भारत माता सोसाइटी (1907): पंजाब कृषक आंदोलन और पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन

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भारत माता सोसाइटी

भारत माता सोसाइटी 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में पंजाब में विकसित हुई एक महत्वपूर्ण गुप्त क्रांतिकारी राष्ट्रवादी संस्था थी। इसका उदय पंजाब में बढ़ती राष्ट्रवादी और ब्रिटिश-विरोधी राजनीतिक गतिविधियों के बीच हुआ।

➣ इसका प्रमुख केंद्र लाहौर था। संगठन को अंजुमन-ए-मुहिब्बान-ए-वतन के नाम से भी जाना जाता था। इसके गठन और गतिविधियों में सरदार अजीत सिंह की प्रमुख भूमिका रही।

➣ भारत माता सोसाइटी का उदय ऐसे समय में हुआ जब पंजाब में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राजनीतिक चेतना तेजी से विकसित हो रही थी। इसी वातावरण में संगठन ने राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं को एक मंच प्रदान किया और आगे चलकर पंजाब के प्रारंभिक क्रांतिकारी राष्ट्रवाद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ इस प्रकार भारत माता सोसाइटी को पंजाब में प्रारंभिक 20वीं शताब्दी के क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाता है। इसका विशेष महत्व आगे चलकर 1907 के पंजाब कृषक आंदोलन और उससे जुड़ी राष्ट्रवादी गतिविधियों में दिखाई देता है।

पंजाब में उग्र राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि

1905 के बंग-भंग और उसके बाद चले स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव पंजाब तक भी पहुँचा। स्वदेशी, बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा जैसे विचारों ने शिक्षित युवाओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं में ब्रिटिश शासन के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण को मजबूत किया। पंजाब में यह राष्ट्रवादी चेतना धीरे-धीरे औपनिवेशिक शासन के प्रत्यक्ष विरोध की दिशा में बढ़ने लगी।

➣ पंजाब में पहले से सक्रिय आर्य समाज, राष्ट्रवादी प्रेस और राजनीतिक सभाओं ने भी इस वातावरण को प्रभावित किया। लाला लाजपत राय, अजीत सिंह, सूफी अंबा प्रसाद जैसे नेताओं और लेखकों ने विभिन्न माध्यमों से ब्रिटिश नीतियों की आलोचना तथा राजनीतिक जागरूकता फैलाने का कार्य किया। इस दौर में राष्ट्रवादी गतिविधियाँ केवल शहरों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि ग्रामीण पंजाब के प्रश्नों से भी जुड़ने लगीं।

कृषक असंतोष और राष्ट्रवादी राजनीति का मेल

➣ भारत माता सोसाइटी के उदय की सबसे महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि पंजाब का कृषक असंतोष था। औपनिवेशिक सरकार की भूमि एवं सिंचाई संबंधी नीतियों ने किसानों में यह आशंका पैदा की कि उनके पारंपरिक भूमि-अधिकार और आर्थिक हित कमजोर हो रहे हैं।

➣ विशेष रूप से पंजाब कॉलोनाइजेशन एक्ट, 1906 और बारी दोआब नहर से संबंधित नीतियों के विरुद्ध असंतोष तेजी से बढ़ा।

सरदार अजीत सिंह ने इन कृषक समस्याओं को व्यापक राजनीतिक प्रश्न से जोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों में सभाओं और भाषणों के माध्यम से किसानों को औपनिवेशिक नीतियों के विरुद्ध संगठित किया। इस प्रकार कृषक असंतोष धीरे-धीरे ब्रिटिश-विरोधी राजनीतिक आंदोलन का रूप लेने लगा।

➣ इसी वातावरण में भारत माता सोसाइटी जैसी क्रांतिकारी संस्था के लिए आधार तैयार हुआ। इसका महत्व इस बात में था कि पंजाब में पहली बार कृषक असंतोष, राष्ट्रवादी प्रचार और गुप्त क्रांतिकारी संगठन एक-दूसरे से जुड़ने लगे। आगे चलकर 1907 का कृषक आंदोलन इस प्रक्रिया को व्यापक जन-आंदोलन में बदलने वाला महत्वपूर्ण चरण बना।

भारत माता सोसाइटी की स्थापना (1907)

स्थापना में अजीत सिंह की भूमिका

➣ भारत माता सोसाइटी के गठन में सरदार अजीत सिंह की केंद्रीय भूमिका थी। 1906–07 के पंजाब कृषक आंदोलन के दौरान वे ब्रिटिश सरकार की भूमि एवं सिंचाई संबंधी नीतियों के प्रबल विरोधी के रूप में उभर चुके थे।

➣ प्रारंभ में संगठन का स्वरूप छोटा और अपेक्षाकृत गोपनीय था। इसका उद्देश्य ऐसे राष्ट्रवादियों को एकत्र करना था जो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सक्रिय राजनीतिक प्रचार और प्रतिरोध के लिए तैयार हों।

➣ बाद में इसमें लाला चंद फलक, घसीता राम, नंद किशोर मेहता, लाला राम सरन दास, पिंडी दास आदि जैसे कार्यकर्ता और राष्ट्रवादी जुड़े।

