जस्टिस पार्टी (1916–1944): गैर-ब्राह्मण आंदोलन और दक्षिण भारत की राजनीति

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत जस्टिस पार्टी (1916–1944)
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जस्टिस पार्टी (1916)

जस्टिस पार्टी, जिसका औपचारिक नाम साउथ इंडियन लिबरल फेडरेशन (South Indian Liberal Federation – SILF) था, मद्रास प्रेसीडेंसी की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक संस्था थी।

➣ इसका गठन मुख्यतः गैर-ब्राह्मण समुदायों के राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक हितों की रक्षा और उन्हें प्रशासन एवं सार्वजनिक जीवन में उचित प्रतिनिधित्व दिलाने के उद्देश्य से किया गया था।

➣ जस्टिस पार्टी ने गैर-ब्राह्मण आंदोलन को एक संगठित राजनीतिक रूप प्रदान किया और मद्रास प्रेसीडेंसी की राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा, सरकारी नौकरियों तथा राजनीतिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। इसने उस समय की राजनीति में ब्राह्मण प्रभुत्व के विरुद्ध गैर-ब्राह्मण समुदायों के हितों को एक प्रभावी मंच प्रदान किया।

➣ जस्टिस पार्टी का प्रभाव केवल तत्कालीन प्रांतीय राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसकी राजनीतिक एवं सामाजिक विचारधारा ने आगे चलकर दक्षिण भारत में विकसित होने वाले द्रविड़ आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण आधार तैयार किया।

➣ इस कारण भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के साथ-साथ दक्षिण भारत के सामाजिक न्याय एवं गैर-ब्राह्मण आंदोलन के इतिहास में जस्टिस पार्टी का विशेष महत्व है।

जस्टिस पार्टी की स्थापना की पृष्ठभूमि

मद्रास प्रेसीडेंसी में सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियाँ

19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मद्रास प्रेसीडेंसी में आधुनिक शिक्षा, प्रशासनिक संस्थाओं तथा राजनीतिक गतिविधियों के विस्तार के साथ विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच शिक्षा, सरकारी नौकरियों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी। अंग्रेजी शिक्षा और आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था का लाभ उठाने वाले समूहों में ब्राह्मणों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक थी, जिसके कारण प्रशासन, शिक्षा, कानून तथा सार्वजनिक जीवन के अनेक क्षेत्रों में उनका प्रभाव बढ़ गया।

➣ इस स्थिति से अनेक गैर-ब्राह्मण शिक्षित एवं संपन्न वर्गों में यह भावना विकसित हुई कि आधुनिक प्रशासन और राजनीति में उनकी जनसंख्या के अनुपात में पर्याप्त भागीदारी नहीं है। विशेष रूप से सरकारी सेवाओं, उच्च शिक्षा और प्रशासनिक पदों में प्रतिनिधित्व का प्रश्न धीरे-धीरे गैर-ब्राह्मण राजनीतिक चेतना का प्रमुख आधार बनने लगा।

➣ उपलब्ध 1912 के आँकड़ों के अनुसार, मद्रास प्रेसीडेंसी में ब्राह्मणों की जनसंख्या लगभग 3 प्रतिशत थी, लेकिन वे उच्च प्रशासनिक पदों में अपनी जनसंख्या के अनुपात से काफी अधिक प्रतिनिधित्व रखते थे। इस समय डिप्टी कलेक्टरों के लगभग 55 प्रतिशत और जिला मुंसिफों के लगभग 72.6 प्रतिशत पदों पर ब्राह्मण थे। इन आँकड़ों ने गैर-ब्राह्मण नेताओं के बीच प्रशासनिक सेवाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग को मजबूत किया।

ब्राह्मण प्रभुत्व के विरुद्ध असंतोष

➣ मद्रास प्रेसीडेंसी में प्रशासन, शिक्षा और सार्वजनिक संस्थाओं में ब्राह्मणों के अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व को लेकर गैर-ब्राह्मण वर्गों में असंतोष बढ़ने लगा। कुछ प्रभावशाली ब्राह्मण समूहों का प्रांतीय प्रशासन और सार्वजनिक जीवन में मजबूत प्रभाव माना जाता था। इनमें मायलापुर समूह का उल्लेख विशेष रूप से किया जाता है।

➣ हालांकि इस असंतोष को पूरे गैर-ब्राह्मण समाज की एक समान प्रतिक्रिया के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। प्रारंभिक गैर-ब्राह्मण राजनीति का नेतृत्व मुख्यतः शिक्षित, संपन्न और प्रभावशाली गैर-ब्राह्मण वर्गों ने किया। इन वर्गों की प्रमुख मांग प्रशासन, शिक्षा और राजनीतिक संस्थाओं में उचित प्रतिनिधित्व और अवसर प्राप्त करना थी। बाद के चरणों में यही राजनीति व्यापक रूप से सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के प्रश्नों से जुड़ती गई।

कांग्रेस और होमरूल आंदोलन के प्रति गैर-ब्राह्मणों की आशंकाएँ

➣ इसी दौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और होमरूल आंदोलन का प्रभाव मद्रास प्रेसीडेंसी में बढ़ रहा था। गैर-ब्राह्मण नेताओं के एक वर्ग को आशंका थी कि राजनीतिक सत्ता के भारतीयों के हाथों में आने पर यदि प्रशासनिक एवं राजनीतिक संस्थाओं में समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं किया गया, तो पहले से प्रभावशाली सामाजिक समूहों का प्रभुत्व बना रह सकता है।

एनी बेसेंट के होमरूल आंदोलन तथा मद्रास की कांग्रेस राजनीति में ब्राह्मण नेताओं के प्रभाव ने गैर-ब्राह्मण नेताओं के एक वर्ग की इन आशंकाओं को और मजबूत किया। परिणामस्वरूप उन्होंने गैर-ब्राह्मण समुदायों के हितों को स्वतंत्र रूप से संगठित करने और उनकी राजनीतिक मांगों को सामने रखने की आवश्यकता महसूस की।

प्रारंभिक गैर-ब्राह्मण संगठनों का उदय

➣ जस्टिस पार्टी के गठन से पहले ही मद्रास प्रेसीडेंसी में गैर-ब्राह्मणों को संगठित करने के प्रयास शुरू हो चुके थे। 1909 में पी. सुब्रह्मण्यम और एम. पुरुषोत्तम नायडू ने मद्रास नॉन-ब्राह्मिन एसोसिएशन स्थापित करने का प्रयास किया। इसका उद्देश्य गैर-ब्राह्मण समुदायों को संगठित करना था, लेकिन यह प्रयास व्यापक संगठन का रूप नहीं ले सका।

➣ इसके बाद 1912 में गैर-ब्राह्मण सरकारी कर्मचारियों और अन्य नेताओं के एक समूह ने मद्रास यूनाइटेड लीग (Madras United League) की स्थापना की। इसके सचिव के रूप में डॉ. सी. नटेसा मुदलियार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रारंभ में यह संगठन मुख्यतः सामाजिक गतिविधियों और गैर-ब्राह्मण समुदाय के बीच संगठन एवं जागरूकता बढ़ाने तक सीमित रहा।

1 अक्टूबर 1912 को मद्रास यूनाइटेड लीग का पुनर्गठन किया गया और इसका नाम मद्रास द्रविड़ियन एसोसिएशन कर दिया गया। इस संगठन ने मद्रास में अपनी शाखाएँ स्थापित कीं तथा गैर-ब्राह्मण समुदाय के बीच सामाजिक एवं शैक्षिक जागरूकता बढ़ाने का कार्य किया।

मद्रास द्रविड़ियन एसोसिएशन की प्रमुख गतिविधियों में गैर-ब्राह्मण छात्रों के लिए छात्रावास की स्थापना, गैर-ब्राह्मण स्नातकों के बीच सामाजिक संपर्क बढ़ाना तथा उनकी समस्याओं और मांगों को सामने लाना शामिल था। इन प्रयासों ने गैर-ब्राह्मण समुदाय के बीच एक संगठित सामाजिक एवं राजनीतिक चेतना विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ इस प्रकार मद्रास प्रेसीडेंसी में सामाजिक-राजनीतिक असमानता, प्रशासन एवं शिक्षा में प्रतिनिधित्व का प्रश्न, कांग्रेस की राजनीति को लेकर गैर-ब्राह्मण नेताओं की आशंकाएँ तथा प्रारंभिक गैर-ब्राह्मण संगठनों का विकास– इन सभी परिस्थितियों ने मिलकर आगे चलकर जस्टिस पार्टी के गठन की पृष्ठभूमि तैयार की।

