गोलमेज सम्मेलन (1930–1932) : पृष्ठभूमि, तीनों सम्मेलन और प्रमुख निर्णय

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गोलमेज सम्मेलन (1930 – 32) : परिचय

➣ गोलमेज सम्मेलन 1930 से 1932 के बीच लंदन में आयोजित तीन महत्वपूर्ण संवैधानिक सम्मेलनों की श्रृंखला थी।

➣ इन सम्मेलनों का आयोजन ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत के भावी संविधान पर विचार करने तथा विभिन्न भारतीय राजनीतिक दलों, देशी रियासतों और अन्य प्रतिनिधियों के साथ संवैधानिक समझौता स्थापित करने के उद्देश्य से किया गया था।

➣ ये सम्मेलन वायसराय लॉर्ड इरविन की घोषणा (31 अक्टूबर 1929) का प्रत्यक्ष परिणाम थे, जिसमें भारत के लिए भविष्य में डोमिनियन स्टेटस तथा उसकी रूपरेखा तय करने हेतु एक गोलमेज सम्मेलन बुलाए जाने का वायदा किया गया था।

➣ इस अर्थ में गोलमेज सम्मेलन साइमन कमीशन की असफलता और बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन के दबाव से उपजी ब्रिटिश सरकार की एक राजनीतिक पहल थी, न कि विशुद्ध रूप से स्वैच्छिक सुधार।

➣ गोलमेज (Round Table) नाम इसलिए दिया गया क्योंकि बैठक में कोई निश्चित हेड सीट नहीं रखी गई थी – इसके माध्यम से यह दर्शाने का प्रयास किया गया कि ब्रिटिश सरकार और भारतीय प्रतिनिधि औपचारिक रूप से समान धरातल पर बैठकर विचार-विमर्श कर रहे हैं, यद्यपि व्यवहार में निर्णायक शक्ति अंततः ब्रिटिश सरकार के ही हाथ में रही।

➣ इन सम्मेलनों में ब्रिटिश सरकार, भारतीय राजनीतिक दलों, देशी रियासतों, मुस्लिम लीग, दलित वर्ग, सिख, ईसाई, एंग्लो-इंडियन, यूरोपीय समुदाय तथा अन्य हित-समूहों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

➣ इतिहासकारों के अनुसार गोलमेज सम्मेलन भारतीय संवैधानिक इतिहास के निर्णायक चरणों में से एक थे। इन सम्मेलनों में हुई चर्चाओं और सिफारिशों के आधार पर आगे चलकर श्वेत पत्र (1933), संयुक्त संसदीय समिति तथा अंततः भारत सरकार अधिनियम, 1935 का मार्ग प्रशस्त हुआ।

➣ UPSC की दृष्टि से गोलमेज सम्मेलन इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये पहला अवसर थे जब ब्रिटिश सरकार ने भारत के संवैधानिक भविष्य पर भारतीयों के साथ औपचारिक वार्ता की प्रक्रिया अपनाई, और इन्हीं चर्चाओं से निकले कई सिद्धांत (संघवाद, प्रांतीय स्वायत्तता, अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व) आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1935 और अंततः भारतीय संविधान में भी प्रतिबिंबित हुए।

गोलमेज सम्मेलन की पृष्ठभूमि

साइमन कमीशन, नेहरू रिपोर्ट एवं जिन्ना के चौदह सूत्र का प्रभाव

➣ 1920 के दशक के उत्तरार्ध में भारत की संवैधानिक स्थिति अत्यंत जटिल हो गई थी। साइमन कमीशन (1927) के बहिष्कार, नेहरू रिपोर्ट (1928) के प्रस्तुतीकरण तथा जिन्ना के चौदह सूत्र (1929) के सामने आने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि भारत के भावी संविधान के संबंध में विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच गंभीर मतभेद विद्यमान हैं।

➣ नेहरू रिपोर्ट ने भारत के लिए एक संयुक्त संवैधानिक प्रारूप प्रस्तुत किया, जबकि जिन्ना के चौदह सूत्रों ने मुस्लिम लीग की संवैधानिक माँगों को स्पष्ट रूप से सामने रखा।

➣ इन दोनों दस्तावेज़ों ने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय नेताओं के बीच संघीय व्यवस्था, प्रांतीय स्वायत्तता, अल्पसंख्यकों के अधिकार तथा निर्वाचन प्रणाली जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अभी व्यापक सहमति नहीं बन सकी थी।

➣ दूसरी ओर, साइमन कमीशन की रिपोर्ट भी भारतीय जनता और प्रमुख राजनीतिक दलों को संतुष्ट नहीं कर सकी। भारतीय नेताओं का मत था कि भारत के संवैधानिक भविष्य का निर्णय भारतीयों की भागीदारी के बिना नहीं किया जा सकता।

➣ परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार पर सभी पक्षों को साथ लेकर व्यापक संवैधानिक वार्ता आयोजित करने का दबाव बढ़ने लगा।

➣ इन परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार ने यह अनुभव किया कि भारत की संवैधानिक समस्याओं का समाधान केवल एकपक्षीय सुधारों से संभव नहीं है। इसलिए उसने ब्रिटिश सरकार, भारतीय राजनीतिक दलों, देशी रियासतों तथा विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक समुदायों के प्रतिनिधियों को एक मंच पर लाकर विचार-विमर्श करने का निर्णय लिया।

➣ इसी निर्णय के परिणामस्वरूप 1930 से 1932 के बीच लंदन में तीन गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन किया गया।

इरविन की घोषणा (31 अक्टूबर 1929) एवं लाहौर अधिवेशन

➣ इंग्लैंड में चार महीने की यात्रा से लौटने के बाद वायसराय लॉर्ड इरविन ने 31 अक्टूबर 1929 को एक महत्वपूर्ण घोषणा की, जिसे इरविन घोषणा के नाम से जाना जाता है। इसमें दो मुख्य बातें कही गईं – पहली, भारत के संवैधानिक विकास का स्वाभाविक लक्ष्य डोमिनियन स्टेटस (उपनिवेशीय स्वराज्य) की प्राप्ति है, और दूसरी, साइमन कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद भावी संविधान पर विचार करने हेतु लंदन में एक गोलमेज सम्मेलन बुलाया जाएगा।

➣ घोषणा में डोमिनियन स्टेटस प्राप्ति की कोई निश्चित समय-सीमा नहीं दी गई थी, जिससे अनेक भारतीय नेता असंतुष्ट रहे। 2 नवंबर 1929 को गांधीजी, मोतीलाल नेहरू सहित कुछ प्रमुख नेताओं ने दिल्ली घोषणापत्र जारी कर माँग की कि गोलमेज सम्मेलन डोमिनियन स्टेटस के क्रियान्वयन की योजना बनाने हेतु बुलाया जाए, उसमें कांग्रेस को बहुमत प्रतिनिधित्व मिले, तथा राजनीतिक बंदियों को सामान्य क्षमादान दिया जाए।