➣ भारत माता सोसाइटी की गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र उसका प्रचार-कार्य था। संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने सभाओं, भाषणों, पुस्तिकाओं और राष्ट्रवादी साहित्य के माध्यम से ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना की। इस प्रकार संगठन ने शिक्षित राष्ट्रवादी वर्ग और सामान्य जनता, विशेषकर किसानों के बीच राजनीतिक संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया।

➣ कुछ समकालीन विवरणों के अनुसार संगठन की बैठकों के लिए भारत माता नाम से जुड़े स्थान और कार्यालय का उपयोग किया जाता था तथा बाद में संगठन के नाम से राष्ट्रवादी साहित्य के प्रकाशन और वितरण की व्यवस्था भी विकसित हुई। इससे भारत माता सोसाइटी की गतिविधियाँ केवल गुप्त बैठकों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि राजनीतिक प्रचार और जन-जागरण तक फैल गईं।

कृषक आंदोलन से संगठन का संबंध

➣ भारत माता सोसाइटी का गठन 1907 के पंजाब के किसान आंदोलन से जुड़ा हुआ था। उस समय पंजाब के किसानों में पंजाब कॉलोनाइजेशन बिल, बढ़े हुए भूमि-राजस्व और सिंचाई की महंगी दरों को लेकर पहले से ही नाराज़गी थी।

➣ अजीत सिंह और उनके साथियों ने किसानों की इस नाराज़गी को एक बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदलने की कोशिश की। पंजाब के विभिन्न शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाली सभाओं में अजीत सिंह जैसे नेताओं ने किसानों की तत्काल समस्याओं के साथ-साथ विदेशी शासन की समाप्ति और देश की स्वतंत्रता का प्रश्न उठाया।

➣ इस प्रकार भारत माता सोसाइटी की स्थापना का महत्व केवल एक नए क्रांतिकारी संगठन के निर्माण में नहीं था। इसका वास्तविक महत्व यह था कि इसने पंजाब के कृषक असंतोष को संगठित राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी राजनीति से जोड़ने का प्रयास किया।

➣ यही प्रक्रिया आगे चलकर 1907 के व्यापक पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन के राजनीतिक वातावरण को मजबूत करने वाली बनी।

भारत माता सोसाइटी की स्थापना (1907)

1907 में पंजाब में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों के बीच सरदार अजीत सिंह और उनके सहयोगियों ने भारत माता सोसाइटी का गठन किया। इसका प्रारंभिक स्वरूप एक छोटे और अपेक्षाकृत गोपनीय राष्ट्रवादी संगठन का था।

➣ संगठन के गठन में अजीत सिंह की प्रमुख भूमिका थी। उनके साथ जुड़े राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं ने एक ऐसे संगठन की आवश्यकता महसूस की जो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सक्रिय राजनीतिक कार्यों के लिए राष्ट्रवादी युवाओं और कार्यकर्ताओं को संगठित कर सके।

➣ भारत माता सोसाइटी का गठन उस समय हुआ जब पंजाब में राजनीतिक असंतोष तेजी से बढ़ रहा था। इसलिए इसका निर्माण किसी लंबे संगठनात्मक विकास के बाद नहीं, बल्कि 1907 के राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में तेजी से उभरती राष्ट्रवादी गतिविधियों के बीच हुआ।

➣ प्रारंभिक चरण में संगठन का काम अपेक्षाकृत गोपनीय तरीके से किया जाता था। इसकी बैठकों और संगठनात्मक गतिविधियों को सरकारी निगरानी से बचाने का प्रयास किया जाता था। बाद में इसकी गतिविधियाँ सार्वजनिक राजनीतिक जीवन में भी दिखाई देने लगीं।

भारत माता सोसाइटी के प्रमुख नेता

➣ भारत माता सोसाइटी में पंजाब के कई राष्ट्रवादी नेता, लेखक, पत्रकार और क्रांतिकारी कार्यकर्ता जुड़े हुए थे। इनका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लोगों में जागरूकता पैदा करना और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष को मजबूत करना था। संगठन का प्रमुख केंद्र लाहौर था।

➣ संगठन में सरदार अजीत सिंह की प्रमुख भूमिका थी। उनके साथ सूफी अंबा प्रसाद, घसीता राम, लाला चंद फलक, नंद किशोर मेहता, लाला राम सरन दास, पिंडी दास आदि कार्यकर्ता जुड़े थे। इन लोगों ने अलग-अलग तरीकों से संगठन के प्रचार, जनसभाओं और राजनीतिक गतिविधियों में सहयोग किया।

सरदार अजीत सिंह

सरदार अजीत सिंह भारत माता सोसाइटी के प्रमुख नेताओं में थे। वे प्रभावशाली वक्ता थे और पंजाब के किसानों की समस्याओं को लेकर सक्रिय रहते थे। उन्होंने किसानों की समस्याओं को केवल स्थानीय समस्या न मानकर उन्हें ब्रिटिश शासन के विरोध से जोड़ने का प्रयास किया।

1907 के पंजाब कृषक आंदोलन में अजीत सिंह की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही। उन्होंने अनेक स्थानों पर सभाएँ कीं और किसानों को ब्रिटिश सरकार की भूमि एवं सिंचाई संबंधी नीतियों के विरुद्ध संगठित किया।

सूफी अंबा प्रसाद

सूफी अंबा प्रसाद लेखक, पत्रकार और राष्ट्रवादी कार्यकर्ता थे। उन्होंने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना की और लोगों में देशभक्ति की भावना पैदा करने का प्रयास किया।

