भारत सरकार अधिनियम, 1935 : पृष्ठभूमि, प्रमुख प्रावधान, संघीय योजना और सीमाएँ

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भारत सरकार अधिनियम, 1935 : परिचय

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 ब्रिटिश शासनकाल का सबसे व्यापक, विस्तृत एवं महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिनियम था। इसे ब्रिटिश संसद द्वारा 2 अगस्त 1935 को पारित किया गया।

➣ इस अधिनियम में 321 धाराएँ एवं 10 अनुसूचियाँ थीं, जिसके कारण यह उस समय तक का सबसे बड़ा संवैधानिक अधिनियम माना जाता था।

➣ यह अधिनियम भारत में उत्तरदायी शासन की दिशा में ब्रिटिश सरकार द्वारा किया गया सबसे बड़ा संवैधानिक प्रयास था। इसका उद्देश्य भारतीय प्रशासन को अधिक संगठित बनाना, प्रांतों को स्वायत्तता प्रदान करना तथा भारत में एक अखिल भारतीय संघ की स्थापना करना था।

➣ यद्यपि इस अधिनियम के सभी प्रावधान पूर्ण रूप से लागू नहीं हो सके, फिर भी इसकी अनेक व्यवस्थाएँ भारतीय प्रशासन पर गहरा प्रभाव छोड़ गईं।

➣ प्रांतीय स्वायत्तता, संघीय न्यायालय, संघीय एवं प्रांतीय विषयों का विभाजन, लोक सेवा आयोग जैसी संस्थाओं एवं व्यवस्थाओं का विकास इसी अधिनियम के अंतर्गत हुआ। इसके साथ ही भारतीय रिज़र्व बैंक (स्थापना: 1935) की व्यवस्था भी इस अधिनियम में की गई।

➣ भारतीय संविधान के अनेक प्रावधान प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारत सरकार अधिनियम, 1935 से प्रेरित माने जाते हैं। इसी कारण इसे भारतीय संविधान का आधारभूत दस्तावेज (Blueprint of the Indian Constitution) भी कहा जाता है।

➣ प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से इस विशाल अधिनियम को ब्रिटिश संसद ने दो पृथक अधिनियमों में विभाजित कर दिया – भारत सरकार अधिनियम, 1935 (ब्रिटिश भारत हेतु) तथा बर्मा सरकार अधिनियम, 1935, क्योंकि इसी अधिनियम के अंतर्गत बर्मा को भारत से पृथक किया जाना था।

➣ इस अधिनियम ने पूर्ववर्ती भारत सरकार अधिनियम, 1915 (जो उस समय तक के सभी संवैधानिक प्रावधानों को समेकित करने वाला अधिनियम था) को भी निरसित कर दिया, जिससे यह भारतीय संवैधानिक इतिहास का एक व्यापक एवं समेकित दस्तावेज बन गया।

➣ अधिनियम के अधिकांश प्रावधान, विशेषतः प्रांतीय स्वायत्तता से संबंधित भाग, 1 अप्रैल 1937 से लागू किए गए, जबकि अखिल भारतीय संघ से संबंधित संघीय भाग व्यवहार में कभी लागू नहीं हो सका। इस प्रकार यह अधिनियम स्वतंत्रता तक (1947) भारत का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक दस्तावेज बना रहा।

भारत सरकार अधिनियम, 1935 की पृष्ठभूमि

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 का निर्माण किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि यह मॉन्टेग्यू घोषणा (1917) से प्रारम्भ हुई संवैधानिक सुधारों की प्रक्रिया, भारत सरकार अधिनियम, 1919, साइमन कमीशन (1927), गोलमेज सम्मेलन (1930–32), श्वेत पत्र (1933) तथा ब्रिटिश संसद की संयुक्त प्रवर समिति की सिफारिशों का परिणाम था।

प्रारम्भिक संवैधानिक सुधार (1917–1919)

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 का निर्माण ब्रिटिश सरकार द्वारा लगभग दो दशकों तक किए गए संवैधानिक सुधारों की क्रमिक प्रक्रिया का परिणाम था। इस प्रक्रिया की औपचारिक शुरुआत 20 अगस्त 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा से हुई।

➣ मॉन्टेग्यू घोषणा (1917) में ब्रिटिश सरकार ने पहली बार यह स्वीकार किया कि भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी शासन की स्थापना की जाएगी तथा भारतीयों को प्रशासन में अधिक भागीदारी प्रदान की जाएगी। यद्यपि यह घोषणा केवल एक नीतिगत आश्वासन थी, फिर भी इसने भविष्य के संवैधानिक सुधारों की आधारशिला रखी।

➣ इसके पश्चात मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) प्रकाशित की गई, जिसमें भारत में प्रशासनिक सुधारों के लिए अनेक सुझाव प्रस्तुत किए गए।

➣ इन्हीं सिफारिशों के आधार पर भारत सरकार अधिनियम, 1919 पारित किया गया, जिसके अंतर्गत प्रांतों में द्वैध शासन की व्यवस्था लागू की गई तथा भारतीयों की प्रशासनिक भागीदारी का सीमित विस्तार किया गया।

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 भारतीय संवैधानिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, फिर भी यह भारतीय जनता और राजनीतिक दलों की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सका। सीमित उत्तरदायी शासन, गवर्नर की व्यापक शक्तियाँ तथा केंद्र में ब्रिटिश नियंत्रण के बने रहने के कारण व्यापक असंतोष उत्पन्न हुआ।

➣ परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार को आगे और व्यापक संवैधानिक सुधारों पर विचार करना पड़ा, जिसने अंततः भारत सरकार अधिनियम, 1935 का मार्ग प्रशस्त किया।

मॉन्टेग्यू घोषणा (1917) ने उत्तरदायी शासन का सिद्धांत प्रस्तुत किया, मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) ने उसके लिए सुधारों का खाका दिया और भारत सरकार अधिनियम, 1919 ने उन्हें आंशिक रूप से लागू किया। यही प्रक्रिया आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1935 का आधार बनी।

साइमन कमीशन एवं गोलमेज सम्मेलन (1927–1932)

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 भारतीयों की राजनीतिक आकांक्षाओं को संतुष्ट करने में असफल रहा। परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने आगे के संवैधानिक सुधारों पर विचार करने के उद्देश्य से 1927 में साइमन कमीशन की नियुक्ति की।

➣ यद्यपि आयोग का भारत में व्यापक विरोध हुआ, फिर भी इसकी रिपोर्ट ने भविष्य के संवैधानिक सुधारों की दिशा निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ साइमन कमीशन के बहिष्कार के बाद भारतीय नेताओं ने स्वयं संवैधानिक प्रारूप तैयार करने का प्रयास किया, जिसके परिणामस्वरूप नेहरू रिपोर्ट (1928) प्रस्तुत की गई।

➣ इसके प्रत्युत्तर में मोहम्मद अली जिन्ना ने चौदह सूत्र (1929) प्रस्तुत किए। इन घटनाओं ने भारतीय संविधान के स्वरूप तथा अल्पसंख्यकों के राजनीतिक अधिकारों पर व्यापक बहस को जन्म दिया।

➣ इसके बाद 1930 से 1932 के बीच तीन गोलमेज सम्मेलन आयोजित किए गए, जिनमें भारत के भावी संविधान, संघीय व्यवस्था तथा विभिन्न समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर विचार-विमर्श किया गया। यद्यपि इन सम्मेलनों में कोई अंतिम एवं सर्वसम्मत निर्णय नहीं हो सका, फिर भी इन्हीं विचार-विमर्शों ने आगे के संवैधानिक सुधारों की रूपरेखा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

साम्प्रदायिक अधिनिर्णय (Communal Award, 1932) एवं पूना पैक्ट (1932)

➣ द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर कोई सहमति नहीं बन सकी। परिणामस्वरूप ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने 16 अगस्त 1932 को साम्प्रदायिक अधिनिर्णय (Communal Award) की घोषणा की।

➣ इस अधिनिर्णय के अंतर्गत मुसलमानों, सिखों, यूरोपीयों तथा अन्य अल्पसंख्यकों के साथ-साथ पहली बार दलित वर्गों को भी पृथक निर्वाचन का अधिकार प्रदान किया गया।

➣ महात्मा गांधी ने इसे हिन्दू समाज को विभाजित करने वाला कदम मानते हुए इसके विरोध में यरवदा जेल (पूना) में आमरण अनशन प्रारम्भ किया। इसके परिणामस्वरूप 24 सितम्बर 1932 को गांधीजी तथा डॉ. भीमराव आंबेडकर के मध्य पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर हुए, जिसके तहत दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षित सीटों की व्यवस्था स्वीकार की गई।

➣ यही कारण था कि जब भारत सरकार अधिनियम, 1935 पारित हुआ, तब मुसलमानों, सिखों एवं अन्य समुदायों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था पूर्ववत् जारी रखी गई, जबकि दलित वर्गों को संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षित सीटों के माध्यम से प्रतिनिधित्व दिया गया।

श्वेत पत्र (1933) एवं अधिनियम का पारण

➣ गोलमेज सम्मेलनों में हुए विचार-विमर्श के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने 1933 में श्वेत पत्र प्रकाशित किया, जिसमें प्रस्तावित संवैधानिक सुधारों की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की गई।

