भारत में ब्रिटिश शक्ति का विस्तार (1757–1858 ई.) : व्यापार से साम्राज्य तक

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत भारत में ब्रिटिश शक्ति का विस्तार (1757–1858 ई.)
📚 विषय सूची

1600 ई. में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी जब भारत आई, तब उसका उद्देश्य केवल व्यापार करना था। उस समय किसी ने भी नहीं सोचा था कि यही कंपनी आगे चलकर भारत जैसे विशाल भू-भाग पर शासन करेगी।

➣ समय के साथ भारत की कमजोर राजनीतिक स्थिति, भारतीय राज्यों की आपसी फूट और व्याप्त अराजकता का लाभ उठाकर कंपनी ने सशस्त्र व्यापार नीति अपनाई।

➣ परिणामस्वरूप उसने व्यापार के साथ-साथ भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करना शुरू किया और धीरे-धीरे अपनी सत्ता का विस्तार करती चली गई।

ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार में प्रमुख गवर्नर जनरलों की भूमिका

➣ भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना चरणबद्ध रूप से हुई। इसके विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण में मुख्यतः पाँच व्यक्तियों की निर्णायक भूमिका रही-

1. लॉर्ड क्लाइव,
2. वारेन हेस्टिंग्स,
3. कॉर्नवालिस,
4. वेलेजली और
5. डलहौजी

➣ इन अंग्रेज़ गवर्नरों द्वारा भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के संदर्भ में एक प्रसिद्ध कथन है-

क्लाइव ने भारत में अंग्रेज़ी राज्य की नींव डाली।

➣ इसका अर्थ है कि प्लासी (1757) और बक्सर (1764) की विजय तथा दीवानी अधिकार (1765) प्राप्त करके रॉबर्ट क्लाइव ने भारत में अंग्रेज़ों की राजनीतिक और आर्थिक शक्ति की आधारशिला रखी। यहीं से ईस्ट इंडिया कंपनी केवल व्यापारिक संस्था न रहकर एक राजनीतिक शक्ति बन गई।

वारेन हेस्टिंग्स ने उस नींव को मजबूत किया।

➣ वारेन हेस्टिंग्स ने प्रशासनिक सुधार किए, द्वैध शासन समाप्त किया, न्याय एवं राजस्व व्यवस्था को संगठित किया तथा कंपनी की प्रशासनिक पकड़ को मजबूत बनाया। इससे अंग्रेज़ी शासन स्थिर और प्रभावी होने लगा।

कॉर्नवालिस ने इमारत खड़ी करनी प्रारंभ की।

➣ लॉर्ड कॉर्नवालिस ने सिविल सेवा, न्यायपालिका और पुलिस व्यवस्था में व्यापक सुधार किए तथा स्थायी बंदोबस्त (1793) लागू किया। इन सुधारों से भारत में अंग्रेज़ी प्रशासन की मजबूत संरचना तैयार होने लगी।

वेलेजली ने उस इमारत को पूरा किया।

➣ लॉर्ड वेलेजली ने सहायक संधि के माध्यम से हैदराबाद, अवध, पेशवा, मैसूर सहित अनेक भारतीय राज्यों को अंग्रेज़ों के प्रभाव में ला दिया। परिणामस्वरूप अंग्रेज़ भारत की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति बन गए।

डलहौजी ने उस इमारत में अनेक मंज़िलें जोड़कर उसे और भी विशाल बना दिया।

➣ लॉर्ड डलहौजी ने व्यपगत सिद्धांत, कुशासन के आधार पर विलय तथा युद्धों के माध्यम से सतारा, झाँसी, नागपुर, अवध, पंजाब सहित अनेक राज्यों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। इसके अतिरिक्त निम्न बर्मा पर भी अंग्रेज़ों का अधिकार स्थापित हुआ। जिससे ब्रिटिश साम्राज्य का क्षेत्रफल अपने समय में अभूतपूर्व रूप से बढ़ा।

बाद के गवर्नर जनरलों ने उसे अंतिम स्वरूप प्रदान किया।

➣ डलहौजी के बाद के गवर्नर जनरलों ने ब्रिटिश साम्राज्य को संगठित एवं सुदृढ़ किया। 1858 के बाद देशी रियासतों के प्रति अधीनस्थ संघ की नीति तथा बाद में बराबर के संघ की नीति अपनाकर ब्रिटिश सर्वोच्चता को बनाए रखा। इस प्रकार स्वतंत्रता प्राप्ति तक लगभग संपूर्ण भारत पर ब्रिटिश प्रभुत्व स्थापित रहा।

भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व के अनुकूल परिस्थितियाँ

अंग्रेज़ों की सैन्य, नौसैनिक एवं आर्थिक शक्ति

➣ अंग्रेज़ों के पास आधुनिक हथियारों से लैस, प्रशिक्षित और अनुशासित सेना थी। उनकी युद्ध प्रणाली भारतीय राज्यों की पारंपरिक सेनाओं की तुलना में अधिक संगठित और प्रभावी थी।

➣ अंग्रेज़ों की सबसे बड़ी ताकत उनकी शक्तिशाली नौसेना थी। समुद्री मार्गों पर नियंत्रण होने के कारण वे इंग्लैंड से सैनिक, हथियार, धन और आवश्यक सामग्री आसानी से भारत पहुँचा सकते थे।

➣ उनकी नौसेना शक्ति को देखते हुए अलीवर्दी ख़ाँ का एक प्रसिद्ध कथन है- अंग्रेज़ों को बंगाल की भूमि से निकालना कठिन नहीं, परन्तु उनकी समुद्री शक्ति का सामना करना समुद्र में आग लगाने के समान है।

➣ आर्थिक दृष्टि से भी ईस्ट इंडिया कंपनी अत्यंत मजबूत थी। उसे इंग्लैंड के व्यापारियों और ब्रिटिश सरकार का समर्थन प्राप्त था। व्यापार से होने वाली आय का उपयोग कंपनी अपनी सेना बढ़ाने, युद्ध लड़ने और भारतीय शासकों को अपने पक्ष में करने के लिए करती थी।

➣ इस प्रकार आधुनिक सेना, शक्तिशाली नौसेना और पर्याप्त आर्थिक संसाधनों ने अंग्रेज़ों को भारतीय राज्यों की तुलना में कहीं अधिक मजबूत बना दिया, जिसका लाभ उन्हें भारत में अपने साम्राज्य के विस्तार में मिला।

मुगल साम्राज्य का पतन

➣ 1707 ई. में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य का पतन तेजी से शुरू हो गया। उसके उत्तराधिकारी योग्य और शक्तिशाली शासक सिद्ध नहीं हुए, जिससे केंद्रीय सत्ता लगातार कमजोर होती चली गई।

➣ मुगल साम्राज्य के कमजोर पड़ते ही बंगाल, अवध, हैदराबाद, मराठा, मैसूर और सिख जैसी क्षेत्रीय शक्तियाँ लगभग स्वतंत्र हो गईं। परिणामस्वरूप पूरे भारत में एक शक्तिशाली केंद्रीय शासन के स्थान पर अनेक छोटे-बड़े राज्य अस्तित्व में आ गए।

➣ मुगल साम्राज्य की इस कमजोरी का लाभ विदेशी आक्रमणकारियों ने भी उठाया। 1739 ई. में नादिरशाह ने दिल्ली पर आक्रमण कर भारी लूटपाट की तथा कोहिनूर हीरा और मयूर सिंहासन अपने साथ ले गया। इस आक्रमण ने मुगल साम्राज्य की वास्तविक कमजोरी को पूरे देश के सामने उजागर कर दिया।

➣ इसके बाद अहमदशाह अब्दाली ने भी भारत पर कई बार आक्रमण किए। विशेष रूप से 1761 ई. का पानीपत का तृतीय युद्ध भारतीय इतिहास की एक निर्णायक घटना सिद्ध हुआ, जिसने उत्तर भारत के शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल दिया और मराठों की उत्तर भारत में बढ़ती शक्ति को गहरा आघात पहुँचाया।

➣ अंग्रेज़ों ने इस पूरी राजनीतिक स्थिति का भरपूर लाभ उठाया। एक ओर मुगल सत्ता कमजोर हो चुकी थी और दूसरी ओर भारतीय राज्य आपसी संघर्षों में उलझे हुए थे। ऐसी स्थिति में अंग्रेज़ों ने धीरे-धीरे भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करना शुरू किया और आगे चलकर अपनी सत्ता का विस्तार कर लिया।

➣ उल्लेखनीय है कि 18वीं शताब्दी में भारत की राजनीतिक स्थिति काफी हद तक 11वीं–12वीं शताब्दी जैसी हो गई थी। जिस प्रकार उस समय अनेक छोटे-बड़े राज्यों की आपसी प्रतिद्वंद्विता और राजनीतिक विखंडन का लाभ उठाकर मुस्लिम आक्रमणकारियों ने भारत में अपनी सत्ता स्थापित की थी, उसी प्रकार 18वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के पतन और भारतीय राज्यों की आपसी फूट ने अंग्रेज़ों को भी भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने का अवसर प्रदान किया।

भारतीय राज्यों के आपसी संघर्ष

➣ मुगल साम्राज्य के पतन के बाद भारत में अनेक शक्तिशाली राज्य तो उभरे, लेकिन उनमें राष्ट्रीय एकता का अभाव था। उस समय राष्ट्रीय भावना पूरे देश के बजाय प्रायः राज्य, जाति, धर्म अथवा क्षेत्र तक ही सीमित थी। अधिकांश शासक अपने राज्य का विस्तार करने और प्रतिद्वंद्वी राज्यों को पराजित करने में लगे हुए थे।

➣ उदाहरण के लिए, मराठों ने चौथ और सरदेशमुखी वसूलने के उद्देश्य से कई राज्यों पर आक्रमण किए। उन्होंने बंगाल के नवाब अलीवर्दी खाँ पर भी कई बार आक्रमण किए। इसी प्रकार मराठों और मैसूर के बीच भी समय-समय पर संघर्ष होते रहे।

