हिन्दू महासभा (1915)
➣ हिन्दू महासभा की स्थापना 1915 ई. में हरिद्वार में आयोजित कुंभ मेले के अवसर पर की गई। इसका उद्देश्य विभिन्न प्रांतीय हिन्दू सभाओं को एक अखिल भारतीय मंच पर संगठित करना तथा हिन्दू समाज के सामाजिक, शैक्षिक एवं राजनीतिक हितों का प्रतिनिधित्व करना था।
➣ 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व, पृथक निर्वाचन तथा विभिन्न समुदायों के राजनीतिक अधिकारों का प्रश्न महत्वपूर्ण होता जा रहा था। ऐसे समय में हिन्दू महासभा एक ऐसे संगठन के रूप में उभरी, जिसने हिन्दू समाज के संगठन और उसके राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर विशेष बल दिया।
➣ स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान हिन्दू महासभा ने समय-समय पर विभिन्न राष्ट्रीय एवं राजनीतिक प्रश्नों पर अपनी अलग नीति अपनाई। इसके प्रमुख नेताओं में मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय, बी. एस. मुंजे, एन. सी. केलकर तथा बाद में विनायक दामोदर सावरकर प्रमुख थे।
पृष्ठभूमि
➣ 1906 ई. में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना तथा 1909 ई. के भारतीय परिषद अधिनियम (मॉर्ले-मिंटो सुधार) के अंतर्गत मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था लागू होने के बाद भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का महत्व बढ़ गया।
➣ इसी समय देश के विभिन्न प्रांतों में पंजाब हिन्दू सभा, उत्तर प्रदेश हिन्दू सभा, बंगाल हिन्दू सभा जैसी अनेक प्रांतीय हिन्दू सभाएँ सक्रिय थीं। ये संस्थाएँ मुख्यतः हिन्दू समाज के सामाजिक, शैक्षिक तथा राजनीतिक हितों से जुड़े विषयों पर कार्य करती थीं, किन्तु इनके बीच कोई अखिल भारतीय समन्वय नहीं था।
➣ 1909 ई. में पंजाब हिन्दू सभा की स्थापना के बाद एक अखिल भारतीय संगठन बनाने की आवश्यकता अधिक महसूस की जाने लगी। लाला लाजपत राय, मदन मोहन मालवीय, लाल चंद, यू. एन. मुखर्जी तथा अन्य नेताओं ने विभिन्न हिन्दू सभाओं को एक साझा मंच पर लाने का प्रयास किया।
➣ इस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पूरे देश का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती थी, फिर भी कुछ नेताओं का मत था कि हिन्दू समाज के सामाजिक एवं राजनीतिक प्रश्नों पर विचार करने के लिए एक पृथक अखिल भारतीय संगठन की आवश्यकता है। इन्हीं परिस्थितियों ने हिन्दू महासभा की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
हिन्दू महासभा की स्थापना (1915)
➣ 1915 ई. में हरिद्वार में आयोजित कुंभ मेले के अवसर पर देश की विभिन्न प्रांतीय हिन्दू सभाओं को मिलाकर अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की स्थापना की गई। उद्देश्य पूरे भारत में हिन्दू समाज का एक साझा मंच तैयार करना था।
➣ हिन्दू महासभा किसी एक प्रांत तक सीमित संगठन नहीं थी, बल्कि इसका गठन विभिन्न क्षेत्रों में पहले से कार्यरत हिन्दू सभाओं के समन्वय से किया गया था। इसी कारण स्थापना के समय से ही इसे अखिल भारतीय स्वरूप प्राप्त हुआ।
➣ प्रारम्भिक वर्षों में हिन्दू महासभा का मुख्य ध्यान हिन्दू समाज का संगठन, शिक्षा का प्रसार, सामाजिक सुधार तथा हिन्दुओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे विषयों पर रहा। बाद के वर्षों में इसकी राजनीतिक गतिविधियाँ अधिक सक्रिय होती गईं और यह भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण संगठन बनकर उभरा।
प्रारम्भिक विकास
➣ स्थापना के बाद अखिल भारतीय हिन्दू महासभा ने देश के विभिन्न प्रांतों में पहले से कार्यरत हिन्दू सभाओं को एक साझा मंच पर संगठित करने का प्रयास किया। इसका उद्देश्य किसी नए संगठन की स्थापना करना नहीं, बल्कि विभिन्न प्रांतीय हिन्दू सभाओं के बीच समन्वय स्थापित करना था।
➣ प्रारम्भिक वर्षों में हिन्दू महासभा का कार्यक्षेत्र मुख्यतः सामाजिक संगठन, शिक्षा का प्रसार, हिन्दू समाज की एकता तथा हिन्दुओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े विषयों तक सीमित रहा। उस समय यह एक व्यापक जनआन्दोलन के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षित वर्ग एवं सामाजिक नेताओं के संगठन के रूप में विकसित हुई।
