ष्य | ब्रिटिश शासन का अंत करके भारत की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना। |
| “करो या मरो” का आह्वान | 8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने ग्वालिया टैंक मैदान में किया। |
| आंदोलन का देशव्यापी प्रारंभ | 9 अगस्त 1942 से भारत छोड़ो आंदोलन ने व्यापक देशव्यापी रूप लेना शुरू किया। |
| सरकारी कर्मचारियों के लिए गांधी का संदेश | नौकरी छोड़े बिना कांग्रेस के प्रति अपनी निष्ठा घोषित करने का आह्वान। |
| सैनिकों के लिए गांधी का संदेश | अपने देशवासियों पर गोली चलाने से इनकार करने का आह्वान। |
| छात्रों के लिए गांधी का संदेश | तभी पढ़ाई छोड़ने का आह्वान जब वे स्वतंत्रता तक अपने निर्णय पर दृढ़ रह सकें। |
| देशी रियासतों के शासकों के लिए संदेश | अपनी प्रजा की संप्रभुता स्वीकार करने का आह्वान। |
नेताओं की गिरफ्तारियाँ (9 अगस्त, 1942)
➣ 8 अगस्त, 1942 को बंबई में भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित होने के कुछ ही घंटों बाद ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को एक साथ गिरफ्तार करके आंदोलन को प्रारंभ में ही नेतृत्वविहीन करने की योजना लागू कर दी।
➣ 9 अगस्त, 1942 की सुबह ऑपरेशन जीरो आवर के तहत महात्मा गांधी तथा कांग्रेस के लगभग सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
➣ महात्मा गांधी को गिरफ्तार करके पूना के आगा खाँ पैलेस में नजरबंद रखा गया। उनके साथ कस्तूरबा गांधी, महादेव देसाई और सरोजिनी नायडू सहित कुछ अन्य सहयोगियों को भी वहाँ रखा गया।
➣ नजरबंदी के दौरान गांधीजी के निजी सचिव महादेव देसाई की 15 अगस्त, 1942 को तथा कस्तूरबा गांधी की 22 फरवरी, 1944 को आगा खाँ पैलेस में ही मृत्यु हो गई।
➣ कांग्रेस कार्यसमिति के प्रमुख सदस्यों को गिरफ्तार करके अहमदनगर किले में नजरबंद रखा गया। इनमें जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरदार वल्लभभाई पटेल, गोविंद बल्लभ पंत, आचार्य जे. बी. कृपलानी, डॉ. पट्टाभि सीतारमैया, डॉ. सैयद महमूद और डॉ. प्रफुल्ल चंद्र घोष जैसे प्रमुख नेता शामिल थे। इस प्रकार कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को एक ही समय में जनता से अलग करने का प्रयास किया गया।
➣ डॉ. राजेंद्र प्रसाद बंबई अधिवेशन में उपस्थित नहीं थे। इसलिए उन्हें पटना में ही गिरफ्तार कर बांकीपुर सेंट्रल जेल में नजरबंद कर दिया गया। इसी प्रकार देश के विभिन्न भागों में प्रांतीय और स्थानीय कांग्रेस नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को भी गिरफ्तार किया गया।
➣ शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद 9 अगस्त, 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में निर्धारित कार्यक्रम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। अरुणा आसफ अली ने वहाँ कांग्रेस का झंडा फहराया।
➣ यह घटना ब्रिटिश सरकार द्वारा कांग्रेस नेतृत्व की सामूहिक गिरफ्तारी के विरुद्ध प्रतिरोध का महत्वपूर्ण प्रतीक बन गई और अरुणा आसफ अली भारत छोड़ो आंदोलन की प्रमुख महिला नेताओं में उभरकर सामने आईं।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | संक्षेप में |
|---|---|
| भारत छोड़ो प्रस्ताव | 8 अगस्त 1942, बंबई |
| नेताओं की गिरफ्तारी | 9 अगस्त 1942 |
| गांधी की नजरबंदी | आगा खाँ पैलेस, पूना |
| कांग्रेस कार्यसमिति | अहमदनगर किले में नजरबंदी |
| डॉ. राजेंद्र प्रसाद | बांकीपुर सेंट्रल जेल, पटना |
| महादेव देसाई | 15 अगस्त 1942, आगा खाँ पैलेस में मृत्यु |
| कस्तूरबा गांधी | 22 फरवरी 1944, आगा खाँ पैलेस में मृत्यु |
| अरुणा आसफ अली | 9 अगस्त 1942 को ग्वालिया टैंक मैदान में कांग्रेस का झंडा फहराया |
| महत्वपूर्ण प्रतीक | शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी के बावजूद आंदोलन का जारी रहना |
आंदोलन का प्रस्फुटन