➣ उल्लेखनीय है कि बंगाल के नवाब अलीवर्दी खाँ उन प्रारम्भिक भारतीय शासकों में थे, जिन्होंने अंग्रेज़ों की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं को समय रहते समझ लिया था। बाद में हैदर अली और टीपू सुल्तान ने भी अंग्रेज़ों का डटकर विरोध किया और उन्हें भारत में अपनी सत्ता स्थापित करने से रोकने का भरसक प्रयास किया।

➣ दक्षिण भारत में निजाम, मराठा, मैसूर तथा कर्नाटक के शासक लगातार एक-दूसरे के विरुद्ध संघर्ष करते रहे। स्थिति ऐसी हो गई थी कि हैदराबाद के निजाम ने अपने पड़ोसी राज्यों से सुरक्षा के लिए स्वेच्छा से अंग्रेज़ों के साथ सहायक संधि कर ली।

➣ इसके अतिरिक्त कई भारतीय शासकों ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को हराने अथवा सत्ता प्राप्त करने के लिए अंग्रेज़ों या अन्य यूरोपीय शक्तियों की सहायता भी ली। परिणामस्वरूप अंग्रेज़ों को भारतीय राज्यों की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप करने का अवसर मिल गया।

➣ भारतीय राज्यों की यही आपसी प्रतिद्वंद्विता अंग्रेज़ों की सबसे बड़ी ताकत बन गई। उन्होंने इस स्थिति का लाभ उठाकर फूट डालो और शासन करो की नीति अपनाई। पहले वे किसी एक पक्ष का समर्थन करते थे, फिर उसी राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करके धीरे-धीरे उसे अपने प्रभाव में ले लेते थे।

अंग्रेज़ी सत्ता की शुरुआत

भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार

प्लासी का युद्ध (23 जून 1757 ई.)

प्लासी का युद्ध भारत में अंग्रेज़ी राजनीतिक सत्ता की वास्तविक शुरुआत माना जाता है। इस विजय के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी केवल एक व्यापारिक संस्था नहीं रही, बल्कि भारतीय राजनीति की एक प्रभावशाली शक्ति बन गई।

➣ उस समय बंगाल भारत का सबसे समृद्ध प्रांत था। यहाँ की अपार संपत्ति, विकसित व्यापार और अधिक राजस्व के कारण अंग्रेज़ लंबे समय से बंगाल पर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते थे।

➣ अंग्रेज़ों द्वारा व्यापारिक विशेषाधिकारों का दुरुपयोग, बिना कर दिए व्यापार करना, किलों की किलेबंदी करना तथा नवाब के आदेशों की अवहेलना करना दोनों पक्षों के बीच संघर्ष का मुख्य कारण बना।

➣ उस समय नवाब सिराजुद्दौला के कई प्रभावशाली अधिकारी और दरबारी उससे असंतुष्ट थे। अंग्रेज़ों ने बंगाल की आंतरिक राजनीति का पूरा लाभ उठाया। क्लाइव ने इसी असंतोष का फायदा उठाते हुए मीर जाफर, जगत सेठ और राय दुर्लभ से गुप्त समझौता कर लिया।

➣ मीर जाफर स्वयं बंगाल का नवाब बनना चाहता था, जबकि जगत सेठ और अन्य दरबारियों को सिराजुद्दौला की नीतियों से अपने हित प्रभावित होने का डर था। अंग्रेज़ों ने मीर जाफर से वादा किया कि यदि वह युद्ध में उनका साथ देगा, तो उसे बंगाल का नवाब बना दिया जाएगा।

➣ यही कारण था कि प्लासी के युद्ध में मीर जाफर और उसके समर्थकों ने अपनी विशाल सेना होने के बावजूद युद्ध में सक्रिय भाग नहीं लिया। इस विश्वासघात ने सिराजुद्दौला की हार लगभग तय कर दी और अंग्रेज़ों को निर्णायक विजय मिल गई।

➣ विजय के बाद अंग्रेज़ों ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब बना दिया। यह भारत के इतिहास में पहली बार था जब किसी भारतीय राज्य का शासक अंग्रेज़ों की इच्छा से गद्दी पर बैठा। इसलिए इसे कठपुतली नवाब भी कहा जाता है।

➣ प्लासी की विजय के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी को अपार धन-संपत्ति प्राप्त हुई। मीर जाफर ने नवाब बनने के बदले कंपनी को लगभग 1 करोड़ 77 लाख रुपये नकद, 24 परगनों की जमींदारी तथा अनेक व्यापारिक सुविधाएँ प्रदान कीं।

रॉबर्ट क्लाइव को भी व्यक्तिगत रूप से लगभग 20 लाख रुपये तथा बाद में 24 परगनों की जागीर प्राप्त हुई। इसके अतिरिक्त कंपनी के अनेक अधिकारियों ने भी बड़ी मात्रा में धन और बहुमूल्य उपहार प्राप्त किए।

➣ प्लासी से प्राप्त इस अपार धन ने ईस्ट इंडिया कंपनी की आर्थिक स्थिति पूरी तरह बदल दी। इसी धन के बल पर कंपनी ने अपनी सेना का विस्तार किया, आधुनिक हथियार खरीदे, नए युद्ध लड़े और धीरे-धीरे भारत के अन्य राज्यों पर भी अपना प्रभाव स्थापित करना शुरू कर दिया।

➣ इस विजय के बाद अंग्रेज़ व्यावहारिक रूप से बंगाल के वास्तविक स्वामी बन गए। नवाब केवल नाम का शासक रह गया, जबकि बंगाल की राजनीति और प्रशासन पर अंग्रेज़ों का प्रभाव लगातार बढ़ता गया।

➣ यही कारण है कि इतिहासकार प्लासी के युद्ध को अंग्रेज़ों के लिए भारत की सत्ता का प्रवेश द्वार मानते हैं।।

बक्सर का युद्ध (22 अक्टूबर 1764 ई.)

➣ इतिहासकारों के अनुसार प्लासी के युद्ध ने अंग्रेज़ों को बंगाल में प्रवेश दिलाया, जबकि बक्सर के युद्ध ने भारत में उनकी राजनीतिक सत्ता को वैधानिक और स्थायी आधार प्रदान किया। इस युद्ध के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी केवल एक व्यापारिक संस्था नहीं रही, बल्कि भारत की एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी

➣ प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेज़ों ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया, लेकिन बाद में उसे हटाकर मीर कासिम को नवाब बना दिया। जब मीर कासिम ने अंग्रेज़ों के बढ़ते हस्तक्षेप का विरोध करना शुरू किया, तो अंग्रेज़ों और उसके बीच संघर्ष बढ़ गया।

➣ अंग्रेज़ों का सामना अब केवल बंगाल के नवाब से नहीं था, बल्कि मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की संयुक्त शक्ति से था। इसके बावजूद अंग्रेज़ों ने निर्णायक विजय प्राप्त की।

➣ इस विजय के बाद अंग्रेज़ों का प्रभाव केवल बंगाल तक सीमित नहीं रहा। अब बंगाल, बिहार और उड़ीसा के साथ-साथ अवध और स्वयं मुगल सम्राट भी अंग्रेज़ों के प्रभाव में आ गए। इससे भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्तियों पर कंपनी का प्रभाव स्थापित हो गया।

➣ बक्सर की विजय के बाद मुगल सम्राट की स्थिति इतनी कमजोर हो गई कि अगले ही वर्ष 1765 ई. में उसने अंग्रेज़ों को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी सौंप दी। इससे पहली बार ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में नियमित रूप से राजस्व प्राप्त करने का अधिकार मिला।

➣ इस प्रकार बक्सर का युद्ध अंग्रेज़ों के लिए केवल एक सैन्य विजय नहीं था, बल्कि इसने उन्हें भारत में वैधानिक, आर्थिक और राजनीतिक शक्ति प्रदान की। यही कारण है कि इसे भारत में अंग्रेज़ी साम्राज्य के विस्तार का एक निर्णायक मोड़ माना जाता है।

प्लासी का युद्ध अंग्रेज़ों को बंगाल की सत्ता तक ले गया, जबकि बक्सर का युद्ध उन्हें भारत की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति बना गया।
▪ प्लासी (1757) → अंग्रेज़ों को राजनीतिक प्रवेश मिला।
▪ बक्सर (1764) → अंग्रेज़ों को राजनीतिक + आर्थिक + वैधानिक अधिकार मिले।

दीवानी अधिकार प्राप्त होने के परिणाम

➣ 1765 ई. में बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त होने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी केवल व्यापार करने वाली संस्था नहीं रही। अब उसके हाथ में इन प्रांतों से राजस्व (लगान) वसूलने का अधिकार भी आ गया।

दीवानी अधिकार का अर्थ था- राजस्व (लगान) वसूल करने तथा नागरिक प्रशासन का अधिकार। इसके बदले कंपनी ने मुगल सम्राट को प्रतिवर्ष 26 लाख रुपये पेंशन देने का वचन दिया था।

➣ दीवानी मिलने के बाद कंपनी के हाथ में आय का सबसे बड़ा स्रोत आ गया। अब उसे व्यापार के लिए इंग्लैंड से अधिक धन मँगाने की आवश्यकता नहीं रही, क्योंकि भारतीय राजस्व से ही व्यापार, सेना और प्रशासन का खर्च पूरा होने लगा।

➣ इसी धन के बल पर अंग्रेज़ों ने अपनी सेना का विस्तार किया, नए युद्ध लड़े और धीरे-धीरे अन्य भारतीय राज्यों पर भी अपना प्रभाव स्थापित करना शुरू कर दिया।

दीवानी अधिकार प्राप्त होना अंग्रेज़ी साम्राज्य के विस्तार में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। यही वह घटना थी जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी को एक व्यापारिक संस्था से आर्थिक और राजनीतिक शक्ति में बदल दिया।

➣ दीवानी अधिकार मिलने के बाद अंग्रेज़ों के हाथ में आय तो आ गई, लेकिन प्रशासन और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी नवाब के पास ही रही। इसी व्यवस्था को द्वैध शासन कहा गया, जिसे आगे चलकर कंपनी ने अपने हित में इस्तेमाल किया।

बंगाल में द्वैध शासन (1765 ई. – 1772 ई.)