➣ 1915 ई. से लेकर 1920 के दशक तक हिन्दू महासभा ने अपने वार्षिक अधिवेशनों के माध्यम से विभिन्न सामाजिक एवं राजनीतिक विषयों पर विचार-विमर्श किया। धीरे-धीरे इसकी शाखाओं का विस्तार उत्तर भारत, पंजाब, बंगाल, संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश), बिहार तथा मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों तक हुआ।
➣ समय के साथ भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व, पृथक निर्वाचन, खिलाफत आन्दोलन तथा हिन्दू-मुस्लिम संबंधों जैसे विषय प्रमुख होने लगे। इन परिस्थितियों के कारण हिन्दू महासभा की राजनीतिक भूमिका भी पहले की तुलना में अधिक सक्रिय होती गई।
प्रमुख उद्देश्य
➣ हिन्दू महासभा का मुख्य उद्देश्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले हिन्दू समाज को एक अखिल भारतीय संगठन के रूप में संगठित करना था।
➣ संगठन ने शिक्षा के प्रसार, सामाजिक सुधार, अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराइयों को दूर करने तथा हिन्दू समाज में संगठन एवं सहयोग की भावना विकसित करने पर बल दिया।
➣ हिन्दू महासभा का मानना था कि बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में हिन्दू समाज के हितों एवं राजनीतिक अधिकारों का प्रभावी प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इसी कारण यह विधायी परिषदों तथा अन्य राजनीतिक संस्थाओं में हिन्दुओं के प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रश्नों को भी उठाती रही।
➣ संगठन ने हिन्दू समाज में सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय भावना तथा सामाजिक एकता को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न सभाओं, सम्मेलनों एवं सार्वजनिक कार्यक्रमों का आयोजन किया।
➣ आगे चलकर विशेषकर 1930 के दशक में हिन्दू महासभा का राजनीतिक स्वरूप अधिक स्पष्ट हुआ और उसने अनेक राष्ट्रीय एवं राजनीतिक प्रश्नों पर अपनी स्वतंत्र नीति प्रस्तुत की।
प्रमुख नेता
➣ हिन्दू महासभा के विकास में अनेक सामाजिक एवं राजनीतिक नेताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा। प्रारम्भिक वर्षों में मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय, लाल चंद, यू. एन. मुखर्जी, बी. एस. मुंजे तथा एन. सी. केलकर जैसे नेताओं ने संगठन को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ इन नेताओं ने विभिन्न प्रांतीय हिन्दू सभाओं के बीच समन्वय स्थापित करने, संगठन का विस्तार करने तथा हिन्दू समाज से जुड़े सामाजिक एवं राजनीतिक प्रश्नों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का प्रयास किया।
➣ 1937 ई. में विनायक दामोदर सावरकर हिन्दू महासभा के अध्यक्ष बने। उनके नेतृत्व में संगठन की राजनीतिक गतिविधियों का विस्तार हुआ और हिन्दू महासभा भारतीय राजनीति में अधिक सक्रिय रूप से सामने आई। सावरकर के नेतृत्वकाल की नीतियों एवं गतिविधियों का विवरण अगले भाग में दिया गया है।
वीर सावरकर के नेतृत्व में हिन्दू महासभा
➣ 1937 ई. में विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) हिन्दू महासभा के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। उनके नेतृत्व में हिन्दू महासभा का स्वरूप पहले की अपेक्षा अधिक राजनीतिक हो गया और संगठन ने राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपनी स्पष्ट नीति प्रस्तुत करनी प्रारम्भ की।
➣ सावरकर ने हिन्दू महासभा के माध्यम से हिन्दू संगठन पर विशेष बल दिया। उनका मत था कि बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में हिन्दू समाज को संगठित, शिक्षित तथा आत्मरक्षा के लिए सक्षम होना चाहिए।
➣ 1937 से 1943 ई. के बीच सावरकर लगातार कई बार हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने गए। इस अवधि में संगठन का विस्तार विभिन्न प्रांतों में हुआ तथा अनेक राजनीतिक विषयों पर हिन्दू महासभा ने अपने स्वतंत्र प्रस्ताव पारित किए।
