गांधीजी का हरिजन आंदोलन : परिचय
➣ गांधीजी का हरिजन आंदोलन 1932 के बाद अस्पृश्यता के विरुद्ध चलाया गया एक व्यापक सामाजिक सुधार अभियान था। गांधी ने इस कार्य को अपने रचनात्मक कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।
➣ इसका उद्देश्य केवल अस्पृश्यता की प्रथा का विरोध करना ही नहीं था, बल्कि दलितों के सामाजिक सम्मान, सार्वजनिक जीवन में समानता और हिंदू समाज के भीतर सुधार के लिए जनमत तैयार करना भी था।
➣ हालांकि गांधी का संगठित हरिजन कार्य 1932 के बाद व्यापक रूप में सामने आया, लेकिन अस्पृश्यता के विरोध का उनका विचार इससे बहुत पहले विकसित हो चुका था। वे इसे हिंदू समाज की गंभीर बुराई मानते थे और अपने आश्रम-जीवन से ही इसके विरुद्ध व्यावहारिक कदम उठाने लगे थे।
➣ उनके साबरमती आश्रम में दूदाभाई, उनकी पत्नी दानीबहन और बेटी लक्ष्मी के रहने के निर्णय ने भी आश्रम के भीतर अस्पृश्यता के प्रश्न को सीधे सामने ला दिया था। गांधी ने सामाजिक विरोध के बावजूद इस परिवार को आश्रम में रहने दिया।
पृष्ठभूमि
प्रारंभिक अस्पृश्यता-विरोधी आंदोलनों में गांधी की भूमिका
➣ गांधी की अस्पृश्यता-विरोधी भूमिका का महत्वपूर्ण उदाहरण वैकोम सत्याग्रह (1924–25) था। त्रावणकोर में वैकोम महादेव मंदिर के आसपास की सड़कों पर इझावा और अन्य बहिष्कृत समुदायों के आवागमन पर जातिगत प्रतिबंध था।
➣ टी. के. माधवन और केरल के अन्य नेताओं द्वारा शुरू किए गए इस संघर्ष को गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन मिला। गांधी स्वयं मार्च 1925 में वैकोम पहुँचे और सत्याग्रहियों तथा सवर्ण नेताओं से बातचीत की।
➣ उन्होंने अस्पृश्यता को हिंदू समाज के लिए गंभीर दोष बताया और आंदोलन को अहिंसा, आत्मसंयम और सामाजिक परिवर्तन के माध्यम से आगे बढ़ाने पर जोर दिया।
➣ वैकोम ने गांधी को यह अनुभव भी दिया कि अस्पृश्यता के विरुद्ध संघर्ष केवल राजनीतिक प्रस्तावों से नहीं, बल्कि समाज के भीतर लंबे समय तक चलने वाले जनजागरण से जुड़ा है।
➣ वैकोम के बाद गुरुवायूर मंदिर सत्याग्रह (1931–32) ने मंदिर प्रवेश के प्रश्न को और अधिक प्रमुख बनाया। गांधी ने इस आंदोलन के प्रति भी सहानुभूति और समर्थन व्यक्त किया।
➣ गुरुवायूर के संदर्भ में उन्होंने अस्पृश्यता को हिंदू समाज की ऐसी बुराई माना जिसे दूर करना तत्काल आवश्यक था। इस प्रकार वैकोम और गुरुवायूर जैसे आंदोलनों ने गांधी के अस्पृश्यता-विरोधी अभियान को व्यापक सामाजिक आधार दिया।
➣ गांधी के लिए मंदिर प्रवेश केवल पूजा का अधिकार नहीं था। उनका मानना था कि यदि हिंदू समाज किसी व्यक्ति को जन्म के आधार पर मंदिर और सार्वजनिक जीवन से बाहर रखता है, तो यह उसकी मानवीय गरिमा और सामाजिक समानता के विरुद्ध है।
दक्षिण भारत के सामाजिक सुधार आंदोलनों का प्रभाव
➣ गांधी के हरिजन आंदोलन की पृष्ठभूमि केवल कांग्रेस की राजनीति से नहीं बनी थी। दक्षिण भारत में पहले से ही श्री नारायण गुरु, अय्यंकाली, एस.एन.डी.पी. योगम, नायर सर्विस सोसाइटी तथा अन्य सामाजिक सुधार आंदोलनों के माध्यम से जातिगत भेदभाव के विरुद्ध चेतना विकसित हो रही थी।
➣ इसी व्यापक वातावरण में जस्टिस पार्टी ने मद्रास प्रेसीडेंसी में गैर-ब्राह्मण समुदायों के प्रतिनिधित्व, शिक्षा और सामाजिक अवसरों के प्रश्न उठाए।
➣ यद्यपि जस्टिस पार्टी गांधी के हरिजन आंदोलन का हिस्सा नहीं थी, लेकिन दक्षिण भारत में उसकी गैर-ब्राह्मण और सामाजिक न्याय की राजनीति ने जातिगत असमानता के प्रश्न को राजनीतिक चर्चा में महत्वपूर्ण बनाया।
➣ इस प्रकार गांधी के हरिजन आंदोलन के पीछे एक ओर गांधी के अपने आश्रम और सामाजिक सुधार के प्रयोग थे, वहीं दूसरी ओर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पहले से चल रहे अस्पृश्यता-विरोधी और गैर-ब्राह्मण सामाजिक सुधार आंदोलनों की व्यापक पृष्ठभूमि भी थी।
हरिजन सेवक संघ की स्थापना (1932)
➣ 1932 के पूना समझौते के बाद महात्मा गांधी ने अस्पृश्यता के विरुद्ध अपने सामाजिक अभियान को अधिक संगठित रूप देने का निर्णय लिया। इसी क्रम में एक अखिल भारतीय संस्था बनाने की आवश्यकता महसूस हुई।
➣ 30 सितंबर 1932 को बंबई में एक सार्वजनिक बैठक और अखिल भारतीय सम्मेलन के निर्णय के आधार पर All-India Anti-Untouchability League की स्थापना की गई।
➣ उस समय गांधी स्वयं यरवडा जेल में थे। संस्था की स्थापना उनके उस आह्वान के बाद हुई जिसमें उन्होंने हिंदू समाज से अस्पृश्यता समाप्त करने के लिए संगठित प्रयास करने की अपील की थी।
➣ संस्था के अध्यक्ष घनश्यामदास बिड़ला और सचिव अमृतलाल विठ्ठलदास ठक्कर (ठक्कर बापा) बनाए गए।
बिड़ला ने संगठन के प्रशासन और संसाधनों को जुटाने में भूमिका निभाई, जबकि ठक्कर बापा लंबे समय से वंचित समुदायों के बीच सामाजिक कार्य कर रहे थे और उन्होंने संस्था के काम को जमीनी स्तर तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।➣ गांधी ने जेल से ही घनश्यामदास बिड़ला को पत्र लिखकर संस्था के काम की दिशा के बारे में सुझाव दिए। उन्होंने प्रचार और रचनात्मक कार्य दोनों को साथ-साथ चलाने पर जोर दिया।
➣ उनका मानना था कि अस्पृश्यता के विरुद्ध केवल प्रचार पर्याप्त नहीं होगा। समाज में वास्तविक परिवर्तन के लिए शिक्षा, सेवा और सामाजिक सुधार के व्यावहारिक कार्यक्रम भी चलाने होंगे।
➣ गांधी ने यह भी सुझाव दिया कि संस्था को अपना बुलेटिन, पत्रिका या समाचार-पत्र निकालना चाहिए, ताकि अस्पृश्यता से जुड़ी घटनाओं और समस्याओं को व्यापक जनता के सामने रखा जा सके। आगे चलकर इसी दिशा में हरिजन सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ।
संस्था के नाम में परिवर्तन