➣ श्वेत पत्र के प्रस्तावों का परीक्षण लॉर्ड लिनलिथगो की अध्यक्षता वाली ब्रिटिश संसद की संयुक्त प्रवर समिति द्वारा किया गया। समिति ने विभिन्न पक्षों पर विचार करने के बाद अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं, जिनके आधार पर ब्रिटिश संसद ने 2 अगस्त 1935 को भारत सरकार अधिनियम, 1935 पारित किया।

भारत सरकार अधिनियम, 1935 के उद्देश्य

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 का प्रमुख उद्देश्य भारत में ब्रिटिश शासन की प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना तथा भारतीयों की बढ़ती राजनीतिक आकांक्षाओं को सीमित रूप से संतुष्ट करना था।

➣ ब्रिटिश सरकार भारतीयों को कुछ प्रशासनिक अधिकार देना तो चाहती थी लेकिन साथ ही केंद्रीय सत्ता पर अपना नियंत्रण भी बनाए रखना चाहती थी।

➣ अखिल भारतीय संघ की स्थापना:- इस अधिनियम का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य भारत में अखिल भारतीय संघ की स्थापना करना था, जिसमें ब्रिटिश भारत के प्रांतों तथा देशी रियासतों को एक संघीय ढाँचे के अंतर्गत लाने की परिकल्पना की गई। यद्यपि यह संघ व्यवहार में कभी अस्तित्व में नहीं आ सका, फिर भी यह अधिनियम का प्रमुख संवैधानिक लक्ष्य था।

➣ प्रांतीय स्वायत्तता स्थापित करना:- इस अधिनियम का उद्देश्य प्रांतों में द्वैध शासन की व्यवस्था समाप्त कर निर्वाचित मंत्रियों को प्रशासनिक उत्तरदायित्व सौंपना था, ताकि प्रांतों में उत्तरदायी शासन को बढ़ावा दिया जा सके।

➣ उत्तरदायी शासन का क्रमिक विकास:- ब्रिटिश सरकार भारतीयों की बढ़ती राजनीतिक आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए प्रशासन में उनकी भागीदारी बढ़ाना चाहती थी, किंतु साथ ही केंद्रीय शासन एवं साम्राज्यवादी हितों पर अपना नियंत्रण भी बनाए रखना चाहती थी। इसलिए अधिनियम के माध्यम से उत्तरदायी शासन की दिशा में सीमित संवैधानिक सुधार किए गए।

➣ प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना:- इस अधिनियम का उद्देश्य केंद्र एवं प्रांतों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन करना, प्रशासनिक संस्थाओं को अधिक व्यवस्थित बनाना तथा शासन-व्यवस्था को अधिक सुचारु एवं प्रभावी बनाना था।

➣ ब्रिटिश हितों एवं साम्राज्यवादी नियंत्रण की रक्षा करना:- यद्यपि अधिनियम में भारतीयों को कुछ नए अधिकार प्रदान किए गए, फिर भी गवर्नर जनरल एवं गवर्नरों को व्यापक विवेकाधीन एवं विशेष शक्तियाँ देकर ब्रिटिश सरकार ने रक्षा, वित्त तथा आंतरिक सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपना प्रभाव बनाए रखने का प्रयास किया।

भारत सरकार अधिनियम, 1935 की प्रमुख विशेषताएँ

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 एक अत्यंत विस्तृत एवं जटिल संवैधानिक दस्तावेज था, जिसमें प्रशासन के लगभग हर पक्ष- संघीय ढाँचा, प्रांतीय स्वायत्तता, केंद्र-प्रांत विषयों का विभाजन, विधायिका, न्यायपालिका, वित्तीय व्यवस्था, लोक सेवाएँ तथा प्रांतीय पुनर्गठन– को विस्तार से समाहित किया गया था।

➣ इसकी विशेषताओं को क्रमबद्ध रूप से समझने पर ही इसका वास्तविक महत्व एवं इसकी सीमाएँ स्पष्ट होती हैं। आगे इन सभी विशेषताओं का क्रमिक एवं विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है।

अखिल भारतीय संघ की परिकल्पना

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता अखिल भारतीय संघ (All India Federation) की स्थापना का प्रस्ताव था।

➣ इस संघ में ब्रिटिश भारत के प्रांतों तथा देशी रियासतों को एक संघीय ढाँचे के अंतर्गत संगठित करने की परिकल्पना की गई थी। इसका उद्देश्य पूरे भारत के लिए एक एकीकृत संघीय शासन व्यवस्था स्थापित करना था।

➣ अधिनियम के अनुसार ब्रिटिश भारत के प्रांतों का संघ में सम्मिलित होना अनिवार्य था, जबकि देशी रियासतों के लिए इसमें शामिल होना स्वैच्छिक रखा गया था। रियासतें अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर करके संघ का हिस्सा बन सकती थीं।

➣ ब्रिटिश सरकार ने यह व्यवस्था इसलिए अपनाई ताकि देशी रियासतों की स्वायत्त स्थिति को बनाए रखते हुए उन्हें संघीय ढाँचे में सम्मिलित किया जा सके। संघ की स्थापना तभी संभव थी जब पर्याप्त संख्या में रियासतें इसमें शामिल होने के लिए सहमत होतीं।

➣ किन्तु अधिकांश देशी रियासतों ने संघ में शामिल होने में रुचि नहीं दिखाई। वे अपनी आंतरिक स्वायत्तता एवं विशेषाधिकारों को बनाए रखना चाहती थीं।

➣ परिणामस्वरूप संघ की स्थापना के लिए आवश्यक शर्तें पूरी नहीं हो सकीं और अखिल भारतीय संघ व्यवहार में कभी अस्तित्व में नहीं आ सका।

➣ यद्यपि यह संघ लागू नहीं हो सका, फिर भी भारतीय संविधान के निर्माण के समय संघीय शासन व्यवस्था की अवधारणा को विकसित करने में इस प्रस्ताव का महत्वपूर्ण प्रभाव माना जाता है।

प्रांतीय स्वायत्तता

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 की सबसे महत्वपूर्ण एवं व्यवहार में लागू की गई विशेषताओं में प्रांतीय स्वायत्तता प्रमुख थी।

➣ इस अधिनियम के अंतर्गत भारत सरकार अधिनियम, 1919 द्वारा प्रांतों में लागू द्वैध शासन की व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया तथा प्रांतीय प्रशासन का उत्तरदायित्व निर्वाचित भारतीय मंत्रियों को सौंपा गया।

➣ प्रांतीय स्वायत्तता के अंतर्गत प्रत्येक प्रांत में गवर्नर के अधीन एक मंत्रिपरिषद का गठन किया गया, जो प्रांतीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी थी।

➣ मंत्रिपरिषद को शिक्षा, कृषि, स्थानीय स्वशासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा अन्य प्रांतीय विषयों पर प्रशासन चलाने का अधिकार दिया गया।

➣ यद्यपि प्रांतों में मंत्रियों को पर्याप्त प्रशासनिक अधिकार दिए गए, फिर भी गवर्नर के पास विशेष उत्तरदायित्व तथा विवेकाधीन शक्तियाँ सुरक्षित रखी गईं।

➣ आवश्यकता पड़ने पर गवर्नर मंत्रिपरिषद की सलाह को अस्वीकार कर सकता था तथा ब्रिटिश सरकार के हितों की रक्षा के लिए स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकता था।

➣ इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप 1937 के प्रांतीय चुनाव आयोजित किए गए, जिनमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अधिकांश प्रांतों में सफलता प्राप्त कर अपनी सरकारें बनाई। यह पहली बार था जब भारतीय नेताओं को प्रांतों में अपेक्षाकृत व्यापक प्रशासनिक उत्तरदायित्व प्राप्त हुआ।

➣ इस प्रकार, प्रांतीय स्वायत्तता ने भारत में उत्तरदायी शासन की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की। यद्यपि गवर्नर की व्यापक शक्तियों के कारण यह पूर्ण स्वायत्तता नहीं थी, फिर भी इसने भारतीय नेताओं को प्रशासनिक अनुभव प्रदान किया और स्वतंत्र भारत की प्रांतीय शासन व्यवस्था की आधारभूमि तैयार की।

भारत सरकार अधिनियम, 1935 द्वारा प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता लागू की गई। इसके आधार पर 1937 के प्रांतीय चुनाव हुए, जिनमें कांग्रेस ने कई प्रांतों में अपनी सरकारें बनाई।

केंद्र में द्वैध शासन

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत पहली बार केंद्र में द्वैध शासन लागू करने का प्रावधान किया गया। इससे पूर्व भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत द्वैध शासन केवल प्रांतों में लागू था, जबकि 1935 के अधिनियम ने इसे समाप्त कर केंद्र के लिए प्रस्तावित किया।

➣ इस व्यवस्था के अनुसार केंद्र के विषयों को दो भागों-आरक्षित विषय एवं हस्तांतरित विषय-में विभाजित किया गया। रक्षा, विदेश मामले , धार्मिक एवं जनजातीय क्षेत्र जैसे महत्वपूर्ण विषय गवर्नर जनरल के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखे गए, जबकि शेष हस्तांतरित विषयों का प्रशासन मंत्रिपरिषद द्वारा संचालित किया जाना था।