➣ 23 दिसंबर 1929 को दिल्ली में गांधीजी और अन्य नेताओं की वायसराय इरविन से भेंट हुई, जिसमें गांधीजी ने पूछा कि क्या प्रस्तावित सम्मेलन डोमिनियन स्टेटस के आधार पर ही आगे बढ़ेगा। इरविन इसका ठोस आश्वासन नहीं दे सके, जिससे यह वार्ता असफल रही।

➣ इसी असफलता के परिणामस्वरूप भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन (दिसंबर 1929) में, जिसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की, पूर्ण स्वराज्य को कांग्रेस का लक्ष्य घोषित किया गया तथा 26 जनवरी 1930 को प्रथम स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। इसी अधिवेशन में कांग्रेस ने प्रस्तावित प्रथम गोलमेज सम्मेलन के बहिष्कार तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ने का भी निर्णय लिया।

➣ इस प्रकार प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930) में कांग्रेस की अनुपस्थिति का कारण केवल नेताओं की गिरफ्तारी ही नहीं, बल्किलाहौर अधिवेशन में लिया गया एक सुविचारित राजनीतिक निर्णय भी था।

सविनय अवज्ञा आंदोलन और ब्रिटिश सरकार की पहल

➣ जहाँ एक ओर भारत में संवैधानिक सुधारों को लेकर मतभेद बढ़ रहे थे, वहीं दूसरी ओर महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन ने ब्रिटिश शासन पर व्यापक राजनीतिक दबाव उत्पन्न कर दिया।

➣ दांडी यात्रा (12 मार्च – 6 अप्रैल 1930) और नमक सत्याग्रह के बाद यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया तथा हजारों लोगों ने ब्रिटिश कानूनों का शांतिपूर्ण उल्लंघन किया।

➣ आंदोलन के तीव्र होते प्रभाव से ब्रिटिश सरकार को यह अनुभव हुआ कि केवल दमनात्मक उपायों से भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नियंत्रित करना संभव नहीं है। साथ ही, भारतीय जनता की बढ़ती राजनीतिक जागरूकता और स्वशासन की माँग को भी अब अनदेखा नहीं किया जा सकता था।

➣ इन परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार ने यह निर्णय लिया कि भारत के भावी संविधान से संबंधित प्रश्नों पर विभिन्न राजनीतिक दलों, देशी रियासतों तथा अन्य हित-समूहों के प्रतिनिधियों के साथ औपचारिक विचार-विमर्श किया जाए।

➣ इसी उद्देश्य से ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड की पहल पर लंदन में गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन किया गया।

➣ यद्यपि ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य संवैधानिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ना था, फिर भी प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भाग नहीं लिया, क्योंकि लाहौर अधिवेशन में लिए गए बहिष्कार के निर्णय के साथ-साथ उस समय उसके अधिकांश नेता सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण कारावास में भी थे। परिणामस्वरूप सम्मेलन में भारत के सबसे बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक संगठन का प्रतिनिधित्व नहीं हो सका।

गोलमेज सम्मेलनों के उद्देश्य

➣ गोलमेज सम्मेलनों (1930 – 32) का मुख्य उद्देश्य भारत के लिए एक ऐसी नई संवैधानिक व्यवस्था तैयार करना था, जिसे ब्रिटिश सरकार, भारतीय राजनीतिक दलों, देशी रियासतों तथा विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक समुदायों की सहमति प्राप्त हो सके।

➣ ब्रिटिश सरकार भारत में उत्तरदायी शासन की दिशा में आगे बढ़ने की संभावनाओं पर विचार करना चाहती थी। इसी उद्देश्य से केंद्र एवं प्रांतों के बीच शक्तियों का विभाजन, प्रांतीय स्वायत्तता तथा संघीय शासन व्यवस्था जैसे विषयों पर व्यापक चर्चा की गई।

➣ सम्मेलनों का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य अल्पसंख्यकों की समस्या का समाधान खोजना भी था। विशेष रूप से मुस्लिम लीग, सिख, दलित वर्ग, ईसाई, एंग्लो-इंडियन तथा अन्य समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों पर सहमति बनाने का प्रयास किया गया।

➣ ब्रिटिश सरकार का एक अन्य उद्देश्य देशी रियासतों को प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ में सम्मिलित करने की संभावनाओं पर विचार करना था। इसके माध्यम से ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों को एक संघीय ढाँचे में संगठित करने का प्रयास किया गया।

➣ इन सम्मेलनों का उद्देश्य भारत की भावी शासन-व्यवस्था के संबंध में विभिन्न पक्षों के विचारों को समझना तथा उनके आधार पर ऐसी संवैधानिक रूपरेखा तैयार करना था, जो आगे चलकर नए संवैधानिक सुधारों का आधार बन सके।

संक्षेप
भारत के लिए नई संवैधानिक व्यवस्था तैयार करना, संघीय शासन व्यवस्था पर विचार करना, अल्पसंख्यकों की समस्या का समाधान खोजने का प्रयास करना तथा देशी रियासतों को अखिल भारतीय संघ में सम्मिलित करने की संभावनाओं पर विचार करना।

प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930)

आयोजन एवं प्रमुख प्रतिनिधि

➣ प्रथम गोलमेज सम्मेलन का आयोजन 12 नवंबर 1930 से 19 जनवरी 1931 तक लंदन के सेंट जेम्स पैलेस में किया गया। सम्मेलन का उद्घाटन ब्रिटेन के सम्राट जॉर्ज पंचम ने किया, जबकि इसकी अध्यक्षता ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने की।

➣ इस सम्मेलन में ब्रिटिश सरकार ने भारत के विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का प्रयास किया। सम्मेलन में ब्रिटिश भारत, देशी रियासतों तथा ब्रिटिश राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों सहित कुल लगभग 89 प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिनमें लगभग 58 प्रतिनिधि ब्रिटिश भारत के विभिन्न समुदायों व हितों का तथा शेष देशी रियासतों एवं ब्रिटिश दलों का प्रतिनिधित्व करते थे।

➣ भारतीय प्रतिनिधियों में मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा, उदारवादी दल, सिख समुदाय, दलित वर्ग, ईसाई, एंग्लो-इंडियन, व्यापार एवं उद्योग जगत, जमींदार वर्ग तथा देशी रियासतों के प्रतिनिधि शामिल थे।

➣ डॉ. भीमराव आंबेडकर ने दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व किया, जबकि मोहम्मद अली जिन्ना और आगा खान तृतीय मुस्लिम लीग के प्रमुख प्रतिनिधियों में शामिल थे। तेज बहादुर सप्रू उदारवादी दल के प्रमुख नेता के रूप में सम्मिलित हुए, जबकि देशी रियासतों के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व मुख्यतः बीकानेर के महाराजा तथा भोपाल के नवाब ने किया।

➣ चर्चा को सुव्यवस्थित करने के लिए सम्मेलन में संघीय संरचना, प्रांतीय संविधान, मताधिकार (फ्रैंचाइज़), सिंध, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत (NWFP), रक्षा सेवाएँ, अल्पसंख्यक तथा देशी रियासतें जैसे विषयों पर लगभग नौ उपसमितियाँ गठित की गई थीं, जिन्होंने अपनी-अपनी रिपोर्टें पूर्ण सम्मेलन के समक्ष प्रस्तुत कीं।