जस्टिस पार्टी की स्थापना (1916)

➣ गैर-ब्राह्मण समुदायों को संगठित करने के पहले के प्रयासों और मद्रास प्रेसीडेंसी में बढ़ती राजनीतिक चेतना के परिणामस्वरूप 1916 में एक व्यापक गैर-ब्राह्मण राजनीतिक संगठन के गठन की दिशा में निर्णायक कदम उठाया गया।

20 नवंबर 1916 को मद्रास के विक्टोरिया पब्लिक हॉल में गैर-ब्राह्मण नेताओं की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। इस प्रयास में डॉ. सी. नटेसा मुदलियार, पी. त्यागराज चेट्टी और डॉ. टी. एम. नायर जैसे नेताओं ने प्रमुख भूमिका निभाई। इसी प्रक्रिया से साउथ इंडियन लिबरल फेडरेशन (South Indian Liberal Federation – SILF) का गठन हुआ।

➣ संगठन का औपचारिक नाम साउथ इंडियन लिबरल फेडरेशन रखा गया, जबकि इसके राजनीतिक कार्य और गतिविधियों को व्यापक रूप से गैर-ब्राह्मण हितों से जोड़ा गया। संगठन ने दक्षिण भारत के विभिन्न गैर-ब्राह्मण समुदायों को एक साझा राजनीतिक मंच प्रदान करने का प्रयास किया।

➣ संगठन को बाद में उसके अंग्रेजी दैनिक समाचार-पत्र Justice के नाम से लोकप्रिय रूप से जस्टिस पार्टी कहा जाने लगा। इस समाचार-पत्र का उपयोग गैर-ब्राह्मण समुदायों की समस्याओं, राजनीतिक मांगों और संगठन के विचारों को जनता तक पहुँचाने के लिए किया गया।

➣ जस्टिस पार्टी का गठन तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी में गैर-ब्राह्मण राजनीतिक संगठन निर्माण की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण परिणाम था। इससे पहले के विभिन्न सामाजिक संगठनों और आंदोलनों की तुलना में यह एक अधिक संगठित राजनीतिक मंच था, जिसने आगे चलकर मद्रास प्रेसीडेंसी की प्रांतीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रमुख संस्थापक एवं नेता

➣ जस्टिस पार्टी के गठन में मद्रास प्रेसीडेंसी के कई प्रमुख गैर-ब्राह्मण नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें विशेष रूप से पी. त्यागराज चेट्टी, डॉ. टी. एम. नायर और डॉ. सी. नटेसा मुदलियार का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इन नेताओं ने गैर-ब्राह्मण समुदायों को एक संगठित राजनीतिक मंच प्रदान करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

पी. त्यागराज चेट्टी

पी. त्यागराज चेट्टी जस्टिस पार्टी के प्रमुख संस्थापक नेताओं में से एक थे। वे मद्रास के प्रभावशाली गैर-ब्राह्मण नेताओं में शामिल थे और उन्होंने गैर-ब्राह्मण समुदायों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व एवं समान अवसर की मांग को संगठित रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ उन्होंने संगठन के निर्माण तथा गैर-ब्राह्मण समुदायों को एक साझा राजनीतिक मंच पर लाने के प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाई। जस्टिस पार्टी के प्रारंभिक संगठनात्मक विकास में उनका योगदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण था।

डॉ. टी. एम. नायर

डॉ. टी. एम. नायर जस्टिस पार्टी के प्रमुख संस्थापक नेताओं और प्रभावशाली राजनीतिक विचारकों में से एक थे। वे चिकित्सक होने के साथ-साथ सक्रिय सार्वजनिक कार्यकर्ता और पत्रकार भी थे। उन्होंने गैर-ब्राह्मण समुदायों के राजनीतिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व के प्रश्न को मजबूती से उठाया।

➣ डॉ. नायर ने संगठन के विचारों को व्यापक स्तर पर प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे Justice समाचार-पत्र से भी जुड़े रहे, जिसके कारण संगठन को व्यापक रूप से जस्टिस पार्टी के नाम से पहचान मिली।

डॉ. सी. नटेसा मुदलियार

डॉ. सी. नटेसा मुदलियार जस्टिस पार्टी के गठन से पहले के गैर-ब्राह्मण आंदोलन के प्रमुख संगठकों में से एक थे। उन्होंने मद्रास यूनाइटेड लीग तथा बाद में मद्रास द्रविड़ियन एसोसिएशन के माध्यम से गैर-ब्राह्मण समुदायों में सामाजिक एवं राजनीतिक जागरूकता विकसित करने का कार्य किया।

➣ उन्होंने गैर-ब्राह्मण छात्रों के लिए छात्रावास की व्यवस्था तथा सामाजिक संगठन निर्माण जैसे कार्यों के माध्यम से गैर-ब्राह्मण आंदोलन को प्रारंभिक आधार प्रदान किया। बाद में उन्होंने जस्टिस पार्टी के गठन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जस्टिस पार्टी के अन्य प्रमुख नेता

➣ जस्टिस पार्टी के आगे के विकास में पनागल के राजा, जिन्हें सामान्यतः राजा ऑफ पनागल कहा जाता है, ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे जस्टिस पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए और बाद में मद्रास प्रेसीडेंसी के मुख्यमंत्री (Premier) के रूप में भी कार्य किया।

➣ इसके अतिरिक्त पी. टी. राजन और अन्य क्षेत्रीय गैर-ब्राह्मण नेताओं ने भी पार्टी के संगठन एवं राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने में योगदान दिया। इन नेताओं के माध्यम से जस्टिस पार्टी धीरे-धीरे मद्रास प्रेसीडेंसी की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हुई।

उद्देश्य

➣ जस्टिस पार्टी का गठन मुख्यतः गैर-ब्राह्मण समुदायों के राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक हितों की रक्षा तथा उन्हें प्रशासन और सार्वजनिक जीवन में उचित प्रतिनिधित्व दिलाने के उद्देश्य से किया गया था। पार्टी के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे-

गैर-ब्राह्मणों को राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्रतिनिधित्व

➣ जस्टिस पार्टी का प्रमुख उद्देश्य प्रशासनिक एवं राजनीतिक संस्थाओं में गैर-ब्राह्मण समुदायों की पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित करना था। पार्टी चाहती थी कि मद्रास प्रेसीडेंसी के शासन में किसी एक सामाजिक समूह का अत्यधिक प्रभाव न रहे और विभिन्न समुदायों को उनकी सामाजिक एवं जनसंख्या संबंधी स्थिति के अनुरूप प्रतिनिधित्व मिले।

सरकारी नौकरियों में समान अवसर

➣ पार्टी ने सरकारी सेवाओं में गैर-ब्राह्मणों के लिए अधिक अवसर उपलब्ध कराने की मांग की। इसका उद्देश्य प्रशासनिक पदों पर मौजूद सामाजिक असंतुलन को कम करना और विभिन्न समुदायों के लिए रोजगार के अवसरों को व्यापक बनाना था। आगे चलकर यही विचार सामुदायिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण की नीतियों से जुड़ा।

शिक्षा का विस्तार

➣ जस्टिस पार्टी ने गैर-ब्राह्मण समुदायों में शिक्षा के प्रसार को महत्वपूर्ण माना। विशेष रूप से उच्च शिक्षा और अंग्रेजी शिक्षा तक अधिक लोगों की पहुँच सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया, ताकि गैर-ब्राह्मण समुदाय प्रशासनिक एवं पेशेवर क्षेत्रों में आगे बढ़ सकें।

सामाजिक असमानता को कम करना

➣ पार्टी का उद्देश्य सामाजिक जीवन में मौजूद असमानताओं और अवसरों की विषमता को कम करना तथा गैर-ब्राह्मण समुदायों को सामाजिक एवं सार्वजनिक जीवन में अधिक अवसर उपलब्ध कराना था।