➣ संस्था का प्रारंभिक नाम All-India Anti-Untouchability League था। स्थापना के कुछ ही सप्ताह बाद इसके नाम को लेकर विवाद सामने आया।
➣ उस समय समाज सुधारक वी. आर. शिंदे पहले से All-India Untouchability League नाम की संस्था चला रहे थे। उन्हें लगा कि नई संस्था का नाम उनकी संस्था के नाम से बहुत मिलता-जुलता है और इससे भ्रम पैदा हो सकता है। उन्होंने गांधी और घनश्यामदास बिड़ला के सामने इस संबंध में आपत्ति रखी।
➣ गांधी ने शिंदे की आपत्ति को उचित माना। उनका तर्क था कि संस्था के लिए नाम से अधिक महत्वपूर्ण अस्पृश्यता के विरुद्ध वास्तविक काम है।
➣ इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि नई संस्था का नाम बदलकर अखिल भारत हरिजन सेवा संघ (Akhil Bharat Harijan Seva Sangh) रखा जाए। गांधी ने यह भी माना कि Harijan शब्द संस्था के उद्देश्य और उसके सामाजिक कार्य को अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है।
➣ गांधी के लिए हरिजन शब्द का अर्थ ईश्वर के लोग था। वे इस शब्द का प्रयोग उन समुदायों के लिए सम्मानजनक संबोधन के रूप में करते थे जिन्हें हिंदू समाज में अस्पृश्य माना जाता था।
➣ इसी कारण उन्होंने अस्पृश्यता-विरोधी अभियान और उससे जुड़ी संस्था के नाम में भी हरिजन शब्द को अपनाया। 9 दिसंबर 1932 के अपने वक्तव्य में गांधी ने स्पष्ट किया कि पुराने नाम के स्थान पर Servants of Untouchables Society नाम अधिक उपयुक्त होगा।
➣ इस प्रकार संस्था का नाम All-India Anti-Untouchability League से बदलकर Harijan Sevak Sangh कर दिया गया। आगे चलकर अंग्रेजी में Harijan Sevak Sangh और भारतीय भाषाओं में इसके समानार्थी नाम का प्रयोग होने लगा। यही नाम बाद में इस संस्था की स्थायी पहचान बन गया।
हरिजन शब्द पर डॉ. अंबेडकर की आपत्ति
➣ हरिजन शब्द को लेकर डॉ. बी. आर. अंबेडकर का दृष्टिकोण गांधी से अलग था। अंबेडकर का मानना था कि अस्पृश्यता की समस्या केवल नाम बदलने से समाप्त नहीं होगी।
➣ उनके अनुसार बहिष्कृत लोगों की वास्तविक मुक्ति के लिए जाति-व्यवस्था और उससे पैदा होने वाली सामाजिक असमानता को समाप्त करना आवश्यक था। इसलिए वे ऐसे संबोधन को पर्याप्त नहीं मानते थे जो सामाजिक और राजनीतिक स्थिति में वास्तविक परिवर्तन न करे।
➣ 11 फरवरी 1933 को गांधी द्वारा प्रकाशित हरिजन के प्रथम अंक में अंबेडकर का एक वक्तव्य भी प्रकाशित हुआ। इसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि बहिष्कृत वर्गों की समस्या जाति-व्यवस्था से जुड़ी है और केवल नाम बदलने से उनका उद्धार संभव नहीं है। उनके अनुसार जाति का विनाश ही अस्पृश्यता की जड़ को समाप्त कर सकता है।
➣ बाद के वर्षों में भी अंबेडकर ने हरिजन शब्द के प्रयोग की आलोचना की। 1938 में बंबई विधान सभा में कांग्रेस द्वारा अस्पृश्यों के लिए हरिजन शब्द को आधिकारिक रूप से अपनाने के प्रयास का उन्होंने विरोध किया। उनका तर्क था कि नाम बदलने से लोगों की वास्तविक सामाजिक स्थिति नहीं बदलती।
➣ इस प्रकार हरिजन शब्द पर गांधी और अंबेडकर का अंतर केवल शब्दावली का विवाद नहीं था। गांधी इसे सम्मान और सामाजिक सुधार का माध्यम मानते थे, जबकि अंबेडकर का जोर समानता, आत्मसम्मान, सामाजिक शक्ति और जाति-व्यवस्था के मूल परिवर्तन पर था।
संगठनात्मक स्वरूप
➣ हरिजन सेवक संघ का उद्देश्य अस्पृश्यता के विरुद्ध काम को अखिल भारतीय स्तर पर संगठित करना था। इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों को जोड़ा गया तथा सामाजिक सुधार से जुड़े लोगों को अभियान में शामिल किया गया। संस्था के माध्यम से गांधी के अस्पृश्यता-विरोधी विचारों को स्थानीय स्तर तक पहुँचाने का प्रयास किया गया।
➣ गांधी का जोर विशेष रूप से इस बात पर था कि संस्था केवल भाषण और प्रचार तक सीमित न रहे। उन्होंने प्रचार के साथ रचनात्मक कार्य को भी जरूरी माना।
➣ इसलिए हरिजन सेवक संघ आगे चलकर शिक्षा, सामाजिक संपर्क, स्वच्छता, आर्थिक सहायता और सार्वजनिक सुविधाओं से जुड़े कार्यों में शामिल हुआ।
➣ दिल्ली में संघ का मुख्य कार्यालय बाद में विकसित हुआ और 1935 में इसे किंग्सवे कैंप स्थित हरिजन कॉलोनी में स्थानांतरित किया गया। यह स्थान आगे गांधी के दिल्ली प्रवास और हरिजन कार्य से भी जुड़ा रहा।
| तथ्यविवरण | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | 30 सितंबर 1932 |
| मूल नाम | All-India Anti-Untouchability League |
| अध्यक्ष | घनश्यामदास बिड़ला |
| सचिव | अमृतलाल विठ्ठलदास ठक्कर (ठक्कर बापा) |
| गांधी की स्थिति | स्थापना के समय यरवडा जेल में |
| नाम परिवर्तन | हरिजन सेवक संघ |
| नाम बदलने का कारण | वी. आर. शिंदे की आपत्ति |
| गांधी का जोर | प्रचार + रचनात्मक कार्य |
| मुख्य केंद्र | बाद में दिल्ली। 1935 में किंग्सवे कैंप की हरिजन कॉलोनी में कार्यालय |
हरिजन पत्र और पत्रकारिता के माध्यम से जनजागरण
➣ अस्पृश्यता के विरुद्ध गांधीजी के अभियान को व्यापक जनता तक पहुँचाने में पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1932 के बाद हरिजन कार्य को देशव्यापी रूप देने के साथ गांधी ने ऐसी पत्र-पत्रिकाओं की आवश्यकता महसूस की, जिनके माध्यम से दलितों की समस्याओं पर लगातार जनमत तैयार किया जा सके।
हरिजन का प्रकाशन (1933)
➣ 11 फरवरी 1933 को हरिजन का पहला अंक प्रकाशित हुआ। यह मुख्यतः अंग्रेजी साप्ताहिक था और गांधी के अस्पृश्यता-विरोधी अभियान का प्रमुख पत्रकारिता मंच बना।
➣ इसका प्रकाशन हरिजन सेवक संघ से जुड़े प्रयासों के अंतर्गत किया गया। पहले अंक में गांधी ने स्पष्ट किया कि यह पत्र अस्पृश्यता के विरुद्ध सामाजिक सुधार के उद्देश्य से निकाला जा रहा है।
