साइमन कमीशन (1927): परिचय
➣ साइमन कमीशन का औपचारिक नाम भारतीय सांविधिक आयोग था, किन्तु इसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन के नाम पर इसे लोकप्रिय रूप से साइमन कमीशन कहा गया।
➣ इस आयोग का गठन 8 नवंबर 1927 को ब्रिटेन की कंज़र्वेटिव सरकार (प्रधानमंत्री स्टेनली बॉल्डविन) द्वारा भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत किया गया था।
➣ आयोग का उद्देश्य 1919 के अधिनियम के तहत लागू संवैधानिक सुधारों – विशेषतः प्रांतों में द्वैध शासन – की कार्यप्रणाली की समीक्षा करना तथा भविष्य में भारत में किए जाने वाले संवैधानिक सुधारों के संबंध में ब्रिटिश संसद को सिफारिशें प्रस्तुत करना था।
➣ आयोग में कुल सात सदस्य थे और सभी सदस्य ब्रिटिश संसद से लिए गए थे। इसमें एक भी भारतीय सदस्य को शामिल नहीं किया गया, जिसके कारण भारत में इसे श्वेत आयोग कहा गया और लगभग सभी प्रमुख भारतीय राजनीतिक दलों ने इसका व्यापक विरोध किया।
➣ 3 फरवरी 1928 को जब यह आयोग बंबई पहुँचा, तो पूरे देश में Simon Go Back के नारों के साथ इसका अभूतपूर्व बहिष्कार किया गया। अनेक स्थानों पर हड़तालें, प्रदर्शन और काले झंडे दिखाकर विरोध किया गया।
➣ इसी विरोध के दौरान लाहौर में हुए लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए, जिनकी बाद में मृत्यु हो गई। यह घटना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुई।
➣ भारतीय प्रतिनिधित्व के अभाव के कारण साइमन कमीशन की वैधता प्रारंभ से ही विवादों में रही, फिर भी इसने भारतीय संवैधानिक विकास की दिशा को गहराई से प्रभावित किया और आगे होने वाले कई महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं संवैधानिक परिवर्तनों – नेहरू रिपोर्ट, गोलमेज सम्मेलन तथा भारत सरकार अधिनियम, 1935 – की पृष्ठभूमि तैयार की।
साइमन कमीशन एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है क्योंकि यह राष्ट्रीय आंदोलन के तीसरे चरण (1927–1935) की शुरुआत का प्रतीक है। इससे जुड़ा घटनाक्रम – बहिष्कार, नेहरू रिपोर्ट, जिन्ना के चौदह सूत्र, गोलमेज सम्मेलन तथा भारत सरकार अधिनियम 1935 – एक-दूसरे से जुड़ी हुई श्रृंखला बनाता है, इसलिए इसे विषय-समूह के रूप में पढ़ना चाहिए।
पृष्ठभूमि एवं समय-पूर्व गठन के कारण
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 (मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) में यह प्रावधान किया गया था कि इसके क्रियान्वयन के लगभग 10 वर्ष बाद एक वैधानिक आयोग नियुक्त किया जाएगा, जो द्वैध शासन की कार्यप्रणाली, भारतीयों की प्रशासनिक भागीदारी तथा संवैधानिक व्यवस्था की कमियों का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा। इस प्रावधान के अनुसार आयोग का गठन सामान्यतः 1929 में होना अपेक्षित था।
आयोग का समय से पहले गठन
➣ निर्धारित समय की प्रतीक्षा किए बिना ब्रिटिश सरकार ने 8 नवंबर 1927 को ही, अर्थात निर्धारित समय से लगभग दो वर्ष पहले, आयोग के गठन की घोषणा कर दी।
➣ इतिहासकारों के अनुसार इसके पीछे केवल संवैधानिक कारण ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन और भारत की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियाँ भी जिम्मेदार थीं। एक ओर भारत में राष्ट्रीय आंदोलन निरंतर मजबूत हो रहा था, वहीं दूसरी ओर ब्रिटेन की राजनीति में भी सत्ता-परिवर्तन के संकेत मिल रहे थे।
समय-पूर्व गठन के राजनीतिक कारण
➣ उस समय ब्रिटेन में कंज़र्वेटिव दल की सरकार सत्तारूढ़ थी। उसे आशंका थी कि यदि अगले आम चुनाव में लेबर पार्टी सत्ता में आ जाती, तो वह भारत के प्रति अधिक उदार नीति अपना सकती थी।
➣ इसलिए कंज़र्वेटिव सरकार ने सत्ता में रहते हुए ही आयोग का गठन कर उसकी दिशा और कार्यप्रणाली अपने नियंत्रण में रखना उचित समझा, विशेषकर तब जब भारतीय नेता पहले से ही 1919 के सुधारों से असंतुष्ट थे और ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि भविष्य के संवैधानिक सुधारों पर पहल उसी के हाथ में रहे।
यद्यपि 1919 के अधिनियम के अनुसार आयोग का गठन लगभग 1929 में होना था, ब्रिटिश सरकार ने राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए इसे 8 नवंबर 1927 को ही नियुक्त कर दिया – यह तिथि-अंतर वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में अक्सर पूछा जाता है।
साइमन कमीशन की संरचना
➣ आयोग के अध्यक्ष प्रसिद्ध ब्रिटिश विधिवेत्ता एवं राजनेता सर जॉन साइमन थे, जिनके नाम पर ही इसे साइमन कमीशन कहा गया। आयोग का मुख्य कार्य 1919 के अधिनियम के अंतर्गत लागू सुधारों की समीक्षा करना तथा भविष्य के सुधारों पर सिफारिशें प्रस्तुत करना था।