➣ द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) के दौरान सावरकर ने भारतीय युवाओं को ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती होकर सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त करने का आह्वान किया। उनका तर्क था कि आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण भविष्य में भारत के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।
➣ सावरकर ने अपने लेखन और भाषणों के माध्यम से हिन्दुत्व की अवधारणा को भी विस्तार से प्रस्तुत किया। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिन्दुत्व : हू इज़ ए हिन्दू?’ (1923) हिन्दू महासभा की वैचारिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
स्वतंत्रता आन्दोलन में भूमिका
➣ हिन्दू महासभा ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अनेक नीतियों से सहमति भी व्यक्त की और कई विषयों पर असहमति भी रखी। विशेष रूप से खिलाफत आन्दोलन (1919–1924), पृथक निर्वाचन तथा साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व जैसे प्रश्नों पर उसका दृष्टिकोण कांग्रेस से भिन्न था।
➣ 1930 एवं 1940 के दशक में हिन्दू महासभा भारतीय राजनीति के प्रमुख संगठनों में शामिल हो गई। इस अवधि में उसने विभिन्न प्रांतीय चुनावों में भाग लिया तथा कुछ प्रांतों में अन्य राजनीतिक दलों के साथ मिलकर सरकारों में भी भागीदारी की।
➣ 1940 ई. में मुस्लिम लीग द्वारा लाहौर प्रस्ताव (पाकिस्तान प्रस्ताव) प्रस्तुत किए जाने के बाद हिन्दू महासभा ने भारत के विभाजन का विरोध किया तथा अखंड भारत की अवधारणा का समर्थन किया।
➣ स्वतंत्रता आन्दोलन के अंतिम चरण में हिन्दू महासभा भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण संगठन बनी रही, यद्यपि जनाधार और लोकप्रियता की दृष्टि से उसका प्रभाव भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की तुलना में सीमित था।
समयरेखा (Timeline)
| वर्ष / तिथि | प्रमुख घटना |
|---|---|
| 1909 ई. | पंजाब हिन्दू सभा की स्थापना; बाद में इसी ने अखिल भारतीय संगठन के गठन की पृष्ठभूमि तैयार की। |
| 1909 ई. | मॉर्ले-मिंटो सुधार के अंतर्गत मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था लागू हुई। |
| 1915 ई. | हरिद्वार के कुंभ मेले के अवसर पर अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की स्थापना हुई। |
| 1919–1924 ई. | खिलाफत आन्दोलन के दौरान हिन्दू महासभा ने कांग्रेस से भिन्न दृष्टिकोण अपनाया। |
| 1937 ई. | वीर सावरकर हिन्दू महासभा के अध्यक्ष बने। |
| 1937–1943 ई. | सावरकर के नेतृत्व में हिन्दू महासभा की राजनीतिक गतिविधियों का विस्तार हुआ। |
| 1939 ई. | द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ; हिन्दू महासभा ने भारतीय युवाओं को सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त करने का आह्वान किया। |
| 1940 ई. | मुस्लिम लीग के लाहौर प्रस्ताव (पाकिस्तान प्रस्ताव) का विरोध करते हुए हिन्दू महासभा ने अखंड भारत का समर्थन किया। |
| 1947 ई. | भारत की स्वतंत्रता एवं विभाजन के समय हिन्दू महासभा भारतीय राजनीति के प्रमुख संगठनों में से एक थी। |
सारांश (Oneliner)
- अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की स्थापना 1915 ई. में हरिद्वार में आयोजित कुंभ मेले के अवसर पर विभिन्न प्रांतीय हिन्दू सभाओं को एक मंच पर लाकर की गई थी।
- हिन्दू महासभा की स्थापना की पृष्ठभूमि में 1906 ई. में मुस्लिम लीग की स्थापना, 1909 ई. के मॉर्ले-मिंटो सुधार तथा पृथक निर्वाचन जैसी राजनीतिक घटनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
- संगठन का प्रारम्भिक उद्देश्य हिन्दू समाज का संगठन, शिक्षा का प्रसार, सामाजिक सुधार तथा हिन्दुओं के सामाजिक एवं राजनीतिक हितों का प्रतिनिधित्व करना था।
- प्रारम्भिक वर्षों में मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय, बी. एस. मुंजे, एन. सी. केलकर, लाल चंद तथा यू. एन. मुखर्जी जैसे नेताओं ने हिन्दू महासभा के संगठनात्मक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- 1937 ई. में विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) हिन्दू महासभा के अध्यक्ष बने। उनके नेतृत्व में संगठन की राजनीतिक गतिविधियों का विस्तार हुआ तथा हिन्दू संगठन और सैन्यीकरण पर विशेष बल दिया गया।
