भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885 ई.)
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारत का पहला अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन था, जिसकी स्थापना 28 दिसंबर 1885 ई. को बम्बई (वर्तमान मुंबई) में की गई। इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक संगठित स्वरूप प्रदान किया और आगे चलकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रमुख नेतृत्व किया।
➣ स्थापना के समय कांग्रेस का उद्देश्य भारत के विभिन्न प्रांतों के शिक्षित भारतीयों को एक साझा राजनीतिक मंच प्रदान करना, उनकी समस्याओं को सरकार के समक्ष संवैधानिक ढंग से रखना तथा विभिन्न क्षेत्रों के नेताओं के बीच सहयोग और राष्ट्रीय एकता की भावना को विकसित करना था।
➣ अपने प्रारम्भिक वर्षों में कांग्रेस का नेतृत्व मुख्यतः उदारवादी नेताओं के हाथों में रहा, जो संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों के माध्यम से प्रशासनिक सुधारों और भारतीयों के लिए अधिक राजनीतिक अधिकारों की मांग करते थे।
➣ बाद के वर्षों में यही संगठन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे प्रभावशाली राजनीतिक मंच बन गया।
स्थापना
पृष्ठभूमि
➣ 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में राजनीतिक जागरण तेजी से बढ़ रहा था। अंग्रेज़ी शिक्षा के प्रसार, आधुनिक विचारों के प्रभाव तथा समाचार-पत्रों के विकास से शिक्षित भारतीयों में अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी।
➣ परिणामस्वरूप विभिन्न प्रांतों में अनेक राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना हुई, जिन्होंने भारतीयों की समस्याओं को सरकार के सामने उठाना प्रारम्भ किया।
➣ इसी अवधि में इल्बर्ट बिल विवाद (1883) ने भारतीयों और अंग्रेज़ों के बीच विद्यमान नस्लीय भेदभाव को स्पष्ट कर दिया। इसके अतिरिक्त लॉर्ड लिटन की दमनकारी नीतियों तथा लॉर्ड रिपन के उदार सुधारों ने भी भारतीयों में राजनीतिक चेतना को बढ़ावा दिया।
➣ इस समय तक पूना सार्वजनिक सभा (1870), इंडियन एसोसिएशन (1876), मद्रास महाजन सभा (1884) तथा बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन (1885) जैसी प्रमुख राजनीतिक संस्थाएँ विभिन्न प्रांतों में सक्रिय हो चुकी थीं। यद्यपि इनका कार्यक्षेत्र मुख्यतः अपने-अपने क्षेत्रों तक सीमित था, फिर भी ये प्रशासनिक सुधारों, भारतीय प्रतिनिधित्व तथा राजनीतिक अधिकारों जैसे राष्ट्रीय प्रश्नों पर परस्पर सहयोग करने लगी थीं।
➣ इसी क्रम में आनंद मोहन बोस तथा सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय सम्मेलन के 1883 ई. तथा 1885 ई. में दो अधिवेशन आयोजित किए गए, जिनमें भारत के विभिन्न प्रमुख नगरों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इन सम्मेलनों ने पहली बार अखिल भारतीय राजनीतिक मंच की अवधारणा को व्यावहारिक रूप दिया। इसी कारण इन्हें प्रायः भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पूर्ववृत्त माना जाता है।
➣ विशेष रूप से सितंबर 1885 ई. में इन प्रमुख राजनीतिक संस्थाओं द्वारा संयुक्त रूप से इंग्लैंड प्रतिनिधिमंडल भेजा जाना इस बात का प्रमाण था कि भारतीय राजनीति अब प्रांतीय सीमाओं से आगे बढ़कर अखिल भारतीय समन्वय की दिशा में अग्रसर हो चुकी थी।
➣ ऐसे वातावरण में एक स्थायी अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन की आवश्यकता और अधिक स्पष्ट हो गई, जिसके परिणामस्वरूप 28 दिसंबर 1885 ई. को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई।
ए. ओ. ह्यूम
➣ एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (A. O. Hume) भारतीय सिविल सेवा (ICS) के सेवानिवृत्त अधिकारी थे। उन्हें सामान्यतः भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संस्थापक माना जाता है।
➣ उन्होंने भारत के विभिन्न प्रांतों के राजनीतिक नेताओं को एक मंच पर लाने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में केंद्रीय भूमिका निभाई।
➣ ह्यूम का मानना था कि यदि शिक्षित भारतीयों को अपनी समस्याओं और विचारों को व्यक्त करने के लिए एक वैधानिक राजनीतिक मंच उपलब्ध कराया जाए, तो सरकार और भारतीयों के बीच संवाद स्थापित किया जा सकता है।
➣ 1883 ई. में ह्यूम ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकों को एक खुला पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने शिक्षित भारतीय युवाओं से संगठित होकर राष्ट्रहित में कार्य करने का आह्वान किया। इस पत्र को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद भी ह्यूम कई वर्षों तक संगठन से जुड़े रहे। उन्होंने प्रारम्भिक वर्षों में कांग्रेस के संगठनात्मक कार्यों का संचालन किया तथा विभिन्न प्रांतों के नेताओं के बीच समन्वय स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में ह्यूम की भूमिका को लेकर इतिहासकारों के बीच विभिन्न मत हैं। कुछ इतिहासकार इसे सेफ्टी वाल्व सिद्धांत से जोड़ते हैं, जबकि अन्य इतिहासकारों का मत है कि ह्यूम ने भारतीय राजनीतिक जागरण को संगठित रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सेफ्टी वाल्व सिद्धांत
➣ सेफ्टी वाल्व सिद्धांत के अनुसार ए. ओ. ह्यूम ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना इसलिए की, ताकि शिक्षित भारतीयों में बढ़ते असंतोष को एक वैधानिक और शांतिपूर्ण मंच मिल सके।
➣ इस सिद्धांत के समर्थकों का मानना है कि यदि भारतीयों को अपनी शिकायतें रखने का अवसर नहीं मिलता, तो असंतोष हिंसक विद्रोह का रूप ले सकता था। इसलिए कांग्रेस को एक सेफ्टी वाल्व (सुरक्षा वाल्व) की तरह स्थापित किया गया, जिससे असंतोष शांतिपूर्ण ढंग से बाहर निकल सके।
➣ इस सिद्धांत का समर्थन लाला लाजपत राय सहित कुछ अन्य नेताओं ने भी किया। उनका मत था कि ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस को इसलिए प्रोत्साहित किया ताकि भारतीयों के असंतोष को नियंत्रित रखा जा सके।
लाला लाजपत राय ने अपनी पुस्तक Young India (1916) में लिखा कि कांग्रेस लॉर्ड डफरिन के दिमाग की उपज थी।➣ हालाँकि, अधिकांश आधुनिक इतिहासकार इस सिद्धांत को पूरी तरह स्वीकार नहीं करते। उनका मत है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना केवल ब्रिटिश नीति का परिणाम नहीं थी,
➣ बल्कि 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में बढ़ती राजनीतिक चेतना, शिक्षित मध्यम वर्ग के उदय तथा विभिन्न राजनीतिक संगठनों की गतिविधियों का भी परिणाम थी। इसलिए कांग्रेस की स्थापना को किसी एक कारण से नहीं जोड़ा जा सकता।
कांग्रेस की स्थापना से पहले आनंद मोहन बोस तथा सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय सम्मेलन के दो अधिवेशन 1883 तथा 1885 ई. में आयोजित किए गए थे, जिनमें देश के प्रमुख नगरों के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए थे। इसे प्रायः कांग्रेस का पूर्ववृत्त माना जाता है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885)
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का श्रेय सामान्यतः एलन ऑक्टेवियन ह्यूम को दिया जाता है। उनका मानना था कि भारत के विभिन्न प्रांतों में कार्यरत राजनीतिक नेताओं को एक अखिल भारतीय मंच पर संगठित किया जाना चाहिए।
➣ इसी उद्देश्य से 1884 ई. में ह्यूम ने भारतीय राष्ट्रीय संघ के गठन की पहल की। उन्होंने भारत के विभिन्न प्रांतों के प्रमुख नेताओं से संपर्क स्थापित किया और एक अखिल भारतीय सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई।
➣ ह्यूम ने इस प्रस्ताव पर तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डफरिन से भी चर्चा की। कुछ इतिहासकारों के अनुसार डफरिन ने इस प्रयास को अप्रत्यक्ष समर्थन दिया, जबकि अन्य इतिहासकार इसे मुख्यतः ह्यूम और भारतीय नेताओं की पहल मानते हैं।
➣ प्रारम्भ में भारतीय राष्ट्रीय संघ का प्रथम अधिवेशन 25 दिसंबर 1885 ई. को पूना में आयोजित करने का निर्णय लिया गया था, लेकिन वहाँ हैजा फैल जाने के कारण अधिवेशन का स्थान बदलकर बम्बई कर दिया गया।
➣ अंततः 28 दिसंबर 1885 ई. को बम्बई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत विद्यालय में कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन प्रारम्भ हुआ। यह अधिवेशन 31 दिसंबर 1885 ई. तक चला।
➣ इसमें भारत के विभिन्न प्रांतों से आए 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इनमें वकील, शिक्षक, पत्रकार, डॉक्टर, व्यापारी तथा अन्य शिक्षित भारतीय शामिल थे, जो अपने-अपने क्षेत्रों के प्रमुख सार्वजनिक कार्यकर्ताओं में गिने जाते थे।
