गदर पार्टी
➣ गदर पार्टी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख क्रांतिकारी संगठन था, जिसकी स्थापना 21 अप्रैल 1913 ई. को सैन फ्रांसिस्को (संयुक्त राज्य अमेरिका) में रहने वाले भारतीय प्रवासियों द्वारा की गई। इसका मुख्य उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत से ब्रिटिश शासन का अंत कर पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना था।
➣ गदर पार्टी का नेतृत्व मुख्यतः लाला हरदयाल, सोहन सिंह भकना, करतार सिंह सराभा तथा अन्य प्रवासी भारतीय क्रांतिकारियों ने किया। संगठन का मुख्यालय युगांतर आश्रम, सैन फ्रांसिस्को में स्थापित किया गया, जहाँ से ‘गदर नामक समाचार-पत्र प्रकाशित होता था।
➣ प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के प्रारम्भ होते ही गदर पार्टी ने इसे भारत में सशस्त्र विद्रोह के लिए अनुकूल अवसर माना। उसने विदेशों में रहने वाले भारतीयों को स्वदेश लौटकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांति करने का आह्वान किया।
➣ यद्यपि 1915 ई. की नियोजित क्रांति सफल नहीं हो सकी, फिर भी गदर आंदोलन ने भारतीय क्रांतिकारी परंपरा को नई दिशा प्रदान की और आगे के अनेक क्रांतिकारी संगठनों को प्रेरित किया।
➣ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में गदर पार्टी का विशेष महत्व इस बात में निहित है कि यह पहला संगठित भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन था, जिसने विदेश की धरती से ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी तथा भारतीय स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जनमत तैयार करने का प्रयास किया।
स्थापना की पृष्ठभूमि
➣ बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एक नए चरण में प्रवेश कर चुका था। बंगाल विभाजन (1905), स्वदेशी आंदोलन तथा ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों ने भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना को तीव्र किया।
➣ दूसरी ओर, क्रांतिकारी संगठनों का उदय भी हो रहा था, जो मानते थे कि केवल संवैधानिक उपायों से भारत को स्वतंत्र कराना संभव नहीं है।
➣ इसी समय बड़ी संख्या में भारतीय, विशेषकर पंजाब के किसान, पूर्व सैनिक तथा श्रमिक, रोजगार की तलाश में संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा पहुँचे।
➣ विदेश में उन्हें नस्लीय भेदभाव, आव्रजन संबंधी कठोर कानूनों तथा सामाजिक उपेक्षा का सामना करना पड़ा। इन अनुभवों ने उनके मन में ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष को और अधिक बढ़ा दिया।
➣ प्रवासी भारतीयों का यह भी मानना था कि विदेशों में भारतीयों के साथ होने वाले अपमान का मूल कारण भारत का पराधीन होना है। इसलिए उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि सम्मान और अधिकार तभी प्राप्त हो सकते हैं, जब भारत ब्रिटिश शासन से पूर्णतः स्वतंत्र हो।
➣ इसी अवधि में लाला हरदयाल जैसे क्रांतिकारी नेताओं ने विदेशों में बसे भारतीयों को संगठित करना प्रारम्भ किया। उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और सशस्त्र क्रांति के विचारों का प्रचार किया, जिससे प्रवासी भारतीयों में राजनीतिक जागृति उत्पन्न हुई।
➣ इन सभी राजनीतिक, सामाजिक तथा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने मिलकर एक ऐसे क्रांतिकारी संगठन की आवश्यकता उत्पन्न की, जो विदेश की धरती से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का संचालन कर सके। इन्हीं परिस्थितियों के परिणामस्वरूप 1913 ई. में गदर पार्टी की स्थापना हुई।
गदर पार्टी की स्थापना (1913)
➣ विदेशों में रह रहे भारतीयों के बढ़ते असंतोष तथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति की आवश्यकता को देखते हुए 21 अप्रैल 1913 ई. को सैन फ्रांसिस्को (संयुक्त राज्य अमेरिका) में हिंदुस्तान गदर पार्टी की स्थापना की गई। बाद में यह संगठन सामान्यतः गदर पार्टी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
