हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (1924): काकोरी षड्यंत्र, राम प्रसाद बिस्मिल एवं चंद्रशेखर आज़ाद

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हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA)

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) ब्रिटिश शासन के विरुद्ध कार्य करने वाला एक प्रमुख क्रांतिकारी संगठन था, जिसकी स्थापना अक्टूबर 1924 ई. में हुई।

➣ इसका उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से ब्रिटिश शासन का अंत कर भारत में एक संघीय गणराज्य की स्थापना करना था।

➣ यह संगठन भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ, क्योंकि इसने पहली बार उत्तर भारत के विभिन्न क्रांतिकारी समूहों को एक संगठित राष्ट्रीय संगठन के रूप में एकजुट किया।

➣ हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के प्रमुख संस्थापकों में सचिन्द्रनाथ सान्याल, राम प्रसाद बिस्मिल, योगेशचंद्र चटर्जी तथा शचीन्द्रनाथ बख्शी प्रमुख थे। बाद में चंद्रशेखर आज़ाद, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह, भगवतीचरण वोहरा तथा भगत सिंह जैसे अनेक प्रसिद्ध क्रांतिकारी भी इस संगठन से जुड़े।

➣ HRA का उद्देश्य केवल ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या करना या सीमित क्रांतिकारी गतिविधियाँ चलाना नहीं था, बल्कि एक संगठित राष्ट्रीय क्रांति के माध्यम से भारत को स्वतंत्र कर लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करना था।

➣ इसी कारण संगठन ने अपना संविधान तैयार किया, घोषणापत्र प्रकाशित किया तथा देशभर में युवाओं को क्रांतिकारी आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया।

1925 ई. का काकोरी षड्यंत्र HRA की सबसे प्रसिद्ध कार्रवाई थी। यद्यपि इस घटना के बाद ब्रिटिश सरकार ने संगठन के अधिकांश नेताओं को गिरफ्तार कर लिया और कई क्रांतिकारियों को फाँसी दे दी, फिर भी HRA समाप्त नहीं हुआ।

➣ आगे चलकर 1928 ई. में इसका पुनर्गठन हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के रूप में हुआ, जिसने भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को नई दिशा प्रदान की।

स्थापना की पृष्ठभूमि

बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक तक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन दो प्रमुख धाराओं में विकसित हो चुका था। एक ओर महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसात्मक जन-आंदोलन चल रहे थे, जबकि दूसरी ओर अनेक क्रांतिकारी संगठन सशस्त्र संघर्ष को स्वतंत्रता प्राप्ति का प्रभावी साधन मानते थे।

➣ उस समय बंगाल, पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा बिहार सहित विभिन्न क्षेत्रों में कई क्रांतिकारी दल सक्रिय थे, किंतु वे अलग-अलग कार्य कर रहे थे। इनके पास न तो कोई अखिल भारतीय संगठन था, न ही साझा नेतृत्व अथवा समन्वित कार्ययोजना। परिणामस्वरूप उनकी गतिविधियाँ सीमित क्षेत्रों तक ही प्रभावी रह जाती थीं।

➣ क्रांतिकारी नेताओं ने अनुभव किया कि ब्रिटिश शासन का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए एक ऐसे राष्ट्रीय संगठन की आवश्यकता है, जो विभिन्न प्रांतों के क्रांतिकारियों को एक मंच पर लाकर उन्हें समान विचारधारा, साझा उद्देश्य और संगठित नेतृत्व प्रदान कर सके।

➣ इसी आवश्यकता ने आगे चलकर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।

असहयोग आंदोलन की वापसी और युवाओं में असंतोष

5 फरवरी 1922 ई. को उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा में हुई हिंसक घटना के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया। गांधीजी का मानना था कि जब तक आंदोलन पूर्णतः अहिंसक नहीं रहेगा, तब तक उसे जारी रखना उचित नहीं होगा।

➣ गांधीजी के इस निर्णय से अनेक राष्ट्रवादी युवाओं और क्रांतिकारियों में गहरा असंतोष उत्पन्न हुआ। उनका विचार था कि स्वतंत्रता आंदोलन अपने निर्णायक चरण में पहुँच चुका था और ऐसे समय पर आंदोलन वापस लेने से ब्रिटिश सरकार को राहत मिल गई।

➣ विशेष रूप से छात्र, नवयुवक तथा उग्र राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रभावित लोगों ने सशस्त्र क्रांति को स्वतंत्रता प्राप्ति का अधिक प्रभावी मार्ग मानना प्रारम्भ कर दिया।

➣ यही असंतोष आगे चलकर संगठित क्रांतिकारी आंदोलन के रूप में विकसित हुआ। परिणामस्वरूप विभिन्न प्रांतों के क्रांतिकारियों ने एक अखिल भारतीय संगठन के गठन का निर्णय लिया, जिसने 1924 ई. में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) का रूप लिया।

सचिन्द्रनाथ सान्याल की भूमिका

सचिन्द्रनाथ सान्याल हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के प्रमुख संस्थापक एवं वैचारिक मार्गदर्शक थे। वे इससे पहले अनुशीलन समिति, गदर आंदोलन तथा बनारस षड्यंत्र जैसे क्रांतिकारी प्रयासों से जुड़े रह चुके थे। उनके व्यापक अनुभव ने HRA को मजबूत वैचारिक आधार प्रदान किया।

➣ सान्याल का विश्वास था कि ब्रिटिश शासन का अंत केवल व्यक्तिगत वीरता से नहीं, बल्कि एक संगठित राष्ट्रीय क्रांतिकारी संगठन द्वारा ही संभव है। उन्होंने विभिन्न प्रांतों में सक्रिय क्रांतिकारी दलों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया और संगठन के संविधान एवं घोषणापत्र की रूपरेखा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ उन्होंने बाद में प्रसिद्ध क्रांतिकारी पुस्तक “बंदी जीवन” भी लिखी, जिसमें अपने क्रांतिकारी अनुभवों तथा स्वतंत्रता आंदोलन के विचारों का विस्तार से वर्णन किया। यह पुस्तक भारतीय युवाओं में अत्यंत लोकप्रिय हुई और अनेक लोगों को क्रांतिकारी आंदोलन से प्रेरणा मिली।