➣ इस अधिवेशन की अध्यक्षता व्योमेश चंद्र बनर्जी ने की। वे कलकत्ता उच्च न्यायालय के प्रसिद्ध अधिवक्ता थे और विभिन्न प्रांतों के नेताओं द्वारा सर्वसम्मति से कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष चुने गए।
➣ प्रथम अधिवेशन में यह निर्णय लिया गया कि कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन प्रत्येक वर्ष भारत के किसी अलग शहर में आयोजित किया जाएगा, जिससे देश के विभिन्न भागों के नेताओं को एक-दूसरे के संपर्क में आने तथा राष्ट्रीय स्तर पर विचार-विमर्श करने का अवसर मिल सके।
➣ इस अधिवेशन में प्रशासनिक सुधारों, विधान परिषदों के विस्तार, भारतीयों की सरकारी सेवाओं में अधिक भागीदारी तथा सरकार के समक्ष भारतीयों की समस्याओं को संवैधानिक ढंग से प्रस्तुत करने जैसे विषयों पर चर्चा की गई।
➣ यद्यपि कांग्रेस की प्रारम्भिक मांगें सीमित थीं, फिर भी यह पहली बार था जब भारत के विभिन्न प्रांतों के प्रतिनिधि एक अखिल भारतीय राजनीतिक मंच पर एकत्र होकर साझा मुद्दों पर विचार कर रहे थे।
➣ कुछ इतिहासकारों के अनुसार इसी अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी के सुझाव पर भारतीय राष्ट्रीय संघ का नाम बदलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस रखा गया। इसके बाद यही संगठन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
उद्देश्य
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के समय इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन चलाना नहीं था। प्रारम्भिक नेताओं का प्रयास था कि भारतीयों को एक अखिल भारतीय राजनीतिक मंच मिले, जिसके माध्यम से वे अपनी समस्याओं और मांगों को संवैधानिक ढंग से सरकार के सामने रख सकें।
- भारत के विभिन्न प्रांतों के राजनीतिक नेताओं को एक अखिल भारतीय मंच पर संगठित करना।
- भारतीयों में राष्ट्रीय एकता तथा राजनीतिक चेतना का विकास करना।
- जनता की समस्याओं और मांगों को ब्रिटिश सरकार के समक्ष संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करना।
- सरकार और भारतीय नेताओं के बीच संवाद स्थापित कर प्रशासनिक सुधारों की मांग करना।
- भारतीयों की प्रशासन में भागीदारी बढ़ाने तथा विधान परिषदों का विस्तार करने की मांग करना।
- भारतीय सिविल सेवा (ICS) सहित उच्च सरकारी सेवाओं में भारतीयों को अधिक अवसर दिलाने का प्रयास करना।
- भारत के विभिन्न प्रांतों के नेताओं के बीच संपर्क, सहयोग और विचारों का आदान-प्रदान बढ़ाना।
➣ कांग्रेस के प्रारम्भिक नेताओं का विश्वास था कि संवैधानिक तरीकों, प्रार्थना-पत्रों, प्रतिवेदनों और सार्वजनिक चर्चाओं के माध्यम से सरकार पर सुधारों के लिए दबाव बनाया जा सकता है। इसी कारण 1885 से 1905 ई. तक कांग्रेस की नीतियों पर मुख्यतः उदारवादी नेताओं का प्रभाव रहा।
ब्रिटिश समिति (1889 ई.)
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद उसके नेताओं ने अनुभव किया कि केवल भारत में प्रस्ताव पारित करने से ब्रिटिश सरकार पर अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ रहा था। इसलिए उन्होंने अपनी मांगों को सीधे ब्रिटिश संसद और ब्रिटिश जनता तक पहुँचाने का निर्णय लिया।
➣ इसी उद्देश्य से 1889 ई. में लंदन में ब्रिटिश समिति (British Committee of the Indian National Congress) की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य कांग्रेस की मांगों का प्रचार करना तथा प्रशासनिक एवं संवैधानिक सुधारों के पक्ष में जनमत तैयार करना था।
➣ समिति ने अपने विचारों के प्रचार के लिए India नामक साप्ताहिक पत्र का भी प्रकाशन प्रारम्भ किया, जो ब्रिटेन में कांग्रेस का प्रमुख प्रचार माध्यम बना।
➣ ब्रिटिश समिति के प्रयासों से कांग्रेस की मांगें ब्रिटिश संसद तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुँचीं। इससे आगे चलकर भारतीय परिषद अधिनियम, 1892, बेल्बी आयोग (1895–96) तथा अन्य प्रशासनिक सुधारों पर होने वाली चर्चाओं में कांग्रेस को लाभ मिला।
ध्यान दें : कुछ समकालीन स्रोतों में 1887 ई. में भारतीय सुधार समिति के गठन का उल्लेख मिलता है। वहीं अधिकांश आधुनिक इतिहासकार एवं मानक पुस्तकें 1889 ई. में स्थापित ब्रिटिश समिति को ही कांग्रेस की प्रमुख प्रचार समिति मानते हैं।
कांग्रेस को लेकर अंग्रेजों की प्रतिक्रिया
➣ प्रारम्भिक वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की गतिविधियों को गंभीरता से नहीं लिया। उसका मानना था कि कांग्रेस शिक्षित भारतीयों का एक छोटा-सा संगठन है, जिसका जनसाधारण पर अधिक प्रभाव नहीं है।
➣ लेकिन कुछ ही वर्षों में जब कांग्रेस ने प्रशासनिक सुधारों, भारतीयों की भागीदारी तथा राजनीतिक अधिकारों की मांग उठानी शुरू की, तो ब्रिटिश सरकार का दृष्टिकोण बदलने लगा।
➣ ब्रिटिश सरकार ने राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने के लिए फूट डालो और राज करो (Divide and Rule) की नीति को अधिक सक्रिय रूप से अपनाया।
➣ विभिन्न वर्गों, समुदायों तथा राजनीतिक समूहों के बीच मतभेद बढ़ाने का प्रयास किया गया, ताकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक व्यापक राष्ट्रीय संगठन के रूप में विकसित न हो सके।
➣ सरकार ने सर सैय्यद अहमद ख़ाँ, राजा शिवप्रसाद तथा अन्य ब्रिटिश समर्थक नेताओं को कांग्रेस की आलोचना करने और उसके विरुद्ध जनमत तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया।
➣ इसी उद्देश्य से 1888 ई. में यूनाइटेड इंडियन पैट्रियाटिक एसोसिएशन की स्थापना की गई। इस संगठन का उद्देश्य कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव का विरोध करना तथा ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठावान भारतीयों को एक मंच पर संगठित करना था।
➣ इन नेताओं का मत था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पूरे भारत के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं करती। इसी कारण उन्होंने कांग्रेस के समानांतर एक अलग राजनीतिक मंच के गठन का समर्थन किया।
ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के प्रभाव को सीमित करने के लिए फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई।
1888 ई. में यूनाइटेड इंडियन पैट्रियाटिक एसोसिएशन की स्थापना कांग्रेस के विरोध के उद्देश्य से की गई थी।
भारतीय परिषद अधिनियम (1892)
➣ कांग्रेस का मानना था कि भारतीयों को शासन-प्रशासन में अधिक भागीदारी मिलनी चाहिए तथा विधान परिषदों की शक्तियों का विस्तार किया जाना चाहिए। कांग्रेस ने अपने अधिवेशनों और प्रतिवेदनों के माध्यम से लगातार इन मांगों को ब्रिटिश सरकार के समक्ष रखा।
➣ कांग्रेस तथा अन्य भारतीय नेताओं के बढ़ते दबाव के परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 पारित किया। उस समय भारत का वायसराय लॉर्ड लैंसडाउन था।
➣ यह अधिनियम 1861 के भारतीय परिषद अधिनियम में संशोधन कर लाया गया और इसे कांग्रेस की प्रारम्भिक राजनीतिक गतिविधियों का पहला महत्वपूर्ण परिणाम माना जाता है।
भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 की प्रमुख विशेषताएँ
- केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान परिषदों के सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गई।
- पहली बार कुछ गैर-सरकारी संस्थाओं, जैसे नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों, विश्वविद्यालयों तथा वाणिज्य मंडलों को परिषदों के लिए सदस्यों की सिफारिश करने का अधिकार दिया गया।
- यद्यपि अधिनियम में “निर्वाचन (Election)” शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था, फिर भी इसे भारत में अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत माना जाता है।
- विधान परिषदों के सदस्यों को वार्षिक बजट पर चर्चा करने का अधिकार दिया गया, लेकिन वे बजट पर मतदान नहीं कर सकते थे।
- सदस्यों को सार्वजनिक महत्व के विषयों पर प्रश्न पूछने की अनुमति दी गई, किंतु इसके लिए पूर्व सूचना देनी पड़ती थी और पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं था।
कांग्रेस की प्रतिक्रिया
➣ यद्यपि कांग्रेस ने इसे एक प्रारम्भिक संवैधानिक सुधार के रूप में स्वीकार किया, लेकिन वह इससे संतुष्ट नहीं थी। कांग्रेस का मत था कि परिषदों की शक्तियाँ अभी भी बहुत सीमित थीं और अधिकांश अधिकार सरकार के हाथों में ही बने रहे।
➣ भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ने के बावजूद वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति उन्हें प्राप्त नहीं हुई।
➣ कांग्रेस ने आगे भी परिषदों के लोकतांत्रिक विस्तार, निर्वाचित सदस्यों की संख्या बढ़ाने तथा भारतीयों को शासन में अधिक अधिकार देने की मांग जारी रखी।
➣ यही मांगें आगे चलकर भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 (मॉर्ले-मिंटो सुधार) का आधार बनीं।