राजनीतिक जागरूकता और संगठन का विकास

➣ जस्टिस पार्टी का उद्देश्य गैर-ब्राह्मण समुदायों के बीच राजनीतिक चेतना और संगठन विकसित करना भी था। इसके लिए समाचार-पत्रों, सार्वजनिक सभाओं और राजनीतिक गतिविधियों के माध्यम से लोगों को उनके अधिकारों, हितों और प्रतिनिधित्व के प्रश्नों के प्रति जागरूक किया गया।

➣ इस प्रकार जस्टिस पार्टी के उद्देश्यों का मूल आधार समान अवसर, सामुदायिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा का विस्तार और गैर-ब्राह्मण समुदायों की राजनीतिक भागीदारी था। यही उद्देश्य आगे चलकर मद्रास प्रेसीडेंसी में सामाजिक न्याय की राजनीति के विकास का महत्वपूर्ण आधार बने।

जस्टिस पार्टी का राजनीतिक उदय

➣ जस्टिस पार्टी के गठन के बाद उसका प्रभाव धीरे-धीरे मद्रास प्रेसीडेंसी की राजनीति में बढ़ने लगा। भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत प्रांतों में द्वैध शासन (Dyarchy) की व्यवस्था लागू की गई और प्रांतीय विधान परिषदों के चुनावों के माध्यम से भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी का विस्तार हुआ। इस नई व्यवस्था ने जस्टिस पार्टी को अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने का अवसर प्रदान किया।

1920 के मद्रास प्रेसीडेंसी के चुनाव जस्टिस पार्टी के राजनीतिक उदय में निर्णायक साबित हुए। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन के कारण इन चुनावों का बहिष्कार किया, जिसके परिणामस्वरूप जस्टिस पार्टी को चुनावी मैदान में महत्वपूर्ण लाभ मिला। पार्टी ने चुनावों में सफलता प्राप्त कर मद्रास प्रेसीडेंसी में अपनी सरकार बनाने का अवसर प्राप्त किया।

ए. सुब्बारायलु रेड्डियार के नेतृत्व में जस्टिस पार्टी ने दिसंबर 1920 में मद्रास प्रेसीडेंसी में अपनी पहली सरकार बनाई। वे मद्रास प्रेसीडेंसी के पहले प्रीमियर बने। हालांकि उनका कार्यकाल बहुत लंबा नहीं रहा और उनके बाद पनागल के राजा ने सरकार का नेतृत्व संभाला।

पनागल के राजा के नेतृत्व में जस्टिस पार्टी की सरकार ने अपने राजनीतिक प्रभाव को और मजबूत किया। इस अवधि में पार्टी ने विशेष रूप से शिक्षा, सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व तथा सामाजिक सुधार से संबंधित नीतियों को आगे बढ़ाया।

➣ इस प्रकार 1920 के चुनाव जस्टिस पार्टी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुए। कांग्रेस के चुनाव बहिष्कार का लाभ उठाते हुए जस्टिस पार्टी मद्रास प्रेसीडेंसी में सत्ता तक पहुँचने वाली प्रमुख भारतीय राजनीतिक शक्ति बन गई और आने वाले वर्षों में प्रांतीय राजनीति में उसका महत्वपूर्ण प्रभाव रहा।

जस्टिस पार्टी की सरकार एवं प्रमुख सुधार

1920 के चुनावों में सफलता के बाद जस्टिस पार्टी ने मद्रास प्रेसीडेंसी में सरकार बनाई। सत्ता में आने के बाद पार्टी ने केवल गैर-ब्राह्मण प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि शिक्षा, प्रशासन, महिला अधिकार, सामाजिक सुधार, स्थानीय प्रशासन और सार्वजनिक कल्याण से जुड़े कई महत्वपूर्ण कदम उठाए।

सामुदायिक प्रतिनिधित्व और कम्यूनल G.O.

➣ जस्टिस पार्टी सरकार की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में सामुदायिक प्रतिनिधित्व की नीति थी। 1921 के कम्यूनल गवर्नमेंट ऑर्डर (Communal G.O.) के माध्यम से सरकारी सेवाओं में विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया। इसका उद्देश्य प्रशासनिक सेवाओं में मौजूद असंतुलन को कम करना और विभिन्न सामाजिक समूहों को सरकारी नौकरियों में अवसर देना था।

➣ इस नीति के अंतर्गत सरकारी नियुक्तियों में गैर-ब्राह्मण हिंदू, ब्राह्मण, मुस्लिम, भारतीय ईसाई तथा एंग्लो-इंडियन एवं यूरोपीय समुदायों के लिए प्रतिनिधित्व निर्धारित किया गया। आगे चलकर मद्रास की यही नीति भारत में सामुदायिक आरक्षण और सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति के विकास में महत्वपूर्ण उदाहरण बनी।

प्राथमिक शिक्षा का विस्तार

➣ जस्टिस पार्टी सरकार ने प्राथमिक शिक्षा के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया। मद्रास एलीमेंटरी एजुकेशन एक्ट, 1920 के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा को अधिक व्यापक बनाने का प्रयास किया गया। इस व्यवस्था में बालक और बालिकाओं दोनों की शिक्षा को बढ़ावा देने तथा प्राथमिक शिक्षा के लिए सरकारी व्यय बढ़ाने का प्रावधान किया गया।

➣ इस अवधि में लड़कियों की शिक्षा, पंचम वर्गों की शिक्षा तथा शिक्षक प्रशिक्षण के विस्तार पर भी ध्यान दिया गया। 1920–21 के सार्वजनिक शिक्षा संबंधी सरकारी अभिलेखों में प्राथमिक शिक्षा के विस्तार तथा लड़कियों और पंचम वर्गों की शिक्षा में वृद्धि का उल्लेख मिलता है।

मद्रास विश्वविद्यालय में सुधार

1923 के मद्रास विश्वविद्यालय अधिनियम (1923) के माध्यम से विश्वविद्यालय के प्रशासनिक ढाँचे में परिवर्तन किया गया। विश्वविद्यालय की प्रशासनिक संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधिक बनाने तथा उसके कामकाज को व्यवस्थित करने की दिशा में कदम उठाए गए।

➣ इसका महत्व इसलिए भी था क्योंकि उच्च शिक्षा में प्रतिनिधित्व का प्रश्न जस्टिस पार्टी की राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। विश्वविद्यालय प्रशासन में व्यापक प्रतिनिधित्व लाने का प्रयास इसी व्यापक नीति का हिस्सा था।

आंध्र विश्वविद्यालय की स्थापना

➣ जस्टिस पार्टी के शासनकाल की एक महत्वपूर्ण शैक्षिक घटना आंध्र-विश्वविद्यालय की स्थापना थी। 6 नवंबर 1925 को इसके गठन से संबंधित विधेयक मद्रास विधान परिषद में पारित हुआ और विश्वविद्यालय ने 1926 में कार्य करना शुरू किया। सी. आर. रेड्डी इसके प्रथम कुलपति बने।

➣ आंध्र विश्वविद्यालय की स्थापना का संबंध मद्रास प्रेसीडेंसी के तेलुगु-भाषी क्षेत्रों में उच्च शिक्षा के विस्तार की मांग से था। इसलिए यह केवल एक शैक्षिक संस्था की स्थापना नहीं थी, बल्कि तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी में क्षेत्रीय एवं भाषाई आधार पर उच्च शिक्षा के विकास की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम था।

अन्नामलाई विश्वविद्यालय की स्थापना

➣ जस्टिस पार्टी के शासनकाल में दक्षिण भारत में उच्च शिक्षा के विस्तार की दिशा में एक अन्य महत्वपूर्ण घटना अन्नामलाई विश्वविद्यालय की स्थापना थी। राजा सर अन्नामलाई चेट्टियार ने चिदंबरम में पहले से स्थापित शैक्षिक संस्थाओं-श्री मीनाक्षी कॉलेज, श्री मीनाक्षी तमिल कॉलेज और श्री मीनाक्षी संस्कृत कॉलेज-को विकसित करते हुए विश्वविद्यालय की स्थापना की दिशा में कदम उठाया। 1928 में उन्होंने इन संस्थाओं को विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए सरकार को सौंपने पर सहमति दी और 1929 में अन्नामलाई विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।

➣ अन्नामलाई विश्वविद्यालय का महत्व इस दृष्टि से भी था कि इसने दक्षिण भारत में उच्च शिक्षा के विस्तार के साथ तमिल भाषा, साहित्य और क्षेत्रीय शिक्षा को बढ़ावा देने में भूमिका निभाई।