➣ गदर पार्टी के गठन में लाला हरदयाल ने प्रमुख वैचारिक भूमिका निभाई, जबकि सोहन सिंह भकना इसके प्रथम अध्यक्ष चुने गए। संगठन का नेतृत्व मुख्यतः अमेरिका और कनाडा में रहने वाले भारतीय प्रवासी क्रांतिकारियों ने किया, जिनमें अधिकांश पंजाब से थे।
➣ गदर पार्टी का मुख्यालय युगांतर आश्रम, सैन फ्रांसिस्को में स्थापित किया गया। यही संगठन की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना। यहीं से क्रांतिकारी साहित्य का प्रकाशन तथा विश्वभर में बसे भारतीयों से संपर्क स्थापित किया जाता था।
➣ गदर पार्टी की स्थापना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी, क्योंकि यह पहला संगठित भारतीय क्रांतिकारी संगठन था जिसने विदेश की धरती से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संगठित आंदोलन प्रारम्भ किया।
➣ आगे चलकर इस संगठन ने ‘गदर नामक समाचार-पत्र के माध्यम से क्रांतिकारी विचारों का व्यापक प्रचार किया तथा प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत में सशस्त्र विद्रोह की योजना बनाई।
प्रमुख संस्थापक एवं नेतृत्व
| व्यक्तित्व | भूमिका / योगदान |
|---|---|
| लाला हरदयाल | गदर पार्टी के प्रमुख वैचारिक मार्गदर्शक; प्रवासी भारतीयों में क्रांतिकारी विचारों का प्रचार किया तथा संगठन के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। |
| सोहन सिंह भकना | गदर पार्टी के प्रथम अध्यक्ष; संगठन को मजबूत आधार प्रदान किया। |
| करतार सिंह सराभा | युवा क्रांतिकारी; गदर पत्र के प्रकाशन तथा 1915 के प्रस्तावित विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाई। |
| रास बिहारी बोस | 1915 के प्रस्तावित सैनिक विद्रोह के प्रमुख समन्वयक; भारत में गदर आंदोलन को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। |
| सचिंद्रनाथ सान्याल | उत्तर भारत में गदर क्रांतिकारियों के सहयोगी; 1915 की क्रांतिकारी योजना के संगठन में योगदान दिया। |
| विष्णु गणेश पिंगले | महाराष्ट्र के प्रमुख गदर क्रांतिकारी; 1915 के विद्रोह की तैयारियों में सक्रिय भागीदारी। |
| भाई परमानंद | प्रवासी भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना के प्रसार तथा गदर आंदोलन के प्रचार में सहयोग दिया। |
गदर पत्र
➣ गदर पार्टी ने अपने क्रांतिकारी विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए 1 नवंबर 1913 ई. से गदर नामक समाचार-पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ किया। इसका प्रकाशन युगांतर आश्रम, सैन फ्रांसिस्को से किया जाता था।
➣ प्रारम्भ में गदर पत्र उर्दू और गुरुमुखी (पंजाबी) भाषाओं में प्रकाशित हुआ। बाद में इसका प्रकाशन हिंदी, अंग्रेज़ी, गुजराती तथा अन्य भाषाओं में भी किया जाने लगा, ताकि विश्व के विभिन्न देशों में रहने वाले भारतीयों तक क्रांतिकारी विचार पहुँच सकें।
➣ गदर पत्र में ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों की आलोचना की जाती थी तथा भारतीयों से देश की स्वतंत्रता के लिए संगठित होकर संघर्ष करने का आह्वान किया जाता था। इसमें क्रांतिकारी लेख, कविताएँ, समाचार और प्रेरणादायक संदेश प्रकाशित होते थे, जो प्रवासी भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना जगाने का महत्वपूर्ण माध्यम बने।
➣ गदर पार्टी ने इस समाचार-पत्र की प्रतियाँ अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा भारत सहित अनेक देशों में भेजीं। ब्रिटिश सरकार ने इसे अपने शासन के लिए गंभीर चुनौती माना और भारत में इसके प्रसार को रोकने के लिए कड़ी निगरानी तथा प्रतिबंध लगाए।
➣ गदर पत्र ने विदेशों में बसे भारतीयों को एक साझा क्रांतिकारी मंच प्रदान किया और उन्हें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही कारण है कि इसे गदर आंदोलन का सबसे प्रभावशाली वैचारिक और प्रचार माध्यम माना जाता है।
