बर्लिन समिति
➣ बर्लिन समिति की स्थापना प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1914 में जर्मनी में भारतीय क्रांतिकारियों द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य जर्मनी की सहायता से भारत को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र कराने के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों को संगठित करना था।
➣ इस समिति का नेतृत्व वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, चंपकरमन पिल्लै, अब्दुल हाफिज तथा अन्य भारतीय राष्ट्रवादियों ने किया। इसे भारतीय स्वतंत्रता समिति (Indian Independence Committee) के नाम से भी जाना जाता था।
➣ समिति ने जर्मन सरकार से राजनीतिक, आर्थिक एवं सैन्य सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया तथा भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह और क्रांतिकारी गतिविधियों को बढ़ावा देने की योजना बनाई।
➣ बर्लिन समिति ने गदर आंदोलन के क्रांतिकारियों तथा अन्य भारतीय राष्ट्रवादियों के साथ संपर्क स्थापित कर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी अभियान चलाने का प्रयास किया।
पृष्ठभूमि
➣ बर्लिन समिति की स्थापना से पूर्व यूरोप में भारतीय क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र इंडिया हाउस, लंदन था। यह संस्था यूरोप में भारतीय राष्ट्रवादी विचारों के प्रसार तथा क्रांतिकारी गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन गई थी।
➣ प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के आरम्भ होते ही अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ तेजी से बदल गईं। यूरोप में बिखरे भारतीय क्रांतिकारियों को यह अवसर दिखाई दिया कि जर्मनी, जो स्वयं ब्रिटेन का शत्रु था, से सहयोग प्राप्त कर भारत में राष्ट्रवादी उद्देश्य को आगे बढ़ाया जा सकता है।
➣ यूरोप के विभिन्न देशों में रह रहे भारतीय क्रांतिकारियों का मानना था कि यदि जर्मनी का राजनीतिक, आर्थिक एवं सैन्य सहयोग प्राप्त हो जाए, तो भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक क्रांतिकारी गतिविधियाँ संगठित की जा सकती हैं।
प्रारंभिक प्रयास
➣ इस दिशा में सबसे पहला संगठित प्रयास वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय (चट्टो) ने किया। अप्रैल 1914 ई. में उनकी भेंट डॉ. अबिनाश चंद्र भट्टाचार्य तथा जर्मनी में अध्ययनरत अन्य भारतीय राष्ट्रवादी छात्रों से हुई। जहाँ एक संगठित क्रांतिकारी संस्था बनाने तथा जर्मन सहयोग प्राप्त करने पर विचार-विमर्श हुआ।
➣ सितंबर 1914 ई. के प्रारम्भ में इन राष्ट्रवादी भारतीयों ने जर्मन फ्रेंड्स ऑफ इंडिया नामक संगठन की स्थापना की। इसका उद्देश्य जर्मन सरकार से संपर्क स्थापित करना तथा भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के लिए उसका सहयोग प्राप्त करना था।
➣ इसी दौरान इस संगठन के प्रतिनिधियों को कैसर विल्हेम द्वितीय के भाई से भेंट करने का अवसर मिला, जहाँ भारत से ब्रिटिश शासन समाप्त करने के उद्देश्य से जर्मन सहयोग प्राप्त करने पर सहमति बनी।
➣ जर्मन विदेश कार्यालय के मध्य-पूर्व विशेषज्ञ बैरन मैक्स फॉन ओपेनहाइम के सहयोग से वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय ने जर्मनी के विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत भारतीय छात्रों से संपर्क स्थापित किया और उन्हें इस राष्ट्रवादी प्रयास से जुड़ने का आह्वान किया।
➣ इस प्रारंभिक समूह में वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, डॉ. अबिनाश चंद्र भट्टाचार्य, डॉ. मोरेश्वर गोविंदराव प्रभाकर, डॉ. अब्दुल हफीज़ तथा सी. पद्मनाभन पिल्लई जैसे भारतीय राष्ट्रवादी शामिल थे।
ज़्यूरिख में समानांतर प्रयास
➣ बर्लिन में वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय अपने स्तर पर भारतीय क्रांतिकारियों को संगठित करने का प्रयास कर रहे थे, वहीं स्विट्ज़रलैंड के ज़्यूरिख में चंपकरामन पिल्लई ने भी स्वतंत्र रूप से एक समानांतर राष्ट्रवादी अभियान प्रारम्भ किया।
➣ सितंबर 1914 ई. में चंपकरामन पिल्लई ने ज़्यूरिख में इंटरनेशनल प्रो-इंडिया कमेटी की स्थापना की और स्वयं को उसका अध्यक्ष घोषित किया।
➣ इस संगठन का उद्देश्य यूरोप में भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में जनमत तैयार करना तथा विभिन्न देशों में सक्रिय भारतीय राष्ट्रवादियों को एक मंच पर लाना था।