➣ गांधी ने हरिजन को केवल समाचार-पत्र के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार और जनमत निर्माण के साधन के रूप में इस्तेमाल किया। देश के अलग-अलग क्षेत्रों से अस्पृश्यता से संबंधित घटनाओं और सामाजिक समस्याओं को सामने लाकर वे लोगों को इस प्रश्न पर विचार करने के लिए प्रेरित करते थे।
➣ अंग्रेजी के साथ-साथ गांधी के अभियान को भारतीय भाषाओं में पहुँचाने के लिए इसके अन्य संस्करण भी शुरू किए गए। 23 फरवरी 1933 को हरिजन सेवक का प्रकाशन शुरू हुआ।
➣ यह हिंदी में प्रकाशित होता था और उत्तर भारत सहित हिंदी भाषी समाज तक गांधी के अस्पृश्यता-विरोधी विचार पहुँचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बना।
➣ इसके बाद 12 मार्च 1933 को हरिजनबंधु का प्रकाशन शुरू हुआ। यह गुजराती पत्र था और गुजरात में गांधी के हरिजन अभियान के प्रचार का महत्वपूर्ण माध्यम बना।
➣ तीनों पत्रों का उद्देश्य मूल रूप से एक ही अभियान को अलग-अलग भाषाई समाजों तक पहुँचाना था। अंग्रेजी पत्र के माध्यम से राष्ट्रीय और शिक्षित वर्ग तक बात पहुँचाई गई, जबकि हरिजन सेवक और हरिजनबंधु ने हिंदी और गुजराती भाषी जनता के बीच अस्पृश्यता-विरोधी विचारों का प्रसार किया।
पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक जनजागरण
➣ गांधी इन पत्रों के माध्यम से अस्पृश्यता को हिंदू समाज की आंतरिक समस्या के रूप में प्रस्तुत करते थे। वे सवर्ण समाज से आग्रह करते थे कि मंदिर, कुएँ, तालाब, सड़क और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं पर जातिगत प्रतिबंध समाप्त किए जाएँ और बहिष्कृत समुदायों के साथ समान व्यवहार किया जाए।
➣ पत्रों में केवल गांधी के विचार ही नहीं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले सामाजिक सुधारों, मंदिर प्रवेश अभियानों और अस्पृश्यता-विरोधी गतिविधियों की जानकारी भी प्रकाशित की जाती थी। इससे अलग-अलग क्षेत्रों में चल रहे प्रयासों के बीच संपर्क और व्यापक जनसमर्थन बनाने में सहायता मिली।
➣ गांधी इन पत्रों का उपयोग अपने हरिजन दौरे, चंदा संग्रह, सामाजिक कार्यक्रमों और मंदिर प्रवेश आंदोलनों के बारे में जनता को जानकारी देने के लिए भी करते थे। इस तरह पत्रकारिता और प्रत्यक्ष सामाजिक कार्य एक-दूसरे के पूरक बन गए।
➣ हरिजन सेवक संघ के कार्यकर्ताओं और स्थानीय सुधारकों के लिए भी ये पत्र उपयोगी माध्यम थे। इनके जरिए लोगों को विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे हरिजन कार्यों की जानकारी मिलती थी और स्थानीय स्तर पर सामाजिक सुधार के लिए प्रेरणा मिलती थी।
➣ हरिजन केवल गांधी के विचार प्रकाशित करने वाला पत्र नहीं था। इसके प्रारंभिक अंकों में डॉ. बी. आर. अंबेडकर जैसे नेताओं के विचार भी प्रकाशित हुए। इससे अस्पृश्यता और दलित प्रश्न पर गांधी तथा अन्य नेताओं के अलग-अलग दृष्टिकोणों को सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनने का अवसर मिला।| तथ्यविवरण | विवरण |
|---|---|
| हरिजन | 11 फरवरी 1933, अंग्रेजी |
| हरिजन सेवक | 23 फरवरी 1933, हिंदी |
| हरिजन बंधु | 12 मार्च 1933, गुजराती |
| मुख्य उद्देश्य | अस्पृश्यता-विरोधी जनजागरण |
| मुख्य विषय | सामाजिक समानता, मंदिर प्रवेश, शिक्षा, स्वच्छता और सार्वजनिक अधिकार |
| विशेष महत्व | गांधी के विचारों और हरिजन सेवक संघ के कार्य को व्यापक जनता तक पहुँचाना |
| पत्रकारिता का स्वरूप | बहुभाषी जनसंपर्क और सामाजिक सुधार का माध्यम |
गांधी का राष्ट्रव्यापी हरिजन दौरा (1933–34)
➣ हरिजन सेवक संघ की स्थापना और हरिजन पत्र के प्रकाशन के बाद महात्मा गांधी ने अस्पृश्यता के विरुद्ध अपने अभियान को पूरे देश तक पहुँचाने का निर्णय लिया। इसी उद्देश्य से उन्होंने 1933–34 में देशव्यापी हरिजन दौरा किया।
➣ उनका उद्देश्य केवल भाषण देना नहीं था, बल्कि सवर्ण समाज में अस्पृश्यता के विरुद्ध जनमत तैयार करना, हरिजन सेवा के लिए आर्थिक सहायता जुटाना और सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन लाना था।
➣ गांधी का उद्देश्य यह था कि हरिजन सेवा केवल सहानुभूति या भाषणों तक सीमित न रहे, बल्कि स्थानीय स्तर पर विद्यालय, छात्रावास, स्वच्छता और सामाजिक सुधार के कार्यक्रम चलाए जाएँ।
हरिजन यात्रा की शुरुआत और उद्देश्य
➣ 7 नवंबर 1933 को गांधी ने वर्धा से अपनी राष्ट्रव्यापी हरिजन यात्रा शुरू की। यात्रा के दौरान वे अलग-अलग नगरों और गाँवों में सभाएँ करते, स्थानीय कार्यकर्ताओं से मिलते और लोगों से अस्पृश्यता समाप्त करने के लिए अपने सामाजिक व्यवहार में बदलाव लाने की अपील करते थे।
➣ गांधी इस यात्रा के दौरान हरिजन सेवक संघ के लिए चंदा भी एकत्र करते थे। लोग उन्हें नकद राशि के साथ-साथ आभूषण और अन्य वस्तुएँ भी दान करते थे। इस धन का उपयोग हरिजन सेवा, शिक्षा और सामाजिक सुधार के कार्यों के लिए किया जाता था।
➣ चंदा संग्रह को व्यवस्थित रूप देने के लिए Gandhi Harijan Purse Fund बनाया गया। गांधी की नीति थी कि जिस क्षेत्र से धन एकत्र किया जाए, उसका बड़ा हिस्सा उसी क्षेत्र के हरिजन कार्य में लगाया जाए।
➣ उपलब्ध विवरण के अनुसार कई प्रांतों में वहाँ एकत्र राशि का लगभग 75 प्रतिशत स्थानीय हरिजन कार्यों के लिए रखने का प्रावधान था।
➣ यात्रा का प्रभाव केवल धन-संग्रह तक सीमित नहीं था। विभिन्न क्षेत्रों में गांधी के भाषणों और बैठकों से अस्पृश्यता का प्रश्न सामान्य जनता के सामने लगातार आता रहा।
