काबुल की अस्थायी सरकार (1915) : राजा महेंद्र प्रताप, काबुल मिशन एवं रेशमी रुमाल आंदोलन

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत काबुल की अस्थायी सरकार (1915)
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काबुल की अस्थायी सरकार

काबुल की अस्थायी सरकार प्रथम विश्व युद्ध के दौरान विदेश में स्थापित भारतीय क्रांतिकारियों की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहल थी। इसका गठन 1 दिसंबर 1915 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में किया गया।

➣ इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को समाप्त करके भारत में एक स्वतंत्र राष्ट्रीय सरकार स्थापित करने के लिए विदेशों से राजनीतिक और सैन्य सहायता प्राप्त करना था।

➣ इस सरकार का उदय अचानक नहीं हुआ था। इसके पीछे प्रथम विश्व युद्ध (1914–18) के दौरान भारतीय क्रांतिकारियों द्वारा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करने के प्रयासों की लंबी प्रक्रिया थी।

➣ युद्ध में जर्मनी और तुर्की ब्रिटेन के विरोधी थे और भारतीय क्रांतिकारियों को उम्मीद थी कि ब्रिटेन के युद्धकालीन संकट का लाभ उठाकर भारत में स्वतंत्रता आंदोलन को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

पृष्ठभूमि

प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के दौरान ब्रिटेन के विरुद्ध लड़ रही शक्तियों ने भारतीय क्रांतिकारियों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने के लिए सहायता देने की संभावना देखी।

➣ इसी परिस्थिति में बर्लिन समिति, गदर पार्टी तथा अन्य भारतीय क्रांतिकारी समूहों ने जर्मनी के सहयोग से भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह की योजनाएँ बनाईं। इन प्रयासों को व्यापक रूप से हिंदू-जर्मन षड्यंत्र के नाम से जाना जाता है।

➣ इन योजनाओं में भारत में हथियार पहुँचाना, भारतीय सैनिकों को विद्रोह के लिए प्रेरित करना तथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र आंदोलन खड़ा करना शामिल था।

➣ गदर आंदोलन से जुड़े प्रयासों और जर्मनी से हथियार प्राप्त करने की योजनाओं को ब्रिटिश खुफिया तंत्र ने काफी हद तक विफल कर दिया। इसके परिणामस्वरूप विदेशों में हिंदू-जर्मन षड्यंत्र मुकदमे तथा भारत में लाहौर षड्यंत्र मुकदमे जैसी कानूनी कार्रवाइयाँ हुईं।

➣ इन असफलताओं के बावजूद भारतीय क्रांतिकारियों ने अपने प्रयास बंद नहीं किए। उन्हें यह महसूस हुआ कि केवल गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियों और हथियार भेजने के प्रयासों से ब्रिटिश शासन को निर्णायक चुनौती देना कठिन होगा।

➣ इसलिए विदेश में ऐसी राजनीतिक व्यवस्था बनाने की योजना सामने आई, जो भारतीय स्वतंत्रता का प्रतिनिधित्व कर सके और ब्रिटेन के विरोधी देशों से खुले तौर पर राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन प्राप्त कर सके।

अफगानिस्तान का रणनीतिक महत्व

➣ इसी रणनीति के तहत अफगानिस्तान को विशेष महत्व दिया गया। भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा के निकट स्थित होने के कारण अफगानिस्तान से ब्रिटिश भारत पर राजनीतिक और सैन्य दबाव बनाया जा सकता था।

➣ यदि अफगान सरकार ब्रिटिश-विरोधी भारतीय क्रांतिकारियों का साथ देती, तो उत्तर-पश्चिमी सीमा, भारतीय सैनिकों और सीमावर्ती कबीलों के माध्यम से ब्रिटिश शासन के सामने गंभीर चुनौती खड़ी की जा सकती थी।

अमीर हबीबुल्लाह खान की स्थिति इस पूरी योजना में महत्वपूर्ण थी। भारतीय क्रांतिकारियों को आशा थी कि यदि अमीर ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध में शामिल हो जाते हैं, तो अफगानिस्तान भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

➣ साथ ही जर्मनी और तुर्की की सहायता से ब्रिटिश भारत पर बाहरी दबाव बढ़ाने की संभावना भी थी। हालांकि अमीर हबीबुल्लाह खान ब्रिटेन के साथ अपने संबंध पूरी तरह तोड़ने के लिए तैयार नहीं थे और उन्होंने खुले रूप से ब्रिटिश-विरोधी युद्ध का समर्थन नहीं किया।

➣ अफगानिस्तान के इसी रणनीतिक महत्व के कारण बर्लिन समिति और जर्मन सरकार की योजना काबुल तक पहुँची। जर्मनी और तुर्की से जुड़े प्रतिनिधियों तथा भारतीय क्रांतिकारियों के सहयोग से काबुल मिशन को आगे बढ़ाया गया।

➣ इसका तत्काल उद्देश्य अफगान अमीर को ब्रिटिश-विरोधी पक्ष में लाना और भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए अफगानिस्तान का सहयोग प्राप्त करना था।

➣ काबुल में आगे चलकर एक अस्थायी भारतीय सरकार स्थापित करने का विचार इसी व्यापक योजना का हिस्सा था। इसका उद्देश्य केवल ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह करना नहीं था, बल्कि भारत की स्वतंत्रता के लिए एक ऐसी राजनीतिक संस्था प्रस्तुत करना था जिसे विदेशी शक्तियों से राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन प्राप्त कराया जा सके।