➣ कांग्रेस की अनुपस्थिति के बावजूद ब्रिटिश सरकार ने सम्मेलन की कार्यवाही जारी रखी और विभिन्न प्रतिनिधियों के विचारों के आधार पर भारत के भावी संवैधानिक ढाँचे पर चर्चा प्रारंभ की।

मुख्य विषय एवं चर्चाएँ

➣ प्रथम गोलमेज सम्मेलन में मुख्य रूप से अखिल भारतीय संघ, प्रांतीय स्वायत्तता, उत्तरदायी शासन, अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व, देशी रियासतों की स्थिति तथा केंद्र-प्रांत संबंधों पर चर्चा की गई, किन्तु विशेषकर अल्पसंख्यकों के प्रश्न पर कोई सर्वसम्मति नहीं बन सकी।

➣ सम्मेलन में सबसे अधिक चर्चा संघीय शासन व्यवस्था पर हुई। अखिल भारतीय संघ का विचार सर्वप्रथम उदारवादी नेता तेज बहादुर सप्रू ने प्रस्तुत किया, जिसे मुस्लिम लीग सहित अधिकांश प्रतिनिधियों का समर्थन प्राप्त हुआ।

➣ उल्लेखनीय है कि देशी रियासतों के प्रतिनिधियों ने भी इस विचार का समर्थन किया, बशर्ते उनकी आंतरिक स्वायत्तता तथा विशेषाधिकार सुरक्षित रहें।

➣ रियासतों की यह सहमति सम्मेलन की सबसे अप्रत्याशित तथा महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जाती है, क्योंकि इससे पहले तक रियासतें ब्रिटिश भारत के साथ किसी संयुक्त संवैधानिक ढाँचे में सम्मिलित होने को लेकर हिचकिचाती रही थीं।

➣ यद्यपि इस सिद्धांत पर सामान्य सहमति बनी, लेकिन इसके स्वरूप और अधिकारों को लेकर विभिन्न मत सामने आए।

➣ सम्मेलन में प्रांतीय स्वायत्तता तथा उत्तरदायी शासन के प्रश्न पर भी विस्तृत चर्चा हुई। अनेक भारतीय प्रतिनिधियों ने प्रांतों में उत्तरदायी शासन लागू करने तथा भारतीयों की प्रशासनिक भागीदारी बढ़ाने की माँग की, जबकि ब्रिटिश सरकार रक्षा, विदेश नीति और वित्त जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहती थी।

➣ अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व का प्रश्न सम्मेलन का सबसे विवादास्पद विषय रहा। मुस्लिम लीग, सिख, दलित वर्ग, ईसाई तथा अन्य समुदायों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने राजनीतिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व की माँग रखी, किन्तु इन विषयों पर सर्वसम्मति नहीं बन सकी।

➣ इसी सम्मेलन में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय मंच पर दलित वर्ग (untouchables) के लिए पृथक निर्वाचन की औपचारिक माँग रखी, जो आगे द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में और अधिक विवाद का विषय बनी।

➣ सम्मेलन में देशी रियासतों की संवैधानिक स्थिति, केंद्र एवं प्रांतों के बीच शक्तियों का विभाजन, निर्वाचन प्रणाली तथा संघीय विधानमंडल की संरचना जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई। इन चर्चाओं ने आगे होने वाले संवैधानिक सुधारों की दिशा निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रमुख निर्णय

➣ प्रथम गोलमेज सम्मेलन में यद्यपि किसी अंतिम संवैधानिक समझौते पर सहमति नहीं बन सकी, फिर भी सम्मेलन में यह व्यापक रूप से स्वीकार किया गया कि भारत के लिए भविष्य में संघीय शासन व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।

➣ प्रस्तावित संघ में ब्रिटिश भारत तथा देशी रियासतों दोनों को सम्मिलित करने की परिकल्पना की गई।

➣ सम्मेलन में प्रांतीय स्वायत्तता के सिद्धांत का भी सामान्य समर्थन किया गया। अधिकांश प्रतिनिधियों का मत था कि प्रांतों को प्रशासनिक विषयों पर अधिक अधिकार और उत्तरदायित्व प्रदान किए जाने चाहिए, जबकि केंद्र की संरचना पर आगे विचार-विमर्श जारी रखा जाए।

➣ इस संदर्भ में यह सैद्धांतिक सहमति बनी कि प्रांतों में द्वैध शासन को समाप्त कर वहाँ भारतीय मंत्रियों के अधीन उत्तरदायी शासन स्थापित किया जाए। साथ ही सिद्धांततः यह भी स्वीकार किया गया कि सिंध को बंबई प्रेसीडेंसी से पृथक कर एक अलग प्रांत बनाया जाए तथा उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत (NWFP) में भी संवैधानिक सुधार लागू किए जाएँ, यद्यपि इन दोनों विषयों पर वित्तीय एवं प्रशासनिक व्यवस्था तय करने के लिए अलग से समितियाँ गठित करने की आवश्यकता महसूस की गई।

➣ सम्मेलन में यह भी निर्णय लिया गया कि भारत के संवैधानिक प्रश्नों पर आगे भी विचार-विमर्श जारी रखा जाएगा तथा विभिन्न समुदायों, देशी रियासतों और राजनीतिक दलों के साथ व्यापक सहमति बनाने का प्रयास किया जाएगा।

➣ विशेष रूप से अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व तथा केंद्र-प्रांत संबंधों जैसे प्रश्नों को भविष्य की चर्चाओं के लिए खुला रखा गया।

➣ चूँकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इस सम्मेलन में शामिल नहीं हुई थी, इसलिए ब्रिटिश सरकार ने यह अनुभव किया कि उसके बिना किसी भी संवैधानिक योजना को व्यापक राष्ट्रीय स्वीकृति प्राप्त नहीं हो सकती।

➣ परिणामस्वरूप कांग्रेस को वार्ता में सम्मिलित करने के प्रयास प्रारम्भ हुए, जिनका परिणाम आगे चलकर गांधी-इरविन समझौते (1931) तथा द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के रूप में सामने आया।

➣ इस प्रकार प्रथम गोलमेज सम्मेलन किसी अंतिम संवैधानिक समाधान तक नहीं पहुँच सका, लेकिन इसने आगे होने वाली संवैधानिक वार्ताओं की दिशा निर्धारित की और भारत के भावी संविधान से संबंधित चर्चाओं का आधार तैयार किया।

प्रथम गोलमेज सम्मेलन में अखिल भारतीय संघ एवं प्रांतीय स्वायत्तता के सिद्धांतों को सामान्य स्वीकृति मिली, किन्तु अल्पसंख्यकों के प्रश्न तथा अन्य संवैधानिक मुद्दों पर अंतिम निर्णय नहीं हो सका। जबकि कांग्रेस की अनुपस्थिति के कारण आगे गांधी-इरविन समझौता (1931) और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