➣ आयोग के सात सदस्यों में ब्रिटेन के तीनों प्रमुख दलों – कंज़र्वेटिव, लेबर तथा लिबरल – के प्रतिनिधि शामिल थे, ताकि आयोग को केवल किसी एक दल का नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक समर्थन प्राप्त हो।
➣ आयोग के सदस्य थे – सर जॉन साइमन (अध्यक्ष), क्लेमेंट एटली, वर्नन हार्टशॉर्न, एडवर्ड कैडोगन, जॉर्ज लेन-फॉक्स, हैरी लेवी-लॉसन (वाइकाउंट बर्नहैम) तथा डोनाल्ड हॉवर्ड (बैरन स्ट्रैथकोना)।
➣ उल्लेखनीय है कि आयोग के सदस्य क्लेमेंट एटली आगे चलकर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने और उनके प्रधानमंत्रित्व काल में ही भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 पारित हुआ, जिसके परिणामस्वरूप भारत स्वतंत्र हुआ।
➣ यद्यपि आयोग का उद्देश्य भारत की संवैधानिक व्यवस्था की समीक्षा करना था, फिर भी इसमें एक भी भारतीय सदस्य को स्थान नहीं दिया गया। ब्रिटिश सरकार का तर्क था कि यह एक संसदीय आयोग है, इसलिए इसके सदस्य ब्रिटिश संसद से ही लिए गए हैं।
➣ किन्तु भारतीय नेताओं ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। उनका मत था कि जिस आयोग को भारत के राजनीतिक भविष्य पर निर्णय देने हैं, उसमें भारतीयों की अनुपस्थिति आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। भारतीय जनता और अधिकांश राजनीतिक दलों ने इसे राष्ट्रीय स्वाभिमान के विरुद्ध माना।
साइमन कमीशन में कुल 7 सदस्य थे और सभी ब्रिटिश थे। एक भी भारतीय सदस्य को शामिल न किए जाने के कारण इसे All-White Commission कहा गया और यही इसकी सबसे अधिक विवादास्पद विशेषता बनी।
भारतीय केंद्रीय समिति
➣ भारतीय विरोध को कुछ सीमित करने तथा आयोग के कार्य में भारतीय पक्ष जोड़ने के उद्देश्य से वायसराय द्वारा प्रत्येक प्रांतीय विधान परिषद की एक प्रांतीय समिति तथा अखिल-भारतीय प्रकृति के विषयों की जाँच हेतु एक भारतीय केंद्रीय समिति गठित की गई।
➣ यह समिति साइमन कमीशन का औपचारिक हिस्सा नहीं थी, बल्कि एक समानांतर परामर्शदात्री व्यवस्था थी, जिसके सदस्यों ने आयोग के साथ संयुक्त मुक्त सम्मेलन में भाग लेकर साक्ष्य प्रस्तुत किए।
➣ चूँकि इस समिति का गठन भी वायसराय द्वारा ही किया गया था, अधिकांश राष्ट्रवादी नेताओं ने इसे भी अस्वीकार किया, और साइमन कमीशन के साथ इसका सहयोग भारतीय जनमानस में आयोग की वैधता स्थापित नहीं कर सका।
साइमन कमीशन के उद्देश्य
➣ साइमन कमीशन का मुख्य उद्देश्य भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत लागू संवैधानिक सुधारों की समीक्षा करना तथा यह मूल्यांकन करना था कि इन सुधारों ने भारत की शासन-व्यवस्था में कितना परिवर्तन किया है और भविष्य में किस प्रकार के संवैधानिक सुधारों की आवश्यकता है।
➣ आयोग का प्रमुख दायित्व यह जाँचना था कि प्रांतों में लागू द्वैध शासन की व्यवस्था व्यवहार में कितनी सफल रही, और इस व्यवस्था में किन-किन सुधारों की आवश्यकता है।
➣ आयोग को केंद्रीय एवं प्रांतीय शासन-व्यवस्था, विधान परिषदों की कार्यप्रणाली, भारतीयों की प्रशासनिक भागीदारी तथा शासन की समग्र व्यवस्था का अध्ययन कर भविष्य के संवैधानिक सुधारों के संबंध में अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करनी थीं।
➣ इसके अतिरिक्त आयोग का उद्देश्य भारत में उत्तरदायी शासन की दिशा में अब तक हुई प्रगति का मूल्यांकन करना तथा यह सुझाव देना था कि भारतीयों को भविष्य में किस सीमा तक और किस प्रकार प्रशासनिक एवं राजनीतिक अधिकार दिए जा सकते हैं।
➣ आयोग को विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, प्रांतीय सरकारों, व्यापारिक संस्थाओं तथा अन्य संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श कर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करनी थी, ताकि उसके आधार पर ब्रिटिश सरकार भारत की भावी संवैधानिक नीति निर्धारित कर सके।
संक्षेप में: साइमन कमीशन का उद्देश्य 1919 के संवैधानिक सुधारों की समीक्षा करना, द्वैध शासन की सफलता का मूल्यांकन करना तथा भारत के भविष्य के संवैधानिक सुधारों के संबंध में ब्रिटिश सरकार को सिफारिशें देना था।
साइमन कमीशन का भारत दौरा
➣ साइमन कमीशन ने भारत की दो बार यात्रा की। पहली यात्रा (फरवरी–मार्च 1928) में आयोग 3 फरवरी 1928 को बंबई (वर्तमान मुंबई) पहुँचा। इस यात्रा में आयोग ने प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं लिए, बल्कि केंद्रीय व प्रांतीय सरकारों तथा अन्य संस्थाओं से लिखित ज्ञापन आमंत्रित किए।
➣ दूसरी यात्रा (अक्टूबर 1928 से अप्रैल 1929) में आयोग ने भारतीय केंद्रीय समिति तथा प्रांतीय समितियों के साथ मिलकर संयुक्त मुक्त सम्मेलन की पद्धति अपनाते हुए पूना, लाहौर, कराची, पेशावर, दिल्ली, लखनऊ, पटना, कलकत्ता, रंगून, मद्रास तथा नागपुर सहित अनेक स्थानों पर साक्ष्य लिए।
