अनुशीलन समिति (1902) : मुजफ्फरपुर बम कांड, हार्डिंग बम कांड एवं बंगाल का क्रांतिकारी आंदोलन

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत अनुशीलन समिति (1902)
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अनुशीलन समिति

अनुशीलन समिति आधुनिक भारत के प्रारम्भिक एवं सबसे प्रभावशाली क्रांतिकारी संगठनों में से एक थी। इसकी स्थापना 1902 ई. में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में हुई।

➣ इस संगठन का उद्देश्य युवाओं को शारीरिक, मानसिक एवं राष्ट्रीय दृष्टि से प्रशिक्षित कर भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने के लिए तैयार करना था।

➣ अनुशीलन समिति का गठन ऐसे समय हुआ, जब भारत में ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष लगातार बढ़ रहा था। कांग्रेस के उदारवादी नेताओं की संवैधानिक कार्यप्रणाली से असंतुष्ट अनेक युवाओं का विश्वास था कि केवल याचिकाओं और प्रार्थनाओं से स्वतंत्रता प्राप्त नहीं की जा सकती। वे अधिक सक्रिय तथा संघर्षपूर्ण मार्ग अपनाने के पक्षधर थे।

➣ प्रारम्भ में अनुशीलन समिति ने शारीरिक प्रशिक्षण, व्यायाम, लाठी एवं शस्त्र प्रशिक्षण तथा राष्ट्रीय शिक्षा के माध्यम से युवाओं में अनुशासन, आत्मविश्वास और राष्ट्रभक्ति की भावना विकसित करने पर बल दिया। समय के साथ इसका स्वरूप अधिक संगठित और क्रांतिकारी होता गया तथा इसने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध गुप्त गतिविधियाँ प्रारम्भ कर दीं।

➣ आगे चलकर बंगाल विभाजन (1905), स्वदेशी आंदोलन तथा युगांतर समूह के गठन जैसी घटनाओं ने अनुशीलन समिति को बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन का प्रमुख केंद्र बना दिया।

स्थापना की पृष्ठभूमि

उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में भारत में ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष निरंतर बढ़ रहा था। अंग्रेज़ी शासन की दमनकारी नीतियों, आर्थिक शोषण तथा भारतीयों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार ने शिक्षित युवाओं में राष्ट्रीय चेतना को तीव्र कर दिया था।

➣ उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर उदारवादी नेताओं का प्रभाव था, जो याचिकाओं, प्रार्थनाओं और संवैधानिक उपायों के माध्यम से राजनीतिक सुधारों की माँग कर रहे थे।

➣ किंतु अनेक युवा राष्ट्रवादियों का मानना था कि इन उपायों से भारत को स्वतंत्र कराना संभव नहीं है। इसलिए वे अधिक संगठित, अनुशासित और संघर्षपूर्ण आंदोलन की आवश्यकता महसूस करने लगे।

➣ इसी अवधि में स्वामी विवेकानंद के राष्ट्रवादी विचारों, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचनाओं तथा भगवद्गीता जैसे ग्रंथों से प्रेरित होकर युवाओं में आत्मबल, त्याग और राष्ट्रसेवा की भावना का विकास हुआ। इन विचारों ने उन्हें शारीरिक एवं मानसिक रूप से सशक्त बनने के लिए प्रेरित किया।

➣ बंगाल में अनेक स्थानों पर व्यायामशालाएँ, लाठी प्रशिक्षण केंद्र तथा गुप्त युवा मंडल स्थापित होने लगे। इनका उद्देश्य केवल शारीरिक विकास नहीं था, बल्कि युवाओं में अनुशासन, संगठन क्षमता और राष्ट्रभक्ति की भावना विकसित करना भी था।

➣ इन राजनीतिक, वैचारिक और सामाजिक परिस्थितियों के परिणामस्वरूप 1902 ई. में कलकत्ता में अनुशीलन समिति की स्थापना हुई, जिसने आगे चलकर बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन को संगठित रूप प्रदान किया।

अनुशीलन समिति की स्थापना (1902)

1902 ई. में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में अनुशीलन समिति की स्थापना की गई। इस संगठन की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रवादी युवाओं को संगठित कर उन्हें शारीरिक, मानसिक तथा नैतिक रूप से प्रशिक्षित करना और भारत की स्वतंत्रता के लिए तैयार करना था।

➣ अनुशीलन समिति की स्थापना में प्रमथनाथ मित्र ने प्रमुख भूमिका निभाई। वे इसके प्रथम अध्यक्ष बने। इस संगठन को आगे बढ़ाने में सतीश चंद्र बोस, अरविंद घोष (श्री अरविंद), बारिंद्र कुमार घोष, जतिंद्रनाथ बनर्जी (निरालंब स्वामी) तथा अन्य राष्ट्रवादी नेताओं ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

➣ ‘अनुशीलन‘ शब्द का अर्थ है- निरंतर अभ्यास, आत्मविकास एवं अनुशासित प्रशिक्षण। इसी विचार को आधार बनाकर समिति ने युवाओं के सर्वांगीण विकास पर बल दिया।

➣ प्रारम्भ में यह संस्था व्यायाम, लाठी एवं शस्त्र प्रशिक्षण, राष्ट्रीय शिक्षा तथा चरित्र निर्माण जैसी गतिविधियों तक सीमित रही, किन्तु शीघ्र ही इसका स्वरूप एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन के रूप में विकसित हो गया।

➣ स्थापना के कुछ ही वर्षों में अनुशीलन समिति ने बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी शाखाओं का विस्तार किया और अनेक राष्ट्रवादी युवाओं को अपने साथ जोड़ा।

➣ आगे चलकर 1905 ई. के बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन ने इस संगठन की गतिविधियों को नई गति प्रदान की तथा यह बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन गया।