प्रमुख गतिविधियाँ
➣ 1914 से 1915 ई. के बीच गदर आंदोलन कई महत्वपूर्ण घटनाओं से गुज़रा। कोमागाटा मारू घटना, प्रथम विश्व युद्ध, 1915 का प्रस्तावित विद्रोह तथा उसके बाद चले लाहौर षड्यंत्र मुकदमे ने गदर आंदोलन को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारी आंदोलनों में स्थान दिलाया।
कोमागाटा मारू घटना (1914)
➣ कोमागाटा मारू एक जापानी जहाज़ था, जिसे बाबा गुरदित सिंह ने किराए पर लेकर भारतीयों को कनाडा ले जाने की योजना बनाई।
➣ उनका उद्देश्य कनाडा के भेदभावपूर्ण Continuous Journey Regulation (सतत यात्रा नियम) को चुनौती देना तथा भारतीयों के साथ होने वाले नस्लीय भेदभाव का विरोध करना था।
➣ 4 अप्रैल 1914 ई. को यह जहाज़ हांगकांग से रवाना हुआ। मार्ग में शंघाई, मोजी (जापान) तथा योकोहामा से भारतीय यात्री इसमें सवार हुए।
➣ अंततः 23 मई 1914 ई. को जहाज़ वैंकूवर (कनाडा) पहुँचा। इसमें लगभग 376 यात्री थे, जिनमें अधिकांश पंजाबी सिख थे।
➣ कनाडाई सरकार ने Continuous Journey Regulation का हवाला देते हुए अधिकांश यात्रियों को उतरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। लगभग दो महीने तक जहाज़ को बंदरगाह पर रोके रखा गया और अंततः यात्रियों को वापस भारत लौटने के लिए विवश कर दिया गया।
➣ 29 सितंबर 1914 ई. को जब कोमागाटा मारू बजबज, कलकत्ता के निकट पहुँचा, तब ब्रिटिश प्रशासन ने यात्रियों को पंजाब भेजने का प्रयास किया। इस दौरान यात्रियों और पुलिस के बीच संघर्ष हुआ, जिसमें पुलिस की गोलीबारी से कई लोग मारे गए तथा अनेक गिरफ्तार कर लिए गए।
➣ कोमागाटा मारू घटना ने प्रवासी भारतीयों में ब्रिटिश शासन के प्रति गहरा आक्रोश उत्पन्न किया। गदर पार्टी ने इस घटना को ब्रिटिश साम्राज्यवाद और नस्लीय भेदभाव का प्रतीक बताया तथा इसे भारतीयों को सशस्त्र क्रांति के लिए प्रेरित करने के एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया।
प्रथम विश्व युद्ध एवं गदर योजना (1914–1915)
➣ अगस्त 1914 ई. में प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ होते ही गदर पार्टी के नेताओं ने इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति के लिए उपयुक्त अवसर माना। उनका विश्वास था कि युद्ध में व्यस्त ब्रिटेन भारत में व्यापक विद्रोह को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं कर पाएगा।
➣ गदर पार्टी ने विश्व के विभिन्न देशों में बसे भारतीयों से भारत लौटकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष में भाग लेने का आह्वान किया। परिणामस्वरूप अमेरिका, कनाडा, मलाया, सिंगापुर, हांगकांग, चीन तथा अन्य क्षेत्रों से अनेक भारतीय क्रांतिकारी स्वदेश लौटे।
➣ भारत पहुँचने के बाद गदर क्रांतिकारियों ने पंजाब सहित विभिन्न क्षेत्रों में गुप्त रूप से संगठन का विस्तार प्रारम्भ किया। उन्होंने भारतीय सैनिकों से संपर्क स्थापित कर उन्हें ब्रिटिश सेना के विरुद्ध विद्रोह के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया।
➣ इस कार्य में रास बिहारी बोस, सचिंद्रनाथ सान्याल, करतार सिंह सराभा तथा विष्णु गणेश पिंगले जैसे क्रांतिकारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ योजना का मुख्य उद्देश्य भारतीय सेना में व्यापक विद्रोह कराकर ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना था। इसके लिए लाहौर, फिरोजपुर, मेरठ, रावलपिंडी, मियाँ मीर तथा अन्य प्रमुख सैन्य छावनियों में गुप्त रूप से क्रांतिकारी गतिविधियाँ संचालित की गईं।
➣ साथ ही हथियारों की व्यवस्था, गुप्त संदेशों का आदान-प्रदान तथा विभिन्न क्रांतिकारी संगठनों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया गया।