राम प्रसाद बिस्मिल की भूमिका

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल उत्तर भारत के सबसे सक्रिय और लोकप्रिय क्रांतिकारी नेताओं में से एक थे। वे मैनपुरी षड्यंत्र तथा अन्य क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग ले चुके थे और संगठन निर्माण की असाधारण क्षमता रखते थे।

➣ HRA की स्थापना तथा उसके विस्तार में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था। बिस्मिल ने उत्तर प्रदेश एवं आसपास के क्षेत्रों में युवाओं को संगठित किया, गुप्त क्रांतिकारी नेटवर्क विकसित किया तथा संगठन के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने का कार्य किया। वे मानते थे कि क्रांति केवल साहस से नहीं, बल्कि अनुशासन, संगठन और स्पष्ट उद्देश्य से सफल हो सकती है।

➣ उन्होंने सचिन्द्रनाथ सान्याल तथा अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर HRA को एक अखिल भारतीय संगठन का स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आगे चलकर काकोरी षड्यंत्र (1925) के प्रमुख योजनाकारों में भी राम प्रसाद बिस्मिल की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

HRA की स्थापना (1924 ई.)

➣ विभिन्न क्रांतिकारी संगठनों के बीच विचार-विमर्श के बाद अक्टूबर 1924 ई. में कानपुर में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) की स्थापना की गई।

➣ इसका उद्देश्य भारत के विभिन्न प्रांतों में कार्यरत क्रांतिकारी दलों को एक राष्ट्रीय संगठन के अंतर्गत संगठित करना था।

➣ संगठन ने अपने संविधान में स्पष्ट किया कि उसका अंतिम लक्ष्य सशस्त्र क्रांति द्वारा ब्रिटिश शासन का अंत तथा भारत में संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करना है।

➣ HRA ने केवल गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियों पर ही बल नहीं दिया, बल्कि राजनीतिक चेतना, संगठन निर्माण तथा राष्ट्रीय क्रांति की दीर्घकालीन तैयारी को भी समान महत्व दिया।

➣ HRA की स्थापना भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, क्योंकि पहली बार उत्तर भारत के क्रांतिकारियों को एक साझा संगठन, साझा विचारधारा तथा साझा नेतृत्व प्राप्त हुआ। यही संगठन आगे चलकर भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की सबसे प्रभावशाली धारा बना।

संस्थापक सदस्य

➣ हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना में अनेक प्रमुख क्रांतिकारियों ने योगदान दिया। इनमें कुछ ने संगठन को वैचारिक दिशा प्रदान की, जबकि कुछ ने संगठन के विस्तार और क्रांतिकारी गतिविधियों के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

क्रांतिकारी योगदान
सचिन्द्रनाथ सान्याल प्रमुख संस्थापक, वैचारिक मार्गदर्शक एवं संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका।
राम प्रसाद बिस्मिल संगठन के प्रमुख नेता, उत्तर भारत में विस्तार तथा काकोरी योजना के प्रमुख सूत्रधार।
योगेशचंद्र चटर्जी बंगाल के क्रांतिकारियों को HRA से जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान।
शचीन्द्रनाथ बख्शी संगठन के विस्तार एवं गुप्त गतिविधियों के संचालन में सक्रिय भूमिका।
चंद्रशेखर आज़ाद बाद में संगठन के प्रमुख सैन्य नेता बने तथा काकोरी के बाद HRA को पुनर्गठित किया।
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ राम प्रसाद बिस्मिल के निकट सहयोगी एवं काकोरी अभियान के प्रमुख क्रांतिकारी।

नाम का अर्थ

Hindustan Republican Association नाम अपने आप में संगठन की विचारधारा और उद्देश्य को स्पष्ट करता है।

  • Hindustan (हिन्दुस्तान) – सम्पूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व करता है।
  • Republican (रिपब्लिकन) – वंशानुगत राजतंत्र के स्थान पर जनता द्वारा संचालित गणराज्य की स्थापना का लक्ष्य।
  • Association (एसोसिएशन) – समान उद्देश्य वाले क्रांतिकारियों का संगठित संगठन।

➣ इस प्रकार HRA का अर्थ था—ऐसा क्रांतिकारी संगठन जो भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कर एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करे।

➣ यह नाम इस बात का भी संकेत देता है कि संगठन केवल ब्रिटिश शासन को हटाना नहीं चाहता था, बल्कि स्वतंत्र भारत के लिए एक आधुनिक, लोकतांत्रिक एवं जनप्रतिनिधि शासन व्यवस्था की कल्पना भी करता था।

उद्देश्य

➣ हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का उद्देश्य केवल ब्रिटिश अधिकारियों के विरुद्ध सशस्त्र कार्रवाई करना नहीं था। संगठन का लक्ष्य भारत की पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर एक आधुनिक, लोकतांत्रिक तथा गणतांत्रिक राष्ट्र की स्थापना करना था।

  • ब्रिटिश शासन का सशस्त्र क्रांति के माध्यम से अंत करना।
  • भारत में संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य (Federal Republic) की स्थापना करना।
  • विभिन्न प्रांतों के क्रांतिकारियों को एक अखिल भारतीय संगठन के अंतर्गत संगठित करना।
  • युवाओं में राष्ट्रभक्ति, त्याग और बलिदान की भावना विकसित करना।
  • जनता को विदेशी शासन के विरुद्ध जागरूक कर राष्ट्रीय क्रांति के लिए तैयार करना।
  • सामाजिक एवं राजनीतिक समानता पर आधारित शासन व्यवस्था स्थापित करना।
  • स्वतंत्र भारत में जनता के अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना।