मध्याह्न भोजन योजना की शुरुआत

➣ जस्टिस पार्टी के शासनकाल से जुड़ी एक उल्लेखनीय सामाजिक-शैक्षिक पहल मध्याह्न भोजन योजना (Mid-day Meal Scheme) थी। 1920 में मद्रास कॉरपोरेशन के अंतर्गत Thousand Lights क्षेत्र के एक कॉरपोरेशन स्कूल में विद्यार्थियों के लिए भोजन उपलब्ध कराने की योजना शुरू की गई। इसका उद्देश्य विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को विद्यालय से जोड़ना और उनकी उपस्थिति को प्रोत्साहित करना था।

महिलाओं को मताधिकार एवं विधायी भागीदारी

➣ जस्टिस पार्टी के शासनकाल में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। 1921 में मद्रास में महिलाओं को मतदान का अधिकार देने की दिशा में कदम उठाया गया। हालांकि यह सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार नहीं था और मतदान के लिए निर्धारित योग्यताएँ लागू थीं, फिर भी यह महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी।

➣ महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को आगे बढ़ाते हुए 1926 में डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी को मद्रास विधान परिषद में नामित किया गया। वे भारत की किसी विधान संस्था की पहली महिला सदस्य बनीं। उनकी नियुक्ति ने महिलाओं के सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में प्रवेश का मार्ग और व्यापक किया।

स्थानीय प्रशासन एवं सार्वजनिक कल्याण

➣ जस्टिस पार्टी सरकारों ने स्थानीय प्रशासन और जनकल्याण से संबंधित कार्यों पर भी ध्यान दिया। ग्राम सड़कों, सार्वजनिक स्वास्थ्य, आवास तथा शहरी सुधार से जुड़ी योजनाओं को आगे बढ़ाया गया। मद्रास शहर में झुग्गी सुधार और आवास संबंधी योजनाओं पर भी कार्य किया गया।

➣ ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए सरकारी भूमि के उपयोग तथा सार्वजनिक सुविधाओं के विस्तार की दिशा में भी कदम उठाए गए। इन पहलों का उद्देश्य प्रशासन को केवल उच्च वर्गों तक सीमित न रखकर व्यापक सामाजिक आधार प्रदान करना था।

धार्मिक संस्थाओं के प्रशासन में सुधार

➣ जस्टिस पार्टी सरकार ने धार्मिक संस्थाओं के प्रशासन को भी सरकारी विनियमन के दायरे में लाने का प्रयास किया। 1926 के हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती अधिनियम (Hindu Religious Endowments Act) के माध्यम से मंदिरों और धार्मिक बंदोबस्तों के प्रशासन में सरकारी निगरानी की व्यवस्था विकसित की गई। इसका उद्देश्य धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन को अधिक व्यवस्थित करना था।

दलित समुदायों के लिए सामाजिक पहल

➣ जस्टिस पार्टी के शासनकाल में तत्कालीन Depressed Classes के लिए भी कुछ सामाजिक एवं शैक्षिक उपाय किए गए। 1922 में मद्रास विधान परिषद ने अनुसूचित जातियों के लिए प्रयुक्त Panchamar औरParaiyar जैसे शब्दों के स्थान पर Adi Dravidar शब्द के आधिकारिक प्रयोग को स्वीकार किया। यह प्रशासनिक भाषा में सामाजिक सम्मान और पहचान से जुड़े बदलाव का महत्वपूर्ण उदाहरण था।

➣ इस प्रकार जस्टिस पार्टी का शासन केवल गैर-ब्राह्मण प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं था। इसके शासनकाल में सामुदायिक प्रतिनिधित्व, प्राथमिक शिक्षा, विश्वविद्यालयों का विकास, मध्याह्न भोजन, महिला मताधिकार, महिलाओं की विधायी भागीदारी, धार्मिक संस्थाओं का प्रशासन और सामाजिक कल्याण से संबंधित कई महत्वपूर्ण पहल हुईं। इन सुधारों ने आगे चलकर दक्षिण भारत की सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित किया।

जस्टिस पार्टी के प्रमुख सुधार एवं घटनाएँ : एक नजर में

वर्ष प्रमुख सुधार / घटना महत्व
1920 मद्रास एलीमेंटरी एजुकेशन एक्ट प्राथमिक शिक्षा के विस्तार तथा बालक-बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम।
1920 मध्याह्न भोजन योजना मद्रास कॉरपोरेशन के Thousand Lights क्षेत्र के एक स्कूल में विद्यार्थियों को भोजन उपलब्ध कराने की शुरुआत, विद्यालयी उपस्थिति को प्रोत्साहित करने का प्रयास।
1921 Communal G.O. सरकारी सेवाओं में विभिन्न समुदायों के लिए प्रतिनिधित्व निर्धारित करने की नीति, मद्रास में आरक्षण व्यवस्था के प्रारंभिक विकास से जुड़ी महत्वपूर्ण पहल।
1921 महिलाओं को मताधिकार मद्रास प्रेसीडेंसी में महिलाओं को निर्धारित योग्यताओं के अधीन मतदान का अधिकार मिला।
1922 Adi Dravidar नाम का आधिकारिक प्रयोग तत्कालीन Depressed Classes के लिए सम्मानजनक सामाजिक पहचान को बढ़ावा देने की दिशा में कदम।
1923 Madras University Act मद्रास विश्वविद्यालय के प्रशासनिक ढाँचे में सुधार और उच्च शिक्षा के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम।
1925–26 आंध्र विश्वविद्यालय की स्थापना तेलुगु-भाषी क्षेत्रों में उच्च शिक्षा के विस्तार को बढ़ावा मिला, 1925 में विधेयक पारित और 1926 में विश्वविद्यालय ने कार्य शुरू किया।
1926 डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी का विधान परिषद में नामांकन वे भारत की किसी विधान संस्था की पहली महिला सदस्य बनीं।
1926 Hindu Religious Endowments Act हिंदू धार्मिक संस्थाओं एवं मंदिरों के प्रशासन में सरकारी निगरानी और विनियमन की व्यवस्था विकसित हुई।
1929 अन्नामलाई विश्वविद्यालय की स्थापना दक्षिण भारत में उच्च शिक्षा तथा विशेष रूप से तमिल भाषा एवं क्षेत्रीय शिक्षा के विकास को बढ़ावा मिला।

जस्टिस पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संबंध

➣ जस्टिस पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच संबंध मुख्यतः उनके राजनीतिक उद्देश्यों और कार्यपद्धति में अंतर के कारण तनावपूर्ण रहे। कांग्रेस का प्रमुख लक्ष्य राष्ट्रीय स्वतंत्रता और ब्रिटिश शासन से राजनीतिक मुक्ति था, जबकि जस्टिस पार्टी ने मुख्य रूप से गैर-ब्राह्मण समुदायों के प्रतिनिधित्व और सामाजिक हितों को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया।

कांग्रेस की राजनीति से मतभेद

➣ जस्टिस पार्टी के नेताओं का मानना था कि केवल ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार यदि राजनीतिक सत्ता भारतीयों के हाथों में आती है, लेकिन प्रशासन और राजनीतिक संस्थाओं में कुछ प्रभावशाली सामाजिक समूहों का प्रभुत्व बना रहता है, तो गैर-ब्राह्मण समुदायों को पर्याप्त लाभ नहीं मिलेगा। इसलिए वे सामाजिक एवं राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न को राष्ट्रीय स्वतंत्रता के प्रश्न के साथ-साथ महत्वपूर्ण मानते थे।

➣ इसके विपरीत कांग्रेस का मुख्य जोर राष्ट्रीय आंदोलन और स्वशासन पर था। जस्टिस पार्टी के नेताओं को कांग्रेस के स्थानीय संगठन और नेतृत्व में ब्राह्मणों के प्रभाव को लेकर भी आपत्ति थी। इस कारण दोनों संगठनों के बीच राजनीतिक दूरी बनी रही।

1920 के चुनाव और कांग्रेस का बहिष्कार

1920 के मद्रास प्रेसीडेंसी के चुनाव दोनों संगठनों के बीच अंतर को स्पष्ट करने वाली महत्वपूर्ण घटना थे। कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन की नीति के तहत इन चुनावों का बहिष्कार किया, जबकि जस्टिस पार्टी ने चुनाव में भाग लिया। परिणामस्वरूप जस्टिस पार्टी को चुनावी सफलता मिली और उसने मद्रास प्रेसीडेंसी में सरकार बनाई।