➣ अपनी इस योजना को सफल बनाने के लिए गदर पार्टी ने विदेशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों तथा ब्रिटेन के विरोधी देशों से भी सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया। इसी क्रम में विदेशों में कार्यरत भारतीय क्रांतिकारियों के साथ संपर्क स्थापित किया गया, जिन्होंने गदर आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन प्रदान किया।
➣ इन तैयारियों के आधार पर फरवरी 1915 ई. में एक व्यापक सैनिक विद्रोह की योजना बनाई गई, जिसे गदर आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण क्रांतिकारी कार्रवाई माना जाता है।
बर्लिन समिति का सहयोग
➣ बर्लिन समिति (Indian Independence Committee) की स्थापना 1914 ई. में जर्मनी के बर्लिन में भारतीय क्रांतिकारियों द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य जर्मनी की सहायता से भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति को प्रोत्साहित करना था।
➣ समिति के प्रमुख नेताओं में वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय, चम्पकरामन पिल्लै, चन्द्रकांत चक्रवर्ती तथा अन्य प्रवासी भारतीय क्रांतिकारी शामिल थे।
➣ प्रथम विश्व युद्ध के दौरान बर्लिन समिति ने गदर पार्टी के साथ मिलकर भारत में प्रस्तावित सैनिक विद्रोह को सफल बनाने का प्रयास किया। इसके लिए दोनों संगठनों ने भारतीय सैनिकों से संपर्क स्थापित करने, हथियारों की व्यवस्था करने तथा विदेशों से क्रांतिकारी गतिविधियों का समन्वय करने का प्रयास किया।
➣ बर्लिन समिति के सहयोग से गदर आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन मिला। इसी सहयोग के अंतर्गत आगे चलकर हिंदू-जर्मन षड्यंत्र तथा काबुल की अस्थायी सरकार (1915) जैसे महत्वपूर्ण क्रांतिकारी प्रयास सामने आए।
➣ यद्यपि ब्रिटिश गुप्तचर विभाग की सतर्कता के कारण ये योजनाएँ सफल नहीं हो सकीं, फिर भी बर्लिन समिति ने गदर आंदोलन के अंतरराष्ट्रीय विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
फरवरी 1915 का प्रस्तावित विद्रोह
➣ कई महीनों की गुप्त तैयारियों के बाद गदर पार्टी ने फरवरी 1915 ई. में भारत में व्यापक सैनिक विद्रोह प्रारम्भ करने का निर्णय लिया।
➣ इस योजना का नेतृत्व रास बिहारी बोस तथा सचिंद्रनाथ सान्याल कर रहे थे, जबकि करतार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगले तथा अन्य गदर क्रांतिकारी विभिन्न सैन्य छावनियों में विद्रोह की तैयारियों एवं समन्वय का कार्य कर रहे थे।
➣ प्रारम्भिक योजना के अनुसार 21 फरवरी 1915 ई. को लाहौर, फिरोजपुर, मियां मीर, मेरठ, रावलपिंडी तथा अन्य प्रमुख सैन्य छावनियों में एक साथ विद्रोह प्रारम्भ किया जाना था।
➣ इसका उद्देश्य भारतीय सैनिकों को ब्रिटिश अधिकारियों के विरुद्ध संगठित कर शस्त्रागारों पर अधिकार करना तथा इसके बाद विद्रोह को पूरे देश में फैलाना था। किन्तु गदर पार्टी की इस योजना की सूचना कृपाल सिंह नामक मुखबिर ने ब्रिटिश सरकार को दे दी।
इसके बाद क्रांतिकारियों ने योजना को बचाने के लिए विद्रोह की तिथि 21 फरवरी से बदलकर 19 फरवरी 1915 ई. कर दी, किन्तु यह परिवर्तन भी गुप्त नहीं रह सका और ब्रिटिश प्रशासन पूरी तरह सतर्क हो गया।➣ ब्रिटिश सरकार ने विभिन्न सैन्य छावनियों में तलाशी अभियान चलाकर अनेक क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया, हथियार जब्त कर लिए तथा सैनिक इकाइयों पर कड़ी निगरानी स्थापित कर दी।
➣ परिणामस्वरूप फरवरी 1915 का प्रस्तावित सैनिक विद्रोह प्रारम्भ होने से पहले ही विफल हो गया और गदर पार्टी की सबसे महत्वाकांक्षी क्रांतिकारी योजना असफल हो गई।
➣ इस असफलता के बाद ब्रिटिश सरकार ने गदर आंदोलन के विरुद्ध व्यापक दमन अभियान चलाया। बड़ी संख्या में क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया तथा उन पर अनेक मुकदमे चलाए गए, जिनमें लाहौर षड्यंत्र मुकदमे सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं।
लाहौर षड्यंत्र मुकदमे