➣ दोनों यात्राओं के दौरान आयोग ने प्रशासनिक व्यवस्था, विधान परिषदों के कार्य, द्वैध शासन तथा भारतीयों की शासन में भागीदारी का अध्ययन करने का प्रयास किया।
➣ यद्यपि आयोग का उद्देश्य भारतीय जनमत के आधार पर भविष्य के संवैधानिक सुधारों की रूपरेखा तैयार करना था, किन्तु एक भी भारतीय सदस्य को इसमें शामिल न किए जाने के कारण अधिकांश भारतीय राजनीतिक दलों ने इसके साथ सहयोग करने से इनकार कर दिया। परिणामस्वरूप आयोग को अपने भारत दौरे के दौरान अनेक स्थानों पर तीव्र विरोध और बहिष्कार का सामना करना पड़ा।
➣ जहाँ एक ओर कुछ सरकारी अधिकारी, प्रांतीय प्रशासन तथा सीमित संख्या में कुछ संगठनों – जैसे मद्रास की जस्टिस पार्टी तथा दलित वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में डॉ. भीमराव आंबेडकर – ने आयोग के समक्ष अपने विचार प्रस्तुत किए, वहीं दूसरी ओर अधिकांश राष्ट्रीय नेताओं और संगठनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय प्रतिनिधित्व के बिना गठित किसी भी आयोग को वे वैध नहीं मानते।
साइमन कमीशन का विरोध
➣ आयोग के गठन की घोषणा के साथ ही भारत में व्यापक असंतोष फैल गया, क्योंकि इसमें एक भी भारतीय सदस्य को स्थान नहीं दिया गया था। भारतीय नेताओं का मत था कि भारतीयों की भागीदारी के बिना गठित कोई भी आयोग भारत की वास्तविक आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता।
➣ जब 3 फरवरी 1928 को साइमन कमीशन बंबई (मुंबई) पहुँचा, तो उसका स्वागत काले झंडों और Simon Go Back के नारों से किया गया – यह नारा समाजवादी नेता यूसुफ मेहरअली ने गढ़ा था। अनेक शहरों में हड़तालें आयोजित हुईं, बाजार बंद रहे और हजारों लोगों ने शांतिपूर्ण जुलूस निकालकर विरोध जताया।
➣ आयोग ने जहाँ-जहाँ दौरा किया – बंबई, मद्रास, कलकत्ता, इलाहाबाद, लखनऊ, लाहौर, दिल्ली तथा अन्य प्रमुख नगरों – वहाँ-वहाँ लोगों ने काले झंडे दिखाकर और नारे लगाकर स्पष्ट संदेश दिया कि भारतीय जनता इस आयोग को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े जनविरोधों में से एक बन गया।
लाहौर में विरोध प्रदर्शन एवं लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज
➣ 30 अक्टूबर 1928 को जब साइमन कमीशन लाहौर पहुँचा, तब उसके विरोध में एक विशाल शांतिपूर्ण जुलूस निकाला गया। इस प्रदर्शन का नेतृत्व प्रसिद्ध राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय कर रहे थे।
➣ ब्रिटिश प्रशासन ने इस जुलूस को रोकने का प्रयास किया। उस समय लाहौर के पुलिस अधीक्षक जेम्स ए. स्कॉट के आदेश पर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर निर्मम लाठीचार्ज कर दिया। इस दौरान लाला लाजपत राय को कई गंभीर चोटें आईं।
➣ लाठीचार्ज के बाद भी लाला लाजपत राय ने अपना साहस नहीं खोया। उन्होंने कहा कि मेरे शरीर पर पड़ी प्रत्येक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में एक-एक कील सिद्ध होगी। यह कथन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रसिद्ध नारों में से एक बन गया और देशभर के युवाओं में नई ऊर्जा का संचार हुआ।
➣ प्रारंभ में ऐसा माना गया कि लाला लाजपत राय स्वस्थ हो जाएंगे, किन्तु लाठीचार्ज में लगी गंभीर चोटों के कारण उनकी स्थिति लगातार बिगड़ती गई और अंततः 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया। भारतीय जनता ने उनकी मृत्यु के लिए ब्रिटिश प्रशासन को उत्तरदायी ठहराया।
➣ लाला लाजपत राय की मृत्यु से पूरे देश में गहरा आक्रोश फैल गया। इस घटना ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नई गति दी तथा विशेष रूप से युवाओं और क्रांतिकारियों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अधिक संगठित होकर संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया।
लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव तथा उनके साथियों ने 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में पुलिस अधिकारी जे. पी. सांडर्स की हत्या कर दी। इस घटना का विस्तृत विवरण हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) अध्याय में दिया गया है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रतिक्रिया
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने साइमन कमीशन का सबसे पहले और सबसे संगठित रूप से विरोध किया। कांग्रेस का मुख्य तर्क था कि जिस आयोग को भारत के संवैधानिक भविष्य पर सिफारिशें देनी हैं, उसमें एक भी भारतीय सदस्य का शामिल नहीं किया जाना भारतीयों के राष्ट्रीय स्वाभिमान का अपमान है।