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का संगठन

➣ हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) केवल एक गुप्त क्रांतिकारी दल नहीं था, बल्कि एक सुव्यवस्थित राष्ट्रीय संगठन था। इसके संस्थापकों का उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यरत क्रांतिकारी समूहों को एक साझा नेतृत्व, स्पष्ट विचारधारा तथा संगठित कार्ययोजना के अंतर्गत लाना था।

➣ इसीलिए HRA ने संगठनात्मक ढाँचा तैयार किया, संविधान बनाया तथा अपना घोषणापत्र प्रकाशित कर अपने उद्देश्यों और कार्यक्रमों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया।

घोषणापत्र

➣ हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ने अपने विचारों और उद्देश्यों को जनता तक पहुँचाने के लिए The Revolutionary नामक घोषणापत्र प्रकाशित किया।

➣ यह घोषणापत्र जनवरी 1925 ई. में गुप्त रूप से वितरित किया गया था। इसके प्रमुख लेखक सचिन्द्रनाथ सान्याल माने जाते हैं, यद्यपि इसे संगठन की ओर से सामूहिक दस्तावेज़ के रूप में प्रस्तुत किया गया।

➣ इस घोषणापत्र में ब्रिटिश शासन की तीखी आलोचना करते हुए कहा गया कि विदेशी शासन भारत की आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है। इसमें भारतीय युवाओं से आह्वान किया गया कि वे स्वतंत्रता के लिए संगठित होकर क्रांतिकारी आंदोलन का हिस्सा बनें।

The Revolutionary में यह भी स्पष्ट किया गया कि HRA का उद्देश्य अराजकता फैलाना या व्यक्तिगत हिंसा करना नहीं है। संगठन का लक्ष्य एक संगठित राष्ट्रीय क्रांति के माध्यम से ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करना था, जिसमें सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हों।

➣ यह घोषणापत्र भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण वैचारिक दस्तावेज माना जाता है। इससे पहली बार HRA की राजनीतिक सोच, क्रांतिकारी रणनीति तथा स्वतंत्र भारत की परिकल्पना सार्वजनिक रूप से सामने आई।

विचारधारा

➣ हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की विचारधारा क्रांतिकारी राष्ट्रवाद पर आधारित थी। संगठन का विश्वास था कि ब्रिटिश शासन स्वेच्छा से भारत को स्वतंत्र नहीं करेगा, इसलिए संगठित सशस्त्र संघर्ष आवश्यक है।

➣ HRA किसी विशेष धर्म, जाति या क्षेत्र का संगठन नहीं था। इसका उद्देश्य सम्पूर्ण भारत के लोगों को एक राष्ट्रीय पहचान के अंतर्गत संगठित करना था।

➣ संगठन के नेताओं में हिंदू, मुस्लिम और सिख सभी समुदायों के क्रांतिकारी समान रूप से सक्रिय थे। राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ की मित्रता तथा संयुक्त संघर्ष इस राष्ट्रीय एकता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

➣ संगठन लोकतंत्र, गणराज्य तथा जनता की सर्वोच्चता में विश्वास करता था। यद्यपि इसके नाम में Socialist शब्द प्रारम्भ में नहीं था, फिर भी इसके अनेक नेता आर्थिक और सामाजिक समानता के पक्षधर थे।

➣ बाद में यही विचारधारा विकसित होकर 1928 ई. में हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के गठन का आधार बनी।

➣ इस प्रकार HRA ने भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को केवल सशस्त्र संघर्ष तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे स्पष्ट राजनीतिक उद्देश्य, संगठित नेतृत्व और लोकतांत्रिक आदर्शों से भी जोड़ा। यही विशेषता इसे पूर्ववर्ती अनेक क्रांतिकारी संगठनों से अलग और अधिक परिपक्व बनाती है।

धन एकत्र करने की नीति

➣ किसी भी क्रांतिकारी संगठन की सफलता उसके आर्थिक संसाधनों पर भी निर्भर करती है। HRA के सामने भी यही समस्या थी। संगठन के अधिकांश सदस्य सामान्य परिवारों से आते थे और उनके पास इतना धन नहीं था कि संगठन की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। इसलिए आर्थिक संसाधन जुटाना संगठन की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल था।

➣ प्रारम्भ में HRA ने देशभक्त नागरिकों, समर्थकों तथा सहानुभूति रखने वाले व्यापारियों से गुप्त रूप से आर्थिक सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया।

अनेक राष्ट्रवादी व्यक्तियों ने अपनी क्षमता के अनुसार धन, आश्रय तथा अन्य आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए। फिर भी संगठन की बढ़ती आवश्यकताओं की तुलना में यह सहायता पर्याप्त नहीं थी।

➣ इसके बाद HRA ने यह नीति अपनाई कि सरकारी धन को क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए प्राप्त किया जाए। संगठन का तर्क था कि यह धन भारतीय जनता से कर (Tax) के रूप में एकत्र किया गया है और ब्रिटिश सरकार उसी धन का उपयोग भारतीयों पर शासन करने के लिए कर रही है। इसलिए उस सरकारी धन का उपयोग भारत की स्वतंत्रता के लिए करना नैतिक रूप से उचित है।

➣ इसी नीति के अंतर्गत सरकारी कोष को लक्ष्य बनाकर योजनाबद्ध कार्रवाई करने का निर्णय लिया गया। इस नीति का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण 1925 ई. का काकोरी षड्यंत्र था, जिसमें सरकारी खजाने को ले जा रही रेलगाड़ी से धन प्राप्त करने का प्रयास किया गया।

➣ इस घटना ने HRA को पूरे देश में प्रसिद्ध कर दिया, यद्यपि इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने संगठन पर व्यापक दमनचक्र चलाया।

➣ ध्यान देने योग्य बात यह है कि HRA की नीति व्यक्तिगत संपत्ति की लूट नहीं थी। संगठन सामान्य नागरिकों की संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के विरुद्ध था और उसका लक्ष्य मुख्यतः ब्रिटिश सरकार के आर्थिक संसाधन थे।

