स्वराज पार्टी (1923): चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू और काउंसिल प्रवेश की नीति

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत स्वराज पार्टी (1923)
📚 विषय सूची

स्वराज पार्टी (1923 ई.)

स्वराज पार्टी की स्थापना 1 जनवरी 1923 ई. को देशबंधु चित्तरंजन दास तथा पंडित मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में की गई।

➣ इसका उद्देश्य भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग होकर कोई नया स्वतंत्रता आंदोलन चलाना नहीं था, बल्कि ब्रिटिश सरकार द्वारा स्थापित विधान परिषदों में प्रवेश कर उनके भीतर से औपनिवेशिक शासन का विरोध करना था।

➣ स्वराज पार्टी का उदय ऐसे समय में हुआ जब 1922 ई. में असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद राष्ट्रीय आंदोलन असमंजस की स्थिति में था।

➣ कांग्रेस के भीतर इस बात पर मतभेद उत्पन्न हो गया कि क्या विधान परिषदों का बहिष्कार जारी रखा जाए या उनमें प्रवेश कर सरकार की नीतियों का विरोध किया जाए। इसी वैचारिक मतभेद के परिणामस्वरूप स्वराज पार्टी का जन्म हुआ।

➣ स्वराज पार्टी के नेताओं का विश्वास था कि यदि राष्ट्रवादी नेता विधान परिषदों में प्रवेश करेंगे, तो वे सरकार के कार्यों में बाधा उत्पन्न कर सकेंगे, दमनकारी कानूनों का विरोध कर सकेंगे तथा भारतीय जनता की समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठा सकेंगे। इस नीति को आगे चलकर अवरोध की नीति अथवा काउंसिल प्रवेश कार्यक्रम के नाम से जाना गया।

➣ यद्यपि स्वराज पार्टी का अस्तित्व अपेक्षाकृत कुछ वर्षों तक ही प्रभावी रहा, फिर भी इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नई राजनीतिक दिशा प्रदान की।

➣ इसने यह सिद्ध किया कि औपनिवेशिक शासन का विरोध केवल सड़कों पर आंदोलनों के माध्यम से ही नहीं, बल्कि विधान परिषदों के भीतर संवैधानिक तरीकों से भी किया जा सकता है।

पृष्ठभूमि

प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एक नए चरण में प्रवेश कर चुका था। रॉलेट एक्ट (1919), जलियाँवाला बाग हत्याकांड तथा खिलाफत आंदोलन जैसी घटनाओं ने ब्रिटिश शासन के प्रति भारतीयों के असंतोष को अत्यधिक बढ़ा दिया।

➣ इसी वातावरण में महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन (1920–1922) प्रारम्भ हुआ, जिसने पहली बार राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक जनाधार प्रदान किया।

असहयोग आंदोलन की वापसी एवं राजनीतिक परिस्थिति

5 फरवरी 1922 ई. को चौरी-चौरा की घटना के बाद महात्मा गांधी ने 12 फरवरी 1922 ई. को असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया। इस निर्णय के बाद राष्ट्रीय आंदोलन की गति धीमी पड़ गई और कांग्रेस के सामने आगे की रणनीति निर्धारित करने की चुनौती उत्पन्न हुई।

➣ मार्च 1922 ई. में महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस का नेतृत्व भी एक प्रकार के संक्रमण काल से गुजरने लगा।

➣ उसी समय भारत शासन अधिनियम, 1919 के अंतर्गत गठित विधान परिषदों के चुनाव निकट थे। इससे यह प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो गया कि स्वतंत्रता संघर्ष को सक्रिय बनाए रखने के लिए आगे कौन-सी राजनीतिक रणनीति अपनाई जाए।

➣ कांग्रेस के अनेक नेताओं का मानना था कि यदि राष्ट्रवादी नेता विधान परिषदों का बहिष्कार करते रहे, तो वहाँ सरकार समर्थक सदस्य प्रभावी हो जाएँगे। दूसरी ओर, कुछ नेताओं का विचार था कि परिषदों का उपयोग ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध करने और उसकी कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करने के लिए किया जा सकता है।

➣ इसी प्रश्न ने कांग्रेस के भीतर गंभीर वैचारिक बहस को जन्म दिया, जो आगे चलकर संगठन के भीतर दो अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोणों के रूप में विकसित हुई।