प्रमुख संस्थापक एवं नेतृत्व

व्यक्तित्व भूमिका / योगदान
प्रमथनाथ मित्र अनुशीलन समिति के प्रमुख संस्थापक एवं प्रथम अध्यक्ष; संगठन की वैचारिक एवं संगठनात्मक नींव रखी।
सतीश चंद्र बोस समिति के सह-संस्थापक; युवाओं को संगठित करने तथा प्रारम्भिक गतिविधियों के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अरविंद घोष (श्री अरविंद) समिति के प्रमुख वैचारिक मार्गदर्शक; राष्ट्रवाद एवं क्रांतिकारी विचारधारा के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
बारिंद्र कुमार घोष अरविंद घोष के छोटे भाई; गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियों के संगठन तथा बाद में युगांतर समूह के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जतिंद्रनाथ बनर्जी (निरालंब स्वामी) युवाओं के शारीरिक एवं सैन्य प्रशिक्षण के प्रमुख आयोजकों में से एक; संगठन के प्रारम्भिक विस्तार में योगदान दिया।
बाघा जतिन (जतिंद्रनाथ मुखर्जी) बाद के प्रमुख क्रांतिकारी नेता; अनुशीलन समिति की क्रांतिकारी गतिविधियों के विस्तार तथा सशस्त्र आंदोलन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उद्देश्य

➣ अनुशीलन समिति की स्थापना का उद्देश्य केवल एक संगठन बनाना नहीं था, बल्कि राष्ट्रवादी युवाओं को संगठित कर उन्हें भारत की स्वतंत्रता के लिए तैयार करना था। समिति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे-

  • भारत को ब्रिटिश शासन से पूर्ण स्वतंत्र कराने के लिए युवाओं को संगठित करना।
  • शारीरिक प्रशिक्षण, व्यायाम, लाठी एवं शस्त्र प्रशिक्षण के माध्यम से युवाओं को सुदृढ़ एवं अनुशासित बनाना।
  • राष्ट्रीय शिक्षा, चरित्र निर्माण तथा देशभक्ति की भावना का विकास करना।
  • गुप्त क्रांतिकारी संगठन का निर्माण कर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष के लिए कार्यकर्ताओं को तैयार करना।
  • युवाओं में त्याग, साहस, अनुशासन तथा आत्मबल का विकास करना।
  • भारतीयों में राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ कर विदेशी शासन के विरुद्ध व्यापक जनचेतना उत्पन्न करना।
  • आवश्यकता पड़ने पर सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत की स्वतंत्रता प्राप्त करने की तैयारी करना।

➣ इस प्रकार अनुशीलन समिति ने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता को ही अपना लक्ष्य नहीं बनाया, बल्कि एक ऐसे अनुशासित, राष्ट्रभक्त और संघर्षशील युवा वर्ग का निर्माण करने का प्रयास किया, जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व कर सके।

ढाका अनुशीलन समिति (1906)

1906 ई. में अनुशीलन समिति की गतिविधियों का विस्तार करते हुए पुलिन बिहारी दास ने ढाका में इसकी एक शक्तिशाली शाखा ढाका अनुशीलन समिति की स्थापना की।

➣ बंगाल विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल में क्रांतिकारी आन्दोलन को संगठित करने में इस शाखा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ ढाका अनुशीलन समिति ने युवाओं को शारीरिक प्रशिक्षण, लाठी एवं शस्त्र संचालन तथा गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया। कुछ ही वर्षों में इसकी अनेक शाखाएँ स्थापित हो गईं और यह पूर्वी बंगाल का सबसे प्रभावशाली क्रांतिकारी संगठन बन गया।

➣ आगे चलकर ढाका षड्यंत्र केस (1910), बारीसाल षड्यंत्र प्रकरण तथा अन्य क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण यह शाखा पूरे बंगाल में चर्चित हो गई। बाद में ब्रिटिश सरकार ने इसके विरुद्ध कठोर दमनात्मक कार्रवाई की और पुलिन बिहारी दास सहित अनेक क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया।

युगांतर समूह (1906)

1906 ई. में अनुशीलन समिति के भीतर क्रांतिकारी गतिविधियों को अधिक संगठित और प्रभावी बनाने के उद्देश्य से युगांतर समूह का गठन किया गया।

➣ इसका नेतृत्व मुख्यतः बारिंद्र कुमार घोष, भूपेंद्रनाथ दत्त तथा अन्य युवा क्रांतिकारियों ने किया, जबकि अरविंद घोष इसके प्रमुख वैचारिक प्रेरणास्रोत थे।

युगांतर केवल एक क्रांतिकारी संगठन ही नहीं था, बल्कि इसी नाम से प्रकाशित होने वाला एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र भी था, जिसके माध्यम से युवाओं में राष्ट्रवाद, आत्मबल और क्रांतिकारी विचारधारा का प्रचार किया जाता था।

➣ युगांतर समूह का विश्वास था कि भारत की स्वतंत्रता केवल संवैधानिक सुधारों से प्राप्त नहीं की जा सकती। इसलिए इसने गुप्त संगठन, शस्त्र प्रशिक्षण तथा क्रांतिकारी कार्यवाहियों के माध्यम से ब्रिटिश शासन को चुनौती देने की नीति अपनाई।

➣ समूह ने बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी गतिविधियों का विस्तार किया और अनेक युवाओं को क्रांतिकारी आन्दोलन से जोड़ा।

➣ आगे चलकर मुजफ्फरपुर बम कांड (1908), अलीपुर बम षड्यंत्र केस (1908–1909) तथा हावड़ा षड्यंत्र केस (1910) जैसी घटनाओं के कारण युगांतर समूह पूरे देश में चर्चित हो गया।

युगांतर समूह का गठन 1906 ई. में हुआ।
यह अनुशीलन समिति से निकला प्रमुख क्रांतिकारी समूह था।
बारिंद्र कुमार घोष इसके प्रमुख नेताओं में थे।
अरविंद घोष इसके प्रमुख वैचारिक प्रेरणास्रोत थे।
युगांतर नाम से एक क्रांतिकारी समाचार-पत्र भी प्रकाशित होता था।

प्रमुख गतिविधियाँ

मुजफ्फरपुर बम कांड (1908)

मुजफ्फरपुर बम कांड भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक था। यह घटना 30 अप्रैल 1908 ई. को बिहार के मुजफ्फरपुर नगर में हुई। इसका उद्देश्य ब्रिटिश अधिकारी डगलस हेनरी किंग्सफोर्ड की हत्या करना था।

➣ किंग्सफोर्ड पहले कलकत्ता का मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट था और राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों तथा क्रांतिकारियों के विरुद्ध कठोर दंड देने के कारण भारतीय युवाओं में अत्यंत अलोकप्रिय हो गया था।