➣ आरक्षित विषयों का प्रशासन गवर्नर जनरल अपने द्वारा नियुक्त अधिकतम तीन पार्षदों की सहायता से संचालित करता था। ये पार्षद संघीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं थे। दूसरी ओर, हस्तांतरित विषयों का संचालन मंत्रिपरिषद द्वारा किया जाना था, जो संघीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी होती।

➣ यद्यपि अधिनियम में केंद्र में द्वैध शासन की विस्तृत व्यवस्था की गई थी, किन्तु अखिल भारतीय संघ कभी अस्तित्व में नहीं आ सका।

➣ चूँकि संघीय व्यवस्था ही लागू नहीं हुई, इसलिए केंद्र में द्वैध शासन की व्यवस्था भी व्यवहार में कभी लागू नहीं हो सकी। इसके विपरीत प्रांतों में प्रांतीय स्वायत्तता लागू कर दी गई और 1937 के प्रांतीय चुनावों के बाद यह व्यवस्था व्यवहार में भी आ गई।

भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता लागू की। यही 1935 अधिनियम का सबसे महत्वपूर्ण एवं व्यवहार में सफलतापूर्वक लागू किया गया संवैधानिक सुधार था।

गवर्नर एवं गवर्नर जनरल की विशेष शक्तियाँ

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत यद्यपि प्रांतों में प्रांतीय स्वायत्तता लागू की गई, फिर भी गवर्नर जनरल एवं प्रांतीय गवर्नरों को व्यापक विवेकाधीन शक्तियाँ तथा विशेष उत्तरदायित्व प्रदान किए गए। इन शक्तियों के कारण ब्रिटिश सरकार का वास्तविक नियंत्रण प्रशासन पर बना रहा।

➣ गवर्नर जनरल को रक्षा, विदेश मामले, वित्तीय स्थिरता तथा अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा जैसे विषयों में विशेष अधिकार प्राप्त थे। आवश्यकता पड़ने पर वह मंत्रिपरिषद की सलाह को अस्वीकार कर अपने विवेक से निर्णय ले सकता था।

➣ इसी प्रकार, प्रांतीय गवर्नरों को भी कानून-व्यवस्था, वित्तीय मामलों तथा कुछ विशेष परिस्थितियों में व्यापक अधिकार दिए गए थे। यदि वे आवश्यक समझते, तो मंत्रिपरिषद की सलाह के विपरीत कार्य कर सकते थे या किसी विधेयक को स्वीकृति देने से इंकार कर उसे गवर्नर जनरल अथवा ब्रिटिश सम्राट के विचारार्थ सुरक्षित रख सकते थे।

➣ अधिनियम में गवर्नर-जनरल एवं गवर्नरों के विशेष उत्तरदायित्वों को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध किया गया था, जिनके संबंध में वे मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना अपने विवेक से कार्य कर सकते थे। इनमें प्रमुख थे- शांति एवं व्यवस्था की रक्षा, अल्पसंख्यकों के वैध हितों की सुरक्षा, लोक सेवकों के अधिकारों की रक्षा, तथा देशी रियासतों के अधिकारों की सुरक्षा। इसके अतिरिक्त गवर्नर-जनरल को संघीय सरकार की वित्तीय स्थिरता बनाए रखने का भी विशेष उत्तरदायित्व प्राप्त था।

➣ इसके अतिरिक्त, गवर्नर जनरल को अध्यादेश जारी करने, संघीय विधानमंडल को बुलाने, स्थगित करने अथवा भंग करने तथा आपात परिस्थितियों में विशेष प्रशासनिक अधिकारों का प्रयोग करने की शक्ति भी प्राप्त थी।

➣ गवर्नर जनरल एवं गवर्नरों के इस विवेकाधिकार के प्रयोग हेतु ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें पृथक-पृथक अनुदेश-पत्र जारी किए जाते थे, जिनमें यह मार्गदर्शन दिया जाता था कि किन परिस्थितियों में वे अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करें।

➣ इन व्यापक शक्तियों के कारण भारतीय नेताओं ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 की आलोचना की। उनका मत था कि यद्यपि अधिनियम में उत्तरदायी शासन का स्वरूप प्रस्तुत किया गया था, किन्तु वास्तविक सत्ता अभी भी गवर्नर जनरल एवं गवर्नरों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण में ही रही।

आपातकालीन उपबंध

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 की एक अत्यंत महत्वपूर्ण किन्तु प्रायः कम चर्चित विशेषता इसके आपातकालीन उपबंध थे, जो आगे चलकर भारतीय संविधान के आपातकालीन प्रावधानों (अनुच्छेद 352, 356 तथा 360) का सीधा आधार बने।

➣ धारा 102 के अंतर्गत गवर्नर-जनरल यह घोषणा कर सकता था कि युद्ध या बाह्य आक्रमण के कारण भारत की सुरक्षा पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है, और ऐसी घोषणा के बाद संघीय विधानमंडल को प्रांतीय सूची के विषयों पर भी कानून बनाने का अधिकार मिल जाता था।

➣ धारा 93 के अंतर्गत किसी प्रांत के गवर्नर को यह अधिकार था कि यदि वह संतुष्ट हो जाए कि प्रांत का शासन अधिनियम के अनुसार नहीं चलाया जा सकता, तो वह उद्घोषणा द्वारा प्रांतीय शासन की सभी या कुछ शक्तियाँ अपने हाथ में ले सकता था –

➣ अर्थात् निर्वाचित मंत्रिपरिषद एवं विधानमंडल के बिना भी प्रांत पर सीधा शासन कर सकता था। समान प्रावधान धारा 45 के अंतर्गत संघ के स्तर पर भी किया गया था, यद्यपि संघ कभी अस्तित्व में न आने के कारण यह प्रावधान वहाँ व्यवहार में लागू नहीं हो सका।

➣ यह प्रावधान केवल सैद्धांतिक नहीं था। 3 सितंबर 1939 को द्वितीय विश्वयुद्ध के आरंभ होने पर वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने बिना भारतीय नेताओं से परामर्श किए धारा 102 के अंतर्गत आपातकाल की घोषणा करते हुए भारत को युद्ध में शामिल कर दिया।

➣ इसके विरोध में कांग्रेस मंत्रिपरिषदों ने नवंबर 1939 में सामूहिक रूप से त्यागपत्र दे दिया, जिसके पश्चात मद्रास, बंबई, संयुक्त प्रांत, बिहार, उड़ीसा सहित सात प्रांतों के गवर्नरों ने धारा 93 के अंतर्गत उद्घोषणा जारी कर प्रांतों का प्रत्यक्ष शासन अपने हाथ में ले लिया।

1935 अधिनियम की धारा 45 एवं 93 ही आगे चलकर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 (संवैधानिक तंत्र की विफलता) का आधार बनीं, जबकि धारा 102 अनुच्छेद 352 (युद्ध/बाह्य आक्रमण की आपातस्थिति) का आधार बनी।

संघीय, प्रांतीय एवं समवर्ती सूचियाँ

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि पहली बार शासन के विषयों को संघीय सूची, प्रांतीय सूची तथा समवर्ती सूची-तीन भागों में विभाजित किया गया। इसका उद्देश्य केंद्र एवं प्रांतों के बीच प्रशासनिक एवं विधायी शक्तियों का स्पष्ट विभाजन करना था।

➣ अधिनियम के अंतर्गत संघीय सूची में 59 विषय, प्रांतीय सूची में 54 विषय तथा समवर्ती सूची में 36 विषय शामिल किए गए।

➣ इसके अतिरिक्त जो विषय किसी भी सूची में सम्मिलित नहीं थे, उन्हें अवशिष्ट विषय माना गया और उन पर निर्णय लेने का अधिकार गवर्नर जनरल को प्रदान किया गया।

➣ संघीय सूची में राष्ट्रीय महत्व के विषय, जैसे रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा, डाक एवं तार, रेलवे तथा सीमा शुल्क सम्मिलित थे। इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र को प्राप्त था।

➣ प्रांतीय सूची में स्थानीय प्रशासन से संबंधित विषय, जैसे पुलिस, लोक व्यवस्था, कृषि, स्थानीय स्वशासन, जनस्वास्थ्य तथा सिंचाई आदि रखे गए। इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार संबंधित प्रांतीय विधानमंडलों को दिया गया।

➣ समवर्ती सूची में ऐसे विषय रखे गए जिन पर केंद्र एवं प्रांत दोनों कानून बना सकते थे। इनमें फौजदारी कानून, दीवानी प्रक्रिया, विवाह, ट्रस्ट, श्रम संबंधी विषय आदि प्रमुख थे। यदि किसी समवर्ती विषय पर केंद्र एवं प्रांत के कानूनों में टकराव होता, तो सामान्यतः केंद्रीय कानून को प्राथमिकता प्राप्त होती।

सूची विषयों की संख्या प्रमुख विषय
संघीय सूची 59 रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा, रेलवे, डाक एवं तार
प्रांतीय सूची 54 पुलिस, कृषि, जनस्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन, सिंचाई
समवर्ती सूची 36 फौजदारी कानून, विवाह, ट्रस्ट, श्रम, दीवानी प्रक्रिया

भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने पहली बार विषयों को तीन सूचियों–संघीय (59), प्रांतीय (54) एवं समवर्ती (36)-में विभाजित किया। अवशिष्ट विषयों पर निर्णय लेने का अधिकार गवर्नर जनरल को प्राप्त था।

प्रांतों का पुनर्गठन एवं द्विसदनीय विधानमंडल

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत ब्रिटिश भारत के प्रांतों का आंशिक पुनर्गठन भी किया गया। सिंध को बम्बई प्रांत से पृथक कर एक नया प्रांत बनाया गया तथा उड़ीसा (ओडिशा) को बिहार से अलग कर स्वतंत्र प्रांत का दर्जा दिया गया।

➣ इस पुनर्गठन के पश्चात ब्रिटिश भारत में कुल 11 गवर्नर के प्रांत हो गए- मद्रास, बम्बई, बंगाल, संयुक्त प्रांत, पंजाब, बिहार, केंद्रीय प्रांत, असम, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत (NWFP), उड़ीसा तथा सिंध। इन सभी 11 प्रांतों में प्रांतीय स्वायत्तता लागू की गई।

➣ इनके अतिरिक्त कुछ छोटे क्षेत्र मुख्य आयुक्त के प्रांत कहलाते थे – जैसे दिल्ली, अजमेर-मेरवाड़ा, कुर्ग (Coorg) तथा ब्रिटिश बलूचिस्तान – जो 11 गवर्नर-प्रांतों में शामिल नहीं थे तथा सीधे गवर्नर-जनरल (केंद्र सरकार) के नियंत्रण में रहे, इसलिए इनमें प्रांतीय स्वायत्तता लागू नहीं हुई।

➣ छह प्रमुख प्रांतों- बम्बई, मद्रास, बंगाल, बिहार, असम तथा संयुक्त प्रांत में द्विसदनीय प्रांतीय विधानमंडल (विधान परिषद एवं विधान सभा) की व्यवस्था की गई, जबकि शेष प्रांतों में एकसदनीय विधानमंडल ही बना रहा।

संघीय विधानमंडल एवं निर्वाचन व्यवस्था

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत भारत में एक द्विसदनीय संघीय विधानमंडल की स्थापना का प्रावधान किया गया। इसमें राज्य परिषद को उच्च सदन तथा संघीय सभा को निम्न सदन के रूप में प्रस्तावित किया गया था।

➣ राज्य परिषद एक स्थायी सदन था, जिसके सदस्यों का कार्यकाल निश्चित अवधि का होता था तथा प्रत्येक तीन वर्ष बाद एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होने थे। दूसरी ओर, संघीय सभा का कार्यकाल सामान्यतः पाँच वर्ष निर्धारित किया गया था।

➣ संघीय विधानमंडल में ब्रिटिश भारतीय प्रांतों तथा देशी रियासतों दोनों को प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की गई थी। ब्रिटिश भारतीय प्रांतों के प्रतिनिधि निर्वाचित होने थे, जबकि देशी रियासतों के प्रतिनिधियों को संबंधित शासकों द्वारा मनोनीत किया जाना था।

➣ इस अधिनियम के अंतर्गत सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की व्यवस्था नहीं की गई थी। मतदान का अधिकार केवल उन व्यक्तियों को प्राप्त था जो संपत्ति, कर भुगतान, शिक्षा अथवा अन्य निर्धारित योग्यताओं को पूरा करते थे। परिणामस्वरूप भारत की कुल जनसंख्या का केवल लगभग 14 प्रतिशत भाग ही मताधिकार का पात्र था।

➣ मताधिकार की योग्यताएँ तथा विस्तार की सीमा लॉर्ड लोथियन की अध्यक्षता वाली भारतीय मताधिकार समिति (Indian Franchise Committee/Lothian Committee, 1932) की सिफारिशों पर आधारित थी।

➣ समिति को साइमन कमीशन द्वारा सुझाए गए न्यूनतम 10% तथा गोलमेज सम्मेलन द्वारा सुझाए गए अधिकतम 25% के बीच मताधिकार का विस्तार करने का कार्य सौंपा गया था; उसने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को उस समय अव्यावहारिक मानते हुए इसकी सिफारिश नहीं की।

➣ अधिनियम के अंतर्गत विभिन्न समुदायों के लिए पृथक निर्वाचन तथा आरक्षित प्रतिनिधित्व की व्यवस्था भी जारी रखी गई।

➣ साम्प्रदायिक अधिनिर्णय (1932) के आधार पर मुसलमानों, सिखों, यूरोपीयों, भारतीय ईसाइयों तथा एंग्लो-इंडियन समुदायों को पृथक निर्वाचन क्षेत्र प्रदान किए गए, जबकि दलित वर्गों को पूना पैक्ट के अनुसार संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षित सीटें दी गईं। इसके अतिरिक्त महिलाओं तथा श्रमिक वर्ग के लिए भी पृथक आरक्षित सीटों की व्यवस्था की गई।

➣ यद्यपि संघीय विधानमंडल की संरचना का विस्तृत प्रावधान किया गया था, लेकिन अखिल भारतीय संघ की स्थापना न होने के कारण यह व्यवस्था पूर्ण रूप से व्यवहार में लागू नहीं हो सकी।

भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने द्विसदनीय संघीय विधानमंडल की परिकल्पना की, किन्तु अखिल भारतीय संघ के अस्तित्व में न आने के कारण यह पूर्ण रूप से लागू नहीं हो सका। इस अधिनियम में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार नहीं था और केवल लगभग 14% जनसंख्या को ही मतदान का अधिकार प्राप्त था।

संघीय न्यायालय (Federal Court)

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत भारत में पहली बार संघीय न्यायालय की स्थापना का प्रावधान किया गया।

➣ इस प्रावधान के आधार पर 1 अक्टूबर 1937 को दिल्ली में संघीय न्यायालय की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य केंद्र एवं प्रांतों के मध्य उत्पन्न संवैधानिक विवादों का निपटारा करना तथा संघीय कानूनों की व्याख्या करना था।

➣ संघीय न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा अधिकतम छह अन्य न्यायाधीश नियुक्त किए जा सकते थे। इनकी नियुक्ति ब्रिटिश सम्राट द्वारा की जाती थी। संघीय न्यायालय के प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर मॉरिस ग्वायर (Sir Maurice Gwyer) थे।

➣ इस न्यायालय को मुख्यतः मूल क्षेत्राधिकार, अपीलीय क्षेत्राधिकार तथा परामर्श संबंधी क्षेत्राधिकार प्रदान किए गए थे। यह केंद्र एवं प्रांतों के बीच विवादों की सुनवाई कर सकता था तथा कुछ मामलों में उच्च न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपील भी सुन सकता था।

➣ यद्यपि संघीय न्यायालय भारत का सर्वोच्च न्यायालय था, फिर भी उसके निर्णयों के विरुद्ध अंतिम अपील का अधिकार लंदन स्थित प्रिवी काउंसिल के पास सुरक्षित था। इसलिए इसे पूर्णतः स्वतंत्र सर्वोच्च न्यायालय नहीं माना जाता था।

➣ स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने पर संघीय न्यायालय के स्थान पर भारत का सर्वोच्च न्यायालय स्थापित किया गया।

भारतीय रिज़र्व बैंक

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत प्रस्तावित नई संघीय वित्तीय व्यवस्था के प्रभावी संचालन के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को केंद्रीय बैंक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की गई।

➣ यद्यपि RBI की स्थापना भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के अंतर्गत हुई थी, लेकिन इसने 1935 के अधिनियम द्वारा स्थापित वित्तीय ढाँचे को संचालित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

➣ भारतीय रिज़र्व बैंक ने 1 अप्रैल 1935 से अपना कार्य प्रारम्भ किया। इसका प्रमुख उद्देश्य मुद्रा एवं ऋण प्रणाली का नियमन करना, मुद्रा जारी करना, बैंकों का बैंक के रूप में कार्य करना तथा सरकार का वित्तीय सलाहकार एवं बैंकर बनना था।

➣ RBI को देश की मौद्रिक स्थिरता बनाए रखने, विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन करने तथा वित्तीय प्रणाली को सुचारु रूप से संचालित करने की जिम्मेदारी भी दी गई। इससे भारत की केंद्रीय बैंकिंग व्यवस्था अधिक संगठित एवं प्रभावी बनी।

➣ प्रारम्भ में भारतीय रिज़र्व बैंक एक शेयरधारक संस्था था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1 जनवरी 1949 को इसका राष्ट्रीयकरण कर दिया गया और यह पूर्णतः भारत सरकार के स्वामित्व में आ गया।

लोक सेवा आयोग एवं अन्य प्रावधान

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत लोक सेवाओं को अधिक संगठित एवं निष्पक्ष बनाने के लिए संघीय लोक सेवा आयोग, प्रांतीय लोक सेवा आयोग तथा आवश्यकता पड़ने पर संयुक्त लोक सेवा आयोग की व्यवस्था की गई। इन आयोगों का उद्देश्य योग्य अभ्यर्थियों का चयन करना तथा लोक सेवाओं में निष्पक्ष भर्ती सुनिश्चित करना था।

➣ इस अधिनियम के अंतर्गत महालेखा परीक्षक के पद को भी वैधानिक आधार प्रदान किया गया। उसका प्रमुख दायित्व सरकारी आय-व्यय का लेखा परीक्षण करना तथा सार्वजनिक वित्तीय प्रशासन में उत्तरदायित्व एवं पारदर्शिता बनाए रखना था।