उन्होंने सवर्ण हिंदुओं से आग्रह किया कि वे सार्वजनिक कुओं, सड़कों और मंदिरों पर लगे जातिगत प्रतिबंध हटाएँ तथा बहिष्कृत समुदायों के साथ समान व्यवहार करें। इस प्रकार यात्रा ने हरिजन आंदोलन को स्थानीय सामाजिक सुधार से जोड़कर एक देशव्यापी जनजागरण अभियान का रूप दिया।➣ यात्रा महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों से आगे बढ़ी और बाद में बिहार, उड़ीसा तथा अन्य क्षेत्रों तक पहुँची। वे प्रत्येक क्षेत्र में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सामाजिक सुधार के मुद्दे उठाते और हरिजन सेवक संघ के कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का प्रयास करते थे।
➣ 2 मार्च 1934 तक उपलब्ध विवरण के अनुसार गांधी की हरिजन यात्रा के दौरान नकद राशि और आभूषणों के रूप में लगभग ₹3,52,130, 9 आने और 7 पाई एकत्र हो चुके थे। यह उस समय के लिए बहुत बड़ी राशि थी।
➣ आज की क्रय-शक्ति के संदर्भ में इसका मूल्य कई करोड़ रुपये का हो सकता है। यह राशि इस बात का संकेत थी कि हरिजन सेवा के लिए गांधी को देश के विभिन्न वर्गों से व्यापक आर्थिक समर्थन प्राप्त हो रहा था।
यात्रा का विस्तार, विरोध और सामाजिक प्रभाव
➣ गांधी के हरिजन अभियान को व्यापक समर्थन मिला, लेकिन कुछ रूढ़िवादी हिंदू समूहों ने इसका विरोध भी किया। कई स्थानों पर मंदिर प्रवेश और अस्पृश्यता-विरोधी विचारों को लेकर तनाव पैदा हुआ।
➣ इसके बावजूद गांधी ने अपना अभियान जारी रखा और विरोध का उत्तर भी अहिंसा तथा संवाद के माध्यम से देने पर जोर दिया।
➣ 25 अप्रैल 1934 को बिहार में गांधी की हरिजन यात्रा के दौरान उनके विरोध में भीड़ द्वारा हमला किया गया। इसके बावजूद उन्होंने अपनी यात्रा नहीं रोकी।
➣ बाद में 25 जून 1934 को पूना में उनकी मोटर-यात्रा को निशाना बनाकर बम फेंका गया। गांधी सुरक्षित रहे, लेकिन कई लोग घायल हुए। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि अस्पृश्यता के विरुद्ध गांधी का अभियान केवल सामाजिक समर्थन ही नहीं, बल्कि कट्टर विरोध का भी सामना कर रहा था।
➣ 9 मई 1934 को गांधी ने उड़ीसा में हरिजन कार्य के लिए पैदल यात्रा शुरू की। इस दौरान गाँवों में जाकर उन्होंने लोगों से अस्पृश्यता छोड़ने, हरिजन सेवा के लिए सहयोग करने और सामाजिक जीवन में समानता स्थापित करने की अपील की। इस प्रकार यात्रा ने शहरों के साथ-साथ ग्रामीण समाज तक भी हरिजन आंदोलन का संदेश पहुँचाया।
➣ गांधी के लिए इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य यह भी था कि हरिजन कार्य के लिए स्थानीय नेतृत्व और स्वयंसेवकों को तैयार किया जाए।
➣ वे जहाँ जाते, वहाँ सामाजिक कार्यकर्ताओं से मिलते और स्थानीय स्तर पर हरिजन सेवा के स्थायी कार्यक्रम चलाने की प्रेरणा देते। इससे हरिजन सेवक संघ के काम को विभिन्न क्षेत्रों में फैलने में सहायता मिली।
➣ 1934 तक गांधी का ध्यान राजनीतिक आंदोलनों की तुलना में रचनात्मक और सामाजिक कार्यों की ओर अधिक बढ़ गया था।
➣ इसी समय उन्होंने कांग्रेस की सक्रिय राजनीति से दूरी बनाकर हरिजन सेवा, ग्रामोद्योग और बुनियादी शिक्षा जैसे कार्यों पर अधिक ध्यान देने का निर्णय लिया। इस परिवर्तन में हरिजन आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
| तथ्यविवरण | विवरण |
|---|---|
| यात्रा की शुरुआत | 7 नवंबर 1933, वर्धा |
| मुख्य उद्देश्य | अस्पृश्यता-विरोध, जनजागरण और हरिजन सेवा के लिए चंदा |
| यात्रा की प्रकृति | लगभग 12,500 मील, करीब 9 महीने |
| हरिजन कोष | Gandhi Harijan Purse Fund |
| 2 मार्च 1934 तक संग्रह | ₹3,52,130-9-7 |
| 25 अप्रैल 1934 | बिहार में गांधी की यात्रा के दौरान भीड़ द्वारा हमला |
| 9 मई 1934 | उड़ीसा में पैदल यात्रा |
| 25 जून 1934 | पूना में गांधी की मोटर-यात्रा पर बम हमला |
| 1934 का परिवर्तन | गांधी का सामाजिक एवं रचनात्मक कार्यों पर अधिक ध्यान |
मंदिर प्रवेश आंदोलन और अन्य सामाजिक सुधार
➣ हरिजन सेवक संघ के माध्यम से गांधी के अस्पृश्यता-विरोधी अभियान ने केवल जनसभाओं और प्रचार का रूप नहीं लिया, बल्कि स्थानीय स्तर पर कई व्यावहारिक सामाजिक सुधार कार्य भी शुरू किए गए।
➣ इनमें मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक कुएँ और पेयजल, शिक्षा, छात्रवृत्ति, स्वच्छता और चिकित्सा सहायता जैसे कार्य प्रमुख थे।
➣ मंदिर प्रवेश गांधी के हरिजन आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा था। गांधी का मानना था कि हिंदू समाज में जन्म के आधार पर किसी व्यक्ति को मंदिर में प्रवेश से रोकना अस्पृश्यता की सबसे स्पष्ट अभिव्यक्तियों में से एक है।
➣ इसलिए हरिजन सेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने विभिन्न क्षेत्रों में मंदिर समितियों और स्थानीय समाज से संपर्क कर मंदिरों को सभी हिंदुओं के लिए खोलने के पक्ष में जनमत तैयार करने का प्रयास किया।
➣ मालाबार में हरिजन सेवक संघ ने मंदिर प्रवेश के लिए जथा आयोजित किए। अप्रैल 1935 में कालिकट (वर्तमान कोझिकोड) में Temple Entry Conference आयोजित किया गया, जिसमें पूरे मालाबार में 20 अप्रैल 1935 को Temple Entry Day मनाने का निर्णय लिया गया।
➣ मंदिर प्रवेश के साथ-साथ संघ ने बहिष्कृत वर्गों के लिए शिक्षा की सुविधाएँ बढ़ाने पर भी काम किया। मालाबार में 1933–34 के दौरान पालघाट, एझिमाला, अवला, चुंडम्पट्टा, चेरुप्पा, थेन्कुरुशी, पालायाड और एझोम जैसे स्थानों पर नए शैक्षिक संस्थानों को संगठित किया गया या शिक्षा संबंधी कार्य शुरू किए गए। पहले से चल रहे संस्थानों का संचालन भी किया गया।
➣ इन संस्थाओं में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति तथा स्लेट, पुस्तकें और कपड़े जैसी शैक्षिक सहायता दी जाती थी। उपलब्ध वार्षिक विवरण के अनुसार लगभग 135 हरिजन विद्यार्थियों को सामान्य विद्यालयों में प्रवेश दिलाने में सहायता की गई।