➣ इस प्रकार कांग्रेस जहाँ ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन-आंदोलन और असहयोग को राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बना रही थी, वहीं जस्टिस पार्टी ने विधान परिषदों और संवैधानिक राजनीति के माध्यम से अपने उद्देश्यों को आगे बढ़ाने का रास्ता अपनाया।

गैर-ब्राह्मण कांग्रेसियों का प्रश्न

➣ जस्टिस पार्टी के गठन का अर्थ यह नहीं था कि सभी गैर-ब्राह्मण नेता कांग्रेस से बाहर हो गए थे। कांग्रेस के भीतर भी गैर-ब्राह्मण नेताओं का एक वर्ग सक्रिय था। मद्रास प्रेसीडेंसी एसोसिएशन जैसे संगठनों के माध्यम से कांग्रेस के भीतर गैर-ब्राह्मण प्रतिनिधित्व का प्रश्न उठाया गया।

ई. वी. रामासामी नायकर (पेरियार) भी प्रारंभ में कांग्रेस से जुड़े थे। उन्होंने कांग्रेस के भीतर सामुदायिक प्रतिनिधित्व की मांग को उठाया। 1925 के कांचीपुरम कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने इस संबंध में प्रस्ताव रखने का प्रयास किया, लेकिन अपेक्षित समर्थन न मिलने के बाद उनका कांग्रेस से मोहभंग बढ़ता गया। आगे चलकर उन्होंने कांग्रेस छोड़कर आत्मसम्मान आंदोलन को आगे बढ़ाया।

1920 के दशक में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा

➣ 1920 के दशक में मद्रास प्रेसीडेंसी की राजनीति में जस्टिस पार्टी और कांग्रेस के बीच प्रतिस्पर्धा बनी रही। जस्टिस पार्टी ने प्रांतीय शासन और विधान परिषदों के माध्यम से अपना प्रभाव बनाए रखा, जबकि कांग्रेस ने धीरे-धीरे विधान परिषदों में प्रवेश की नीति अपनाकर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करनी शुरू की।

1926 के चुनावों में जस्टिस पार्टी को पहले की तुलना में कमजोर स्थिति का सामना करना पड़ा और वह स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं कर सकी। इसके बाद पी. सुब्बारायण के नेतृत्व में स्वतंत्र मंत्रिमंडल बना, जिसे जस्टिस पार्टी के एक वर्ग का समर्थन प्राप्त था। इससे मद्रास की प्रांतीय राजनीति में कांग्रेस और जस्टिस पार्टी के बीच समीकरण और अधिक जटिल हो गए।

➣ इस प्रकार जस्टिस पार्टी और कांग्रेस का संबंध केवल “विरोध” तक सीमित नहीं था। दोनों के बीच मुख्य अंतर उनके राजनीतिक प्राथमिकताओं, सामाजिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न और संघर्ष की कार्यपद्धति को लेकर था। यही मतभेद आगे चलकर मद्रास प्रेसीडेंसी की विशिष्ट क्षेत्रीय राजनीति और द्रविड़ आंदोलन के विकास की पृष्ठभूमि बने।

पेरियार और आत्मसम्मान आंदोलन

ई. वी. रामासामी नायकर (पेरियार) दक्षिण भारत के सामाजिक एवं राजनीतिक इतिहास के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्वों में से एक थे। उन्होंने जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता, सामाजिक असमानता, अंधविश्वास तथा महिलाओं की सामाजिक अधीनता के विरुद्ध व्यापक आंदोलन चलाया।

➣ आगे चलकर उनके नेतृत्व में विकसित आत्मसम्मान आंदोलन दक्षिण भारत के द्रविड़ आंदोलन की प्रमुख वैचारिक आधारभूमि बना।

पेरियार का प्रारंभिक राजनीतिक जीवन और कांग्रेस से जुड़ाव

➣ पेरियार 1919 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े। प्रारंभ में वे राष्ट्रीय आंदोलन और सामाजिक सुधार दोनों के माध्यम से समाज में परिवर्तन लाना चाहते थे। उन्होंने असहयोग आंदोलन में सक्रिय भाग लिया तथा मद्रास प्रेसीडेंसी में शराबबंदी के प्रचार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ कांग्रेस में रहते हुए पेरियार का विशेष जोर अस्पृश्यता उन्मूलन, शिक्षा तथा गैर-ब्राह्मण और वंचित समुदायों के उचित प्रतिनिधित्व पर था। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ भारतीय समाज में मौजूद सामाजिक असमानता और जातिगत भेदभाव का समाधान भी आवश्यक है।

➣ कांग्रेस के भीतर सामाजिक समानता और गैर-ब्राह्मण प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर पेरियार के मतभेद धीरे-धीरे बढ़ने लगे। वे चाहते थे कि कांग्रेस राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक न्याय के प्रश्न को भी समान महत्व दे।

चेरनमादेवी गुरुकुलम विवाद

➣ पेरियार के कांग्रेस से बढ़ते मतभेदों में चेरनमादेवी गुरुकुलम (Cheranmadevi Gurukulam) विवाद का भी महत्वपूर्ण स्थान था। यह संस्था कांग्रेस के सहयोग से संचालित हो रही थी, लेकिन यहाँ विद्यार्थियों के साथ जाति के आधार पर भोजन और सामाजिक व्यवहार में भेदभाव की शिकायतें सामने आईं।

➣ पेरियार ने इस प्रकार के जातिगत भेदभाव का विरोध किया और कांग्रेस नेतृत्व से सामाजिक समानता के सिद्धांतों को व्यवहार में लागू करने की मांग की। इस विवाद ने उनके और कांग्रेस के कुछ नेताओं के बीच मतभेद को और गहरा किया तथा पेरियार के सामाजिक सुधारवादी दृष्टिकोण को अधिक स्पष्ट किया।

वैकोम सत्याग्रह (1924–25)

1924 में त्रावणकोर राज्य के वैकोम में मंदिर के आसपास की सार्वजनिक सड़कों पर निम्न जातियों के आवागमन पर लगे प्रतिबंध के विरुद्ध सत्याग्रह शुरू हुआ। इसका उद्देश्य जाति के आधार पर सार्वजनिक मार्गों के उपयोग पर लगाए गए प्रतिबंधों को समाप्त करना था। यह आंदोलन दक्षिण भारत में अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध महत्वपूर्ण सामाजिक संघर्ष बन गया।

➣ पेरियार ने वैकोम सत्याग्रह में सक्रिय भाग लिया और आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए वैकोम पहुँचे। उन्होंने आंदोलनकारियों के साथ मिलकर प्रतिबंधित सार्वजनिक मार्गों पर प्रवेश का प्रयास किया, जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया। उनकी सक्रिय भूमिका और संघर्ष के कारण उन्हें बाद में “वैकोम वीरर” के नाम से प्रसिद्धि मिली।

➣ वैकोम सत्याग्रह के दौरान पेरियार की पत्नी नागम्मई ने भी आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। महिलाओं की भागीदारी ने इस संघर्ष को व्यापक सामाजिक आधार प्रदान किया।

➣ वैकोम का अनुभव पेरियार के लिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे उनका विश्वास और मजबूत हुआ कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक मुक्ति भी आवश्यक है। उनके लिए जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता का अंत केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन से संभव नहीं था, बल्कि इसके लिए समाज की मूल संरचनाओं में परिवर्तन आवश्यक था।

सामुदायिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न और कांग्रेस से अलगाव (1925)

➣ पेरियार कांग्रेस के भीतर सामुदायिक प्रतिनिधित्व की मांग लगातार उठाते रहे। उनका तर्क था कि यदि सरकारी नौकरियों, शिक्षा और राजनीतिक संस्थाओं में ऐतिहासिक रूप से प्रभावशाली समुदायों का ही प्रभुत्व बना रहा, तो केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से वास्तविक सामाजिक समानता स्थापित नहीं होगी।

➣ उन्होंने कांग्रेस के विभिन्न अधिवेशनों में गैर-ब्राह्मणों के लिए अनुपातिक प्रतिनिधित्व का प्रस्ताव रखने का प्रयास किया। लेकिन इस मुद्दे पर कांग्रेस के भीतर पर्याप्त सहमति नहीं बन सकी।