कांग्रेस की अनुपस्थिति

➣ प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930) की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भाग नहीं लिया।

➣ इसका एक कारण यह था कि लाहौर अधिवेशन (दिसंबर 1929) में कांग्रेस पहले ही प्रस्तावित गोलमेज सम्मेलन के बहिष्कार का औपचारिक निर्णय ले चुकी थी, क्योंकि वायसराय इरविन डोमिनियन स्टेटस का ठोस आश्वासन नहीं दे सके थे। दूसरा कारण यह था कि उस समय महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन पूरे देश में चल रहा था और कांग्रेस ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध व्यापक जनआंदोलन का नेतृत्व कर रही थी।

➣ आंदोलन को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने महात्मा गांधी सहित कांग्रेस के अनेक प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था। परिणामस्वरूप कांग्रेस ने इस सम्मेलन का बहिष्कार जारी रखा और स्पष्ट किया कि जब तक भारत को वास्तविक उत्तरदायी शासन की दिशा में ठोस आश्वासन नहीं दिया जाएगा, तब तक केवल संवैधानिक चर्चाओं में भाग लेना उचित नहीं होगा।

➣ कांग्रेस की अनुपस्थिति के कारण सम्मेलन में भारत के सबसे बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व नहीं हो सका। यद्यपि विभिन्न राजनीतिक दलों, देशी रियासतों तथा अन्य समुदायों के प्रतिनिधियों ने सम्मेलन में भाग लिया, फिर भी कांग्रेस के बिना लिए गए किसी भी निर्णय को व्यापक राष्ट्रीय समर्थन प्राप्त होने की संभावना अत्यंत कम थी।

➣ ब्रिटिश सरकार ने भी यह अनुभव किया कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की भागीदारी के बिना संवैधानिक प्रश्नों का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

➣ इसी कारण उसने कांग्रेस से वार्ता का मार्ग अपनाया, जिसके परिणामस्वरूप 5 मार्च 1931 को गांधी-इरविन समझौता हुआ। इस समझौते के बाद महात्मा गांधी ने कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हुए द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में भाग लिया।

➣ इस प्रकार प्रथम गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस की अनुपस्थिति उसकी सबसे बड़ी सीमा सिद्ध हुई। यही कारण था कि सम्मेलन किसी व्यापक संवैधानिक सहमति तक नहीं पहुँच सका और आगे की वार्ताओं के लिए कांग्रेस की भागीदारी अनिवार्य मानी गई।

प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भाग नहीं लिया। इसका मुख्य कारण लाहौर अधिवेशन का बहिष्कार-प्रस्ताव, सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारी था।

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931)

गांधी-इरविन समझौते की पृष्ठभूमि

➣ प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930) के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने उसमें भाग नहीं लिया था। सम्मेलन के बाद ब्रिटिश सरकार को यह स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस की भागीदारी के बिना भारत की संवैधानिक समस्याओं का कोई स्थायी समाधान संभव नहीं है। इसलिए उसने कांग्रेस के साथ समझौते का मार्ग अपनाने का निर्णय लिया।

➣ दूसरी ओर, सविनय अवज्ञा आंदोलन पूरे देश में व्यापक रूप से फैल चुका था। हजारों सत्याग्रही गिरफ्तार किए जा चुके थे और ब्रिटिश सरकार पर राजनीतिक दबाव निरंतर बढ़ रहा था। ऐसी परिस्थितियों में दोनों पक्ष वार्ता के लिए तैयार हुए।

➣ महात्मा गांधी और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच कई चरणों में वार्ता हुई। इन वार्ताओं के परिणामस्वरूप 5 मार्च 1931 को गांधी-इरविन समझौता संपन्न हुआ।

➣ इस समझौते के अंतर्गत कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित करने तथा द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर सहमति व्यक्त की।

➣ इसके बदले ब्रिटिश सरकार ने अहिंसक राजनीतिक बंदियों को रिहा करने, जब्त की गई संपत्ति लौटाने, शांतिपूर्ण ढंग से नमक बनाने की सीमित अनुमति देने तथा कांग्रेस के प्रति अपेक्षाकृत उदार नीति अपनाने का आश्वासन दिया। हालांकि क्रांतिकारी गतिविधियों से संबंधित बंदियों को इस समझौते का लाभ नहीं मिला।

इसी कारण भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव की फाँसी की सजा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ और उन्हें कुछ दिनों बाद 23 मार्च को लाहौर जेल में फाँसी दे दी गई। इसके विरोध में महात्मा गांधी को कराची कांग्रेस अधिवेशन (1931) के दौरान कई स्थानों, विशेषकर लाहौर में, काले झंडे भी दिखाए गए।

➣ गांधी-इरविन समझौते के परिणामस्वरूप महात्मा गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एकमात्र आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (सितंबर – दिसंबर 1931) में भाग लिया। पहली बार कांग्रेस प्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिश सरकार के साथ भारत के भावी संविधान पर चर्चा में सम्मिलित हुई।

आयोजन एवं प्रमुख प्रतिनिधि

➣ द्वितीय गोलमेज सम्मेलन का आयोजन 7 सितंबर 1931 से 1 दिसंबर 1931 तक लंदन के सेंट जेम्स पैलेस में किया गया। सम्मेलन की अध्यक्षता ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने की।

➣ ध्यान रहे कि सम्मेलन प्रारम्भ होने के लगभग दो सप्ताह पहले ही ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार की जगह कंज़रवेटिव-बहुल राष्ट्रीय सरकार सत्तारूढ़ हो चुकी थी, जिसका असर सम्मेलन के रुख पर भी पड़ा।

➣ इस सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पहली बार इसमें भाग लिया। गांधी-इरविन समझौते (5 मार्च 1931) के बाद महात्मा गांधी कांग्रेस के एकमात्र आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में सम्मेलन में सम्मिलित हुए।

➣ सम्मेलन में मुस्लिम लीग, देशी रियासतों, सिख समुदाय, दलित वर्ग, भारतीय ईसाई, एंग्लो-इंडियन, यूरोपीय समुदाय, उदारवादी दल, व्यापार एवं उद्योग जगत तथा अन्य हित-समूहों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। चर्चा को सुव्यवस्थित करने के लिए मुख्यतः संघीय संरचना समिति तथा अल्पसंख्यक समिति नामक दो प्रमुख उपसमितियाँ कार्यरत रहीं।

➣ महात्मा गांधी के साथ कांग्रेस की ओर से सलाहकार के रूप में सरोजिनी नायडू तथा मदन मोहन मालवीय भी सम्मेलन में सम्मिलित हुए।

➣ मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल में मोहम्मद अली जिन्ना, आगा खान तृतीय तथा कवि-दार्शनिक मोहम्मद इक़बाल प्रमुख थे, जबकि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने पुनः दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व किया।