➣ इसके साथ ही पिल्लई ने प्रो इंडिया नामक पत्रिका का प्रकाशन भी प्रारम्भ किया, जिसके माध्यम से यूरोपीय देशों का ध्यान भारत की राजनीतिक स्थिति की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया गया।
➣ कुछ ही समय बाद यह स्पष्ट हो गया कि समान उद्देश्य लेकर अलग-अलग संगठनों के रूप में कार्य करने की अपेक्षा एक संयुक्त संगठन अधिक प्रभावी होगा। इसलिए अक्टूबर 1914 ई. में चंपकरामन पिल्लई बर्लिन पहुँचे और अपनी इंटरनेशनल प्रो-इंडिया कमेटी का बर्लिन में चल रहे राष्ट्रवादी संगठन के साथ विलय कर दिया।
➣ इसी विलय ने आगे चलकर बर्लिन समिति को अधिक संगठित स्वरूप प्रदान किया और यूरोप में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों को एक साझा मंच पर कार्य करने का अवसर मिला।
बर्लिन समिति का स्थापना
➣ जर्मन फ्रेंड्स ऑफ इंडिया तथा इंटरनेशनल प्रो-इंडिया कमेटी के एक मंच पर आने के बाद यूरोप में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों को एक संगठित नेतृत्व प्राप्त हुआ। इसी के परिणामस्वरूप सितंबर–अक्टूबर 1914 ई. के दौरान बर्लिन में बर्लिन समिति का औपचारिक गठन हुआ।
➣ समिति के गठन के लिए जर्मनी, स्विट्ज़रलैंड, ऑस्ट्रिया तथा नीदरलैंड्स के विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत भारतीय छात्रों एवं राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं से संपर्क स्थापित किया गया। इसके बाद अनेक भारतीय क्रांतिकारी बर्लिन पहुँचकर इस संगठन से जुड़ गए।
➣ इस चरण में डॉ. धीरेन सरकार, चांजी कर्साप, एन. एस. मराठे, डॉ. ज्ञानेंद्र दासगुप्ता तथा सी. पद्मनाभन पिल्लई जैसे भारतीय राष्ट्रवादी भी समिति के सदस्य बने।
➣ समकालीन स्रोतों में इसे कभी-कभी चंपक-चट्टो बर्लिन समिति भी कहा गया है, क्योंकि इसके संगठन में चंपकरामन पिल्लई और वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय (चट्टो) दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
➣ बर्लिन समिति के गठन के बाद यूरोप में सक्रिय अधिकांश भारतीय क्रांतिकारी इसी संगठन के माध्यम से कार्य करने लगे।
नामकरण एवं प्रारम्भिक सदस्य
➣ प्रारम्भ में इस संगठन को बर्लिन-इंडियन कमेटी के नाम से जाना जाता था। 1915 ई. में संगठन का विस्तार होने तथा इसकी गतिविधियों के व्यापक स्वरूप को देखते हुए इसका नाम बदलकर इंडियन इंडिपेंडेंस कमेटी रख दिया गया।
➣ बर्लिन समिति के प्रारम्भिक सदस्यों में वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, अबिनाश चंद्र भट्टाचार्य, चंपकरामन पिल्लई, भूपेंद्रनाथ दत्त, तारकनाथ दास, मौलाना बरकतुल्ला, चंद्रकांत चक्रवर्ती, एम. प्रभाकर, बीरेंद्र सरकार तथा हेरम्बलाल गुप्ता जैसे प्रमुख भारतीय क्रांतिकारी शामिल थे।
➣ 1915 ई. में लाला हरदयाल तथा मौलाना बरकतुल्ला के सक्रिय रूप से समिति से जुड़ने के बाद इसके अंतरराष्ट्रीय संपर्क और अधिक मजबूत हुए।
इसके बाद समिति ने गदर पार्टी, काबुल मिशन तथा अन्य क्रांतिकारी संगठनों के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक योजनाओं पर कार्य करना प्रारम्भ किया।➣ विभिन्न देशों में सक्रिय भारतीय राष्ट्रवादियों के एक मंच पर आने से बर्लिन समिति शीघ्र ही यूरोप में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे प्रमुख क्रांतिकारी संगठन बन गई।
समिति के उद्देश्य
➣ बर्लिन समिति की स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारत को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र कराना तथा विदेशों में रह रहे भारतीय क्रांतिकारियों को एक संगठित मंच प्रदान करना था। समिति का विश्वास था कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन की व्यस्तता का लाभ उठाकर भारत में सशस्त्र क्रांति की जा सकती है।
- जर्मनी तथा ब्रिटेन के अन्य विरोधी देशों का सहयोग प्राप्त कर भारत में सशस्त्र विद्रोह की तैयारी करना।
- विदेशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारी संगठनों एवं नेताओं के बीच समन्वय स्थापित करना।
- भारतीय सैनिकों को ब्रिटिश सेना के विरुद्ध विद्रोह के लिए प्रेरित करना तथा उन्हें क्रांतिकारी आंदोलन से जोड़ना।
- भारत में हथियार, धन एवं अन्य आवश्यक संसाधन पहुँचाने की व्यवस्था करना।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के लिए राजनीतिक एवं कूटनीतिक समर्थन प्राप्त करना।
- भारत तथा विदेशों में गुप्त क्रांतिकारी नेटवर्क विकसित कर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक सशस्त्र क्रांति की योजना को सफल बनाना।
प्रमुख संस्थापक एवं नेता
| नेता | बर्लिन समिति में योगदान |
|---|---|
| वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय | बर्लिन समिति के प्रमुख संस्थापक एवं नेता। जर्मन अधिकारियों से संपर्क स्थापित कर समिति की गतिविधियों का नेतृत्व किया। |
| चम्पकरामन पिल्लै | यूरोप में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का प्रचार किया तथा जर्मन सहयोग प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। |
| अबिनाश भट्टाचार्य | संस्थापक सदस्यों में शामिल। यूरोप में भारतीय क्रांतिकारियों को संगठित करने तथा गुप्त गतिविधियों के संचालन में योगदान दिया। |
| चन्द्रकांत चक्रवर्ती | समिति के संगठनात्मक विस्तार तथा विदेशों में क्रांतिकारी नेटवर्क विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। |
➣ आगे चलकर बर्लिन समिति ने राजा महेन्द्र प्रताप, मौलाना बरकतुल्ला, उबैदुल्लाह सिंधी तथा गदर पार्टी के अनेक क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विभिन्न क्रांतिकारी योजनाओं पर कार्य किया। इन गतिविधियों का विस्तृत वर्णन आगे के अनुभागों में किया गया है।
बर्लिन समिति का जर्मन सरकार से संबंध
➣ प्रथम विश्व युद्ध के दौरान बर्लिन समिति का जर्मन सरकार से गहरा और संस्थागत संबंध था। यह संबंध केवल नैतिक समर्थन तक सीमित नहीं था, बल्कि जर्मन विदेश कार्यालय, सैन्य प्रतिष्ठान और स्वयं कैसर के स्तर तक फैला हुआ था।
जर्मन विदेश कार्यालय का सहयोग
➣ बर्लिन समिति की स्थापना सितंबर 1914 ई. में जर्मन विदेश कार्यालय की अनुमति एवं सहयोग से हुई थी। प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ होने के बाद जर्मन सरकार ने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध उपनिवेशों में विद्रोह भड़काने की नीति अपनाई, जिसके अंतर्गत भारतीय क्रांतिकारियों के साथ सहयोग स्थापित किया गया।
➣ जर्मन विदेश कार्यालय तथा रिज़र्व जनरल स्टाफ के राजनीतिक कार्यालय ने संयुक्त रूप से बर्लिन समिति को संरक्षण प्रदान किया तथा उसकी गतिविधियों के संचालन में सहयोग दिया।
➣ इतिहासकार फ्रिट्ज़ फिशर ने जर्मनी की इस नीति को क्रांति कार्यक्रम की संज्ञा दी है, जिसका उद्देश्य ब्रिटेन एवं उसके उपनिवेशों में क्रांतिकारी आंदोलनों को समर्थन देकर उसके साम्राज्य को भीतर से कमजोर करना था।
➣ इस नीति की वैचारिक आधारशिला मैक्स फ्रायहर फॉन ओपेनहाइम के 1914 ई. के प्रसिद्ध ज्ञापन “हमारे शत्रुओं के इस्लामी क्षेत्रों में क्रांति लाने संबंधी ज्ञापन” में निहित थी। इस ज्ञापन में भारत को ब्रिटिश साम्राज्य की सबसे महत्वपूर्ण एवं सबसे कमजोर कड़ी माना गया था।
➣ जर्मन विदेश कार्यालय के सहयोग से बर्लिन समिति ने यूरोप में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों को संगठित करना प्रारम्भ किया तथा आगे चलकर गदर पार्टी, हिंदू-जर्मन षड्यंत्र और काबुल मिशन जैसी योजनाओं के लिए आधार तैयार किया।
कैसर एवं जर्मन चांसलर का समर्थन
➣ बर्लिन समिति को केवल जर्मन विदेश कार्यालय का ही सहयोग प्राप्त नहीं था, बल्कि जर्मनी के सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व ने भी ब्रिटिश भारत के विरुद्ध इसकी योजनाओं का समर्थन किया। यह समर्थन जर्मनी की व्यापक युद्धकालीन रणनीति का एक महत्वपूर्ण भाग था।
➣ 31 जुलाई 1914 ई. को रूस की लामबंदी के बाद यूरोप में युद्ध की स्थिति स्पष्ट हो गई। इसी दौरान कैसर विल्हेम द्वितीय ने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध उपनिवेशों में क्रांतिकारी गतिविधियों को प्रोत्साहित करने की नीति पर विचार प्रारम्भ किया।
➣ सितंबर 1914 ई. में जर्मन चांसलर थियोबाल्ड फॉन बेथमान होल्वेग को ब्रिटिश भारत के विरुद्ध संचालित होने वाली गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियों को समर्थन देने की स्वीकृति प्रदान की गई।
➣ इसके बाद जर्मन सरकार ने बर्लिन समिति को भारतीय क्रांतिकारियों के साथ सहयोग स्थापित करने, विदेशों में संपर्क बढ़ाने तथा भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध योजनाएँ तैयार करने की अनुमति दी। इसी राजनीतिक स्वीकृति के आधार पर समिति की विभिन्न अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों का विस्तार हुआ।
➣ बर्लिन समिति ने जर्मन सरकार को विश्वास दिलाया कि यदि भारत में व्यापक विद्रोह कराया जाए, तो ब्रिटेन को सैनिक एवं आर्थिक दोनों स्तरों पर भारी क्षति पहुँचेगी। यही कारण था कि जर्मन नेतृत्व ने भारतीय क्रांतिकारियों के साथ सहयोग को अपनी युद्धनीति का महत्वपूर्ण अंग माना।