➣ इसी व्यापक प्रयास के परिणामस्वरूप काबुल में काबुल की अस्थायी सरकार की स्थापना हुई। हालांकि अफगान अमीर ने इस सरकार को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं दी, फिर भी इसका गठन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास था।

रेशमी रुमाल आंदोलन (1913–15)

रेशमी रुमाल आंदोलन प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारतीय क्रांतिकारियों द्वारा चलाया गया एक महत्वपूर्ण गुप्त आंदोलन था।

➣ इसका नेतृत्व मुख्यतः मौलाना महमूद हसन ने किया और मौलाना ओबैदुल्लाह सिंधी, मौलाना मंसूर अंसारी तथा अन्य राष्ट्रवादी उलेमा ने इसमें सहयोग किया।

➣ आंदोलन का उद्देश्य भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह की तैयारी करना और इसके लिए विदेशों से सहायता प्राप्त करना था।

➣ इस आंदोलन की योजना लगभग 1913 से विकसित होने लगी थी। 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के बाद इस योजना को आगे बढ़ाने का अवसर दिखाई दिया। ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध कर रहे तुर्की और जर्मनी से सहायता प्राप्त करने की संभावना बढ़ गई थी।

➣ मौलाना महमूद हसन ने इस परिस्थिति का लाभ उठाकर भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह की तैयारी तेज करने का निर्णय लिया। उनका उद्देश्य भारत के भीतर क्रांतिकारी गतिविधियों को अफगानिस्तान और तुर्की की संभावित सहायता से जोड़ना था।

➣ इसी योजना के अंतर्गत मौलाना ओबैदुल्लाह सिंधी को अफगानिस्तान भेजा गया। उनका उद्देश्य वहाँ के राजनीतिक एवं धार्मिक प्रभावशाली लोगों से संपर्क स्थापित करना और अमीर हबीबुल्लाह खान से ब्रिटिश-विरोधी सहयोग प्राप्त करने की संभावना तलाशना था। साथ ही उत्तर-पश्चिमी सीमा के कबायली क्षेत्रों में ब्रिटिश-विरोधी समर्थन जुटाने की योजना भी थी।

➣ दूसरी ओर मौलाना महमूद हसन ने तुर्की से सहायता प्राप्त करने के लिए हिजाज की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने उस्मानी तुर्की के प्रभावशाली नेताओं से संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया, ताकि भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रस्तावित विद्रोह को सैन्य और राजनीतिक सहायता मिल सके।

➣ इस प्रकार आंदोलन की रणनीति में भारत के भीतर क्रांतिकारी संगठन और विदेशों से सहायता-दोनों को एक साथ जोड़ा गया।

➣ इस आंदोलन की योजनाओं और संदेशों को गुप्त रखने के लिए रेशमी कपड़े पर पत्र लिखकर उन्हें भेजा जाता था। इन्हीं रेशमी पत्रों के कारण यह आंदोलन आगे चलकर रेशमी रुमाल आंदोलन या रेशमी पत्र आंदोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

➣ आंदोलन का व्यापक उद्देश्य केवल किसी एक क्षेत्र में विद्रोह करना नहीं था। इसके पीछे ऐसी योजना थी जिसमें भारत के भीतर क्रांतिकारी गतिविधियाँ, उत्तर-पश्चिमी सीमा के कबायली समर्थन और अफगानिस्तान तथा तुर्की की सहायता को एक साथ जोड़ा जाए। यदि यह योजना सफल होती, तो ब्रिटिश भारत के सामने एक आंतरिक विद्रोह के साथ-साथ बाहरी दबाव भी उत्पन्न किया जा सकता था।

काबुल मिशन और भारतीय क्रांतिकारियों का आगमन (1915)

1915 में जर्मनी और तुर्की के सहयोग से एक विशेष भारतीय-तुर्की-जर्मन मिशन अफगानिस्तान भेजा गया। इस मिशन को इतिहास में काबुल मिशन या निडरमायर-हेंटिग मिशन के नाम से जाना जाता है।

➣इसका उद्देश्य अमीर हबीबुल्लाह खान को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सहयोग के लिए तैयार करना और अफगानिस्तान के रास्ते भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अभियान की संभावनाएँ तलाशना था।

➣ मिशन में जर्मन पक्ष से ऑस्कर वॉन निडरमायर और वर्नर वॉन हेंटिग प्रमुख थे। भारतीय पक्ष से राजा महेंद्र प्रताप और मौलाना बरकतुल्लाह शामिल थे।

➣इनके साथ तुर्की के काज़िम बे तथा कुछ अफरीदी स्वयंसेवक भी थे। मिशन का राजनीतिक चेहरा महेंद्र प्रताप थे, जबकि निडरमायर और हेंटिग जर्मन पक्ष से इसके प्रमुख प्रतिनिधि थे।

➣ मिशन ने जुलाई 1915 में ईरान के इस्फहान से अफगानिस्तान की ओर अपनी यात्रा शुरू की। सितंबर 1915 में मिशन हेरात पहुँचा और वहाँ कुछ समय रुकने के बाद काबुल के लिए आगे रवाना हुआ।