बेल्बी आयोग (1895–96)
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का मानना था कि भारत पर प्रशासनिक तथा सैन्य व्यय का अत्यधिक बोझ डाला जा रहा है, जबकि इन खर्चों का बड़ा भाग ब्रिटिश साम्राज्य के हितों के लिए किया जाता था। इसलिए कांग्रेस लगातार यह मांग कर रही थी कि भारतीय राजस्व का उपयोग मुख्यतः भारत के आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए किया जाए।
➣ इसी पृष्ठभूमि में 1895 ई. में लॉर्ड बेल्बी की अध्यक्षता में रॉयल कमीशन ऑन इंडियन एक्सपेंडिचर का गठन किया गया, जिसे सामान्यतः बेल्बी आयोग कहा जाता है। इसका उद्देश्य भारत और ब्रिटेन के बीच वित्तीय संबंधों तथा भारत पर होने वाले सरकारी व्यय की समीक्षा करना था।
➣ कांग्रेस ने इस अवसर का उपयोग भारतीय आर्थिक समस्याओं को ब्रिटिश सरकार के समक्ष रखने के लिए किया। दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, दिनशॉ एडुल्जी वाचा सहित अन्य भारतीय नेताओं ने आयोग के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारत पर अत्यधिक सैन्य एवं प्रशासनिक व्यय का बोझ डाला जा रहा है तथा ब्रिटेन के अनेक खर्च भी भारतीय राजस्व से पूरे किए जा रहे हैं। उन्होंने भारत और ब्रिटेन के बीच वित्तीय दायित्वों का न्यायसंगत विभाजन करने की भी मांग की।
➣ यद्यपि बेल्बी आयोग की सिफारिशों से तत्काल कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ, फिर भी इसने भारतीय वित्तीय प्रशासन की कमियों को उजागर किया। साथ ही कांग्रेस के आर्थिक तर्कों को व्यापक पहचान मिली और आगे चलकर भारतीय आर्थिक राष्ट्रवाद को भी बल मिला।
कांग्रेस से संबंधित प्रमुख घटनाक्रम
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 ई. में हुई। इसके बाद स्वतंत्रता प्राप्ति तक कांग्रेस के इतिहास में अनेक महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा और स्वरूप को प्रभावित किया। नीचे 1885 से 1947 ई. तक कांग्रेस से जुड़े प्रमुख घटनाक्रमों को संक्षेप में कालक्रमानुसार प्रस्तुत किया गया है।
भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 1904 एवं कांग्रेस
➣ लॉर्ड कर्जन के शासनकाल में शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी नियंत्रण बढ़ाने के उद्देश्य से भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 1904 पारित किया गया।
➣ ब्रिटिश सरकार का तर्क था कि विश्वविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार और प्रशासन को अधिक व्यवस्थित बनाना आवश्यक है, जबकि भारतीय नेताओं का मत था कि इसका वास्तविक उद्देश्य विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित करना और शिक्षित वर्ग की राजनीतिक गतिविधियों को सीमित करना था।
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस अधिनियम का विरोध किया। कांग्रेस का मानना था कि इससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तताकम होगी तथा उच्च शिक्षा पर सरकार का अनावश्यक हस्तक्षेप बढ़ जाएगा।
➣ कांग्रेस ने अपने अधिवेशनों में इस अधिनियम की आलोचना करते हुए कहा कि शिक्षा संस्थानों को स्वतंत्र वातावरण में कार्य करने का अवसर मिलना चाहिए।
➣ विश्वविद्यालयों के सीनेट एवं सिंडिकेट जैसे निकायों में सरकारी प्रभाव को मजबूत किया गया तथा सरकार को विश्वविद्यालयों के कार्यों पर अधिक नियंत्रण प्राप्त हो गया। इससे शिक्षित भारतीयों में असंतोष बढ़ा और बड़ी संख्या में विद्यार्थी तथा शिक्षक राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति अधिक जागरूक होने लगे।
➣ कांग्रेस ने इस अधिनियम को लॉर्ड कर्जन की उन नीतियों का हिस्सा माना, जिनका उद्देश्य भारतीयों की राजनीतिक एवं बौद्धिक गतिविधियों पर नियंत्रण स्थापित करना था।
➣ यही कारण था कि जब 1905 ई. में बंगाल विभाजन की घोषणा हुई, तब शिक्षित वर्ग और विद्यार्थी बड़ी संख्या में कांग्रेस तथा स्वदेशी आंदोलन के साथ जुड़ गए।
➣ इस प्रकार भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 1904 ने अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय आंदोलन और कांग्रेस के विस्तार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बंगाल विभाजन एवं स्वदेशी आंदोलन में कांग्रेस (1905)
- 16 अक्टूबर 1905 ई. को लॉर्ड कर्ज़न द्वारा किए गए बंगाल विभाजन का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने विरोध किया।
- 1905 ई. के बनारस अधिवेशन में कांग्रेस ने बंगाल विभाजन के विरोध का समर्थन किया तथा स्वदेशी आंदोलन के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया।
- कांग्रेस ने स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार (Boycott) तथा राष्ट्रीय शिक्षा को बंगाल विभाजन के विरोध के प्रमुख साधनों के रूप में स्वीकार किया।
- 1906 ई. के कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस ने स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा को अपने प्रमुख कार्यक्रमों के रूप में स्वीकार किया।
- दादाभाई नौरोजी ने 1906 ई. के कलकत्ता अधिवेशन की अध्यक्षता की तथा कांग्रेस के मंच से पहली बार ‘स्वराज’ को अपने लक्ष्य के रूप में व्यक्त किया।
- स्वदेशी आंदोलन के दौरान कांग्रेस के भीतर आंदोलन की कार्यप्रणाली को लेकर मतभेद उभरने लगे, जो आगे चलकर कांग्रेस के संगठनात्मक संकट का कारण बने।
सूरत विभाजन (1907)
- 1907 ई. का कांग्रेस अधिवेशन प्रारम्भ में नागपुर में आयोजित किया जाना प्रस्तावित था, लेकिन बाद में इसका स्थान बदलकर सूरत कर दिया गया।
- सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के नरम दल और गरम दल के बीच अध्यक्ष पद तथा आंदोलन की कार्यप्रणाली को लेकर मतभेद खुलकर सामने आए।
- गरम दल लाला लाजपत राय अथवा बाल गंगाधर तिलक को अध्यक्ष बनाना चाहता था, जबकि नरम दल ने डॉ. रासबिहारी घोष को अपना उम्मीदवार बनाया।
- अधिवेशन के दौरान दोनों पक्षों के बीच विवाद बढ़ गया, जिसके कारण कार्यवाही बाधित हो गई और कांग्रेस का विभाजन नरम दल एवं गरम दल में हो गया।
- सूरत विभाजन के बाद 1907 से 1916 ई. तक कांग्रेस की गतिविधियों पर मुख्यतः नरम दल का प्रभाव बना रहा, जबकि गरम दल के अधिकांश नेता कांग्रेस की मुख्य गतिविधियों से अलग हो गए।
- सूरत विभाजन के बाद कांग्रेस ने संगठनात्मक पुनर्गठन की दिशा में कार्य किया तथा 1908 ई. में कांग्रेस का नया संविधान अपनाया गया।
- 1916 ई. के लखनऊ अधिवेशन में कांग्रेस के नरम दल और गरम दल का पुनर्मिलन हुआ तथा संगठन पुनः एकजुट हो गया।
मार्ले–मिंटो सुधार (1909) एवं कांग्रेस
- 1909 ई. के भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 (मार्ले–मिंटो सुधार) के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों का विस्तार किया।
- कांग्रेस ने परिषदों के विस्तार का स्वागत किया, लेकिन अधिनियम को अपर्याप्त बताते हुए अधिक व्यापक संवैधानिक सुधारों की मांग जारी रखी।
- कांग्रेस ने इस अधिनियम के अंतर्गत मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन (Separate Electorate) की व्यवस्था का विरोध किया और इसे भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की शुरुआत माना।
- मार्ले–मिंटो सुधारों के बाद कांग्रेस ने विधान परिषदों में भारतीय प्रतिनिधित्व बढ़ाने तथा निर्वाचित सदस्यों के अधिकारों में वृद्धि की मांग को और अधिक प्रमुखता से उठाया।
- मार्ले–मिंटो सुधारों के बाद कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की राजनीतिक मांगों में स्पष्ट अंतर दिखाई देने लगा, जो आगे चलकर दोनों संगठनों के संबंधों को भी प्रभावित करने लगा।
होमरूल आंदोलन और कांग्रेस
- 1916 ई. में बाल गंगाधर तिलक तथा एनी बेसेंट ने होमरूल लीगों की स्थापना की, जिनका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत भारत को स्वशासन (Home Rule) दिलाना था।
- होमरूल आंदोलन के कारण कांग्रेस की राजनीतिक गतिविधियों में पुनः सक्रियता आई तथा कई वर्षों बाद संगठन को जनसमर्थन प्राप्त होने लगा।
- होमरूल आंदोलन ने कांग्रेस के नरम दल और गरम दल के बीच मतभेद कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- एनी बेसेंट ने होमरूल आंदोलन के माध्यम से कांग्रेस के संगठनात्मक विस्तार तथा राजनीतिक प्रचार को गति प्रदान की।
- 1916 ई. के लखनऊ अधिवेशन में कांग्रेस के नरम और गरम दल का पुनर्मिलन हुआ, जिसमें होमरूल आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
- 1917 ई. में एनी बेसेंट भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष चुनी गईं।
लखनऊ अधिवेशन एवं कांग्रेस (1916)
- दिसम्बर 1916 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन लखनऊ में आयोजित हुआ, जिसकी अध्यक्षता अम्बिका चरण मजूमदार ने की।