यही कारण है कि क्रांतिकारी इन कार्रवाइयों को सामान्य डकैती नहीं, बल्कि राजनीतिक उद्देश्य से की गई क्रांतिकारी कार्रवाई मानते थे।

काकोरी षड्यंत्र (1925)

काकोरी षड्यंत्र (जिसे काकोरी ट्रेन एक्शन भी कहा जाता है) 9 अगस्त 1925 ई. को उत्तर प्रदेश के लखनऊ के निकट स्थित काकोरी रेलवे स्टेशन के पास हुआ।

➣ यह HRA की सबसे प्रसिद्ध और सुव्यवस्थित क्रांतिकारी कार्रवाई थी। इसका उद्देश्य सरकारी खजाने को अपने कब्जे में लेकर संगठन की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना तथा ब्रिटिश शासन को खुली चुनौती देना था।

➣ HRA के नेताओं का मानना था कि संगठन के पास आर्थिक संसाधनों का गंभीर अभाव है। देशभक्त नागरिकों से प्राप्त सहयोग पर्याप्त नहीं था, जबकि हथियारों, प्रशिक्षण और संगठन के विस्तार के लिए धन आवश्यक था।

➣ इसलिए यह निर्णय लिया गया कि ब्रिटिश सरकार के उस खजाने को लक्ष्य बनाया जाए, जो भारतीय जनता से कर के रूप में एकत्र किया गया था।

➣ इस योजना का नेतृत्व राम प्रसाद बिस्मिल ने किया। उनके साथ अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, चंद्रशेखर आज़ाद, सचिन्द्रनाथ बख्शी, मन्मथनाथ गुप्त, केशव चक्रवर्ती, मुकुन्दीलाल, मुरारी लाल शर्मा तथा बनवारी लाल सहित कुल लगभग 10 क्रांतिकारी इस अभियान में शामिल थे।

9 अगस्त 1925 ई. को 8 डाउन सहारनपुर–लखनऊ पैसेंजर ट्रेन सरकारी राजस्व लेकर लखनऊ की ओर जा रही थी। काकोरी स्टेशन के निकट क्रांतिकारियों ने चेन खींचकर ट्रेन को रोका।

➣ इसके बाद गार्ड के डिब्बे में रखे सरकारी खजाने के लोहे के संदूक को नीचे उतारा गया और उसे तोड़कर धन अपने कब्जे में ले लिया गया।

➣ इस पूरी कार्रवाई के दौरान क्रांतिकारियों का उद्देश्य यात्रियों को नुकसान पहुँचाना नहीं था। उन्होंने केवल सरकारी धन को लक्ष्य बनाया। किंतु कार्रवाई के दौरान चली एक गोली से एक यात्री अहमद अली की मृत्यु हो गई।

➣ यह घटना क्रांतिकारियों की योजना का हिस्सा नहीं थी, फिर भी बाद में ब्रिटिश सरकार ने इसे मुकदमे का एक प्रमुख आधार बनाया।

➣ काकोरी षड्यंत्र ने पूरे देश में सनसनी फैला दी। पहली बार किसी क्रांतिकारी संगठन ने इतनी योजनाबद्ध ढंग से सरकारी खजाने पर अधिकार कर ब्रिटिश शासन को खुली चुनौती दी थी। इस घटना ने भारतीय युवाओं में HRA की लोकप्रियता बढ़ा दी, जबकि ब्रिटिश सरकार ने इसे अपनी प्रतिष्ठा पर गंभीर आघात माना।

गिरफ्तारियाँ

➣ काकोरी षड्यंत्र के बाद ब्रिटिश सरकार ने इस घटना को अत्यंत गंभीरता से लिया। पुलिस, गुप्तचर विभाग तथा रेलवे प्रशासन को क्रांतिकारियों की खोज में लगा दिया गया। पूरे उत्तर भारत में व्यापक तलाशी अभियान चलाया गया और अनेक स्थानों पर छापे मारे गए।

➣ जाँच के दौरान ब्रिटिश पुलिस को कुछ महत्वपूर्ण सुराग मिले, जिनके आधार पर HRA के अनेक सदस्यों की पहचान कर ली गई। कुछ ही महीनों में लगभग 40 से अधिक व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से कई सीधे काकोरी षड्यंत्र से जुड़े थे, जबकि कुछ पर संगठन की सहायता करने का आरोप लगाया गया।

राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, सचिन्द्रनाथ सान्याल, शचीन्द्रनाथ बख्शी, मन्मथनाथ गुप्त, मुकुन्दीलाल, योगेशचंद्र चटर्जी तथा अनेक अन्य क्रांतिकारी गिरफ्तार कर लिए गए।

➣ इन गिरफ्तारियों से HRA को भारी क्षति पहुँची, क्योंकि संगठन के अधिकांश वरिष्ठ नेता जेल में बंद कर दिए गए। इसके बावजूद संगठन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। हालाँकि चंद्रशेखर आज़ाद, केशव चक्रवर्ती और कुछ अन्य क्रांतिकारी पुलिस की गिरफ्त से बच निकले।

➣ विशेषकर चंद्रशेखर आज़ाद, ने आगे चलकर संगठन को पुनः संगठित करने का कार्य प्रारम्भ किया। यही प्रयास आगे हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के गठन का आधार बना।

काकोरी मुकदमा

➣ गिरफ्तार क्रांतिकारियों के विरुद्ध ब्रिटिश सरकार ने लखनऊ की विशेष अदालत में मुकदमा चलाया। यह मुकदमा लगभग डेढ़ वर्ष तक चला और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चर्चित राजनीतिक मुकदमों में से एक बन गया। ब्रिटिश सरकार ने इसे केवल ट्रेन डकैती का मामला न मानकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संगठित षड्यंत्र के रूप में प्रस्तुत किया।

➣ ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार क्रांतिकारियों पर राजद्रोह, सरकारी खजाने की लूट, षड्यंत्र तथा हत्या जैसे गंभीर आरोप लगाए। सरकार का उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं था, बल्कि पूरे क्रांतिकारी आंदोलन को कुचलना और भविष्य में ऐसे संगठनों को उभरने से रोकना भी था।