➣ भारत माता सोसाइटी की गतिविधियों में उनका मुख्य योगदान लेखन और प्रचार के क्षेत्र में था। वे अजीत सिंह के प्रमुख सहयोगियों में शामिल थे।

किशन सिंह और घसीता राम

सरदार किशन सिंह भी पंजाब के प्रारंभिक राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं में शामिल थे। उन्होंने अजीत सिंह और अन्य नेताओं के साथ मिलकर किसानों को संगठित करने में सहयोग किया। बाद में वे भगत सिंह के पिता के रूप में भी प्रसिद्ध हुए।

महाशय घसीता राम ने भी 1907 के किसान आंदोलन में अजीत सिंह और किशन सिंह के साथ काम किया। उन्होंने किसानों के बीच जाकर ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध राजनीतिक जागरूकता फैलाने में सहायता की।

लाला चंद फलक और अन्य कार्यकर्ता

लाला चंद फलक राष्ट्रवादी कवि और प्रचारक थे। उन्होंने कविता और साहित्य के माध्यम से लोगों में देशभक्ति की भावना जगाने का काम किया। उस समय राष्ट्रवादी साहित्य और कविताएँ लोगों तक राजनीतिक विचार पहुँचाने का महत्वपूर्ण माध्यम थीं।

नंद किशोर मेहता, लाला राम सरन दास, पिंडी दास और अन्य कार्यकर्ता भी भारत माता सोसाइटी की गतिविधियों से जुड़े थे। इन लोगों ने संगठन के प्रचार, सभाओं और अन्य राजनीतिक गतिविधियों में सहयोग किया।

प्रमुख नेताओं की भूमिका

नेता/कार्यकर्ता मुख्य भूमिका
सरदार अजीत सिंह प्रमुख नेता; किसानों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संगठित करना।
सूफी अंबा प्रसाद लेखन, पत्रकारिता और राष्ट्रवादी प्रचार।
सरदार किशन सिंह किसान आंदोलन और राष्ट्रवादी गतिविधियों में सहयोग।
महाशय घसीता राम किसानों के बीच राजनीतिक जागरूकता फैलाना।
लाला चंद फलक राष्ट्रवादी कविता और प्रचार।
नंद किशोर मेहता संगठन की गतिविधियों में सहयोग।
लाला राम सरन दास राष्ट्रवादी एवं क्रांतिकारी गतिविधियों में सहयोग।
पिंडी दास संगठन की राजनीतिक गतिविधियों में सहयोग।

➣ इस प्रकार भारत माता सोसाइटी में अलग-अलग क्षेत्रों के कार्यकर्ता जुड़े थे। अजीत सिंह ने नेतृत्व किया, सूफी अंबा प्रसाद ने लेखन और प्रचार में योगदान दिया तथा अन्य कार्यकर्ताओं ने किसानों और आम लोगों के बीच संगठन की गतिविधियों को आगे बढ़ाया।

भारत माता सोसाइटी के उद्देश्य

➣ भारत माता सोसाइटी का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लोगों में राजनीतिक जागरूकता पैदा करना और उन्हें स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने के लिए तैयार करना था। संगठन का मानना था कि विदेशी शासन को समाप्त करने के लिए केवल कुछ नेताओं का प्रयास पर्याप्त नहीं है, बल्कि आम जनता को भी राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ना जरूरी है।

➣ सोसाइटी के प्रमुख उद्देश्यों में ब्रिटिश शासन का विरोध, देशभक्ति की भावना फैलाना और लोगों को राजनीतिक रूप से संगठित करना शामिल था। इसके नेता ब्रिटिश सरकार की नीतियों को जनता के सामने रखते और उनके विरुद्ध जनमत तैयार करने का प्रयास करते थे।

➣ संगठन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य युवाओं को राष्ट्रवादी आंदोलन से जोड़ना था। अजीत सिंह और उनके सहयोगी युवाओं में देशभक्ति की भावना पैदा करने तथा उन्हें देश की स्वतंत्रता के लिए सक्रिय होने के लिए प्रेरित करते थे। आगे चलकर संगठन से जुड़े कई युवा क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर आकर्षित हुए।

➣ भारत माता सोसाइटी का एक प्रमुख उद्देश्य किसानों और आम जनता की समस्याओं को ब्रिटिश शासन के विरोध से जोड़ना भी था। पंजाब में भूमि, लगान और नहर संबंधी नीतियों से पैदा हुए असंतोष को नेताओं ने व्यापक राजनीतिक आंदोलन का रूप देने का प्रयास किया।

➣ संगठन का उद्देश्य केवल किसी एक सरकारी कानून का विरोध करना नहीं था। इसके पीछे विदेशी शासन से मुक्ति और स्वराज्य की भावना को मजबूत करने का व्यापक विचार था। इसी कारण भारत माता सोसाइटी से जुड़े नेता किसानों की समस्याओं के साथ-साथ लोगों को देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने का संदेश भी देते थे।

भारत माता सोसाइटी का प्रचार एवं साहित्य

➣ भारत माता सोसाइटी ने अपने विचारों को लोगों तक पहुँचाने के लिए समाचार-पत्रों, पुस्तिकाओं, राष्ट्रवादी साहित्य, भाषणों और सार्वजनिक सभाओं का सहारा लिया। उस समय समाचार-पत्र और छोटी पुस्तिकाएँ राजनीतिक विचारों को जनता तक पहुँचाने के महत्वपूर्ण साधन थे।