नाकरिष्टेनस्टेले फ्यूर डेन ओरिएंट (NfO) की भूमिका
➣ बर्लिन समिति की गतिविधियों के संचालन में नाकरिष्टेनस्टेले फ्यूर डेन ओरिएंट (Nachrichtenstelle für den Orient – NfO) अर्थात् पूर्व मामलों का सूचना एवं प्रचार ब्यूरो की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
➣ इसकी स्थापना 1914 ई. में जर्मन विदेश कार्यालय के अंतर्गत की गई थी, ताकि ब्रिटेन, रूस और फ्रांस के उपनिवेशों में जर्मनी के पक्ष में प्रचार-प्रसार तथा क्रांतिकारी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जा सके।
➣ मैक्स फ्रायहर फॉन ओपेनहाइम इस संस्था के प्रमुख थे। उन्होंने बर्लिन समिति के गठन, उसके संगठनात्मक विकास तथा जर्मन अधिकारियों के साथ समन्वय स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ NfO के माध्यम से बर्लिन समिति को जर्मन सरकार के विभिन्न विभागों, दूतावासों तथा विदेशों में स्थित जर्मन प्रतिनिधियों से संपर्क स्थापित करने में सहायता मिली। इसी नेटवर्क के माध्यम से समिति ने यूरोप, अमेरिका, तुर्की, स्विट्ज़रलैंड तथा अन्य देशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों से संपर्क बढ़ाया।
➣ NfO ने बर्लिन समिति की अनेक योजनाओं के लिए वित्तीय सहायता, यात्रा व्यवस्था, प्रचार सामग्री तथा कूटनीतिक संपर्क उपलब्ध कराने में भी सहयोग दिया। समिति की कई गतिविधियाँ जर्मन विदेश कार्यालय और NfO के समन्वय से संचालित होती थीं।
➣ ओपेनहाइम बर्लिन समिति के सदस्यों को प्रायः मेरे भारतीय (Meine Inder) कहकर संबोधित करते थे, जिससे स्पष्ट होता है कि समिति और NfO के बीच अत्यंत निकट सहयोग था।
➣ हालांकि बर्लिन समिति अपने क्रांतिकारी उद्देश्यों के साथ कार्य करती रही, जबकि जर्मन सरकार इस सहयोग को मुख्यतः अपने युद्धकालीन सामरिक हितों की दृष्टि से देखती थी।
धन, शस्त्र एवं सैन्य सहायता
➣ 3 सितम्बर 1915 ई. को बर्लिन समिति के नेताओं ने मैक्स फॉन ओपेनहाइम के समक्ष जर्मन सरकार को अपनी विस्तृत कार्ययोजना प्रस्तुत की। इसमें भारत में क्रांति प्रारम्भ करने के लिए धन, हथियार, सैन्य विशेषज्ञ तथा क्रांतिकारियों को भारत भेजने की व्यवस्था की मांग की गई।
➣ समिति ने प्रस्ताव रखा कि हथियारों एवं गोला-बारूद को समुद्री मार्ग से भारत के तटों तक पहुँचाया जाए तथा भारतीय क्रांतिकारियों को गुप्त रूप से स्वदेश भेजकर सैनिक विद्रोह का नेतृत्व कराया जाए।
➣ ब्रिटिश शासन की आर्थिक व्यवस्था को अस्थिर करने के उद्देश्य से समिति ने 10 रुपये के जाली नोट तैयार कर भारत भेजने का भी प्रस्ताव रखा, जिससे भारतीय मुद्रा व्यवस्था में भ्रम उत्पन्न किया जा सके।
➣ जर्मन सरकार ने इन योजनाओं के लिए सीमित आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई तथा हथियारों की व्यवस्था में सहयोग देने पर सहमति व्यक्त की। इसी सहयोग के आधार पर आगे चलकर अमेरिका स्थित गदर पार्टी के साथ मिलकर भारत में हथियार भेजने की योजनाएँ तैयार की गईं।
➣ इन प्रयासों के परिणामस्वरूप एनी लार्सन तथा एस.एस. मैवरिक जैसे शस्त्र अभियानों की योजना बनाई गई, जिनका उद्देश्य जर्मनी से हथियार भारत पहुँचाना था। यद्यपि ब्रिटिश गुप्तचर विभाग की सतर्कता के कारण ये योजनाएँ सफल नहीं हो सकीं।
प्रचार एवं युद्धबंदी शिविरों में गतिविधियाँ
➣ बर्लिन समिति ने केवल सशस्त्र क्रांति की योजनाएँ ही नहीं बनाईं, बल्कि जर्मन सरकार के सहयोग से व्यापक प्रचार अभियान भी चलाया। इसका उद्देश्य विदेशों में रह रहे भारतीयों, यूरोप में तैनात भारतीय सैनिकों तथा जर्मन युद्धबंदी शिविरों में बंद भारतीय सैनिकों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संगठित करना था।
➣ जर्मन सरकार के सहयोग से समिति ने हिंदोस्तान नामक हिंदी-उर्दू समाचार-पत्र प्रकाशित किया, जिसमें भारतीयों से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष में भाग लेने का आह्वान किया जाता था।
➣ बर्लिन समिति के सदस्य जर्मनी के विभिन्न युद्धबंदी शिविरों में जाकर भारतीय युद्धबंदियों से संपर्क स्थापित करते थे तथा उन्हें यह विश्वास दिलाने का प्रयास करते थे कि ब्रिटिश सेना का साथ छोड़कर भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना उनका राष्ट्रीय कर्तव्य है।
➣ विशेष रूप से ज़ोसेन स्थित हाफमोंडलागर शिविर में रखे गए भारतीय युद्धबंदियों के बीच ब्रिटिश-विरोधी प्रचार किया गया। समिति के सदस्य यहाँ भाषण देते, साहित्य वितरित करते तथा भारतीय सैनिकों को क्रांतिकारी गतिविधियों में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित करते थे.