- इस अधिवेशन में 1907 ई. के सूरत विभाजन के बाद अलग हुए नरम दल और गरम दल का पुनर्मिलन हुआ।
- लखनऊ अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौता सम्पन्न हुआ।
- कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने संवैधानिक सुधारों तथा भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए संयुक्त रूप से ब्रिटिश सरकार के समक्ष अपनी मांगें प्रस्तुत करने पर सहमति व्यक्त की।
- कांग्रेस ने समझौते के अंतर्गत मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था स्वीकार की।
- लखनऊ अधिवेशन के बाद कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच कुछ समय तक राजनीतिक सहयोग बना रहा।
प्रथम विश्व युद्ध एवं कांग्रेस (1914–1918)
- प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार को सहयोग देने की नीति अपनाई।
- कांग्रेस का विश्वास था कि युद्ध में सहयोग के बदले ब्रिटिश सरकार भारत में संवैधानिक सुधार लागू करेगी तथा भारतीयों को शासन में अधिक भागीदारी प्रदान करेगी।
- 1917 ई. में ब्रिटिश भारत के सचिव एडविन मॉन्टेग्यू ने भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी शासन स्थापित करने की घोषणा की, जिसे मॉन्टेग्यू घोषणा (20 अगस्त 1917) कहा जाता है।
- कांग्रेस ने मॉन्टेग्यू घोषणा का स्वागत किया, किन्तु इसे अपर्याप्त बताते हुए शीघ्र एवं व्यापक संवैधानिक सुधारों की मांग जारी रखी।
- प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार से अपने वायदों को पूरा करने की अपेक्षा की, लेकिन इसके विपरीत दमनकारी नीतियाँ अपनाई गईं, जिसके कारण कांग्रेस का रुख अधिक कठोर होता गया।
रॉलेट एक्ट एवं कांग्रेस (1919)
- 1919 ई. में ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट पारित किया, जिसका भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने कड़ा विरोध किया।
- कांग्रेस ने रॉलेट एक्ट को नागरिक स्वतंत्रताओं का हनन तथा बिना मुकदमे के गिरफ्तारी और नजरबंदी का कानून बताया।
- महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने रॉलेट एक्ट के विरोध में देशव्यापी सत्याग्रह का समर्थन किया।
- 6 अप्रैल 1919 ई. को कांग्रेस के आह्वान पर देश के अनेक भागों में हड़ताल, सभाओं तथा शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों का आयोजन किया गया।
- रॉलेट एक्ट के विरोध के दौरान कई स्थानों पर दमनात्मक कार्रवाई की गई, जिसके परिणामस्वरूप पंजाब सहित अनेक क्षेत्रों में तनाव बढ़ गया।
जलियाँवाला बाग हत्याकांड एवं कांग्रेस
- 13 अप्रैल 1919 ई. को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर ने निहत्थी सभा पर गोलियाँ चलाने का आदेश दिया।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस घटना की कड़ी निंदा की तथा इसे ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीति का उदाहरण बताया।
- कांग्रेस ने घटना की जाँच के लिए अपनी ओर से एक समिति गठित की, जिसमें महात्मा गांधी, चित्तरंजन दास, अब्बास तैयबजी, एम.आर. जयकर तथा के. संथानम प्रमुख सदस्य थे।
- कांग्रेस की जाँच समिति ने अपनी रिपोर्ट में पंजाब में लागू मार्शल लॉ तथा ब्रिटिश प्रशासन की दमनात्मक कार्रवाइयों की आलोचना की।
- जलियाँवाला बाग हत्याकांड के बाद कांग्रेस का ब्रिटिश शासन के प्रति विश्वास और अधिक कमजोर हुआ तथा उसने संवैधानिक विरोध के साथ-साथ व्यापक जनआंदोलनों की दिशा में कदम बढ़ाया।
असहयोग आंदोलन एवं कांग्रेस (1920–22)
- सितम्बर 1920 ई. के कलकत्ता विशेष अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की।
- दिसम्बर 1920 ई. के नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन को औपचारिक रूप से अनुमोदित किया तथा अपने संगठन में व्यापक परिवर्तन किए।
- नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने अपने संगठन का पुनर्गठन भाषायी आधार पर प्रांतीय कांग्रेस समितियों के अनुसार किया।
- कांग्रेस की सदस्यता शुल्क घटाकर चार आना (25 पैसे) कर दिया गया, जिससे अधिक संख्या में सामान्य लोग संगठन से जुड़ सके।
- नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने अपने उद्देश्य में संशोधन करते हुए शांतिपूर्ण एवं वैधानिक साधनों के स्थान पर शांतिपूर्ण एवं वैध साधनों द्वारा स्वराज्य प्राप्ति को प्राथमिकता दी।
- फरवरी 1922 ई. में चौरी-चौरा घटना के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय लिया, जिसका कांग्रेस ने समर्थन किया।
स्वराज पार्टी एवं कांग्रेस (1923)
- फरवरी 1922 ई. में असहयोग आंदोलन की वापसी के बाद कांग्रेस के भीतर आगे की राजनीतिक रणनीति को लेकर मतभेद उत्पन्न हो गए।
- परिणामस्वरूप 1 जनवरी 1923 ई. को चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने स्वराज पार्टी की स्थापना की।
- स्वराज पार्टी के नेताओं ने कांग्रेस की सदस्यता बनाए रखते हुए विधान परिषदों में प्रवेश कर ब्रिटिश शासन की नीतियों का भीतर से विरोध करने की नीति अपनाई।
- कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन (1923) में स्वराजवादियों और अपरिवर्तनवादियों के बीच समझौता हुआ तथा स्वराज पार्टी को कांग्रेस के भीतर कार्य करने की अनुमति दी गई।
- 1923 ई. के केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान परिषदों के चुनावों में स्वराज पार्टी ने भाग लिया और अनेक स्थानों पर उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की।
- 1925 ई. के कानपुर अधिवेशन में कांग्रेस और स्वराज पार्टी के बीच सहयोग और अधिक मजबूत हुआ तथा परिषदों में कार्य करने की नीति को कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया।
साइमन कमीशन एवं कांग्रेस (1928)
- 8 नवम्बर 1927 ई. को ब्रिटिश सरकार ने सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में साइमन कमीशन की नियुक्ति की, जिसमें एक भी भारतीय सदस्य शामिल नहीं था।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने साइमन कमीशन का पूर्ण बहिष्कार करने का निर्णय लिया तथा इसे भारतीयों का अपमान बताया।
- दिसम्बर 1927 ई. के मद्रास अधिवेशन में कांग्रेस ने साइमन कमीशन के बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया।
- 3 फरवरी 1928 ई. को साइमन कमीशन के भारत आगमन पर कांग्रेस के नेतृत्व में देशभर में साइमन गो बैक के नारे के साथ विरोध-प्रदर्शन किए गए।
- साइमन कमीशन के विरोध के दौरान कांग्रेस ने अन्य राजनीतिक दलों के साथ मिलकर भारतीयों द्वारा संविधान का प्रारूप तैयार करने का निर्णय लिया, जिसके परिणामस्वरूप 1928 ई. में नेहरू समिति का गठन किया गया।
नेहरू रिपोर्ट एवं कांग्रेस (1928)
- मई 1928 ई. में सर्वदलीय सम्मेलन ने भारत के लिए संवैधानिक प्रारूप तैयार करने हेतु मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में नेहरू समिति का गठन किया।
- अगस्त 1928 ई. में नेहरू समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसे नेहरू रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने नेहरू रिपोर्ट का समर्थन किया तथा इसे भारत के लिए भारतीयों द्वारा तैयार किया गया पहला प्रमुख संवैधानिक प्रारूप माना।
- नेहरू रिपोर्ट में डोमिनियन स्टेटस (औपनिवेशिक स्वराज्य) की मांग की गई तथा पृथक निर्वाचन का विरोध किया गया।
- नेहरू रिपोर्ट का अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के एक बड़े वर्ग ने विरोध किया, जिसके बाद मुहम्मद अली जिन्ना ने 1929 ई. में अपने चौदह सूत्र प्रस्तुत किए।
- दिसम्बर 1928 ई. के कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस ने निर्णय लिया कि यदि ब्रिटिश सरकार एक वर्ष के भीतर नेहरू रिपोर्ट के आधार पर संवैधानिक सुधार लागू नहीं करती, तो कांग्रेस पूर्ण स्वराज को अपना लक्ष्य बनाएगी।
लाहौर अधिवेशन एवं पूर्ण स्वराज (1929)
- दिसम्बर 1929 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन लाहौर में आयोजित हुआ, जिसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की।
- इस अधिवेशन में कांग्रेस ने ‘पूर्ण स्वराज को अपना आधिकारिक लक्ष्य घोषित किया।
- कांग्रेस ने निर्णय लिया कि यदि ब्रिटिश सरकार भारत को पूर्ण स्वतंत्रता नहीं देती, तो देशव्यापी सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारम्भ किया जाएगा।
- अधिवेशन में 26 जनवरी 1930 ई. को पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस मनाने का निर्णय लिया गया।
- 31 दिसम्बर 1929 ई. की मध्यरात्रि को रावी नदी के तट पर जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराया।