➣ फरवरी 1915 ई. में प्रस्तावित सैनिक विद्रोह की योजना विफल होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने गदर आंदोलन से जुड़े क्रांतिकारियों के विरुद्ध व्यापक दमन अभियान प्रारम्भ किया।
➣ बड़ी संख्या में क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर उनके विरुद्ध लाहौर षड्यंत्र मुकदमे चलाए गए। इन मुकदमों का उद्देश्य गदर आंदोलन को पूरी तरह समाप्त करना तथा भविष्य में किसी भी सशस्त्र विद्रोह की संभावना को रोकना था।
➣ इन मुकदमों की सुनवाई Defence of India Act, 1915 के अंतर्गत गठित विशेष न्यायाधिकरण द्वारा की गई। इस न्यायाधिकरण को व्यापक अधिकार प्राप्त थे तथा इसके निर्णयों के विरुद्ध सामान्य न्यायालयों में अपील का अधिकार नहीं था। इससे ब्रिटिश सरकार को मुकदमों का शीघ्र निपटारा करने में सुविधा मिली।
➣ लाहौर षड्यंत्र मुकदमों में करतार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगले, जगत सिंह, हरनाम सिंह, बख्शीश सिंह, कांशी राम, सज्जन सिंह तथा अनेक अन्य गदर क्रांतिकारियों पर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध युद्ध छेड़ने, राजद्रोह तथा षड्यंत्र रचने के आरोप लगाए गए।
➣ प्रथम लाहौर षड्यंत्र मुकदमा (1915) सबसे महत्वपूर्ण मुकदमा था। इसमें अनेक क्रांतिकारियों को मृत्युदंड, आजीवन निर्वासन (काला पानी) तथा विभिन्न अवधियों के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।
➣ प्रारम्भ में 24 क्रांतिकारियों को मृत्युदंड दिया गया, किन्तु बाद में लॉर्ड हार्डिंग के हस्तक्षेप से अधिकांश की सजा कम कर दी गई। अंततः 7 क्रांतिकारियों को फाँसी दी गई तथा अनेक अन्य को अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिया गया।
➣ 16 नवम्बर, 1915 ई. को लाहौर सेंट्रल जेल में करतार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगले, जगत सिंह, हरनाम सिंह, बख्शीश सिंह, कांशी राम तथा सज्जन सिंह को फाँसी दी गई। उस समय करतार सिंह सराभा की आयु केवल 19 वर्ष थी।
➣ इसके बाद द्वितीय लाहौर षड्यंत्र मुकदमा (1916) तथा तृतीय लाहौर षड्यंत्र मुकदमा (1916–1917) सहित अन्य पूरक मुकदमों के माध्यम से भी गदर आंदोलन से जुड़े अनेक क्रांतिकारियों पर मुकदमे चलाए गए। इनमें कई अभियुक्तों को मृत्युदंड, आजीवन कारावास तथा लंबी अवधि के कठोर कारावास की सजाएँ दी गईं।
➣ लाहौर षड्यंत्र मुकदमों के परिणामस्वरूप भारत में गदर पार्टी का संगठन गंभीर रूप से कमजोर हो गया। उसके अनेक प्रमुख नेता या तो फाँसी पर चढ़ा दिए गए, गिरफ्तार कर लिए गए अथवा काला पानी की सजा देकर अंडमान भेज दिए गए।
➣ भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों पर कठोर नियंत्रण स्थापित होने के कारण बर्लिन समिति तथा हिन्दू-जर्मन षड्यंत्र की योजनाओं को भी गहरा आघात पहुँचा।
➣
➣ परिणामस्वरूप 1915 ई. का प्रस्तावित व्यापक सैनिक विद्रोह पूरी तरह विफल हो गया और भारत में गदर आंदोलन की संगठनात्मक शक्ति लगभग समाप्त हो गई।
➣ लाहौर षड्यंत्र मुकदमों के परिणामस्वरूप भारत में गदर पार्टी का संगठन गंभीर रूप से कमजोर हो गया। उसके अनेक प्रमुख नेता या तो गिरफ्तार कर लिए गए, फाँसी पर चढ़ा दिए गए अथवा आजीवन कारावास के लिए भेज दिए गए।
➣ भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों पर कठोर नियंत्रण स्थापित होने के कारण बर्लिन समिति तथा विदेशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों की योजनाओं को भी गहरा आघात पहुँचा।
➣ यद्यपि विदेशों में कुछ क्रांतिकारी अपनी गतिविधियाँ जारी रखने में सफल रहे, लेकिन भारत में व्यापक सैनिक विद्रोह की योजना पूरी तरह विफल हो गई।
किया।1915 के बाद गदर आंदोलन का उत्तरकाल
➣ 1915 ई. के प्रस्तावित विद्रोह की विफलता तथा लाहौर षड्यंत्र मुकदमों के बाद भारत में गदर पार्टी की गतिविधियाँ काफी सीमित हो गईं।
➣ अनेक प्रमुख क्रांतिकारी गिरफ्तार कर लिए गए, कई को मृत्युदंड अथवा आजीवन कारावास मिला और कुछ नेता विदेशों में चले गए। इसके बावजूद गदर आंदोलन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