1765 ई. में दीवानी अधिकार प्राप्त करने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बंगाल पर नियंत्रण भी बना रहे और उसे सीधे शासन की जिम्मेदारी भी न उठानी पड़े।

➣ क्लाइव अच्छी तरह जानता था कि यदि कंपनी सीधे शासन करेगी, तो उसे जनता की सुरक्षा, न्याय, अकाल, प्रशासन और अन्य समस्याओं की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ेगी। इसलिए उसने ऐसी व्यवस्था बनाई, जिसमें आय और वास्तविक शक्ति कंपनी के पास रहे, जबकि उत्तरदायित्व नवाब के ऊपर दिखाई दे।

➣ द्वैध शासन को समझने से पहले दीवानी और निजामत को समझना आवश्यक है। मुगल प्रशासन में दीवान राजस्व एवं वित्त व्यवस्था का प्रमुख अधिकारी होता था, जबकि निजाम (सूबेदार) कानून-व्यवस्था, पुलिस, न्याय तथा सैनिक प्रशासन का प्रमुख होता था। सामान्य परिस्थितियों में दोनों अधिकारी एक-दूसरे पर नियंत्रण रखते थे और अंततः मुगल सम्राट के प्रति उत्तरदायी होते थे।

➣इसी उद्देश्य से रॉबर्ट क्लाइव ने बंगाल में द्वैध शासन की व्यवस्था लागू की।

➣ इलाहाबाद की संधि (1765 ई.) के बाद कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त हो गई। इसके बाद क्लाइव ने एक ऐसी व्यवस्था बनाई, जिसमें दीवानी का वास्तविक नियंत्रण कंपनी के पास रहा, जबकि निजामत का कार्य नवाब के नाम पर चलता रहा।

➣ देखने में ऐसा लगता था कि बंगाल पर अभी भी नवाब का शासन है, लेकिन वास्तविक शक्ति अंग्रेज़ों के हाथ में थी। कंपनी स्वयं सामने आए बिना पूरे प्रशासन को अपने नियंत्रण में रखे हुए थी।

➣ कंपनी ने प्रशासन चलाने के लिए भारतीय अधिकारियों की नियुक्ति की। बंगाल में मुहम्मद रज़ा ख़ाँ, बिहार में राजा शिताब राय तथा उड़ीसा में दुर्लभ राय को उप-दीवान बनाया गया। ये अधिकारी भारतीय थे, लेकिन कार्य कंपनी के हितों के अनुसार करते थे।

➣ इस प्रकार बंगाल में एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई। कंपनी के पास अधिकार और आय दोनों थे, जबकि नवाब के पास केवल नाममात्र का प्रशासनिक दायित्व बचा था। वह अब स्वतंत्र शासक नहीं रह गया, बल्कि कंपनी द्वारा दिए जाने वाले वार्षिक अनुदान पर निर्भर हो गया।

बंगाल में द्वैध शासन

द्वैध शासन से अंग्रेज़ों को क्या लाभ हुआ?

➣ द्वैध शासन का सबसे बड़ा लाभ यह था कि कंपनी को बंगाल की अपार आय मिलने लगी, लेकिन प्रशासन का पूरा खर्च उसे स्वयं नहीं उठाना पड़ा। इससे उसकी आर्थिक स्थिति पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हो गई।

➣ कंपनी ने बिना प्रत्यक्ष शासन किए पूरे बंगाल पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। जनता की दृष्टि में नवाब ही शासक दिखाई देता था, जबकि वास्तविक निर्णय कंपनी लेती थी।

➣ उस समय कंपनी के पास इतने प्रशिक्षित अधिकारी और प्रशासनिक व्यवस्था नहीं थी कि वह इतने बड़े प्रदेश का शासन स्वयं चला सके। द्वैध शासन ने इस समस्या का भी समाधान कर दिया, क्योंकि प्रशासन भारतीय अधिकारियों के माध्यम से चलता रहा और कंपनी केवल नियंत्रण करती रही।

➣ इस व्यवस्था से कंपनी का प्रशासनिक खर्च भी कम रहा। यदि कंपनी स्वयं शासन चलाती, तो उसे बड़ी संख्या में नए अधिकारी नियुक्त करने पड़ते और उन पर भारी खर्च करना पड़ता। द्वैध शासन के कारण यह खर्च काफी हद तक बच गया।

➣ सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि कंपनी अब बंगाल के विशाल राजस्व का उपयोग अपनी सेना बढ़ाने, नए युद्ध लड़ने और भारत के अन्य राज्यों में अपना प्रभाव फैलाने के लिए करने लगी। यही धन आगे चलकर अंग्रेज़ी साम्राज्य के विस्तार का सबसे मजबूत आर्थिक आधार बना।

➣ इस प्रकार द्वैध शासन अंग्रेज़ों के लिए अत्यंत लाभदायक सिद्ध हुआ। इसने कंपनी को बिना प्रत्यक्ष शासन किए बंगाल की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति पर नियंत्रण स्थापित करने का अवसर प्रदान किया।

`

द्वैध शासन की कमियाँ, प्रभाव एवं अंत

➣ द्वैध शासन की सबसे बड़ी कमी यह थी कि अधिकार और उत्तरदायित्व अलग-अलग हाथों में थे। कंपनी के पास राजस्व वसूलने और वास्तविक शक्ति तो थी, लेकिन जनता के प्रति उसकी कोई जवाबदेही नहीं थी। दूसरी ओर नवाब जनता के प्रति उत्तरदायी तो था, पर उसके पास कोई वास्तविक अधिकार नहीं बचे थे।

➣ कंपनी का मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक राजस्व प्राप्त करना था। इसलिए किसानों और जमींदारों से कठोरता से लगान वसूला गया, जबकि प्रशासन, न्याय और जनकल्याण की ओर बहुत कम ध्यान दिया गया। परिणामस्वरूप बंगाल की प्रशासनिक व्यवस्था धीरे-धीरे चरमरा गई।

➣ अंग्रेज़ी अधिकारियों और कंपनी के कर्मचारियों ने अपने पद का व्यापक दुरुपयोग किया। निजी व्यापार, रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ा। भारतीय व्यापारियों के साथ भेदभाव होने लगा तथा स्थानीय व्यापार और उद्योगों को भी भारी नुकसान पहुँचा।

➣ बंगाल का प्रसिद्ध रेशम और सूती वस्त्र उद्योग भी इस व्यवस्था से प्रभावित हुआ। कंपनी ने व्यापार पर अपना एकाधिकार स्थापित करना शुरू कर दिया, जिससे भारतीय कारीगरों और व्यापारियों की आर्थिक स्थिति लगातार खराब होती गई।

➣ द्वैध शासन के दौरान 1770 ई. में बंगाल में भीषण अकाल पड़ा। इस अकाल में लाखों लोगों की मृत्यु हो गई, लेकिन कंपनी की प्राथमिकता राजस्व वसूली ही बनी रही। इससे जनता में भारी असंतोष फैल गया और द्वैध शासन की कमजोरियाँ पूरी तरह उजागर हो गईं।

➣ इस व्यवस्था से स्वयं अंग्रेज़ अधिकारी भी संतुष्ट नहीं थे। कंपनी को यह समझ आने लगा कि यदि भारत में लंबे समय तक शासन करना है, तो केवल राजस्व वसूलना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि प्रशासन पर भी प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित करना आवश्यक है।

➣ इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए 1772 ई. में बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने द्वैध शासन व्यवस्था को समाप्त कर दिया। इसके बाद कंपनी ने राजस्व और प्रशासन-दोनों का नियंत्रण सीधे अपने हाथों में ले लिया।

➣ द्वैध शासन का अंत अंग्रेज़ों की प्रशासनिक नीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था। अब कंपनी केवल धन एकत्र करने वाली संस्था नहीं रही, बल्कि उसने प्रत्यक्ष रूप से शासन चलाना भी शुरू कर दिया। इससे भारत में अंग्रेज़ी सत्ता पहले की तुलना में और अधिक मजबूत हो गई।

➣ इतिहासकार डोडवेल ने द्वैध शासन को अधिकार और उत्तरदायित्व के बीच तलाक कहा है, क्योंकि अधिकार कंपनी के पास थे जबकि उत्तरदायित्व नवाब पर छोड़ दिया गया था।

➣ प्रसिद्ध इतिहासकार के. एम. पन्निकर ने 1765–1772 ई. के इस काल को डाकुओं का राज्य कहा है, जबकि पर्सिवल स्पीयर ने इसे खुली और निर्लज्ज लूट का युग बताया है।

➣ स्वयं रॉबर्ट क्लाइव ने भी बाद में स्वीकार किया कि उस समय बंगाल में जितनी अराजकता, भ्रष्टाचार और शोषण था, वैसा दृश्य उसने कहीं और नहीं देखा।

सहायक संधि की पृष्ठभूमि

1798 ई. में लॉर्ड वेलेजली भारत का गवर्नर जनरल बनकर आया। वह एक साम्राज्यवादी विचारधारा का समर्थक था और भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी को सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनाना चाहता था।

➣ उस समय भारत की राजनीतिक स्थिति अंग्रेज़ों के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं थी। कई भारतीय राज्यों के दरबारों और सेनाओं में फ्रांसीसी अधिकारी कार्य कर रहे थे। फ्रांस और इंग्लैंड यूरोप में एक-दूसरे के कट्टर प्रतिद्वंद्वी थे, इसलिए वेलेजली को डर था कि यदि भारत में फ्रांसीसी प्रभाव बढ़ता रहा, तो अंग्रेज़ों की स्थिति कमजोर हो सकती है।

➣ वेलेजली अच्छी तरह समझता था कि केवल युद्ध लड़कर पूरे भारत पर अधिकार करना आसान नहीं होगा। इसलिए उसने ऐसी नीति अपनाने का निर्णय लिया, जिससे भारतीय राज्य बिना युद्ध किए ही अंग्रेज़ों पर निर्भर हो जाएँ।