➣ कांग्रेस के बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन का नेतृत्व दूसरी पंक्ति के नेताओं और भूमिगत कार्यकर्ताओं के हाथों में चला गया। अरुणा आसफ अली, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन और उषा मेहता जैसे कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रहकर आंदोलन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ जयप्रकाश नारायण हजारीबाग सेंट्रल जेल में बंद थे। 9 नवंबर, 1942 को वे योगेंद्र शुक्ल तथा अपने अन्य साथियों के साथ जेल से निकलने में सफल हुए। इसके बाद उन्होंने भूमिगत रहकर आंदोलन को संगठित करने का प्रयास किया।
➣ केंद्रीय नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद विद्यार्थियों, किसानों, मजदूरों, महिलाओं और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने अनेक स्थानों पर स्वयं आंदोलन की कमान संभाल ली। इस कारण भारत छोड़ो आंदोलन शीघ्र ही एक व्यापक और स्वतःस्फूर्त जनविद्रोह का रूप लेने लगा।
➣ किसान आंदोलन के प्रमुख सामाजिक आधारों में थे। कई क्षेत्रों में किसानों ने सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार किया, करों के विरोध में भाग लिया और भूमिगत कार्यकर्ताओं को सहयोग दिया। कुछ स्थानों पर जमींदारों के एक वर्ग ने भी आंदोलन का समर्थन किया।
➣ छात्र, मजदूर और किसान आंदोलन के प्रमुख जनाधार बने, जबकि निम्न मध्यम वर्ग ने भी सक्रिय योगदान दिया। इसके विपरीत उच्च वर्ग और नौकरशाही का एक बड़ा हिस्सा ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार रहा। इसी सामाजिक संरचना के आधार पर डॉ. अम्बाप्रसाद ने भारत छोड़ो आंदोलन को विद्यार्थी-किसान-मध्यमवर्गीय विद्रोह कहा था।
➣ कुछ क्षेत्रों में पुलिस और प्रशासन के निचले स्तर के कर्मचारियों ने भी आंदोलनकारियों के प्रति सहानुभूति दिखाई या अप्रत्यक्ष सहयोग दिया। इससे ब्रिटिश सरकार का अपने स्थानीय प्रशासनिक तंत्र पर विश्वास कमजोर हुआ।
➣ सरकारी सेंसरशिप के बावजूद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रूप से प्रचार जारी रखा। बंबई के विभिन्न स्थानों से कांग्रेस का गुप्त रेडियो प्रसारित किया जाता था, जिसकी आवाज़ दूर-दूर तक, यहाँ तक कि मद्रास तक सुनी जा सकती थी। इसके संचालन में उषा मेहता की महत्वपूर्ण भूमिका थी, जबकि राम मनोहर लोहिया नियमित रूप से इससे प्रसारण करते थे।
➣ आंदोलन का प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों में भी व्यापक रहा। किसानों के छोटे-छोटे जत्थे दिन में खेती का काम करते और रात में आंदोलन की गतिविधियों में भाग लेते थे। कई स्थानों पर ग्रामीण जनता ने भूमिगत कार्यकर्ताओं को आश्रय, भोजन और अन्य आवश्यक सहायता भी प्रदान की।
➣ ब्रिटिश शासन के संचार और प्रशासनिक ढाँचे को बाधित करने के लिए कई स्थानों पर रेल की पटरियाँ उखाड़ना, पुलों को नुकसान पहुँचाना, टेलीफोन और तार की लाइनें काटना तथा सरकारी भवनों पर हमला जैसी घटनाएँ हुईं।
➣ कांग्रेस का आधिकारिक दृष्टिकोण अहिंसा पर आधारित था, लेकिन शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी और व्यापक सरकारी दमन के बाद कई क्षेत्रों में आंदोलन स्वतःस्फूर्त होकर उग्र और तोड़-फोड़ वाली कार्रवाइयों में बदल गया।
➣ आंदोलन में सभी राजनीतिक दलों और संगठनों की भागीदारी नहीं थी। मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा, पंजाब की यूनियनिस्ट पार्टी तथा उस समय का कम्युनिस्ट आंदोलन इससे अलग रहे। मुस्लिम लीग ने आंदोलन का विरोध किया, जबकि डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने भी इसका समर्थन नहीं किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी आंदोलन से अलग रहा।
➣ आंदोलन की तीव्रता इतनी अधिक थी कि तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल को भेजे संदेश में इसे 1857 के विद्रोह के बाद का सबसे गंभीर विद्रोह बताया।
➣ सुभाषचंद्र बोस ने बर्लिन रेडियो से अपने प्रसारणों में भारत छोड़ो आंदोलन को अहिंसक गुरिल्ला युद्ध के रूप में संबोधित किया, जबकि सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसे एक अद्वितीय आंदोलन के रूप में देखा।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन को विदेशों में भी ध्यान मिला। अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर तथा पर्ल एस. बक, एडगर स्नो और नॉर्मन थॉमस जैसे अमेरिकी बुद्धिजीवियों ने भारतीय स्वतंत्रता की मांग के प्रति समर्थन व्यक्त किया।