➣ सुरक्षा कारणों से बाद में उसका तबादला मुजफ्फरपुर (बिहार) में जिला न्यायाधीश के पद पर कर दिया गया। युगांतर समूह के क्रांतिकारियों ने किंग्सफोर्ड को दंडित करने का निर्णय लिया।

➣ इस कार्य की जिम्मेदारी खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी को सौंपी गई। दोनों कई दिनों तक मुजफ्फरपुर में रहकर किंग्सफोर्ड की गतिविधियों पर गुप्त रूप से निगरानी रखते रहे और उचित अवसर की प्रतीक्षा करते रहे।

30 अप्रैल 1908 ई. की रात लगभग 8:30 बजे दोनों क्रांतिकारियों ने यूरोपियन क्लब से निकल रही एक बग्घी को किंग्सफोर्ड की बग्घी समझकर उस पर बम फेंक दिया। किंतु दुर्भाग्यवश किंग्सफोर्ड उस बग्घी में नहीं था।

➣ उस बग्घी में प्रसिद्ध वकील प्रिंगल कैनेडी की पत्नी श्रीमती कैनेडी तथा उनकी पुत्री कुमारी कैनेडी सवार थीं। बम विस्फोट में दोनों की मृत्यु हो गई, जबकि किंग्सफोर्ड बच गया।

➣ घटना के बाद दोनों क्रांतिकारी अलग-अलग दिशाओं में निकल गए। प्रफुल्ल चाकी को पुलिस ने मोकामा घाट रेलवे स्टेशन के निकट घेर लिया। गिरफ्तारी निश्चित जानकर उन्होंने अपनी पिस्तौल से स्वयं को गोली मार ली और अंग्रेजों के हाथ जीवित पड़ने से बच गए।

➣ दूसरी ओर खुदीराम बोस लगभग 40 किलोमीटर पैदल चलने के बाद वैनीरेलवे स्टेशन के निकट गिरफ्तार कर लिए गए। गिरफ्तारी के समय उनके पास एक पिस्तौल, कारतूस तथा क्रांतिकारी साहित्य मिला।

➣ खुदीराम बोस पर मुजफ्फरपुर सत्र न्यायालय में मुकदमा चलाया गया। मुकदमे की सुनवाई के बाद जिला एवं सत्र न्यायाधीश एच. डब्ल्यू. कॉर्नडॉफ ने उन्हें 13 जून 1908 ई. को मृत्युदंड की सज़ा सुनाई।

➣ इस निर्णय के विरुद्ध कलकत्ता उच्च न्यायालय में अपील की गई, किंतु अपील अस्वीकार कर दी गई और मृत्युदंड बरकरार रखा गया।

11 अगस्त 1908 ई. को मुजफ्फरपुर केंद्रीय कारागार में खुदीराम बोस को फाँसी दे दी गई। उस समय उनकी आयु लगभग 18 वर्ष 8 माह थी।

वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे कम आयु के शहीद क्रांतिकारियों में से एक माने जाते हैं।

अलीपुर षड्यंत्र मामला (1908–1909)

मुजफ्फरपुर बम कांड (30 अप्रैल 1908 ई.) के बाद ब्रिटिश सरकार ने बंगाल के क्रांतिकारी संगठनों के विरुद्ध व्यापक दमन अभियान प्रारम्भ किया।

➣ पुलिस ने कलकत्ता तथा उसके आसपास अनेक स्थानों पर छापे मारे और 2 मई 1908 ई. को माणिकतल्ला बागान स्थित गुप्त क्रांतिकारी केंद्र से बम, हथियार, विस्फोटक सामग्री तथा अनेक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बरामद किए। इन्हीं बरामदगी के आधार पर अनेक क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया।

➣ इन गिरफ्तारियों के बाद ब्रिटिश सरकार ने अनुशीलन समिति एवं युगांतर समूह से जुड़े क्रांतिकारियों के विरुद्ध अलीपुर षड्यंत्र मामला चलाया।

➣ यह मुकदमा अलीपुर सत्र न्यायालय, कलकत्ता में चला और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के सबसे चर्चित राजनीतिक मुकदमों में से एक बन गया।

➣ इस मुकदमे में अरविंद घोष, बारिंद्र कुमार घोष, उल्लासकर दत्त, हेमचंद्र दास, उपेन्द्रनाथ बनर्जी सहित लगभग 38 क्रांतिकारियों पर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध षड्यंत्र रचने, बम निर्माण तथा सशस्त्र क्रांति की तैयारी करने के आरोप लगाए गए।

➣ अरविंद घोष की ओर से प्रसिद्ध अधिवक्ता चित्तरंजन दास (देशबंधु सी. आर. दास) ने पैरवी की। उन्होंने न्यायालय में प्रभावशाली ढंग से यह तर्क प्रस्तुत किया कि अरविंद घोष के विरुद्ध पर्याप्त प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। परिणामस्वरूप मई 1909 ई. में न्यायालय ने अरविंद घोष को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

➣ दूसरी ओर बारिंद्र कुमार घोष तथा उल्लासकर दत्त सहित कई क्रांतिकारियों को प्रारम्भ में मृत्युदंड सुनाया गया, जिसे बाद में घटाकर आजीवन परिवहन कर दिया गया।

➣ उन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल (काला पानी) भेज दिया गया। अन्य कई अभियुक्तों को भी विभिन्न अवधियों के कारावास की सज़ा दी गई।

➣ अलीपुर षड्यंत्र मामला अनुशीलन समिति के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। इस मुकदमे के बाद ब्रिटिश सरकार ने बंगाल के क्रांतिकारी संगठनों पर कड़ी निगरानी और दमन जारी रखा।

➣ यद्यपि इससे अनुशीलन समिति की गतिविधियाँ प्रभावित हुईं, फिर भी उसके क्रांतिकारी विचार और संगठनात्मक परंपरा आगे चलकर बाघा जतिन तथा अन्य क्रांतिकारियों के माध्यम से जीवित रही।

ढाका षड्यंत्र केस (1910)

अलीपुर बम षड्यंत्र मामले (1908–1909) के बाद ब्रिटिश सरकार ने यह अनुभव किया कि बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियाँ केवल कलकत्ता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनकी जड़ें पूर्वी बंगाल तक फैल चुकी हैं।

➣ विशेष रूप से ढाका अनुशीलन समिति के नेतृत्व में अनेक गुप्त शाखाएँ कार्य कर रही थीं, जहाँ युवाओं को शारीरिक प्रशिक्षण, लाठी एवं शस्त्र संचालन का अभ्यास कराया जाता था तथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति की तैयारी की जा रही थी।