➣ दिसंबर 1927 में आयोजित मद्रास अधिवेशन की अध्यक्षता डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी ने की। इसी अधिवेशन में कांग्रेस ने सर्वसम्मति से साइमन कमीशन के पूर्ण बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया तथा देशवासियों से अपील की कि वे आयोग के साथ किसी भी प्रकार का सहयोग न करें और उसका शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करें।
➣ कांग्रेस का मत था कि भारत के लिए संविधान या संवैधानिक सुधारों की रूपरेखा तैयार करने का अधिकार स्वयं भारतीयों को होना चाहिए। इसी उद्देश्य से उसने ब्रिटिश सरकार को चुनौती देते हुए भारतीय नेताओं द्वारा स्वयं संविधान का प्रारूप तैयार करने का निर्णय लिया।
➣ इसी मद्रास अधिवेशन में एक और ऐतिहासिक घटनाक्रम भी हुआ – जवाहरलाल नेहरू ने (सुभाष चंद्र बोस तथा युवा वामपंथी नेताओं के समर्थन से) कांग्रेस के इतिहास में पहली बार पूर्ण राष्ट्रीय स्वतंत्रता< को दल का अंतिम लक्ष्य घोषित करने वाला प्रस्ताव पारित करवाया। इसके बाद इसे तत्काल पूर्ण रूप से लागू करने के बजाय नेहरू रिपोर्ट में डोमिनियन स्टेटस को अपनाया गया, और अंततः यही पूर्ण स्वराज का संकल्प विधिवत रूप से लाहौर अधिवेशन (दिसंबर 1929) में दोहराया गया, जब कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का भी निर्णय लिया।
➣ इसके परिणामस्वरूप 1928 में सर्वदलीय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसकी नेहरू समिति ने आगे चलकर नेहरू रिपोर्ट (1928) प्रस्तुत की।
मद्रास अधिवेशन (1927) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने साइमन कमीशन के पूर्ण बहिष्कार का निर्णय लिया, और साथ ही पहली बार पूर्ण स्वराज को अपना लक्ष्य घोषित किया। इसी विरोध के परिणामस्वरूप सर्वदलीय सम्मेलन आयोजित हुआ और आगे चलकर नेहरू रिपोर्ट (1928) तैयार की गई।
मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया
➣ साइमन कमीशन के प्रति मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया एक समान नहीं थी। इस समय तक लीग दो प्रमुख गुटों में विभाजित हो चुकी थी।
➣ एक का नेतृत्व मोहम्मद अली जिन्ना कर रहे थे, जबकि दूसरे का नेतृत्व सर मोहम्मद शफी के हाथों में था। दोनों गुटों ने साइमन कमीशन के संबंध में अलग-अलग रुख अपनाया।
➣ मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाले गुट ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के समान साइमन कमीशन का विरोध किया। जिन्ना का मत था कि जिस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य न हो, वह भारत के राजनीतिक भविष्य का निष्पक्ष निर्णय नहीं कर सकता।
➣ इसके विपरीत सर मोहम्मद शफी के नेतृत्व वाले गुट ने साइमन कमीशन के साथ सहयोग करने का निर्णय लिया। उनका मानना था कि यदि मुसलमान आयोग के समक्ष अपनी माँगें और समस्याएँ प्रस्तुत करेंगे, तो भविष्य के संवैधानिक सुधारों में उनके हितों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी।
➣ इस प्रकार साइमन कमीशन ने केवल ब्रिटिश सरकार और भारतीय नेताओं के बीच ही मतभेद उत्पन्न नहीं किए, बल्कि मुस्लिम लीग के भीतर मौजूद राजनीतिक मतभेदों को भी स्पष्ट रूप से सामने ला दिया।
मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाले मुस्लिम लीग गुट ने साइमन कमीशन का बहिष्कार किया, जबकि सर मोहम्मद शफी के गुट ने आयोग के साथ सहयोग करने का निर्णय लिया।
अन्य राजनीतिक दलों एवं संगठनों की प्रतिक्रिया
➣ साइमन कमीशन के प्रति केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग ही नहीं, बल्कि अनेक अन्य राजनीतिक दलों एवं संगठनों ने भी अपनी-अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की।
➣ हिन्दू महासभा, सेंट्रल सिख लीग, भारतीय उदारवादी नेताओं के एक बड़े वर्ग तथा अनेक छात्र एवं श्रमिक संगठनों ने साइमन कमीशन के बहिष्कार का समर्थन किया।
➣ दूसरी ओर जस्टिस पार्टी, मद्रास के कुछ गैर-ब्राह्मण नेताओं तथा कुछ अन्य संगठनों ने आयोग के साथ सहयोग किया। इसी प्रकार डॉ. भीमराव आंबेडकर ने दलित वर्गों (Depressed Classes) के प्रतिनिधि के रूप में आयोग के समक्ष अपनी माँगें प्रस्तुत कीं और पृथक प्रतिनिधित्व की वकालत की – कांग्रेस के पूर्ण-बहिष्कार के विपरीत उनका दृष्टिकोण था कि आयोग के मंच का उपयोग वंचित वर्गों की आवाज़ उठाने के लिए किया जाना चाहिए।
➣ कई देशी रियासतों ने भी आयोग के प्रति अपेक्षाकृत सहयोगात्मक रुख अपनाया, क्योंकि वे भावी संवैधानिक व्यवस्था में अपनी स्थिति सुरक्षित रखना चाहते थे।
➣ इस प्रकार साइमन कमीशन के प्रश्न पर भारतीय राजनीति पूरी तरह एकमत नहीं थी, जो उस समय की भारतीय राजनीति की विविधता को स्पष्ट करता है।
साइमन कमीशन की प्रमुख सिफारिशें
➣ भारत के विभिन्न भागों का दौरा करने तथा अनेक व्यक्तियों, संगठनों और प्रांतीय सरकारों से विचार-विमर्श करने के बाद साइमन कमीशन ने मई 1930 में अपनी दो-खंडीय रिपोर्ट (खंड-I: भारत की स्थिति का सर्वेक्षण, 12 मई 1930। खंड-II: सिफारिशें, 27 मई 1930) ब्रिटिश सरकार को प्रस्तुत की।