➣ प्रथम गोलमेज सम्मेलन की तुलना में इस सम्मेलन का महत्व अधिक था, क्योंकि पहली बार ब्रिटिश सरकार और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आमने-सामने बैठकर भारत के भावी संविधान पर चर्चा करने वाले थे। इसलिए देश-विदेश की निगाहें इस सम्मेलन पर केंद्रित थीं।

➣ यद्यपि सम्मेलन में लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक वर्गों का प्रतिनिधित्व था, फिर भी विभिन्न समुदायों की संवैधानिक माँगों तथा राजनीतिक दृष्टिकोणों में पर्याप्त मतभेद बने रहे। यही मतभेद आगे चलकर सम्मेलन की कार्यवाही को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारणों में से एक बने।

मुख्य चर्चाएँ एवं मतभेद

➣ द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भारत के भावी संविधान से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई। इनमें संघीय शासन व्यवस्था, प्रांतीय स्वायत्तता, उत्तरदायी शासन, देशी रियासतों की स्थिति तथा अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व जैसे प्रश्न प्रमुख थे।

➣ महात्मा गांधी ने कांग्रेस की ओर से यह स्पष्ट किया कि कांग्रेस पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करती है और भारत में शीघ्र पूर्ण उत्तरदायी शासन स्थापित किया जाना चाहिए। उन्होंने एक सशक्त केंद्र, राष्ट्रीय एकता तथा संयुक्त राजनीतिक व्यवस्था पर बल दिया तथा पृथक निर्वाचन प्रणाली का विरोध किया।

➣ दूसरी ओर, मुस्लिम लीग, सिख समुदाय, दलित वर्ग, एंग्लो-इंडियन तथा अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने राजनीतिक अधिकारों एवं पृथक प्रतिनिधित्व की माँग दोहराई। इन समुदायों का मत था कि भविष्य के संविधान में उनके अधिकारों की स्पष्ट संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

➣ सम्मेलन के दौरान महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर के बीच दलित वर्ग के पृथक निर्वाचन के प्रश्न पर भी गंभीर मतभेद सामने आए।

➣ डॉ. आंबेडकर दलितों के लिए पृथक राजनीतिक प्रतिनिधित्व के पक्षधर थे, जबकि गांधीजी उन्हें हिंदू समाज का अभिन्न अंग मानते हुए पृथक निर्वाचन के विरोधी थे। यह विवाद आगे चलकर सांप्रदायिक निर्णय (1932) तथा पूना पैक्ट (1932) की पृष्ठभूमि बना।

➣ इसके अलावा देशी रियासतों ने प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ में सम्मिलित होने की इच्छा तो व्यक्त की, किन्तु वे अपनी आंतरिक स्वायत्तता और विशेषाधिकारों को बनाए रखना चाहती थीं। इससे संघीय व्यवस्था के स्वरूप पर भी पूर्ण सहमति नहीं बन सकी।

➣ फिर भी संघीय संरचना समिति ने संघीय वित्त-व्यवस्था सहित कुछ विषयों पर प्रगति दर्ज की, और सम्मेलन के समापन (1 दिसंबर 1931) पर रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने संघ-निर्माण की दिशा में हुई प्रगति के साथ-साथ सिंध तथा उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत (NWFP) को पूर्ण प्रांत का दर्जा दिए जाने संबंधी निर्णयों की घोषणा भी की।

➣ इस प्रकार सम्मेलन में अधिकांश समय विभिन्न समुदायों के राजनीतिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर मतभेद बने रहे। परिणामस्वरूप भारत की भावी संवैधानिक व्यवस्था के संबंध में किसी व्यापक समझौते तक पहुँचना संभव नहीं हो सका।

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन का सबसे विवादास्पद विषय अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व था। विशेष रूप से महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर के बीच दलित वर्ग के पृथक निर्वाचन को लेकर।

सम्मेलन की असफलता

➣ द्वितीय गोलमेज सम्मेलन भारत की संवैधानिक समस्याओं का अंतिम समाधान खोजने में सफल नहीं हो सका। यद्यपि विभिन्न राजनीतिक दलों, समुदायों और देशी रियासतों के प्रतिनिधियों ने व्यापक चर्चा की, फिर भी अनेक महत्वपूर्ण प्रश्नों पर सर्वसम्मति नहीं बन सकी।

➣ सम्मेलन की असफलता का सबसे प्रमुख कारण अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व का प्रश्न था। मुस्लिम लीग, सिख, दलित वर्ग तथा अन्य समुदाय अपनी-अपनी राजनीतिक माँगों पर दृढ़ रहे, जबकि महात्मा गांधी संयुक्त राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व और पृथक निर्वाचन प्रणाली के विरोध के पक्षधर थे। परिणामस्वरूप कोई सर्वमान्य समाधान नहीं निकल सका।

➣ संघीय शासन व्यवस्था, देशी रियासतों की भूमिका, केंद्र एवं प्रांतों के बीच शक्तियों के विभाजन तथा उत्तरदायी शासन जैसे विषयों पर भी विभिन्न पक्षों के विचारों में पर्याप्त मतभेद बने रहे। इससे सम्मेलन किसी अंतिम संवैधानिक समझौते तक नहीं पहुँच सका।

➣ सम्मेलन की समाप्ति के बाद महात्मा गांधी निराश होकर भारत लौटे। इसके कुछ ही समय बाद ब्रिटिश सरकार ने पुनः दमनात्मक नीति अपनाई, सविनय अवज्ञा आंदोलन फिर से प्रारम्भ हुआ और गांधीजी सहित अनेक कांग्रेस नेताओं को दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया।

➣ सम्मेलन के समापन पर ही रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने स्पष्ट कर दिया था कि यदि भारतीय समुदाय स्वयं अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर सहमति नहीं बना पाते, तो ब्रिटिश सरकार को स्वयं ही इस विषय पर अंतिम निर्णय लेना होगा। सम्मेलन में अल्पसंख्यकों के प्रश्न का समाधान न होने पर अंततः मैकडोनाल्ड ने अपनी इसी चेतावनी के अनुरूप 16 अगस्त 1932 को सांप्रदायिक निर्णय की घोषणा की।

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन मुख्यतः अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व तथा संवैधानिक व्यवस्था पर सहमति न बनने के कारण असफल रहा।

सांप्रदायिक निर्णय एवं पूना पैक्ट (1932)

➣ द्वितीय गोलमेज सम्मेलन की असफलता के बाद 16 अगस्त 1932 को सांप्रदायिक निर्णय तथा उसके विरोध में गांधीजी के अनशन के परिणामस्वरूप 24 सितंबर 1932 को पूना पैक्ट संपन्न हुआ, जिसमें दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र में आरक्षित स्थान की व्यवस्था की गई। (विस्तृत विवरण अलग पृष्ठ पर उपलब्ध है।)

➣ द्वितीय गोलमेज सम्मेलन की असफलता → सांप्रदायिक निर्णय (16 अगस्त 1932) → गांधीजी का अनशन → पूना पैक्ट (24 सितंबर 1932) – यही घटनाक्रम आगे तृतीय गोलमेज सम्मेलन की पृष्ठभूमि बना।