➣ भारतीय जनता ने इन क्रांतिकारियों को अपराधी नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्त माना। देश के अनेक नेताओं, समाचार-पत्रों तथा सार्वजनिक संगठनों ने उनके प्रति सहानुभूति व्यक्त की। विभिन्न स्थानों पर उनकी सजा कम करने की माँग करते हुए ज्ञापन भेजे गए।

➣ अंततः 6 अप्रैल 1927 ई. को न्यायालय ने अपना निर्णय सुनाया, जिसमें अनेक क्रांतिकारियों को फाँसी, आजीवन कारावास तथा लंबी अवधि के कठोर कारावास की सजाएँ दी गईं। यह निर्णय पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया और ब्रिटिश सरकार की कठोर नीति की व्यापक आलोचना हुई।

➣ काकोरी मुकदमे के निर्णय के बाद ब्रिटिश सरकार ने चार प्रमुख क्रांतिकारियों को मृत्युदंड दिया। इन क्रांतिकारियों के बलिदान ने भारतीय युवाओं को गहराई से प्रभावित किया और वे स्वतंत्रता संग्राम के अमर शहीद बन गए।

➣ देशभर में इन मृत्युदंडों का व्यापक विरोध हुआ। अनेक राष्ट्रीय नेताओं, सामाजिक संगठनों तथा सामान्य जनता ने दया-याचिकाएँ भेजीं और फाँसी की सज़ा रद्द करने की माँग की, किंतु ब्रिटिश सरकार ने इन अपीलों को अस्वीकार कर दिया।

क्रांतिकारी दंड फाँसी की तिथि
राम प्रसाद बिस्मिल मृत्युदंड 19 दिसंबर 1927 ई. (गोरखपुर जेल में)
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ मृत्युदंड 19 दिसंबर 1927 ई. ( फैज़ाबाद जेल में)
रोशन सिंह मृत्युदंड 19 दिसंबर 1927 ई. (गोंडा जेल में)
राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी मृत्युदंड निर्धारित तिथि से दो दिन पूर्व 17 दिसंबर 1927 ई.(इलाहाबाद (नैनी) जेल में)

➣ इनके अतिरिक्त अनेक क्रांतिकारियों को आजीवन कारावास (काला पानी) अथवा 10 से 14 वर्ष तक के कठोर कारावास की सज़ा दी गई। सचिन्द्रनाथ सान्याल, मन्मथनाथ गुप्त, योगेशचंद्र चटर्जी, मुकुन्दीलाल, गोविन्द चरण कर तथा अन्य कई क्रांतिकारियों को विभिन्न अवधियों की सज़ाएँ सुनाई गईं।

➣ ब्रिटिश सरकार ने आगे भी क्रांतिकारी संगठनों पर कड़ी निगरानी बनाए रखी, लेकिन HRA के दमन से आंदोलन समाप्त नहीं हुआ। इसके विपरीत, संगठन का पुनर्गठन होकर HSRA के रूप में सामने आया, जिसने पहले से अधिक संगठित और वैचारिक रूप से परिपक्व क्रांतिकारी आंदोलन का नेतृत्व किया।

➣ इस प्रकार ब्रिटिश सरकार का दमन अल्पकाल में सफल दिखाई दिया, किंतु दीर्घकाल में वह भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को समाप्त करने में असफल रहा।

HRA का पुनर्गठन

➣ काकोरी कांड के बाद HRA को भारी क्षति पहुँची। संगठन के अधिकांश संस्थापक नेता या तो फाँसी पर चढ़ा दिए गए अथवा लंबी अवधि के लिए जेल भेज दिए गए। इससे संगठन का केंद्रीय नेतृत्व लगभग समाप्त हो गया और उसकी गतिविधियाँ कुछ समय के लिए धीमी पड़ गईं।

➣ शेष बचे क्रांतिकारियों ने संगठन को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया और यही प्रयास आगे चलकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के गठन का आधार बना।

➣ काकोरी कांड के बाद क्रांतिकारी आंदोलन के सामने दो प्रमुख चुनौतियाँ थीं-पहली, संगठन को पुनः संगठित करना और दूसरी, ऐसी नई रणनीति तैयार करना जिससे भविष्य में आंदोलन अधिक प्रभावी रूप से आगे बढ़ सके।

काकोरी के बाद की स्थिति

➣ काकोरी षड्यंत्र के बाद चंद्रशेखर आज़ाद उन गिने-चुने प्रमुख क्रांतिकारियों में थे जो ब्रिटिश पुलिस की गिरफ्त से बच निकले। संगठन के अधिकांश वरिष्ठ नेताओं के जेल जाने या शहीद हो जाने के बाद HRA के पुनर्गठन की जिम्मेदारी स्वाभाविक रूप से उनके कंधों पर आ गई।

➣ चंद्रशेखर आज़ाद ने भूमिगत रहकर विभिन्न प्रांतों में बिखरे क्रांतिकारियों से पुनः संपर्क स्थापित किया। उन्होंने उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार तथा अन्य क्षेत्रों में सक्रिय युवाओं को एक मंच पर लाने का प्रयास किया।

➣ उनका विश्वास था कि यदि संगठन को जीवित रखना है, तो उसे केवल पुराने ढाँचे पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि नई परिस्थितियों के अनुसार उसका पुनर्गठन करना आवश्यक है।

➣ आज़ाद ने संगठन में अनुशासन, गोपनीयता तथा प्रशिक्षण पर विशेष बल दिया। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि संगठन का कार्य किसी एक व्यक्ति पर निर्भर न रहे, बल्कि सामूहिक नेतृत्व के आधार पर आगे बढ़े।

➣ चंद्रशेखर आज़ाद का व्यक्तित्व नई पीढ़ी के क्रांतिकारियों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक था। उनकी संगठन क्षमता और नेतृत्व के कारण HRA फिर से सक्रिय होने लगा तथा शीघ्र ही अनेक युवा क्रांतिकारी उनके साथ जुड़ गए। इन्हीं युवाओं में सबसे प्रमुख नाम भगत सिंह का था।