➣ ध्यान देने योग्य है कि द्वैध शासन की खामियाँ साइमन कमीशन से पहले ही सामने आ चुकी थीं – 1924 में गठित मडिमन समिति की अल्पमत रिपोर्ट (गैर-सरकारी भारतीय सदस्यों द्वारा) ने पहले ही घोषित कर दिया था कि द्वैध शासन व्यवहार में असफल रहा है।
➣ साइमन कमीशन ने इसी पृष्ठभूमि में अपनी विस्तृत जाँच के आधार पर निम्नलिखित प्रमुख सिफारिशें प्रस्तुत कीं, जो परस्पर एक-दूसरे से जुड़ी हुई थीं।
प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त करने की सिफारिश
➣ साइमन कमीशन ने माना कि भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत प्रांतों में लागू द्वैध शासन की व्यवस्था सफल नहीं रही।
➣ इसके पीछे ठोस व्यावहारिक कारण थे – आरक्षित विषयों (कानून-व्यवस्था, पुलिस, वित्त, सिंचाई) तथा हस्तांतरित विषयों (शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, स्थानीय स्वशासन) का विभाजन प्रायः अतार्किक था – उदाहरणस्वरूप कृषि हस्तांतरित विषय था जबकि उससे सीधे जुड़ी सिंचाई आरक्षित विषय बनी रही।
➣ इसके अतिरिक्त, चूँकि वित्त विभाग आरक्षित विषय था, हस्तांतरित विषयों के भारतीय मंत्रियों को अपने विभागों के लिए धन आवंटन हेतु गवर्नर के कार्यकारी परिषद पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे उन्हें पर्याप्त बजट नहीं मिल पाता था। मंत्रियों को अपने ही विभाग के कर्मचारियों पर पूर्ण नियंत्रण भी प्राप्त नहीं था, और उन्हें एक साथ गवर्नर तथा विधान परिषद – दोनों के प्रति उत्तरदायी रहना पड़ता था, जिससे प्रशासन में भ्रम, टकराव और कार्यकुशलता की कमी उत्पन्न हुई।
➣ इसलिए आयोग ने सिफारिश की कि प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर संपूर्ण प्रांतीय प्रशासन निर्वाचित मंत्रियों को सौंपा जाए, ताकि प्रशासन अधिक उत्तरदायी और प्रभावी बन सके।
प्रांतीय स्वायत्तता का समर्थन
➣ द्वैध शासन की उपरोक्त कमियों के प्रत्यक्ष समाधान के रूप में आयोग ने प्रांतीय स्वायत्तता का समर्थन किया।
➣ इसके अंतर्गत प्रांतीय मंत्रिमंडल को अपने विभागों का संचालन करने तथा प्रांतीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी बनाने की सिफारिश की गई – अर्थात हस्तांतरित/आरक्षित विषयों का भेद समाप्त कर पूरा प्रांतीय प्रशासन ही निर्वाचित सरकार को सौंपा जाए।
➣ यद्यपि आयोग ने प्रांतों में भारतीयों की भूमिका बढ़ाने का समर्थन किया, फिर भी उसने गवर्नर को विशेष परिस्थितियों में व्यापक विवेकाधीन एवं विशेष उत्तरदायित्व संबंधी शक्तियाँ बनाए रखने की भी सिफारिश की। अर्थात् आवश्यकता पड़ने पर गवर्नर निर्वाचित मंत्रियों के निर्णयों में हस्तक्षेप कर सकता था।
➣ भारतीय नेताओं का मत था कि केवल प्रांतीय स्वायत्तता पर्याप्त नहीं है। जब तक केंद्र में भी उत्तरदायी शासन स्थापित नहीं किया जाएगा, तब तक भारत में वास्तविक स्वशासन की स्थापना संभव नहीं होगी।
साइमन कमीशन की प्रांतीय स्वायत्तता संबंधी सिफारिश को आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1935 में स्वीकार किया गया। इसी अधिनियम के अंतर्गत 1937 के प्रांतीय चुनाव हुए, जिनमें कई प्रांतों में कांग्रेस मंत्रिमंडलों का गठन हुआ।
केंद्र में उत्तरदायी शासन न देने की सिफारिश
➣ प्रांतीय स्तर पर उदारता दिखाने के बावजूद, जब बात केंद्र की आई, तो साइमन कमीशन का रुख पूरी तरह बदल गया – उसने केंद्र में उत्तरदायी शासन लागू करने की सिफारिश नहीं की। आयोग का मत था कि भारत की परिस्थितियाँ अभी ऐसी नहीं हैं कि केंद्रीय शासन की पूरी जिम्मेदारी निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधियों को सौंप दी जाए।
➣ आयोग का तर्क था कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में रक्षा, विदेश नीति, वित्त तथा अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण बना रहना आवश्यक है, तथा केंद्रीय कार्यपालिका (गवर्नर-जनरल एवं उसकी कार्यकारी परिषद) मनोनीत सदस्यों के अधीन ही रहनी चाहिए।
➣ भारतीय नेताओं ने इस सिफारिश की तीखी आलोचना की। उनका कहना था कि यदि केंद्र की वास्तविक सत्ता वायसराय और ब्रिटिश सरकार के हाथों में ही रहेगी, तो प्रांतों में दिए गए सीमित अधिकारों का भी विशेष महत्व नहीं रह जाएगा – यह विरोधाभास साइमन कमीशन की सबसे कमजोर कड़ी सिद्ध हुआ।
साइमन कमीशन ने प्रांतों में स्वायत्तता का समर्थन किया, लेकिन केंद्र में उत्तरदायी शासन की सिफारिश नहीं की थी। यही इसकी सबसे अधिक आलोचना किए जाने वाले सुझावों में से एक था।
संघीय शासन व्यवस्था का सुझाव
➣ केंद्र में उत्तरदायी शासन देने से इनकार करने के बावजूद, आयोग ने भारत में भविष्य के लिए एक दीर्घकालिक हल के रूप में संघीय शासन व्यवस्था अपनाने का सुझाव दिया।