1925 के कांचीपुरम प्रांतीय कांग्रेस सम्मेलन में पेरियार ने सामुदायिक प्रतिनिधित्व से संबंधित प्रस्ताव को आगे बढ़ाने का प्रयास किया, लेकिन उसे अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। इसके बाद उनका कांग्रेस से मोहभंग निर्णायक रूप से बढ़ गया।

➣ पेरियार ने निष्कर्ष निकाला कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्वतंत्रता के प्रश्न को प्राथमिकता दे रही थी, जबकि जातिगत असमानता, सामाजिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक सुधार जैसे प्रश्नों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा था।

➣ इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर सामाजिक सुधार को केंद्र में रखने वाला स्वतंत्र आंदोलन खड़ा करने का निर्णय लिया।

आत्मसम्मान आंदोलन की स्थापना और विचारधारा (1925)

1925 में पेरियार ने आत्मसम्मान आंदोलन (Self-Respect Movement / Suya Mariyadhai Iyakkam) की शुरुआत की। इसका मूल उद्देश्य गैर-ब्राह्मणों तथा सामाजिक रूप से वंचित वर्गों में आत्मसम्मान, समानता और सामाजिक स्वतंत्रता की भावना विकसित करना था।

➣ आत्मसम्मान आंदोलन केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आंदोलन नहीं था। इसका लक्ष्य समाज की उन संरचनाओं को चुनौती देना था जिन्हें पेरियार सामाजिक असमानता और जातिगत ऊँच-नीच का आधार मानते थे। इसलिए आंदोलन ने जाति व्यवस्था, अस्पृश्यता, सामाजिक रूढ़ियों, अंधविश्वास और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरुद्ध अभियान चलाया।

➣ आत्मसम्मान आंदोलन ने जन्म के आधार पर सामाजिक ऊँच-नीच को अस्वीकार किया और सामाजिक जीवन में तर्कवाद, विवेक तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया। पेरियार का जोर इस बात पर था कि व्यक्ति किसी परंपरा को केवल इसलिए स्वीकार न करे क्योंकि वह पुरानी है, बल्कि उसे तर्क और विवेक की कसौटी पर परखे।

➣ आंदोलन के विचारों को जनता तक पहुँचाने में पेरियार के समाचार-पत्र “कुडियारसु (Kudi Arasu)” की महत्वपूर्ण भूमिका रही। प्रेस, सार्वजनिक सभाओं और व्यापक यात्राओं के माध्यम से जाति-विरोध, सामाजिक समानता, तर्कवाद, महिला अधिकार और आत्मसम्मान के विचारों का प्रचार किया गया।

➣ इस प्रकार आत्मसम्मान आंदोलन केवल शिक्षित अभिजात वर्ग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धीरे-धीरे व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप लेने लगा।

आत्मसम्मान आंदोलन का विस्तार एवं चेंगलपट्टू सम्मेलन (1929)

➣ आत्मसम्मान आंदोलन को संगठित एवं व्यापक वैचारिक आधार देने के लिए 1929 में चेंगलपट्टू में इसका पहला प्रमुख प्रांतीय सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में सामाजिक समानता, जाति-विरोध, शिक्षा, विवाह, महिलाओं की स्थिति और सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रश्नों को प्रमुखता दी गई।

➣ सम्मेलन ने स्पष्ट किया कि सामाजिक सुधार केवल धार्मिक या व्यक्तिगत क्षेत्र का विषय नहीं है, बल्कि इसका संबंध समाज की व्यापक संरचना से है। आंदोलन ने जाति आधारित ऊँच-नीच को समाप्त करने और सामाजिक जीवन में समानता स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता का विरोध

➣ आत्मसम्मान आंदोलन ने जाति आधारित ऊँच-नीच और अस्पृश्यता को सामाजिक समानता के सबसे बड़े अवरोधों में माना। पेरियार ने जन्म के आधार पर किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति निर्धारित करने का विरोध किया तथा जाति-आधारित पहचान और विशेषाधिकारों की आलोचना की।

➣ आंदोलन का उद्देश्य केवल अस्पृश्यता की कुछ प्रथाओं में सुधार करना नहीं था, बल्कि जाति व्यवस्था की मूल सामाजिक संरचना पर प्रश्न उठाना था। इसी कारण आत्मसम्मान आंदोलन दक्षिण भारत के सामाजिक सुधार आंदोलनों में अपनी उग्र जाति-विरोधी विचारधारा के लिए विशेष रूप से जाना गया।

महिला अधिकार और आत्मसम्मान विवाह

➣ पेरियार ने महिलाओं की स्थिति को सामाजिक सुधार का केंद्रीय प्रश्न माना। आत्मसम्मान आंदोलन ने महिला शिक्षा, संपत्ति के अधिकार, विवाह में स्वतंत्रता, विधवा पुनर्विवाह और लैंगिक समानता जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उनका मानना था कि महिलाओं को समान अधिकार दिए बिना वास्तविक सामाजिक समानता स्थापित नहीं की जा सकती।

➣ आत्मसम्मान आंदोलन की महत्वपूर्ण सामाजिक पहलों में आत्मसम्मान विवाह की अवधारणा थी। ऐसे विवाहों में पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों और ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्यता को चुनौती दी गई तथा स्त्री-पुरुष की समानता और पारस्परिक सहमति को महत्व दिया गया।

➣ आंदोलन ने अंतरजातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह और महिलाओं की सामाजिक स्वतंत्रता को भी प्रोत्साहित किया। इस प्रकार विवाह संस्था को जातिगत और पितृसत्तात्मक नियंत्रण से मुक्त करने का प्रयास किया गया।

आत्मसम्मान आंदोलन और जस्टिस पार्टी का संबंध

आत्मसम्मान आंदोलन और जस्टिस पार्टी एक ही संगठन नहीं थे। जस्टिस पार्टी मुख्यतः एक राजनीतिक संगठन थी, जबकि आत्मसम्मान आंदोलन का मुख्य स्वरूप सामाजिक सुधार और वैचारिक आंदोलन का था। हालांकि दोनों के बीच गैर-ब्राह्मण प्रतिनिधित्व, सामाजिक असमानता के विरोध और सामाजिक न्याय के प्रश्न पर महत्वपूर्ण समानताएँ थीं।

➣ 1930 के दशक में जस्टिस पार्टी के कमजोर होने और कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव के बीच पेरियार का प्रभाव गैर-ब्राह्मण राजनीति में लगातार बढ़ता गया। 1932 में पेरियार ने यूरोप और सोवियत संघ सहित विभिन्न देशों की यात्रा की और वहाँ के सामाजिक एवं राजनीतिक प्रयोगों का अध्ययन किया।

➣ सोवियत संघ की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था ने उनके विचारों को प्रभावित किया, हालांकि उनकी राजनीति का मूल केंद्र जाति-विरोध, सामाजिक समानता और आत्मसम्मान ही रहा।

➣ इसी अवधि में आत्मसम्मान आंदोलन और जस्टिस पार्टी के बीच राजनीतिक एवं वैचारिक निकटता बढ़ती गई। जस्टिस पार्टी के कमजोर होने के साथ पेरियार का प्रभाव गैर-ब्राह्मण राजनीति में और मजबूत हुआ।

आत्मसम्मान आंदोलन से द्रविड़ राजनीति की ओर

1937 के चुनावों में जस्टिस पार्टी की पराजय और मद्रास में कांग्रेस सरकार के गठन के बाद पेरियार और जस्टिस पार्टी के बीच संबंध और मजबूत हुए। कांग्रेस सरकार द्वारा विद्यालयों में हिंदी को अनिवार्य शिक्षा देने की नीति के विरोध ने पेरियार को एक व्यापक जन-आंदोलन के प्रमुख नेता के रूप में स्थापित किया।

1937–39 का हिंदी-विरोधी आंदोलन केवल भाषा का प्रश्न नहीं रहा, बल्कि यह तमिल भाषा, क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक-राजनीतिक प्रभुत्व से जुड़े व्यापक प्रश्नों से भी जुड़ गया। इस आंदोलन ने पेरियार के नेतृत्व में द्रविड़ राजनीतिक चेतना को और मजबूत किया।