तृतीय गोलमेज सम्मेलन (1932)

आयोजन एवं प्रतिनिधित्व

➣ तृतीय गोलमेज सम्मेलन का आयोजन 17 नवंबर 1932 से 24 दिसंबर 1932 तक लंदन के सेंट जेम्स पैलेस में किया गया। इसकी अध्यक्षता भी ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने की।

➣ यह सम्मेलन ऐसे समय आयोजित हुआ, जब द्वितीय गोलमेज सम्मेलन असफल हो चुका था, सांप्रदायिक निर्णय (16 अगस्त 1932) की घोषणा की जा चुकी थी तथा पूना पैक्ट (24 सितंबर 1932) भी संपन्न हो चुका था। इन घटनाओं ने भारत की राजनीतिक परिस्थितियों को पहले की अपेक्षा और अधिक जटिल बना दिया था।

➣ वस्तुतः द्वितीय सम्मेलन की असफलता के बाद ब्रिटिश सरकार ने जून 1932 में यह संकेत दिया था कि अब कोई तृतीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित नहीं किया जाएगा और भविष्य में संवैधानिक प्रगति समितियों के माध्यम से ही की जाएगी।

➣ इसके विरोध में उदारवादी नेता तेज बहादुर सप्रू तथा एम.आर. जयकर ने गोलमेज परामर्श समिति से त्यागपत्र भी दे दिया था। बाद में सीमित स्वरूप में ही तृतीय सम्मेलन बुलाया गया।

➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस सम्मेलन में भाग नहीं लिया। उस समय सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः प्रारम्भ हो चुका था और कांग्रेस के अनेक प्रमुख नेता, जिनमें महात्मा गांधी भी शामिल थे, ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार किए जा चुके थे।

➣ कांग्रेस के साथ-साथ ब्रिटिश लेबर पार्टी, मोहम्मद अली जिन्ना तथा प्रथम एवं द्वितीय सम्मेलन में सक्रिय रहे उदारवादी नेता सप्रू एवं जयकर भी इस सम्मेलन से अनुपस्थित रहे। इस प्रकार यह सम्मेलन पूर्ववर्ती दोनों सम्मेलनों की तुलना में कहीं अधिक सीमित प्रतिनिधित्व वाला रहा।

➣ सम्मेलन में मात्र लगभग 46 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। ब्रिटिश भारत (गैर-रियासती) प्रतिनिधिमंडल की अध्यक्षता आगा खान तृतीय ने की, डॉ. भीमराव आंबेडकर ने पुनः दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व किया, जबकि बेगम जहाँआरा शाहनवाज़ ने महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया। हैदराबाद, भोपाल, मैसूर, जम्मू-कश्मीर तथा पटियाला सहित कुछ प्रमुख देशी रियासतों के शासकों व दीवानों ने भी सम्मेलन में भाग लिया।

➣ किन्तु प्रमुख राष्ट्रीय नेतृत्व की अनुपस्थिति के कारण सम्मेलन का राजनीतिक महत्व पहले दो गोलमेज सम्मेलनों की तुलना में काफी कम रहा।

➣ इतिहासकारों के अनुसार तृतीय गोलमेज सम्मेलन मुख्यतः पूर्ववर्ती सम्मेलनों में हुई चर्चाओं को अंतिम रूप देने तथा भविष्य के संवैधानिक सुधारों की दिशा निर्धारित करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था।

मुख्य निर्णय

➣ द्वितीय गोलमेज सम्मेलन की समाप्ति के बाद ब्रिटिश सरकार ने संवैधानिक विषयों पर आगे काम जारी रखने के लिए तीन विशेषज्ञ समितियाँ गठित की थीं – मताधिकार समिति, संघीय वित्त समिति तथा देशी रियासत समिति – जिन्होंने 1932 के मध्य तक अपनी-अपनी रिपोर्टें प्रस्तुत कर दी थीं। तृतीय गोलमेज सम्मेलन में मुख्यतः इन्हीं रिपोर्टों की समीक्षा की गई।

➣ तृतीय गोलमेज सम्मेलन में भारत के भावी संविधान से संबंधित उन विषयों पर पुनः विचार किया गया, जिन पर पहले दो गोलमेज सम्मेलनों में व्यापक चर्चा हो चुकी थी।

➣ विशेष रूप से संघीय शासन व्यवस्था, प्रांतीय स्वायत्तता, केंद्र-प्रांत संबंध तथा देशी रियासतों की भागीदारी जैसे विषयों पर विचार-विमर्श जारी रखा गया।

➣ सम्मेलन में यह स्पष्ट हुआ कि भारत के लिए प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ की स्थापना तभी संभव होगी, जब पर्याप्त संख्या में देशी रियासतें उसमें सम्मिलित होने के लिए सहमत हों।

➣ साथ ही संघीय शासन की संरचना और केंद्र की शक्तियों से संबंधित विषयों पर भी आगे कार्य करने की आवश्यकता स्वीकार की गई।

➣ प्रमुख राष्ट्रीय नेतृत्व एवं व्यापक जनप्रतिनिधित्व के अभाव में सम्मेलन औपचारिक बैठकों की अपेक्षा समितियों के स्तर पर ही अधिक सक्रिय रहा, तथा इसमें कोई नई प्लेनरी (पूर्ण सत्र) सहमति दर्ज करने की बजाय पूर्व की चर्चाओं को समेटने पर अधिक बल दिया गया।

➣ यद्यपि सम्मेलन में कोई व्यापक राजनीतिक समझौता नहीं हो सका, फिर भी पूर्ववर्ती गोलमेज सम्मेलनों में प्राप्त सुझावों और विचारों के आधार पर भविष्य की संवैधानिक योजना तैयार करने की दिशा में कार्य आगे बढ़ाया गया।

➣ इन चर्चाओं के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1933 में श्वेत पत्र प्रकाशित किया, जिसमें भारत के लिए प्रस्तावित संवैधानिक सुधारों की रूपरेखा प्रस्तुत की गई। इसके बाद इस योजना पर विचार करने के लिए ब्रिटिश संसद की एक संयुक्त प्रवर समिति का गठन किया गया, जिसकी अध्यक्षता लॉर्ड लिनलिथगो ने की।

➣ संयुक्त प्रवर समिति की सिफारिशों और गोलमेज सम्मेलनों में हुई चर्चाओं के आधार पर अंततः 2 अगस्त 1935 को भारत सरकार अधिनियम, 1935 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया, जिसने ब्रिटिश भारत की संवैधानिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन किए। उस समय तक यह ब्रिटिश संसद द्वारा पारित सबसे लंबा अधिनियम था।

तृतीय गोलमेज सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह था कि मताधिकार, संघीय वित्त एवं देशी रियासत समितियों की रिपोर्टों तथा सम्मेलन की चर्चाओं के आधार पर श्वेत पत्र (1933) प्रकाशित हुआ। आगे संयुक्त प्रवर समिति ने इसकी समीक्षा की और अंततः भारत सरकार अधिनियम, 1935 का मार्ग प्रशस्त हुआ।