2 अक्टूबर 1915 को मिशन काबुल पहुँचा। वहाँ उसे अमीर के अतिथि गृह बाग-ए-बाबर में ठहराया गया। अफगान सरकार मिशन की गतिविधियों पर नजर रख रही थी और अमीर हबीबुल्लाह तत्काल उससे मिलने के लिए तैयार नहीं थे। अंततः 26 अक्टूबर 1915 को पगमान में अमीर ने मिशन के प्रमुख सदस्यों से मुलाकात की।

➣ दूसरी ओर मौलाना ओबैदुल्लाह सिंधी भी 1915 में काबुल पहुँच चुके थे। वे देवबंद की राष्ट्रवादी धारा से जुड़े थे और अफगानिस्तान के माध्यम से ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे।

➣काबुल में उनकी मुलाकात राजा महेंद्र प्रताप और मौलाना बरकतुल्लाह से हुई। इस प्रकार भारत की स्वतंत्रता के लिए काम कर रही अलग-अलग क्रांतिकारी धाराएँ काबुल में एक-दूसरे के संपर्क में आईं।

➣ काबुल पहुँचने के बाद भारतीय क्रांतिकारियों और जर्मन-तुर्की प्रतिनिधियों का मुख्य ध्यान अमीर हबीबुल्लाह को ब्रिटिश-विरोधी पक्ष में लाने पर था। इसी उद्देश्य से अमीर के साथ लगातार संपर्क और बातचीत की गई।

➣हालांकि अमीर ने उस समय कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं दी।। वे ब्रिटिश सरकार के साथ अपने संबंधों को बनाए रखना चाहते थे। इसलिए उन्होंने मिशन के सदस्यों से मिलने में भी कुछ समय लगाया।

➣जर्मन मिशन काबुल पहुँचने के बाद भी अमीर कुछ समय अपने पगमान स्थित ग्रीष्मकालीन महल में रहे और 26 अक्टूबर 1915 को मिशन के सदस्यों से मिलने के लिए व्यवस्था की गई।

➣ ब्रिटिश सरकार भी अफगान अमीर पर अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए सक्रिय थी। इसी समय ब्रिटिश सरकार ने किंग जॉर्ज पंचम का व्यक्तिगत संदेश अमीर को भेजा और अफगानिस्तान के प्रति ब्रिटिश मैत्री की पुष्टि की।

साथ ही अफगान सरकार को मिलने वाली वार्षिक आर्थिक सहायता में दो लाख रुपये की वृद्धि का संकेत दिया गया। इसका उद्देश्य अमीर को केंद्रीय शक्तियों के प्रभाव से दूर रखना था।

तथ्य विवरण
मिशन का नाम निडरमायर–हेंटिग मिशन / काबुल मिशन
नेतृत्व ऑस्कर वॉन निडरमायर और वर्नर वॉन हेंटिग
भारतीय प्रमुख सदस्य राजा महेंद्र प्रताप, मौलाना बरकतुल्लाह
तुर्की प्रतिनिधि काज़िम बे
ओबैदुल्लाह सिंधी अक्टूबर 1915 में काबुल पहुँचे
यात्रा प्रारंभ जुलाई 1915, इस्फहान
हेरात आगमन सितंबर 1915
काबुल आगमन 2 अक्टूबर 1915
काबुल में ठहराव बाग-ए-बाबर स्थित अमीर का अतिथि गृह
अमीर हबीबुल्लाह खान
अगला निर्णायक चरण 1 दिसंबर 1915 – काबुल की अस्थायी सरकार की स्थापना

काबुल की अस्थायी सरकार की स्थापना (1915)

➣ काबुल पहुँचने के बाद भारतीय क्रांतिकारियों ने यह महसूस किया कि केवल विदेशी सहायता प्राप्त करने के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। भारत की स्वतंत्रता के लिए एक ऐसी राजनीतिक संस्था की आवश्यकता थी जो विदेश में रहकर भारतीय स्वतंत्रता का प्रतिनिधित्व कर सके और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विदेशी शक्तियों से समर्थन प्राप्त कर सके।

➣ इसी विचार के परिणामस्वरूप 1 दिसंबर 1915 को काबुल में भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को समाप्त करके भारत में एक स्वतंत्र राष्ट्रीय सरकार की स्थापना के लिए राजनीतिक, कूटनीतिक और आवश्यक होने पर सैन्य सहायता जुटाना था।

➣ सरकार की स्थापना के समय उसकी सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि उसके पास भारत में कोई वास्तविक प्रशासनिक या सैन्य नियंत्रण नहीं था। साथ ही अफगान अमीर हबीबुल्लाह खान ने इसे औपचारिक मान्यता नहीं दी। फिर भी सरकार ने अफगानिस्तान और अन्य विदेशी शक्तियों से सहायता तथा राजनीतिक समर्थन प्राप्त करने के प्रयास जारी रखे।

अस्थायी सरकार का संगठन एवं प्रमुख सदस्य

➣ इस अस्थायी सरकार के अध्यक्ष राजा महेंद्र प्रताप और प्रधानमंत्री मौलाना बरकतुल्लाह बने। मौलाना ओबैदुल्लाह सिंधी को गृह मंत्री तथा अन्य प्रमुख सहयोगियों को अलग-अलग विभागों की जिम्मेदारी दी गई। इस प्रकार विदेश की भूमि पर स्वतंत्र भारत की भावी सरकार का एक प्रारंभिक राजनीतिक ढाँचा प्रस्तुत किया गया।