➣ संघ ने हरिजन बस्तियों की सफाई और स्वास्थ्य संबंधी कार्य भी किए। मालाबार में लगभग 138 लोगों को चिकित्सा सहायता दी गई तथा पेयजल की सुविधा सुधारने के लिए कुछ स्थानों पर कुओं की मरम्मत का काम किया गया। साथ ही शराब जैसी सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध प्रचार भी चलाया गया।
➣ गांधी स्वयं भी अपने हरिजन अभियान में विद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं के महत्व पर जोर देते थे। 1933 में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके द्वारा खोले जाने वाले विद्यालय केवल हरिजन बच्चों के लिए अलग संस्थाएँ बनाने के उद्देश्य से नहीं थे।
➣ वे ऐसी शिक्षा-व्यवस्था चाहते थे जिसमें हरिजन बच्चों को शिक्षा से वंचित न किया जाए और उनके लिए विशेष सहायता की आवश्यकता को समझा जाए।
➣ इस प्रकार गांधी के हरिजन आंदोलन में मंदिर प्रवेश, शिक्षा, छात्रवृत्ति, सार्वजनिक जलस्रोत, स्वच्छता, स्वास्थ्य को सामाजिक सुधार के परस्पर जुड़े हुए क्षेत्रों के रूप में देखा गया।
➣ इन कार्यों का उद्देश्य केवल तत्काल सहायता देना नहीं था, बल्कि बहिष्कृत वर्गों को सामान्य सामाजिक जीवन में बराबरी का स्थान दिलाने के लिए परिस्थितियाँ तैयार करना था।
| तथ्यविवरण | विवरण |
|---|---|
| मालाबार Temple Entry Conference | अप्रैल 1935, कालिकट |
| Temple Entry Day | 20 अप्रैल 1935 |
| शैक्षिक केंद्र | पालघाट, एझिमाला, अवला, चुण्डम्पट्टा, चेरुप्पा, थेन्कुरुशी, पालायाड, एझोम आदि |
| शैक्षिक सहायता | छात्रवृत्ति, स्लेट, पुस्तकें और कपड़े |
| सामान्य विद्यालयों में प्रवेश | लगभग 135 विद्यार्थी |
| चिकित्सा सहायता | लगभग 138 हरिजन |
| अन्य कार्य | हरिजन बस्तियों की सफाई, कुओं की मरम्मत, शराब-विरोधी प्रचार |
| मुख्य संस्था | हरिजन सेवक संघ |
त्रावणकोर मंदिर प्रवेश उद्घोषणा (1936)
➣ 12 नवंबर 1936 को त्रावणकोर के महाराजा श्री चिथिरा तिरुनाल बलराम वर्मा ने ऐतिहासिक मंदिर प्रवेश उद्घोषणा (Temple Entry Proclamation) जारी की।
➣ इसके द्वारा त्रावणकोर राज्य के उन हिंदू मंदिरों को सभी हिंदुओं के लिए खोल दिया गया, जहाँ पहले जाति के आधार पर प्रवेश प्रतिबंधित था। विशेष रूप से उन समुदायों को मंदिर में प्रवेश और पूजा का अधिकार मिला, जिन्हें उस समय अवर्ण या अस्पृश्य माना जाता था।
➣ यह निर्णय त्रावणकोर में लंबे समय से चल रहे जाति-विरोधी और अस्पृश्यता-विरोधी सामाजिक आंदोलनों की पृष्ठभूमि में आया। श्री नारायण गुरु, अय्यंकाली और अन्य समाज सुधारकों के प्रयासों से निम्न जातियों में सामाजिक समानता की चेतना बढ़ी थी।
➣ इसके बाद वैकोम सत्याग्रह (1924–25) ने मंदिर के आसपास की सड़कों पर आवागमन के अधिकार का प्रश्न उठाया, जबकि गुरुवायूर सत्याग्रह (1931–32) ने मंदिर में प्रवेश और पूजा के अधिकार को अधिक सीधे तौर पर सामने रखा। इन आंदोलनों ने मंदिर प्रवेश के प्रश्न को त्रावणकोर और केरल की राजनीति में महत्वपूर्ण बना दिया।
➣ इस व्यापक सामाजिक दबाव के बीच चिथिरा तिरुनाल द्वारा जारी उद्घोषणा ने पहली बार राज्य की ओर से मंदिर प्रवेश पर लगे जातिगत प्रतिबंध को बड़े स्तर पर समाप्त किया।
➣ इसे केवल किसी एक मंदिर के सुधार के रूप में नहीं, बल्कि त्रावणकोर के हिंदू मंदिरों में जाति-आधारित धार्मिक बहिष्कार समाप्त करने वाले राज्यव्यापी निर्णय के रूप में देखा गया।
उद्घोषणा के मुख्य प्रावधान और तत्काल प्रभाव
➣ उद्घोषणा का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह था कि त्रावणकोर के हिंदू मंदिरों में प्रवेश पर जन्म और जाति के आधार पर लगाए गए प्रतिबंध समाप्त किए गए। अब पहले अस्पृश्य माने जाने वाले हिंदू समुदाय भी अन्य हिंदुओं के समान मंदिरों में जाकर पूजा कर सकते थे।
➣ इसका प्रभाव किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं था। त्रावणकोर राज्य के मंदिरों पर लागू होने के कारण यह निर्णय वैकोम जैसी स्थानीय सड़क-आधारित उपलब्धि से कहीं अधिक व्यापक था।
➣ केरल के शैक्षिक स्रोतों के अनुसार इसके बाद मद्रास और कोचीन में भी मंदिर प्रवेश से संबंधित घोषणाएँ जारी हुईं और मंदिरों में पूजा का अधिकार व्यापक हुआ।
➣ इस निर्णय का तत्काल सामाजिक प्रभाव यह हुआ कि मंदिर में प्रवेश और पूजा का अधिकार अब केवल ऊँची जातियों तक सीमित नहीं रहा। इससे बहिष्कृत समुदायों के बीच आत्मसम्मान और सामाजिक समानता की भावना को बल मिला और धार्मिक जीवन में उनके बहिष्कार को औपचारिक चुनौती मिली।
गांधी के हरिजन आंदोलन से संबंध और ऐतिहासिक महत्व
➣ गांधीजी के हरिजन आंदोलन ने 1932 के बाद अस्पृश्यता और मंदिर प्रवेश के प्रश्न को पूरे भारत में व्यापक जनचर्चा का विषय बनाया।
➣ हरिजन सेवक संघ, हरिजन पत्र और गांधी की यात्राओं के माध्यम से सवर्ण समाज में अस्पृश्यता के विरुद्ध जनमत तैयार किया गया। इस व्यापक वातावरण ने मंदिर प्रवेश के प्रश्न को सामाजिक सुधार के प्रमुख मुद्दों में बनाए रखने में मदद की।
➣ लेकिन 1936 की मंदिर प्रवेश उद्घोषणा को केवल गांधी के हरिजन आंदोलन का परिणाम मानना सही नहीं होगा। इसके पीछे केरल के लंबे सामाजिक सुधार आंदोलनों, श्री नारायण गुरु, अय्यंकाली, वैकोम और गुरुवायूर जैसे संघर्षों तथा त्रावणकोर के भीतर बढ़ती सामाजिक चेतना का संयुक्त प्रभाव था।
➣ इस उद्घोषणा का महत्व इसलिए भी बड़ा था क्योंकि इससे राज्य सत्ता ने स्वयं यह स्वीकार किया कि धार्मिक संस्थाओं में जन्म आधारित बहिष्कार को बनाए रखना उचित नहीं है। केरल राजभवन के आधिकारिक विवरण में इसे अस्पृश्यता समाप्त करने की दिशा में एक क्रांतिकारी और साहसिक सुधार बताया गया है।