- 26 जनवरी 1930 ई. को कांग्रेस के आह्वान पर पूरे देश में पूर्ण स्वराज दिवस मनाया गया तथा स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा ली गई।
सविनय अवज्ञा आंदोलन एवं कांग्रेस (1930–34)
- मार्च 1930 ई. में महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारम्भ किया।
- 12 मार्च 1930 ई. को गांधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी यात्रा प्रारम्भ की, जो 6 अप्रैल 1930 ई. को दांडी पहुँचकर नमक कानून तोड़ने के साथ सम्पन्न हुई।
- कांग्रेस ने नमक कानून तोड़ने, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, कर न देने तथा अन्य औपनिवेशिक कानूनों की सविनय अवज्ञा का आह्वान किया।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान कांग्रेस के अनेक प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार किया गया तथा संगठन की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाए गए।
- 5 मार्च 1931 ई. को गांधी–इरविन समझौते के बाद कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर दिया।
- गांधी–इरविन समझौते के अनुसार कांग्रेस ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में भाग लेने पर सहमति व्यक्त की।
- 1932 ई. में आंदोलन पुनः प्रारम्भ किया गया, लेकिन व्यापक दमन तथा गिरफ्तारियों के कारण इसकी गति कमजोर पड़ गई।
- 1934 ई. में महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन समाप्त करने की घोषणा की।
भारत शासन अधिनियम, 1935 एवं कांग्रेस
- भारत शासन अधिनियम, 1935 ब्रिटिश काल का सबसे विस्तृत संवैधानिक अधिनियम था, जिस पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने मिश्रित प्रतिक्रिया व्यक्त की।
- कांग्रेस ने अधिनियम में प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ (All India Federation) की योजना तथा गवर्नर एवं गवर्नर जनरल की विशेष शक्तियों की आलोचना की।
- कांग्रेस ने अधिनियम को पूर्ण उत्तरदायी शासन की दिशा में अपर्याप्त बताया, क्योंकि वास्तविक सत्ता अभी भी ब्रिटिश सरकार के हाथों में बनी हुई थी।
- आलोचना के बावजूद कांग्रेस ने 1937 ई. के प्रांतीय चुनावों में भाग लेने का निर्णय लिया, क्योंकि इससे प्रांतीय स्तर पर उत्तरदायी सरकारें बनाने का अवसर प्राप्त हुआ।
- कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि चुनावों में भाग लेना भारत शासन अधिनियम, 1935 को स्वीकार करना नहीं, बल्कि उपलब्ध संवैधानिक अवसरों का राजनीतिक उपयोग करना है।
1937 के प्रांतीय चुनाव एवं कांग्रेस मंत्रिमंडल
- भारत शासन अधिनियम, 1935 के अंतर्गत 1937 ई. में प्रांतीय विधानसभाओं के चुनाव आयोजित किए गए, जिनमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भाग लिया।
- कांग्रेस ने 11 में से 8 प्रांतों में बहुमत अथवा सबसे बड़े दल के रूप में सफलता प्राप्त की।
- प्रारम्भ में कांग्रेस ने गवर्नरों की विशेष शक्तियों के कारण मंत्रिमंडल गठन से इंकार कर दिया।
- वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा गवर्नरों के विवेकाधिकार के सीमित प्रयोग का आश्वासन दिए जाने के बाद कांग्रेस ने जुलाई 1937 ई. से विभिन्न प्रांतों में अपने मंत्रिमंडलों का गठन किया।
- कांग्रेस ने मद्रास, संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत एवं बरार, उड़ीसा, बॉम्बे, असम तथा बाद में उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में अपनी सरकारें बनाई।
द्वितीय विश्व युद्ध एवं कांग्रेस
- 3 सितम्बर 1939 ई. को वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने भारतीय नेताओं से परामर्श किए बिना भारत को द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल करने की घोषणा कर दी।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस निर्णय का विरोध किया तथा स्पष्ट किया कि भारत की सहमति के बिना उसे युद्ध में शामिल करना अनुचित है।
- कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार से युद्ध के उद्देश्य स्पष्ट करने तथा भारत को पूर्ण उत्तरदायी शासन अथवा स्वतंत्रता का आश्वासन देने की मांग की।
- ब्रिटिश सरकार द्वारा संतोषजनक आश्वासन न दिए जाने पर अक्टूबर–नवम्बर 1939 ई. में कांग्रेस के सभी प्रांतीय मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दे दिया।
- कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफे के बाद 22 दिसम्बर 1939 ई. को अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने “मुक्ति दिवस (Day of Deliverance)” मनाया, जिसका कांग्रेस ने विरोध किया।
- द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के संबंध लगातार तनावपूर्ण बने रहे, जिसके परिणामस्वरूप आगे अगस्त प्रस्ताव (1940), क्रिप्स मिशन (1942) तथा भारत छोड़ो आंदोलन (1942) जैसी घटनाएँ सामने आईं।
अगस्त प्रस्ताव एवं कांग्रेस (1940)
- 8 अगस्त 1940 ई. को वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने भारतीय नेताओं के समक्ष अगस्त प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
- अगस्त प्रस्ताव में युद्ध के बाद भारत के लिए नया संविधान बनाने तथा भारतीयों को संवैधानिक प्रक्रिया में अधिक भागीदारी देने का आश्वासन दिया गया।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, क्योंकि इसमें पूर्ण उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार अथवा तत्काल सत्ता हस्तांतरण का कोई प्रावधान नहीं था।
- कांग्रेस का मत था कि भारत की जनता की सहमति के बिना ब्रिटिश सरकार को युद्ध में भारतीय संसाधनों का उपयोग करने का अधिकार नहीं है।
- अगस्त प्रस्ताव अस्वीकार किए जाने के बाद कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के बीच मतभेद और बढ़ गए, जिसके परिणामस्वरूप आगे व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940–41) तथा क्रिप्स मिशन (1942) जैसी घटनाएँ हुईं।
क्रिप्स मिशन एवं कांग्रेस (1942)
- मार्च 1942 ई. में ब्रिटिश सरकार ने सर स्टैफर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में क्रिप्स मिशन को भारत भेजा।
- क्रिप्स मिशन का उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय नेताओं का सहयोग प्राप्त करना तथा युद्धोपरांत भारत की संवैधानिक व्यवस्था का प्रस्ताव प्रस्तुत करना था।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया।
- कांग्रेस का मत था कि प्रस्तावों में तत्काल उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार की व्यवस्था नहीं थी तथा पूर्ण स्वतंत्रता का स्पष्ट आश्वासन भी नहीं दिया गया था।
- महात्मा गांधी ने क्रिप्स प्रस्ताव को “ढहते हुए बैंक का उत्तर-तिथि चेक कहा।
- क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अधिक निर्णायक आंदोलन प्रारम्भ करने का निर्णय लिया, जिसके परिणामस्वरूप भारत छोड़ो आंदोलन (1942) प्रारम्भ हुआ।
भारत छोड़ो आंदोलन एवं कांग्रेस (1942)
- 8 अगस्त 1942 ई. को बम्बई के ग्वालिया टैंक मैदान (वर्तमान अगस्त क्रांति मैदान) में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (AICC) की बैठक में भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया गया।
- इस अधिवेशन की अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने की।
- महात्मा गांधी ने इसी अवसर पर “करो या मरो (Do or Die)” का प्रसिद्ध नारा दिया।
- 9 अगस्त 1942 ई. को महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना आज़ाद सहित कांग्रेस के अधिकांश शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया तथा कांग्रेस को अवैध संगठन घोषित कर दिया गया।
- कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी के बावजूद अनेक स्थानों पर आंदोलन स्वतः जारी रहा तथा कई क्षेत्रों में स्थानीय एवं समानांतर राष्ट्रीय सरकारों की स्थापना हुई।
- ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए व्यापक गिरफ्तारियाँ, प्रेस पर नियंत्रण तथा दमनात्मक कार्रवाई की।
वेवल योजना एवं शिमला सम्मेलन (1945)
- 14 जून 1945 ई. को वायसराय लॉर्ड वेवल ने वेवल योजना (Wavell Plan) की घोषणा की।
- वेवल योजना पर विचार-विमर्श के लिए 25 जून से 14 जुलाई 1945 ई. तक शिमला सम्मेलन आयोजित किया गया।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने शिमला सम्मेलन में भाग लिया तथा अपने प्रतिनिधि के रूप में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के नेतृत्व में हिस्सा लिया।
- कांग्रेस का मत था कि वह सभी भारतीयों का प्रतिनिधित्व करती है, इसलिए उसे सभी समुदायों के प्रतिनिधि नामित करने का अधिकार होना चाहिए।
- अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि होने का दावा किया तथा सभी मुस्लिम सदस्यों के नामांकन का अधिकार अपने पास रखने की मांग की।
- कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर सहमति न बनने के कारण शिमला सम्मेलन असफल रहा।
1945–46 के चुनाव एवं कांग्रेस
- 1945–46 ई. में केंद्रीय विधानमंडल तथा प्रांतीय विधानसभाओं के चुनाव आयोजित किए गए।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में व्यापक सफलता प्राप्त की तथा अधिकांश प्रांतों में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी।
- कांग्रेस ने केंद्रीय विधानमंडल की सामान्य सीटों पर अधिकांश स्थानों पर विजय प्राप्त की।
- प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस ने हिन्दू-बहुल अधिकांश प्रांतों में सरकार बनाने योग्य बहुमत अथवा सबसे बड़े दल का स्थान प्राप्त किया।
- इसी चुनाव में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने मुस्लिम आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में भारी सफलता प्राप्त कर स्वयं को भारतीय मुसलमानों का प्रमुख राजनीतिक प्रतिनिधि सिद्ध किया।
- 1945–46 के चुनावों के परिणामों ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को भारत के दो प्रमुख राजनीतिक संगठनों के रूप में स्थापित किया तथा आगे की संवैधानिक वार्ताओं में दोनों की भूमिका निर्णायक हो गई।
कैबिनेट मिशन योजना एवं कांग्रेस (1946)
- मार्च 1946 ई. में ब्रिटिश सरकार ने लॉर्ड पैथिक लॉरेंस, सर स्टैफर्ड क्रिप्स तथा ए. वी. अलेक्ज़ेंडर को भारत भेजा, जिसे कैबिनेट मिशन कहा जाता है।
- कैबिनेट मिशन का उद्देश्य भारतीय नेताओं के सहयोग से सत्ता हस्तांतरण की रूपरेखा तैयार करना तथा भारत के लिए संविधान निर्माण की व्यवस्था करना था।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने संविधान सभा के गठन के प्रस्ताव का समर्थन किया, लेकिन प्रांतीय समूहों की व्यवस्था पर आपत्ति व्यक्त की।
- कांग्रेस ने भारत की एकता एवं अखंडता बनाए रखने पर बल दिया तथा किसी भी प्रकार के विभाजन का विरोध किया।
- कांग्रेस ने संविधान सभा के चुनावों में भाग लिया तथा उसमें सबसे बड़े दल के रूप में उभरी।
- कैबिनेट मिशन योजना को लेकर कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए, जिसके कारण योजना अंततः सफल नहीं हो सकी।
अंतरिम सरकार एवं कांग्रेस (1946)
- 2 सितम्बर 1946 ई. को वायसराय लॉर्ड वेवल के अधीन अंतरिम सरकार का गठन किया गया।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अंतरिम सरकार में भाग लिया तथा पंडित जवाहरलाल नेहरू इसके उपाध्यक्ष बने, जो व्यवहारतः सरकार के प्रमुख थे।
- प्रारम्भ में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने अंतरिम सरकार का बहिष्कार किया, लेकिन अक्टूबर 1946 ई. में उसने भी इसमें भाग लेना स्वीकार कर लिया।
- अंतरिम सरकार में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच प्रशासनिक तथा राजनीतिक मतभेद लगातार बने रहे, जिससे सरकार का कार्य सुचारु रूप से नहीं चल सका।
- अंतरिम सरकार ने ब्रिटिश शासन से भारतीय नेतृत्व को प्रशासनिक सत्ता हस्तांतरित करने की प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त किया।
माउंटबेटन योजना एवं कांग्रेस (1947)
- 24 मार्च 1947 ई. को लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के अंतिम वायसराय के रूप में पदभार ग्रहण किया।
- 3 जून 1947 ई. को माउंटबेटन योजना (3 June Plan) की घोषणा की गई, जिसमें भारत के विभाजन तथा सत्ता हस्तांतरण की रूपरेखा प्रस्तुत की गई।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने व्यापक विचार-विमर्श के बाद माउंटबेटन योजना को स्वीकार कर लिया।
- कांग्रेस के प्रमुख नेताओं जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल तथा आचार्य जे. बी. कृपलानी ने परिस्थितियों को देखते हुए विभाजन को अनिच्छापूर्वक स्वीकार किया।
- कांग्रेस का मत था कि सत्ता हस्तांतरण में अनावश्यक विलंब से देश में राजनीतिक अस्थिरता और सांप्रदायिक हिंसा बढ़ सकती है।
- माउंटबेटन योजना के आधार पर भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 पारित किया गया, जिसके अंतर्गत 15 अगस्त 1947 ई. को भारत स्वतंत्र हुआ।
स्वतंत्रता एवं विभाजन (1947)
- 15 अगस्त 1947 ई. को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के अंतर्गत भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र बना।
- स्वतंत्रता के साथ ही भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान एक पृथक राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया।
- पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष तथा लॉर्ड माउंटबेटन स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल बने।
- स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व करने वाले संगठन से स्वतंत्र भारत के शासन का दायित्व संभालने वाले प्रमुख राजनीतिक दल के रूप में परिवर्तित हो गई।
स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
➣ 15 अगस्त 1947 ई. को भारत की स्वतंत्रता के साथ ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की भूमिका में मूलभूत परिवर्तन आया। स्वतंत्रता से पहले कांग्रेस एक राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व करने वाला संगठन थी, जबकि स्वतंत्रता के बाद वह लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करने वाला एक प्रमुख राजनीतिक दल बन गई।
➣ स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद महात्मा गांधी का मत था कि कांग्रेस ने अपना मूल उद्देश्य — भारत को स्वतंत्र कराना — पूरा कर लिया है। इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को उसके तत्कालीन स्वरूप में भंग कर दिया जाए तथा उसके स्थान पर लोक सेवक संघ की स्थापना की जाए। गांधीजी चाहते थे कि यह संगठन चुनावी राजनीति से दूर रहकर ग्राम स्वराज, सामाजिक सुधार, शिक्षा, स्वच्छता, अस्पृश्यता उन्मूलन तथा रचनात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का कार्य करे। किन्तु कांग्रेस के अधिकांश वरिष्ठ नेताओं ने गांधीजी के इस सुझाव को स्वीकार नहीं किया। उनका मत था कि स्वतंत्र भारत के सामने संविधान लागू करने, रियासतों के एकीकरण, प्रशासनिक पुनर्गठन, शरणार्थी पुनर्वास तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने जैसी अनेक चुनौतियाँ थीं। इसलिए कांग्रेस का एक संगठित राजनीतिक दल के रूप में बने रहना आवश्यक माना गया।
➣ 1951–52 ई. में स्वतंत्र भारत के प्रथम आम चुनाव हुए, जिनमें कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया और केंद्र सहित अधिकांश राज्यों में अपनी सरकारें बनाईं। इसके बाद कई दशकों तक कांग्रेस भारतीय राजनीति की प्रमुख शक्ति बनी रही। जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पी. वी. नरसिम्हा राव, मनमोहन सिंह सहित अनेक प्रधानमंत्रियों ने कांग्रेस के नेतृत्व में देश का शासन किया।
➣ समय के साथ कांग्रेस के भीतर कई संगठनात्मक परिवर्तन हुए तथा विभिन्न अवसरों पर दल में विभाजन भी हुए। इनमें 1969 ई. का विभाजन, 1978 ई. में कांग्रेस (आई) का गठन तथा बाद के वर्षों में विभिन्न क्षेत्रीय दलों का उदय विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे।
➣ 1989 ई. के बाद भारतीय राजनीति में गठबंधन युग का विस्तार हुआ, जिससे कांग्रेस का दीर्घकालीन एकदलीय प्रभुत्व धीरे-धीरे कम होने लगा। इसके बावजूद कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में बनी रही।
➣ यद्यपि अब उसका स्वरूप स्वतंत्रता आंदोलन के संगठन का न होकर एक लोकतांत्रिक राजनीतिक दल का है, फिर भी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उसके ऐतिहासिक योगदान तथा आधुनिक भारत के निर्माण में उसकी भूमिका के कारण भारतीय इतिहास और राजनीति में उसका विशेष स्थान बना हुआ है।
कांग्रेस के बारे में किसने क्या कहा?
| व्यक्ति | कथन |
|---|---|
| लॉर्ड कर्जन | कांग्रेस एक “गंदी चीज (Dirty Thing) और देशद्रोही संगठन” है। |
| लाला लाजपत राय | “कांग्रेस लॉर्ड डफ़रिन के दिमाग की उपज है।” (1916 ई. में Young India में व्यक्त विचार) |
| लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक | “यदि हम वर्ष में एक बार मेढ़क की तरह टर्राएँ, तो हमें कुछ भी नहीं मिलेगा।” |
| लाला लाजपत राय | कांग्रेस का अधिवेशन “शिक्षित भारतीयों का वार्षिक राष्ट्रीय मेला” है। |
| अश्विनी कुमार दत्त | कांग्रेस का अधिवेशन “तीन दिनों का तमाशा” है। |
| बिपिन चन्द्र पाल | कांग्रेस एक “याचना संस्था” है। |
| बाल गंगाधर तिलक | उदारवादी नेताओं की नीति को “राजनीतिक भिक्षावृत्ति (Political Mendicancy)” कहा। |