➣ आयोग ने सुझाव दिया कि भविष्य की संवैधानिक व्यवस्था में ब्रिटिश भारतीय प्रांतों तथा इच्छुक देशी रियासतों को मिलाकर एक संघ बनाया जाए, जिसके अंतर्गत प्रांतों तथा रियासतों के प्रतिनिधियों की एक व्यापक भारतीय परिषद केंद्रीय स्तर पर परामर्श का कार्य कर सके।
➣ संघ में उत्पन्न होने वाले विवादों के निपटारे हेतु आयोग ने एक संघीय न्यायालय की स्थापना का भी सुझाव दिया, जिसे आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत 1937 में मूर्त रूप दिया गया।
➣ यद्यपि साइमन कमीशन ने संघीय व्यवस्था का सिद्धांत प्रस्तुत किया, लेकिन उसके स्वरूप का विस्तृत ढाँचा बाद में भारत सरकार अधिनियम, 1935 में निर्धारित किया गया। हालाँकि देशी रियासतों के संघ में शामिल न होने के कारण यह संघीय व्यवस्था व्यवहार में पूर्ण रूप से लागू नहीं हो सकी।
भारत में संघीय शासन व्यवस्था की अवधारणा को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने का श्रेय साइमन कमीशन की सिफारिशों को दिया जाता है। बाद में भारत सरकार अधिनियम, 1935 में इसे कानूनी रूप दिया गया।
बर्मा को भारत से अलग करने की सिफारिश
➣ संघीय ढाँचे को अधिक व्यावहारिक व सुसंगत बनाने की दिशा में ही आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बर्मा (वर्तमान म्यांमार) को भारत से अलग करने की भी सिफारिश की, क्योंकि उसकी भौगोलिक स्थिति, प्रशासनिक आवश्यकताएँ तथा सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ भारत से भिन्न थीं।
➣ ब्रिटिश सरकार ने इस सिफारिश को स्वीकार किया और आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत 1 अप्रैल 1937 से बर्मा को भारत से औपचारिक रूप से अलग कर दिया गया।
➣ ध्यान रहे, बर्मा (वर्तमान म्यांमार) प्राचीन भारत का हिस्सा नहीं था। प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध (1824–1826), द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध (1852) और तृतीय आंग्ल-बर्मा युद्ध (1885) के बाद क्रमशः उसके विभिन्न क्षेत्रों पर ब्रिटिश नियंत्रण स्थापित हुआ और 1886 में बर्मा के पूर्ण विलय के बाद उसे ब्रिटिश भारतीय प्रशासन के अंतर्गत रखा गया था। इस प्रकार बर्मा का भारत के साथ संबंध मुख्यतः औपनिवेशिक प्रशासनिक व्यवस्था के कारण था।
1 अप्रैल 1937 को भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत बर्मा (वर्तमान म्यांमार) को भारत से आधिकारिक रूप से अलग कर दिया गया। यह साइमन कमीशन की प्रमुख सिफारिशों में से एक थी, जिसे ब्रिटिश सरकार ने पूर्ण रूप से लागू किया।
मताधिकार के सीमित विस्तार की सिफारिश
➣ प्रशासनिक ढाँचे के साथ-साथ आयोग ने जन-प्रतिनिधित्व के आधार पर भी विचार किया। साइमन कमीशन ने भारत में मताधिकार का कुछ हद तक विस्तार करने की सिफारिश की, किन्तु उसने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का समर्थन नहीं किया।
➣ मतदान का अधिकार संपत्ति, आय, कर-भुगतान, शिक्षा तथा अन्य निर्धारित योग्यताओं के आधार पर ही दिया जाना था।
➣ भारतीय नेताओं ने इस सिफारिश की आलोचना करते हुए कहा कि सीमित मताधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना के अनुरूप नहीं है, और जब तक अधिक से अधिक भारतीयों को मतदान का अधिकार नहीं मिलेगा, प्रांतीय स्वायत्तता जैसी सिफारिशें भी अपना पूरा अर्थ नहीं पा सकेंगी।
साइमन कमीशन ने मताधिकार के सीमित विस्तार की सिफारिश की थी, न कि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की। भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की व्यवस्था स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान (1950) के लागू होने पर स्थापित हुई।
साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली एवं दलित वर्गों हेतु सीट-आरक्षण की सिफारिश
➣ मताधिकार-विस्तार की सिफारिश के साथ ही आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि यह विस्तार 1919 के अधिनियम के अंतर्गत लागू साम्प्रदायिक (पृथक) निर्वाचन प्रणाली के ढाँचे के भीतर ही होगा, जिसे आगे भी जारी रखने की सिफारिश की गई – यद्यपि अधिकांश भारतीय राष्ट्रवादी नेता इसे राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध मानते थे।
➣ आयोग ने दलित वर्गों के लिए भी विधानमंडलों में सीटों के आरक्षण की सिफारिश की, ताकि उनके हितों का समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।
➣ भारतीय नेताओं ने साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली की निरंतरता की आलोचना की, क्योंकि उनका मानना था कि यह हिंदू-मुस्लिम विभाजन को और गहरा करेगी। आगे चलकर यही मुद्दा साम्प्रदायिक पंचाट (कम्युनल अवार्ड, 1932) तथा पूना पैक्ट (1932) जैसे विवादों की पृष्ठभूमि बना।