➣ विदेशों में रह रहे गदर कार्यकर्ताओं ने अमेरिका, कनाडा, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा अन्य देशों में भारतीय प्रवासियों के बीच राष्ट्रीय चेतना का प्रचार जारी रखा।
➣ उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद का विरोध करते हुए भारतीय स्वतंत्रता के समर्थन में जनमत तैयार करने का प्रयास किया। इस अवधि में विदेशों से क्रांतिकारी साहित्य, आर्थिक सहायता तथा वैचारिक सहयोग भी विभिन्न माध्यमों से जारी रहा।
➣ 1920 के दशक तक आते-आते गदर पार्टी का संगठित क्रांतिकारी स्वरूप धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया। इसके प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी तथा ब्रिटिश सरकार की कड़ी निगरानी के कारण संगठन अपनी प्रारम्भिक शक्ति बनाए नहीं रख सका।
➣ इसी समय भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में भी नया चरण प्रारम्भ हुआ। महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा अन्य जन-आंदोलनों के कारण स्वतंत्रता संघर्ष का केंद्र भारत के भीतर स्थानांतरित हो गया। परिणामस्वरूप गदर पार्टी का प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित होता गया।
➣ यद्यपि एक संगठित क्रांतिकारी संस्था के रूप में गदर पार्टी का सक्रिय चरण धीरे-धीरे समाप्त हो गया, फिर भी उसके अनेक सदस्य जीवनभर भारतीय स्वतंत्रता के लिए कार्य करते रहे। गदर आंदोलन की क्रांतिकारी परंपरा ने आगे के अनेक क्रांतिकारी संगठनों को प्रेरणा दी।
करतार सिंह सराभा (1896–1915 ई.)
➣ करतार सिंह सराभा (1896–1915 ई.) गदर पार्टी के सबसे प्रसिद्ध एवं युवा क्रांतिकारियों में से एक थे। उनका जन्म 24 मई, 1896 ई. को सराभा गाँव, लुधियाना (पंजाब) में हुआ था। बचपन में ही उनके पिता मंगल सिंह का निधन हो गया, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनके दादा सरदार बदन सिंह ने किया।
➣ प्रारम्भिक शिक्षा के बाद वे 1912 ई. में उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका (कैलिफोर्निया) गए। वहीं उनका संपर्क लाला हरदयाल तथा अन्य भारतीय राष्ट्रवादियों से हुआ और वे 1913 ई. में स्थापित गदर पार्टी से जुड़ गए।
➣ गदर पार्टी में उन्होंने गदर समाचार-पत्र के लेखन, मुद्रण, संपादन तथा वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे प्रवासी भारतीयों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संगठित करते थे और उन्हें भारत लौटकर स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित करते थे।
➣ प्रथम विश्व युद्ध (1914) प्रारम्भ होने के बाद गदर पार्टी के आह्वान पर वे भारत लौट आए। यहाँ उन्होंने रासबिहारी बोस तथा शचीन्द्रनाथ सान्याल के साथ मिलकर सैनिक विद्रोह की तैयारियों में सक्रिय भूमिका निभाई। पंजाब की विभिन्न सैन्य छावनियों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं और सैनिकों से संपर्क स्थापित करने का महत्वपूर्ण दायित्व उन्हीं को सौंपा गया था।
➣ गदर पार्टी की योजना सफल नहीं हो सकी और 28 मार्च, 1915 ई. को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। प्रथम लाहौर षड्यंत्र मुकदमे में वे प्रमुख अभियुक्तों में शामिल थे। मुकदमे के दौरान उन्होंने अपने कार्यों की पूरी जिम्मेदारी स्वीकार की और दया-याचिका (Mercy Petition) दाखिल करने से स्पष्ट इंकार कर दिया।
➣ 16 नवम्बर, 1915 ई. को लाहौर सेंट्रल जेल में केवल 19 वर्ष की आयु में उन्हें उनके छह साथियों के साथ फाँसी दे दी गई। इतनी कम आयु में शहीद होने के कारण वे भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के सबसे युवा और प्रेरणादायी क्रांतिकारियों में गिने जाते हैं।
➣ शहीद भगत सिंह करतार सिंह सराभा को अपना आदर्श मानते थे। कहा जाता है कि वे सराभा का चित्र हमेशा अपने पास रखते थे और अपने साथियों से उनके साहस तथा बलिदान की चर्चा किया करते थे।