➣ इसी उद्देश्य से उसने सहायक संधि को व्यापक रूप से लागू किया। इस नीति के माध्यम से अंग्रेज़ भारतीय राज्यों को सुरक्षा देने का वादा करते थे, लेकिन बदले में उनकी विदेश नीति, सैन्य व्यवस्था और कई महत्वपूर्ण अधिकार अपने नियंत्रण में ले लेते थे।

➣ वास्तव में सहायक संधि का विचार बिल्कुल नया नहीं था। फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले ने सबसे पहले भारतीय शासकों को सैन्य सहायता देकर बदले में धन प्राप्त करने की नीति अपनाई थी। लेकिन यह व्यवस्था सीमित थी और पूरे भारत में प्रभावी रूप से लागू नहीं हो सकी।

लॉर्ड वेलेजली ने इसी विचार को एक संगठित राजनीतिक नीति का रूप दिया। उसने सहायक संधि को केवल सुरक्षा समझौता न बनाकर भारतीय राज्यों को अंग्रेज़ों के अधीन लाने का सबसे प्रभावी साधन बना दिया।

➣ परिणामस्वरूप अनेक भारतीय राज्यों ने एक-एक करके यह संधि स्वीकार कर ली। बाहर से वे स्वतंत्र दिखाई देते थे, लेकिन उनकी वास्तविक स्वतंत्रता धीरे-धीरे समाप्त होती चली गई। यही कारण है कि सहायक संधि को भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का सबसे सफल राजनीतिक हथियार माना जाता है।

ध्यान दें : सहायक संधि की अवधारणा का प्रारम्भिक प्रयोग फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले ने किया था, लेकिन इसे व्यापक रूप से लागू कर भारत में अंग्रेज़ी साम्राज्य के विस्तार का प्रभावी माध्यम लॉर्ड वेलेजली ने बनाया।

लॉर्ड वेलेजली की सहायक संधि

सहायक संधि का अर्थ एवं विकास

➣ सामान्य अर्थ में सहायक संधि का मतलब है- दो या दो से अधिक राज्यों के बीच सुरक्षा के लिए किया गया समझौता। लेकिन भारत में इसका अर्थ ही बदल गया। भारत में सहायक संधि का उद्देश्य केवल सुरक्षा देना नहीं था, बल्कि भारतीय राज्यों को धीरे-धीरे अंग्रेज़ों के अधीन लाना भी था।

➣ यद्यपि अंग्रेज़ों ने 1765 ई. में अवध के नवाब के साथ भी एक प्रकार की सहायक संधि की थी, जिसके अंतर्गत उसकी सुरक्षा के बदले धन लिया गया था। लेकिन उस समय यह केवल एक सीमित समझौता था।

➣ सहायक संधि की वास्तविक शुरुआत 1798 ई. में लॉर्ड वेलेजली के भारत आने के बाद हुई। उसने इसे एक सुनियोजित राजनीतिक नीति का रूप दिया और धीरे-धीरे अनेक भारतीय राज्यों को इस संधि को स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया।

➣ सबसे पहले हैदराबाद के निजाम ने 1798 ई. में यह संधि स्वीकार की। इसके बाद 1800 ई. में उसने संशोधित संधि भी की, जिसके बाद हैदराबाद पूरी तरह अंग्रेज़ों के प्रभाव में आ गया।

➣ इसके बाद मैसूर (1799 ई.), तंजौर (1799 ई.), अवध (1801 ई.), पेशवा बाजीराव द्वितीय (1802 ई. – बेसिन की संधि), बरार के भोंसले (1803 ई.), सिंधिया (1804 ई.) तथा बाद में जयपुर, जोधपुर, बूंदी, भरतपुर आदि राज्यों ने भी सहायक संधि स्वीकार कर ली।

➣ मराठों में इंदौर के होल्कर ने इस नीति का लंबे समय तक विरोध किया था और सहायक संधि स्वीकार नहीं की।

➣ कुछ ही वर्षों में भारत के अधिकांश प्रमुख राज्य किसी न किसी रूप में अंग्रेज़ों की इस नीति के अधीन आ गए। इससे अंग्रेज़ों का प्रभाव तेजी से बढ़ा और भारतीय राज्यों की स्वतंत्र नीति लगभग समाप्त हो गई।

सहायक संधि की प्रमुख शर्तें

➣ सहायक संधि स्वीकार करने वाले प्रत्येक भारतीय राज्य को कुछ निश्चित शर्तों का पालन करना पड़ता था। देखने में ये शर्तें राज्य की सुरक्षा के लिए थीं, लेकिन वास्तव में इन्हीं के माध्यम से अंग्रेज़ धीरे-धीरे उस राज्य पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेते थे।

➣ संधि स्वीकार करने वाले राज्य को अपने क्षेत्र में अंग्रेज़ी सेना रखने की अनुमति देनी होती थी। इस सेना का पूरा खर्च संबंधित राज्य को ही उठाना पड़ता था। यदि कोई राज्य यह खर्च देने में असमर्थ होता, तो उसे अपने राज्य का कुछ भाग अंग्रेज़ों को सौंपना पड़ता था।

➣ किसी भी देशी रियासत को अंग्रेज़ों की अनुमति के बिना किसी अन्य भारतीय राज्य या विदेशी शक्ति से युद्ध, संधि अथवा मैत्री संबंध स्थापित करने का अधिकार नहीं था। इससे उस राज्य की विदेश नीति पूरी तरह अंग्रेज़ों के नियंत्रण में आ जाती थी।

➣ संधि स्वीकार करने वाले राज्य को अपने दरबार में एक ब्रिटिश रेजिडेंट रखना अनिवार्य था। उसका कार्य केवल सलाह देना नहीं था, बल्कि राज्य की गतिविधियों पर नज़र रखना और समय-समय पर अंग्रेज़ी सरकार को सूचना भेजना भी था। धीरे-धीरे रेजिडेंट राज्य के निर्णयों को भी प्रभावित करने लगा।

➣ कोई भी भारतीय शासक अंग्रेज़ों की स्वीकृति के बिना किसी यूरोपीय अधिकारी को अपनी सेना या प्रशासन में नियुक्त नहीं कर सकता था। इस शर्त का मुख्य उद्देश्य भारतीय राज्यों से फ्रांसीसी प्रभाव को पूरी तरह समाप्त करना था।

➣ सहायक संधि स्वीकार करने वाले राज्य को अंग्रेज़ों की अनुमति के बिना किसी ऐसे व्यक्ति को शरण या नौकरी देने का अधिकार भी नहीं था, जिसे अंग्रेज़ अपना शत्रु मानते हों। इससे अंग्रेज़ों का प्रभाव और अधिक बढ़ता गया।

➣ बदले में ईस्ट इंडिया कंपनी राज्य को बाहरी आक्रमणों तथा आवश्यकता पड़ने पर आंतरिक विद्रोहों से सुरक्षा देने का वचन देती थी। इसी कारण अनेक भारतीय शासकों ने अपनी सुरक्षा के लिए यह संधि स्वीकार कर ली।

➣ यद्यपि अंग्रेज़ यह दावा करते थे कि वे राज्य के आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, लेकिन व्यवहार में ब्रिटिश रेजिडेंट और अंग्रेज़ी सरकार समय-समय पर राज्यों के आंतरिक मामलों को भी प्रभावित करने लगी। परिणामस्वरूप अधिकांश देशी रियासतों की वास्तविक स्वतंत्रता धीरे-धीरे समाप्त हो गई।

➣ इस प्रकार सहायक संधि की सभी शर्तें देखने में सामान्य प्रतीत होती थीं, लेकिन उनका वास्तविक उद्देश्य भारतीय राज्यों को राजनीतिक, सैन्य और कूटनीतिक रूप से अंग्रेज़ों पर निर्भर बनाना था।

सहायक संधि से अंग्रेज़ों को लाभ

➣ सहायक संधि लॉर्ड वेलेजली की सबसे सफल राजनीतिक नीति सिद्ध हुई। इसके माध्यम से अंग्रेज़ों ने बिना बड़े युद्ध किए अनेक भारतीय राज्यों को अपने प्रभाव क्षेत्र में शामिल कर लिया। यही कारण है कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार में इस नीति की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

➣ इस नीति का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि भारतीय राज्यों से फ्रांसीसी प्रभाव लगभग समाप्त हो गया। अब कोई भी देशी राज्य अंग्रेज़ों की अनुमति के बिना किसी फ्रांसीसी अधिकारी को अपनी सेना या प्रशासन में नियुक्त नहीं कर सकता था। इससे भारत में अंग्रेज़ों के सबसे बड़े यूरोपीय प्रतिद्वंद्वी की शक्ति कमजोर पड़ गई।

➣ सहायक संधि के कारण अंग्रेज़ों को भारतीय राज्यों के खर्च पर एक विशाल सेना उपलब्ध हो गई। सेना अंग्रेज़ों की थी, लेकिन उसका पूरा खर्च देशी रियासतें उठाती थीं। इससे कंपनी की सैन्य शक्ति लगातार बढ़ती गई, जबकि आर्थिक भार भारतीय राज्यों पर पड़ता था।

➣ अधिकांश भारतीय राज्यों की विदेश नीति अंग्रेज़ों के नियंत्रण में आ गई। अब कोई भी राज्य अंग्रेज़ों की अनुमति के बिना युद्ध, संधि या राजनीतिक संबंध स्थापित नहीं कर सकता था। इससे अंग्रेज़ों का प्रभाव पूरे भारत में तेजी से फैलने लगा।

➣ प्रत्येक राज्य में ब्रिटिश रेजिडेंट की नियुक्ति होने से अंग्रेज़ों को वहाँ की राजनीतिक गतिविधियों की प्रत्यक्ष जानकारी मिलने लगी। आवश्यकता पड़ने पर वे राज्य के उत्तराधिकार, प्रशासन और अन्य महत्वपूर्ण मामलों में भी हस्तक्षेप करने लगे।