साइमन कमीशन ने साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली को यथावत रखने तथा दलित वर्गों हेतु सीट-आरक्षण की सिफारिश की – यह सिफारिश आगे चलकर साम्प्रदायिक पंचाट (1932) से जुड़े विवाद की पृष्ठभूमि बनी।
प्रांतीय पुनर्गठन एवं प्रशासनिक सुधार
➣ प्रतिनिधित्व संबंधी सिफारिशों के अतिरिक्त आयोग ने प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन पर भी विचार किया। आयोग के समक्ष सिंध को बंबई प्रेसीडेंसी से अलग कर स्वतंत्र प्रांत बनाने की माँग रखी गई थी।
➣ आयोग ने इस पर ठोस सिफारिश देने के बजाय वित्तीय एवं प्रशासनिक कठिनाइयों का हवाला देते हुए भविष्य में एक सीमा-आयोग के गठन का सुझाव दिया – अंततः सिंध को भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत 1936 में बंबई से अलग कर स्वतंत्र प्रांत बनाया गया।
➣ इसी प्रकार आयोग ने उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत (NWFP) तथा बलूचिस्तान में सुधार कर उन्हें अन्य प्रांतों के समकक्ष दर्जा तथा केंद्रीय विधानमंडल में प्रतिनिधित्व देने की भी सिफारिश की।
➣ प्रशासनिक स्तर पर आयोग ने सुझाव दिया कि लोक सेवा आयोग की भूमिका को और सुदृढ़ किया जाए तथा प्रशासनिक सेवाओं में योग्य एवं प्रशिक्षित अधिकारियों की नियुक्ति सुनिश्चित की जाए। आयोग ने उच्च न्यायालयों तथा न्यायिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने पर भी बल दिया।
➣ रक्षा क्षेत्र में आयोग ने सेना के क्रमिक भारतीयकरण की सिफारिश की, हालाँकि साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि रणनीतिक सुरक्षा की दृष्टि से ब्रिटिश सैन्य टुकड़ियों की उपस्थिति बनी रहनी चाहिए।
➣ साइमन कमीशन की अनेक प्रशासनिक व क्षेत्रीय सिफारिशों का प्रभाव आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1935 में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है – चाहे वह प्रांतीय स्वायत्तता हो, संघीय व्यवस्था हो, या सिंध व बर्मा का पृथक्करण।
साइमन कमीशन की सीमाएँ एवं आलोचना
➣ भारतीय प्रतिनिधित्व का पूर्ण अभाव: आयोग में एक भी भारतीय सदस्य न होना इसकी सबसे बड़ी और मूल कमी थी। जिस आयोग को भारत के संवैधानिक भविष्य पर निर्णय देने थे, उसमें भारतीयों की अनुपस्थिति ने इसकी नैतिक वैधता को प्रारंभ से ही समाप्त कर दिया।
➣ केंद्र में उत्तरदायी शासन से इनकार: प्रांतों में स्वायत्तता की सिफारिश करते हुए भी आयोग ने केंद्र में उत्तरदायी शासन देने से इनकार किया, जिससे वास्तविक स्वशासन का मार्ग अधूरा रह गया।
➣ साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली की निरंतरता: पृथक निर्वाचक-मंडल को बनाए रखने की सिफारिश ने सांप्रदायिक विभाजन को और गहरा किया, जो आगे चलकर विभाजनकारी राजनीति को बढ़ावा देने वाला सिद्ध हुआ।
➣ सीमित एवं क्रमिक मताधिकार: सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को अस्वीकार कर आयोग ने लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के दायरे को अत्यंत सीमित रखा।
➣ सतही एवं दूरस्थ समझ: आयोग के सदस्य भारतीय समाज, संस्कृति व राजनीति से अपरिचित थे और अल्पकालिक दौरों के आधार पर व्यापक सिफारिशें प्रस्तुत कीं, जिससे इनकी व्यावहारिक प्रासंगिकता पर प्रश्न उठे।
➣ राष्ट्रीय आंदोलन में गहरी दरार: मुस्लिम लीग के जिन्ना व शफी गुटों में विभाजन तथा कांग्रेस-लीग के मध्य बढ़ती दूरी ने आगे चलकर सांप्रदायिक राजनीति को बल दिया।
➣ तात्कालिक अप्रासंगिकता: आयोग की रिपोर्ट प्रस्तुत होने (मई 1930) तक भारतीय राजनीति काफी आगे बढ़ चुकी थी – कांग्रेस पूर्ण स्वराज (लाहौर अधिवेशन, दिसंबर 1929) की माँग कर चुकी थी और सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ हो चुका था। इस कारण साइमन रिपोर्ट को अपेक्षाकृत कम महत्व मिला और ब्रिटिश सरकार को आगे गोलमेज सम्मेलनों के माध्यम से सीधे भारतीय नेताओं से वार्ता करनी पड़ी।
संक्षेप में, साइमन कमीशन अपने गठन में ही दोषपूर्ण था – भारतीय प्रतिनिधित्व के अभाव के कारण यह प्रारंभ से ही अपनी नैतिक वैधता खो चुका था, और यही कारण था कि इसकी सिफारिशों से अधिक महत्वपूर्ण इसके विरुद्ध चला बहिष्कार-आंदोलन सिद्ध हुआ।
साइमन कमीशन का महत्व एवं परिणाम
➣ यद्यपि साइमन कमीशन का भारत में व्यापक विरोध हुआ, फिर भी भारतीय संवैधानिक विकास के इतिहास में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। इसका सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि इसने राष्ट्रीय आंदोलन को डोमिनियन स्टेटस की माँग से आगे बढ़ाकर पूर्ण स्वतंत्रता के संकल्प तक पहुँचाने वाली संपूर्ण घटना-श्रृंखला को जन्म दिया।