प्रमुख सदस्य पद भूमिका
राजा महेंद्र प्रताप अध्यक्ष सरकार के प्रमुख राजनीतिक नेता; विदेशी शक्तियों और अफगान नेतृत्व से संपर्क स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका।
मौलाना बरकतुल्लाह प्रधानमंत्री सरकार के राजनीतिक कार्यों का संचालन तथा भारत की स्वतंत्रता के लिए विदेशी समर्थन जुटाने में भूमिका।
मौलाना ओबैदुल्लाह सिंधी गृह मंत्री आंतरिक संगठन तथा भारत और उत्तर-पश्चिमी सीमा क्षेत्र से जुड़े क्रांतिकारी संपर्कों में महत्वपूर्ण भूमिका।
मौलवी मुहम्मद बशीर युद्ध मंत्री सैन्य मामलों और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संभावित सशस्त्र संघर्ष से संबंधित जिम्मेदारियाँ।
चंपकरमन पिल्लै विदेश मंत्री विदेशी शक्तियों से संपर्क तथा भारत की स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन प्राप्त करने के प्रयास।

➣ इस प्रकार महेंद्र प्रताप का राजनीतिक नेतृत्व, बरकतुल्लाह का प्रशासनिक एवं राजनीतिक कार्य, ओबैदुल्लाह सिंधी का आंतरिक संगठन, मुहम्मद बशीर का सैन्य पक्ष और चंपकरमन पिल्लै का विदेशी संपर्क काबुल की अस्थायी सरकार की प्रारंभिक संगठनात्मक व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ थीं।

जर्मनी, तुर्की और अफगानिस्तान से संबंध

काबुल की अस्थायी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती भारत से बाहर रहकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रभावी सहायता प्राप्त करना था। इसलिए उसके नेताओं ने जर्मनी, तुर्की और अफगानिस्तान के साथ राजनीतिक एवं कूटनीतिक संबंध मजबूत करने का प्रयास किया।

जर्मनी से सहायता की अपेक्षा

➣ प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी ब्रिटेन का प्रमुख विरोधी था। इसलिए भारतीय क्रांतिकारियों को उम्मीद थी कि जर्मनी भारत की स्वतंत्रता के प्रयासों को धन, हथियार, सैन्य सहायता और कूटनीतिक समर्थन देगा। काबुल में जर्मन प्रतिनिधियों की मौजूदगी भी इसी उद्देश्य से जुड़ी थी।

➣ भारतीय क्रांतिकारियों का प्रयास था कि जर्मनी की सहायता से अफगानिस्तान को ब्रिटिश-विरोधी पक्ष में लाया जाए और फिर अफगानिस्तान के रास्ते भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अभियान चलाया जाए। इस योजना में हथियारों की आपूर्ति, सैन्य प्रशिक्षण और राजनीतिक समर्थन की संभावनाएँ शामिल थीं।

➣ हालांकि जर्मनी भारतीय क्रांतिकारियों का उपयोग ब्रिटिश साम्राज्य को कमजोर करने के लिए करना चाहता था, लेकिन युद्ध की भौगोलिक परिस्थितियों और अफगानिस्तान की तटस्थ नीति के कारण भारत में बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष सैन्य सहायता पहुँचाना संभव नहीं हो सका।

तुर्की से संबंध

उस्मानी तुर्की भी प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन के विरुद्ध केंद्रीय शक्तियों का हिस्सा था। भारतीय मुस्लिम राष्ट्रवादियों के लिए तुर्की का महत्व और भी अधिक था क्योंकि उस्मानी सुल्तान खलीफा के रूप में व्यापक मुस्लिम जगत में प्रभाव रखते थे। इसलिए काबुल के भारतीय क्रांतिकारी तुर्की से राजनीतिक और सैन्य सहयोग प्राप्त करने के प्रयास करते रहे।

➣ तुर्की का सहयोग मिलने पर भारतीय क्रांतिकारी इसे भारत में ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन को मजबूत करने के साथ-साथ अफगानिस्तान को ब्रिटिश विरोधी पक्ष में लाने के लिए उपयोग करना चाहते थे। इस प्रकार जर्मनी और तुर्की दोनों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संभावित अंतरराष्ट्रीय सहयोगी के रूप में देखा गया।

अमीर हबीबुल्लाह को ब्रिटिश-विरोधी युद्ध में शामिल करने का प्रयास

➣ काबुल की अस्थायी सरकार की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अमीर हबीबुल्लाह खान का समर्थन प्राप्त करना था। यदि अफगानिस्तान ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध में शामिल हो जाता, तो ब्रिटिश भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर एक नया मोर्चा खुल सकता था और भारतीय क्रांतिकारियों को अफगान क्षेत्र से सहायता मिल सकती थी।

➣ भारतीय क्रांतिकारियों तथा जर्मन-तुर्की प्रतिनिधियों ने अमीर को यह समझाने का प्रयास किया कि ब्रिटेन के विरुद्ध खड़े होने पर उन्हें केंद्रीय शक्तियों से धन, हथियार और सैन्य सहायता मिल सकती है।

➣ इसके साथ ही सीमावर्ती कबीलों और भारत के असंतुष्ट सैनिकों को भी ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संगठित करने की संभावना पर विचार किया गया।

➣ लेकिन अमीर हबीबुल्लाह खान ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। वे ब्रिटिश सरकार से अपने संबंधों को पूरी तरह समाप्त करने के लिए तैयार नहीं थे और उन्हें आशंका थी कि यदि जर्मनी और तुर्की अपेक्षित सहायता नहीं दे सके, तो अफगानिस्तान को अकेले ब्रिटिश शक्ति का सामना करना पड़ेगा। इसलिए उन्होंने तटस्थता की नीति बनाए रखी।