➣ अधिनियम में रेलवे, रिज़र्व बैंक तथा अन्य महत्वपूर्ण प्रशासनिक संस्थाओं के कार्यों को अधिक सुव्यवस्थित बनाने के लिए भी विभिन्न प्रावधान किए गए, जिससे ब्रिटिश भारत की प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक संगठित स्वरूप प्रदान किया जा सके।

➣ इसी क्रम में रेलवे प्रशासन को मंत्रियों एवं पार्षदों के प्रत्यक्ष नियंत्रण से मुक्त रखने के लिए एक संघीय रेलवे प्राधिकरण की व्यवस्था की गई, जिसमें 7 सदस्य होने थे (इसका विवरण अधिनियम की आठवीं अनुसूची में दिया गया था)।

➣ यद्यपि इन संस्थाओं का गठन प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया था, फिर भी इन पर अंतिम नियंत्रण ब्रिटिश सरकार एवं गवर्नर जनरल के माध्यम से बना रहा। इसलिए भारतीय नेताओं ने इन्हें पूर्णतः स्वायत्त संस्थाएँ नहीं माना।

भारत परिषद (India Council) की समाप्ति

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1858 के अंतर्गत लंदन में भारत सचिव (Secretary of State for India) की सहायता के लिए एक सलाहकार निकाय, भारत परिषद (Council of India), गठित किया गया था।

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने इस भारत परिषद को समाप्त कर दिया तथा उसके स्थान पर भारत सचिव की सहायता हेतु कुछ सलाहकारों की नियुक्ति का प्रावधान किया, जिससे भारत सचिव की शक्तियाँ अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र एवं लचीली हो गईं।

बर्मा (म्यांमार) एवं अदन को भारत से पृथक करना

➣ तृतीय आंग्ल-बर्मी युद्ध (1885) के बाद ब्रिटिश सरकार ने बर्मा (वर्तमान म्यांमार) को अपने अधीन कर लिया था। 1886 से उसका प्रशासन ब्रिटिश भारतीय प्रशासन के साथ संचालित किया जाने लगा। इस कारण प्रशासनिक दृष्टि से बर्मा, ब्रिटिश भारत का भाग माना जाता था।

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत यह निर्णय लिया गया कि बर्मा का प्रशासन भारत से पृथक किया जाए। इसके आधार पर 1 अप्रैल 1937 से बर्मा को ब्रिटिश भारत से अलग कर एक पृथक ब्रिटिश उपनिवेश बना दिया गया।

➣ ब्रिटिश सरकार का तर्क था कि भारत और बर्मा की भौगोलिक, प्रशासनिक तथा राजनीतिक परिस्थितियाँ भिन्न थीं। इसलिए दोनों क्षेत्रों का पृथक प्रशासन अधिक सुविधाजनक एवं प्रभावी होगा। हालाँकि, आधिकारिक रूप से इसे मुख्यतः प्रशासनिक सुविधा के आधार पर उचित ठहराया गया था।

➣ बर्मा के पृथक होने के बाद उसका प्रशासन, वित्त तथा विधायी व्यवस्था भारत से स्वतंत्र रूप से संचालित होने लगी। इसके साथ ही भारतीय विधानमंडलों का बर्मा से संबंधित विषयों पर अधिकार समाप्त हो गया। बाद में 4 जनवरी 1948 को बर्मा ब्रिटेन से पूर्णतः स्वतंत्र हो गया और एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ।

➣ इसी अधिनियम के अंतर्गत अदन (Aden), जो पूर्व में बम्बई प्रेसीडेंसी के अधीन प्रशासित होता था, को भी 1937 में भारत से पृथक कर एक स्वतंत्र ब्रिटिश क्राउन कॉलोनी बना दिया गया तथा इसका प्रशासन सीधे ब्रिटिश उपनिवेश कार्यालय के अधीन कर दिया गया।

बर्मा प्राचीन भारत का अभिन्न भाग नहीं था। 1886 से उसका प्रशासन ब्रिटिश भारतीय प्रशासन के अंतर्गत संचालित किया गया। 1937 में बर्मा के साथ-साथ अदन को भी भारत से पृथक कर दिया गया।

निष्कर्षतः
▪ भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने एक साथ अखिल भारतीय संघ, प्रांतीय स्वायत्तता, केंद्र में द्वैध शासन, त्रिस्तरीय विषय-सूचियाँ, द्विसदनीय संघीय एवं प्रांतीय विधानमंडल, संघीय न्यायालय, रिज़र्व बैंक, लोक सेवा आयोग, महालेखा परीक्षक जैसी संस्थाओं की स्थापना की तथा भारत परिषद की समाप्ति एवं प्रांतों के पुनर्गठन (सिंध, उड़ीसा, बर्मा, अदन) जैसे व्यापक परिवर्तन किए।
▪ इनमें से प्रांतीय स्वायत्तता ही एकमात्र ऐसी विशेषता थी जो पूर्ण रूप से व्यवहार में लागू हो सकी, जबकि अखिल भारतीय संघ पर आधारित शेष अनेक व्यवस्थाएँ (केंद्र में द्वैध शासन, संघीय विधानमंडल का पूर्ण स्वरूप) कागजों तक ही सीमित रह गईं।

भारत सरकार अधिनियम, 1919 एवं 1935 में अंतर

आधार भारत सरकार अधिनियम, 1919 भारत सरकार अधिनियम, 1935
आधार मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों पर आधारित साइमन कमीशन, गोलमेज सम्मेलन, श्वेत पत्र एवं संयुक्त प्रवर समिति की सिफारिशों पर आधारित
द्वैध शासन (Dyarchy) प्रांतों में लागू किया गया प्रांतों से समाप्त कर केंद्र में प्रस्तावित किया गया
प्रांतीय स्वायत्तता प्रांतों को वास्तविक स्वायत्तता प्राप्त नहीं थी प्रांतों में प्रांतीय स्वायत्तता लागू की गई
संघीय व्यवस्था कोई संघीय व्यवस्था नहीं अखिल भारतीय संघ (All India Federation) की परिकल्पना की गई
विषयों का विभाजन केंद्र एवं प्रांतों के बीच स्पष्ट तीन सूचियाँ नहीं थीं संघीय, प्रांतीय एवं समवर्ती सूची में विषयों का विभाजन किया गया
संघीय न्यायालय कोई प्रावधान नहीं संघीय न्यायालय की स्थापना का प्रावधान किया गया
लोक सेवा आयोग केवल केंद्रीय लोक सेवा आयोग का प्रावधान संघीय, प्रांतीय एवं संयुक्त लोक सेवा आयोग की व्यवस्था
विधानमंडल केंद्र में सीमित विधायी सुधार द्विसदनीय संघीय विधानमंडल की व्यवस्था
मताधिकार अत्यंत सीमित मताधिकार मतदाताओं की संख्या बढ़ाई गई, परंतु सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार नहीं दिया गया
बर्मा ब्रिटिश भारतीय प्रशासन का भाग 1 अप्रैल 1937 से बर्मा को भारत से पृथक कर दिया गया
गवर्नर एवं गवर्नर जनरल व्यापक शक्तियाँ प्राप्त थीं विशेष उत्तरदायित्व एवं विवेकाधीन शक्तियाँ और अधिक स्पष्ट रूप से सुरक्षित रखी गईं
महत्व उत्तरदायी शासन की दिशा में प्रारम्भिक कदम ब्रिटिश काल का सबसे व्यापक संवैधानिक अधिनियम तथा भारतीय संविधान का प्रमुख आधार

भारत सरकार अधिनियम, 1935 की सीमाएँ

➣ अखिल भारतीय संघ कभी अस्तित्व में नहीं आ सका:- यद्यपि अधिनियम में अखिल भारतीय संघ की परिकल्पना की गई थी, लेकिन देशी रियासतों के लिए इसमें सम्मिलित होना स्वैच्छिक रखा गया। अधिकांश रियासतों ने संघ में शामिल होने से इंकार कर दिया, जिसके कारण संघीय व्यवस्था कभी लागू नहीं हो सकी।

➣ प्रस्तावित संघ का स्वयं अलोकतांत्रिक स्वरूप:- यदि अखिल भारतीय संघ अस्तित्व में आ भी जाता, तब भी वह पूर्णतः लोकतांत्रिक नहीं होता, क्योंकि संघीय विधानमंडल में देशी रियासतों के प्रतिनिधि जनता द्वारा निर्वाचित नहीं, बल्कि संबंधित शासकों द्वारा मनोनीत किए जाने थे। इस प्रकार निरंकुश एवं अनुत्तरदायी रियासती शासकों के मनोनीत प्रतिनिधियों को निर्वाचित ब्रिटिश भारतीय प्रतिनिधियों के समकक्ष रखा गया था, जो संघ के लोकतांत्रिक चरित्र को कमजोर करता।

➣ गवर्नर जनरल एवं गवर्नरों की अत्यधिक विवेकाधीन शक्तियाँ:- अधिनियम के अंतर्गत गवर्नर जनरल तथा प्रांतीय गवर्नरों को व्यापक विवेकाधीन एवं विशेष उत्तरदायित्व संबंधी शक्तियाँ प्रदान की गई थीं। परिणामस्वरूप मंत्रिपरिषद की शक्तियाँ सीमित रहीं और वास्तविक नियंत्रण ब्रिटिश सरकार के हाथों में ही बना रहा।