➣ वैकोम सत्याग्रह और 1936 की उद्घोषणा के बीच अंतर परीक्षा की दृष्टि से विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। वैकोम (1924–25) में मुख्य उपलब्धि मंदिर के आसपास की सार्वजनिक सड़कों पर आवागमन का अधिकार थी, जबकि 1936 की त्रावणकोर मंदिर प्रवेश उद्घोषणा ने मंदिरों में प्रवेश और पूजा का व्यापक अधिकार प्रदान किया।
| तथ्यविवरण | विवरण |
|---|---|
| तिथि | 12 नवंबर 1936 |
| उद्घोषणा | Temple Entry Proclamation |
| शासक | श्री चिथिरा तिरुनाल बलराम वर्मा |
| राज्य | त्रावणकोर |
| मुख्य प्रावधान | हिंदू मंदिरों में जाति-आधारित प्रवेश प्रतिबंध समाप्त |
| लाभ | पहले अस्पृश्य माने जाने वाले हिंदुओं को मंदिर प्रवेश एवं पूजा का अधिकार |
| पूर्ववर्ती प्रमुख आंदोलन | वैकोम सत्याग्रह, गुरुवायूर सत्याग्रह |
| व्यापक महत्व | अस्पृश्यता के विरुद्ध राज्य-स्तरीय कानूनी सुधार |
| आगे का प्रभाव | मद्रास और कोचीन में भी मंदिर प्रवेश संबंधी सुधारों को गति |
हरिजन आंदोलन की उपलब्धियाँ एवं सीमाएँ
➣ गांधीजी का हरिजन आंदोलन 1932 के बाद अस्पृश्यता के विरुद्ध भारत में चलाए गए सबसे व्यापक सामाजिक अभियानों में से एक था।
➣ इसका प्रभाव केवल गांधी के भाषणों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हरिजन सेवक संघ, हरिजन पत्र, राष्ट्रव्यापी यात्राओं, मंदिर प्रवेश अभियानों, शिक्षा, स्वच्छता और सार्वजनिक सुविधाओं से जुड़े कार्यों के माध्यम से अलग-अलग क्षेत्रों तक पहुँचा।
हरिजन आंदोलन की प्रमुख उपलब्धियाँ
➣ इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह थी कि अस्पृश्यता को राष्ट्रीय सामाजिक प्रश्न बना दिया गया। गांधी ने लगातार सवर्ण हिंदुओं से अस्पृश्यता छोड़ने और बहिष्कृत वर्गों के साथ समान व्यवहार करने की अपील की। इससे मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक कुएँ-तालाब, विद्यालय और सामाजिक मेल-जोल जैसे विषय व्यापक सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बने।
➣ हरिजन सेवक संघ ने गांधी के अभियान को संगठित रूप दिया। इसके माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में शिक्षा, छात्रवृत्ति, स्वच्छता, चिकित्सा सहायता और सामाजिक सुधार के कार्य किए गए। मालाबार जैसे क्षेत्रों में विद्यार्थियों को सामान्य विद्यालयों में प्रवेश दिलाने और स्थानीय सामाजिक संस्थाएँ विकसित करने के प्रयास किए गए।
➣ गांधी की 1933–34 की राष्ट्रव्यापी हरिजन यात्रा ने आंदोलन को पूरे देश में फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस यात्रा के दौरान उन्होंने सार्वजनिक सभाओं के माध्यम से अस्पृश्यता के विरुद्ध जनमत तैयार किया और हरिजन कार्य के लिए बड़ी मात्रा में आर्थिक सहायता जुटाई। इससे सामाजिक सुधार का प्रश्न केवल राजनीतिक नेताओं तक सीमित नहीं रहा।
➣ मंदिर प्रवेश के क्षेत्र में भी आंदोलन का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। त्रावणकोर मंदिर प्रवेश उद्घोषणा (12 नवंबर 1936) इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है, जिसके द्वारा त्रावणकोर के हिंदू मंदिरों में पहले अस्पृश्य माने जाने वाले समुदायों के प्रवेश का मार्ग खुला। हालांकि इसे केवल गांधी के आंदोलन का परिणाम नहीं माना जा सकता।
➣ गांधी के हरिजन अभियान का एक अन्य महत्व यह था कि उसने सवर्ण समाज को भी अस्पृश्यता के प्रश्न के सामने खड़ा किया। गांधी का जोर केवल पीड़ित समुदाय को संगठित करने पर नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था के भीतर परिवर्तन पैदा करने पर भी था जिसने अस्पृश्यता को बनाए रखा था।
हरिजन आंदोलन की सीमाएँ
➣ हरिजन आंदोलन की सबसे बड़ी सीमा यह रही कि अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुए। सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन कई क्षेत्रों में बहुत धीमा रहा और केवल जनजागरण से सदियों पुरानी जातिगत धारणाओं को समाप्त करना संभव नहीं था।
➣ आंदोलन का मुख्य जोर लंबे समय तक सामाजिक सुधार, नैतिक अपील और सवर्ण समाज के परिवर्तन पर रहा। इसके कारण दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सत्ता में हिस्सेदारी और अपने नेतृत्व के प्रश्न को वह स्थान नहीं मिला जिसकी मांग डॉ. अंबेडकर जैसे नेता कर रहे थे।
➣ गांधी की पद्धति में अस्पृश्यता का विरोध तो स्पष्ट था, लेकिन जाति-व्यवस्था के पूर्ण उन्मूलन का प्रश्न उनके विचारों में अंबेडकर की तुलना में अलग रूप में उपस्थित था। यही अंतर आगे चलकर दोनों के बीच वैचारिक मतभेद का एक प्रमुख आधार बना।
➣ हरिजन शब्द भी आंदोलन की सीमा और आलोचना का विषय बना। गांधी इसे सम्मानजनक संबोधन मानते थे, लेकिन बाद में अनेक दलित नेताओं ने इसे ऊपर से दिया गया और संरक्षणवादी संबोधन माना। अंबेडकर सहित कई दलित कार्यकर्ताओं का जोर इस बात पर था कि केवल नाम बदलने से सामाजिक स्थिति नहीं बदलेगी।
हरिजन आंदोलन पर डॉ. अंबेडकर का दृष्टिकोण
➣ डॉ. बी. आर. अंबेडकर अस्पृश्यता समाप्त करने के गांधी के उद्देश्य से असहमत नहीं थे, लेकिन वे गांधी की कार्य-पद्धति और दलित प्रतिनिधित्व की अवधारणा के कई पहलुओं के आलोचक थे।
➣ उनका मानना था कि दलितों की मुक्ति के लिए केवल सवर्ण समाज की नैतिक आत्मशुद्धि पर्याप्त नहीं है। उन्हें राजनीतिक शक्ति, शिक्षा, स्वतंत्र संगठन और कानूनी सुरक्षा भी चाहिए।
➣ अंबेडकर के अनुसार दलितों को अपने प्रतिनिधि चुनने का स्वतंत्र राजनीतिक अधिकार मिलना चाहिए। इसी कारण उन्होंने 1932 में पृथक निर्वाचक मंडल की मांग का समर्थन किया, जबकि गांधी इसके विरोधी थे।
➣ यह मतभेद केवल चुनावी व्यवस्था का प्रश्न नहीं था, बल्कि इस बात से जुड़ा था कि दलितों का प्रतिनिधित्व कौन करेगा – दलित स्वयं या व्यापक हिंदू/राष्ट्रीय संगठन?