कांग्रेस में मतभेद : परिवर्तनवादी एवं अपरिवर्तनवादी

➣ असहयोग आंदोलन की वापसी के बाद कांग्रेस के भीतर आगे की राजनीतिक रणनीति को लेकर स्पष्ट मतभेद सामने आ गए। दोनों पक्ष भारत की स्वतंत्रता चाहते थे, किन्तु उसे प्राप्त करने के साधनों के संबंध में उनके विचार भिन्न थे।

➣ परिणामस्वरूप कांग्रेस दो प्रमुख वैचारिक धाराओं-परिवर्तनवादी तथा अपरिवर्तनवादी-में विभाजित हो गई।

परिवर्तनवादी नेताओं का नेतृत्व देशबंधु चित्तरंजन दास तथा पंडित मोतीलाल नेहरू कर रहे थे। उनका मत था कि राष्ट्रवादी नेताओं को विधान परिषदों में प्रवेश कर सरकार की नीतियों का भीतर से विरोध करना चाहिए।

➣ इसके विपरीत अपरिवर्तनवादी नेताओं का नेतृत्व डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभभाई पटेल, सी. राजगोपालाचारी, डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी तथा अन्य गांधीवादी नेताओं के हाथों में था।

➣ उनका मत था कि परिषदों का बहिष्कार जारी रखते हुए महात्मा गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों-जैसे खादी का प्रचार, राष्ट्रीय शिक्षा, ग्राम सुधार तथा अस्पृश्यता-निवारण-को आगे बढ़ाया जाए।

➣ यद्यपि दोनों गुटों के विचारों में अंतर था, फिर भी दोनों का अंतिम लक्ष्य भारत की स्वतंत्रता ही था। यही कारण था कि मतभेद होने के बावजूद दोनों पक्ष कांग्रेस के भीतर बने रहे और संगठन की एकता बनाए रखने का प्रयास करते रहे।

परिवर्तनवादी बनाम अपरिवर्तनवादी
आधार परिवर्तनवादी (Pro-Changers) अपरिवर्तनवादी (No-Changers)
प्रमुख नेता देशबंधु चित्तरंजन दास, पंडित मोतीलाल नेहरू महात्मा गांधी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभभाई पटेल, सी. राजगोपालाचारी
विधान परिषदों के प्रति दृष्टिकोण विधान परिषदों में प्रवेश के समर्थक विधान परिषदों के बहिष्कार के समर्थक
संघर्ष की रणनीति परिषदों के भीतर रहकर सरकार का विरोध (अवरोध की नीति) असहयोग, रचनात्मक कार्यक्रम एवं जन-आंदोलन पर बल
मुख्य उद्देश्य संवैधानिक संस्थाओं का उपयोग कर ब्रिटिश सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाना जनता को संगठित कर स्वराज्य के लिए जनाधार को मजबूत करना
कार्यप्रणाली संसदीय एवं संवैधानिक संघर्ष रचनात्मक कार्य, जनसंगठन एवं अहिंसक आंदोलन

गया अधिवेशन (1922)

➣ कांग्रेस के भीतर उत्पन्न यह वैचारिक मतभेद दिसंबर 1922 ई. में आयोजितबिहार के गया अधिवेशन में खुलकर सामने आया। इस अधिवेशन की अध्यक्षता देशबंधु चित्तरंजन दास ने की।

➣ उन्होंने प्रस्ताव रखा कि कांग्रेस को आगामी विधान परिषदों के चुनावों में भाग लेना चाहिए और परिषदों के भीतर से ब्रिटिश शासन का विरोध करना चाहिए।

➣ किन्तु अपरिवर्तनवादी नेताओं ने परिषदों के बहिष्कार की नीति को जारी रखते हुए महात्मा गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों को ही स्वतंत्रता आंदोलन का उपयुक्त मार्ग माना। परिणामस्वरूप चित्तरंजन दास का प्रस्ताव पारित नहीं हो सका।

➣ प्रस्ताव अस्वीकृत होने के बाद चित्तरंजन दास ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके पश्चात उन्होंने मोतीलाल नेहरू तथा अपने अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर परिषदों में प्रवेश की नीति को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।

गया अधिवेशन (1922 ई.) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यहीं से स्वराज पार्टी के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

स्वराज पार्टी की स्थापना (1923)

गया अधिवेशन (दिसंबर 1922) में परिषद प्रवेश संबंधी प्रस्ताव अस्वीकार होने के बाद परिवर्तनवादी नेताओं ने अपनी राजनीतिक रणनीति को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।