‘भारत माता’ समाचार-पत्र

➣ भारत माता सोसाइटी से जुड़ा ‘भारत माता’ नामक प्रकाशन संगठन के प्रचार का महत्वपूर्ण माध्यम था। इसके माध्यम से ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना, देशभक्ति और स्वतंत्रता से जुड़े विचारों का प्रचार किया जाता था। लाहौर में इसका प्रकाशन सोसाइटी की गतिविधियों से जुड़ा था।

शांति नारायण भटनागर भी लाहौर में ‘भारत माता’ के माध्यम से स्वतंत्रता की भावना फैलाने वाले पत्रकारों में शामिल थे। बाद में उन्होंने ‘स्वराज’ नामक समाचार-पत्र शुरू किया, जिसे भारत माता सोसाइटी के बैनर से प्रकाशित किया गया।

भारत माता बुक एजेंसी

➣ सोसाइटी ने राष्ट्रवादी विचारों वाली पुस्तकों और पुस्तिकाओं को लोगों तक पहुँचाने के लिए भारत माता बुक एजेंसी की स्थापना की। इसका उद्देश्य ऐसी सामग्री प्रकाशित और वितरित करना था जो लोगों में देशभक्ति तथा ब्रिटिश शासन के विरोध की भावना पैदा करे।

➣ इस माध्यम से ‘1857 दी बगावत’, ‘देसी फौज’, ‘जबर जनाह’ और ‘बागी मसीहा’ जैसी राष्ट्रवादी रचनाएँ प्रकाशित या वितरित की गईं। इनमें से ‘बागी मसीहा’ सूफी अंबा प्रसाद द्वारा अजीत सिंह के जीवन पर लिखी गई रचना थी।

पुस्तिकाओं और पर्चों का उपयोग

➣ भारत माता सोसाइटी से जुड़े कार्यकर्ता छोटी पुस्तिकाओं और पर्चों के माध्यम से भी अपने विचार फैलाते थे। इनमें ब्रिटिश शासन की नीतियों, देश की स्थिति और स्वतंत्रता की आवश्यकता जैसे विषयों को सरल भाषा में रखा जाता था। इनका उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों तक राष्ट्रवादी संदेश पहुँचाना था।

➣ ऐसे साहित्य को केवल शहरों तक सीमित रखने के बजाय किसानों और सामान्य जनता तक पहुँचाने का प्रयास किया गया। इस कारण प्रेस और साहित्य भारत माता सोसाइटी की राजनीतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए।

सभाएँ और भाषण

➣ भारत माता सोसाइटी के प्रचार का दूसरा महत्वपूर्ण माध्यम सार्वजनिक सभाएँ और भाषण थे। सरदार अजीत सिंह अपने प्रभावशाली भाषणों के लिए प्रसिद्ध थे। वे विभिन्न स्थानों पर सभाएँ करके लोगों को ब्रिटिश शासन की नीतियों और उनके प्रभावों के बारे में बताते थे।

➣ इन सभाओं में किसानों की समस्याओं को भी उठाया जाता था। भूमि, लगान और नहर से जुड़े प्रश्नों के माध्यम से लोगों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि उनकी आर्थिक समस्याओं का संबंध औपनिवेशिक शासन की नीतियों से है। इसी प्रचार ने आगे चलकर 1907 के पंजाब कृषक आंदोलन के लिए वातावरण तैयार करने में सहायता की।

1907 का पंजाब कृषक आंदोलन और भारत माता सोसाइटी

1906–07 में पंजाब में किसानों का असंतोष एक बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदल गया। इसका मुख्य कारण ब्रिटिश सरकार की भूमि, नहर और राजस्व संबंधी नीतियाँ थीं। विशेष रूप से पंजाब कॉलोनाइजेशन बिल, बारी दोआब नहर से संबंधित बढ़ी हुई सिंचाई दरें और पंजाब लैंड एलियनेशन एक्ट ने किसानों में असंतोष बढ़ाया।

➣ इस असंतोष को सरदार अजीत सिंह, किशन सिंह और उनके सहयोगियों ने व्यापक ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया।

पंजाब कॉलोनाइजेशन बिल (1906)

25 अक्टूबर 1906 को पंजाब विधान परिषद में पंजाब कॉलोनाइजेशन बिल पेश किया गया। इसका संबंध मुख्य रूप से पंजाब की नहर कॉलोनियों में सरकार द्वारा किसानों को दी गई भूमि से था।

बिल में भूमि के उत्तराधिकार और उपयोग से संबंधित ऐसी शर्तें प्रस्तावित थीं जिन्हें किसानों ने अपने पारंपरिक अधिकारों के लिए खतरा माना।

➣ किसानों को विशेष चिंता इस बात की थी कि भूमि पर उनका अधिकार पहले की तरह पूर्ण नहीं रहेगा और उत्तराधिकार से संबंधित सरकारी नियंत्रण बढ़ जाएगा।

➣ इससे यह डर पैदा हुआ कि आने वाली पीढ़ियों को भूमि हस्तांतरित करने में कठिनाई हो सकती है। इस कारण चेनाब कॉलोनी और लायलपुर क्षेत्र के किसानों में बिल के विरुद्ध असंतोष तेजी से बढ़ा।