अफगान दरबार में भारतीय क्रांतिकारियों को समर्थन

➣ यद्यपि अमीर ने आधिकारिक रूप से काबुल की अस्थायी सरकार का समर्थन नहीं किया, लेकिन अफगान दरबार और राजनीतिक-धार्मिक वर्ग के कुछ प्रभावशाली लोगों में भारतीय क्रांतिकारियों के प्रति सहानुभूति थी।

➣ इनमें अमीर के भाई नसरुल्लाह खान, उनके पुत्र अमानुल्लाह खान और इनायतुल्लाह खान, कुछ धार्मिक नेता और सीमावर्ती कबीलों के प्रभावशाली लोग शामिल थे।

महमूद तारज़ी के संपादन में निकलने वाले सिराज-उल-अखबार जैसे समाचार-पत्रों ने भी ब्रिटिश-विरोधी विचारों को जगह दी। इससे काबुल में भारतीय क्रांतिकारियों को कुछ वैचारिक और सामाजिक समर्थन मिला, हालांकि यह समर्थन अफगान सरकार की आधिकारिक नीति में परिवर्तित नहीं हुआ।

ब्रिटिश कूटनीति और अफगान तटस्थता

➣ ब्रिटिश सरकार ने काबुल मिशन और भारतीय क्रांतिकारियों की गतिविधियों को गंभीर खतरे के रूप में देखा। इसलिए उसने अफगानिस्तान को केंद्रीय शक्तियों के प्रभाव में जाने से रोकने के लिए कूटनीतिक और आर्थिक दबाव बढ़ाया।

➣ ब्रिटिश नेतृत्व अमीर हबीबुल्लाह को लगातार यह विश्वास दिलाने का प्रयास करता रहा कि ब्रिटेन के साथ संबंध बनाए रखना अफगानिस्तान के हित में है।

➣ ब्रिटिश पक्ष ने अमीर के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने के लिए आर्थिक सहायता और राजनीतिक आश्वासनों का उपयोग किया। ब्रिटिश सरकार ने अफगानिस्तान को मिलने वाली वार्षिक सहायता बढ़ाने की भी पेशकश की। इसके साथ-साथ किंग जॉर्ज पंचम की ओर से अमीर को संदेश भेजकर ब्रिटेन-अफगान मैत्री बनाए रखने का प्रयास किया गया।

➣ इस ब्रिटिश दबाव और जर्मन-तुर्की सहायता की अनिश्चितता के कारण अमीर ने अंततः प्रथम विश्व युद्ध में अफगानिस्तान को तटस्थ बनाए रखा। यही काबुल की अस्थायी सरकार की सबसे बड़ी कूटनीतिक समस्या बन गई।

पक्ष मुख्य तथ्य
जर्मनी धन, हथियार और सैन्य सहायता के माध्यम से ब्रिटिश भारत के विरुद्ध अभियान में सहयोग की कोशिश
तुर्की ब्रिटेन-विरोधी समर्थन और पैन-इस्लामिक संपर्क
अमीर हबीबुल्लाह खान
मुख्य मांग अमीर ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध में शामिल हों
अफगान नीति आधिकारिक तटस्थता
समर्थक अफगान नेता नसरुल्लाह खान, अमानुल्लाह खान आदि में सहानुभूति
ब्रिटिश प्रतिक्रिया कूटनीतिक दबाव, आर्थिक सहायता और अफगान तटस्थता बनाए रखने के प्रयास
1916 निडरमायर-हेंटिग मिशन काबुल से रवाना हुआ
मुख्य परिणाम अमीर को युद्ध में शामिल कराने का प्रयास असफल

➣ इस प्रकार काबुल की अस्थायी सरकार को जर्मनी और तुर्की से सहानुभूति एवं कुछ राजनीतिक समर्थन तो मिला, लेकिन अफगान अमीर का खुला समर्थन और निर्णायक सैन्य सहायता प्राप्त नहीं हो सकी। यही उसकी विदेश नीति की सबसे बड़ी कमजोरी बनी।

ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया एवं दमन

काबुल मिशन, रेशमी रुमाल आंदोलन और काबुल की अस्थायी सरकार की गतिविधियों को ब्रिटिश सरकार ने गंभीर खतरे के रूप में लिया।

ब्रिटिश अधिकारियों को आशंका थी कि जर्मनी और तुर्की की सहायता से भारतीय क्रांतिकारी अफगानिस्तान के रास्ते भारत में विद्रोह खड़ा कर सकते हैं तथा भारतीय सैनिकों और उत्तर-पश्चिमी सीमा के कबीलों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संगठित कर सकते हैं।

➣ ब्रिटिश सरकार ने फारस के रास्ते काबुल जाने वाले मार्गों पर भी निगरानी बढ़ाई। इसका उद्देश्य जर्मन अधिकारियों, भारतीय क्रांतिकारियों और उनके सहयोगियों की आवाजाही रोकना तथा काबुल मिशन को अफगानिस्तान पहुँचने से पहले ही कमजोर करना था।

➣ ब्रिटिश खुफिया अधिकारियों ने काबुल मिशन से जुड़े पत्राचार और संदेशों को भी पकड़ने का प्रयास किया। इन सूचनाओं से ब्रिटिश अधिकारियों को पता चला कि भारतीय क्रांतिकारी अफगानिस्तान को आधार बनाकर हथियार, सैनिक सहायता और राजनीतिक समर्थन प्राप्त करने का प्रयास कर रहे थे।

