इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (1930): सूर्य सेन, चटगाँव शस्त्रागार कांड एवं बंगाल का क्रांतिकारी आंदोलन

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इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (IRA) : परिचय

इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (Indian Republican Army – IRA) ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सक्रिय एक क्रांतिकारी संगठन था, जिसका गठन 1930 ई. में सूर्य सेन (मास्टर दा) के नेतृत्व में चटगाँव (वर्तमान बांग्लादेश) में किया गया।

➣ इंडियन रिपब्लिकन आर्मी का नाम विशेष रूप से 18 अप्रैल 1930 ई. के चटगाँव शस्त्रागार कांड के कारण प्रसिद्ध हुआ। इस अभियान में क्रांतिकारियों ने चटगाँव में अस्थायी नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया।

➣ यद्यपि यह प्रयास लंबे समय तक सफल नहीं रह सका, फिर भी इसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में क्रांतिकारी गतिविधियों को नई दिशा दी।

पृष्ठभूमि

1920 के दशक के उत्तरार्ध में बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन को नई परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा था। असहयोग आंदोलन (1922) की समाप्ति के बाद अनेक युवाओं में निराशा उत्पन्न हुई और एक वर्ग ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अधिक सक्रिय तथा प्रत्यक्ष संघर्ष की आवश्यकता महसूस की।

➣ बंगाल में पहले से ही अनुशीलन समिति और युगांतर जैसी क्रांतिकारी संस्थाओं की मजबूत परंपरा मौजूद थी। इन संगठनों ने युवाओं के बीच गुप्त संगठन, शारीरिक प्रशिक्षण, अनुशासन और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी विचारों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

➣ इस समय ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारी गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए गिरफ्तारियाँ, निगरानी और दमन बढ़ा दिया था। इसके बावजूद बंगाल के युवाओं में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अधिक संगठित और साहसिक कार्रवाई की भावना मजबूत होती गई।

चटगाँव में भी राष्ट्रवादी गतिविधियाँ धीरे-धीरे संगठित रूप ले रही थीं। स्थानीय युवाओं और क्रांतिकारियों के बीच यह विचार विकसित हुआ कि ब्रिटिश प्रशासन की शक्ति को सीधे चुनौती देने के लिए केवल व्यक्तिगत कार्रवाइयों के बजाय संगठित और योजनाबद्ध अभियान की आवश्यकता है।

➣ इस पृष्ठभूमि में सूर्य सेन के नेतृत्व में चटगाँव के क्रांतिकारी युवाओं का एक संगठित समूह तैयार हुआ। इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन की प्रशासनिक और संचार व्यवस्था पर सुनियोजित प्रहार करके क्रांतिकारी आंदोलन को नई दिशा देना था।

इंडियन रिपब्लिकन आर्मी का गठन (1930)

1930 ई. में सूर्य सेन (मास्टर दा) के नेतृत्व में इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (Indian Republican Army – Chittagong Branch) का गठन किया गया।

➣ संगठन के नाम में प्रयुक्त Republican Army शब्द इस विचार को व्यक्त करता था कि भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कर एक स्वतंत्र गणराज्य (Republic) के रूप में स्थापित किया जाए। वहीं Chittagong Branch शब्द यह स्पष्ट करता है कि यह संगठन चटगाँव क्षेत्र में कार्यरत क्रांतिकारी दल था।

➣ इस संगठन का नाम आयरलैंड के Irish Republican Army (IRA) से प्रेरित था। उस समय आयरलैंड में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध चल रहे संगठित संघर्ष ने भारतीय क्रांतिकारियों को प्रभावित किया था।

➣ हालांकि इंडियन रिपब्लिकन आर्मी और Irish Republican Army दो अलग-अलग संगठन थे तथा उनके कार्यक्षेत्र और परिस्थितियाँ भी भिन्न थीं।

संगठन का आधिकारिक नाम Indian Republican Army, Chittagong Branch था। किन्तु इसे प्रायः Indian Republican Army (IRA) के नाम से जाना जाता है।