आंदोलन का विस्तार
➣ भारत छोड़ो आंदोलन का प्रभाव किसी एक प्रांत या क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। बंबई, बंगाल, बिहार, उड़ीसा, संयुक्त प्रांत और मद्रास इसके प्रमुख केंद्र बने, जबकि देश के अन्य हिस्सों में भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार आंदोलन की गतिविधियाँ दिखाई दीं।
➣ बिहार और संयुक्त प्रांत में आंदोलन ने विशेष रूप से उग्र रूप धारण किया। इन क्षेत्रों के कई जिलों में ब्रिटिश प्रशासन के विरुद्ध व्यापक विरोध हुआ और कुछ समय के लिए विद्रोह जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई।
➣ पूर्वी उत्तर प्रदेश में आजमगढ़, बलिया और गोरखपुर आंदोलन के प्रमुख केंद्र रहे। यहाँ स्थानीय जनता ने प्रशासन के विरुद्ध व्यापक विरोध किया और कई स्थानों पर सरकारी व्यवस्था को चुनौती दी।
➣ बिहार में गया, भागलपुर, सारण, पूर्णिया, शाहाबाद, मुजफ्फरपुर और चंपारण आंदोलन के प्रमुख केंद्र रहे। इन क्षेत्रों में आंदोलन का प्रभाव ग्रामीण इलाकों तक भी पहुँचा और ब्रिटिश प्रशासन को व्यापक चुनौती मिली।
➣ बंगाल में आंदोलन का प्रभाव विशेष रूप से मिदनापुर जैसे क्षेत्रों में व्यापक रहा। ग्रामीण जनता की सक्रियता के कारण यहाँ आंदोलन ने मजबूत जनाधार बनाया और आगे चलकर तामलुक की समानांतर सरकार के गठन की पृष्ठभूमि तैयार हुई।
➣ उड़ीसा और मद्रास में भी विद्यार्थियों, स्थानीय कार्यकर्ताओं और सामान्य जनता ने आंदोलन में भाग लिया। इस प्रकार आंदोलन का प्रभाव देश के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में दिखाई दिया।
| तथ्य | महत्वपूर्ण जानकारी |
|---|---|
| भूमिगत नेतृत्व | अरुणा आसफ अली, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन और उषा मेहता |
| हजारीबाग जेल से पलायन | 9 नवंबर 1942 — जयप्रकाश नारायण, योगेंद्र शुक्ल आदि के साथ जेल से निकले |
| गुप्त रेडियो | उषा मेहता और राम मनोहर लोहिया से संबंधित कांग्रेस का भूमिगत रेडियो |
| प्रमुख जनाधार | विद्यार्थी, किसान, मजदूर और निम्न मध्यम वर्ग |
| ग्रामीण भागीदारी | किसानों ने भूमिगत कार्यकर्ताओं को आश्रय और सहयोग दिया |
| उग्र गतिविधियाँ | रेल, तार और टेलीफोन व्यवस्था तथा सरकारी संस्थानों को बाधित करना |
| आंदोलन से अलग संगठन | मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा, यूनियनिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट आंदोलन और RSS |
| डॉ. बी. आर. आंबेडकर | भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन नहीं किया |
| वायसराय की टिप्पणी | लॉर्ड लिनलिथगो ने इसे 1857 के बाद का सबसे गंभीर विद्रोह बताया |
| सुभाषचंद्र बोस | बर्लिन रेडियो से आंदोलन को अहिंसक गुरिल्ला युद्ध कहा |
| प्रमुख क्षेत्र | बंबई, बंगाल, बिहार, उड़ीसा, संयुक्त प्रांत और मद्रास |
| पूर्वी उत्तर प्रदेश | आजमगढ़, बलिया और गोरखपुर प्रमुख केंद्र |
| बिहार | गया, भागलपुर, सारण, पूर्णिया, शाहाबाद, मुजफ्फरपुर और चंपारण प्रमुख केंद्र |
| बंगाल | मिदनापुर में व्यापक आंदोलन। आगे चलकर तामलुक की समानांतर सरकार की पृष्ठभूमि |
समानांतर सरकारों की स्थापना
➣ भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कुछ क्षेत्रों में स्थानीय जनता और कार्यकर्ताओं ने ब्रिटिश प्रशासन को चुनौती देते हुए अपनी स्वतंत्र समानांतर सरकारें अथवा प्रति सरकार स्थापित कर दीं।
➣ इन क्षेत्रों में ब्रिटिश प्रशासन का प्रभाव अस्थायी रूप से कमजोर पड़ गया और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने न्याय, सुरक्षा तथा प्रशासन से संबंधित कार्य अपने हाथों में ले लिए।
बलिया (प्रथम समानांतर सरकार)
➣ पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया में अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पहली प्रमुख समानांतर सरकार स्थापित हुई। इसका नेतृत्व स्थानीय कांग्रेस नेता चित्तू पांडे ने किया, जिन्हें बाद में बलिया का गांधी कहा गया।