➣ 1907 के प्रारंभ में बिल के विरोध में सभाएँ और सरकार को ज्ञापन देने का सिलसिला शुरू हुआ। शुरुआत में आंदोलन का स्वरूप मुख्यतः कानूनी और शांतिपूर्ण विरोध का था, लेकिन सरकार द्वारा किसानों की मांगों पर पर्याप्त ध्यान न देने से आंदोलन धीरे-धीरे अधिक व्यापक होता गया।

बारी दोआब नहर की दरों का प्रश्न

➣ किसानों के असंतोष का दूसरा प्रमुख कारण बारी दोआब नहर से संबंधित सिंचाई दरों में वृद्धि का प्रस्ताव था। नवंबर 1906 में पंजाब सरकार ने बारी दोआब नहर से सिंचाई के लिए नई दरों की घोषणा की। इससे अमृतसर, लाहौर और गुरदासपुर जैसे क्षेत्रों के किसानों में असंतोष पैदा हुआ।

➣ किसानों का तर्क था कि सिंचाई पर बढ़ा हुआ खर्च उनकी खेती को और महँगा बना देगा। इसलिए कॉलोनाइजेशन बिल के साथ नहर की बढ़ी हुई दरें भी आंदोलन का महत्वपूर्ण मुद्दा बन गईं।

➣ हालांकि सरकार ने बाद में नई दरों को स्थगित कर दिया और उनकी दोबारा समीक्षा का आश्वासन दिया, लेकिन तब तक यह मुद्दा किसानों के व्यापक असंतोष का हिस्सा बन चुका था।

पंजाब लैंड एलियनेशन एक्ट, 1900

➣ किसानों की नाराजगी केवल कॉलोनाइजेशन बिल और नहर की दरों तक सीमित नहीं थी। पंजाब लैंड एलियनेशन एक्ट, 1900 भी भूमि से जुड़ी महत्वपूर्ण समस्या था।

➣ इस कानून का उद्देश्य कृषि भूमि को गैर-कृषक और साहूकार वर्गों के हाथों जाने से रोकना था। इसके लिए भूमि के हस्तांतरण पर कुछ कानूनी प्रतिबंध लगाए गए और सरकार ने कृषि भूमि के लेन-देन को नियंत्रित किया।

➣ कानून का एक उद्देश्य किसानों को साहूकारों के हाथों भूमि खोने से बचाना था, क्योंकि कर्ज के कारण अनेक किसान अपनी जमीन गिरवी रखने या बेचने के लिए मजबूर होते थे।

➣ लेकिन किसानों के एक वर्ग को इस बात पर आपत्ति थी कि इस कानून ने उनकी भूमि के स्वतंत्र हस्तांतरण और लेन-देन की क्षमता को सीमित कर दिया। विशेष रूप से भूमि को गिरवी रखने, बेचने या दूसरे व्यक्ति के नाम करने के मामलों में सरकारी कानूनी वर्गीकरण और प्रतिबंध महत्वपूर्ण हो गए।

➣ हालांकि पंजाब लैंड एलियनेशन एक्ट, 1900 का उद्देश्य किसानों को भूमि से बेदखल होने से बचाना था, लेकिन 1906–07 के आंदोलन में किसानों की नाराजगी का मुख्य केंद्र कॉलोनाइजेशन बिल और नहर संबंधी नीतियाँ थीं। भूमि हस्तांतरण से जुड़ी पुरानी समस्याओं ने इस असंतोष को और व्यापक बनाने में भूमिका निभाई।

➣ इस प्रकार 1906–07 में पंजाब के किसानों की शिकायतें केवल किसी एक कानून से नहीं जुड़ी थीं। भूमि पर अधिकार, कर्ज, सिंचाई का खर्च, राजस्व का बोझ और सरकार का बढ़ता हस्तक्षेप—इन सभी प्रश्नों ने मिलकर किसानों में असंतोष का वातावरण तैयार किया।

अजीत सिंह की भूमिका

➣ इस किसान आंदोलन को व्यापक राजनीतिक रूप देने में सरदार अजीत सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने किसानों की स्थानीय समस्याओं को ब्रिटिश शासन की नीतियों से जोड़कर देखा और पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर जनसभाएँ और भाषण किए। उनके साथ किशन सिंह और घसीता राम जैसे कार्यकर्ता भी किसानों को संगठित करने में सक्रिय थे।

➣ अजीत सिंह का उद्देश्य केवल किसी एक कानून को हटवाना नहीं था। वे किसानों के असंतोष को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदलना चाहते थे। इसी कारण उनकी सभाओं में भूमि और नहर के प्रश्नों के साथ-साथ स्वतंत्रता और विदेशी शासन के विरोध की बातें भी उठाई जाती थीं।

➣ ब्रिटिश सरकार ने अजीत सिंह की गतिविधियों को गंभीर खतरे के रूप में देखा। 21 अप्रैल 1907 के रावलपिंडी भाषण के बाद उनके विरुद्ध राजद्रोह संबंधी कार्रवाई की दिशा में कदम बढ़े। सरकार को आशंका थी कि उनके भाषणों और सभाओं से पंजाब में व्यापक विद्रोह की स्थिति पैदा हो सकती है।

लाला लाजपत राय की भूमिका

➣ लाजपत राय ने किसानों की शिकायतों के प्रति सहानुभूति दिखाई और ब्रिटिश सरकार की नीतियों की आलोचना की। हालांकि वे अजीत सिंह की तुलना में अधिक संवैधानिक और राजनीतिक तरीके से काम करने के पक्षधर थे, फिर भी दोनों का विरोध ब्रिटिश शासन की नीतियों के विरुद्ध था।