➣ इन्हीं गतिविधियों को समाप्त करने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने 1910 ई. में पूर्वी बंगाल में व्यापक दमन अभियान चलाया।

➣ पुलिस ने ढाका तथा उसके आसपास स्थित अनुशीलन समिति की अनेक शाखाओं पर छापेमारी की और संगठन से जुड़े कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। अनेक गुप्त दस्तावेज़ तथा संगठन की गतिविधियों से संबंधित अभिलेख कब्जे में लिए गए।

➣ इन गिरफ्तारियों के आधार पर पुलिन बिहारी दास सहित ढाका अनुशीलन समिति के अनेक सदस्यों के विरुद्ध ढाका षड्यंत्र केस चलाया गया।

➣ अभियुक्तों पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 121A के अंतर्गत ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र रचने, गुप्त क्रांतिकारी संगठन संचालित करने, युवाओं को सैन्य एवं शस्त्र प्रशिक्षण देने तथा सशस्त्र विद्रोह की तैयारी करने के आरोप लगाए गए।

➣ मुकदमे के दौरान ब्रिटिश सरकार ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि ढाका अनुशीलन समिति केवल एक व्यायाम अथवा शारीरिक प्रशिक्षण संस्था नहीं थी, बल्कि उसका वास्तविक उद्देश्य ब्रिटिश शासन को बलपूर्वक समाप्त करना था।

➣ परिणामस्वरूप न्यायालय ने पुलिन बिहारी दास सहित अनेक अभियुक्तों को विभिन्न अवधियों के कठोर कारावास की सजा सुनाई।

➣ मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि ढाका अनुशीलन समिति केवल शारीरिक प्रशिक्षण संस्था नहीं थी, बल्कि उसका वास्तविक उद्देश्य ब्रिटिश शासन को बलपूर्वक समाप्त करना था।

➣ ढाका षड्यंत्र केस के समानांतर ब्रिटिश सरकार ने बारीसाल तथा पूर्वी बंगाल के अन्य क्षेत्रों में भी क्रांतिकारी नेटवर्क को समाप्त करने के लिए व्यापक गिरफ्तारियाँ कीं।

➣ इस दौरान ढाका अनुशीलन समिति से जुड़े अनेक कार्यकर्ताओं के विरुद्ध मुकदमे चलाए गए, जिन्हें सामूहिक रूप से बारीसाल षड्यंत्र प्रकरण कहा जाता है।

➣ यद्यपि इन दमनात्मक कार्रवाइयों से पूर्वी बंगाल का क्रांतिकारी आन्दोलन कुछ समय के लिए कमजोर पड़ा, फिर भी अनुशीलन समिति और युगांतर समूह की गतिविधियाँ पूर्णतः समाप्त नहीं हुईं।

हावड़ा षड्यंत्र केस (1910)

अलीपुर बम षड्यंत्र मामले (1908–1909) के बाद ब्रिटिश सरकार का मानना था कि बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन का पूर्णतः दमन हो चुका है। किन्तु जतिन्द्रनाथ मुखर्जी (बाघा जतिन) के नेतृत्व में युगांतर समूह ने पुनः अपने संगठन का विस्तार प्रारम्भ कर दिया।

➣ इस दौरान क्रांतिकारी विभिन्न स्थानों पर गुप्त रूप से संगठित होकर हथियार एकत्र करने, सैनिकों से संपर्क स्थापित करने तथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह की तैयारी में जुट गए।

➣ इन गतिविधियों की जानकारी मिलने पर ब्रिटिश सरकार ने 1910 ई. में अनेक स्थानों पर छापेमारी कर कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया तथा उनके विरुद्ध हावड़ा षड्यंत्र केस चलाया। इस मुकदमे का केंद्र हावड़ा (कलकत्ता) था, इसलिए इसे हावड़ा षड्यंत्र केस कहा गया।

➣ इस मुकदमे में बाघा जतिन (जतिन्द्रनाथ मुखर्जी) सहित युगांतर समूह के अनेक सदस्यों पर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध षड्यंत्र रचने, गुप्त क्रांतिकारी संगठन संचालित करने, हथियार एकत्र करने तथा सरकारी अधिकारियों की हत्या एवं सशस्त्र विद्रोह की योजना बनाने के आरोप लगाए गए।

➣ मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष बाघा जतिन के विरुद्ध पर्याप्त प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। परिणामस्वरूप वे इस मुकदमे में दोषमुक्त हो गए, जबकि कई अन्य क्रांतिकारियों को विभिन्न अवधियों के कारावास की सजा सुनाई गई।

➣ हावड़ा षड्यंत्र केस के बाद युगांतर समूह की गतिविधियाँ कुछ समय के लिए प्रभावित अवश्य हुईं, किन्तु बाघा जतिन ने संगठन को पुनर्गठित किया।

➣ आगे चलकर इसी संगठन ने रॉडा शस्त्र लूट (1914), हिन्दू-जर्मन षड्यंत्र तथा बालासोर संघर्ष (1915) जैसी महत्वपूर्ण क्रांतिकारी गतिविधियों में प्रमुख भूमिका निभाई।

हार्डिंग बम कांड (दिल्ली षड्यंत्र) (1912)

12 दिसम्बर, 1912 ई. को ब्रिटिश सरकार ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा के उपलक्ष्य में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय का भव्य जुलूस निकाला।

➣ जब यह जुलूस चाँदनी चौक, दिल्ली से गुजर रहा था, तभी वायसराय के हाथी पर एक शक्तिशाली बम फेंका गया। इस घटना को इतिहास में हार्डिंग बम कांड अथवा दिल्ली षड्यंत्र केस के नाम से जाना जाता है।

➣ इस षड्यंत्र की योजना का प्रमुख नेतृत्व रासबिहारी बोस ने किया था। इसके क्रियान्वयन में सचिन्द्रनाथ सान्याल, अमीरचंद, अवध बिहारी, बालमुकुन्द तथा बसंत कुमार विश्वास सहित अनेक क्रांतिकारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ माना जाता है कि वायसराय के हाथी पर बम फेंकने का कार्य बसंत कुमार विश्वास ने किया था, जिन्होंने महिला का वेश धारण कर स्वयं को भीड़ में छिपा लिया था।