प्रमुख सदस्य

➣ इंडियन रिपब्लिकन आर्मी में अधिकांश सदस्य छात्र, शिक्षक तथा युवा क्रांतिकारी थे। संगठन ने अपने सदस्यों के बीच कार्यों का विभाजन किया और एक सुनियोजित अभियान की तैयारी प्रारम्भ की।

व्यक्तित्व भूमिका
सूर्य सेन (मास्टर दा) संगठन के संस्थापक एवं प्रमुख नेता।
अनन्त सिंह चटगाँव अभियान के प्रमुख क्रांतिकारी सदस्य।
गणेश घोष अभियान की योजना और क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका।
लोकनाथ बल क्रांतिकारी दल के प्रमुख सदस्य।
अंबिका चक्रवर्ती संगठन के सक्रिय सदस्य एवं अभियान के सहभागी।
निर्मल सेन क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका।
तारकेश्वर दस्तीदार सूर्य सेन के सहयोगी एवं प्रमुख क्रांतिकारी।
प्रीतिलता वाद्देदार महिला क्रांतिकारी, जिन्होंने बाद की क्रांतिकारी गतिविधियों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
कल्पना दत्त महिला क्रांतिकारी एवं संगठन की सक्रिय सदस्य।

इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (IRA) के उद्देश्य

➣ इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (IRA) का उद्देश्य केवल ब्रिटिश शासन का विरोध करना नहीं था, बल्कि भारत को विदेशी शासन से मुक्त कर एक स्वतंत्र गणराज्य (Republic) की स्थापना करना था।

➣ संगठन का मानना था कि संगठित क्रांतिकारी कार्रवाई के माध्यम से ब्रिटिश प्रशासन को चुनौती देकर भारतीयों में स्वतंत्रता के प्रति विश्वास और उत्साह उत्पन्न किया जा सकता है।

  • ब्रिटिश शासन को सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों के माध्यम से चुनौती देना।
  • भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कर एक स्वतंत्र गणराज्य की स्थापना करना।
  • सरकारी शस्त्रागारों, संचार व्यवस्था तथा प्रशासनिक तंत्र को अस्थायी रूप से बाधित कर ब्रिटिश शासन की शक्ति को कमजोर करना।
  • भारतीय युवाओं को संगठित कर उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करना।
  • क्रांतिकारी संगठनों के बीच समन्वय स्थापित कर सशस्त्र संघर्ष को संगठित रूप देना।
  • ऐसी क्रांतिकारी कार्रवाई करना, जिससे पूरे देश में स्वतंत्रता आंदोलन को नई प्रेरणा मिले।

चटगाँव शस्त्रागार कांड (1930)

➣ इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (चटगाँव शाखा) के गठन के बाद सूर्य सेन ने ब्रिटिश प्रशासन के विरुद्ध एक संगठित अभियान की योजना बनाई। इस अभियान का उद्देश्य चटगाँव के प्रमुख सरकारी प्रतिष्ठानों पर एक साथ कार्रवाई कर ब्रिटिश प्रशासन की सैन्य एवं संचार व्यवस्था को बाधित करना था।

➣ इस अभियान के लिए चटगाँव का चयन किया गया क्योंकि वहाँ पुलिस शस्त्रागार, सहायक सेना का शस्त्रागार, टेलीफोन एवं टेलीग्राफ कार्यालय तथा रेलवे संचार व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण सरकारी प्रतिष्ठान स्थित थे।

➣ सूर्य सेन ने अपने विश्वसनीय साथियों के बीच अलग-अलग कार्यों का विभाजन किया। प्रत्येक दल को एक निश्चित लक्ष्य सौंपा गया और सभी कार्रवाइयों को एक ही समय पर पूरा करने की योजना बनाई गई।


18 अप्रैल 1930 ई. (गुड फ्राइडे) की रात्रि लगभग 10 बजे सूर्य सेन (मास्टर दा) के नेतृत्व में इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (चटगाँव शाखा) के लगभग 65 क्रांतिकारियों ने अपनी योजना के अनुसार अभियान प्रारम्भ किया।