➣ सहायक संधि के कारण भारतीय राज्यों के बीच आपसी सहयोग की संभावना भी लगभग समाप्त हो गई। अब वे अंग्रेज़ों के विरुद्ध कोई मजबूत संघ या संयुक्त मोर्चा नहीं बना सकते थे। इससे अंग्रेज़ों के लिए एक-एक करके सभी राज्यों पर अपना प्रभाव स्थापित करना आसान हो गया।

➣ अंग्रेज़ों की प्रतिष्ठा और राजनीतिक शक्ति में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। कुछ ही वर्षों में भारत के अधिकांश बड़े राज्य किसी न किसी रूप में अंग्रेज़ों के संरक्षण में आ गए, जिससे ईस्ट इंडिया कंपनी भारत की सबसे प्रभावशाली शक्ति बनकर उभरी।

➣ इस प्रकार सहायक संधि ने अंग्रेज़ों को सैन्य, राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक-चारों क्षेत्रों में मजबूत बना दिया। यही कारण है कि इतिहासकार इसे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का सबसे प्रभावी राजनीतिक हथियार मानते हैं।

सहायक संधि की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि अंग्रेज़ों ने बिना प्रत्यक्ष युद्ध किए भारतीय राज्यों की स्वतंत्र विदेश नीति और सैन्य शक्ति पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। इससे भारत में उनका साम्राज्य तेजी से फैलता चला गया।

सहायक संधि का भारतीय राज्यों पर प्रभाव

➣ जहाँ एक ओर सहायक संधि अंग्रेज़ों के लिए अत्यंत लाभदायक सिद्ध हुई, वहीं दूसरी ओर इसने भारतीय राज्यों की राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य शक्ति को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया। बाहर से ये राज्य स्वतंत्र दिखाई देते थे, लेकिन उनकी वास्तविक स्वतंत्रता लगभग समाप्त हो चुकी थी।

सहायक संधि स्वीकार करने के बाद भारतीय शासक अपनी विदेश नीति पर स्वयं निर्णय नहीं ले सकते थे। वे अंग्रेज़ों की अनुमति के बिना किसी अन्य राज्य से युद्ध, संधि या मैत्री संबंध भी स्थापित नहीं कर सकते थे। इससे उनकी संप्रभुता पर सीधा प्रभाव पड़ा।

➣ प्रत्येक राज्य में ब्रिटिश सेना और ब्रिटिश रेजिडेंट की उपस्थिति के कारण अंग्रेज़ों का प्रभाव लगातार बढ़ता गया। यद्यपि सहायक संधि में आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप न करने की बात कही गई थी, लेकिन व्यवहार में अंग्रेज़ समय-समय पर राज्यों के आंतरिक मामलों को भी प्रभावित करने लगे।

अंग्रेज़ी सेना का खर्च उठाना अधिकांश राज्यों के लिए आसान नहीं था। परिणामस्वरूप उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होती गई। कई राज्यों को सेना के खर्च के बदले अपने प्रदेश का कुछ भाग अंग्रेज़ों को सौंपना पड़ा, जिससे अंग्रेज़ी साम्राज्य का क्षेत्रफल लगातार बढ़ता गया।

सहायक संधि के कारण अधिकांश भारतीय राज्यों की अपनी सेनाएँ धीरे-धीरे कमजोर होती गईं। अनेक सैनिक बेरोज़गार हो गए और राज्य अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह अंग्रेज़ों पर निर्भर हो गए। इससे भारतीय शासकों की सैन्य शक्ति लगभग समाप्त हो गई।

➣ जब किसी राज्य की सुरक्षा की जिम्मेदारी अंग्रेज़ों ने अपने हाथ में ले ली, तो कई शासकों में प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व की भावना भी कम होने लगी। कुछ शासक प्रशासन की अपेक्षा विलासिता में अधिक रुचि लेने लगे, जिसका सीधा प्रभाव जनता पर पड़ा।

➣ भारतीय शासक हस्तशिल्प, कला और स्थानीय उद्योगों के प्रमुख संरक्षक थे। अंग्रेज़ी प्रभाव बढ़ने के साथ उनका संरक्षण कम होता गया, जिससे अनेक पारंपरिक उद्योगों और कारीगरों की स्थिति भी प्रभावित हुई।

➣ इतिहासकार सर टॉमस मुनरो ने इस नीति की आलोचना करते हुए कहा था कि देशी रियासतों ने अपनी स्वतंत्रता और राष्ट्रीय चरित्र बेचकर सुरक्षा खरीद ली। यह कथन सहायक संधि के वास्तविक प्रभाव को स्पष्ट करता है।

➣ वास्तव में सहायक संधि भारतीय राज्यों के लिए मीठा विष सिद्ध हुई। प्रारम्भ में यह उन्हें सुरक्षा का आश्वासन देती थी, लेकिन धीरे-धीरे उनकी स्वतंत्रता, सैन्य शक्ति और राजनीतिक अधिकार समाप्त करती चली गई।

➣ इस प्रकार सहायक संधि ने बिना प्रत्यक्ष युद्ध किए भारतीय राज्यों को अंग्रेज़ों पर निर्भर बना दिया। यही नीति आगे चलकर भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे मजबूत आधारों में से एक सिद्ध हुई।

पक्ष अंग्रेज़ों को लाभ भारतीय राज्यों को हानि
सैन्य भारतीय राज्यों के खर्च पर विशाल सेना मिली। अपनी सेना कमजोर हो गई।
राजनीतिक विदेश नीति पर नियंत्रण स्थापित हुआ। स्वतंत्र विदेश नीति समाप्त हुई।
आर्थिक सेना का खर्च राज्यों ने उठाया। राज्य आर्थिक रूप से कमजोर हुए।
प्रशासनिक रेजिडेंट के माध्यम से नियंत्रण बढ़ा। आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बढ़ा।
साम्राज्य विस्तार बिना युद्ध प्रभाव क्षेत्र बढ़ा। वास्तविक स्वतंत्रता समाप्त हुई।
समग्र परिणाम ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार हुआ। राज्य अंग्रेज़ों पर निर्भर हो गए।

लॉर्ड डलहौजी और उसकी साम्राज्यवादी नीति

1848 ई. में लॉर्ड डलहौजी भारत का गवर्नर जनरल बनकर आया। 1848 से 1856 ई. का उसका कार्यकाल भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के तीव्र विस्तार के लिए जाना जाता है।

डलहौजी एक कुशल प्रशासक होने के साथ-साथ कट्टर साम्राज्यवादी भी था। उसका स्पष्ट उद्देश्य भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का अधिक से अधिक विस्तार करना था। इसलिए उसने केवल युद्धों पर ही नहीं, बल्कि कूटनीति और कानूनी उपायों का भी सहारा लिया।

➣ डलहौजी से पहले अंग्रेज़ मुख्यतः सहायक संधि जैसी नीतियों के माध्यम से भारतीय राज्यों को अपने प्रभाव में लाते थे। ऐसे राज्य बाहर से स्वतंत्र दिखाई देते थे, लेकिन उनकी विदेश नीति और सैन्य व्यवस्था अंग्रेज़ों के नियंत्रण में रहती थी।

डलहौजी इससे एक कदम आगे बढ़ा। उसका मानना था कि जहाँ भी अवसर मिले, वहाँ देशी राज्यों को सीधे ब्रिटिश साम्राज्य में मिला देना चाहिए। इससे अंग्रेज़ों का नियंत्रण अधिक मजबूत होगा और प्रशासन भी सीधे ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ में आ जाएगा।

➣ इसी सोच के आधार पर उसने भारतीय राज्यों के प्रति पहले के गवर्नर जनरलों से अलग नीति अपनाई। उसने उत्तराधिकार संबंधी परंपराओं का लाभ उठाकर कई राज्यों का विलय किया और जहाँ यह संभव नहीं हुआ, वहाँ अन्य आधारों पर भी अंग्रेज़ी हस्तक्षेप को बढ़ावा दिया।

डलहौजी के शासनकाल में सतारा, झाँसी, नागपुर जैसे अनेक राज्य अंग्रेज़ी साम्राज्य में मिला लिए गए। इसके अतिरिक्त पंजाब और निम्न बर्मा (लोअर बर्मा) जैसे क्षेत्रों पर भी अंग्रेज़ों का अधिकार स्थापित हुआ। इस प्रकार उसके शासनकाल में ब्रिटिश साम्राज्य का क्षेत्रफल पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गया।

➣ यही कारण है कि इतिहासकार लॉर्ड डलहौजी को भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे आक्रामक विस्तारवादी गवर्नर जनरलों में से एक मानते हैं।

➣ उसकी नीतियों ने अंग्रेज़ी सत्ता को तो मजबूत किया, लेकिन भारतीय शासकों और जनता में गहरा असंतोष भी पैदा कर दिया, जो आगे चलकर 1857 के विद्रोह के प्रमुख कारणों में से एक बना।

ध्यान दें : लॉर्ड वेलेजली ने सहायक संधि के माध्यम से भारतीय राज्यों को अंग्रेज़ों पर निर्भर बनाया, जबकि लॉर्ड डलहौजी ने व्यपगत सिद्धांत (हड़प नीति) अपनाकर अनेक राज्यों का सीधा विलय अंग्रेज़ी साम्राज्य में कर दिया।

व्यपगत सिद्धांत (हड़प नीति)

➣ भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के लिए लॉर्ड डलहौजी ने व्यपगत सिद्धांत (Doctrine of Lapse) लागू किया, जिसे सामान्यतः हड़प नीति कहा जाता है। इस नीति का मुख्य उद्देश्य उन देशी राज्यों का अंग्रेज़ी साम्राज्य में विलय करना था, जहाँ कोई प्राकृतिक उत्तराधिकारी न हो।

➣ इस नीति के अनुसार यदि किसी देशी राज्य का शासक बिना प्राकृतिक (सगा) उत्तराधिकारी के मर जाता था, तो उसका राज्य स्वतः ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन चला जाता था। अंग्रेज़ दत्तक पुत्र को राज्य का वैध उत्तराधिकारी नहीं मानते थे।