➣ बम विस्फोट में लॉर्ड हार्डिंग गंभीर रूप से घायल हो गया तथा उसका अंगरक्षक मारा गया, किन्तु वायसराय की जान बच गई। इस घटना ने ब्रिटिश सरकार को झकझोर दिया, क्योंकि पहली बार भारत के सर्वोच्च ब्रिटिश अधिकारी को सार्वजनिक रूप से निशाना बनाया गया था।

➣ इसके बाद दिल्ली, पंजाब, संयुक्त प्रान्त तथा बंगाल में व्यापक स्तर पर छापेमारी और गिरफ्तारियाँ प्रारम्भ कर दी गईं। लंबी जाँच के बाद ब्रिटिश सरकार ने इस घटना से संबंधित दिल्ली षड्यंत्र केस चलाया।

➣ मुकदमे में अमीरचंद, अवध बिहारी, बालमुकुन्द तथा बसंत कुमार विश्वास को दोषी ठहराकर मृत्युदंड दिया गया। दूसरी ओर रासबिहारी बोस गिरफ्तारी से बच निकले और कुछ समय तक गुप्त रूप से क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करते रहे।

➣ बाद में 1915 ई. में वे जापान चले गए, जहाँ से उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित करने का कार्य जारी रखा।

➣ आगे चलकर रासबिहारी बोस ने गदर आन्दोलन, हिन्दू-जर्मन षड्यंत्र तथा बाद में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग के संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ इसके बाद सरकार ने क्रांतिकारी संगठनों के विरुद्ध दमन और अधिक कठोर कर दिया, किन्तु इससे क्रांतिकारी गतिविधियाँ पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं।

रॉडा शस्त्र लूट (1914)

26 अगस्त, 1914 ई. को युगांतर समूह के क्रांतिकारियों ने कलकत्ता स्थित ब्रिटिश हथियार आपूर्तिकर्ता कंपनी रॉडा एंड कंपनी से बड़ी मात्रा में हथियार एवं कारतूस लूट लिए।

➣ यह घटना इतिहास में रॉडा शस्त्र लूट (Rodda Arms Heist) के नाम से प्रसिद्ध है और भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन की सबसे सफल गुप्त कार्रवाइयों में से एक मानी जाती है।

➣ इस योजना का नेतृत्व श्रीशचन्द्र मित्र (हाबू) ने किया, जो उस समय रॉडा एंड कंपनी में कार्यरत थे। उन्होंने कंपनी से हथियारों की खेप ले जाने के दौरान एक बैलगाड़ी को योजना के अनुसार अलग मार्ग पर भेज दिया, जिससे क्रांतिकारी बिना किसी संदेह के हथियार लेकर सुरक्षित निकलने में सफल रहे।

➣ इस कार्रवाई में क्रांतिकारियों के हाथ लगभग 50 माउज़र पिस्तौल तथा लगभग 46,000 कारतूस लगे। उस समय यह ब्रिटिश भारत में क्रांतिकारियों द्वारा हथियारों की सबसे बड़ी सफल लूट थी।

➣ इन हथियारों का उपयोग बाद में युगांतर समूह, बाघा जतिन तथा अन्य क्रांतिकारी संगठनों द्वारा विभिन्न गुप्त अभियानों में किया गया।

➣ रॉडा शस्त्र लूट के बाद ब्रिटिश सरकार ने पूरे बंगाल में व्यापक तलाशी अभियान चलाया तथा अनेक क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया। यद्यपि पुलिस कुछ हथियार बरामद करने में सफल रही, फिर भी अधिकांश हथियार क्रांतिकारियों के पास पहुँच चुके थे और उनका उपयोग आगे की क्रांतिकारी गतिविधियों में किया गया।

➣ रॉडा शस्त्र लूट का भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन पर दूरगामी प्रभाव पड़ा। इस प्रकार यह घटना बंगाल के क्रांतिकारी आन्दोलन तथा आगे चलकर बालासोर संघर्ष (1915) की महत्वपूर्ण कड़ी सिद्ध हुई।

बर्लिन समिति से संपर्क

प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) प्रारम्भ होने के बाद विदेशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों ने यह अवसर देखा कि ब्रिटेन युद्ध में व्यस्त होने के कारण भारत में सशस्त्र क्रांति सफल हो सकती है।

➣ इसी उद्देश्य से जर्मनी के बर्लिन में कार्यरत बर्लिन समिति ने जर्मन सरकार के सहयोग से भारत में हथियार पहुँचाकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक विद्रोह की योजना बनाई, जिसे इतिहास में हिन्दू-जर्मन षड्यंत्र के नाम से जाना जाता है।

➣ इस योजना के अंतर्गत जर्मन सरकार ने भारतीय क्रांतिकारियों को हथियार एवं गोला-बारूद उपलब्ध कराने का निर्णय लिया। योजना के अनुसार हथियारों की खेप एनी लार्सन नामक जहाज़ के माध्यम से प्रशांत महासागर के रास्ते भेजी जानी थी, जबकि एस. एस. मैवरिक के माध्यम से उन्हें दक्षिण-पूर्व एशिया होते हुए भारत पहुँचाने की योजना बनाई गई।

➣ इसके अतिरिक्त बैटाविया (वर्तमान जकार्ता, इंडोनेशिया) को भारतीय क्रांतिकारियों और जर्मन प्रतिनिधियों के बीच संपर्क स्थापित करने तथा हथियारों के स्थानांतरण के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में चुना गया।

➣ भारत में इन हथियारों को प्राप्त करने तथा उन्हें क्रांतिकारियों तक पहुँचाने का दायित्व युगांतर समूह के नेता बाघा जतिन (जतिन्द्रनाथ मुखर्जी) को सौंपा गया। उन्होंने उड़ीसा तट के माध्यम से हथियार प्राप्त करने की योजना बनाई और अपने साथियों के साथ आवश्यक तैयारियाँ प्रारम्भ कर दीं।

➣ किन्तु यह योजना सफल नहीं हो सकी। एनी लार्सन और एस. एस. मैवरिक के बीच हथियारों का स्थानांतरण निर्धारित योजना के अनुसार नहीं हो पाया। दूसरी ओर ब्रिटिश गुप्तचर विभाग को पूरे षड्यंत्र की जानकारी मिल गई, जिसके बाद समुद्री मार्गों तथा भारतीय तटों पर कड़ी निगरानी स्थापित कर दी गई। परिणामस्वरूप जर्मनी से भेजे जाने वाले हथियार भारत नहीं पहुँच सके और सम्पूर्ण योजना विफल हो गई।