➣ इसी क्रम में 1 जनवरी 1923 ई. को देशबंधु चित्तरंजन दास तथा पंडित मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में स्वराज पार्टी (Swaraj Party) की स्थापना की गई।

➣ प्रारम्भ में इस संगठन का आधिकारिक नाम कांग्रेस-खिलाफत स्वराज पार्टी रखा गया। बाद में यह संगठन सामान्यतः स्वराज पार्टी के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

➣ स्वराज पार्टी के संस्थापकों ने स्पष्ट किया कि यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग कोई प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल नहीं है। इसके सदस्य कांग्रेस के भीतर रहकर ही अपनी राजनीतिक रणनीति को आगे बढ़ाएँगे तथा राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखेंगे।

➣ स्वराज पार्टी की स्थापना भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ थी। इसके माध्यम से कांग्रेस के भीतर पहली बार एक संगठित समूह ने संवैधानिक संस्थाओं का उपयोग ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राजनीतिक संघर्ष के लिए करने की दिशा में संगठित पहल की।

➣ स्वराज पार्टी के गठन एवं विकास में अनेक राष्ट्री नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रमुख संस्थापक एवं नेताओं का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-

नेता भूमिका
देशबंधु चित्तरंजन दास स्वराज पार्टी के प्रमुख संस्थापक, वैचारिक नेता एवं मार्गदर्शक।
पंडित मोतीलाल नेहरू सह-संस्थापक, केंद्रीय विधान सभा में स्वराज पार्टी के प्रमुख संसदीय नेता।
विठ्ठलभाई पटेल विधान परिषदों में स्वराज पार्टी के प्रमुख नेता; 1925 में केंद्रीय विधान सभा के प्रथम भारतीय निर्वाचित अध्यक्ष बने।
एन. सी. केलकर महाराष्ट्र में स्वराज पार्टी के प्रमुख नेता तथा संगठन के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान।
हकीम अजमल खाँ स्वराज पार्टी के संस्थापक नेताओं में से एक तथा प्रमुख राष्ट्रवादी नेता।
एम. आर. जयकर प्रसिद्ध विधिवेत्ता एवं स्वराज पार्टी के प्रमुख संसदीय नेता।
श्रीनिवास अयंगार दक्षिण भारत में स्वराज पार्टी के प्रमुख नेता।

➣ इस प्रकार स्वराज पार्टी का नेतृत्व ऐसे अनुभवी नेताओं के हाथों में था, जिन्होंने संसदीय परंपराओं, संवैधानिक बहसों तथा प्रभावशाली वक्तृत्व-कला के माध्यम से ब्रिटिश शासन को चुनौती दी और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई राजनीतिक दिशा प्रदान की।

उद्देश्य

  • विधान परिषदों में प्रवेश कर ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों का प्रभावी विरोध करना।
  • सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट, विधेयकों तथा अन्य प्रशासनिक प्रस्तावों का विरोध कर औपनिवेशिक शासन की कमजोरियों को उजागर करना।
  • भारतीय जनता के राजनीतिक एवं आर्थिक हितों की रक्षा करना तथा उनकी समस्याओं को परिषदों में प्रमुखता से उठाना।
  • भारत में उत्तरदायी शासन तथा स्वशासन की माँग को सशक्त रूप से प्रस्तुत करना।
  • ब्रिटिश सरकार पर संवैधानिक एवं संसदीय माध्यमों से राजनीतिक दबाव बनाकर प्रशासनिक सुधारों को बाध्य करना।
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अंतिम लक्ष्य स्वराज्य की प्राप्ति में संसदीय संघर्ष के माध्यम से योगदान देना।

➣ इस प्रकार स्वराज पार्टी का उद्देश्य केवल चुनाव जीतना या विधान परिषदों में प्रतिनिधित्व प्राप्त करना नहीं था, बल्कि उन परिषदों को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के एक प्रभावी राजनीतिक मंच में परिवर्तित करना था।

राजनीतिक विचारधारा

स्वराज पार्टी की विचारधारा संवैधानिक संघर्ष पर आधारित थी। पार्टी का मानना था कि ब्रिटिश सरकार द्वारा स्थापित विधान परिषदों का उपयोग औपनिवेशिक शासन के समर्थन के लिए नहीं, बल्कि उसके विरोध के लिए किया जाना चाहिए।

➣ इसी कारण स्वराज पार्टी ने परिषदों में प्रवेश को राष्ट्रीय आंदोलन की एक नई रणनीति के रूप में अपनाया। उसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन से समझौता करना नहीं, बल्कि संवैधानिक साधनों के माध्यम से सरकार को चुनौती देना था।