तीनों गोलमेज सम्मेलनों की तुलना

आधार प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930) द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) तृतीय गोलमेज सम्मेलन (1932)
अवधि 12 नवंबर 1930 – 19 जनवरी 1931 7 सितंबर – 1 दिसंबर 1931 17 नवंबर – 24 दिसंबर 1932
कुल प्रतिनिधि (लगभग) 89 100 से अधिक 46
कांग्रेस की भागीदारी भाग नहीं लिया महात्मा गांधी कांग्रेस के एकमात्र आधिकारिक प्रतिनिधि थे। भाग नहीं लिया
मुख्य विषय संघीय व्यवस्था, प्रांतीय स्वायत्तता एवं संवैधानिक सुधार अल्पसंख्यकों का प्रश्न, संघीय व्यवस्था एवं उत्तरदायी शासन पूर्व चर्चाओं को अंतिम रूप देना एवं संवैधानिक योजना तैयार करना
प्रमुख विशेषता कांग्रेस की अनुपस्थिति के बावजूद सम्मेलन आयोजित हुआ। पहली और एकमात्र बार महात्मा गांधी ने सम्मेलन में भाग लिया। राजनीतिक महत्व अपेक्षाकृत कम रहा।
मुख्य समस्या कांग्रेस की अनुपस्थिति अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व पर मतभेद प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं की अनुपस्थिति एवं सीमित सहमति
प्रमुख परिणाम गांधी-इरविन समझौते एवं द्वितीय सम्मेलन का मार्ग प्रशस्त हुआ। सांप्रदायिक निर्णय (1932) एवं पूना पैक्ट की पृष्ठभूमि बनी। श्वेत पत्र (1933) एवं भारत सरकार अधिनियम, 1935 का मार्ग प्रशस्त हुआ।

➣ प्रथम गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस अनुपस्थित रही, द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में केवल महात्मा गांधी ने कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया, जबकि तृतीय गोलमेज सम्मेलन में पुनः कांग्रेस ने भाग नहीं लिया।

गोलमेज सम्मेलनों का महत्व एवं सीमाएँ (मूल्यांकन)

महत्व / उपलब्धियाँ

➣ गोलमेज सम्मेलन पहला अवसर थे जब ब्रिटिश सरकार ने भारत के संवैधानिक भविष्य पर भारतीय राजनीतिक दलों, देशी रियासतों तथा विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों के साथ प्रत्यक्ष एवं औपचारिक वार्ता की, न कि केवल एकपक्षीय आयोग (जैसे साइमन कमीशन) के माध्यम से निर्णय थोपा।

➣ इन सम्मेलनों में पहली बार अखिल भारतीय संघ के सिद्धांत को – जिसमें ब्रिटिश भारत तथा देशी रियासतें दोनों सम्मिलित हों – लगभग सर्वसम्मति से स्वीकृति मिली। यह सिद्धांत आगे भारत सरकार अधिनियम, 1935 का आधार बना।

➣ सम्मेलनों ने प्रांतीय स्वायत्तता के विचार को स्थापित किया, जिसे बाद में 1935 के अधिनियम में लागू किया गया।

➣ इन सम्मेलनों के माध्यम से दलित वर्ग, महिलाओं, देशी रियासतों तथा विभिन्न धार्मिक-सामाजिक समूहों को संवैधानिक वार्ता में सीधी भागीदारी का अवसर मिला, जो इससे पूर्व लगभग अनुपस्थित थी।

➣ गोलमेज सम्मेलनों की चर्चाओं ने अंततः श्वेत पत्र (1933), संयुक्त संसदीय समिति की सिफारिशों तथा भारत सरकार अधिनियम, 1935 का आधार तैयार किया, जो स्वतंत्र भारत के संविधान-निर्माण की प्रक्रिया में भी एक महत्वपूर्ण कड़ी सिद्ध हुआ।

सीमाएँ / कमियाँ

➣ सम्मेलनों की सबसे बड़ी सीमा यह रही कि तीनों में से किसी में भी भारत के भावी संविधान पर कोई अंतिम एवं सर्वसम्मत समझौता नहीं हो सका।

➣ अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व का प्रश्न पूरी प्रक्रिया के दौरान अनसुलझा रहा और अंततः इसे सम्मेलन के बाहर, ब्रिटिश प्रधानमंत्री के एकपक्षीय सांप्रदायिक निर्णय (1932) के माध्यम से सुलझाया गया – जिससे यह स्पष्ट हुआ कि सम्मेलन स्वयं समाधान तक पहुँचने में असफल रहे।

➣ पृथक निर्वाचन की माँगों ने सांप्रदायिक विभाजन को और गहरा किया, यद्यपि पूना पैक्ट ने दलितों के मामले में इसे कुछ हद तक संतुलित किया।

➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, जो भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रीय राजनीतिक संगठन था, प्रथम एवं तृतीय गोलमेज सम्मेलन में अनुपस्थित रही, जिससे इन दोनों सम्मेलनों की प्रतिनिधित्वात्मक वैधता सीमित रह गई।

➣ ब्रिटिश सरकार ने रक्षा, विदेश नीति तथा वित्त जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर नियंत्रण अपने ही हाथ में रखने पर बल दिया, जिससे उत्तरदायी शासन की माँग केवल आंशिक रूप से ही स्वीकार हो सकी।

➣ देशी रियासतें अखिल भारतीय संघ में सम्मिलित होने की इच्छा तो व्यक्त करती रहीं, किन्तु अपनी आंतरिक स्वायत्तता छोड़ने को तैयार नहीं थीं, जिससे प्रस्तावित संघीय ढाँचा व्यवहार में कभी पूर्ण रूप से क्रियान्वित नहीं हो सका।

➣ आलोचकों के अनुसार गोलमेज सम्मेलन बड़ी सीमा तक ब्रिटिश सरकार की एक ऐसी रणनीति भी थे, जिसके माध्यम से बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन को संवैधानिक वार्ता में उलझाकर उसकी गति को धीमा किया जा सके, बिना सत्ता के वास्तविक हस्तांतरण की कोई ठोस प्रतिबद्धता किए।

महत्वपूर्ण तथ्य

➣ वायसराय लॉर्ड इरविन ने 31 अक्टूबर 1929 को अपनी घोषणा में डोमिनियन स्टेटस तथा गोलमेज सम्मेलन बुलाए जाने का वायदा किया था, जिसके बाद लाहौर अधिवेशन (दिसंबर 1929) में कांग्रेस ने 26 जनवरी 1930 को ‘पूर्ण स्वराज्य दिवस’ मनाने का निर्णय लिया।

➣ गोलमेज सम्मेलन की श्रृंखला 1930 से 1932 के बीच लंदन के सेंट जेम्स पैलेस में आयोजित की गई थी।

➣ तीनों गोलमेज सम्मेलनों की अध्यक्षता ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने की, जबकि प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930) का उद्घाटन ब्रिटेन के सम्राट जॉर्ज पंचम ने किया था।