29 दिसंबर 1938 को पेरियार को जस्टिस पार्टी का अध्यक्ष चुना गया। उनके नेतृत्व में जस्टिस पार्टी की राजनीति धीरे-धीरे पारंपरिक प्रांतीय चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर सामाजिक समानता, तर्कवाद, आत्मसम्मान और द्रविड़ पहचान जैसे व्यापक मुद्दों से जुड़ने लगी।

➣ इस प्रकार पेरियार की राजनीतिक यात्रा कांग्रेस से जुड़ाव → सामाजिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर मतभेद → वैकोम सत्याग्रह → कांग्रेस से अलगाव → 1925 में आत्मसम्मान आंदोलन → जाति-विरोध, तर्कवाद और महिला अधिकार → जस्टिस पार्टी से बढ़ती निकटता की क्रमिक प्रक्रिया से होकर गुजरी। आगे चलकर यही प्रक्रिया जस्टिस पार्टी के द्रविड़र कड़गम में रूपांतरण और दक्षिण भारत में आधुनिक द्रविड़ राजनीति के विकास का आधार बनी।

जस्टिस पार्टी से द्रविड़र कड़गम तक

1930 के दशक में जस्टिस पार्टी की राजनीतिक स्थिति लगातार कमजोर होती गई। पार्टी के भीतर गुटबाजी, नेतृत्व संबंधी मतभेद, व्यापक जनाधार की कमी तथा कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव ने उसकी राजनीतिक शक्ति को कमजोर कर दिया।

➣ दूसरी ओर ई. वी. रामासामी नायकर (पेरियार) के नेतृत्व में आत्मसम्मान आंदोलन सामाजिक स्तर पर तेजी से प्रभावशाली हो रहा था। इन परिस्थितियों ने जस्टिस पार्टी के स्वरूप में महत्वपूर्ण परिवर्तन की पृष्ठभूमि तैयार की।

1937 के चुनाव, हिंदी-विरोधी आंदोलन और पेरियार का उभार

भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत प्रांतों में प्रांतीय स्वायत्तता की व्यवस्था लागू की गई और 1937 में मद्रास प्रेसीडेंसी में प्रांतीय चुनाव हुए। इन चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को व्यापक सफलता मिली, जबकि जस्टिस पार्टी को भारी पराजय का सामना करना पड़ा। इस पराजय के साथ मद्रास की प्रांतीय राजनीति में जस्टिस पार्टी की लंबे समय से चली आ रही प्रधानता समाप्त हो गई।

➣ कांग्रेस ने मद्रास में सरकार बनाई और सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) मद्रास प्रेसीडेंसी के प्रीमियर बने। जस्टिस पार्टी के कमजोर होने के बाद पेरियार के नेतृत्व में गैर-ब्राह्मण राजनीति को एक नया सामाजिक एवं वैचारिक आधार मिलने लगा।

➣ कांग्रेस सरकार ने विद्यालयों में हिंदी की अनिवार्य शिक्षा की नीति लागू की। पेरियार और उनके समर्थकों ने इसका तीव्र विरोध किया। उन्होंने इसे केवल भाषा का प्रश्न न मानकर तमिल भाषा, क्षेत्रीय पहचान तथा सामाजिक-राजनीतिक प्रभुत्व से जुड़ा मुद्दा बनाया।

1937–39 का हिंदी-विरोधी आंदोलन पेरियार के नेतृत्व में एक महत्वपूर्ण जन-आंदोलन बन गया। आंदोलन के दौरान व्यापक गिरफ्तारियाँ हुईं और पेरियार सहित अनेक कार्यकर्ताओं को जेल भेजा गया। इस आंदोलन ने पेरियार की लोकप्रियता और गैर-ब्राह्मण राजनीति में उनके प्रभाव को और मजबूत किया।

पेरियार का जस्टिस पार्टी पर नेतृत्व और द्रविड़ राजनीति का विस्तार

➣ 1937 की चुनावी पराजय के बाद जस्टिस पार्टी के भीतर संगठन को नए नेतृत्व और व्यापक सामाजिक आधार देने की आवश्यकता महसूस हुई। इसी पृष्ठभूमि में पेरियार का प्रभाव पार्टी के भीतर तेजी से बढ़ा। 29 दिसंबर 1938 को पेरियार को जस्टिस पार्टी का अध्यक्ष चुना गया। उस समय वे जेल में थे।

➣ पेरियार के नेतृत्व में जस्टिस पार्टी की राजनीति का स्वरूप धीरे-धीरे पारंपरिक प्रांतीय चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर सामाजिक सुधार, आत्मसम्मान, तर्कवाद, जाति-विरोध और द्रविड़ पहचान जैसे व्यापक मुद्दों से जुड़ने लगा। जस्टिस पार्टी और आत्मसम्मान आंदोलन के बीच संबंध भी अधिक घनिष्ठ हुए।

➣ इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप जस्टिस पार्टी का मूल गैर-ब्राह्मण राजनीतिक आधार व्यापक द्रविड़ सामाजिक पहचान से जुड़ने लगा। पेरियार के नेतृत्व में आंदोलन ने आगे चलकर अलग द्रविड़ राष्ट्र की मांग भी उठाई। इसके पीछे उत्तर भारतीय राजनीतिक-सामाजिक प्रभुत्व, हिंदी के प्रसार तथा ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था के प्रति विरोध जैसे विचार जुड़े हुए थे।

➣ इस प्रकार जस्टिस पार्टी की राजनीति धीरे-धीरे केवल मद्रास प्रेसीडेंसी में गैर-ब्राह्मण प्रतिनिधित्व तक सीमित न रहकर द्रविड़ पहचान और क्षेत्रीय राजनीतिक स्वायत्तता के व्यापक प्रश्न से जुड़ने लगी।

द्वितीय विश्व युद्ध और जस्टिस पार्टी का राजनीतिक रूपांतरण

1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के बाद भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफे और प्रांतीय राजनीति में आए बदलावों ने मद्रास की राजनीति को भी प्रभावित किया। इस समय पेरियार का प्रभाव गैर-ब्राह्मण एवं द्रविड़ राजनीति में और मजबूत हुआ।

➣ युद्धकालीन परिस्थितियों में जस्टिस पार्टी की पारंपरिक राजनीतिक भूमिका और अधिक कमजोर होती गई। इसके विपरीत पेरियार के नेतृत्व में सामाजिक एवं वैचारिक आंदोलन अधिक महत्वपूर्ण होता गया। जस्टिस पार्टी धीरे-धीरे अपने पुराने चुनावी एवं संवैधानिक राजनीतिक स्वरूप से दूर होकर आत्मसम्मान और द्रविड़ विचारधारा के अधिक निकट आती गई।

जस्टिस पार्टी का द्रविड़र कड़गम में रूपांतरण (1944)

➣ जस्टिस पार्टी के राजनीतिक एवं वैचारिक रूपांतरण का निर्णायक चरण 1944 में आया। 27 अगस्त 1944 को आयोजित सेलम सम्मेलन में जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर “द्रविड़र कड़गम (Dravidar Kazhagam – DK)” कर दिया गया।

➣ इस परिवर्तन के साथ जस्टिस पार्टी का पुराना राजनीतिक स्वरूप समाप्त हो गया और संगठन को एक व्यापक सामाजिक एवं द्रविड़ आंदोलन के रूप में पुनर्गठित किया गया। चुनावी राजनीति की अपेक्षा सामाजिक सुधार, जाति-विरोध, तर्कवाद, आत्मसम्मान और द्रविड़ पहचान को अधिक महत्व दिया गया।

➣ इस प्रकार 1916 में गैर-ब्राह्मण राजनीतिक संगठन के रूप में शुरू हुई जस्टिस पार्टी लगभग तीन दशकों की राजनीतिक यात्रा के बाद 1944 में द्रविड़र कड़गम में रूपांतरित हो गई। इस परिवर्तन ने दक्षिण भारत की राजनीति में एक नए चरण की शुरुआत की और आगे चलकर द्रविड़ राजनीतिक दलों के उदय के लिए वैचारिक एवं संगठनात्मक आधार तैयार किया।

जस्टिस पार्टी का ऐतिहासिक महत्व एवं योगदान

➣ जस्टिस पार्टी भारतीय इतिहास में ऐसी प्रारंभिक क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियों में से एक थी जिसने सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक सत्ता के प्रश्न को सीधे राजनीति के केंद्र में रखा। इसका महत्व केवल मद्रास प्रेसीडेंसी की तत्कालीन राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके प्रयासों ने दक्षिण भारत में सामाजिक न्याय और द्रविड़ राजनीति के विकास को भी प्रभावित किया।