➣ इस कारण ब्रिटिश अधिकारियों की नजर में लाजपत राय और अजीत सिंह दोनों पंजाब में बढ़ती राजनीतिक अशांति के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए। दोनों के प्रभाव को अलग-अलग सामाजिक वर्गों में समर्थन मिल रहा था।

➣ दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक दृष्टिकोण में अंतर होने के बावजूद 1907 के दौर में उनके बीच सहयोग दिखाई देता है। अजीत सिंह का प्रभाव किसानों और युवाओं के बीच अधिक था, जबकि लाला लाजपत राय का प्रभाव शिक्षित मध्यम वर्ग और व्यापक राष्ट्रवादी राजनीति में मजबूत था।

➣ इस प्रकार दोनों नेताओं की गतिविधियाँ एक-दूसरे की पूरक बन गईं। अजीत सिंह ने ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को राजनीतिक रूप से सक्रिय किया, जबकि लाजपत राय पंजाब के व्यापक राष्ट्रवादी आंदोलन के प्रमुख चेहरे बने। इससे ब्रिटिश सरकार के लिए पंजाब में बढ़ते विरोध को नियंत्रित करना कठिन होता गया।

लायलपुर की विशाल सभा और ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ (22 मार्च 1907)

➣ आंदोलन का एक महत्वपूर्ण चरण 22 मार्च 1907 को आया, जब लायलपुर में एक विशाल किसान सभा आयोजित की गई। लगभग 9,000 किसान और कॉलोनी निवासी इस सभा में शामिल हुए।

➣ यह सभा वार्षिक पशु मेले के अवसर पर हुई थी और इसमें कॉलोनाइजेशन बिल तथा अन्य सरकारी नीतियों का विरोध किया गया।

➣ इसी सभा में राष्ट्रवादी कवि और ‘झंग सियाल’ के संपादक बाँके दयाल (प्रभ दयाल) ने अपनी प्रसिद्ध कविता “पगड़ी संभाल जट्टा” प्रस्तुत की।

➣ इसमें किसान की पगड़ी को उसके सम्मान, अधिकार और आत्मसम्मान का प्रतीक बनाया गया था। कविता किसानों के बीच बहुत लोकप्रिय हुई और आंदोलन का प्रमुख नारा बन गई।

“पगड़ी संभाल जट्टा” का अर्थ केवल अपनी पगड़ी की रक्षा करना नहीं था। इसका संदेश किसानों को अपने सम्मान, भूमि और अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होने का था। इस कारण यह गीत जल्द ही पूरे पंजाब में आंदोलन की पहचान बन गया।

➣ लायलपुर की सभा के बाद आंदोलन का प्रभाव पंजाब के कई अन्य क्षेत्रों में भी फैल गया। लाहौर, रावलपिंडी, अमृतसर, गुजरांवाला, मुल्तान और अन्य क्षेत्रों में सभाएँ और विरोध कार्यक्रम आयोजित किए गए। अजीत सिंह और अन्य राष्ट्रवादी नेताओं ने इन सभाओं के माध्यम से किसानों को संगठित किया।

➣ इस आंदोलन की विशेषता यह थी कि इसमें किसानों की स्थानीय आर्थिक समस्याएँ और राष्ट्रवादी राजनीति एक-दूसरे से जुड़ गईं। इससे पंजाब में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असंतोष केवल शहरों के शिक्षित वर्ग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ग्रामीण जनता तक भी पहुँच गया।

सरकार की दमनात्मक कार्रवाई

➣ आंदोलन के बढ़ते प्रभाव से ब्रिटिश सरकार चिंतित हो गई। सरकार ने राष्ट्रवादी सभाओं और नेताओं पर निगरानी बढ़ाई तथा राजनीतिक गतिविधियों को रोकने के लिए दमनात्मक कदम उठाए।

9 मई 1907 को लाला लाजपत राय को बिना मुकदमे के गिरफ्तार कर मांडले भेज दिया गया। अजीत सिंह को भी उसी दौर में गिरफ्तार कर मांडले, बर्मा भेजा गया।

➣ नेताओं की गिरफ्तारी से पंजाब में और अधिक आक्रोश पैदा हुआ। ब्रिटिश सरकार ने सार्वजनिक सभाओं पर नियंत्रण बढ़ाने के लिए भी कदम उठाए।

➣ इस दमन के बावजूद आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि पंजाब में किसान अब भूमि और राजस्व संबंधी नीतियों के साथ-साथ औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भी राजनीतिक रूप से सक्रिय हो चुके थे।

आंदोलन का परिणाम

➣ व्यापक विरोध और राजनीतिक दबाव के कारण ब्रिटिश सरकार को कॉलोनाइजेशन संबंधी अपने रुख में पीछे हटना पड़ा। कॉलोनाइजेशन बिल से जुड़ी विवादित व्यवस्थाओं में संशोधन/वापसी की दिशा में सरकार को कदम उठाने पड़े और नहर की बढ़ी हुई दरों को भी स्थगित कर पुनर्विचार किया गया। इससे किसानों की प्रमुख मांगों को आंशिक सफलता मिली।