➣ विधानमंडल का वित्तीय नियंत्रण सीमित रहा:- गवर्नर जनरल को अपने विवेकाधीन कार्यों (जैसे रक्षा, प्रशासनिक सेवाएँ) से संबंधित व्यय को स्वयं प्रमाणित (Certify) करने की शक्ति प्राप्त थी। ऐसे व्यय पर विधानमंडल को मतदान का अधिकार नहीं था, और यदि विधानमंडल किसी व्यय को अस्वीकार भी कर देता, तो भी गवर्नर जनरल उसे प्रमाणित कर लागू करवा सकता था। इससे बजट पर निर्वाचित प्रतिनिधियों का नियंत्रण अत्यंत सीमित रह गया।

➣ सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का अभाव:- इस अधिनियम के अंतर्गत सभी वयस्क नागरिकों को मतदान का अधिकार नहीं दिया गया। मताधिकार केवल सीमित संख्या में उन व्यक्तियों को प्राप्त था जो संपत्ति, कर अथवा शिक्षा संबंधी निर्धारित योग्यताओं को पूरा करते थे।

➣ सांप्रदायिक निर्वाचन व्यवस्था जारी रही:- अधिनियम में पृथक निर्वाचन की व्यवस्था समाप्त नहीं की गई, बल्कि साम्प्रदायिक अधिनिर्णय (1932) के आधार पर इसे और अधिक समुदायों (दलित वर्ग, महिलाएँ, श्रमिक वर्ग) तक विस्तारित कर दिया गया। विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक समुदायों के लिए अलग निर्वाचन व्यवस्था बनाए रखने से सांप्रदायिक राजनीति को और बढ़ावा मिला।

➣ संविधान संशोधन का अधिकार भारतीयों को नहीं था:- इस अधिनियम में संशोधन करने का अधिकार ब्रिटिश संसद के पास सुरक्षित था। भारतीय विधानमंडलों को अपने संवैधानिक ढाँचे में परिवर्तन करने का अधिकार प्राप्त नहीं था।

➣ अत्यंत विस्तृत एवं दुरूह विधायी दस्तावेज:- 321 धाराओं एवं 10 अनुसूचियों वाला यह अधिनियम इतना विस्तृत, जटिल एवं तकनीकी था कि व्यवहार में इसे समझना तथा सुचारु रूप से लागू करना प्रशासकों के लिए भी कठिन कार्य था। इसकी अत्यधिक जटिलता के कारण भी समकालीन आलोचकों ने इसे एक अव्यावहारिक संवैधानिक दस्तावेज बताया।

भारतीय नेताओं एवं राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया

कांग्रेस की प्रतिक्रिया

➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 का पूर्णतः स्वागत नहीं किया। उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में थे और 1936 में कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए।

➣ कांग्रेस का मत था कि यह अधिनियम भारत को वास्तविक उत्तरदायी शासन अथवा पूर्ण स्वशासन प्रदान नहीं करता, बल्कि ब्रिटिश नियंत्रण को बनाए रखता है।

➣ कांग्रेस ने विशेष रूप से गवर्नर जनरल तथा प्रांतीय गवर्नरों को प्रदान की गई व्यापक विवेकाधीन शक्तियों की आलोचना की।

➣ उसका मानना था कि जब तक अंतिम निर्णय का अधिकार ब्रिटिश अधिकारियों के पास रहेगा, तब तक निर्वाचित मंत्रिपरिषद वास्तविक रूप से उत्तरदायी शासन स्थापित नहीं कर सकेगी।

➣ कांग्रेस ने पृथक निर्वाचन तथा सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था का भी विरोध किया। उसके अनुसार इससे भारतीय समाज में सांप्रदायिक विभाजन और गहरा होगा तथा राष्ट्रीय एकता प्रभावित होगी।

➣ अप्रैल 1936 में आयोजित लखनऊ अधिवेशन की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने अधिनियम को अस्वीकार करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया कि वह इसे न तो स्वीकार करेगी, न इससे सहयोग करेगी, बल्कि इसका विधानमंडलों के भीतर तथा बाहर दोनों जगह मुकाबला करेगी ताकि इसे समाप्त किया जा सके। इसी अधिवेशन में 1937 के प्रांतीय चुनावों में भाग लेने का निर्णय लिया गया, यद्यपि चुनाव जीतने पर मंत्रिपद स्वीकार करने अथवा न करने का प्रश्न बाद के लिए स्थगित रखा गया।

➣ इसके बाद दिसंबर 1936 में महाराष्ट्र के एक गाँव फ़ैज़पुर में आयोजित अधिवेशन (यह कांग्रेस का किसी गाँव में आयोजित पहला अधिवेशन था, अध्यक्ष: जवाहरलाल नेहरू) में लखनऊ के निर्णय को दोहराते हुए एक व्यापक कृषक कार्यक्रम अपनाया गया, जिसने ग्रामीण मतदाताओं के बीच कांग्रेस के जनाधार को और मजबूत किया।

➣ कांग्रेस का मत था कि विधानसभाओं में पहुँचकर जनता के हितों की रक्षा की जा सकती है तथा ब्रिटिश शासन की सीमाओं को व्यावहारिक रूप से उजागर किया जा सकता है।

➣ 1937 के प्रांतीय चुनावों में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त करने के बाद कांग्रेस ने प्रारंभ में गवर्नरों की विशेष शक्तियों के कारण सरकार बनाने में संकोच किया।

➣ किंतु जब वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने आश्वासन दिया कि गवर्नर सामान्य परिस्थितियों में अपने विशेषाधिकारों का दुरुपयोग नहीं करेंगे, तब कांग्रेस ने जुलाई 1937 से विभिन्न प्रांतों में अपनी मंत्रिपरिषदों का गठन प्रारंभ किया।

➣ इस प्रकार कांग्रेस ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 को अंतिम संवैधानिक समाधान के रूप में कभी स्वीकार नहीं किया। उसने इसे अधूरा एवं अपूर्ण सुधार मानते हुए एक ओर राजनीतिक संघर्ष जारी रखा और दूसरी ओर उपलब्ध संवैधानिक संस्थाओं का उपयोग जनता के हित में करने की नीति अपनाई।

इस प्रकार लखनऊ अधिवेशन (1936) में कांग्रेस ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 की आलोचना की, जबकि फ़ैज़पुर अधिवेशन (1936) में 1937 के प्रांतीय चुनावों में भाग लेने का निर्णय लिया। चुनावों में सफलता के बाद जुलाई 1937 से कांग्रेस ने विभिन्न प्रांतों में अपनी सरकारों का गठन किया।

मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया

➣ मुस्लिम लीग ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 का मिश्रित दृष्टिकोण से मूल्यांकन किया।

➣ मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में लीग ने पृथक निर्वाचन तथा अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था का स्वागत किया, क्योंकि वह इन्हें मुसलमानों के राजनीतिक हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक मानती थी।

➣ 1936 में आयोजित मुस्लिम लीग के बम्बई अधिवेशन में जिन्ना ने घोषणा की कि लीग भारत सरकार अधिनियम, 1935 को अंतिम संवैधानिक समाधान नहीं मानती, फिर भी वह इसके अंतर्गत होने वाले चुनावों में भाग लेकर मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करेगी।

➣ मुस्लिम लीग का मत था कि प्रांतीय स्वायत्तता से मुस्लिम-बहुल प्रांतों में उसकी राजनीतिक स्थिति मजबूत होगी। इसलिए उसने प्रांतीय स्वायत्तता के प्रावधान का सामान्यतः समर्थन किया।

➣ दूसरी ओर, लीग प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ (All India Federation) से संतुष्ट नहीं थी। उसका मानना था कि केंद्र में मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक अधिकारों तथा प्रतिनिधित्व की पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई थी।

➣ 1937 के प्रांतीय चुनावों में मुस्लिम लीग ने इस अधिनियम के अंतर्गत भाग लिया, लेकिन अधिकांश प्रांतों में उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली।

➣ विशेष रूप से संयुक्त प्रांत में कांग्रेस द्वारा लीग के साथ गठबंधन सरकार न बनाए जाने से जिन्ना को यह विश्वास हो गया कि मुसलमानों के हितों की रक्षा केवल मुस्लिम लीग ही कर सकती है।

➣ चुनावों में अपेक्षित सफलता न मिलने के बाद मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग के संगठन को पुनर्गठित किया और पूरे भारत में मुसलमानों को लीग के साथ जोड़ने का अभियान प्रारम्भ किया। आगे चलकर इसी प्रक्रिया ने लाहौर प्रस्ताव (1940) तथा पाकिस्तान की माँग के लिए आधार तैयार किया।

➣ इस प्रकार मुस्लिम लीग ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 के कुछ प्रावधानों का समर्थन किया, लेकिन इसे भारत की संवैधानिक समस्या का अंतिम समाधान नहीं माना और भविष्य में मुसलमानों के लिए पृथक राजनीतिक व्यवस्था की माँग को और अधिक संगठित रूप से आगे बढ़ाया।