➣ समिति ने हिंदी, उर्दू, पंजाबी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में प्रचार सामग्री तैयार कर विभिन्न देशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों तथा सैनिकों तक पहुँचाई। इन प्रचार अभियानों का उद्देश्य भारतीय सैनिकों में ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा कमजोर करना तथा स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति समर्थन बढ़ाना था।
➣ यद्यपि इन प्रचार प्रयासों से व्यापक सैनिक विद्रोह नहीं हो सका, फिर भी बर्लिन समिति ने पहली बार विदेशों में भारतीय युद्धबंदियों और प्रवासी भारतीयों को एक संगठित क्रांतिकारी नेटवर्क से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास किया।
अफगान मिशन को जर्मन समर्थन
➣ भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय मोर्चा तैयार करने के उद्देश्य से बर्लिन समिति ने जर्मन सरकार के सहयोग से 1915 ई. में एक विशेष मिशन अफगानिस्तान भेजा। इस मिशन को काबुल मिशन या निडरमायर-हेंटिग मिशन के नाम से जाना जाता है।
➣ इस मिशन का उद्देश्य अफगानिस्तान को ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध में शामिल करना तथा वहाँ से भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करना था।
➣ इस मिशन का नेतृत्व भारतीय क्रांतिकारी राजा महेंद्र प्रताप तथा मौलाना बरकतुल्ला ने किया, जबकि जर्मन सरकार की ओर से प्रसिद्ध राजनयिक वर्नर ओटो फॉन हेंटिग को इसमें शामिल किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि यह केवल भारतीय क्रांतिकारियों का प्रयास नहीं था, बल्कि जर्मन विदेश कार्यालय का भी आधिकारिक समर्थन प्राप्त था।
➣ मिशन का प्रमुख उद्देश्य अमीर हबीबुल्लाह खान को ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध के लिए तैयार करना, अफगान सरकार का समर्थन प्राप्त करना तथा भारत में सशस्त्र विद्रोह के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करना था।
➣ बर्लिन समिति का विश्वास था कि यदि अफगानिस्तान ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध में उतरता है, तो उत्तर-पश्चिमी सीमा से भारत में क्रांतिकारी अभियान चलाना तथा भारतीय सैनिकों को विद्रोह के लिए प्रेरित करना अधिक आसान हो जाएगा।
➣ यद्यपि यह मिशन अपने सभी राजनीतिक उद्देश्यों में सफल नहीं हो सका, फिर भी इसके परिणामस्वरूप 1 दिसंबर 1915 ई. को काबुल की अस्थायी सरकार की स्थापना हुई, जिसने विदेशों में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। इस सरकार का विस्तृत वर्णन अगले अनुभाग में किया गया है।
जर्मन सहयोग की सीमाएँ
➣ यद्यपि जर्मन सरकार ने बर्लिन समिति को राजनीतिक, कूटनीतिक तथा सीमित आर्थिक एवं सैन्य सहयोग प्रदान किया, फिर भी यह सहयोग कई कारणों से अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका। अधिकांश योजनाएँ ब्रिटिश गुप्तचर विभाग की सतर्कता, युद्धकालीन परिस्थितियों तथा जर्मनी के अपने सामरिक हितों के कारण सफल नहीं हो सकीं।
➣ जर्मन सरकार का समर्थन भारत की स्वतंत्रता के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता पर आधारित नहीं था, बल्कि उसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य को कमजोर करना था। इसलिए सहायता हमेशा जर्मनी के युद्धकालीन हितों के अनुरूप ही दी गई।
➣ बर्लिन समिति द्वारा भारत में हथियार पहुँचाने की अनेक योजनाएँ, जैसे एनी लार्सन एवं एस.एस. मैवरिक अभियान विफल रहे। परिणामस्वरूप अपेक्षित मात्रा में हथियार भारतीय क्रांतिकारियों तक नहीं पहुँच सके।
➣ 1918 ई. में प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी की पराजय के बाद बर्लिन समिति को मिलने वाला सरकारी सहयोग लगभग समाप्त हो गया। इसके साथ ही समिति की अधिकांश अंतरराष्ट्रीय योजनाएँ भी ठप पड़ गईं।
➣ इन सीमाओं के बावजूद बर्लिन समिति ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित करने, विदेशी शक्तियों से सहयोग प्राप्त करने तथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध वैश्विक क्रांतिकारी नेटवर्क विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गदर पार्टी से संपर्क एवं सहयोग