➣ जबकि भारतीय परंपरा में दत्तक पुत्र को वास्तविक पुत्र के समान अधिकार प्राप्त थे और वह राज्य का उत्तराधिकारी बन सकता था। डलहौजी ने इसी परंपरा को अस्वीकार कर अनेक राज्यों के विलय का मार्ग प्रशस्त किया।

➣ अंग्रेज़ों का तर्क था कि दत्तक पुत्र को केवल पारिवारिक संपत्ति का उत्तराधिकारी माना जा सकता है, लेकिन राज्य पर शासन करने का अधिकार उसे स्वतः प्राप्त नहीं होता। भारतीय शासकों ने इस तर्क को अपनी परंपराओं और अधिकारों के विरुद्ध माना।

➣ डलहौजी ने इस नीति को लागू करने के लिए भारतीय राज्यों को तीन श्रेणियों में बाँटा। प्रत्येक श्रेणी के लिए उत्तराधिकार के अलग-अलग नियम निर्धारित किए गए-

श्रेणी राज्यों की स्थिति उत्तराधिकार / दत्तक पुत्र संबंधी व्यवस्था
प्रथम श्रेणी वे रियासतें जो कभी किसी विदेशी सत्ता के अधीन नहीं रहीं और किसी को कर नहीं देती थीं। दत्तक पुत्र को सामान्यतः मान्यता दी जाती थी तथा अंग्रेज़ हस्तक्षेप नहीं करते थे।
द्वितीय श्रेणी वे रियासतें जो पहले मुगल सम्राट या मराठा पेशवा के अधीन थीं और बाद में अंग्रेज़ों के संरक्षण में आ गईं। दत्तक पुत्र गोद लेने से पहले ब्रिटिश सरकार की अनुमति आवश्यक थी।
तृतीय श्रेणी वे राज्य जिनकी स्थापना या पुनर्स्थापना में ब्रिटिश सरकार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदान था। दत्तक पुत्र को मान्यता नहीं दी जाती थी; प्राकृतिक उत्तराधिकारी न होने पर राज्य का विलय कर लिया जाता था।

➣ वास्तव में व्यपगत सिद्धांत उत्तराधिकार से अधिक साम्राज्य विस्तार की नीति थी। अंग्रेज़ों ने इसे एक कानूनी आधार के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन इसका वास्तविक उद्देश्य भारतीय राज्यों का विलय कर ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करना था।

सहायक संधि के अंतर्गत राज्य नाममात्र स्वतंत्र रहता था, जबकि व्यपगत सिद्धांत के अंतर्गत उसका सीधा विलय अंग्रेज़ी साम्राज्य में कर दिया जाता था। यही दोनों नीतियों के बीच सबसे बड़ा अंतर है।

हड़प नीति का क्रियान्वयन

➣ व्यपगत सिद्धांत लागू करने के बाद लॉर्ड डलहौजी ने एक-एक करके उन भारतीय राज्यों का विलय करना शुरू किया, जहाँ उसकी दृष्टि में प्राकृतिक उत्तराधिकारी नहीं था। इस नीति के माध्यम से अनेक देशी रियासतें ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बन गईं।

➣ इस नीति का पहला शिकार सतारा (1848 ई.) बना। सतारा के शासक अप्पा साहेब (शाहजी) ने अपनी मृत्यु से पहले एक बालक को गोद लिया था, लेकिन डलहौजी ने उसे वैध उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और सतारा का विलय अंग्रेज़ी साम्राज्य में कर लिया।

➣ इसके बाद 1849 ई. में जैतपुर (बुंदेलखंड) और संबलपुर (वर्तमान ओडिशा क्षेत्र) का विलय किया गया। दोनों राज्यों में उत्तराधिकार के प्रश्न को आधार बनाकर अंग्रेज़ों ने अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

1850 ई. में बघाट तथा 1852 ई. में उदयपुर (मध्य भारत की रियासत) को भी इसी नीति के अंतर्गत अंग्रेज़ी साम्राज्य में मिला लिया गया।

1854 ई. में झाँसी का विलय किया गया। झाँसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु से पहले दामोदर राव को गोद लिया गया था, लेकिन डलहौजी ने उसे उत्तराधिकारी स्वीकार नहीं किया। इसी निर्णय का रानी लक्ष्मीबाई ने तीव्र विरोध किया, जो आगे चलकर 1857 के विद्रोह का एक प्रमुख कारण बना।

➣ इसी वर्ष नागपुर (1854 ई.) का भी विलय कर लिया गया। नागपुर के शासक रघुजी तृतीय की मृत्यु बिना प्राकृतिक उत्तराधिकारी के हुई थी, इसलिए डलहौजी ने व्यपगत सिद्धांत लागू करते हुए इस राज्य को भी अंग्रेज़ी साम्राज्य में मिला लिया।

➣ इस प्रकार कुछ ही वर्षों में सतारा, जैतपुर, संबलपुर, बघाट, उदयपुर, झाँसी और नागपुर जैसे अनेक राज्य अंग्रेज़ी साम्राज्य का हिस्सा बन गए। इससे भारत में ब्रिटिश सत्ता का क्षेत्रफल और प्रभाव दोनों तेजी से बढ़े।

वर्ष राज्य विलय का आधार
1848 ई. सतारा व्यपगत सिद्धांत (हड़प नीति)
1849 ई. जैतपुर व्यपगत सिद्धांत (हड़प नीति)
1849 ई. संबलपुर व्यपगत सिद्धांत (हड़प नीति)
1850 ई. बघाट व्यपगत सिद्धांत (हड़प नीति)
1852 ई. उदयपुर (मध्य भारत) व्यपगत सिद्धांत (हड़प नीति)
1854 ई. झाँसी व्यपगत सिद्धांत (हड़प नीति)
1854 ई. नागपुर व्यपगत सिद्धांत (हड़प नीति)
1856 ई. अवध कुशासन

अवध (1856 ई.) का विलय व्यपगत सिद्धांत के अंतर्गत नहीं किया गया था। अंग्रेज़ों ने उस पर कुशासन का आरोप लगाकर उसे अपने अधीन किया था।

अवध का विलय (1856 ई.)

अवध का विलय व्यपगत सिद्धांत (हड़प नीति) के अंतर्गत नहीं किया गया था। अंग्रेज़ों ने 1856 ई. में अवध के नवाब वाजिद अली शाह पर कुशासन (Misgovernment) का आरोप लगाकर उसके राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया।

➣ अंग्रेज़ों का दावा था कि अवध की प्रशासनिक व्यवस्था अत्यंत खराब हो चुकी है, जनता सुरक्षित नहीं है और राज्य में भ्रष्टाचार तथा अव्यवस्था फैली हुई है। इसलिए वहाँ सुशासन स्थापित करने के लिए अंग्रेज़ी हस्तक्षेप आवश्यक है।

➣ लेकिन अधिकांश इतिहासकारों का मत है कि कुशासन केवल एक बहाना था। वास्तव में अंग्रेज़ अवध जैसे समृद्ध और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य पर प्रत्यक्ष अधिकार स्थापित करना चाहते थे।

अवध गंगा के उपजाऊ मैदान में स्थित एक समृद्ध राज्य था। इसके अतिरिक्त उत्तर भारत में अंग्रेज़ी साम्राज्य को मजबूत करने तथा पंजाब और बंगाल के बीच अपना नियंत्रण सुदृढ़ करने की दृष्टि से भी इसका विशेष महत्व था।

अवध के विलय के बाद नवाब वाजिद अली शाह को शासन से हटाकर कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) भेज दिया गया। इस घटना से अवध के दरबार, सैनिकों, तालुकेदारों और सामान्य जनता में गहरा असंतोष फैल गया।

➣ इस प्रकार अवध का विलय ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार की एक महत्वपूर्ण घटना थी। यद्यपि यह हड़प नीति के अंतर्गत नहीं हुआ, फिर भी इसने अंग्रेज़ों की विस्तारवादी नीति को स्पष्ट रूप से उजागर कर दिया और 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हड़प नीति के परिणाम

➣ लॉर्ड डलहौजी की हड़प नीति ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार को नई गति दी। कुछ ही वर्षों में अनेक देशी रियासतें अंग्रेज़ी साम्राज्य में मिला ली गईं, जिससे ईस्ट इंडिया कंपनी की राजनीतिक और प्रशासनिक शक्ति पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गई।

➣ इस नीति के कारण भारतीय शासकों में असुरक्षा की भावना फैल गई। जिन राज्यों में प्राकृतिक उत्तराधिकारी नहीं था, वहाँ के शासकों को यह भय सताने लगा कि उनकी मृत्यु के बाद उनका राज्य भी अंग्रेज़ों द्वारा हड़प लिया जाएगा।

➣ भारतीय परंपरा में दत्तक पुत्र को वैध उत्तराधिकारी माना जाता था, लेकिन अंग्रेज़ों ने इस परंपरा को अस्वीकार कर दिया। इससे भारतीय शासकों और जनता में अंग्रेज़ों के प्रति गहरा असंतोष उत्पन्न हुआ।

➣ अनेक राज्यों के विलय के बाद वहाँ के सैनिकों, दरबारियों, अधिकारियों और आश्रितों की आजीविका समाप्त हो गई। इससे अंग्रेज़ी शासन के प्रति विरोध लगातार बढ़ता गया।

➣ विशेष रूप से झाँसी और अवध की घटनाओं ने अंग्रेज़ों के प्रति व्यापक असंतोष पैदा किया। यही कारण था कि 1857 के विद्रोह के दौरान अनेक देशी शासकों, सैनिकों और सामान्य जनता ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध हथियार उठा लिए।

➣ यद्यपि हड़प नीति ने अंग्रेज़ों को तत्काल राजनीतिक और क्षेत्रीय लाभ पहुँचाया, लेकिन दीर्घकाल में यही नीति उनके विरुद्ध जनआक्रोश का एक प्रमुख कारण बन गई।

1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया और 1858 ई. में भारत का प्रशासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया। इसके साथ ही देशी रियासतों के प्रति अपेक्षाकृत उदार नीति अपनाई गई तथा दत्तक उत्तराधिकारी को मान्यता देने की परंपरा भी पुनः स्वीकार कर ली गई।