1936 में मुस्लिम लीग के बम्बई अधिवेशन में जिन्ना ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। हालाँकि उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली।

हिन्दू महासभा एवं अन्य दलों की प्रतिक्रिया

➣ हिन्दू महासभा तथा राष्ट्रीय उदारवादी संघ (National Liberal Federation) जैसे दलों ने कांग्रेस के विपरीत भारत सरकार अधिनियम, 1935 का सामान्यतः समर्थन किया तथा इसके अंतर्गत होने वाले 1937 के प्रांतीय चुनावों में भी भाग लिया।

➣ हिन्दू महासभा ने विशेष रूप से मुसलमानों तथा अन्य समुदायों को दिए गए पृथक निर्वाचन एवं व्यापक साम्प्रदायिक आरक्षण का विरोध किया, क्योंकि उसका मानना था कि इससे हिन्दू समाज के राजनीतिक हितों की उपेक्षा होगी।

➣ डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी अगस्त 1936 में स्वतंत्र मजदूर पक्ष (Independent Labour Party) का गठन किया तथा 1937 के प्रांतीय चुनावों में बम्बई प्रांत से इस दल के माध्यम से भाग लेकर उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की।

देशी रियासतों की प्रजा की प्रतिक्रिया (प्रजामंडल आंदोलन)

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ में देशी रियासतों के प्रतिनिधियों को जनता द्वारा निर्वाचित न करके संबंधित शासकों द्वारा मनोनीत किए जाने के प्रावधान का देशी रियासतों की प्रजा ने कड़ा विरोध किया।

➣ 1927 में बम्बई में गठित अखिल भारतीय रियासती प्रजा सम्मेलन (All India States’ Peoples’ Conference) ने देशी रियासतों में भी उत्तरदायी एवं प्रतिनिधिक शासन की माँग उठाई तथा संघीय विधानमंडल में रियासतों के प्रतिनिधि जनता द्वारा निर्वाचित किए जाने की माँग की।

➣ 1936 के लखनऊ अधिवेशन में कांग्रेस ने भी घोषणा की कि देशी रियासतों की प्रजा को शेष भारत के समान ही आत्मनिर्णय का अधिकार प्राप्त होना चाहिए।

➣ आगे चलकर 1939 में जवाहरलाल नेहरू इस सम्मेलन के अध्यक्ष निर्वाचित हुए, जिससे रियासती प्रजा आंदोलन को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के साथ और निकटता से जोड़ा जा सका।

ब्रिटिश सरकार एवं अन्य नेताओं की प्रतिक्रिया

➣ ब्रिटिश सरकार ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 को भारत में संवैधानिक विकास की दिशा में अब तक का सबसे व्यापक एवं महत्वपूर्ण सुधार बताया।

➣ भारत सचिव सर सैमुअल होर ने इसे ऐसा संवैधानिक ढाँचा बताया, जिसके माध्यम से भारतीयों को प्रशासन में पहले की अपेक्षा अधिक भागीदारी दी जाएगी, जबकि ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की भी रक्षा होगी।

➣ तत्कालीन वायसराय लॉर्ड विलिंगडन तथा ब्रिटिश प्रशासन का विश्वास था कि इस अधिनियम के माध्यम से भारत में राजनीतिक स्थिरता स्थापित होगी तथा भारतीय नेताओं को प्रशासनिक उत्तरदायित्व निभाने का अवसर मिलेगा।

➣ जवाहरलाल नेहरू ने इस अधिनियम की तीखी आलोचना करते हुए इसे ब्रेकों से युक्त ऐसी मशीन, जिसमें इंजन ही नहीं है की संज्ञा दी। उनका आशय था कि अधिनियम में नियंत्रण और प्रतिबंध तो बहुत थे, किन्तु वास्तविक लोकतांत्रिक एवं उत्तरदायी शासन की भावना का अभाव था।

➣ डॉ. भीमराव आंबेडकर के अनुसार यद्यपि यह अधिनियम भारत की राजनीतिक आकांक्षाओं को पूर्णतः संतुष्ट नहीं करता था, फिर भी इसमें अनेक महत्वपूर्ण संवैधानिक एवं प्रशासनिक सुधार किए गए थे, जो भविष्य की शासन-व्यवस्था के विकास के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकते थे।

➣ तेज बहादुर सप्रू तथा एम. आर. जयकर जैसे उदारवादी नेताओं ने सामान्यतः इस अधिनियम को संवैधानिक प्रगति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना, जबकि अनेक राष्ट्रवादी नेताओं का मत था कि जब तक भारत को पूर्ण उत्तरदायी शासन और स्वशासन प्राप्त नहीं होता, तब तक संवैधानिक संघर्ष जारी रहना चाहिए।

➣ इस प्रकार भारत सरकार अधिनियम, 1935 को ब्रिटिश सरकार ने एक ऐतिहासिक संवैधानिक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि अधिकांश भारतीय नेताओं ने इसे अधूरा सुधार माना।

➣ यद्यपि इस अधिनियम ने भारतीय प्रशासन में अनेक संस्थागत परिवर्तन किए, फिर भी यह भारत की पूर्ण स्वतंत्रता एवं उत्तरदायी शासन की राष्ट्रीय आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सका।

भारतीय संविधान में भारत सरकार अधिनियम, 1935 की विरासत

➣ डॉ. भीमराव आंबेडकर संविधान सभा में स्वयं इस बात को स्वीकार करते थे कि भारतीय संविधान का प्रशासनिक ढाँचा बहुत हद तक भारत सरकार अधिनियम, 1935 से लिया गया है, यद्यपि संविधान के मौलिक अधिकार, नीति-निदेशक तत्व एवं लोकतांत्रिक-गणतांत्रिक स्वरूप जैसे प्रावधान इस अधिनियम से भिन्न एवं मौलिक थे।

भारत सरकार अधिनियम, 1935 का प्रावधान भारतीय संविधान में संगत प्रावधान
संघीय ढाँचा (केंद्र-प्रांत विभाजन) केंद्र-राज्य संबंध एवं संघीय व्यवस्था
गवर्नर का पद एवं उसकी विवेकाधीन शक्तियाँ राज्यपाल की संस्था
संघीय, प्रांतीय एवं समवर्ती सूची में विषयों का विभाजन सातवीं अनुसूची की संघ, राज्य एवं समवर्ती सूचियाँ
संघीय न्यायालय भारत का सर्वोच्च न्यायालय
संघीय एवं प्रांतीय लोक सेवा आयोग संघ एवं राज्य लोक सेवा आयोग
गवर्नर जनरल की आपातकालीन शक्तियाँ संविधान के आपातकालीन उपबंध
प्रशासनिक विवरण (लोक सेवाओं, महालेखा परीक्षक आदि से संबंधित प्रावधान) संविधान के अनेक अनुच्छेदों में प्रशासनिक विस्तृत उपबंध

ध्यान रहे: मौलिक अधिकार, राज्य के नीति-निदेशक तत्व, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, एकल नागरिकता तथा गणतांत्रिक-लोकतांत्रिक स्वरूप जैसे प्रावधान भारत सरकार अधिनियम, 1935 से नहीं, बल्कि अन्य स्रोतों (जैसे आयरलैंड, अमेरिका, ब्रिटेन के संविधानों) से प्रेरित हैं। अतः 1935 के अधिनियम को केवल प्रशासनिक ढाँचे का स्रोत मानना चाहिए, संपूर्ण संविधान का नहीं।

समकालीन प्रासंगिकता

➣ गवर्नर को दी गई विवेकाधीन शक्तियों की उत्पत्ति भारत सरकार अधिनियम, 1935 से ही मानी जाती है, और यह विषय आज भी सक्रिय संवैधानिक बहस का केंद्र बना हुआ है।

➣ उदाहरणस्वरूप, सर्वोच्च न्यायालय ने अप्रैल 2025 में तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल मामले में यह व्यवस्था दी कि राज्यपाल विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रख सकते तथा उन्हें अनुच्छेद 200 के अंतर्गत निर्धारित समयसीमा में निर्णय लेना होगा।

➣ यह विवाद दर्शाता है कि गवर्नर/गवर्नर जनरल की विवेकाधीन शक्तियों को लेकर 1935 के अधिनियम के समय से चली आ रही बहस – अर्थात निर्वाचित सरकार बनाम संवैधानिक प्रमुख की शक्तियों का संतुलन – स्वतंत्र भारत में भी प्रासंगिक बनी हुई है।

महत्वपूर्ण तथ्य

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 ब्रिटिश शासनकाल का सबसे विस्तृत एवं व्यापक संवैधानिक अधिनियम था, जिसमें कुल 321 धाराएँ एवं 10 अनुसूचियाँ थीं।

➣ यह अधिनियम मुख्यतः साइमन कमीशन रिपोर्ट (1930), तीन गोलमेज सम्मेलनों (1930-32), श्वेत पत्र (1933) तथा लॉर्ड लिनलिथगो की अध्यक्षता वाली संयुक्त प्रवर समिति की सिफारिशों पर आधारित था।

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 को 2 अगस्त 1935 को ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया, जबकि इसके अधिकांश प्रशासनिक प्रावधान 1 अप्रैल 1937 से लागू किए गए। इसने पूर्ववर्ती भारत सरकार अधिनियम, 1915 को निरसित कर दिया तथा प्रशासनिक सुविधा हेतु स्वयं को भारत सरकार अधिनियम, 1935 एवं बर्मा सरकार अधिनियम, 1935– दो भागों में विभाजित कर लिया।