भगत सिंह का प्रवेश

भगत सिंह बचपन से ही राष्ट्रवादी वातावरण में पले-बढ़े थे। जलियाँवाला बाग हत्याकांड (1919) तथा असहयोग आंदोलन की वापसी (1922) जैसी घटनाओं ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला।

➣ युवावस्था में उन्होंने क्रांतिकारी साहित्य का गंभीर अध्ययन किया और यह निष्कर्ष निकाला कि भारत की स्वतंत्रता के लिए संगठित क्रांतिकारी आंदोलन आवश्यक है। भगत सिंह पहले नौजवान भारत सभा जैसी संस्थाओं के माध्यम से युवाओं में राष्ट्रवादी चेतना फैलाने का कार्य कर रहे थे।

➣ काकोरी कांड के बाद जब HRA पुनर्गठन के दौर से गुजर रहा था, तब उन्होंने चंद्रशेखर आज़ाद और अन्य क्रांतिकारियों से संपर्क स्थापित किया तथा संगठन की गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेना प्रारम्भ किया।

➣ भगत सिंह के आगमन से HRA को केवल एक साहसी क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी वैचारिक नेता भी मिला। उनका मानना था कि क्रांति का उद्देश्य केवल ब्रिटिश शासन को हटाना नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता पर आधारित व्यवस्था स्थापित करना भी होना चाहिए। इस कारण उन्होंने संगठन की विचारधारा को अधिक व्यापक और आधुनिक बनाने पर बल दिया।

भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, भगवतीचरण वोहरा, सुखदेव, शिव वर्मा तथा अन्य युवा क्रांतिकारियों के संयुक्त प्रयासों से HRA में वैचारिक परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। यही प्रक्रिया आगे चलकर सितंबर 1928 ई. की फिरोजशाह कोटला बैठक में अपने निर्णायक चरण पर पहुँची।

फिरोजशाह कोटला बैठक (1928)

8–9 सितंबर 1928 ई. को दिल्ली के ऐतिहासिक फिरोजशाह कोटला के खंडहरों में विभिन्न प्रांतों के प्रमुख क्रांतिकारियों की एक गुप्त बैठक आयोजित की गई।

➣ इस बैठक का उद्देश्य काकोरी कांड के बाद बिखरे हुए क्रांतिकारी आंदोलन को पुनः संगठित करना तथा उसके लिए नई विचारधारा और कार्यनीति निर्धारित करना था।

➣ इस बैठक में चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, भगवतीचरण वोहरा, सुखदेव, शिव वर्मा, विजय कुमार सिन्हा, यशपाल, जयदेव कपूर तथा विभिन्न प्रांतों के अन्य युवा क्रांतिकारी शामिल हुए। बैठक अत्यंत गोपनीय रखी गई, ताकि ब्रिटिश पुलिस को इसकी जानकारी न मिल सके।

➣ बैठक में इस बात पर गंभीर चर्चा हुई कि केवल ब्रिटिश शासन का अंत कर देना पर्याप्त नहीं होगा। स्वतंत्र भारत में ऐसी शासन व्यवस्था स्थापित होनी चाहिए, जो सामाजिक और आर्थिक समानता पर आधारित हो तथा शोषण का अंत करे। इसी कारण संगठन की विचारधारा को अधिक स्पष्ट और व्यापक बनाने का निर्णय लिया गया।

➣ फिरोजशाह कोटला की यह बैठक भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि यहीं से HRA का नया वैचारिक और संगठनात्मक स्वरूप विकसित हुआ।

HSRA की स्थापना

➣ फिरोजशाह कोटला बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) का पुनर्गठन कर उसका नाम हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Socialist Republican Association – HSRA) रखा जाए।

➣ संगठन के नाम में Socialist शब्द जोड़े जाने का उद्देश्य यह स्पष्ट करना था कि स्वतंत्रता के बाद भारत में केवल राजनीतिक परिवर्तन ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समानता पर आधारित व्यवस्था भी स्थापित की जाएगी। संगठन का विश्वास था कि यदि केवल सत्ता परिवर्तन होगा और शोषण की व्यवस्था बनी रहेगी, तो स्वतंत्रता का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होगा।

➣ पुनर्गठन के बाद चंद्रशेखर आज़ाद संगठन के सर्वोच्च सैन्य नेता बने, जबकि भगत सिंह ने संगठन की वैचारिक दिशा, प्रचार तथा राजनीतिक कार्यक्रमों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भगवतीचरण वोहरा, सुखदेव, शिव वर्मा, राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त तथा अन्य युवा क्रांतिकारी भी संगठन के प्रमुख सदस्य बने।

➣ HSRA ने यह स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य केवल सशस्त्र संघर्ष करना नहीं है, बल्कि जनता के बीच राजनीतिक चेतना उत्पन्न करना भी है। इसी कारण आगे चलकर संगठन ने सांडर्स वध (1928), केंद्रीय विधानसभा बम कांड (1929) तथा अन्य कार्रवाइयों को केवल प्रतिशोध के रूप में नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश देने के उद्देश्य से अंजाम दिया।

➣ इस प्रकार HSRA की स्थापना भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के विकास का नया चरण थी, जिसमें संगठन ने सशस्त्र संघर्ष को स्पष्ट राजनीतिक और वैचारिक उद्देश्य से जोड़ दिया।

HRA और HSRA में अंतर

आधार HRA HSRA
पूरा नाम हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन
स्थापना 1924 ई., कानपुर 1928 ई., फिरोजशाह कोटला (दिल्ली) में पुनर्गठन
प्रमुख नेता राम प्रसाद बिस्मिल, सचिन्द्रनाथ सान्याल, योगेशचंद्र चटर्जी चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, भगवतीचरण वोहरा, सुखदेव
मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन का अंत कर गणराज्य की स्थापना ब्रिटिश शासन का अंत कर समाजवादी लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना
विचारधारा क्रांतिकारी राष्ट्रवाद एवं गणराज्यवाद क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के साथ समाजवादी विचारधारा
विशेषता अखिल भारतीय क्रांतिकारी संगठन की स्थापना क्रांतिकारी आंदोलन को स्पष्ट समाजवादी एवं राजनीतिक दिशा प्रदान करना
प्रमुख घटनाएँ काकोरी षड्यंत्र (1925) सांडर्स वध (1928), केंद्रीय विधानसभा बम कांड (1929)