➣ आंदोलनकारियों और स्थानीय जनता के दबाव के कारण बलिया के प्रशासन को गंभीर चुनौती मिली। जनता ने जिलाधिकारी को सत्ता सौंपने तथा गिरफ्तार कांग्रेस नेताओं को रिहा करने के लिए मजबूर कर दिया। इस प्रकार कुछ समय के लिए स्थानीय प्रशासन पर आंदोलनकारियों का प्रभाव स्थापित हो गया।
➣ बलिया की यह समानांतर सरकार अधिक समय तक कायम नहीं रह सकी। लगभग एक सप्ताह के भीतर जब ब्रिटिश सैनिक बलिया पहुँचे, तब तक स्थानीय नेता वहाँ से निकल चुके थे और ब्रिटिश प्रशासन ने पुनः अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।
तामलुक (ताम्रलिप्त जातीय सरकार)
➣ बंगाल के मिदनापुर जिले के तामलुक और कांथी क्षेत्र में 17 दिसंबर, 1942 को ताम्रलिप्त जातीय सरकार की स्थापना की गई। इसका नेतृत्व सतीश चंद्र सामंत ने सर्वाधिनायक के रूप में किया।
➣ तामलुक क्षेत्र में इससे पहले भी राष्ट्रीय आंदोलन और गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों का प्रभाव था। इसी कारण भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान यहाँ स्थानीय जनता का समर्थन व्यापक रहा और समानांतर सरकार अपेक्षाकृत संगठित रूप में कार्य कर सकी।
➣ ताम्रलिप्त जातीय सरकार ने केवल ब्रिटिश प्रशासन का विरोध ही नहीं किया, बल्कि स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक और सामाजिक कार्य भी किए। इसके द्वारा विद्यालयों को सहायता, चक्रवात पीड़ितों के लिए राहत कार्य, गरीबों के लिए खाद्यान्न वितरण तथा स्थानीय विवादों के निपटारे के लिए मध्यस्थता न्यायालय स्थापित किए गए।
➣ इस सरकार ने अपने संगठन को मजबूत करने के लिए विद्युत वाहिनी नामक स्वयंसेवी दस्ता भी बनाया। इस प्रकार तामलुक में समानांतर सरकार ने प्रशासन, राहत, न्याय और संगठन-इन सभी क्षेत्रों में ब्रिटिश व्यवस्था का विकल्प प्रस्तुत करने का प्रयास किया।
➣ ताम्रलिप्त जातीय सरकार लगभग सितंबर 1944 तक सक्रिय रही। लगभग दो वर्षों तक इसका अस्तित्व बने रहना इसे भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान स्थापित सबसे अधिक दीर्घजीवी और संगठित समानांतर सरकारों में शामिल करता है।
सतारा (प्रति सरकार)
➣ महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थापित समानांतर सरकार को प्रति सरकार कहा गया। इसका गठन 1943 में हुआ और यह भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान स्थापित समानांतर सरकारों में सबसे अधिक दीर्घजीवी और प्रभावशाली रही।
➣ सतारा प्रति सरकार के प्रमुख नेताओं में क्रांतिसिंह नाना पाटिल का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यशवंतराव चव्हाण सहित अनेक स्थानीय कार्यकर्ताओं ने भी इसकी गतिविधियों में भूमिका निभाई। यह व्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रों में ब्रिटिश प्रशासन के समानांतर अपना प्रभाव स्थापित करने में सफल रही।
➣ प्रति सरकार ने स्थानीय विवादों के निपटारे के लिए न्यायदान मंडल नामक जन-न्यायालय स्थापित किए। इसके अतिरिक्त ग्राम राज्य जैसी स्थानीय व्यवस्थाओं के माध्यम से ग्रामीण स्तर पर संगठन और प्रशासन को मजबूत किया गया।
➣ सतारा की प्रति सरकार ने राजनीतिक गतिविधियों के साथ-साथ कई रचनात्मक और सामाजिक कार्य भी किए। इनमें ग्राम पुस्तकालयों की स्थापना, शराबबंदी, अस्पृश्यता-विरोध, सड़क निर्माण और स्वच्छता जैसे कार्य शामिल थे। सामाजिक सुधार के क्षेत्र में सरल और मितव्ययी गांधी विवाह जैसी प्रथाओं को भी प्रोत्साहित किया गया।
➣ प्रति सरकार ने ब्रिटिश शासन के सहयोगियों और पुलिस मुखबिरों के विरुद्ध भी कार्रवाई की। इस प्रकार सतारा में आंदोलन केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित न रहकर वैकल्पिक स्थानीय प्रशासन और ग्रामीण सत्ता-संरचना के रूप में विकसित हुआ।