➣ गांधी और कांग्रेस के सामाजिक सुधार संबंधी दावों के प्रति अंबेडकर का अविश्वास 14 अगस्त 1931 को बंबई के मणि भवन में हुई उनकी गांधी से बातचीत में भी स्पष्ट दिखाई दिया। बातचीत के दौरान अंबेडकर ने कहा कि वे बड़े नेताओं और महात्माओं पर निर्भर रहने के बजाय self-help and self-respect में विश्वास करते हैं।
➣ इसी संदर्भ में उन्होंने गांधी के प्रति अपना प्रसिद्ध तीखा कथन दिया – History tells that Mahatmas, like fleeting phantoms, raise dust, but raise no level. अर्थात्, उनके अनुसार महात्मा क्षणिक प्रभाव तो पैदा कर सकते हैं, लेकिन इससे समाज के वास्तविक स्तर में आवश्यक परिवर्तन नहीं आता।
इतिहास गवाह है कि महात्मा लोग क्षणभंगुर प्रेत/बुलबुलों की तरह होते हैं, जो धूल तो उड़ाते हैं पर स्तर नहीं उठाते।
➣ इस कथन का संदर्भ केवल व्यक्तिगत आलोचना नहीं था। अंबेडकर का मुख्य आरोप था कि कांग्रेस और हिंदू समाज ने दलितों की स्थिति में पर्याप्त वास्तविक परिवर्तन नहीं किया।
➣ वे चाहते थे कि दलित स्वयं अपने अधिकारों के लिए संगठित हों और अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर उनका नियंत्रण हो। इसलिए उनका जोर आत्म-सहायता, आत्मसम्मान और स्वतंत्र संगठन पर था।
➣ अंबेडकर ने हरिजन शब्द की अवधारणा पर भी आपत्ति की। उनका जोर इस बात पर था कि दलितों को समान नागरिक और अधिकार-संपन्न समुदाय के रूप में देखा जाए, न कि किसी दूसरे समूह द्वारा संरक्षण दिए जाने वाले समुदाय के रूप में। इस दृष्टि से गांधी का हरिजन सेवा मॉडल और अंबेडकर का स्वतंत्र अधिकार एवं राजनीतिक शक्ति का मॉडल अलग दिखाई देता है।
➣ अंबेडकर की आलोचना का एक महत्वपूर्ण आधार यह भी था कि यदि जाति-व्यवस्था की मूल संरचना बनी रहती है, तो केवल अस्पृश्यता के कुछ व्यवहारिक रूपों को समाप्त करने से सामाजिक बराबरी पूरी तरह स्थापित नहीं हो सकती। इसलिए वे सामाजिक सुधार के साथ जाति के मूल ढाँचे को चुनौती देने पर अधिक जोर देते थे।
➣ फिर भी गांधी के हरिजन आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व कम नहीं होता। इसने अस्पृश्यता को देशव्यापी सार्वजनिक प्रश्न बनाया, सामाजिक सुधार को व्यापक जनसमर्थन दिया और कई क्षेत्रों में व्यवहारिक सुधारों के लिए वातावरण तैयार किया।
➣ दूसरी ओर अंबेडकर की आलोचना ने यह महत्वपूर्ण प्रश्न सामने रखा कि सामाजिक समानता के साथ राजनीतिक शक्ति और स्वतंत्र प्रतिनिधित्व भी क्यों आवश्यक हैं।
➣ इस प्रकार गांधी के हरिजन आंदोलन को जनजागरण और सामाजिक सुधार की व्यापक पहल के रूप में, जबकि अंबेडकर की आलोचना को स्वतंत्र अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आत्मसम्मान और जाति-व्यवस्था के मूल परिवर्तन पर जोर देने वाली वैकल्पिक दृष्टि के रूप में समझा जा सकता है।
गांधी और अंबेडकर के विचारों में समानताएँ
➣ महात्मा गांधी और डॉ. बी. आर. अंबेडकर के बीच अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता के प्रश्न पर कई महत्वपूर्ण मतभेद थे, लेकिन दोनों का अंतिम लक्ष्य पूरी तरह विपरीत नहीं था।
➣ दोनों ही बहिष्कृत वर्गों की स्थिति में सुधार और उन्हें अधिक सम्मान तथा अधिकार दिलाने के पक्ष में थे। अंतर मुख्यतः सामाजिक परिवर्तन की पद्धति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर था।
| पहलू | महात्मा गांधी | डॉ. बी. आर. अंबेडकर |
|---|---|---|
| अस्पृश्यता का विरोध | अस्पृश्यता को गंभीर सामाजिक बुराई मानकर उसके उन्मूलन के लिए व्यापक अभियान चलाया। | अस्पृश्यता को सामाजिक अन्याय का गंभीर रूप मानकर उसके समाप्ति के लिए संघर्ष किया। |
| सामाजिक समानता | बहिष्कृत वर्गों को हिंदू समाज में समान सम्मान और स्थान देने पर जोर। | सामाजिक और नागरिक जीवन में पूर्ण समानता तथा समान अधिकार पर जोर। |
| शिक्षा | बहिष्कृत वर्गों की शिक्षा को उनके उत्थान का महत्वपूर्ण साधन माना। | शिक्षा को सामाजिक मुक्ति और आत्मनिर्भरता का प्रमुख साधन माना। |
| सार्वजनिक सुविधाएँ | कुएँ, तालाब, सड़कें, विद्यालय और अन्य सार्वजनिक सुविधाएँ सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध कराने के पक्ष में। | सार्वजनिक संसाधनों पर समान नागरिक अधिकार को आवश्यक माना और इसके लिए प्रत्यक्ष आंदोलन किए। |
| मंदिर प्रवेश | अस्पृश्यता समाप्त करने और हिंदू समाज में सुधार के लिए मंदिर प्रवेश का समर्थन। | मंदिर प्रवेश को सामाजिक समानता के संघर्ष का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना और मंदिर प्रवेश आंदोलनों का नेतृत्व किया। |
| आत्मसम्मान | बहिष्कृत वर्गों के प्रति सम्मानजनक व्यवहार और सामाजिक दूरी समाप्त करने पर जोर। | आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और अपने अधिकारों के लिए स्वयं संघर्ष करने पर विशेष जोर। |