➣ अभियान को सफल बनाने के लिए क्रांतिकारियों को कई दलों में विभाजित किया गया था तथा प्रत्येक दल को अलग-अलग सरकारी प्रतिष्ठानों की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

➣ योजना के अनुसार गणेश घोष के नेतृत्व में एक दल ने दामपाड़ा स्थित पुलिस शस्त्रागार पर कब्ज़ा कर लिया, जबकि लोकनाथ बल के नेतृत्व में दूसरे दल ने ऑक्ज़िलियरी फोर्स के शस्त्रागार पर अधिकार कर लिया।

➣ इन दोनों शस्त्रागारों पर अधिकार करना अभियान का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य था, क्योंकि क्रांतिकारी बड़ी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद प्राप्त करना चाहते थे।

➣ क्रांतिकारी शस्त्रागारों पर अधिकार करने में तो सफल रहे, लेकिन वहाँ उन्हें अपेक्षित मात्रा में गोला-बारूद नहीं मिला। अधिकांश कारतूस पहले ही सुरक्षित स्थान पर रख दिए गए थे।

➣ परिणामस्वरूप उनके पास हथियार तो थे, परन्तु उन्हें प्रभावी ढंग से उपयोग करने के लिए पर्याप्त गोला-बारूद उपलब्ध नहीं था। इसे अभियान की सबसे बड़ी कमी माना जाता है।

➣ शस्त्रागारों पर कार्रवाई के साथ-साथ अन्य दलों ने टेलीफोन एवं टेलीग्राफ कार्यालयों की तारें काट दीं, जिससे चटगाँव का संपर्क अन्य प्रशासनिक केंद्रों से अस्थायी रूप से टूट गया।

➣ इसके अतिरिक्त रेलवे संचार व्यवस्था को भी बाधित किया गया, ताकि ब्रिटिश प्रशासन तत्काल अतिरिक्त पुलिस और सेना न बुला सके।

➣ अभियान की योजना में यूरोपियन क्लब पर भी कार्रवाई शामिल थी, क्योंकि वहाँ अनेक ब्रिटिश सरकारी एवं सैन्य अधिकारी एकत्रित होते थे। किन्तु गुड फ्राइडे होने के कारण उस दिन क्लब में अपेक्षित संख्या में अधिकारी उपस्थित नहीं थे, जिससे योजना का यह भाग सफल नहीं हो सका।

➣ क्रांतिकारियों ने सरकारी प्रतिष्ठानों पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराया। इसके पश्चात सूर्य सेन ने एक अस्थायी क्रांतिकारी सरकार की घोषणा की। यह घोषणा मुख्यतः इस अभियान की सफलता का प्रतीक थी।

➣ यद्यपि वे अपने सभी उद्देश्यों को पूरा नहीं कर सके, फिर भी यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे साहसिक एवं सुव्यवस्थित क्रांतिकारी अभियानों में से एक माना जाता है।

➣ पर्याप्त गोला-बारूद उपलब्ध न होने तथा ब्रिटिश सेना के सक्रिय होने के बाद सूर्य सेन ने अपने साथियों के साथ अपनी निर्धारित योजना के अनुसार चटगाँव छोड़ दिया और जलालाबाद पहाड़ी की ओर प्रस्थान किया।

जलालाबाद पहाड़ी का संघर्ष

18 अप्रैल 1930 ई. की कार्रवाई के बाद सूर्य सेन के नेतृत्व में क्रांतिकारी दल चटगाँव छोड़कर जलालाबाद पहाड़ी पर पहुँच गया। यहाँ उन्होंने पुनर्गठन कर आगे की रणनीति बनाने का प्रयास किया।

➣ चटगाँव शस्त्रागार कांड की सूचना मिलते ही ब्रिटिश सरकार ने पुलिस और सेना की अतिरिक्त टुकड़ियाँ भेजीं।