➣ सतारा और तामलुक दोनों क्षेत्रों की एक उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि ब्रिटिश प्रशासन के कुछ औपचारिक ढाँचे-जैसे कलेक्टर और पुलिस प्रशासन-पूरी तरह समाप्त नहीं हुए थे, लेकिन कई ग्रामीण क्षेत्रों में न्याय, कानून-व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन पर स्वतंत्रता सेनानियों का प्रभाव काफी बढ़ गया था।
अन्य क्षेत्रों में समानांतर प्रशासन
➣ इसके अलावा उड़ीसा के तालचेर तथा कर्नाटक के धारवाड़ जैसे क्षेत्रों में भी आंदोलनकारियों ने ब्रिटिश प्रशासन को चुनौती देते हुए स्थानीय स्तर पर अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्थाएँ स्थापित करने का प्रयास किया। इसी प्रकार बालासोर जैसे क्षेत्रों में भी आंदोलन का प्रभाव प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ा।
➣ इन समानांतर सरकारों की प्रकृति और अवधि अलग-अलग थी। कहीं यह व्यवस्था केवल कुछ दिनों या सप्ताहों तक रही, जबकि तामलुक और सतारा में आंदोलनकारियों ने अपेक्षाकृत लंबे समय तक वैकल्पिक प्रशासनिक ढाँचा बनाए रखा।
समानांतर सरकारें : परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| क्षेत्र | समानांतर सरकार | प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
| बलिया | समानांतर सरकार | अगस्त 1942 में चित्तू पांडे के नेतृत्व में; अल्पकालिक। |
| तामलुक | ताम्रलिप्त जातीय सरकार | 17 दिसंबर 1942; सतीश चंद्र सामंत के नेतृत्व में; सितंबर 1944 तक सक्रिय। |
| तामलुक | प्रमुख विशेषता | राहत, न्याय और स्थानीय प्रशासन के क्षेत्र में सक्रिय; विद्युत वाहिनी का गठन। |
| सतारा | प्रति सरकार | 1943 में स्थापित; क्रांतिसिंह नाना पाटिल प्रमुख नेता। |
| सतारा | प्रमुख विशेषता | न्यायदान मंडल और ग्राम-स्तरीय वैकल्पिक प्रशासन; अपेक्षाकृत दीर्घकालिक। |
| अन्य क्षेत्र | स्थानीय समानांतर व्यवस्था | तालचेर, धारवाड़ और बालासोर में भी ब्रिटिश प्रशासन को चुनौती दी गई। |
| सबसे महत्वपूर्ण तुलना | तामलुक और सतारा | दोनों में आंदोलनकारियों ने केवल विरोध नहीं किया, बल्कि वैकल्पिक स्थानीय प्रशासन चलाने का प्रयास किया। |
ब्रिटिश सरकार का दमन
➣ भारत छोड़ो आंदोलन के प्रारंभ होते ही ब्रिटिश सरकार ने व्यापक गिरफ्तारियाँ शुरू कर दीं। कांग्रेस को अवैध घोषित कर उसके कार्यालयों, सभाओं और राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
➣ आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस और सेना का व्यापक प्रयोग किया गया। अनेक स्थानों पर प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज और गोलीबारी की गई तथा आंदोलनकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की गई।
➣ सरकार ने आंदोलन की खबरों और प्रचार को नियंत्रित करने के लिए प्रेस सेंसरशिप लागू की। समाचार-पत्रों पर नियंत्रण रखा गया और कांग्रेस तथा भूमिगत गतिविधियों से संबंधित सामग्री के प्रकाशन पर रोक लगाई गई।
➣ कई क्षेत्रों में आंदोलनकारियों और उनके समर्थकों पर सामूहिक जुर्माने लगाए गए। गाँवों में तलाशी अभियान चलाए गए तथा संदिग्ध कार्यकर्ताओं और सहयोगियों को गिरफ्तार किया गया।
➣ रेलवे, तार और टेलीफोन जैसी सरकारी संचार व्यवस्थाओं को नुकसान पहुँचाने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए सरकार ने विशेष सुरक्षा व्यवस्था की। भूमिगत कार्यकर्ताओं और गुप्त संगठनों पर भी कड़ी कार्रवाई की गई।
➣ ब्रिटिश दमन के परिणामस्वरूप 1942 के अंत तक आंदोलन की खुली गतिविधियाँ काफी कमजोर हो गईं, हालांकि भूमिगत प्रतिरोध कुछ समय तक जारी रहा। लगभग 1 लाख से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया और दमन के दौरान बड़ी संख्या में लोग मारे गए।
➣ कठोर दमन के बावजूद ब्रिटिश सरकार भारतीय जनता की स्वतंत्रता की आकांक्षा को समाप्त नहीं कर सकी। आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन-असंतोष अब व्यापक और गहरा हो चुका था।
भारत छोड़ो आंदोलन का अंत
➣ ब्रिटिश सरकार के कड़े दमन के कारण 1942 के अंत तक भारत छोड़ो आंदोलन की खुली गतिविधियाँ काफी हद तक दबा दी गईं। हालांकि कई स्थानों पर भूमिगत कार्यकर्ता और स्थानीय समूह इसके बाद भी सक्रिय रहे।