➣ इस प्रकार HRA और HSRA के बीच मूल अंतर केवल नाम का नहीं था। HRA ने भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को एक संगठित राष्ट्रीय आधार प्रदान किया, जबकि HSRA ने उसी आंदोलन को अधिक व्यापक वैचारिक दृष्टि, समाजवादी सोच तथा स्पष्ट राजनीतिक कार्यक्रम के साथ आगे बढ़ाया।

➣ इसलिए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में HRA और HSRA को एक ही क्रांतिकारी परंपरा के क्रमिक विकास के दो महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।

उपलब्धियाँ

  • उत्तर भारत के विभिन्न क्रांतिकारी संगठनों को एक अखिल भारतीय मंच पर संगठित किया।
  • भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को पहली बार स्पष्ट संगठनात्मक ढाँचा, लिखित संविधान तथा घोषणापत्र प्रदान किया।
  • संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य (Federal Republic) की स्थापना का स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य प्रस्तुत किया।
  • काकोरी षड्यंत्र (1925) के माध्यम से ब्रिटिश शासन को खुली चुनौती दी और क्रांतिकारी आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
  • युवाओं में राष्ट्रभक्ति, त्याग, अनुशासन तथा बलिदान की भावना को सुदृढ़ किया।
  • राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ जैसे क्रांतिकारियों के माध्यम से राष्ट्रीय एकता और हिंदू-मुस्लिम सहयोग का प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया।
  • HRA के पुनर्गठन के माध्यम से आगे चलकर HSRA के गठन और भगत सिंह जैसे नए नेतृत्व के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।
  • भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को क्षेत्रीय स्वरूप से निकालकर अधिक संगठित और राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।

सीमाएँ

  • संगठन के पास आर्थिक संसाधनों का अभाव था, जिसके कारण उसे सरकारी खजाने पर कार्रवाई जैसी जोखिमपूर्ण योजनाओं का सहारा लेना पड़ा।
  • सदस्य संख्या सीमित थी और संगठन मुख्यतः कुछ प्रांतों तक ही प्रभावी रूप से सक्रिय रह सका।
  • व्यापक जनसंगठन विकसित करने की अपेक्षा गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियों पर अधिक निर्भर रहा।
  • काकोरी कांड के बाद अधिकांश वरिष्ठ नेताओं की गिरफ्तारी और फाँसी से संगठन को भारी क्षति पहुँची।
  • ब्रिटिश सरकार की कठोर दमनकारी नीति के कारण संगठन का मूल ढाँचा अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रह सका।
  • स्वतंत्र रूप से दीर्घकालीन राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए आवश्यक संसाधन और संगठनात्मक आधार पर्याप्त नहीं थे।

इतिहासकारों का मूल्यांकन

➣ इतिहासकारों का मत है कि HRA भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के विकास का संक्रमणकालीन चरण था। इसने पूर्ववर्ती क्षेत्रीय क्रांतिकारी संगठनों और आगे चलकर स्थापित हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के बीच एक सशक्त सेतु का कार्य किया।

➣ इससे पहले अधिकांश क्रांतिकारी संगठन क्षेत्रीय स्तर पर कार्य करते थे, किंतु HRA ने पहली बार उत्तर भारत के विभिन्न प्रांतों में सक्रिय क्रांतिकारियों को एक अखिल भारतीय संगठन के अंतर्गत संगठित किया। इससे क्रांतिकारी आंदोलन अधिक समन्वित और प्रभावी बन सका।

बिपिन चंद्र जैसे इतिहासकारों ने माना है कि HRA और उसके उत्तराधिकारी संगठन HSRA ने भारतीय युवाओं में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद को नई ऊर्जा प्रदान की। उनके अनुसार इन संगठनों ने यह संदेश दिया कि स्वतंत्रता केवल याचिकाओं से नहीं, बल्कि साहस, संगठन और बलिदान से भी प्राप्त की जा सकती है।

➣ कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि HRA की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी वैचारिक परिपक्वता थी। इस संगठन ने केवल ब्रिटिश शासन के विरोध तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि स्वतंत्र भारत की भावी राजनीतिक व्यवस्था के संबंध में भी स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।

➣ हालाँकि कुछ विद्वानों ने यह भी इंगित किया है कि गुप्त क्रांतिकारी संगठनों की अपनी व्यावहारिक सीमाएँ थीं। सीमित संसाधनों और छोटे संगठनात्मक आधार के कारण वे अकेले ब्रिटिश शासन को समाप्त नहीं कर सकते थे। फिर भी अधिकांश इतिहासकार इस बात पर सहमत हैं कि HRA ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में साहस, आत्मबलिदान और क्रांतिकारी चेतना की परंपरा को मजबूत किया।