➣ यही विचार आगे चलकर काउंसिल प्रवेश की नीति तथा अवरोध की नीति के रूप में सामने आया।

काउंसिल प्रवेश की नीति

स्वराज पार्टी की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक रणनीति काउंसिल प्रवेश की नीति थी। इसके अंतर्गत पार्टी ने ब्रिटिश सरकार द्वारा स्थापित विधान परिषदों के चुनावों में भाग लेने तथा परिषदों के भीतर रहकर राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने का निर्णय लिया।

➣ स्वराज पार्टी के नेताओं का मत था कि यदि राष्ट्रवादी परिषदों का बहिष्कार करते रहेंगे, तो वहाँ सरकार समर्थक सदस्य प्रभावी हो जाएँगे।

➣ इसके विपरीत, यदि राष्ट्रवादी परिषदों में प्रवेश करेंगे, तो वे सरकार की नीतियों का प्रभावी विरोध कर सकेंगे, भारतीय जनता की समस्याओं को परिषदों में उठा सकेंगे तथा औपनिवेशिक शासन की कमियों को देश के सामने उजागर कर सकेंगे।

➣ इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए स्वराज पार्टी ने परिषदों में प्रवेश के बाद जिस संसदीय कार्यशैली को अपनाया, वह अवरोध की नीति के नाम से प्रसिद्ध हुई।

अवरोध की नीति

➣ विधान परिषदों में प्रवेश करने के बाद स्वराज पार्टी ने अवरोध की नीति अपनाई। इसके अंतर्गत परिषदों में उपलब्ध संवैधानिक एवं संसदीय प्रक्रियाओं का उपयोग करके ब्रिटिश सरकार की कार्यवाही का प्रभावी विरोध किया जाता था।

➣ स्वराजवादी सदस्य बहस, प्रश्न, संशोधन तथा मतदान जैसे संसदीय उपायों के माध्यम से सरकार की नीतियों को चुनौती देते थे और परिषदों को राजनीतिक संघर्ष का सक्रिय मंच बनाते थे।

➣ अवरोध की नीति के अंतर्गत स्वराज पार्टी मुख्यतः निम्नलिखित संसदीय उपायों का प्रयोग करती थी-

  • सरकारी विधेयकों पर विस्तृत बहस कर उनकी कमियों को उजागर करना।
  • प्रश्नकाल के माध्यम से मंत्रियों एवं अधिकारियों से जवाब माँगना।
  • संशोधन प्रस्ताव प्रस्तुत कर सरकारी प्रस्तावों को चुनौती देना।
  • स्थगन प्रस्ताव एवं अन्य संसदीय प्रक्रियाओं के माध्यम से महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दे उठाना।
  • आवश्यकता पड़ने पर सरकारी बजट एवं वित्तीय प्रस्तावों के विरुद्ध मतदान करना।
  • परिषदों की कार्यवाही के माध्यम से ब्रिटिश सरकार की नीतियों को जनता के सामने उजागर करना।

➣ इस प्रकार अवरोध की नीति स्वराज पार्टी की संसदीय कार्यशैली थी। इसके माध्यम से उसने वैधानिक संस्थाओं के भीतर रहकर ब्रिटिश शासन को चुनौती दी तथा भारतीय संसदीय विपक्ष की एक सशक्त परंपरा की शुरुआत की।

विधान परिषदों में स्वराज पार्टी की भूमिका

स्वराज पार्टी की स्थापना के बाद उसका मुख्य लक्ष्य अपनी काउंसिल प्रवेश की नीति को व्यवहार में लागू करना था। इसी उद्देश्य से पार्टी ने 1923 ई. में आयोजित केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों के चुनावों में सक्रिय रूप से भाग लिया।

➣ इन चुनावों के परिणामों ने यह सिद्ध कर दिया कि स्वराज पार्टी केवल एक वैचारिक समूह नहीं थी, बल्कि वह भारतीय राजनीति में एक प्रभावशाली संसदीय शक्ति के रूप में उभर चुकी थी।

1923 के चुनाव एवं सफलता

नवंबर 1923 ई. में भारत शासन अधिनियम, 1919 के अंतर्गत केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान परिषदों के चुनाव आयोजित किए गए। यह स्वराज पार्टी का पहला चुनाव था और इन चुनावों को उसकी काउंसिल प्रवेश नीति की पहली बड़ी परीक्षा माना गया।