सहायक संधि का उद्देश्य भारतीय राज्यों को अंग्रेज़ों पर निर्भर बनाना था, जबकि हड़प नीति का उद्देश्य उन्हें सीधे ब्रिटिश साम्राज्य में मिला देना था। यही दोनों नीतियों के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर है।

प्रमुख युद्ध

➣ भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार केवल कूटनीति, संधियों और प्रशासनिक उपायों से ही नहीं, बल्कि अनेक निर्णायक युद्धों के माध्यम से भी हुआ।

➣ इन युद्धों में प्राप्त विजयों ने अंग्रेज़ों के यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों तथा भारतीय शक्तियों को क्रमशः कमजोर किया और अन्ततः सम्पूर्ण भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त किया।

बेदरा का युद्ध

1759 ई. में बंगाल के बेदरा के निकट अंग्रेज़ों और डच ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में अंग्रेज़ों की निर्णायक विजय हुई और भारत में डचों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का अंत हो गया।

➣ डच कम्पनी बंगाल में अपने व्यापारिक हितों की रक्षा तथा अंग्रेज़ों की बढ़ती शक्ति को चुनौती देना चाहती थी, किन्तु बेदरा की पराजय के बाद उसे यह प्रयास छोड़ना पड़ा। इसके बाद डच केवल व्यापार तक सीमित रह गए और भारतीय राजनीति में उनका प्रभाव लगभग समाप्त हो गया।

➣ इस विजय से बंगाल में अंग्रेज़ों का प्रभुत्व और अधिक सुदृढ़ हो गया। अब अंग्रेज़ों को न तो किसी भारतीय शक्ति से तत्काल चुनौती थी और न ही किसी यूरोपीय प्रतिद्वंद्वी से। इससे कम्पनी को बंगाल के विशाल आर्थिक संसाधनों का निर्बाध उपयोग करने तथा भारत के अन्य भागों में अपने साम्राज्य का विस्तार करने का अवसर मिला।

➣ इतिहासकारों का मत है कि प्लासी (1757 ई.) ने बंगाल में अंग्रेज़ों के राजनीतिक प्रभुत्व की शुरुआत की, जबकि बेदरा (1759 ई.) की विजय ने उस प्रभुत्व को यूरोपीय चुनौती से भी सुरक्षित कर दिया। इस प्रकार बंगाल अंग्रेज़ी साम्राज्य के विस्तार का सबसे सुदृढ़ आधार बन गया।

कर्नाटक युद्ध

➣ अठारहवीं शताब्दी के मध्य में अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों के बीच हुए तीन कर्नाटक युद्धों (1746–1763 ई.) ने भारत में यूरोपीय प्रभुत्व के भविष्य का निर्णय कर दिया। इन युद्धों में अंग्रेज़ों ने धीरे-धीरे फ्रांसीसियों को पराजित कर दक्षिण भारत में अपनी स्थिति अत्यन्त सुदृढ़ कर ली।

1763 ई. की पेरिस संधि के बाद फ्रांस को भारत में अपनी व्यापारिक बस्तियाँ तो वापस मिल गईं, किन्तु उसे किलेबंदी करने, सेना रखने तथा भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं रही। परिणामस्वरूप फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी केवल एक व्यापारिक संस्था बनकर रह गई।

➣ इन युद्धों की सफलता ने अंग्रेज़ों को यह विश्वास दिलाया कि वे केवल व्यापारिक कम्पनी नहीं, बल्कि भारत में एक शक्तिशाली राजनीतिक सत्ता भी बन सकते हैं। इसके बाद कम्पनी ने भारतीय राज्यों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करना आरम्भ किया तथा अपनी साम्राज्यवादी नीति को अधिक आक्रामक रूप से लागू किया।

➣ इतिहासकार पी. ई. रॉबर्ट्स के अनुसार, कर्नाटक युद्धों ने भारत में अंग्रेज़ी साम्राज्य की नींव रखी। वहीं डुप्ले की असफलता और रॉबर्ट क्लाइव की सफलता ने भारत में अंग्रेज़ों की राजनीतिक श्रेष्ठता को स्थापित कर दिया।

आंग्ल-मैसूर युद्ध

➣ आंग्ल-मैसूर युद्धों में अंग्रेज़ों की विजय ने दक्षिण भारत की राजनीतिक शक्ति-संतुलन को पूरी तरह बदल दिया। मैसूर राज्य, जो अंग्रेज़ों के विस्तार का सबसे बड़ा विरोधी था, उसकी शक्ति समाप्त हो गई और कम्पनी के लिए दक्षिण भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित करना आसान हो गया।

➣ इन युद्धों के बाद अंग्रेज़ों का प्रभाव कर्नाटक, मालाबार तट तथा दक्षिण भारत के विशाल क्षेत्रों तक फैल गया। मैसूर के शासक अंग्रेज़ों के अधीन हो गए और कम्पनी की सहायक संधि की नीति को व्यापक सफलता मिली। इससे अनेक भारतीय राज्यों को भी अंग्रेज़ों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।

➣ दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों के सबसे शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी के समाप्त हो जाने से कम्पनी को अपनी सैन्य शक्ति को अन्य क्षेत्रों में केंद्रित करने का अवसर मिला। यही कारण था कि इसके बाद अंग्रेज़ों ने मराठों तथा अन्य भारतीय शक्तियों के विरुद्ध अधिक प्रभावी ढंग से अभियान चलाए।

लॉर्ड वेलेजली ने टीपू सुल्तान की पराजय के बाद अत्यधिक आत्मविश्वास व्यक्त करते हुए कहा था- India is now ours. (अब भारत हमारा है।) यद्यपि यह कथन औपचारिक सरकारी घोषणा नहीं था, फिर भी यह दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों की निर्णायक सफलता और बढ़ते आत्मविश्वास का प्रतीक माना जाता है।

आंग्ल-मराठा युद्ध

➣ आंग्ल-मराठा युद्धों की समाप्ति के साथ ही मराठा संघ की राजनीतिक एवं सैन्य शक्ति का अंत हो गया। मराठे, जो मुगल साम्राज्य के पतन के बाद भारत की सबसे प्रभावशाली शक्ति बन चुके थे, अब अंग्रेज़ों के सामने टिक नहीं सके।

➣ मराठों की पराजय के परिणामस्वरूप मध्य भारत, पश्चिम भारत तथा दक्कन के विशाल क्षेत्रों पर कम्पनी का प्रभाव स्थापित हो गया। अनेक मराठा रियासतों ने अंग्रेज़ों की अधीनता स्वीकार कर ली तथा कम्पनी भारत की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी।

मराठों की पराजय के बाद भारत में ऐसा कोई शक्तिशाली भारतीय राज्य शेष नहीं रहा जो सम्पूर्ण देश के स्तर पर अंग्रेज़ों को चुनौती दे सके। इससे कम्पनी को भारतीय राजनीति में सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ और उसकी परमाउंटसी की नीति को स्थायी आधार मिला।

➣ इतिहासकार वी. ए. स्मिथ के अनुसार, 1818 ई. के बाद भारत में अंग्रेज़ी सर्वोच्चता निर्विवाद हो गई। इसी कारण आंग्ल-मराठा युद्धों को भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के वास्तविक राजनीतिक प्रभुत्व की स्थापना का निर्णायक चरण माना जाता है।

आंग्ल-सिख युद्ध

➣ आंग्ल-सिख युद्धों में विजय के बाद अंग्रेज़ों ने पंजाब का विलय कर लिया। इसके साथ ही उत्तर-पश्चिम भारत पर कम्पनी का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया और सिख साम्राज्य का अंत हो गया।

➣ पंजाब के विलय के परिणामस्वरूप कम्पनी की सीमाएँ अफ़ग़ानिस्तान के निकट तक पहुँच गईं। इससे उत्तर-पश्चिम सीमा की सुरक्षा अंग्रेज़ों के हाथ में आ गई और मध्य एशिया की दिशा में उनकी सामरिक स्थिति अधिक सुदृढ़ हो गई।

सिख साम्राज्य के पतन के बाद भारत में अंग्रेज़ों का ऐसा कोई शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी नहीं बचा जो उनके साम्राज्यवादी विस्तार को रोक सके। परिणामस्वरूप सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर कम्पनी का राजनीतिक प्रभाव लगभग पूर्ण रूप से स्थापित हो गया।

➣ इतिहासकार जे. आर. सीली का मत है कि पंजाब का विलय भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार की अंतिम महान उपलब्धियों में से एक था। 1849 ई. के बाद अंग्रेज़ भारत की निर्विवाद सर्वोच्च शक्ति बन गए।

>
युद्ध ब्रिटिश शक्ति के विस्तार पर प्रभाव / परिणाम
कर्नाटक युद्ध (1746–1763 ई.) फ्रांसीसी राजनीतिक प्रभाव समाप्त हो गया। अंग्रेज़ भारत की सबसे शक्तिशाली यूरोपीय शक्ति बन गए तथा आगे के साम्राज्यवादी विस्तार का मार्ग प्रशस्त हुआ।
प्लासी का युद्ध (1757 ई.) बंगाल में अंग्रेज़ों की राजनीतिक सत्ता की नींव पड़ी। कम्पनी का भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप बढ़ा और बंगाल पर उसका प्रभाव स्थापित हुआ।
बेदरा (Bedara) का युद्ध (1759 ई.) डच ईस्ट इंडिया कम्पनी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का अंत हुआ। बंगाल में अंग्रेज़ों का प्रभुत्व और अधिक सुदृढ़ हो गया।
बक्सर का युद्ध (1764 ई.) अंग्रेज़ों की निर्णायक विजय के बाद 1765 ई. में दीवानी अधिकार प्राप्त हुए। इससे कम्पनी को विशाल आर्थिक संसाधन मिले और उसके साम्राज्य विस्तार को वित्तीय आधार प्राप्त हुआ।
आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767–1799 ई.) दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों के सबसे शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी का अंत हुआ। कम्पनी का प्रभुत्व स्थापित हुआ तथा सहायक संधि की नीति को व्यापक सफलता मिली।
आंग्ल-मराठा युद्ध (1775–1818 ई.) मराठा संघ की शक्ति समाप्त हो गई। मध्य, पश्चिम एवं दक्कन भारत पर अंग्रेज़ों का प्रभाव स्थापित हुआ और ब्रिटिश सर्वोच्चता (British Paramountcy) सुदृढ़ हुई।
आंग्ल-सिख युद्ध (1845–1849 ई.) पंजाब का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय हुआ। उत्तर-पश्चिम भारत पर अंग्रेज़ों का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हुआ और भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का क्षेत्रीय विस्तार लगभग पूर्ण हो गया।

अधीनस्थ संघ की नीति (1858–1935 ई.)