➣ कई दिनों तक क्रांतिकारियों की खोज के बाद 22 अप्रैल 1930 ई. को जलालाबाद पहाड़ी पर दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। ब्रिटिश सेना के पास आधुनिक हथियार और पर्याप्त गोला-बारूद था, जबकि क्रांतिकारियों के पास हथियार सीमित थे।

➣ इस मुठभेड़ में इंडियन रिपब्लिकन आर्मी के अनेक क्रांतिकारी शहीद हुए, जबकि ब्रिटिश सेना को भी जनहानि उठानी पड़ी। दोनों पक्षों के बीच हुए इस संघर्ष ने ब्रिटिश प्रशासन को यह स्पष्ट कर दिया कि चटगाँव का अभियान केवल एक आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित क्रांतिकारी कार्रवाई थी।

➣ संघर्ष के बाद सूर्य सेन ने शेष साथियों को छोटे-छोटे दलों में विभाजित कर अलग-अलग स्थानों पर चले जाने का निर्देश दिया। इसके बाद अधिकांश क्रांतिकारी भूमिगत हो गए और अगले कई वर्षों तक ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपनी गतिविधियाँ जारी रखते रहे।

बाद की घटनाएँ

➣ जलालाबाद पहाड़ी के संघर्ष के बाद ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी के लिए व्यापक अभियान चलाया, लेकिन सूर्य सेन और उनके कई सहयोगी लगभग तीन वर्षों तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहे। इस दौरान उन्होंने गुप्त रूप से क्रांतिकारी गतिविधियाँ जारी रखीं।

➣ इस आंदोलन में प्रीतिलता वाद्देदार और कल्पना दत्त जैसी महिला क्रांतिकारियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 24 सितंबर 1932 ई. को प्रीतिलता वाद्देदार के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने चटगाँव के पहारतली यूरोपियन क्लब पर हमला किया। अभियान के दौरान गिरफ्तारी से बचने के लिए प्रीतिलता ने पोटैशियम सायनाइड खाकर आत्मबलिदान कर दिया।

➣ दूसरी ओर, कल्पना दत्त भी चटगाँव के क्रांतिकारी आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ी रहीं। वे कई अभियानों में शामिल हुईं, लेकिन बाद में ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर ली गईं। न्यायालय ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जिसे बाद में कम कर दिया गया।

16 फरवरी 1933 ई. को सूर्य सेन को एक मुखबिर की सूचना के आधार पर ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उन पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई गई।

12 जनवरी 1934 ई. को सूर्य सेन तथा उनके सहयोगी तारकेश्वर दस्तीदार को चटगाँव जेल में फाँसी दे दी गई। इससे पहले ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा सूर्य सेन को अमानवीय शारीरिक यातनाएँ दिए जाने का भी उल्लेख मिलता है।

➣ फाँसी के बाद उनके शव परिजनों को नहीं सौंपे गए, प्रचलित ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार ब्रिटिश प्रशासन ने उन्हें गुप्त रूप से बंगाल की खाड़ी में फेंक दिया, ताकि उनकी समाधि स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का केंद्र न बन सके।

➣ यद्यपि इंडियन रिपब्लिकन आर्मी लंबे समय तक सक्रिय नहीं रह सकी, फिर भी चटगाँव शस्त्रागार कांड और उससे जुड़े क्रांतिकारियों के साहस ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई प्रेरणा दी।