➣ चुनाव परिणामों में पार्टी को उल्लेखनीय सफलता मिली। केंद्रीय विधान सभा में स्वराज पार्टी सबसे बड़े निर्वाचित दल के रूप में उभरी। यद्यपि उसे पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हुआ, फिर भी वह सरकार के लिए सबसे प्रभावशाली विपक्षी शक्ति बन गई।

➣ प्रांतीय विधान परिषदों में भी स्वराज पार्टी ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। विशेष रूप से बंगाल और मध्य प्रांत में उसे स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ,

➣ जबकि बंबई, संयुक्त प्रांत तथा अन्य प्रांतों में भी उसने प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई। इन परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया कि परिषदों में प्रवेश की उसकी नीति को जनता का पर्याप्त समर्थन प्राप्त था।

➣ चुनावों के बाद स्वराज पार्टी ने केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान परिषदों में एक संगठित संसदीय दल का गठन किया। पार्टी के सदस्यों ने परिषदों के भीतर समन्वित रूप से कार्य करते हुए सरकार की नीतियों का विरोध प्रारम्भ किया और अपनी अवरोध की नीति को व्यवहार में लागू किया।

➣ इन चुनावों की सफलता ने स्वराज पार्टी को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप पहली बार ब्रिटिश सरकार को विधान परिषदों के भीतर एक सशक्त एवं संगठित राष्ट्रवादी विपक्ष का सामना करना पड़ा, जिसने आगे चलकर उसकी अनेक नीतियों को प्रभावी चुनौती दी।

1923 के चुनाव : प्रमुख परिणाम विवरण
चुनाव नवंबर 1923 ई.
आधार भारत शासन अधिनियम, 1919 के अंतर्गत
केंद्रीय विधान सभा स्वराज पार्टी सबसे बड़े निर्वाचित दल के रूप में उभरी।
प्रमुख सफलता बंगाल एवं मध्य प्रांत में उल्लेखनीय सफलता; अन्य प्रांतों में भी प्रभावशाली प्रदर्शन।
ऐतिहासिक महत्व ब्रिटिश सरकार को पहली बार विधान परिषदों के भीतर एक संगठित राष्ट्रवादी विपक्ष का सामना करना पड़ा।

➣ यद्यपि विधान परिषदों की शक्तियाँ सीमित थीं और अंतिम अधिकार ब्रिटिश सरकार के हाथों में ही था, फिर भी स्वराज पार्टी ने इन संस्थाओं को निष्क्रिय मंच नहीं बनने दिया। उसने भारतीय जनता की समस्याओं और राष्ट्रीय आकांक्षाओं को औपनिवेशिक शासन के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।

विठ्ठलभाई पटेल का केंद्रीय विधान सभा का अध्यक्ष चुना जाना (1925)

➣ ली कमीशन तथा मुडिमैन समिति जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर स्वराज पार्टी के प्रभावी संसदीय प्रदर्शन के बाद उसका राजनीतिक प्रभाव और अधिक बढ़ गया।

➣ इसी पृष्ठभूमि में 1925 ई. में स्वराज पार्टी को एक महत्वपूर्ण संसदीय सफलता मिली, जब उसके वरिष्ठ नेता विठ्ठलभाई झावेरभाई पटेल केंद्रीय विधान सभा के अध्यक्ष निर्वाचित हुए।

विठ्ठलभाई पटेल सरदार वल्लभभाई पटेल के बड़े भाई थे। वे इस पद पर निर्वाचित होने वाले प्रथम भारतीय थे। इससे पूर्व इस पद पर सामान्यतः ब्रिटिश अधिकारी ही नियुक्त किए जाते थे।

➣ विठ्ठलभाई पटेल का निर्वाचन इस बात का प्रमाण था कि स्वराज पार्टी विधान परिषदों के भीतर एक प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो चुकी थी। यह उसकी संसदीय रणनीति तथा संगठनात्मक क्षमता की एक महत्वपूर्ण सफलता मानी गई।

➣ यद्यपि वे स्वराज पार्टी के प्रमुख नेता थे, फिर भी अध्यक्ष के रूप में उन्होंने सभी सदस्यों के साथ समान व्यवहार करने का प्रयास किया तथा सदन की गरिमा और स्वायत्तता को बनाए रखने पर विशेष बल दिया।

ली कमीशन का विरोध

1923 ई. में ब्रिटिश सरकार ने भारत की उच्च प्रशासनिक सेवाओं में भर्ती की व्यवस्था की समीक्षा करने के लिए ली कमीशन की नियुक्ति की।