➣ 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार को यह महसूस हुआ कि डलहौजी की आक्रामक विलय नीति ने भारतीय शासकों को अंग्रेज़ों से दूर कर दिया है। इसलिए 1858 ई. में कंपनी का शासन समाप्त होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने देशी रियासतों के प्रति अपेक्षाकृत उदार नीति अपनाई ।

➣ 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों ने अपनी नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। अब उनका उद्देश्य देशी रियासतों का विलय करना नहीं, बल्कि उन्हें अपने साथ जोड़कर उनकी वफ़ादारी और सहयोग प्राप्त करना था। इसी नीति को अधीनस्थ संघ की नीति कहा जाता है।

1 नवंबर 1858 ई. को महारानी विक्टोरिया की घोषणा के माध्यम से ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर भारत का प्रशासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दिया गया। इसी घोषणा में यह आश्वासन दिया गया कि ब्रिटिश सरकार अब बिना उचित कारण देशी राज्यों का विलय नहीं करेगी।

➣ इस घोषणा के अंतर्गत भारतीय शासकों को दत्तक पुत्र गोद लेने का अधिकार पुनः प्रदान कर दिया गया। अर्थात् यदि किसी शासक का प्राकृतिक उत्तराधिकारी न हो, तो वह दत्तक पुत्र को अपना उत्तराधिकारी बना सकता था। इस प्रकार व्यपगत सिद्धांत (हड़प नीति) को व्यवहारिक रूप से समाप्त कर दिया गया।

➣ अंग्रेज़ों की नई नीति यह थी कि यदि किसी राज्य में कुप्रशासन हो, तो आवश्यक होने पर उसके शासक को हटाया जा सकता है, लेकिन राज्य का सीधा विलय नहीं किया जाएगा। इससे देशी रियासतों का अस्तित्व बना रहा, लेकिन वे ब्रिटिश सर्वोच्चता को स्वीकार करने के लिए बाध्य थीं।

1876 ई. में रॉयल टाइटल्स एक्ट पारित किया गया, जिसके आधार पर 1877 ई. में लॉर्ड लिटन ने दिल्ली दरबार का आयोजन किया और महारानी विक्टोरिया को भारत की सम्राज्ञी ( कैसर-ए-हिन्द) की उपाधि प्रदान की। इससे यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि भारत की सभी देशी रियासतें अब ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्चता के अधीन हैं।

➣ इसके बाद 1903 ई. में लॉर्ड कर्जन तथा 1911 ई. में लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय ने भी दिल्ली दरबार का आयोजन किया। इन दरबारों का उद्देश्य देशी राजाओं की निष्ठा बनाए रखना तथा ब्रिटिश साम्राज्य की सर्वोच्चता का प्रदर्शन करना था।

➣ इस प्रकार 1858 के बाद अंग्रेज़ों ने देशी राज्यों के प्रति टकराव की नीति छोड़कर सहयोग की नीति अपनाई। बाहर से रियासतों का अस्तित्व बना रहा, लेकिन उनकी सर्वोच्च सत्ता ब्रिटिश सरकार के हाथों में ही रही।

लॉर्ड डलहौजी की नीति का उद्देश्य देशी राज्यों का विलय करना था, जबकि 1858 के बाद की अधीनस्थ संघ की नीति का उद्देश्य उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रखते हुए उनका सहयोग प्राप्त करना था।

बटलर समिति (1927 ई.)

➣ प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन तेजी से बढ़ रहा था। दूसरी ओर देशी रियासतें भी अपने अधिकारों और भविष्य को लेकर चिंतित थीं। ऐसी स्थिति में ब्रिटिश सरकार देशी राज्यों और ब्रिटिश सरकार के बीच संबंधों को स्पष्ट करना चाहती थी।

➣ इसी उद्देश्य से 1927 ई. में सर हरकोर्ट बटलर की अध्यक्षता में भारतीय राज्य समिति का गठन किया गया, जिसे सामान्यतः बटलर समिति कहा जाता है।

➣ इस समिति का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश सरकार (परमसत्ता) और देशी रियासतों के बीच संबंधों की समीक्षा करना तथा भविष्य के लिए उपयुक्त सुझाव देना था। साथ ही यह भी देखना था कि बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में इन संबंधों को किस प्रकार बनाए रखा जाए।

➣ समिति ने भारत की 16 प्रमुख देशी रियासतों का दौरा किया, विभिन्न शासकों से विचार-विमर्श किया और उनके सुझावों का अध्ययन किया। इसके आधार पर 1929 ई. में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

➣ बटलर समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि देशी रियासतों और ब्रिटिश सरकार के बीच जो संबंध हैं, उनमें किसी प्रकार का परिवर्तन उनकी सहमति के बिना नहीं किया जाना चाहिए। इस प्रकार समिति ने देशी राज्यों की विशिष्ट स्थिति को स्वीकार करने पर बल दिया।

➣ समिति ने यह भी सुझाव दिया कि देशी रियासतों से संबंधित मामलों में ब्रिटिश सरकार को अधिक सावधानी और संतुलित नीति अपनानी चाहिए, ताकि दोनों पक्षों के बीच विश्वास और सहयोग बना रहे।

➣ यद्यपि समिति की अधिकांश सिफारिशें पूरी तरह लागू नहीं हो सकीं, फिर भी इसकी रिपोर्ट ने आगे चलकर गोलमेज सम्मेलनों तथा भारत शासन अधिनियम, 1935 के निर्माण को प्रभावित किया।

➣ इस प्रकार बटलर समिति ब्रिटिश सरकार और देशी रियासतों के संबंधों को पुनः परिभाषित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास थी। इसने आगे की संवैधानिक व्यवस्थाओं के लिए आधार तैयार किया।

बटलर समिति (1927) का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश सरकार (परमसत्ता) और देशी रियासतों के बीच संबंधों की समीक्षा करना तथा भविष्य के संबंधों के लिए सुझाव देना था। इसने अपनी रिपोर्ट 1929 ई. में प्रस्तुत की।

बराबर के संघ की नीति (1935–1947 ई.)

बटलर समिति (1927) की रिपोर्ट और गोलमेज सम्मेलनों (1930–32) के बाद ब्रिटिश सरकार ने देशी रियासतों को अपने पक्ष में बनाए रखने के लिए एक नई नीति अपनाई, जिसे बराबर के संघ की नीति कहा जाता है। इसका उद्देश्य देशी राज्यों को प्रस्तावित भारतीय संघ का भाग बनाकर ब्रिटिश शासन को अधिक स्थिर बनाना था।

➣ इसी उद्देश्य से भारत शासन अधिनियम, 1935 में अखिल भारतीय संघ की योजना प्रस्तुत की गई। इस संघ में ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों-दोनों को शामिल करने का प्रस्ताव था।

➣ इस योजना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि देशी रियासतों का संघ में शामिल होना अनिवार्य नहीं था। प्रत्येक रियासत अपनी इच्छा से ही इस संघ का सदस्य बन सकती थी। ब्रिटिश सरकार ने यह व्यवस्था इसलिए की ताकि देशी शासकों का सहयोग और विश्वास बनाए रखा जा सके।

➣ देशी रियासतों को संघीय शासन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व भी दिया गया। प्रस्तावित संघीय विधानसभा की 375 सीटों में से 125 सीटें तथा संघीय परिषद (उच्च सदन) की 260 सीटों में से 104 सीटें देशी रियासतों के लिए निर्धारित की गई थीं।

➣ ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य एक ऐसा संघ बनाना था, जिसमें देशी रियासतें ब्रिटिश शासन के साथ जुड़ी रहें और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव उन पर कम पड़े।

➣ लेकिन अधिकांश देशी रियासतों ने इस योजना में विशेष रुचि नहीं दिखाई। वे अपनी आंतरिक स्वायत्तता बनाए रखना चाहती थीं, जबकि भारतीय राष्ट्रीय नेताओं ने भी इस संघीय व्यवस्था की कई कमियों का विरोध किया। परिणामस्वरूप अखिल भारतीय संघ की योजना कभी लागू नहीं हो सकी।

1947 ई. में भारत की स्वतंत्रता के साथ ही ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त हो गई। इसके बाद देशी रियासतों को भारत या पाकिस्तान में विलय अथवा स्वतंत्र रहने का विकल्प दिया गया। अधिकांश रियासतों ने सरदार वल्लभभाई पटेल और वी. पी. मेनन के प्रयासों से भारतीय संघ में विलय स्वीकार कर लिया।

➣ इस प्रकार बराबर के संघ की नीति ब्रिटिश सरकार का देशी रियासतों को अपने साथ बनाए रखने का अंतिम संवैधानिक प्रयास था। यद्यपि यह योजना सफल नहीं हो सकी, फिर भी इसने स्वतंत्रता से पहले भारत की संवैधानिक राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारत शासन अधिनियम, 1935 के अंतर्गत प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ कभी लागू नहीं हो सका, क्योंकि देशी रियासतों का उसमें शामिल होना स्वैच्छिक था और अधिकांश रियासतों ने इसमें भाग नहीं लिया।

📚 Chapters

    प्रातिक्रिया दे

    आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

    Swipe left/right to change content

    Share This Page

    WhatsApp Telegram