➣ ब्रिटिश सरकार की सबसे महत्वपूर्ण सफलताओं में रेशमी पत्रों का पकड़ा जाना था। 1916 में पंजाब सी.आई.डी. ने ऐसे पत्र पकड़े जो ओबैदुल्लाह सिंधी और उनके सहयोगियों की ओर से मौलाना महमूद हसन तक पहुँचाए जाने थे।

ये पत्र रेशमी कपड़े पर लिखे गए थे और इनमें काबुल तथा भारत में चल रही ब्रिटिश-विरोधी गतिविधियों से संबंधित जानकारी थी। इसी कारण यह मामला आगे चलकर रेशमी रुमाल षड्यंत्र के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

➣ इन पत्रों की जाँच से ब्रिटिश अधिकारियों को काबुल में ओबैदुल्लाह सिंधी की गतिविधियों, विदेशी सहायता प्राप्त करने के प्रयासों और हथियारों की व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी मिली।

ब्रिटिश अधिकारियों ने पत्रों को आंदोलन के व्यापक नेटवर्क का पता लगाने के लिए उपयोग किया और भारत तथा विदेशों में उससे जुड़े लोगों की निगरानी एवं पूछताछ तेज कर दी।

➣ रेशमी पत्रों के खुलासे के बाद ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन से जुड़े अनेक लोगों को गिरफ्तार किया और उनसे पूछताछ की। मौलाना महमूद हसन को मक्का में गिरफ्तार किया गया और बाद में उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों के हवाले कर दिया गया। उन्हें माल्टा में नजरबंद रखा गया, जहाँ वे 1920 तक रहे।

➣ ब्रिटिश कार्रवाई केवल भारत तक सीमित नहीं रही। विदेशों में मौजूद भारतीय क्रांतिकारियों के संपर्क, धन के स्रोत, यात्रा और पत्राचार पर निगरानी बढ़ाई गई। इसका उद्देश्य क्रांतिकारी नेटवर्क को अलग-अलग हिस्सों में बाँटना और उनके बीच सहयोग तथा संसाधनों के प्रवाह को रोकना था।

➣ ब्रिटिश सरकार ने साथ-साथ कूटनीतिक उपायों का भी इस्तेमाल किया। अफगान अमीर पर केंद्रीय शक्तियों और भारतीय क्रांतिकारियों से दूरी बनाए रखने के लिए दबाव डाला गया। ब्रिटिश पक्ष ने राजनीतिक संदेशों और आर्थिक सहायता के माध्यम से अमीर की तटस्थता बनाए रखने का प्रयास किया।

➣ इस प्रकार ब्रिटिश प्रतिक्रिया केवल गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं थी। खुफिया निगरानी, पत्राचार को पकड़ना, क्रांतिकारी नेटवर्क में घुसपैठ, सीमा मार्गों पर निगरानी, गिरफ्तारियाँ और कूटनीतिक दबाव– इन सभी माध्यमों का उपयोग भारतीय क्रांतिकारी गतिविधियों को कमजोर करने के लिए किया गया।

काबुल की अस्थायी सरकार की विफलता एवं समाप्ति

काबुल की अस्थायी सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि उसे अफगान सरकार की औपचारिक मान्यता और प्रत्यक्ष सैन्य समर्थन प्राप्त नहीं हुआ।

अमीर हबीबुल्लाह खान ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अफगानिस्तान को तटस्थ बनाए रखा और ब्रिटेन के साथ अपने संबंधों को पूरी तरह समाप्त करने से बचते रहे। इससे काबुल की सरकार की योजनाओं को अपेक्षित आधार नहीं मिल सका।

➣ भारतीय क्रांतिकारियों का उद्देश्य था कि अफगानिस्तान ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध में शामिल हो और जर्मनी तथा तुर्की की सहायता से भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अभियान चलाया जाए। लेकिन अमीर के तटस्थ रहने के कारण अफगान क्षेत्र से व्यापक सैन्य अभियान शुरू नहीं किया जा सका।

➣ दूसरी बड़ी समस्या जर्मनी और तुर्की से निर्णायक एवं निरंतर सैन्य सहायता प्राप्त न होना थी। प्रथम विश्व युद्ध के विभिन्न मोर्चों पर केंद्रीय शक्तियाँ स्वयं युद्ध में उलझी थीं। इसलिए काबुल स्थित भारतीय क्रांतिकारियों को ऐसी सहायता नहीं मिल सकी जिससे भारत में बड़े पैमाने पर सशस्त्र विद्रोह संगठित किया जा सके।

➣ ब्रिटिश सरकार की कूटनीतिक और खुफिया कार्रवाई ने भी काबुल की सरकार को कमजोर किया। ब्रिटिश अधिकारियों ने अफगान अमीर पर लगातार दबाव बनाए रखा और भारतीय क्रांतिकारियों तथा उनके विदेशी सहयोगियों की गतिविधियों पर निगरानी बढ़ाई। इससे काबुल सरकार के लिए स्वतंत्र रूप से अपनी गतिविधियाँ चलाना और विदेशी संपर्क बनाए रखना कठिन होता गया।