➣ इस आयोग के अध्यक्ष लॉर्ड ली ऑफ़ फ़ेयरहैम थे। आयोग का उद्देश्य भारतीय सिविल सेवाओं (ICS) तथा अन्य उच्च सेवाओं में यूरोपीय और भारतीय अधिकारियों के अनुपात तथा भर्ती नीति पर विचार करना था।

➣ जब आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, तो उसने उच्च प्रशासनिक सेवाओं में ब्रिटिश अधिकारियों के प्रभुत्व को बनाए रखने की सिफारिश की।

➣ यद्यपि भारतीयों की संख्या में कुछ वृद्धि का सुझाव दिया गया, फिर भी आयोग ने महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर अंग्रेज़ अधिकारियों की प्रधानता को समाप्त करने का समर्थन नहीं किया।

➣ स्वराज पार्टी ने ली कमीशन की सिफारिशों का तीव्र विरोध किया। पार्टी का मत था कि भारतीय प्रशासन पर भारतीयों का अधिकार होना चाहिए और उच्च सेवाओं में नियुक्ति के अवसर समान रूप से भारतीयों को मिलने चाहिए।

➣ स्वराजवादियों ने इसे ब्रिटिश सरकार की उस नीति का हिस्सा माना, जिसके माध्यम से प्रशासन पर अंग्रेज़ों का नियंत्रण बनाए रखा जा रहा था।

➣ केंद्रीय विधान सभा में पंडित मोतीलाल नेहरू तथा अन्य स्वराजवादी नेताओं ने आयोग की सिफारिशों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने तर्क दिया कि जब भारतीय प्रशासन का व्यय भारतीय जनता वहन करती है, तो उसके उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

परिणाम

➣ यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने आयोग की सभी सिफारिशों को तत्काल वापस नहीं लिया, फिर भी विधान सभा में हुए तीव्र विरोध ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय अब उच्च प्रशासनिक सेवाओं में यूरोपीय अधिकारियों के विशेषाधिकार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।

➣ इस बहस ने भारतीयकरण की माँग को और अधिक बल प्रदान किया तथा आगे चलकर भारतीयों को उच्च प्रशासनिक सेवाओं में अधिक अवसर देने के प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बना दिया। यह स्वराज पार्टी की संसदीय सफलता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।

मुडिमैन समिति का विरोध

भारत शासन अधिनियम, 1919 के अंतर्गत प्रांतों में लागू द्वैध शासन की कार्यप्रणाली की समीक्षा करने के लिए 1924 ई. में ब्रिटिश सरकार ने मुडिमैन समिति का गठन किया।

➣ इस समिति के अध्यक्ष सर अलेक्जेंडर मुडिमैन थे। समिति का उद्देश्य यह जाँचना था कि प्रांतीय शासन में द्वैध शासन की व्यवस्था कितनी सफल रही है।

➣ समिति में ब्रिटिश तथा भारतीय दोनों प्रकार के सदस्य शामिल थे, किन्तु इसके निष्कर्षों पर सर्वसम्मति नहीं बन सकी। अधिकांश सरकारी सदस्यों ने द्वैध शासन की व्यवस्था को जारी रखने का समर्थन किया, जबकि भारतीय सदस्यों ने इसे अप्रभावी तथा अव्यावहारिक बताया।

➣ स्वराज पार्टी ने मुडिमैन समिति की कार्यप्रणाली तथा उसकी सिफारिशों की तीव्र आलोचना की। पार्टी का मत था कि समिति भारतीय जनता की वास्तविक आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती और उसका उद्देश्य उत्तरदायी शासन स्थापित करने के बजाय भारत शासन अधिनियम, 1919 की कमियों को छिपाना है।

➣ केंद्रीय विधान सभा में मोतीलाल नेहरू तथा अन्य स्वराजवादी नेताओं ने स्पष्ट कहा कि प्रांतों में लागू द्वैध शासन पूरी तरह असफल सिद्ध हुआ है।

उनके अनुसार प्रशासनिक अधिकारों का कृत्रिम विभाजन उत्तरदायी शासन के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा था और भारत को वास्तविक स्वशासन प्रदान किए बिना राजनीतिक समस्याओं का समाधान संभव नहीं था।

परिणाम

➣ स्वराज पार्टी के तीव्र विरोध तथा भारतीय सदस्यों के असहमति-पूर्ण मत के कारण मुडिमैन समिति की रिपोर्ट भारतीय जनमत को संतुष्ट नहीं कर सकी। समिति द्वैध शासन की कमियों का कोई प्रभावी समाधान प्रस्तुत करने में असफल रही।