| महात्मा गांधी | स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस को भंग कर “लोक सेवक संघ” बनाने का सुझाव दिया। |
कांग्रेस की प्रमुख प्रारम्भिक माँगें (1885–1903)
| प्रमुख माँग | वर्ष |
|---|---|
| भारत परिषद को समाप्त किया जाए। | 1885 |
| भारतीय सिविल सेवा (ICS) की परीक्षा भारत एवं इंग्लैंड में एक साथ आयोजित की जाए। | 1885 |
| कार्यपालिका को न्यायपालिका से पृथक किया जाए। | 1886 |
| भू-राजस्व व्यवस्था में सुधार किया जाए। | 1889 |
| कपास पर लगाए गए उत्पादन शुल्क को समाप्त किया जाए। | 1894 |
| बेगार की प्रथा समाप्त की जाए। | 1893 |
| दमनकारी कानूनों (विशेषतः रेगुलेशन एवं राजद्रोह संबंधी कानूनों) को समाप्त किया जाए। | 1897 |
| लॉर्ड कर्ज़न के विश्वविद्यालय विधेयक का विरोध। | 1903 |
| ऑफिशियल सीक्रेट्स बिल का विरोध। | 1903 |
अन्य सम्बंधित महत्वपूर्ण तथ्य
कांग्रेस से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
➣ दादाभाई नौरोजी, जिन्हें ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया कहा जाता है, 1886, 1893 तथा 1906 में कुल तीन बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने।
➣ 1940 से 1946 तक कांग्रेस का कोई वार्षिक अधिवेशन आयोजित नहीं हुआ। परिणामस्वरूप मौलाना अबुल कलाम आज़ाद लगभग छह वर्ष तक कांग्रेस के अध्यक्ष बने रहे।
➣ कांग्रेस का सर्वाधिक 10 बार अधिवेशन कलकत्ता (कोलकाता) में आयोजित हुआ।
➣ 1919 के अमृतसर अधिवेशन में बाल गंगाधर तिलक ने अंतिम बार भाग लिया। अगले वर्ष (1920) उनका निधन हो गया।
➣ 1921 के अहमदाबाद अधिवेशन में चित्तरंजन दास अध्यक्ष निर्वाचित हुए, लेकिन जेल में होने के कारण हकीम अजमल खाँ ने कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में अधिवेशन की अध्यक्षता की।
➣ 1924 के बेलगाम अधिवेशन की अध्यक्षता महात्मा गांधी ने की। यह कांग्रेस का एकमात्र अधिवेशन है जिसकी अध्यक्षता गांधीजी ने की थी।
➣ 1932 (दिल्ली) एवं 1933 (कलकत्ता) के अधिवेशनों में मदन मोहन मालवीय अध्यक्ष निर्वाचित हुए, लेकिन जेल में होने के कारण क्रमशः अमृतलाल विठ्ठलदास ठक्कर (ठक्कर बापा) तथा नेली सेनगुप्ता ने कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।
➣ 1936 का लखनऊ अधिवेशन तथा 1937 का फैजपुर अधिवेशन दोनों की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की।
➣ 1937 का फैजपुर अधिवेशन कांग्रेस का पहला अधिवेशन था, जो किसी ग्रामीण क्षेत्र में आयोजित किया गया।
➣ 1938 के हरिपुरा अधिवेशन में राष्ट्रीय योजना समिति के गठन का निर्णय लिया गया। बाद में इसके अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू बनाए गए।
➣ 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन में सुभाष चन्द्र बोस ने पट्टाभि सीतारमैया को पराजित कर पुनः अध्यक्ष पद जीता, लेकिन बाद में इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की।
➣ 1923 के दिल्ली विशेष अधिवेशन में 35 वर्ष की आयु में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष बने।
➣ 1887 के मद्रास अधिवेशन में पहली बार कांग्रेस का अधिवेशन किसी भारतीय भाषा में संबोधित किया गया।
➣ 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी ने पहली बार कांग्रेस के मंच से “स्वराज” को लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया।
कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष
| विशेषता | व्यक्ति | अधिवेशन |
|---|---|---|
| प्रथम अध्यक्ष | व्योमेश चन्द्र बनर्जी | 1885, बम्बई |
| प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष | बदरुद्दीन तैयबजी | 1887, मद्रास |
| प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष | जार्ज यूल (George Yule) | 1888, इलाहाबाद |
| प्रथम महिला अध्यक्ष | एनी बेसेन्ट | 1917, कलकत्ता |
| प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष | सरोजिनी नायडू | 1925, कानपुर |
| प्रथम कार्यकारी अध्यक्ष | हकीम अजमल खाँ | 1921, अहमदाबाद |
| सबसे युवा अध्यक्ष | मौलाना अबुल कलाम आज़ाद | 1923, दिल्ली विशेष अधिवेशन |
| भारतीय मूल की प्रथम विदेशी महिला अध्यक्ष | नेली सेनगुप्ता | 1933, कलकत्ता |
कांग्रेस के अधिवेशन में हुए कुछ प्रमुख घटनाएं
| वर्ष | स्थान | अध्यक्ष | विवरण |
|---|---|---|---|
| 1885 | बम्बई | डब्ल्यू. सी. बनर्जी (व्योमेश चन्द्र बनर्जी) |
▪ प्रथम अधिवेशन, 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। ▪ नमक कर समाप्त करने की मांग। ▪ सुरेन्द्रनाथ बनर्जी सम्मिलित नहीं हुए। ▪ कुछ इतिहासकारों के अनुसार दादाभाई नौरोजी के सुझाव पर भारतीय राष्ट्रीय संघ का नाम बदलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) रखा गया। |
| 1886 | कलकत्ता | दादाभाई नौरोजी |
▪ प्रथम पारसी अध्यक्ष। ▪ प्रतिनिधियों की संख्या बढ़कर 436 हुई। |
| 1887 | मद्रास | बदरुद्दीन तैयबजी |
▪ प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष। ▪ पहली बार सभी वर्गों एवं समुदायों से कांग्रेस में शामिल होने का आह्वान। ▪ महादेव गोविन्द रानाडे द्वारा इंडियन नेशनल सोशल कॉन्फ्रेंस का आयोजन। ▪ पहली बार अधिवेशन में देशी भाषा का प्रयोग किया गया। |
| 1888 | इलाहाबाद | जार्ज यूल (George Yule) |
▪ प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष। ▪ लाला लाजपत राय पहली बार कांग्रेस अधिवेशन में सम्मिलित हुए। ▪ कांग्रेस का संविधान तैयार करने के लिए समिति गठित की गई। |
| 1889 | बम्बई | सर विलियम वेडरबर्न |
▪ पहली बार महिलाओं ने कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया। ▪ 21 वर्ष आयु के मताधिकार की मांग का समर्थन किया गया। |
| 1890 | कलकत्ता | फिरोजशाह मेहता | — |
| 1891 | नागपुर | पी. आनंद चार्लू (P. Ananda Charlu) |
▪ अध्यक्ष ने कांग्रेस को “राष्ट्रीय संस्था” (National Institution) कहा। ▪ कांग्रेस के संगठन को अधिक व्यवस्थित बनाने पर बल दिया। |
| 1892 | इलाहाबाद | डब्ल्यू. सी. बनर्जी | ▪ अधिवेशन इंग्लैंड में आयोजित करने का प्रस्ताव रखा गया, किन्तु इसे स्वीकार नहीं किया गया। |
| 1893 | लाहौर | दादाभाई नौरोजी |
▪ प्रतिवाद (Protest) शब्द का प्रयोग प्रमुखता से किया गया। ▪ भारतीय सिविल सेवा (ICS) परीक्षा भारत में आयोजित करने की मांग दोहराई गई। |
| 1894 | मद्रास | अल्फ्रेड वेब | ▪ प्रथम आयरिश (Irish) अध्यक्ष। |
| 1895 | पूना | सुरेन्द्रनाथ बनर्जी | — |
| 1896 | कलकत्ता | रहीमतुल्ला एम. सयानी | ▪ पहली बार रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा वन्दे मातरम् का गायन किया गया। |
| 1897 | अमरावती | सी. शंकरन नायर | — |
| 1898 | मद्रास | आनन्द मोहन बोस | — |
| 1899 | लखनऊ | रमेश चन्द्र दत्त | ▪ भू-राजस्व व्यवस्था में सुधार एवं स्थायी बंदोबस्त जैसी नीतियों पर बल दिया। |
| 1900 | लाहौर | एन. जी. चन्दावरकर | — |
| 1901 | कलकत्ता | दिनशॉ एडुलजी वाचा | ▪ दक्षिणाचरण सेन द्वारा वन्दे मातरम् का गायन किया गया। |
| 1902 | अहमदाबाद | सुरेन्द्रनाथ बनर्जी | — |
| 1903 | मद्रास | लालमोहन घोष | ▪ लॉर्ड कर्ज़न की नीतियों की आलोचना की गई। |
| 1904 | बम्बई | सर हेनरी कॉटन | ▪ बंगाल विभाजन के प्रस्ताव का विरोध व्यक्त किया गया। |
| 1905 | बनारस | गोपाल कृष्ण गोखले |
▪ बंगाल विभाजन का विरोध। ▪ पहली बार स्वशासन की मांग प्रमुख रूप से उठाई गई। ▪ लाला लाजपत राय ने कांग्रेस के मंच से अधिक सक्रिय आंदोलन अपनाने पर बल दिया। |
| 1906 | कलकत्ता | दादाभाई नौरोजी |
▪ कांग्रेस के मंच से पहली बार “स्वराज” को लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया। ▪ स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार एवं राष्ट्रीय शिक्षा संबंधी प्रस्ताव स्वीकार किए गए। |
| 1907 | सूरत | डॉ. रास बिहारी घोष |
▪ कांग्रेस का नरम दल एवं गरम दल में विभाजन। ▪ अध्यक्ष पद के विवाद के कारण अधिवेशन बीच में ही समाप्त हो गया। |
| 1908 | मद्रास | डॉ. रास बिहारी घोष |
▪ कांग्रेस का अधिवेशन सूरत विभाजन के बाद नरम दल के नेतृत्व में आयोजित हुआ। ▪ स्वराज प्राप्ति तथा अनिवार्य शिक्षा पर बल दिया गया। |
| 1909 | लाहौर | सर विलियम वेडरबर्न | ▪ कांग्रेस का रजत जयंती अधिवेशन। |
| 1910 | इलाहाबाद | सर विलियम वेडरबर्न | — |
| 1911 | कलकत्ता | पं. बिशन नारायण धर | ▪ रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित “जन-गण-मन” पहली बार गाया गया। |
| 1912 | बांकीपुर (पटना) | आर. एन. मधोलकर | ▪ ए. ओ. ह्यूम को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। |
| 1913 | कराची | सैय्यद मोहम्मद बहादुर | ▪ पहली बार कांग्रेस ने स्पष्ट रूप से स्वशासन की मांग दोहराई। |