1916 में जर्मन-तुर्की मिशन के लिए यह स्पष्ट हो गया कि अमीर हबीबुल्लाह को ब्रिटिश-विरोधी युद्ध में शामिल कराना संभव नहीं है। निडरमायर-हेंटिग मिशन ने अंततः काबुल छोड़ दिया। इससे काबुल की अस्थायी सरकार को मिलने वाली विदेशी सहायता और कूटनीतिक समर्थन की संभावनाएँ और कमजोर हो गईं।

➣ इसके बाद काबुल की अस्थायी सरकार के नेता विदेशों में भारत की स्वतंत्रता के लिए संपर्क और समर्थन जुटाने का प्रयास करते रहे, लेकिन उनके पास भारत में कोई वास्तविक प्रशासनिक नियंत्रण या स्थायी सैन्य आधार नहीं था। इसलिए सरकार मुख्यतः विदेश-स्थित क्रांतिकारी राजनीतिक केंद्र के रूप में ही काम करती रही।

1918 में प्रथम विश्व युद्ध के अंत के साथ अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल गईं। जर्मनी और उसके सहयोगियों की हार ने उन बाहरी शक्तियों को कमजोर कर दिया जिनसे भारतीय क्रांतिकारियों को सहायता की उम्मीद थी। इस परिवर्तन का काबुल की अस्थायी सरकार की गतिविधियों पर भी सीधा प्रभाव पड़ा।

➣ युद्ध की समाप्ति के बाद काबुल स्थित इस क्रांतिकारी सरकार के लिए अपना पूर्व उद्देश्य जारी रखना कठिन हो गया। अफगानिस्तान की तटस्थ नीति, विदेशी सहायता की कमी, ब्रिटिश कूटनीतिक दबाव और बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने इसके राजनीतिक प्रयासों को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया।

➣ इस प्रकार काबुल की अस्थायी सरकार की विफलता का कारण केवल ब्रिटिश दमन नहीं था। इसके पीछे अफगान अमीर का समर्थन न मिलना, केंद्रीय शक्तियों से सीमित सहायता, भारत में प्रत्यक्ष आधार का अभाव और प्रथम विश्व युद्ध के बदलते परिणाम भी महत्वपूर्ण थे।

➣ हालांकि सरकार अपनी तत्काल राजनीतिक और सैन्य योजना को सफल नहीं बना सकी, फिर भी उसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित करने का महत्वपूर्ण प्रयास किया।

महत्वपूर्ण तथ्य

तिथि / वर्ष महत्वपूर्ण तथ्य
1914 प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ। भारतीय क्रांतिकारियों ने ब्रिटेन के युद्ध में उलझने का लाभ उठाकर विदेशी सहायता से स्वतंत्रता संघर्ष तेज करने का प्रयास किया।
1914–15 हिंदू-जर्मन षड्यंत्र के अंतर्गत बर्लिन समिति, गदर पार्टी और अन्य क्रांतिकारियों ने जर्मनी की सहायता से ब्रिटिश भारत में विद्रोह की योजनाएँ बनाईं।
1915 रेशमी रुमाल आंदोलन से जुड़ी गतिविधियों के अंतर्गत अफगानिस्तान और तुर्की से सहायता प्राप्त करने तथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह की योजना बनाई गई।
जुलाई 1915 निडरमायर-हेंटिग मिशन ने ईरान के इस्फहान से अफगानिस्तान की ओर यात्रा शुरू की।
सितंबर 1915 काबुल मिशन हेरात पहुँचा।
2 अक्टूबर 1915 जर्मन-तुर्की-भारतीय काबुल मिशन काबुल पहुँचा।
अक्टूबर 1915 मौलाना ओबैदुल्लाह सिंधी काबुल पहुँचे और वहाँ राजा महेंद्र प्रताप तथा मौलाना बरकतुल्लाह से जुड़े।
1 दिसंबर 1915 काबुल में भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना हुई।
1 दिसंबर 1915 राजा महेंद्र प्रताप अध्यक्ष और मौलाना बरकतुल्लाह प्रधानमंत्री बने।
1 दिसंबर 1915 ओबैदुल्लाह सिंधी को गृह मंत्री, मौलवी मुहम्मद बशीर को युद्ध मंत्री और चंपकरमन पिल्लै को विदेश मंत्री बनाया गया।
मुख्य लक्ष्य ब्रिटिश शासन को समाप्त करना, विदेशी सहायता प्राप्त करना और स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय सरकार की स्थापना के लिए प्रयास करना।
मुख्य विदेशी संपर्क जर्मनी, तुर्की और अफगानिस्तान से राजनीतिक एवं सैन्य सहायता प्राप्त करने का प्रयास।
अफगान अमीर हबीबुल्लाह खान को ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध में शामिल कराने का प्रयास, लेकिन अमीर ने तटस्थ नीति बनाए रखी।
1916 ब्रिटिश खुफिया तंत्र ने रेशमी पत्रों को पकड़ा, जिससे रेशमी रुमाल आंदोलन की योजनाओं और काबुल से जुड़े क्रांतिकारी नेटवर्क की जानकारी ब्रिटिश सरकार को मिली।
1916 ब्रिटिश कार्रवाई के बाद मौलाना महमूद हसन गिरफ्तार हुए और बाद में माल्टा में नजरबंद किए गए।
1916 निडरमायर-हेंटिग मिशन काबुल से वापस चला गया।
1918 प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हुआ। केंद्रीय शक्तियों की हार से काबुल की अस्थायी सरकार को मिलने वाली विदेशी सहायता की संभावनाएँ कमजोर हुईं।
1919 अफगानिस्तान की परिस्थितियों में परिवर्तन और ब्रिटिश-अफगान संबंधों के बदलने के साथ काबुल की अस्थायी सरकार की गतिविधियाँ समाप्ति की ओर बढ़ीं।