➣ बर्लिन समिति का मूल उद्देश्य प्रथम विश्व युद्ध की परिस्थिति का लाभ उठाकर भारत में सशस्त्र विद्रोह करवाना था। इसके लिए अमेरिका में सक्रिय गदर पार्टी के साथ तालमेल स्थापित करना आवश्यक समझा गया, क्योंकि उस समय विदेशों में भारतीय क्रांतिकारियों का सबसे संगठित एवं प्रभावशाली संगठन गदर पार्टी ही थी।
➣ बर्लिन समिति और गदर पार्टी के बीच प्रमुख सूत्रधार लाला हरदयाल बने। अमेरिका में गिरफ्तारी से बचकर यूरोप पहुँचने के बाद उन्होंने दोनों संगठनों के बीच संपर्क स्थापित कराने तथा संयुक्त क्रांतिकारी योजना तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ 22 सितम्बर 1915 ई. को समिति के सदस्य डॉ. धीरेन सरकार तथा एन. एस. मराठे वाशिंगटन डी.सी. के लिए रवाना हुए। वहाँ उन्होंने जर्मन राजदूत जोहान फॉन बर्नस्टॉर्फ के माध्यम से अमेरिका में सक्रिय गदर पार्टी के नेताओं से औपचारिक संपर्क स्थापित किया।
➣ दोनों संगठनों के बीच यह सहमति बनी कि बर्लिन समिति जर्मनी एवं यूरोप से राजनीतिक, कूटनीतिक तथा आर्थिक सहयोग जुटाएगी, जबकि गदर पार्टी अमेरिका, कनाडा तथा अन्य देशों में बसे भारतीयों को संगठित कर भारत में सशस्त्र विद्रोह की तैयारी करेगी।
➣ जर्मन विदेश मंत्रालय तथा अमेरिका स्थित जर्मन दूतावास ने भी दोनों संगठनों के बीच समन्वय स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे भारत में प्रस्तावित क्रांतिकारी योजनाओं को अंतरराष्ट्रीय समर्थन प्राप्त हुआ।
➣ दोनों संगठनों ने मिलकर भारत में हथियार पहुँचाने, भारतीय सैनिकों को विद्रोह के लिए प्रेरित करने, विदेशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों के बीच समन्वय स्थापित करने तथा एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी नेटवर्क विकसित करने की संयुक्त योजना तैयार की।
➣ इसी सहयोग के परिणामस्वरूप आगे चलकर हिंदू-जर्मन षड्यंत्र अस्तित्व में आया तथा भारत में हथियार पहुँचाने के अनेक प्रयास किए गए।
➣ इस संयुक्त योजना के अंतर्गत एनी लार्सन शस्त्र-कांड जैसी योजनाएँ भी बनाई गईं, जिनके माध्यम से जर्मनी से बड़ी मात्रा में हथियार भारत भेजने का प्रयास किया गया। यद्यपि ब्रिटिश गुप्तचर विभाग की सतर्कता के कारण ये प्रयास सफल नहीं हो सके।
हिंदू-जर्मन षड्यंत्र
➣ बर्लिन समिति और गदर पार्टी के बीच सहयोग स्थापित होने के बाद भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय सशस्त्र क्रांति की योजना तैयार की गई। इतिहास में यह योजना हिंदू-जर्मन षड्यंत्र के नाम से प्रसिद्ध है।
➣ इसका उद्देश्य प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन की व्यस्तता का लाभ उठाकर भारत में सैनिक विद्रोह कराना तथा ब्रिटिश शासन का अंत करना था।
➣ इस षड्यंत्र में बर्लिन समिति, गदर पार्टी, जुगांतर तथा अन्य भारतीय क्रांतिकारी संगठनों ने मिलकर भाग लिया।
➣ योजना के अनुसार जर्मनी से भारत में बड़ी मात्रा में हथियार, गोला-बारूद तथा धन भेजा जाना था, जिससे भारतीय क्रांतिकारी एवं सैनिक ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संगठित विद्रोह कर सकें।
➣ भारत में प्रस्तावित विद्रोह का नेतृत्व विभिन्न क्षेत्रों के क्रांतिकारियों को सौंपा गया, जबकि विदेशों से धन, हथियार एवं कूटनीतिक सहयोग जुटाने की जिम्मेदारी बर्लिन समिति और गदर पार्टी ने संभाली।
➣ इस योजना का विस्तार भारत तक ही सीमित नहीं था, बल्कि जर्मनी, अमेरिका, स्विट्ज़रलैंड, तुर्की, अफगानिस्तान तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों को भी इसमें शामिल किया गया।
एनी लार्सन एवं एस.एस. मैवरिक शस्त्र योजना
➣ हिन्दू-जर्मन षड्यंत्र के अंतर्गत भारत में सशस्त्र क्रांति प्रारम्भ करने के उद्देश्य से भारतीय क्रांतिकारियों ने बर्लिन समिति, गदर पार्टी तथा जर्मन सरकार के सहयोग से एक गुप्त शस्त्र योजना बनाई।
➣ इस योजना का उद्देश्य बड़ी मात्रा में हथियार भारत पहुँचाकर ब्रिटिश भारतीय सेना में विद्रोह कराना था।
➣ योजना के अनुसार अमेरिका से लगभग 8,000 राइफलें, गोला-बारूद, मशीनगनें तथा अन्य सैन्य सामग्री खरीदकर एनी लार्सन नामक जहाज़ पर लादी गई। इसके बाद इन्हें समुद्र में एक निर्धारित स्थान पर एस.एस. मैवरिक में स्थानांतरित कर दक्षिण-पूर्व एशिया के रास्ते भारत भेजने की योजना बनाई गई।