| 1914 | मद्रास | भूपेन्द्रनाथ बसु | ▪ प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार को सहयोग देने का प्रस्ताव पारित किया गया। |
| 1915 | बम्बई | सर सत्येन्द्र प्रसन्न सिन्हा |
▪ कांग्रेस के किसी अधिवेशन की अध्यक्षता करने वाले प्रथम भारतीय लॉर्ड। ▪ लॉर्ड विलिंग्डन अधिवेशन में उपस्थित हुए। |
| 1916 | लखनऊ | अम्बिका चरण मजूमदार |
▪ नरम दल एवं गरम दल का पुनर्मिलन। ▪ कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौता। ▪ कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था स्वीकार की। |
| 1917 | कलकत्ता | एनी बेसेन्ट |
▪ कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष। ▪ प्रथम विदेशी (आयरिश मूल की) महिला अध्यक्ष। |
| 1918 (विशेष) | बम्बई | सैय्यद हसन इमाम | ▪ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों पर विचार। |
| 1918 (वार्षिक) | दिल्ली | मदन मोहन मालवीय | ▪ प्रथम विश्व युद्ध के बाद संवैधानिक सुधारों पर चर्चा। |
| 1918 | दिल्ली | मदन मोहन मालवीय |
▪ प्रथम विश्व युद्ध के बाद संवैधानिक सुधारों पर चर्चा। ▪ हिन्दी के प्रयोग एवं राष्ट्रीय शिक्षा पर बल दिया गया। |
| 1919 | अमृतसर | पं. मोतीलाल नेहरू |
▪ जलियाँवाला बाग हत्याकांड की निंदा। ▪ रॉलेट एक्ट की आलोचना। ▪ खिलाफत आंदोलन को समर्थन। |
| 1920 (विशेष) | कलकत्ता | लाला लाजपत राय | ▪ असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पारित। |
| 1920 (वार्षिक) | नागपुर | सी. विजय राघवाचारियर |
▪ असहयोग आंदोलन का अनुमोदन। ▪ तिलक स्वराज्य कोष की स्थापना। ▪ कांग्रेस के संविधान में संशोधन। ▪ कांग्रेस का पुनर्गठन भाषायी आधार पर किया गया। ▪ सदस्यता शुल्क चार आना निर्धारित किया गया। |
| 1921 | अहमदाबाद | हकीम अजमल खाँ (कार्यकारी) |
▪ निर्वाचित अध्यक्ष चित्तरंजन दास जेल में होने के कारण कार्यकारी अध्यक्ष बने। ▪ पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। ▪ पहली बारपूर्ण स्वराज का प्रस्ताव रखा गया (मौलाना हसरत मोहानी द्वारा), किन्तु अस्वीकार हुआ। |
| 1922 | गया | चित्तरंजन दास |
▪ परिषदों में प्रवेश के प्रश्न पर मतभेद। ▪ बाद में स्वराज पार्टी के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ। |
| 1923 (विशेष) | दिल्ली | मौलाना अबुल कलाम आज़ाद |
▪ 35 वर्ष की आयु में कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष बने। ▪ स्वराजवादियों और अपरिवर्तनवादियों के बीच समझौते का मार्ग प्रशस्त। |
| 1923 (वार्षिक) | काकीनाडा | मौलाना मोहम्मद अली | ▪ स्वराज पार्टी को परिषदों के चुनाव में भाग लेने की अनुमति। |
| 1924 | बेलगाम | महात्मा गांधी | ▪ कांग्रेस का एकमात्र अधिवेशन जिसकी अध्यक्षता महात्मा गांधी ने की। |
| 1925 | कानपुर | सरोजिनी नायडू |
▪ प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष। ▪ कांग्रेस के कार्यों में हिन्दी के प्रयोग पर बल दिया गया। |
| 1926 | गुवाहाटी | एस. श्रीनिवास अयंगार | ▪ कांग्रेस स्वयंसेवकों के लिए खादी के उपयोग पर बल दिया गया। |
| 1927 | मद्रास | डॉ. एम. ए. अंसारी |
▪ साइमन कमीशन के बहिष्कार का प्रस्ताव। ▪ पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को पहली बार गंभीरता से स्वीकार करने की दिशा में कदम। |
| 1928 | कलकत्ता | पं. मोतीलाल नेहरू |
▪ नेहरू रिपोर्ट पर विचार। ▪ ब्रिटिश सरकार को एक वर्ष का अंतिम अवसर देने का निर्णय। |
| 1929 | लाहौर | पं. जवाहरलाल नेहरू |
▪ पूर्ण स्वराज को कांग्रेस का लक्ष्य घोषित किया गया। ▪ 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाने का निर्णय। ▪ सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारम्भ करने का अधिकार कार्यसमिति को दिया गया। |
| 1931 | कराची | सरदार वल्लभभाई पटेल |
▪ गांधी–इरविन समझौते का अनुमोदन। ▪ मौलिक अधिकार एवं राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम संबंधी ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित। |
| 1932 | दिल्ली | अमृतलाल विठ्ठलदास ठक्कर (ठक्कर बापा) (कार्यकारी) | ▪ निर्वाचित अध्यक्ष मदन मोहन मालवीय जेल में होने के कारण कार्यकारी अध्यक्ष ने अधिवेशन की अध्यक्षता की। |
| 1933 | कलकत्ता | नेली सेनगुप्ता |
▪ भारतीय मूल की प्रथम विदेशी महिला अध्यक्ष। ▪ निर्वाचित अध्यक्ष मदन मोहन मालवीय जेल में होने के कारण कार्यकारी अध्यक्ष बनीं। |
| 1934 | बम्बई | डॉ. राजेन्द्र प्रसाद | ▪ कांग्रेस ने विधानमंडलों में भागीदारी की नीति पर पुनर्विचार किया। |
| 1936 | लखनऊ | पं. जवाहरलाल नेहरू | ▪ कांग्रेस के आर्थिक कार्यक्रम में समाजवादी विचारों पर विशेष बल दिया गया। |
| 1937 | फैजपुर | पं. जवाहरलाल नेहरू | ▪ पहली बार कांग्रेस का अधिवेशन किसी ग्रामीण क्षेत्र में आयोजित हुआ। |
| 1938 | हरिपुरा | सुभाषचन्द्र बोस |
▪ राष्ट्रीय योजना समिति (National Planning Committee) के गठन का निर्णय लिया गया। ▪ समिति के अध्यक्ष पं. जवाहरलाल नेहरू बनाए गए। |
| 1939 | त्रिपुरी | सुभाषचन्द्र बोस |
▪ अध्यक्ष पद के लिए पहली बार गंभीर चुनावी मुकाबला हुआ। ▪ पट्टाभि सीतारमैया को पराजित कर पुनः अध्यक्ष चुने गए। ▪ बाद में त्यागपत्र दिया, जिसके पश्चात डॉ. राजेन्द्र प्रसाद अध्यक्ष बने। |
| 1940 | रामगढ़ | मौलाना अबुल कलाम आज़ाद |
▪ पूर्ण स्वतंत्रता की मांग दोहराई गई। ▪ ब्रिटिश सरकार पर राष्ट्रीय सरकार के गठन हेतु दबाव बढ़ाया गया। |
| 1946 | मेरठ | आचार्य जे. बी. कृपलानी |
▪ स्वतंत्रता एवं सत्ता हस्तांतरण की परिस्थितियों पर विचार। ▪ संविधान सभा के कार्यों का समर्थन। |
| 1948 | जयपुर | डॉ. पट्टाभि सीतारमैया |
▪ स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन। ▪ स्वतंत्र भारत में कांग्रेस के संगठनात्मक पुनर्गठन पर बल दिया गया। |
| 1950 | नासिक | पुरुषोत्तम दास टंडन | ▪ कांग्रेस संगठन में भाषा एवं संगठनात्मक प्रश्नों पर व्यापक चर्चा। |
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस : प्रमुख घटनाओं की समयरेखा (Timeline)
| वर्ष | प्रमुख घटना |
|---|---|
| 1885 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना एवं प्रथम अधिवेशन (बम्बई) |
| 1887 | बदरुद्दीन तैयबजी प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष बने। |
| 1888 | जार्ज यूल कांग्रेस के प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष बने। |
| 1905 | बंगाल विभाजन का विरोध एवं स्वदेशी आंदोलन का समर्थन। |
| 1906 | कलकत्ता अधिवेशन में स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार एवं राष्ट्रीय शिक्षा का प्रस्ताव। |
| 1907 | सूरत विभाजन : कांग्रेस नरम दल एवं गरम दल में विभाजित। |
| 1909 | मार्ले-मिंटो सुधारों का विरोध। |
| 1916 | लखनऊ अधिवेशन, नरम-गरम दल का पुनर्मिलन एवं लखनऊ समझौता। |
| 1917 | एनी बेसेन्ट कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष बनीं। |
| 1919 | रॉलेट एक्ट एवं जलियाँवाला बाग हत्याकांड का विरोध। |
| 1920 | असहयोग आंदोलन का अनुमोदन (नागपुर अधिवेशन)। |
| 1923 | स्वराज पार्टी का गठन। |
| 1927 | साइमन कमीशन के बहिष्कार का निर्णय। |
| 1928 | नेहरू रिपोर्ट प्रस्तुत। |
| 1929 | लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज को कांग्रेस का लक्ष्य घोषित किया गया। |
| 1930 | सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारम्भ। |
| 1931 | कराची अधिवेशन में गांधी-इरविन समझौते का अनुमोदन एवं मौलिक अधिकारों का प्रस्ताव। |
| 1935 | भारत शासन अधिनियम, 1935 पर कांग्रेस की आलोचनात्मक प्रतिक्रिया। |
| 1937 | प्रांतीय चुनावों में विजय एवं आठ प्रांतों में कांग्रेस मंत्रिमंडलों का गठन। |
| 1939 | द्वितीय विश्व युद्ध के विरोध में कांग्रेस मंत्रिमंडलों का इस्तीफा। |
| 1940 | अगस्त प्रस्ताव अस्वीकार। |
| 1942 | भारत छोड़ो आंदोलन एवं “करो या मरो” का आह्वान। |
| 1945–46 | चुनावों में कांग्रेस की सफलता एवं अंतरिम सरकार में भागीदारी। |
| 1946 | कैबिनेट मिशन योजना एवं संविधान सभा में कांग्रेस का बहुमत। |
| 1947 | माउंटबेटन योजना स्वीकार; भारत स्वतंत्र हुआ। |
| 1951–52 | प्रथम आम चुनाव में कांग्रेस की विजय एवं पहली निर्वाचित सरकार का गठन। |
| 1969 | कांग्रेस का विभाजन। |
| 1978 | कांग्रेस (आई) का गठन। |
| 2004 | संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी। |
| 2014 | लोकसभा चुनाव में कांग्रेस विपक्ष की प्रमुख पार्टी बनी। |
| वर्तमान | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारत की प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों में से एक है। |
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