गैर-ब्राह्मण राजनीतिक चेतना को संगठित रूप देना

➣ जस्टिस पार्टी ने मद्रास प्रेसीडेंसी में पहले से विकसित हो रही गैर-ब्राह्मण चेतना को एक संगठित राजनीतिक मंच प्रदान किया। इसने विभिन्न गैर-ब्राह्मण समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक अवसरों के प्रश्न पर एक साझा मंच पर लाने का प्रयास किया।

सामुदायिक प्रतिनिधित्व की नीति

➣ जस्टिस पार्टी की सबसे महत्वपूर्ण दीर्घकालिक विरासत सामुदायिक प्रतिनिधित्व की नीति थी। सरकारी सेवाओं में विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व के लिए लागू की गई Communal G.O. ने मद्रास में ऐसी नीतियों की नींव मजबूत की, जिन्हें आगे चलकर सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व से जुड़ी नीतियों के विकास में महत्वपूर्ण माना गया।

शिक्षा के विस्तार में योगदान

➣ जस्टिस पार्टी के शासनकाल में प्राथमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा और शैक्षिक अवसरों के विस्तार पर जोर दिया गया। आंध्र विश्वविद्यालय और अन्नामलाई विश्वविद्यालय जैसी उच्च शिक्षा संस्थाओं का विकास इसी व्यापक दौर में हुआ। इससे मद्रास प्रेसीडेंसी में उच्च शिक्षा के क्षेत्र का विस्तार हुआ।

महिला राजनीतिक भागीदारी

➣ जस्टिस पार्टी के शासनकाल में महिलाओं की राजनीतिक एवं सार्वजनिक भागीदारी के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण प्रगति हुई। मद्रास में महिलाओं को मताधिकार मिलने और डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी के विधान परिषद में प्रवेश ने महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान बनाया।

सामाजिक न्याय की राजनीति का विकास

➣ जस्टिस पार्टी ने दक्षिण भारत की राजनीति में यह विचार मजबूत किया कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व के साथ-साथ सामाजिक असमानताओं और अवसरों की विषमता का समाधान भी आवश्यक है। यही विचार आगे चलकर आत्मसम्मान आंदोलन और द्रविड़ राजनीति में अधिक व्यापक सामाजिक न्याय की विचारधारा से जुड़ा।

द्रविड़ आंदोलन की आधारभूमि

➣ जस्टिस पार्टी ने दक्षिण भारत में विकसित हो रही द्रविड़ पहचान को राजनीतिक अभिव्यक्ति प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि जस्टिस पार्टी स्वयं बाद के द्रविड़ आंदोलनों के समान व्यापक वैचारिक आंदोलन नहीं थी, फिर भी इसकी गैर-ब्राह्मण राजनीति ने आगे चलकर पेरियार के आत्मसम्मान आंदोलन और द्रविड़र कड़गम के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक आधार तैयार किया।

द्रविड़ राजनीतिक दलों के विकास पर प्रभाव

1944 में द्रविड़र कड़गम में रूपांतरण के बाद जस्टिस पार्टी की राजनीतिक विरासत समाप्त नहीं हुई। इसके सामाजिक न्याय, गैर-ब्राह्मण प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय पहचान से जुड़े विचारों ने आगे चलकर तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति को प्रभावित किया। बाद में इसी व्यापक राजनीतिक परंपरा से द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और अन्य द्रविड़ राजनीतिक धाराओं के विकास की पृष्ठभूमि तैयार हुई।

भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय राजनीति का प्रारंभिक उदाहरण

➣ जस्टिस पार्टी को भारत में प्रारंभिक क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के महत्वपूर्ण उदाहरणों में माना जा सकता है। इसने राष्ट्रीय स्वतंत्रता के व्यापक प्रश्न के साथ-साथ एक विशेष क्षेत्र और सामाजिक समूहों से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनाया। इस दृष्टि से यह भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय हितों और सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति के विकास का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

ऐतिहासिक मूल्यांकन

➣ जस्टिस पार्टी की उपलब्धियों के साथ उसकी सीमाएँ भी थीं। इसका नेतृत्व लंबे समय तक मुख्यतः शिक्षित एवं संपन्न गैर-ब्राह्मण वर्गों के हाथों में रहा और यह व्यापक जनाधार विकसित करने में कांग्रेस की तुलना में पीछे रही। ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग की उसकी नीति के कारण राष्ट्रीय आंदोलन के दौर में उसकी लोकप्रियता सीमित रही।

➣ फिर भी जस्टिस पार्टी का ऐतिहासिक महत्व इस बात में है कि उसने सामाजिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा, सरकारी सेवाओं में अवसर और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को दक्षिण भारतीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। बाद में इन्हीं प्रश्नों को पेरियार और द्रविड़ आंदोलन ने अधिक व्यापक सामाजिक एवं वैचारिक रूप प्रदान किया।

➣ इस प्रकार 1916 में साउथ इंडियन लिबरल फेडरेशन के रूप में शुरू हुई जस्टिस पार्टी ने मद्रास प्रेसीडेंसी की राजनीति में एक नए सामाजिक-राजनीतिक विमर्श को जन्म दिया। इसकी राजनीतिक यात्रा का अंतिम रूप 1944 में द्रविड़र कड़गम के रूप में सामने आया, लेकिन इसकी सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की विरासत दक्षिण भारत की राजनीति में लंबे समय तक बनी रही।

जस्टिस पार्टी : महत्वपूर्ण तथ्य

वर्ष / तिथि महत्वपूर्ण तथ्य
1909 मद्रास में गैर-ब्राह्मणों को संगठित करने के लिए Madras Non-Brahmin Association के गठन का प्रयास।
1912 मद्रास यूनाइटेड लीग का गठन; बाद में इसका नाम मद्रास द्रविड़ियन एसोसिएशन किया गया।
20 नवंबर 1916 साउथ इंडियन लिबरल फेडरेशन (SILF) के गठन से जस्टिस पार्टी के संगठनात्मक रूप की शुरुआत।
1917 SILF के विचारों को आगे बढ़ाने के लिए Justice समाचार-पत्र का प्रकाशन; इसी के कारण संगठन लोकप्रिय रूप से जस्टिस पार्टी कहलाया।
1920 मद्रास प्रेसीडेंसी के चुनाव में कांग्रेस के बहिष्कार का लाभ उठाकर जस्टिस पार्टी सत्ता में आई।
दिसंबर 1920 ए. सुब्बारायलु रेड्डियार के नेतृत्व में जस्टिस पार्टी की पहली सरकार बनी।
1921 Communal G.O. के माध्यम से सरकारी सेवाओं में सामुदायिक प्रतिनिधित्व की नीति को आगे बढ़ाया गया।
1921 मद्रास में महिलाओं को निर्धारित योग्यताओं के अधीन मताधिकार प्रदान किया गया।
1922 तत्कालीन “Depressed Classes” के लिए “Adi Dravidar” नाम के आधिकारिक प्रयोग को स्वीकार किया गया।
1923 Madras University Act पारित किया गया।
1924–25 वैकोम सत्याग्रह में पेरियार की महत्वपूर्ण भूमिका; उन्हें “वैकोम वीरर” कहा गया।
1925 पेरियार ने कांग्रेस से अलग होकर आत्मसम्मान आंदोलन शुरू किया।
1926 आंध्र विश्वविद्यालय ने कार्य करना शुरू किया।
1926 डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी मद्रास विधान परिषद में नामित होने वाली पहली महिला बनीं।
1929 चेंगलपट्टू में आत्मसम्मान आंदोलन का पहला प्रमुख प्रांतीय सम्मेलन आयोजित हुआ।
1929 अन्नामलाई विश्वविद्यालय की स्थापना।
1937 मद्रास प्रांतीय चुनाव में जस्टिस पार्टी की भारी पराजय और कांग्रेस की विजय।
1937–39 पेरियार के नेतृत्व में हिंदी-विरोधी आंदोलन
29 दिसंबर 1938 पेरियार जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष चुने गए।
1944 सेलम सम्मेलन में जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर द्रविड़र कड़गम (DK) किया गया।

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