➣ इस योजना के समन्वय के लिए बैटाविया (वर्तमान जकार्ता, इंडोनेशिया) को एक महत्वपूर्ण संपर्क केंद्र बनाया गया, जहाँ से भारतीय क्रांतिकारियों, जर्मन प्रतिनिधियों तथा गदर पार्टी के सदस्यों के बीच संदेशों एवं योजनाओं का आदान-प्रदान किया जाता था।
➣ भारत में इन हथियारों को प्राप्त करने तथा उन्हें क्रांतिकारियों तक पहुँचाने का दायित्व बाघा जतिन (जतिन्द्रनाथ मुखर्जी) और उनके साथियों को सौंपा गया था। इसके लिए उड़ीसा के बालासोर तट को संभावित उतराई स्थल के रूप में चुना गया था।
➣ किन्तु अमेरिकी तथा ब्रिटिश गुप्तचर एजेंसियों को इस योजना की जानकारी मिल गई। परिणामस्वरूप एनी लार्सन पर लदा अधिकांश शस्त्र-सामान जब्त कर लिया गया तथा एस.एस. मैवरिक भी अपने निर्धारित उद्देश्य को पूरा नहीं कर सका। फलस्वरूप हथियार भारत नहीं पहुँच सके और पूरी योजना विफल हो गई।
➣ इस शस्त्र योजना की विफलता से हिन्दू-जर्मन षड्यंत्र को गंभीर आघात पहुँचा। इसके बाद अमेरिका और ब्रिटिश सरकार के सहयोग से इस षड्यंत्र से जुड़े अनेक भारतीय, जर्मन तथा अमेरिकी नागरिकों के विरुद्ध हिन्दू-जर्मन षड्यंत्र मुकदमा चलाया गया।
हिंदू-जर्मन षड्यंत्र मुकदमा
➣ हिंदू-जर्मन षड्यंत्र उजागर होने के बाद अमेरिका की सरकार ने बर्लिन समिति, गदर पार्टी तथा जर्मन अधिकारियों से जुड़े व्यक्तियों के विरुद्ध हिंदू-जर्मन षड्यंत्र मुकदमा (इंडो-जर्मन प्लॉट) चलाया।
➣ यह मुकदमा सैन फ्रांसिस्को के संघीय जिला न्यायालय में आयोजित हुआ और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित विदेश में चलने वाले सबसे महत्वपूर्ण मुकदमों में से एक माना जाता है।
➣ मई 1917 ई. में एक संघीय ग्रैंड जूरी ने गदर पार्टी के आठ भारतीय राष्ट्रवादियों पर ब्रिटेन के विरुद्ध सैन्य अभियान चलाने के षड्यंत्र का आरोप लगाया। 1915 से 1917 ई. के बीच ब्रिटिश सरकार लगातार अमेरिकी सरकार पर दबाव डालती रही कि वह अमेरिका में संचालित गदर पार्टी तथा उससे जुड़े क्रांतिकारी नेटवर्क के विरुद्ध कार्रवाई करे।
➣ यह मुकदमा 20 नवंबर 1917 ई. को प्रारम्भ हुआ और 24 अप्रैल 1918 ई. को समाप्त हुआ। लगभग 155 दिनों तक चले इस मुकदमे को उस समय अमेरिका के इतिहास का सबसे लंबा एवं सबसे महँगा आपराधिक मुकदमा माना गया।
➣ मुकदमे में 9 जर्मन नागरिक (जिनमें वाशिंगटन एवं सैन फ्रांसिस्को स्थित जर्मन राजनयिक भी शामिल थे), 9 अमेरिकी नागरिक तथा 17 भारतीय अभियुक्त बनाए गए, जिनमें अधिकांश गदर पार्टी से जुड़े क्रांतिकारी थे।
➣ इससे पूर्व 17 अक्टूबर 1917 ई. को शिकागो में भी दस भारतीयों और पाँच जर्मनों के विरुद्ध एक संबंधित मुकदमा चलाया गया था।
➣ मुकदमे के दौरान अमेरिकी क्रिप्टोलॉजिस्ट विलियम फ्रीडमैन ने जर्मन एजेंटों एवं भारतीय क्रांतिकारियों के बीच आदान-प्रदान किए गए गुप्त संदेशों को डिकोड कर न्यायालय में महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत किए।
➣ इसके अतिरिक्त जोध सिंह, जिसे ब्रिटिश सरकार अमेरिका लेकर आई थी, सरकारी गवाह बन गया और उसने अपने कई साथियों के विरुद्ध गवाही दी।
➣ अभियोजन पक्ष ने इस पूरे प्रकरण को जर्मन सरकार द्वारा अमेरिकी भूमि का उपयोग कर ब्रिटिश भारत के विरुद्ध युद्ध छेड़ने का षड्यंत्र बताया, जबकि भारतीय क्रांतिकारियों ने न्यायालय में तर्क दिया कि उनका उद्देश्य अपने देश को विदेशी शासन से मुक्त कराना था और उन्होंने अपने संघर्ष की तुलना अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों से की।
➣ 24 अप्रैल 1918 ई. को निर्णय सुनाए जाने के तुरंत बाद अदालत कक्ष में एक सनसनीखेज घटना घटी। गदर पार्टी के नेता रामचंद्र की उनके ही साथी अभियुक्त राम सिंह ने गोली मारकर हत्या कर दी। इसके तुरंत बाद एक अमेरिकी मार्शल ने राम सिंह को भी गोली मार दी। इस घटना ने पूरे मुकदमे को विश्वभर में चर्चित बना दिया।
➣ मुकदमे के अंत में अनेक अभियुक्तों को विभिन्न अवधियों के कारावास की सजा सुनाई गई। यद्यपि ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि भारतीय अभियुक्तों को भारत भेजकर उन पर पुनः मुकदमा चलाया जाए, किन्तु अमेरिकी न्याय विभाग ने ऐसा नहीं किया।