प्रमुख व्यक्तित्व
| व्यक्तित्व | भूमिका / योगदान |
|---|---|
| लाला हरदयाल | गदर पार्टी के प्रमुख वैचारिक मार्गदर्शक, संगठन के गठन तथा क्रांतिकारी विचारों के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। |
| सोहन सिंह भकना | गदर पार्टी के प्रथम अध्यक्ष, संगठन को संगठित एवं सुदृढ़ आधार प्रदान किया। |
| करतार सिंह सराभा | गदर आंदोलन के सबसे प्रसिद्ध युवा क्रांतिकारी, 1915 के प्रस्तावित विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाई तथा 16 नवंबर 1915 को फाँसी दी गई। |
| रास बिहारी बोस | 1915 के प्रस्तावित सैनिक विद्रोह के प्रमुख समन्वयक, भारत में गदर आंदोलन के संचालन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। |
| सचिंद्रनाथ सान्याल | उत्तर भारत में क्रांतिकारी नेटवर्क के संगठन तथा 1915 की विद्रोह योजना के समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। |
| विष्णु गणेश पिंगले | महाराष्ट्र के प्रमुख गदर क्रांतिकारी, सैनिक विद्रोह की तैयारियों में सक्रिय भागीदारी की। |
| बाबा गुरदित सिंह | कोमागाटा मारू जहाज़ को किराए पर लेकर कनाडा के भेदभावपूर्ण आव्रजन कानूनों को चुनौती दी; यह घटना गदर आंदोलन की प्रमुख पृष्ठभूमि बनी। |
समयरेखा (Timeline)
| वर्ष / तिथि | प्रमुख घटना |
|---|---|
| 21 अप्रैल 1913 ई. | सैन फ्रांसिस्को (संयुक्त राज्य अमेरिका) में गदर पार्टी की स्थापना। |
| 1 नवंबर 1913 ई. | युगांतर आश्रम से ‘गदर समाचार-पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ। |
| 23 मई 1914 ई. | कोमागाटा मारू जहाज़ का कनाडा के वैंकूवर पहुँचना। |
| 29 सितंबर 1914 ई. | बजबज (Budge Budge) में कोमागाटा मारू के यात्रियों और पुलिस के बीच संघर्ष। |
| अगस्त 1914 ई. | प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ; गदर पार्टी ने इसे सशस्त्र क्रांति के अवसर के रूप में देखा। |
| फरवरी 1915 ई. | भारत में व्यापक सैनिक विद्रोह की योजना बनाई गई, जो मुखबिरी के कारण विफल रही। |
| 1915–1916 ई. | लाहौर षड्यंत्र मुकदमे चलाए गए तथा अनेक गदर क्रांतिकारियों को कठोर दंड दिए गए। |
| 16 नवंबर 1915 ई. | करतार सिंह सराभा को लाहौर केंद्रीय कारागार में फाँसी दी गई। |
| 1920 का दशक | ब्रिटिश दमन और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के कारण गदर पार्टी का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा। |
तुलना : गदर पार्टी एवं हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA)
| आधार | गदर पार्टी | HSRA |
|---|---|---|
| स्थापना | 21 अप्रैल 1913 ई. | सितंबर 1928 ई. |
| स्थापना स्थान | सैन फ्रांसिस्को (संयुक्त राज्य अमेरिका) | दिल्ली के फिरोजशाह कोटला |
| पूर्व नाम | हिंदुस्तान गदर पार्टी | हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) |
| प्रमुख नेता | लाला हरदयाल, सोहन सिंह भकना, करतार सिंह सराभा, रास बिहारी बोस | चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, भगवतीचरण वोहरा |
| मुख्य उद्देश्य | सशस्त्र क्रांति द्वारा ब्रिटिश शासन का अंत कर भारत को स्वतंत्र कराना। | सशस्त्र क्रांति के माध्यम से स्वतंत्र, समाजवादी एवं गणतांत्रिक भारत की स्थापना। |
| कार्य क्षेत्र | विदेशों में बसे भारतीय तथा भारत। | मुख्यतः भारत, विशेषकर उत्तर भारत। |
| प्रमुख गतिविधियाँ | गदर पत्र का प्रकाशन, कोमागाटा मारू घटना, 1915 का प्रस्तावित सैनिक विद्रोह। | सॉन्डर्स वध, केंद्रीय विधानसभा बम प्रकरण, क्रांतिकारी प्रचार। |
| विचारधारा | उग्र राष्ट्रवाद एवं सशस्त्र क्रांति। | क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के साथ समाजवादी विचारधारा। |