➣ योजना के विफल होने के बाद ब्रिटिश पुलिस ने बाघा जतिन और उनके साथियों की खोज तेज कर दी। क्रांतिकारियों को उड़ीसा की ओर हटना पड़ा, जहाँ आगे चलकर बालासोर अभियान (1915) के दौरान उनका ब्रिटिश सेना एवं पुलिस से अंतिम सशस्त्र संघर्ष हुआ।

बाघा जतिन एवं बालासोर अभियान

बर्लिन समिति से संपर्क स्थापित होने के बाद बाघा जतिन (जतिन्द्रनाथ मुखर्जी) ने अपने साथियों के साथ उड़ीसा तट पर जर्मनी से भेजे जाने वाले हथियार प्राप्त करने की तैयारी प्रारम्भ कर दी।

➣ यद्यपि एनी लार्सन–एस.एस. मैवरिक शस्त्र योजना विफल हो गई, फिर भी ब्रिटिश सरकार को विश्वास था कि बाघा जतिन और उनके साथी सशस्त्र विद्रोह की तैयारी में लगे हुए हैं। परिणामस्वरूप उनके विरुद्ध व्यापक खोज अभियान प्रारम्भ कर दिया गया।

➣ ब्रिटिश गुप्तचर विभाग की लगातार निगरानी के कारण बाघा जतिन, चित्तप्रिय राय चौधरी, मनोरंजन सेनगुप्ता, नरेन्द्रनाथ दासगुप्ता तथा ज्योतिषचन्द्र पाल उड़ीसा के जंगलों की ओर चले गए।

पुलिस और सेना लगातार उनका पीछा करती रही।

➣ अंततः 9 सितम्बर, 1915 ई. को उड़ीसा के बालासोर जिले में बुरीबलंग नदी के तट पर दोनों पक्षों के बीच भीषण मुठभेड़ हुई। इस मुठभेड़ में चित्तप्रिय राय चौधरी वीरगति को प्राप्त हुए, जबकि बाघा जतिन गंभीर रूप से घायल हो गए।

➣ घायल अवस्था में बाघा जतिन को गिरफ्तार कर बालासोर अस्पताल ले जाया गया, जहाँ 10 सितम्बर, 1915 ई. को उनका निधन हो गया। उनके अन्य साथियों को गिरफ्तार कर विभिन्न अवधियों के कारावास की सजा सुनाई गई।

➣ बाघा जतिन की मृत्यु के साथ अनुशीलन समिति और युगांतर समूह के एक महत्वपूर्ण चरण का अंत हो गया। यद्यपि इसके बाद भी बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियाँ जारी रहीं, किन्तु संगठन को बाघा जतिन जैसा प्रभावशाली नेतृत्व पुनः प्राप्त नहीं हो सका।

अनुशीलन समिति का पतन

➣ ➣ 1915 ई. में बालासोर अभियान के दौरान बाघा जतिन (जतिन्द्रनाथ मुखर्जी) की मृत्यु अनुशीलन समिति के लिए सबसे बड़ा आघात सिद्ध हुई। उनके नेतृत्व में संगठन बंगाल का सबसे सक्रिय क्रांतिकारी समूह बन चुका था, इसलिए उनकी शहादत के बाद संगठन को प्रभावी नेतृत्व नहीं मिल सका।

➣ ➣ दूसरी ओर अलीपुर बम षड्यंत्र मामला, ढाका षड्यंत्र केस, हावड़ा षड्यंत्र केस तथा अन्य मुकदमों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने संगठन के अनेक प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार किया इससे अनुशीलन समिति का संगठनात्मक ढाँचा कमजोर पड़ गया।

➣ ➣ प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हिन्दू-जर्मन षड्यंत्र की विफलता तथा विदेशी स्रोतों से हथियार प्राप्त करने की योजना असफल हो जाने से संगठन की सशस्त्र क्रांति की रणनीति को भी गंभीर झटका लगा।

➣ ➣ यद्यपि अनुशीलन समिति का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो गया, फिर भी उसके अनेक सदस्य आगे चलकर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA), हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) तथा अन्य क्रांतिकारी संगठनों से जुड़कर स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय रहे।

➣ ➣ इस प्रकार अनुशीलन समिति की क्रांतिकारी परंपरा आगे की पीढ़ी तक पहुँचती रही।

प्रमुख व्यक्तित्व

व्यक्तित्व भूमिका / योगदान
प्रमथनाथ मित्र अनुशीलन समिति के प्रमुख संस्थापक एवं प्रथम अध्यक्ष; संगठन की वैचारिक एवं संगठनात्मक नींव रखी।
सतीश चंद्र बोस समिति के सह-संस्थापक; युवाओं को संगठित करने तथा प्रारम्भिक गतिविधियों के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अरविंद घोष (श्री अरविंद) समिति के प्रमुख वैचारिक मार्गदर्शक; क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का प्रचार किया तथा अलीपुर षड्यंत्र मामले में प्रमुख अभियुक्त रहे, बाद में बरी हुए।
बारिंद्र कुमार घोष अरविंद घोष के छोटे भाई; युगांतर समूह के प्रमुख नेता तथा माणिकतल्ला बम कारखाने के संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जतिंद्रनाथ बनर्जी (निरालंब स्वामी) समिति के प्रारम्भिक नेताओं में से एक; युवाओं के शारीरिक एवं सैन्य प्रशिक्षण को संगठित किया।
भूपेंद्रनाथ दत्त युगांतर समाचार-पत्र के संपादन तथा क्रांतिकारी विचारों के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
खुदीराम बोस मुजफ्फरपुर बम कांड (1908) के प्रमुख क्रांतिकारी; 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर केंद्रीय कारागार में फाँसी दी गई।
प्रफुल्ल चाकी मुजफ्फरपुर बम कांड में खुदीराम बोस के सहयोगी; गिरफ्तारी से बचने के लिए मोकामा घाट के निकट आत्मबलिदान किया।
बाघा जतिन (जतिंद्रनाथ मुखर्जी) अनुशीलन समिति के उत्तरकाल के प्रमुख क्रांतिकारी नेता; प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सशस्त्र विद्रोह की योजना बनाई तथा 1915 में बालासोर के निकट वीरगति प्राप्त की।
चित्तरंजन दास (देशबंधु) अलीपुर षड्यंत्र मामले में अरविंद घोष की ओर से सफल पैरवी कर उन्हें बरी कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