➣ आंदोलन के दौरान गिरफ्तार किए गए कांग्रेस के प्रमुख नेता लंबे समय तक जेल में रहे। आखिरकार खराब स्वास्थ्य के कारण महात्मा गांधी को 6 मई, 1944 को आगा खाँ पैलेस से रिहा कर दिया गया। गांधीजी की रिहाई के समय तक आंदोलन का सक्रिय चरण काफी कमजोर पड़ चुका था।
➣ गांधीजी के जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने तत्काल कोई नया व्यापक जनआंदोलन शुरू नहीं किया। उन्होंने रचनात्मक कार्यों और राजनीतिक प्रयासों के माध्यम से अपनी सक्रियता फिर से शुरू की तथा देश की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों पर ध्यान केंद्रित किया।
➣ गांधीजी की रिहाई को लेकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल का रवैया काफी कठोर था। गांधीजी की रिहाई के संदर्भ में चर्चिल ने कहा था-
How can we bow to a damned old man who has always been our enemy, at a time when we are winning everywhere?
➣ 1944 तक भारत छोड़ो आंदोलन का सक्रिय चरण लगभग समाप्त हो चुका था। कांग्रेस का संगठन भी लंबे समय तक चले दमन और गिरफ्तारियों से प्रभावित था। इसलिए कांग्रेस ने तत्काल किसी नए बड़े जनआंदोलन को आगे बढ़ाने के बजाय राजनीतिक और संवैधानिक रास्ते पर ध्यान देना शुरू किया।
➣ इस समय तक द्वितीय विश्व युद्ध का रुख भी बदल चुका था। 1944 में मित्र राष्ट्रों की स्थिति मजबूत होने लगी और युद्ध के बाद भारत के राजनीतिक भविष्य का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण बन गया। गांधीजी की सक्रियता और भविष्य में किसी नए आंदोलन की संभावना को देखते हुए ब्रिटिश सरकार भी भारतीय समस्या के राजनीतिक समाधान पर विचार करने लगी।
➣ इसी बदली हुई राजनीतिक परिस्थिति में आगे चलकर वायसराय लॉर्ड वेवेल ने वेवेल योजना (1945) प्रस्तुत की। इसके साथ भारत की संवैधानिक समस्या को सुलझाने के लिए बातचीत का एक नया दौर शुरू हुआ।
➣ इस प्रकार भारत छोड़ो आंदोलन अपने तत्काल उद्देश्य-ब्रिटिश शासन का तत्काल अंत-को प्राप्त नहीं कर सका, लेकिन इसने स्वतंत्रता संघर्ष को निर्णायक चरण में पहुँचा दिया। 1942 के बाद ब्रिटिश सरकार के लिए भारत पर लंबे समय तक शासन बनाए रखना लगातार कठिन होता गया।
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ भारत छोड़ो प्रस्ताव 14 जुलाई, 1942 को वर्धा में आयोजित कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पारित किया गया था। इस बैठक की अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आजाद ने की थी।
➣ भारत छोड़ो प्रस्ताव को अंतिम स्वीकृति 8 अगस्त, 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (AICC) की बैठक में मिली।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन का सबसे प्रसिद्ध नारा करो या मरो था, जिसे महात्मा गांधी ने 8 अगस्त, 1942 को दिया था।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन का वास्तविक देशव्यापी प्रस्फुटन 9 अगस्त, 1942 से हुआ। इसी दिन ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था।
➣ कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा चलाए गए अभियान को ऑपरेशन जीरो आवर कहा जाता है।
➣ अरुणा आसफ अली ने 9 अगस्त, 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में कांग्रेस का झंडा फहराया। यह घटना भारत छोड़ो आंदोलन के शुरुआती दौर की महत्वपूर्ण घटनाओं में मानी जाती है।
➣ महात्मा गांधी को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान आगा खाँ पैलेस, पूना में नजरबंद रखा गया था, जबकि कांग्रेस कार्यसमिति के कई प्रमुख नेताओं को अहमदनगर किले में नजरबंद किया गया था।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उषा मेहता ने भूमिगत कांग्रेस रेडियो के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राम मनोहर लोहिया भी इस रेडियो से नियमित रूप से प्रसारण करते थे।
➣ जयप्रकाश नारायण और योगेंद्र शुक्ल 9 नवंबर, 1942 को हजारीबाग सेंट्रल जेल से निकलने में सफल हुए। इसके बाद जयप्रकाश नारायण ने भूमिगत रहकर भारत छोड़ो आंदोलन को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बलिया में चित्तू पांडे के नेतृत्व में पहली प्रमुख समानांतर सरकार स्थापित हुई। इसे भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान स्थापित समानांतर सरकारों का प्रारंभिक उदाहरण माना जाता है।