➣ साइमन कमीशन के बहिष्कार के बाद भारतीय नेताओं ने अनुभव किया कि भारतीय स्वयं भी अपने संविधान की रूपरेखा तैयार कर सकते हैं। इसी भावना से मद्रास अधिवेशन (दिसंबर 1927) में – जहाँ बहिष्कार का प्रस्ताव पारित हुआ – नेहरू ने पहली बार सम्पूर्ण राष्ट्रीय स्वतंत्रता का प्रस्ताव भी पारित करवाया, और परिणामस्वरूप सर्वदलीय सम्मेलन व नेहरू रिपोर्ट (1928) तैयार हुई।
➣ नेहरू रिपोर्ट में प्रस्तावित डोमिनियन स्टेटस से असंतुष्ट होकर इंडिपेंडेंस फॉर इंडिया लीग (अगस्त 1928) का गठन हुआ, जिसने आगे चलकर लाहौर अधिवेशन (1929) के “पूर्ण स्वराज” प्रस्ताव तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) की पृष्ठभूमि तैयार करने में भूमिका निभाई।
➣ दूसरी ओर, नेहरू रिपोर्ट से असहमत होकर मोहम्मद अली जिन्ना ने 1929 में अपने चौदह सूत्र प्रस्तुत किए, जिसके बाद ब्रिटिश सरकार को 1930–32 के बीच गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन करना पड़ा।
➣ अंततः साइमन कमीशन की रिपोर्ट, गोलमेज सम्मेलन तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन के संयुक्त दबाव ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 की पृष्ठभूमि तैयार की।
➣ इस प्रकार, यद्यपि साइमन कमीशन स्वयं भारतीय जनता का विश्वास प्राप्त नहीं कर सका, फिर भी इसके बहिष्कार ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा दी और आगे के सभी संवैधानिक-राजनीतिक घटनाक्रमों की आधारशिला रखी।
साइमन कमीशन (1927) → मद्रास संकल्प (1927) → नेहरू रिपोर्ट व इंडिपेंडेंस फॉर इंडिया लीग (1928) → जिन्ना के चौदह सूत्र (1929) → लाहौर का पूर्ण स्वराज प्रस्ताव (1929) → सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) → गोलमेज सम्मेलन (1930–32) → भारत सरकार अधिनियम, 1935
सिफारिशें एवं उनका आगे क्रियान्वयन (तुलनात्मक तालिका)
➣ नीचे दी गई तालिका साइमन कमीशन की प्रमुख सिफारिशों तथा उनके आगे के क्रियान्वयन/परिणाम को संक्षेप में दर्शाती है, जिससे “किसने क्या सिफारिश की, और उसका क्या हुआ” – यह भ्रम आसानी से दूर हो जाता है।
| सिफारिश | साइमन कमीशन का सुझाव | आगे क्रियान्वयन / परिणाम |
|---|---|---|
| प्रांतों में द्वैध शासन | समाप्त कर पूर्ण उत्तरदायी शासन दिया जाए | 1935 अधिनियम में प्रांतीय स्वायत्तता; 1937 के चुनावों में कांग्रेस मंत्रिमंडल बने |
| केंद्र में उत्तरदायी शासन | अभी नहीं दिया जाए | 1935 अधिनियम में भी केंद्र में पूर्ण उत्तरदायी शासन नहीं मिला; गवर्नर-जनरल की विशेष शक्तियाँ बरकरार रहीं |
| संघीय व्यवस्था | ब्रिटिश प्रांतों + देशी रियासतों का संघ | 1935 अधिनियम में संघीय ढाँचे का प्रावधान, किन्तु रियासतों के असहयोग से व्यवहार में लागू नहीं हो सका |
| बर्मा का पृथक्करण | भारत से अलग प्रशासन | 1 अप्रैल 1937 से 1935 अधिनियम के अंतर्गत औपचारिक रूप से लागू |
| साम्प्रदायिक निर्वाचन | यथावत जारी रखना | 1932 में साम्प्रदायिक पंचाट (Communal Award) व पूना पैक्ट का आधार बना |
| मताधिकार | सीमित एवं क्रमिक विस्तार | सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार भारतीय संविधान (1950) से ही लागू हुआ |
त्वरित पुनरावृत्ति तालिका (Quick Revision)
| बिंदु | तथ्य |
|---|---|
| आधिकारिक नाम | भारतीय सांविधिक आयोग (Indian Statutory Commission) |
| गठन तिथि | 8 नवंबर 1927 (ब्रिटिश प्रधानमंत्री स्टेनली बॉल्डविन की सरकार द्वारा) |
| अध्यक्ष | सर जॉन साइमन |
| सदस्य संख्या | 7 (सभी ब्रिटिश सांसद; एक भी भारतीय नहीं) |
| भारत आगमन | 3 फरवरी 1928, बंबई (दो यात्राएँ: फरवरी–मार्च 1928 तथा अक्टूबर 1928–अप्रैल 1929) |
| प्रसिद्ध नारा | “Simon Go Back” (यूसुफ मेहरअली द्वारा गढ़ा गया) |
| कांग्रेस का बहिष्कार निर्णय | मद्रास अधिवेशन, दिसंबर 1927 (अध्यक्ष: डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी) |
| मुस्लिम लीग | जिन्ना गुट – बहिष्कार; शफी गुट – सहयोग |
| लाहौर लाठीचार्ज | 30 अक्टूबर 1928 (पुलिस अधीक्षक जेम्स ए. स्कॉट) |
| लाला लाजपत राय का निधन | 17 नवंबर 1928 |
| भारतीय केंद्रीय समिति | वायसराय द्वारा गठित समानांतर परामर्शदात्री समिति (आयोग का औपचारिक भाग नहीं) |
| रिपोर्ट प्रस्तुति | मई 1930 (दो खंडों में – खंड-I: 12 मई, खंड-II: 27 मई 1930) |
| प्रमुख सिफारिशें | द्वैध शासन समाप्ति, प्रांतीय स्वायत्तता, केंद्र में उत्तरदायी शासन अस्वीकार, संघीय व्यवस्था, बर्मा पृथक्करण, साम्प्रदायिक निर्वाचन जारी, सीमित मताधिकार |
| आगे की श्रृंखला | नेहरू रिपोर्ट (1928) → जिन्ना के 14 सूत्र (1929) → गोलमेज सम्मेलन (1930–32) → भारत सरकार अधिनियम 1935 |
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