प्रमुख व्यक्तित्व

व्यक्तित्व योगदान
सचिन्द्रनाथ सान्याल HRA के प्रमुख संस्थापक, वैचारिक मार्गदर्शक, संविधान एवं घोषणापत्र The Revolutionary के प्रमुख रचनाकार।
राम प्रसाद बिस्मिल HRA के प्रमुख नेता तथा काकोरी षड्यंत्र (1925) के मुख्य योजनाकार।
योगेशचंद्र चटर्जी बंगाल के क्रांतिकारियों को HRA से जोड़ने तथा संगठन के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान।
शचीन्द्रनाथ बख्शी HRA के सक्रिय सदस्य एवं काकोरी अभियान के प्रमुख क्रांतिकारियों में शामिल।
चंद्रशेखर आज़ाद काकोरी कांड के बाद HRA का पुनर्गठन किया तथा आगे चलकर HSRA के सर्वोच्च सैन्य नेता बने।
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ राम प्रसाद बिस्मिल के निकट सहयोगी, काकोरी कांड के प्रमुख क्रांतिकारी तथा राष्ट्रीय एकता के प्रतीक।
राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी काकोरी षड्यंत्र के प्रमुख सहभागी; सबसे पहले फाँसी दिए जाने वाले काकोरी शहीद।
रोशन सिंह काकोरी मुकदमे में मृत्युदंड प्राप्त करने वाले प्रमुख क्रांतिकारी।
भगत सिंह काकोरी के बाद HRA से जुड़े; संगठन की विचारधारा में समाजवादी दृष्टिकोण जोड़ने तथा HSRA के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका।
भगवतीचरण वोहरा HRA के पुनर्गठन और HSRA की वैचारिक दिशा निर्धारित करने वाले प्रमुख क्रांतिकारी।

समयरेखा (Timeline)

वर्ष / तिथि घटना
5 फरवरी 1922 ई. चौरी-चौरा घटना के बाद असहयोग आंदोलन स्थगित; अनेक युवाओं का झुकाव क्रांतिकारी मार्ग की ओर।
अक्टूबर 1924 ई. कानपुर में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) की स्थापना।
जनवरी 1925 ई. HRA का घोषणापत्र The Revolutionary प्रकाशित एवं गुप्त रूप से वितरित।
9 अगस्त 1925 ई. काकोरी षड्यंत्र (Kakori Train Action)।
1925–26 ई. व्यापक गिरफ्तारियाँ एवं काकोरी मुकदमे की कार्यवाही।
6 अप्रैल 1927 ई. काकोरी मुकदमे में विशेष न्यायालय का निर्णय।
17 दिसंबर 1927 ई. राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को फाँसी।
19 दिसंबर 1927 ई. राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ एवं रोशन सिंह को फाँसी।
8–9 सितंबर 1928 ई. दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में ऐतिहासिक बैठक।
सितंबर 1928 ई. HRA का पुनर्गठन कर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) की स्थापना।

कुछ महत्वपूर्ण भ्रम-बिंदु

HRA की स्थापना भगत सिंह ने नहीं की थी। इसका गठन अक्टूबर 1924 ई. में सचिन्द्रनाथ सान्याल, राम प्रसाद बिस्मिल, योगेशचंद्र चटर्जी एवं शचीन्द्रनाथ बख्शी जैसे क्रांतिकारियों ने किया था; भगत सिंह बाद में इससे जुड़े।

HRA और HSRA को बिल्कुल एक ही संगठन नहीं माना जाना चाहिए। HRA (1924) का 1928 ई. में पुनर्गठन करके HSRA बनाया गया और इस नए संगठन ने समाजवादी विचारधारा को स्पष्ट रूप से अपनाया।

HRA का गठन दिल्ली में नहीं, बल्कि कानपुर में हुआ था। दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में 1928 में संगठन का पुनर्गठन हुआ और HSRA का गठन किया गया।

काकोरी कांड का उद्देश्य यात्रियों को लूटना नहीं था। क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाना ले जाने वाली ट्रेन को निशाना बनाया ताकि उस धन का उपयोग क्रांतिकारी आंदोलन के लिए किया जा सके।

काकोरी कांड को सामान्य डकैती मानना सही नहीं होगा। HRA ने इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राजनीतिक उद्देश्य से की गई क्रांतिकारी कार्रवाई के रूप में अंजाम दिया था।

काकोरी कांड के बाद सभी प्रमुख क्रांतिकारी गिरफ्तार नहीं हुए थे। चंद्रशेखर आज़ाद पुलिस की गिरफ्त से बच निकले और बाद में संगठन के पुनर्गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को 19 दिसंबर 1927 को फाँसी नहीं दी गई थी। उन्हें 17 दिसंबर 1927 ई. को फाँसी दी गई, जबकि राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ और रोशन सिंह को 19 दिसंबर 1927 ई. को फाँसी दी गई।

HRA का घोषणापत्र The Revolutionary भगत सिंह ने नहीं लिखा था। इसके प्रमुख लेखक के रूप में सचिन्द्रनाथ सान्याल का नाम लिया जाता है।

HRA का उद्देश्य केवल ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या करना नहीं था। इसका व्यापक लक्ष्य ब्रिटिश शासन का अंत करके भारत में संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य स्थापित करना था।

HRA शुरू से समाजवादी संगठन नहीं था। इसकी प्रारंभिक विचारधारा का आधार क्रांतिकारी राष्ट्रवाद और गणराज्यवाद था, जबकि समाजवादी विचारधारा को स्पष्ट रूप से HSRA (1928) में अपनाया गया।

राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ अलग-अलग संगठनों से नहीं जुड़े थे। दोनों HRA के प्रमुख क्रांतिकारी थे और काकोरी षड्यंत्र में साथ शामिल हुए।

फिरोजशाह कोटला बैठक का संबंध काकोरी षड्यंत्र से नहीं था। यह सितंबर 1928 में HRA के पुनर्गठन और HSRA के गठन के लिए आयोजित की गई थी।

सांडर्स वध HRA की सबसे प्रसिद्ध कार्रवाई नहीं थी। काकोरी षड्यंत्र (1925) HRA की प्रमुख कार्रवाई थी, जबकि सांडर्स वध (1928) HSRA से जुड़ा था।

HRA ने कोई लिखित संविधान तैयार नहीं किया था—यह धारणा सही नहीं है। संगठन ने लिखित संविधान और घोषणापत्र के माध्यम से अपने उद्देश्य और संगठनात्मक दिशा को स्पष्ट किया था।

HRA का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर प्रभाव केवल काकोरी कांड तक सीमित नहीं रहा। इसके संगठनात्मक और वैचारिक आधार पर आगे चलकर HSRA का गठन हुआ और भगत सिंह तथा चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारी नेतृत्व के केंद्र में आए।

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