➣ बंगाल के मिदनापुर जिले के तामलुक में ताम्रलिप्त जातीय सरकार स्थापित की गई थी। इसका नेतृत्व सतीश चंद्र सामंत ने किया था और यह लगभग सितंबर, 1944 तक सक्रिय रही।
➣ महाराष्ट्र के सतारा में स्थापित प्रति सरकार भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बनी सबसे अधिक दीर्घजीवी समानांतर सरकारों में थी। इसके प्रमुख नेताओं में क्रांतिसिंह नाना पाटिल शामिल थे।
➣ ताम्रलिप्त जातीय सरकार ने स्थानीय प्रशासन के साथ-साथ राहत कार्य, विद्यालयों को सहायता, मध्यस्थता न्यायालय तथा विद्युत वाहिनी जैसी व्यवस्थाएँ भी विकसित की थीं।
➣ सतारा की प्रति सरकार ने न्यायदान मंडल तथा ग्राम राज्य जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक प्रशासन चलाने का प्रयास किया।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन का सबसे अधिक प्रभाव बंबई, बंगाल, बिहार, उड़ीसा, संयुक्त प्रांत और मद्रास में दिखाई दिया। बिहार और संयुक्त प्रांत के कई क्षेत्रों में आंदोलन ने विशेष रूप से उग्र रूप लिया।
➣ पूर्वी उत्तर प्रदेश में आजमगढ़, बलिया और गोरखपुर तथा बिहार में गया, भागलपुर, सारण, पूर्णिया, शाहाबाद, मुजफ्फरपुर और चंपारण आंदोलन के प्रमुख केंद्र रहे।
➣ आंदोलन के प्रमुख जनाधार में छात्र, मजदूर, किसान और निम्न मध्यम वर्ग शामिल थे। महिलाओं ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिनमें अरुणा आसफ अली, उषा मेहता और सुचेता कृपलानी प्रमुख थीं।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन से मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा, साम्यवादी दल और पंजाब की यूनियनिस्ट पार्टी अलग रहे। मुस्लिम लीग ने आंदोलन का विरोध किया, जबकि डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने भी इसका समर्थन नहीं किया।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन के समय भारत के प्रधान सेनापति लॉर्ड वेवेल थे। वे बाद में अक्टूबर, 1943 से फरवरी, 1947 तक भारत के वायसराय और गवर्नर-जनरल रहे।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन के समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल थे, जो कंज़र्वेटिव पार्टी से संबंधित थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उनके नेतृत्व में गठबंधन सरकार थी।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित होने के समय मौलाना अबुल कलाम आजाद कांग्रेस के अध्यक्ष थे। वे 1940 के रामगढ़ अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए थे।
➣ 1941 से 1945 के बीच द्वितीय विश्व युद्ध की परिस्थितियों के कारण कांग्रेस का कोई नियमित वार्षिक अधिवेशन आयोजित नहीं हो सका। इस कारण मौलाना अबुल कलाम आजाद लगभग छह वर्षों तक कांग्रेस अध्यक्ष बने रहे और वे स्वतंत्रता-पूर्व कांग्रेस के सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहने वाले नेताओं में शामिल हुए।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर, जो बाद में गांधीजी के प्रसिद्ध जीवनीकार बने, गांधीजी के संपर्क में रहे और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की घटनाओं से जुड़े रहे।
➣ बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान को बाद में अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाने लगा। इसी कारण भारत छोड़ो आंदोलन को अगस्त क्रांति भी कहा जाता है।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जवाहरलाल नेहरू अहमदनगर किले में नजरबंद थे। इसी अवधि में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक The Discovery of India लिखी।