➣ इस अधिनियम के अंतर्गत अखिल भारतीय संघ की स्थापना का प्रावधान किया गया था, किन्तु देशी रियासतों के संघ में सम्मिलित न होने के कारण यह व्यवस्था कभी लागू नहीं हो सकी।

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने प्रांतों में लागू द्वैध शासन को समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता लागू की, जिसके आधार पर 1937 के प्रांतीय चुनाव आयोजित किए गए, जिनमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अधिकांश प्रांतों में विजय प्राप्त की तथा प्रारंभिक हिचकिचाहट के बाद जुलाई 1937 से अपनी मंत्रिपरिषदों का गठन किया।

➣ इस अधिनियम के अंतर्गत केंद्र में द्वैध शासन लागू करने का प्रावधान किया गया, किन्तु अखिल भारतीय संघ अस्तित्व में न आने के कारण यह व्यवस्था व्यवहार में कभी लागू नहीं हो सकी।

➣ अधिनियम के अंतर्गत सिंध को बम्बई से तथा उड़ीसा को बिहार से पृथक कर नए प्रांत बनाए गए, जिससे ब्रिटिश भारत में प्रांतों की कुल संख्या 11 हो गई। इनमें से बम्बई, मद्रास, बंगाल, बिहार, असम एवं संयुक्त प्रांत– इन 6 प्रांतों में द्विसदनीय विधानमंडल की व्यवस्था की गई।

➣ ये सभी 11 प्रांत गवर्नर के प्रांत थे, जहाँ प्रांतीय स्वायत्तता लागू हुई। इनसे अलग दिल्ली, अजमेर-मेरवाड़ा, कुर्ग तथा ब्रिटिश बलूचिस्तान जैसे छोटे क्षेत्र मुख्य आयुक्त के प्रांत कहलाते थे, जो सीधे गवर्नर-जनरल के नियंत्रण में रहे और जहाँ प्रांतीय स्वायत्तता लागू नहीं हुई।

➣ पहली बार शासन के विषयों को संघीय सूची (59 विषय), प्रांतीय सूची (54 विषय) तथा समवर्ती सूची (36 विषय) में विभाजित किया गया, जबकि अवशिष्ट विषयों पर निर्णय लेने का अधिकार गवर्नर जनरल को दिया गया।

➣ अधिनियम में प्रस्तावित द्विसदनीय संघीय विधानमंडल में राज्य परिषद (Council of State) को स्थायी उच्च सदन तथा संघीय सभा (Federal Assembly) को पाँच वर्षीय निम्न सदन के रूप में रखा गया था।

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत संघीय न्यायालय की स्थापना का प्रावधान किया गया, जिसकी स्थापना 1 अक्टूबर 1937 को दिल्ली में हुई तथा जिसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर मॉरिस ग्वायर थे। स्वतंत्रता के बाद इसी के स्थान पर 26 जनवरी 1950 को सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना हुई।

➣ भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 1 अप्रैल 1935 से कार्य प्रारम्भ किया। इसकी स्थापना भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के अंतर्गत हुई थी, जबकि 1935 के अधिनियम की संघीय वित्तीय व्यवस्था में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

➣ 1 अप्रैल 1937 को बर्मा (वर्तमान म्यांमार) को ब्रिटिश भारत से पृथक कर एक अलग ब्रिटिश उपनिवेश बना दिया गया। इससे पूर्व 1886 से उसका प्रशासन ब्रिटिश भारतीय प्रशासन के अंतर्गत संचालित होता था। इसी क्रम में अदन (Aden) को भी 1937 में भारत से पृथक कर सीधे ब्रिटिश उपनिवेश कार्यालय के अधीन कर दिया गया।

➣ इस अधिनियम ने 1858 में गठित लंदन स्थित सलाहकार निकाय भारत परिषद (Council of India) को समाप्त कर दिया तथा भारत सचिव की सहायता हेतु सलाहकारों की नियुक्ति का प्रावधान किया।

➣ इस अधिनियम के अंतर्गत संघीय लोक सेवा आयोग, प्रांतीय लोक सेवा आयोग तथा संयुक्त लोक सेवा आयोग की व्यवस्था की गई, जिससे लोक सेवाओं की भर्ती को अधिक संगठित स्वरूप प्रदान किया गया।

➣ गवर्नर जनरल एवं प्रांतीय गवर्नरों को व्यापक विवेकाधीन शक्तियाँ एवं विशेष उत्तरदायित्व प्रदान किए गए, जिसके कारण वास्तविक सत्ता ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण में बनी रही।

➣ गवर्नर-जनरल एवं गवर्नरों के विशेष उत्तरदायित्वों में प्रमुख थे- शांति-व्यवस्था की रक्षा, अल्पसंख्यकों के वैध हितों की सुरक्षा, लोक सेवकों के अधिकारों की रक्षा, देशी रियासतों के अधिकारों की सुरक्षा, तथा (गवर्नर-जनरल के मामले में अतिरिक्त रूप से) संघीय सरकार की वित्तीय स्थिरता बनाए रखना।

➣ इस अधिनियम के अंतर्गत सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार लागू नहीं किया गया था। मताधिकार प्राप्त व्यक्तियों की संख्या भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत लगभग 50 लाख (5 मिलियन) से बढ़कर 1935 के अधिनियम में लगभग 3.5 करोड़ (35 मिलियन) हो गई (अलग-अलग स्रोतों में 1919 का यह आँकड़ा 50 लाख से 70 लाख के बीच मिलता है), फिर भी यह कुल जनसंख्या के केवल लगभग 14 प्रतिशत भाग के बराबर ही थी।

➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने पृथक निर्वाचन की व्यवस्था को समाप्त नहीं किया, बल्कि साम्प्रदायिक अधिनिर्णय (1932) एवं पूना पैक्ट (1932) के आधार पर इसे और अधिक समुदायों (दलित वर्ग, महिलाएँ, श्रमिक वर्ग) तक विस्तारित कर दिया, जिससे सांप्रदायिक राजनीति को और बढ़ावा मिला।

➣ इस अधिनियम में संशोधन करने का अधिकार भारतीय विधानमंडलों को नहीं, बल्कि ब्रिटिश संसद को प्राप्त था। इसलिए भारतीयों को वास्तविक संवैधानिक संप्रभुता प्राप्त नहीं हुई।

➣ जवाहरलाल नेहरू ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 को ब्रेकों से युक्त ऐसी मशीन, जिसमें इंजन ही नहीं है (A Machine with Strong Brakes but No Engine) की संज्ञा दी, क्योंकि उनके अनुसार इसमें नियंत्रण तो बहुत थे, पर वास्तविक उत्तरदायी शासन का अभाव था।

➣ अधिनियम की धारा 45 (संघ के लिए), धारा 93 (प्रांतों के लिए, जिसके तहत गवर्नर संवैधानिक तंत्र की विफलता पर सीधा शासन अपने हाथ में ले सकता था) तथा धारा 102 (युद्ध/बाह्य आक्रमण की आपातस्थिति में गवर्नर-जनरल की उद्घोषणा-शक्ति) आगे चलकर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 तथा अनुच्छेद 352 का आधार बनीं। 3 सितंबर 1939 को वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने धारा 102 के अंतर्गत आपातकाल घोषित कर भारत को द्वितीय विश्वयुद्ध में शामिल किया, जिसके विरोध में कांग्रेस मंत्रिपरिषदों ने त्यागपत्र दिया और सात प्रांतों में गवर्नरों ने धारा 93 के अंतर्गत सीधा शासन अपने हाथ में लिया।

➣ अधिनियम के अंतर्गत मताधिकार का विस्तार लॉर्ड लोथियन की अध्यक्षता वाली भारतीय मताधिकार समिति (Lothian Committee, 1932) की सिफारिशों पर आधारित था।

➣ रेलवे प्रशासन को मंत्रियों/पार्षदों के नियंत्रण से मुक्त रखने हेतु 7 सदस्यीय संघीय रेलवे प्राधिकरण (Federal Railway Authority) की व्यवस्था की गई (अधिनियम की आठवीं अनुसूची)।

➣ भारतीय संविधान के संघीय ढाँचे, केंद्र-राज्य विषयों के विभाजन, लोक सेवा आयोग, संघीय न्यायालय (सर्वोच्च न्यायालय का पूर्ववर्ती स्वरूप), राज्यपाल की संस्था तथा अनेक प्रशासनिक प्रावधानों की प्रेरणा भारत सरकार अधिनियम, 1935 से प्राप्त हुई।

➣ 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी यह अधिनियम तत्काल समाप्त नहीं हुआ। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 द्वारा आवश्यक संशोधनों (जैसे ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता तथा गवर्नर जनरल एवं गवर्नरों की विशेष विवेकाधीन शक्तियों की समाप्ति) के साथ भारत सरकार अधिनियम, 1935 को ही भारत तथा पाकिस्तान दोनों के अस्थायी संविधान के रूप में अपनाया गया। भारत में यह व्यवस्था 26 जनवरी 1950 को नया संविधान लागू होने तक जारी रही।

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