प्रमुख व्यक्ति एवं उनकी भूमिका

व्यक्ति भूमिका
राजा महेंद्र प्रताप काबुल की अस्थायी सरकार के अध्यक्ष
मौलाना बरकतुल्लाह अस्थायी सरकार के प्रधानमंत्री
मौलाना ओबैदुल्लाह सिंधी अस्थायी सरकार के गृह मंत्री, रेशमी रुमाल आंदोलन और काबुल की गतिविधियों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी।
मौलवी मुहम्मद बशीर युद्ध मंत्री
चंपकरमन पिल्लै विदेश मंत्री
मौलाना महमूद हसन रेशमी रुमाल आंदोलन के प्रमुख नेता।
ऑस्कर वॉन निडरमायर जर्मन सैन्य अधिकारी, काबुल मिशन के प्रमुख नेताओं में से एक।
वर्नर वॉन हेंटिग जर्मन राजनयिक, काबुल मिशन के प्रमुख प्रतिनिधियों में से एक।
हबीबुल्लाह खान अफगान अमीर, भारतीय क्रांतिकारियों के प्रयासों के बावजूद ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध में शामिल नहीं हुए।

अक्सर होने वाले सामान्य भ्रम

काबुल की अस्थायी सरकार की स्थापना 1 दिसंबर 1915 को हुई थी; इसे 1916 में स्थापित मानना गलत है।

राजा महेंद्र प्रताप काबुल की अस्थायी सरकार के अध्यक्ष थे, जबकि मौलाना बरकतुल्लाह इसके प्रधानमंत्री थे। दोनों के पदों को आपस में नहीं मिलाना चाहिए।

मौलाना ओबैदुल्लाह सिंधी काबुल की अस्थायी सरकार से जुड़े थे, लेकिन वे निडरमायर-हेंटिग जर्मन मिशन के सदस्य नहीं थे। वे अलग से काबुल पहुँचे और वहाँ महेंद्र प्रताप तथा बरकतुल्लाह के साथ जुड़े।

काबुल मिशन केवल भारतीय क्रांतिकारियों का मिशन नहीं था। इसमें जर्मन और तुर्की प्रतिनिधियों के साथ भारतीय राष्ट्रवादी भी शामिल थे। जर्मन पक्ष से ऑस्कर वॉन निडरमायर और वर्नर वॉन हेंटिग प्रमुख थे।

रेशमी रुमाल आंदोलन और काबुल की अस्थायी सरकार एक ही घटना या एक ही संगठन नहीं थे। रेशमी रुमाल आंदोलन पहले से चल रहा गुप्त क्रांतिकारी प्रयास था, जबकि काबुल की अस्थायी सरकार 1 दिसंबर 1915 को काबुल में स्थापित एक राजनीतिक संस्था थी।

मौलाना महमूद हसन काबुल की अस्थायी सरकार के सदस्य नहीं थे। वे रेशमी रुमाल आंदोलन के प्रमुख नेताओं में थे, जबकि काबुल में ओबैदुल्लाह सिंधी उनके संपर्क और योजना से जुड़े हुए थे।

अमीर हबीबुल्लाह खान ने काबुल की अस्थायी सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी थी। वे प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अफगानिस्तान की तटस्थता बनाए रखने के पक्ष में रहे।

काबुल की अस्थायी सरकार के पास भारत में कोई वास्तविक प्रशासनिक नियंत्रण नहीं था। यह विदेश में स्थापित भारतीय स्वतंत्रता का राजनीतिक एवं क्रांतिकारी प्रयास था।

जर्मनी और तुर्की से भारतीय क्रांतिकारियों को समर्थन प्राप्त करने के प्रयास हुए थे, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि इन देशों ने काबुल की अस्थायी सरकार को भारत में शासन करने के लिए वास्तविक सैन्य शक्ति उपलब्ध करा दी थी।

निडरमायर-हेंटिग मिशन और काबुल की अस्थायी सरकार एक ही चीज नहीं थे। मिशन का मुख्य उद्देश्य अफगान अमीर को ब्रिटिश-विरोधी पक्ष में लाने और केंद्रीय शक्तियों के लिए अफगानिस्तान का सहयोग प्राप्त करने का प्रयास करना था, जबकि अस्थायी सरकार भारतीय स्वतंत्रता के लिए एक राजनीतिक संस्था के रूप में स्थापित हुई।

रेशमी पत्रों का खुलासा 1916 में हुआ था। इसे 1915 में रेशमी रुमाल आंदोलन की शुरुआत के साथ नहीं मिलाना चाहिए। रेशमी पत्रों के पकड़े जाने से ब्रिटिश सरकार को ओबैदुल्लाह सिंधी और काबुल से जुड़े क्रांतिकारी नेटवर्क की महत्वपूर्ण जानकारी मिली।

काबुल मिशन का काबुल पहुँचना और काबुल की अस्थायी सरकार की स्थापना एक ही तारीख की घटनाएँ नहीं थीं। काबुल मिशन 2 अक्टूबर 1915 को काबुल पहुँचा, जबकि अस्थायी सरकार की स्थापना बाद में 1 दिसंबर 1915 को हुई।

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