समयरेखा (Timeline)

वर्ष / तिथि प्रमुख घटना
1902 ई. कलकत्ता में प्रमथनाथ मित्र के नेतृत्व में अनुशीलन समिति की स्थापना।
1905 ई. बंगाल विभाजन के बाद समिति की गतिविधियों में तीव्र वृद्धि तथा स्वदेशी आंदोलन से निकट संबंध।
1906 ई. ढाका अनुशीलन समिति की स्थापना; पुलिन बिहारी दास के नेतृत्व में पूर्वी बंगाल में संगठन का विस्तार।
1906 ई. युगांतर समूह का गठन तथा युगांतर समाचार-पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ।
30 अप्रैल 1908 ई. मुजफ्फरपुर बम कांड; खुदीराम बोस एवं प्रफुल्ल चाकी द्वारा किंग्सफोर्ड पर बम फेंकने का प्रयास।
2 मई 1908 ई. माणिकतल्ला बागान पर पुलिस का छापा; बम, हथियार एवं गुप्त दस्तावेज़ बरामद।
1908–1909 ई. अलीपुर षड्यंत्र मामला चला; अनेक क्रांतिकारियों पर मुकदमा।
13 जून 1908 ई. खुदीराम बोस को मुजफ्फरपुर सत्र न्यायालय द्वारा मृत्युदंड की सज़ा सुनाई गई।
11 अगस्त 1908 ई. मुजफ्फरपुर केंद्रीय कारागार में खुदीराम बोस को फाँसी दी गई।
मई 1909 ई. अरविंद घोष अलीपुर षड्यंत्र मामले में साक्ष्यों के अभाव में बरी हुए।
1910 ई. ढाका षड्यंत्र केस; पुलिन बिहारी दास सहित ढाका अनुशीलन समिति के अनेक क्रांतिकारियों पर मुकदमा चलाया गया।
1910 ई. हावड़ा षड्यंत्र केस; बाघा जतिन के नेतृत्व में पुनर्गठित युगांतर समूह के विरुद्ध ब्रिटिश सरकार का प्रमुख मुकदमा।
12 दिसम्बर 1912 ई. हार्डिंग बम कांड (दिल्ली षड्यंत्र); वायसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय पर बम फेंका गया।
26 अगस्त 1914 ई. रॉडा शस्त्र लूट; युगांतर समूह ने कलकत्ता स्थित रॉडा एंड कंपनी से हथियारों की बड़ी खेप प्राप्त की।
10 सितंबर 1915 ई. बालासोर (उड़ीसा) के निकट मुठभेड़ में बाघा जतिन वीरगति को प्राप्त हुए।

तुलनात्मक अध्ययन : अनुशीलन समिति एवं अभिनव भारत

आधार अनुशीलन समिति अभिनव भारत
स्थापना 1902 ई. 1904 ई.
स्थापना स्थान कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) नासिक (महाराष्ट्र)
संस्थापक प्रमथनाथ मित्र (सतीश चंद्र बोस एवं अन्य राष्ट्रवादियों के सहयोग से) विनायक दामोदर सावरकर एवं गणेश दामोदर सावरकर
प्रमुख कार्यक्षेत्र बंगाल महाराष्ट्र तथा लंदन में इंडिया हाउस के माध्यम से विदेश
प्रमुख उद्देश्य युवाओं को संगठित कर सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत की स्वतंत्रता प्राप्त करना। गुप्त क्रांतिकारी संगठन बनाकर ब्रिटिश शासन का अंत करना तथा पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना।
प्रमुख गतिविधियाँ युगांतर समूह, मुजफ्फरपुर बम कांड, अलीपुर षड्यंत्र मामला। क्रांतिकारी साहित्य का प्रचार, इंडिया हाउस की गतिविधियाँ, नासिक षड्यंत्र प्रकरण।
प्रमुख नेता अरविंद घोष, बारिंद्र कुमार घोष, बाघा जतिन, खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चाकी। वी. डी. सावरकर, गणेश सावरकर, मदनलाल धींगरा, अनंत लक्ष्मण कान्हेरे।
विशेषता बंगाल में संगठित क्रांतिकारी आंदोलन की मजबूत नींव रखी। महाराष्ट्र में गुप्त क्रांतिकारी संगठन का विकास किया तथा विदेशों में भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को गति दी।
ऐतिहासिक महत्व बाद के क्रांतिकारी संगठनों तथा युगांतर समूह को प्रेरणा दी। आगे चलकर गदर आंदोलन, HRA तथा अन्य क्रांतिकारी संगठनों की वैचारिक पृष्ठभूमि को मजबूत किया।

कुछ महत्वपूर्ण भ्रम-बिंदु

अनुशीलन समिति को भारत का पहला क्रांतिकारी संगठन नहीं माना जाना चाहिए। यह आधुनिक भारत के प्रारम्भिक एवं सबसे प्रभावशाली क्रांतिकारी संगठनों में से एक था; इससे पहले मित्र मेला (1899) जैसे गुप्त क्रांतिकारी संगठन अस्तित्व में आ चुके थे।

अनुशीलन समिति की स्थापना बंगाल विभाजन (1905) के बाद नहीं हुई थी। इसका गठन 1902 ई. में हो चुका था, जबकि 1905 के बंगाल विभाजन के बाद इसकी गतिविधियों का तेजी से विस्तार हुआ।

अनुशीलन समिति और युगांतर को पूरी तरह अलग-अलग संगठन समझना ठीक नहीं होगा। युगांतर समूह अनुशीलन समिति से निकला प्रमुख क्रांतिकारी समूह था।

ढाका अनुशीलन समिति अनुशीलन समिति से अलग कोई असंबंधित संगठन नहीं थी, बल्कि इसकी एक प्रमुख शाखा थी। इसका नेतृत्व पुलिन बिहारी दास ने किया।

प्रमथनाथ मित्र अनुशीलन समिति के प्रमुख संस्थापक थे, जबकि अरविंद घोष इसके प्रमुख वैचारिक मार्गदर्शकों में शामिल थे। इसलिए अनुशीलन समिति की स्थापना का पूरा श्रेय केवल अरविंद घोष को देना उचित नहीं है।