➣ परिणामस्वरूप भारत में व्यापक संवैधानिक सुधारों की माँग और अधिक प्रबल हुई। आगे चलकर यही राजनीतिक दबाव साइमन कमीशन (1927) की नियुक्ति तथा नए संवैधानिक सुधारों की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण कारण बना।

स्वराज पार्टी का पतन एवं उत्तरकाल

1923 से 1925 ई. के बीच स्वराज पार्टी ने विधान परिषदों में एक प्रभावशाली राष्ट्रवादी विपक्ष के रूप में अपनी पहचान स्थापित की। किन्तु 1925 ई. के बाद परिस्थितियाँ बदलने लगीं।

देशबंधु चित्तरंजन दास की मृत्यु (1925)

16 जून 1925 ई. को दार्जिलिंग में देशबंधु चित्तरंजन दास का असामयिक निधन हो गया। वे स्वराज पार्टी के संस्थापक तथा उसके प्रमुख वैचारिक और राजनीतिक नेता थे। उनकी मृत्यु स्वराज पार्टी के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई।

➣ देशबंधु दास के निधन के बाद पंडित मोतीलाल नेहरू सहित अन्य नेताओं ने संगठन का नेतृत्व संभाला, किन्तु पार्टी के भीतर परिषदों में अपनाई जाने वाली रणनीति को लेकर मतभेद उभरने लगे।

➣ एक वर्ग अवरोध की नीति को जारी रखना चाहता था, जबकि दूसरा वर्ग परिस्थितियों के अनुसार सरकार के साथ सीमित सहयोग का पक्षधर था।

➣ इन वैचारिक मतभेदों ने स्वराज पार्टी की संगठनात्मक एकता को प्रभावित किया। परिणामस्वरूप आगे चलकर उत्तरदायी सहयोग की नीति का उदय हुआ और पार्टी के राजनीतिक प्रभाव में धीरे-धीरे गिरावट आने लगी।

➣ हालाँकि उत्तरदायी सहयोग की अवधारणा देशबंधु चित्तरंजन दास की मृत्यु से पहले ही उभरने लगी थी, किन्तु 1925 ई. में उनके निधन के बाद यह नीति अधिक स्पष्ट रूप से सामने आई।

उत्तरदायी सहयोग की नीति

देशबंधु चित्तरंजन दास की मृत्यु के बाद स्वराज पार्टी के भीतर परिषदों में अपनाई जाने वाली रणनीति को लेकर मतभेद और अधिक स्पष्ट हो गए।

➣ एक वर्ग पहले की भाँति अवरोध की नीति जारी रखना चाहता था, जबकि दूसरा वर्ग बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने का समर्थक था। इसी पृष्ठभूमि में उत्तरदायी सहयोग की अवधारणा सामने आई।

➣ इस विचार के प्रमुख समर्थकों में एन. सी. केलकर, एम. आर. जयकर तथा कुछ अन्य स्वराजवादी नेता शामिल थे। उनका मत था कि प्रत्येक सरकारी प्रस्ताव का केवल विरोध करना उचित नहीं है।

➣ यदि कोई प्रस्ताव भारतीय जनता के हित में हो, तो उसका समर्थन किया जाना चाहिए, जबकि जनविरोधी तथा औपनिवेशिक हितों से जुड़े प्रस्तावों का पहले की भाँति विरोध जारी रहना चाहिए।

➣ उत्तरदायी सहयोग का अर्थ ब्रिटिश सरकार के साथ समझौता करना नहीं था। इसका उद्देश्य परिस्थितियों के अनुसार संसदीय रणनीति अपनाते हुए राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देना था। इस नीति के समर्थकों का विश्वास था कि इससे विधान परिषदों के भीतर भारतीय सदस्यों का प्रभाव और अधिक बढ़ाया जा सकता है।

➣ किन्तु स्वराज पार्टी के सभी नेता इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं थे। अनेक नेताओं का मानना था कि इससे पार्टी अपनी मूल अवरोध की नीति से विचलित हो जाएगी और ब्रिटिश सरकार को अप्रत्यक्ष लाभ मिलेगा।

➣ परिणामस्वरूप संगठन के भीतर वैचारिक मतभेद और गहरे होते गए, जिसने आगे चलकर उसके राजनीतिक पतन को गति दी।