➣ भारत छोड़ो और साइमन गो बैक जैसे नारों को लोकप्रिय बनाने में युसूफ मेहर अली की महत्वपूर्ण भूमिका थी। विशेष रूप से Quit India का नारा उन्हीं से जोड़ा जाता है।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान लगभग 60,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया। ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए गिरफ्तारियों, गोलीबारी, सेंसरशिप और अन्य दमनात्मक उपायों का व्यापक प्रयोग किया।
➣ स्वास्थ्य खराब होने के कारण महात्मा गांधी को 6 मई, 1944 को आगा खाँ पैलेस से रिहा कर दिया गया। उनकी रिहाई के बाद उन्होंने तत्काल कोई नया व्यापक जनआंदोलन शुरू करने के बजाय रचनात्मक कार्यों पर ध्यान दिया।
कुछ महत्वपूर्ण भ्रम बिंदु
➣ भारत छोड़ो प्रस्ताव 9 अगस्त, 1942 को पारित नहीं हुआ था। इसे पहले 14 जुलाई, 1942 को वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति ने पारित किया तथा 8 अगस्त, 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने स्वीकृति दी। 9 अगस्त से आंदोलन का व्यापक प्रस्फुटन हुआ।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन के समय कांग्रेस अध्यक्ष महात्मा गांधी नहीं, बल्कि मौलाना अबुल कलाम आजाद थे। गांधीजी कांग्रेस के सर्वोच्च राष्ट्रीय नेता के रूप में आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे।
➣ भारत छोड़ो और करो या मरो को एक ही नारा नहीं समझना चाहिए। “भारत छोड़ो” नारे को युसूफ मेहर अली से जोड़ा जाता है, जबकि करो या मरो का आह्वान महात्मा गांधी ने किया था।
➣ 9 अगस्त, 1942 को केवल गांधीजी की गिरफ्तारी नहीं हुई थी। ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन शुरू होने से पहले ही गांधीजी सहित कांग्रेस के लगभग सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था, जिसके बाद आंदोलन का नेतृत्व स्थानीय और भूमिगत कार्यकर्ताओं के हाथों में चला गया।
➣ अरुणा आसफ अली भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित करने वाली नेता नहीं थीं। उन्होंने 9 अगस्त, 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में कांग्रेस का झंडा फहराया था।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन की पहली समानांतर सरकार सतारा में नहीं, बल्कि बलिया में चित्तू पांडे के नेतृत्व में स्थापित हुई थी। सतारा की प्रति सरकार बाद में स्थापित हुई और सबसे अधिक समय तक सक्रिय रही।
➣ ताम्रलिप्त जातीय सरकार केवल एक भूमिगत संगठन नहीं थी। तामलुक में इसने न्याय, राहत, शिक्षा और स्थानीय प्रशासन से जुड़े कार्य भी किए थे।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन के समय भारत के वायसराय लॉर्ड वेवेल नहीं, बल्कि लॉर्ड लिनलिथगो थे। वेवेल उस समय भारत के प्रधान सेनापति थे और अक्टूबर, 1943 में वायसराय बने।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन के समय ब्रिटेन में Labour Party की सरकार नहीं थी। उस समय विंस्टन चर्चिल प्रधानमंत्री थे और वे Conservative Party से संबंधित थे। हालांकि उनकी सरकार द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एक गठबंधन सरकार थी।
➣ ग्वालिया टैंक मैदान को भारत छोड़ो आंदोलन के समय से ही “अगस्त क्रांति मैदान” नहीं कहा जाता था। बाद में इसे अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना गया और इसी कारण भारत छोड़ो आंदोलन को अगस्त क्रांति भी कहा जाता है।
➣ गांधीजी की गिरफ्तारी और रिहाई को एक ही वर्ष की घटना नहीं समझना चाहिए। उन्हें 9 अगस्त, 1942 को गिरफ्तार किया गया था और स्वास्थ्य के आधार पर 6 मई, 1944 को रिहा किया गया।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन पूरी तरह अहिंसक नहीं रहा। गांधीजी का आंदोलन का मूल उद्देश्य अहिंसक था, लेकिन शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद कई क्षेत्रों में आंदोलन स्वतःस्फूर्त और उग्र हो गया तथा रेल पटरियाँ उखाड़ने, तार-टेलीफोन लाइनें काटने और सरकारी भवनों पर हमले जैसी घटनाएँ भी हुईं।
➣ जवाहरलाल नेहरू ने The Discovery of India सामान्य राजनीतिक परिस्थितियों में नहीं लिखी थी। उन्होंने इसे अहमदनगर किले में नजरबंदी के दौरान 1942–44 के बीच लिखा था।
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