| सामाजिक सुधार की आवश्यकता | राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक सुधार को भी आवश्यक माना। | राजनीतिक स्वतंत्रता को सामाजिक समानता और न्याय के बिना अधूरा माना। |
| संगठन का महत्व | हरिजन सेवक संघ जैसे संगठनों के माध्यम से सामाजिक सुधार को संगठित करने का प्रयास। | बहिष्कृत हितकारिणी सभा, इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी और अन्य संगठनों के माध्यम से स्वतंत्र संगठन पर जोर। |
➣ इस प्रकार गांधी और अंबेडकर दोनों अस्पृश्यता के विरोध, शिक्षा, सामाजिक सम्मान और समानता के पक्षधर थे। मुख्य अंतर यह था कि गांधी अधिकतर समाज के भीतर नैतिक और सामाजिक सुधार के माध्यम से परिवर्तन चाहते थे, जबकि अंबेडकर कानूनी अधिकार, स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संगठन और जाति-व्यवस्था के मूल परिवर्तन को अधिक निर्णायक मानते थे।
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ हरिजन आंदोलन महात्मा गांधी द्वारा अस्पृश्यता के विरुद्ध चलाया गया व्यापक सामाजिक सुधार अभियान था, जिसे 1932 के बाद अधिक संगठित रूप दिया गया।
➣ 30 सितंबर 1932 को All-India Anti-Untouchability League की स्थापना हुई।
➣ इस संस्था के अध्यक्ष घनश्यामदास बिड़ला तथा सचिव अमृतलाल विठ्ठलदास ठक्कर (ठक्कर बापा) बनाए गए।
➣ संस्था का प्रारंभिक नाम All-India Anti-Untouchability League था, जिसे बाद में बदलकर Harijan Sevak Sangh (हरिजन सेवक संघ) कर दिया गया।
➣ नाम परिवर्तन का एक कारण वी. आर. शिंदे की आपत्ति थी, क्योंकि उनकी संस्था का नाम इससे मिलता-जुलता था। गांधी ने नया नाम अपनाने का सुझाव दिया।
➣ गांधी ने अस्पृश्य माने जाने वाले समुदायों के लिए हरिजन शब्द का प्रयोग किया। डॉ. बी. आर. अंबेडकर इस शब्द को स्वीकार नहीं करते थे और सामाजिक समानता के लिए जाति-व्यवस्था के मूल परिवर्तन तथा स्वतंत्र अधिकारों पर जोर देते थे।
➣ 11 फरवरी 1933 को गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजी साप्ताहिक Harijan का पहला अंक प्रकाशित हुआ।
➣ 23 फरवरी 1933 से हिंदी में Harijan Sevak का प्रकाशन शुरू हुआ।
➣ 12 मार्च 1933 से गुजराती में Harijanbandhu का प्रकाशन शुरू हुआ।
➣ इन पत्र-पत्रिकाओं का मुख्य उद्देश्य अस्पृश्यता के विरुद्ध जनजागरण और सामाजिक सुधार के विचारों का प्रचार करना था।
➣ 7 नवंबर 1933 को गांधी ने वर्धा से अपना राष्ट्रव्यापी हरिजन दौरा शुरू किया।
➣ हरिजन यात्रा का मुख्य उद्देश्य अस्पृश्यता के विरुद्ध जनमत तैयार करना, सामाजिक सुधार को बढ़ावा देना और हरिजन कार्य के लिए चंदा जुटाना था।
➣ यात्रा के दौरान Gandhi Harijan Purse Fund के लिए बड़ी मात्रा में धन और आभूषण एकत्र किए गए।
➣ 2 मार्च 1934 तक उपलब्ध विवरण के अनुसार यात्रा के दौरान लगभग ₹3,52,130, 9 आने और 7 पाई एकत्र किए जा चुके थे।
➣ 25 अप्रैल 1934 को बिहार में गांधी की हरिजन यात्रा के दौरान उनके विरोध में भीड़ द्वारा हमला किया गया।
➣ 9 मई 1934 को गांधी ने उड़ीसा में हरिजन कार्य के लिए पैदल यात्रा शुरू की।
➣ 25 जून 1934 को पूना में गांधी की मोटर-यात्रा को निशाना बनाकर बम फेंका गया। गांधी सुरक्षित रहे, लेकिन कई लोग घायल हुए।
➣ हरिजन आंदोलन के अंतर्गत मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक कुएँ और तालाब, सड़कें, विद्यालय, छात्रवृत्ति, स्वच्छता और चिकित्सा सहायता जैसे सामाजिक सुधार कार्यों पर जोर दिया गया।
➣ अप्रैल 1935 में कालिकट में Temple Entry Conference आयोजित किया गया और 20 अप्रैल 1935 को Temple Entry Day मनाने का निर्णय लिया गया।
➣ मालाबार में हरिजन सेवक संघ से जुड़े प्रयासों के तहत लगभग 135 हरिजन विद्यार्थियों को सामान्य विद्यालयों में प्रवेश दिलाने में सहायता की गई तथा विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति, पुस्तकें और कपड़े जैसी सहायता दी गई।
➣ हरिजन सेवा के सामाजिक कार्यक्रमों में बस्तियों की सफाई, कुओं की मरम्मत और चिकित्सा सहायता भी शामिल थे।
➣ 12 नवंबर 1936 को त्रावणकोर के महाराजा श्री चिथिरा तिरुनाल बलराम वर्मा ने मंदिर प्रवेश उद्घोषणा (Temple Entry Proclamation) जारी की।
➣ इस उद्घोषणा के द्वारा त्रावणकोर के हिंदू मंदिरों में उन समुदायों के प्रवेश पर लगे जातिगत प्रतिबंध हटाए गए जिन्हें पहले अस्पृश्य माना जाता था।
➣ वैकोम सत्याग्रह (1924–25) में मुख्य प्रश्न सार्वजनिक सड़कों पर आवागमन का था, जबकि 1936 की त्रावणकोर मंदिर प्रवेश उद्घोषणा ने मंदिर प्रवेश और पूजा के अधिकार को व्यापक रूप से मान्यता दी।
➣ हरिजन आंदोलन की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि गांधी ने अस्पृश्यता के खिलाफ सामाजिक सुधार और नैतिक जनजागरण पर जोर दिया, जबकि डॉ. अंबेडकर ने स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व, कानूनी सुरक्षा और जाति-व्यवस्था के मूल परिवर्तन को अधिक महत्व दिया।
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