प्रमुख सदस्य

व्यक्तित्व भूमिका
सूर्य सेन (मास्टर दा) इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (चटगाँव शाखा) के संस्थापक एवं चटगाँव शस्त्रागार कांड के प्रमुख नेता।
अनन्त सिंह चटगाँव शस्त्रागार कांड के प्रमुख क्रांतिकारी एवं अभियान के आयोजकों में शामिल।
गणेश घोष दामपाड़ा स्थित पुलिस शस्त्रागार पर कब्ज़ा करने वाले दल के नेता।
लोकनाथ बल ऑक्ज़िलियरी फोर्स शस्त्रागार पर कार्रवाई का नेतृत्व किया।
अंबिका चक्रवर्ती चटगाँव अभियान के सक्रिय क्रांतिकारी सदस्य।
निर्मल सेन इंडियन रिपब्लिकन आर्मी के प्रमुख क्रांतिकारी सदस्य।
प्रीतिलता वाद्देदार 1932 में पहारतली यूरोपियन क्लब पर हमले का नेतृत्व किया।
कल्पना दत्त चटगाँव आंदोलन की प्रमुख महिला क्रांतिकारी, बाद में गिरफ्तार हुईं।
तारकेश्वर दस्तीदार सूर्य सेन के सहयोगी, 12 जनवरी 1934 को सूर्य सेन के साथ फाँसी दी गई।

भ्रम-बिंदु

इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (IRA) और आयरिश रिपब्लिकन आर्मी (Irish Republican Army) अलग-अलग संगठन थे। भारतीय संगठन ने केवल उसके नाम और संघर्ष से प्रेरणा ली थी।

इंडियन रिपब्लिकन आर्मी का नेतृत्व सूर्य सेन (मास्टर दा) ने किया था, न कि भगत सिंह या चंद्रशेखर आज़ाद ने।

चटगाँव शस्त्रागार कांड 18 अप्रैल 1930 ई. को हुआ था, जबकि जलालाबाद पहाड़ी का संघर्ष 22 अप्रैल 1930 ई. को हुआ।

इंडियन रिपब्लिकन आर्मी और हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) अलग-अलग संगठन थे।

इंडियन रिपब्लिकन आर्मी का मुख्य कार्यक्षेत्र चटगाँव (वर्तमान बांग्लादेश) था।

प्रीतिलता वाद्देदार ने 1932 ई. में पहारतली यूरोपियन क्लब पर हमला किया था, न कि चटगाँव शस्त्रागार कांड में प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया था।

कल्पना दत्त चटगाँव आंदोलन की प्रमुख महिला क्रांतिकारी थीं, लेकिन उन्होंने पहारतली यूरोपियन क्लब पर हमले का नेतृत्व नहीं किया था।

चटगाँव शस्त्रागार पर क्रांतिकारियों ने कब्ज़ा तो कर लिया था, लेकिन पर्याप्त गोला-बारूद न मिलने से उनकी योजना पूरी तरह सफल नहीं हो सकी।

सूर्य सेन को 16 फरवरी 1933 ई. को गिरफ्तार किया गया तथा 12 जनवरी 1934 ई. को फाँसी दी गई।

इंडियन रिपब्लिकन आर्मी का आधिकारिक नाम Indian Republican Army, Chittagong Branch था।

क्रांतिकारी आंदोलन का अंतिम संगठित चरण

➣ अनेक इतिहासकार चटगाँव शस्त्रागार कांड को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का अंतिम प्रमुख संगठित क्रांतिकारी अभियान मानते हैं। सूर्य सेन की गिरफ्तारी तथा उनकी फाँसी के बाद इंडियन रिपब्लिकन आर्मी का संगठनात्मक स्वरूप लगभग समाप्त हो गया।

➣ ➣इसके साथ ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में संगठित क्रांतिकारी संगठनों का एक महत्वपूर्ण चरण भी लगभग समाप्त हो गया।

➣ हालाँकि बाद में भी विभिन्न स्थानों पर क्रांतिकारी गतिविधियाँ और व्यक्तिगत साहसिक कार्रवाइयाँ होती रहीं, किन्तु वे इंडियन रिपब्लिकन आर्मी, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) अथवा गदर पार्टी जैसे संगठित क्रांतिकारी संगठनों के रूप में नहीं थीं।

➣ ➣1930 के दशक के मध्य से स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र धीरे-धीरे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के जन आंदोलनों, संवैधानिक सुधारों, प्रांतीय स्वशासन, मुस्लिम लीग की राजनीति तथा आगे चलकर सुभाष चंद्र बोस और आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) जैसी नई राजनीतिक एवं सैन्य धाराओं की ओर स्थानांतरित हो गया।

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