➣ 1907 का यह आंदोलन इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने पंजाब में किसान असंतोष को संगठित राजनीतिक आंदोलन में बदल दिया। भारत माता सोसाइटी और अजीत सिंह जैसे राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं ने इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारत माता सोसाइटी का विघटन

1907 के पंजाब कृषक आंदोलन और उसके बाद ब्रिटिश सरकार की दमनात्मक कार्रवाई से भारत माता सोसाइटी की गतिविधियों को बड़ा झटका लगा।

अजीत सिंह, लाला लाजपत राय और अन्य राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं पर सरकारी निगरानी बढ़ गई तथा कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया या उन्हें भूमिगत होना पड़ा। इससे भारत में सोसाइटी की पहले जैसी संगठित गतिविधियाँ कमजोर पड़ने लगीं।

➣ हालांकि भारत माता सोसाइटी का प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। इसके कई कार्यकर्ता अलग-अलग स्थानों पर राष्ट्रवादी गतिविधियों से जुड़े रहे। अजीत सिंह और सूफी अंबा प्रसाद ने बाद में विदेश जाकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपना काम जारी रखा।

➣ 1907 में मांडले से रिहाई के बाद अजीत सिंह ने भारत में अपनी ब्रिटिश-विरोधी गतिविधियाँ फिर शुरू कीं। उन्होंने ‘पेशवा’ जैसे समाचार-पत्रों और राष्ट्रवादी पुस्तिकाओं के माध्यम से ब्रिटिश शासन की आलोचना जारी रखी। सरकारी कार्रवाई की आशंका बढ़ने पर 1909 में वे ज़िया-उल-हक के साथ फारस (ईरान) चले गए

➣ ईरान में अजीत सिंह ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध काम करने वाले भारतीय राष्ट्रवादियों के साथ संपर्क बनाया। उन्होंने शिराज में एक छोटा क्रांतिकारी केंद्र विकसित किया और वहाँ से भारत की स्वतंत्रता के लिए गतिविधियाँ चलाने का प्रयास किया। इससे भारत माता सोसाइटी से जुड़े राष्ट्रवादी प्रयासों का एक हिस्सा भारत से बाहर भी जारी रहा।

सूफी अंबा प्रसाद भी ब्रिटिश सरकार की कार्रवाई से बचने के लिए भारत से बाहर चले गए। 1907 के बाद वे पहले नेपाल पहुँचे और बाद में फारस (ईरान) चले गए। वहाँ उन्होंने अजीत सिंह और अन्य भारतीय राष्ट्रवादियों के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध गतिविधियाँ जारी रखीं।

➣ विदेश में सूफी अंबा प्रसाद की भूमिका केवल राजनीतिक संपर्क तक सीमित नहीं रही। उन्होंने लेखन, पत्रकारिता और राष्ट्रवादी प्रचार के माध्यम से भी भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में विचार फैलाए। इस तरह भारत माता सोसाइटी से जुड़े प्रारंभिक राष्ट्रवादी प्रचार का एक हिस्सा विदेशों में भी जारी रहा।

ईरान में क्रांतिकारी केंद्र

➣ भारत से बाहर जाने के बाद सरदार अजीत सिंह, सूफी अंबा प्रसाद और उनके सहयोगियों ने फारस (वर्तमान ईरान) में ब्रिटिश-विरोधी गतिविधियों को आगे बढ़ाया।

➣ लगभग 1909 से ईरान उनके लिए भारतीय स्वतंत्रता के प्रचार और क्रांतिकारी गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।

➣ अजीत सिंह ने शिराज में एक छोटा क्रांतिकारी केंद्र स्थापित किया। यहाँ उनके साथ सूफी अंबा प्रसाद, ज़िया-उल-हक, ठाकुर दास और ऋषिकेश लेथा जैसे कार्यकर्ता जुड़े।

➣ इनका उद्देश्य भारतीय स्वतंत्रता के लिए समर्थन जुटाना और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध गतिविधियों को जारी रखना था।

मई 1910 में अजीत सिंह और उनके सहयोगियों ने शिराज से फारसी भाषा में “हयात (Hayat)” नामक राष्ट्रवादी पत्र का प्रकाशन शुरू किया। इसके माध्यम से ब्रिटिश शासन की आलोचना और भारतीय स्वतंत्रता के विचारों का प्रचार किया गया। ब्रिटिश खुफिया विभाग ने इस पत्र और उससे जुड़ी गतिविधियों पर नजर रखना शुरू कर दिया था।

विदेशी क्रांतिकारियों से संपर्क

➣ ईरान में रहते हुए भारतीय क्रांतिकारियों ने केवल अपने साथियों तक संपर्क सीमित नहीं रखा, बल्कि वहाँ के स्थानीय राष्ट्रवादियों से भी संबंध बनाए।

➣ उस समय ईरान में संवैधानिक आंदोलन और ब्रिटिश प्रभाव के विरोध की राजनीतिक गतिविधियाँ चल रही थीं। इस वातावरण ने भारतीय क्रांतिकारियों को काम करने के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान कीं।

➣ ईरानी राष्ट्रवादियों ने अजीत सिंह और सूफी अंबा प्रसाद को शरण और सहायता भी दी। जब ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें गिरफ्तार करवाने या वापस भारत भेजने का प्रयास किया, तो फारसी संवैधानिक सरकार ने उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों को सौंपने से इनकार कर दिया। इससे भारतीय क्रांतिकारियों को कुछ समय तक ईरान में स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर मिला।