| ऐतिहासिक महत्व | विदेश की धरती से संगठित भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का प्रारम्भ किया। | भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को नई वैचारिक दिशा और व्यापक जनसमर्थन प्रदान किया। |
अक्सर होने वाले सामान्य भ्रम
➣ गदर पार्टी की स्थापना भारत में नहीं हुई थी। इसकी स्थापना 21 अप्रैल 1913 ई. को सैन फ्रांसिस्को (संयुक्त राज्य अमेरिका) में हुई थी।
➣ गदर पार्टी के संस्थापक और प्रथम अध्यक्ष एक ही व्यक्ति नहीं थे। लाला हरदयाल इसके प्रमुख वैचारिक मार्गदर्शक थे, जबकि सोहन सिंह भकना इसके प्रथम अध्यक्ष थे।
➣ गदर पत्र का प्रकाशन भारत से नहीं होता था। इसका प्रकाशन युगांतर आश्रम, सैन फ्रांसिस्को से किया जाता था।
➣ कोमागाटा मारू एक भारतीय जहाज़ नहीं था। यह एक जापानी जहाज़ था, जिसे बाबा गुरदित सिंह ने किराए पर लिया था।
➣ कोमागाटा मारू घटना भारत में नहीं हुई थी। इसका प्रमुख प्रसंग कनाडा के वैंकूवर बंदरगाह से जुड़ा था; भारत लौटने पर बजबज में भी संघर्ष हुआ।
➣ 1915 का प्रस्तावित विद्रोह सफल नहीं हुआ था। कृपाल सिंह की मुखबिरी के कारण इसकी योजना विफल हो गई।
➣ 1915 के प्रस्तावित विद्रोह का नेतृत्व केवल करतार सिंह सराभा ने नहीं किया था। इसमें रास बिहारी बोस, सचिंद्रनाथ सान्याल, करतार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगले सहित अनेक क्रांतिकारियों की भूमिका थी।
➣ लाहौर षड्यंत्र मुकदमे प्रथम विश्व युद्ध से पहले नहीं चले थे। ये 1915 के प्रस्तावित विद्रोह की विफलता के बाद चलाए गए थे।
➣ करतार सिंह सराभा को आजीवन कारावास नहीं मिला था। उन्हें 16 नवंबर 1915 ई. को फाँसी दी गई थी।
➣ गदर पार्टी और HSRA एक ही संगठन नहीं थे। गदर पार्टी की स्थापना 1913 में विदेश में हुई थी, जबकि HSRA की स्थापना 1928 में भारत में हुई।
➣ गदर पार्टी का मुख्य कार्य केवल समाचार-पत्र प्रकाशित करना नहीं था। उसका अंतिम उद्देश्य सशस्त्र क्रांति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराना था, जबकि गदर पत्र उसका प्रमुख प्रचार माध्यम था।
➣ गदर आंदोलन का प्रभाव केवल विदेशों तक सीमित नहीं था। इसने भारत में सैनिक विद्रोह की योजना बनाई और आगे के क्रांतिकारी आंदोलनों, विशेषकर HSRA, को भी प्रेरित किया।
सारांश
- गदर पार्टी की स्थापना 21 अप्रैल 1913 ई. को सैन फ्रांसिस्को (संयुक्त राज्य अमेरिका) में की गई।
- इसके प्रमुख वैचारिक मार्गदर्शक लाला हरदयाल तथा प्रथम अध्यक्ष सोहन सिंह भकना थे।
- संगठन का मुख्यालय युगांतर आश्रम (सैन फ्रांसिस्को) था, जहाँ से 1 नवंबर 1913 ई. से ‘गदर समाचार-पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ।
- गदर पार्टी का मुख्य उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से ब्रिटिश शासन का अंत कर भारत को पूर्ण स्वतंत्र बनाना था।
- कोमागाटा मारू घटना (1914) तथा प्रथम विश्व युद्ध ने गदर आंदोलन को नई गति प्रदान की और भारत में व्यापक सैनिक विद्रोह की योजना बनाने की पृष्ठभूमि तैयार की।
- फरवरी 1915 ई. में प्रस्तावित सैनिक विद्रोह कृपाल सिंह की मुखबिरी के कारण असफल हो गया।
- विद्रोह की विफलता के बाद लाहौर षड्यंत्र मुकदमे चलाए गए, जिनमें अनेक गदर क्रांतिकारियों को मृत्युदंड एवं आजीवन कारावास की सज़ा दी गई।
- करतार सिंह सराभा की शहादत ने आगे चलकर भगत सिंह सहित अनेक युवा क्रांतिकारियों को प्रेरित किया।
- यद्यपि गदर पार्टी अपने तत्कालीन उद्देश्य में सफल नहीं हो सकी, फिर भी उसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया तथा प्रवासी भारतीयों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
- गदर आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला प्रमुख संगठित क्रांतिकारी आंदोलन था, जिसने विदेश की धरती से ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी और आगे के क्रांतिकारी संगठनों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना।
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