➣ तीनों गोलमेज सम्मेलनों में क्रमशः लगभग 89, 100 से अधिक तथा 46 प्रतिनिधियों ने भाग लिया – अर्थात् प्रतिनिधियों की संख्या क्रमिक रूप से घटती गई।

➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रथम (1930) एवं तृतीय (1932) गोलमेज सम्मेलनों का बहिष्कार किया, जबकि द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में केवल महात्मा गांधी ने कांग्रेस के एकमात्र आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया।

➣ महात्मा गांधी 29 अगस्त 1931 को एस.एस. राजपूताना नामक समुद्री जहाज से बंबई (मुंबई) से लंदन के लिए रवाना हुए थे।

➣ डॉ. भीमराव आंबेडकर ने गोलमेज सम्मेलनों में दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व किया। वे उन गिने-चुने भारतीय नेताओं में से थे जो तीनों गोलमेज सम्मेलनों में लगातार उपस्थित रहे – आगा खान तृतीय भी इसी श्रेणी में आते हैं, जिन्होंने तीनों सम्मेलनों में भाग लिया तथा तृतीय गोलमेज सम्मेलन में ब्रिटिश-भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व भी किया। इसके विपरीत मोहम्मद अली जिन्ना मुस्लिम लीग के प्रमुख प्रतिनिधि होते हुए भी केवल प्रथम एवं द्वितीय सम्मेलन में ही उपस्थित रहे, तृतीय सम्मेलन में अनुपस्थित रहे।

➣ गोलमेज सम्मेलनों में संघीय शासन व्यवस्था, प्रांतीय स्वायत्तता, उत्तरदायी शासन, अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व तथा देशी रियासतों की स्थिति प्रमुख चर्चा के विषय थे।

➣ द्वितीय गोलमेज सम्मेलन का सबसे विवादास्पद विषय अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व था। इसी सम्मेलन के दौरान महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर के बीच दलितों के पृथक निर्वाचन के प्रश्न पर गंभीर मतभेद उभरकर सामने आए।

➣ प्रथम गोलमेज सम्मेलन के बाद 5 मार्च 1931 को गांधी-इरविन समझौता हुआ, जबकि द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के बाद 16 अगस्त 1932 को सांप्रदायिक निर्णय घोषित किया गया, जिसे ‘मैकडोनाल्ड अवार्ड’ के नाम से भी जाना जाता है।

➣ गांधीजी के यरवदा जेल आमरण अनशन (20 सितंबर 1932) के परिणामस्वरूप 24 सितंबर 1932 को पूना पैक्ट हुआ, जिसमें दलित वर्ग के लिए संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र में 148 आरक्षित स्थान तय किए गए।

➣ तृतीय गोलमेज सम्मेलन के बाद मार्च 1933 में श्वेत पत्र प्रकाशित किया गया। इसके आधार पर लॉर्ड लिनलिथगो की अध्यक्षता वाली ब्रिटिश संसद की संयुक्त प्रवर समिति ने विचार किया और अंततः 2 अगस्त 1935 को भारत सरकार अधिनियम, 1935 पारित किया गया।

➣ इसी अधिनियम के अंतर्गत 1 अक्टूबर 1937 को संघीय न्यायालय (Federal Court of India) तथा भारतीय रिज़र्व बैंक (1935) की स्थापना हुई। संघीय न्यायालय ही आगे चलकर 26 जनवरी 1950 को स्थापित भारत के सर्वोच्च न्यायालय का पूर्ववर्ती संस्थान बना।

समकालीन प्रासंगिकता

➣ गोलमेज सम्मेलनों की चर्चाएँ आज भी भारतीय राजव्यवस्था के अध्ययन हेतु प्रासंगिक हैं। पूना पैक्ट (1932) में अपनाया गया संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र में आरक्षित स्थान का सिद्धांत आज भी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330 एवं 332 के अंतर्गत लोकसभा एवं विधानसभाओं में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए सीट-आरक्षण का आधार बना हुआ है।

➣ इसी प्रकार, गोलमेज सम्मेलनों में उठे केंद्र-राज्य संबंध, संघवाद के स्वरूप तथा प्रांतीय (राज्य) स्वायत्तता जैसे प्रश्न आज भी भारत के सहकारी संघवाद, राज्यों की स्वायत्तता एवं केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों (जैसे वित्त आयोग की सिफारिशों) से जुड़ी समकालीन बहसों में किसी न किसी रूप में गूँजते हैं, जो दर्शाता है कि इन सम्मेलनों में उठाए गए मूल संवैधानिक प्रश्न भारत की राजनीतिक व्यवस्था के लिए दीर्घकालिक महत्व रखते हैं।

➣ गोलमेज सम्मेलनों में हुई संघीय संरचना संबंधी चर्चाओं का ठोस संस्थागत परिणाम भी सामने आया। इन्हीं चर्चाओं के आधार पर बने भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत 1 अक्टूबर 1937 को संघीय न्यायालय की स्थापना हुई, जो आगे चलकर 26 जनवरी 1950 को स्थापित भारत के सर्वोच्च न्यायालय का प्रत्यक्ष पूर्ववर्ती संस्थान बना।

➣ इसी अधिनियम के अंतर्गत भारतीय रिज़र्व बैंक (1935) की स्थापना भी हुई तथा केंद्र व प्रांतों के बीच विषयों के बंटवारे हेतु जिस त्रि-सूची (Union, State, Concurrent List) प्रणाली की नींव रखी गई, उसे स्वतंत्र भारत के संविधान (सातवीं अनुसूची) में भी अपनाया गया।

➣ इस प्रकार, यद्यपि गोलमेज सम्मेलनों में प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ देशी रियासतों के असहयोग के कारण व्यवहार में कभी क्रियान्वित नहीं हो सका, फिर भी इन सम्मेलनों में विकसित हुए अनेक संवैधानिक सिद्धांत और संस्थाएँ – प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से – स्वतंत्र भारत की शासन-व्यवस्था का अभिन्न अंग बन गईं।

➣ गोलमेज सम्मेलनों में बेगम जहाँआरा शाहनवाज़ जैसी महिला प्रतिनिधि की भागीदारी भारत के संवैधानिक इतिहास में महिलाओं के औपचारिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की चर्चा के आरंभिक उदाहरणों में गिनी जाती है। यह विषय आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि हाल ही में नारी शक्ति वंदन अधिनियम (संविधान का 106वाँ संशोधन अधिनियम, 2023) के माध्यम से लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत स्थान आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है, जिसमें अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति हेतु पूर्व से आरक्षित स्थानों के भीतर भी महिलाओं के लिए उप-आरक्षण की व्यवस्था है। ध्यातव्य है कि इस अधिनियम का वास्तविक क्रियान्वयन जनगणना-आधारित परिसीमन की प्रक्रिया पूर्ण होने से जुड़ा हुआ है, तथा इसे शीघ्र लागू करने से संबंधित विधायी प्रयासों एवं समय-सीमा को लेकर विमर्श अभी भी जारी है।

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