➣ इस मुकदमे के बाद अमेरिका में गदर पार्टी और बर्लिन समिति की गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी, जिससे विदेशों से संचालित भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को गहरा आघात पहुँचा।
➣ भारत में हिंदू-जर्मन षड्यंत्र एवं गदर आंदोलन से जुड़े अनेक क्रांतिकारियों पर लाहौर षड्यंत्र मुकदमों के अंतर्गत भी अभियोग चलाए गए। इन मुकदमों में जिनका विस्तृत वर्णन गदर पार्टी अध्याय में किया गया है।
➣ अमेरिका में चले हिंदू-जर्मन षड्यंत्र मुकदमे में अधिकांश अभियुक्तों को जहाँ कारावास एवं जुर्माने की सज़ा सुनाई थी वहीँ लाहौर षड्यंत्र मुकदमों में क्रांतिकारियों को मृत्युदंड तथा आजीवन कारावास जैसी कठोर सजाएँ दी गईं।
बर्लिन समिति का योगदान
➣ यद्यपि बर्लिन समिति अपने प्रमुख उद्देश्यों को पूर्णतः प्राप्त नहीं कर सकी, फिर भी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में उसका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
➣ इस समिति ने भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को पहली बार संगठित अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया तथा विदेशी शक्तियों के सहयोग से ब्रिटिश शासन को चुनौती देने का प्रयास किया।
➣ प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित करने वाला यह पहला प्रमुख क्रांतिकारी संगठन था।
➣ इसने गदर पार्टी, जुगांतर, भारतीय क्रांतिकारियों तथा जर्मन सरकार के बीच समन्वय स्थापित कर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संयुक्त क्रांतिकारी अभियान चलाने का प्रयास किया।
➣ बर्लिन समिति के प्रयासों से हिंदू-जर्मन षड्यंत्र, काबुल मिशन तथा काबुल की अस्थायी सरकार (1915) जैसी महत्वपूर्ण क्रांतिकारी गतिविधियों को दिशा मिली।
➣ बर्लिन समिति तथा जर्मन सरकार के सहयोग से संचालित काबुल मिशन के परिणामस्वरूप 1 दिसंबर 1915 ई. को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में काबुल की अस्थायी सरकार की स्थापना हुई।
➣ इस समिति ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कूटनीतिक प्रयासों तथा विदेशी सहयोग के महत्व को स्थापित किया और यह सिद्ध किया कि भारत की स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय जनमत एवं सहयोग भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
महत्वपूर्ण तथ्य
| विषय | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|
| स्थापना | सितंबर 1914 ई., बर्लिन (जर्मनी) |
| प्रारम्भिक नाम | बर्लिन समिति |
| बाद का नाम | भारतीय स्वतंत्रता समिति (Indian Independence Committee / Indisches Unabhängigkeitskomitee) |
| मुख्य उद्देश्य | जर्मनी के सहयोग से भारत को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र कराना तथा सशस्त्र क्रांति का संगठन करना। |
| प्रमुख संस्थापक | वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, चम्पकरण (चेम्पकरमन) पिल्लै, अविनाश चंद्र भट्टाचार्य, अब्दुल हफीज़, तारकनाथ दास आदि। |
| जर्मन सहयोग | जर्मन विदेश कार्यालय के संरक्षण तथा सीमित आर्थिक, कूटनीतिक एवं सैन्य सहयोग से कार्य किया। |
| प्रमुख सहयोगी संगठन | गदर पार्टी |
| प्रमुख अभियान | हिंदू-जर्मन षड्यंत्र (Indo-German Conspiracy) |
| महत्वपूर्ण शस्त्र योजना | एनी लार्सन (Annie Larsen) एवं एस.एस. मैवरिक (SS Maverick) शस्त्र योजना |
| महत्वपूर्ण मिशन | नीडरमायर–हेंटिग (काबुल) मिशन, 1915 ई. |
| महत्वपूर्ण उपलब्धि | 1 दिसंबर 1915 ई. को काबुल की अस्थायी सरकार की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका। |
| महत्वपूर्ण मुकदमा | हिंदू-जर्मन षड्यंत्र मुकदमा (San Francisco Trial), 1917–1918 ई. |
| पतन का प्रमुख कारण | ब्रिटिश गुप्तचर विभाग की सतर्कता, योजनाओं की विफलता तथा प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी की पराजय (1918)। |
| ऐतिहासिक महत्व | भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को पहली बार संगठित अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करने वाला प्रमुख क्रांतिकारी संगठन। |
Leave a Reply