- द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) के दौरान हिन्दू महासभा ने भारतीय युवाओं से सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त करने का आह्वान किया।
- हिन्दू महासभा ने खिलाफत आन्दोलन, पृथक निर्वाचन तथा अन्य कई राजनीतिक प्रश्नों पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग दृष्टिकोण अपनाया।
- 1940 ई. में मुस्लिम लीग द्वारा प्रस्तुत लाहौर प्रस्ताव (पाकिस्तान प्रस्ताव) का हिन्दू महासभा ने विरोध किया तथा अखंड भारत की अवधारणा का समर्थन किया।
- स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान हिन्दू महासभा भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण संगठन रही, यद्यपि जनाधार की दृष्टि से उसका प्रभाव भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की तुलना में सीमित था।
- आधुनिक भारत के राजनीतिक इतिहास में हिन्दू महासभा का महत्व एक ऐसे संगठन के रूप में है जिसने हिन्दू समाज के संगठन, उसके सामाजिक-राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा विभिन्न राष्ट्रीय प्रश्नों पर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक नीति प्रस्तुत की।
कुछ महत्वपूर्ण भ्रम-बिंदु
➣ अनेक विद्यार्थी मानते हैं कि हिन्दू महासभा की स्थापना वीर सावरकर ने की थी। यह सही नहीं है। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की स्थापना 1915 ई. में हरिद्वार में हुई थी, जबकि वीर सावरकर 1937 ई. में इसके अध्यक्ष बने थे।
➣ यह भी भ्रम रहता है कि हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) एक ही संगठन हैं। वास्तव में दोनों अलग-अलग संगठन थे। हिन्दू महासभा एक राजनीतिक संगठन थी, जबकि RSS की स्थापना 1925 ई. में एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में हुई थी।
➣ कई बार परीक्षाओं में पूछा जाता है कि हिन्दू महासभा की स्थापना 1906 ई. में हुई थी। यह गलत है। 1906 ई. में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई थी, जबकि हिन्दू महासभा की स्थापना 1915 ई. में हुई।
➣ यह भी ध्यान रखें कि हिन्दू महासभा की स्थापना किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं की गई थी। इसका गठन विभिन्न प्रांतीय हिन्दू सभाओं को एक अखिल भारतीय मंच पर संगठित करके किया गया था।
➣ मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय, बी. एस. मुंजे तथा अन्य नेताओं ने हिन्दू महासभा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया, किन्तु इन्हें संगठन का एकमात्र संस्थापक मानना सही नहीं होगा।
➣ एक अन्य सामान्य भ्रम यह है कि वीर सावरकर हिन्दू महासभा के प्रथम अध्यक्ष थे। वास्तव में वे 1937 ई. में अध्यक्ष बने थे। स्थापना के समय संगठन का नेतृत्व अन्य वरिष्ठ नेताओं के हाथों में था।
➣ कई विद्यार्थी यह भी समझते हैं कि हिन्दू महासभा ने मुस्लिम लीग के लाहौर प्रस्ताव (1940) का समर्थन किया था। वास्तव में हिन्दू महासभा ने इस प्रस्ताव का विरोध किया तथा अखंड भारत की अवधारणा का समर्थन किया।
➣ यह कहना भी सही नहीं होगा कि हिन्दू महासभा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नीतियाँ पूरी तरह समान थीं। अनेक राष्ट्रीय विषयों पर दोनों के विचार अलग थे, विशेषकर खिलाफत आन्दोलन, पृथक निर्वाचन तथा साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व जैसे प्रश्नों पर।
➣ कुछ लोग हिन्दू महासभा को केवल धार्मिक संगठन मानते हैं, जबकि वास्तव में यह एक राजनीतिक संगठन भी था, जिसने हिन्दू समाज के सामाजिक, शैक्षिक एवं राजनीतिक हितों से जुड़े अनेक विषयों पर कार्य किया।
➣ यह धारणा भी सही नहीं है कि हिन्दू महासभा स्वतंत्रता आन्दोलन में पूरी तरह निष्क्रिय रही। यद्यपि उसकी नीतियाँ कई मामलों में कांग्रेस से भिन्न थीं, फिर भी उसने राष्ट्रीय एवं राजनीतिक प्रश्नों पर अपनी स्वतंत्र नीति प्रस्तुत की और भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई।
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