सितंबर 1910 में अजीत सिंह शिराज से बुशहर (Bushire) चले गए। उनका उद्देश्य वहाँ भारतीय व्यापारियों और समुद्री यात्रियों के माध्यम से भारत में मौजूद अपने साथियों से संपर्क स्थापित करना था। इससे ईरान में चल रही गतिविधियों को भारत के राष्ट्रवादी नेटवर्क से जोड़ने का प्रयास किया गया।

➣ ब्रिटिश सरकार इन गतिविधियों से चिंतित थी। 1910 में ब्रिटिश खुफिया रिपोर्टों में अजीत सिंह और सूफी अंबा प्रसाद की गतिविधियों तथा “हयात” के प्रकाशन का उल्लेख मिलता है। इससे पता चलता है कि ब्रिटिश सरकार भारत से बाहर चल रहे इस छोटे लेकिन सक्रिय राष्ट्रवादी नेटवर्क पर भी नजर रख रही थी।

➣ ईरान में विकसित यह नेटवर्क आगे चलकर भारतीय क्रांतिकारियों के अंतरराष्ट्रीय संपर्क का एक प्रारंभिक उदाहरण बना। बाद के वर्षों में अजीत सिंह का संपर्क यूरोप और अन्य देशों में सक्रिय भारतीय राष्ट्रवादियों से हुआ तथा वे आगे चलकर गदर आंदोलन से भी जुड़े।

➣ इस प्रकार 1907 की भारत माता सोसाइटी से निकली क्रांतिकारी धारा धीरे-धीरे भारत की सीमाओं से बाहर फैलती गई।

भारत माता सोसाइटी का क्रांतिकारी प्रभाव

➣ भारत माता सोसाइटी का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव पंजाब में ब्रिटिश-विरोधी राष्ट्रवादी चेतना को मजबूत करना था। इसने किसानों, युवाओं और सामान्य जनता को राजनीतिक रूप से जागरूक करने तथा उन्हें विदेशी शासन के विरुद्ध संगठित करने का प्रयास किया।

➣ भारत माता सोसाइटी की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि यद्यपि इसे क्रांतिकारी संगठन कहा जाता है, लेकिन इसकी गतिविधियों का मुख्य आधार हथियारों का प्रयोग, बम निर्माण, हत्या या सशस्त्र षड्यंत्र नहीं था।

इसके कार्यकर्ताओं ने मुख्य रूप से जनसभाओं, भाषणों, राष्ट्रवादी साहित्य, समाचार-पत्रों और किसानों के संगठन के माध्यम से ब्रिटिश शासन का विरोध किया।

➣ इस दृष्टि से भारत माता सोसाइटी की कार्यपद्धति अपने समय के कुछ अन्य गुप्त क्रांतिकारी संगठनों से अलग थी। जहाँ अनुशीलन समिति और अभिनव भारत जैसी धाराओं में गुप्त संगठन, हथियारों की व्यवस्था और सशस्त्र कार्रवाई की स्पष्ट भूमिका थी,

➣ वहीं भारत माता सोसाइटी ने मुख्य रूप से जनता के बीच राजनीतिक असंतोष को संगठित करने पर जोर दिया। इसलिए इसका क्रांतिकारी महत्व उसकी राजनीतिक लामबंदी और राष्ट्रवादी प्रचार में अधिक था।

➣ इसका प्रभाव पंजाब के आगे के क्रांतिकारी वातावरण पर भी पड़ा। अजीत सिंह, किशन सिंह और सूफी अंबा प्रसाद जैसे कार्यकर्ताओं की गतिविधियों ने ऐसी राजनीतिक परिस्थितियाँ बनाने में योगदान दिया जिनमें बाद की पीढ़ी के युवाओं को राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी विचारों से परिचित होने का अवसर मिला।

भगत सिंह का पारिवारिक वातावरण इसका महत्वपूर्ण उदाहरण था; उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह पहले से ही ब्रिटिश-विरोधी गतिविधियों से जुड़े हुए थे।

➣ सोसाइटी का प्रभाव भारत तक सीमित नहीं रहा। सरकारी दमन के बाद अजीत सिंह और सूफी अंबा प्रसाद जैसे कार्यकर्ताओं ने विदेशों में भी ब्रिटिश-विरोधी गतिविधियाँ जारी रखीं। इससे पंजाब के प्रारंभिक क्रांतिकारी राष्ट्रवाद और विदेशों में विकसित हो रहे भारतीय क्रांतिकारी नेटवर्क के बीच संपर्क मजबूत हुआ।

➣ इस प्रकार भारत माता सोसाइटी का ऐतिहासिक महत्व मुख्यतः इस बात में था कि उसने पंजाब में जन-आधारित राष्ट्रवादी राजनीति और क्रांतिकारी चेतना को मजबूत किया।

➣ यह ऐसा क्रांतिकारी संगठन था जिसने सशस्त्र षड्यंत्र की अपेक्षा राजनीतिक जागरण, जनसंगठन और ब्रिटिश-विरोधी प्रचार को अपना प्रमुख माध्यम बनाया। आगे चलकर इसी व्यापक राजनीतिक वातावरण ने पंजाब में विकसित होने वाली विभिन्न क्रांतिकारी धाराओं के लिए महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि तैयार की।

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