बारिंद्र कुमार घोष और अरविंद घोष दो अलग-अलग व्यक्ति थे। बारिंद्र कुमार घोष, अरविंद घोष के छोटे भाई थे।

मुजफ्फरपुर बम कांड में जज किंग्सफोर्ड की मृत्यु नहीं हुई थी। वे बच गए थे, जबकि बम गलती से प्रिंगल कैनेडी की पत्नी और पुत्री की बग्घी पर गिरा था।

प्रफुल्ल चाकी को गिरफ्तार नहीं किया जा सका था। गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने मोकामा घाट के निकट स्वयं को गोली मार ली।

खुदीराम बोस को काला पानी की सजा नहीं मिली थी। उन्हें 11 अगस्त 1908 ई. को मुजफ्फरपुर केंद्रीय कारागार में फाँसी दी गई थी।

मुजफ्फरपुर बम कांड और अलीपुर षड्यंत्र मामला एक ही घटना नहीं थे। मुजफ्फरपुर बम कांड 1908 में हुआ, जबकि उसके बाद हुई गिरफ्तारियों और माणिकतल्ला बागान से बरामद सामग्री के आधार पर अलीपुर षड्यंत्र मामला (1908–1909) चलाया गया।

अलीपुर षड्यंत्र मामले में अरविंद घोष को सजा नहीं हुई थी। चित्तरंजन दास की पैरवी के बाद वे 1909 ई. में साक्ष्यों के अभाव में बरी हो गए।

अलीपुर षड्यंत्र मामला और हावड़ा षड्यंत्र केस दो अलग-अलग मुकदमे थे। हावड़ा केस 1910 में चला और इसका संबंध मुख्यतः बाघा जतिन के नेतृत्व में पुनर्गठित युगांतर समूह से था।

हार्डिंग बम कांड में लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय की मृत्यु नहीं हुई थी। वे गंभीर रूप से घायल हुए थे, लेकिन उनकी जान बच गई।

रॉडा शस्त्र लूट में हथियार ब्रिटिश सेना से सीधे नहीं लूटे गए थे। ये हथियार रॉडा एंड कंपनी से लूटे गए थे, जो ब्रिटिश सरकार को हथियारों की आपूर्ति करने वाली निजी कंपनी थी।

बर्लिन समिति भारत में स्थापित संगठन नहीं थी। इसका गठन जर्मनी के बर्लिन में भारतीय क्रांतिकारियों ने किया था।

बाघा जतिन अनुशीलन समिति के संस्थापक नहीं थे। वे बाद के दौर में इसके प्रमुख क्रांतिकारी नेताओं में उभरे और युगांतर समूह के प्रमुख नेता बने।

बालासोर संघर्ष में बाघा जतिन की मृत्यु उसी दिन नहीं हुई थी। 9 सितंबर 1915 ई. को वे गंभीर रूप से घायल हुए और अगले दिन 10 सितंबर 1915 ई. को बालासोर अस्पताल में उनका निधन हुआ।

अनुशीलन समिति को केवल शारीरिक व्यायाम कराने वाली संस्था समझना अधूरा होगा। शुरुआती दौर में शारीरिक प्रशिक्षण पर जोर था, लेकिन आगे चलकर यह एक संगठित गुप्त क्रांतिकारी संगठन के रूप में विकसित हुई।

अनुशीलन समिति और अभिनव भारत एक ही संगठन नहीं थे। अनुशीलन समिति की स्थापना 1902 ई. में कलकत्ता में हुई थी, जबकि अभिनव भारत की स्थापना 1904 ई. में नासिक में हुई।

सारांश

  • अनुशीलन समिति आधुनिक भारत के प्रारम्भिक एवं सबसे प्रभावशाली क्रांतिकारी संगठनों में से एक थी। इसकी स्थापना 1902 ई. में कलकत्ता में प्रमथनाथ मित्र ने की थी।
  • संगठन का उद्देश्य युवाओं में राष्ट्रवाद, अनुशासन, शारीरिक एवं सैन्य प्रशिक्षण तथा सशस्त्र क्रांति की भावना विकसित कर भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराना था।
  • 1905 ई. के बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन के बाद अनुशीलन समिति का तीव्र विस्तार हुआ। इसी दौरान ढाका अनुशीलन समिति तथा युगांतर समूह जैसी शाखाओं ने बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन को नई दिशा प्रदान की।
  • अनुशीलन समिति से जुड़े क्रांतिकारियों ने मुजफ्फरपुर बम कांड (1908), अलीपुर बम षड्यंत्र मामला (1908–1909), ढाका षड्यंत्र केस (1910), हावड़ा षड्यंत्र केस (1910), हार्डिंग बम कांड (1912) तथा रॉडा शस्त्र लूट (1914) जैसी अनेक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी घटनाओं में प्रमुख भूमिका निभाई।
  • प्रथम विश्व युद्ध के दौरान बर्लिन समिति के माध्यम से हिन्दू-जर्मन षड्यंत्र के अंतर्गत भारत में हथियार पहुँचाने की योजना बनाई गई, जिसमें बाघा जतिन (जतिन्द्रनाथ मुखर्जी) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • 1915 ई. के बालासोर अभियान में बाघा जतिन ने अपने साथियों के साथ ब्रिटिश सेना का सामना किया। इस संघर्ष में वे गंभीर रूप से घायल हुए और अगले दिन उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु अनुशीलन समिति के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई।
  • ब्रिटिश सरकार के दमन, लगातार चलाए गए षड्यंत्र मुकदमों तथा प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी एवं मृत्यु के कारण अनुशीलन समिति का संगठन धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया।
  • यद्यपि अनुशीलन समिति का प्रभाव समय के साथ कम हो गया, फिर भी इसकी संगठनात्मक परंपरा, क्रांतिकारी विचारधारा और प्रशिक्षण प्रणाली ने आगे चलकर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA), हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) तथा अन्य क्रांतिकारी संगठनों को गहराई से प्रभावित किया।
  • भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में अनुशीलन समिति का सबसे बड़ा योगदान भारत में संगठित गुप्त क्रांतिकारी आंदोलन की मजबूत नींव रखना तथा राष्ट्रवादी युवाओं की ऐसी पीढ़ी तैयार करना था, जिसने आगे के स्वतंत्रता संघर्ष को नई दिशा प्रदान की।

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