1926 के चुनाव एवं स्वराज पार्टी का पतन

1926 ई. में केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान परिषदों के पुनः चुनाव आयोजित किए गए। इस समय तक स्वराज पार्टी अपनी प्रारम्भिक एकता और राजनीतिक प्रभाव खो चुकी थी।

देशबंधु चित्तरंजन दास की मृत्यु, उत्तरदायी सहयोग को लेकर उत्पन्न मतभेद तथा बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के कारण पार्टी पहले जैसी संगठित नहीं रह गई थी।

➣ इन परिस्थितियों का प्रभाव 1926 के चुनावों में स्पष्ट दिखाई दिया। स्वराज पार्टी का प्रदर्शन 1923 ई. की तुलना में कमजोर रहा और केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान परिषदों में उसकी राजनीतिक शक्ति घट गई।

➣ इससे विधान परिषदों के भीतर ब्रिटिश सरकार पर प्रभावी दबाव बनाने की उसकी क्षमता भी कम हो गई। इसी अवधि में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा भी बदलने लगी। साइमन कमीशन (1927) के बहिष्कार, सर्वदलीय सम्मेलनों तथा व्यापक जन-आंदोलनों की तैयारियों ने पुनः संसदीय राजनीति की अपेक्षा जनसंघर्ष को अधिक महत्व देना प्रारम्भ कर दिया। परिणामस्वरूप स्वराज पार्टी की काउंसिल-केंद्रित राजनीति का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा।

➣ अब स्वराज पार्टी के अनेक प्रमुख नेता पुनः भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मुख्यधारा के साथ सक्रिय रूप से कार्य करने लगे। इसके कारण पार्टी की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान धीरे-धीरे समाप्त होती गई और वह एक प्रभावशाली संसदीय संगठन के रूप में अपना पूर्व स्थान बनाए नहीं रख सकी।

➣ यद्यपि स्वराज पार्टी का राजनीतिक प्रभाव कुछ ही वर्षों में घट गया, फिर भी उसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई संसदीय रणनीति प्रदान की। विधान परिषदों के भीतर संगठित विपक्ष की स्थापना, ब्रिटिश सरकार की नीतियों का संवैधानिक विरोध में उसका योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सदैव महत्वपूर्ण माना जाता है।

स्वराज पार्टी का प्रभाव एवं महत्व

➣ इसने पहली बार यह सिद्ध किया कि ब्रिटिश सरकार द्वारा स्थापित संवैधानिक संस्थाओं का उपयोग भी औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रभावी राजनीतिक संघर्ष के लिए किया जा सकता है।

➣ स्वराज पार्टी ने भारतीय संसदीय परंपरा, संगठित विपक्ष तथा संवैधानिक संघर्ष की नई दिशा विकसित की, जिसका प्रभाव आगे के राष्ट्रीय आंदोलन और स्वतंत्र भारत की संसदीय व्यवस्था दोनों पर पड़ा।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव

➣ असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद जब राष्ट्रीय आंदोलन अपेक्षाकृत धीमा पड़ गया था, तब स्वराज पार्टी ने विधान परिषदों के भीतर संघर्ष का मार्ग अपनाकर राष्ट्रीय आंदोलन को सक्रिय बनाए रखा। इससे स्वतंत्रता आंदोलन की निरंतरता बनी रही और राष्ट्रवादी राजनीति को नया मंच प्राप्त हुआ।

➣ स्वराजवादी नेताओं ने परिषदों में संगठित विपक्ष की भूमिका निभाते हुए ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों की खुली आलोचना की।

➣ उन्होंने ली कमीशन, मुडिमैन समिति, सरकारी बजट तथा प्रशासनिक निर्णयों पर प्रभावी बहस के माध्यम से यह सिद्ध किया कि भारतीय नेता संसदीय संस्थाओं का सफलतापूर्वक उपयोग कर सकते हैं।

➣ स्वराज पार्टी की गतिविधियों ने भारतीय नेताओं में संसदीय कार्यप्रणाली, विधायी बहस, वित्तीय नियंत्रण तथा प्रशासनिक उत्तरदायित्व की समझ विकसित की। यही अनुभव आगे चलकर स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक एवं संसदीय व्यवस्था के निर्माण में भी उपयोगी सिद्ध हुआ।

➣ यद्यपि स्वराज पार्टी अपने अंतिम लक्ष्य स्वराज्य को प्राप्त नहीं कर सकी, फिर भी उसने ब्रिटिश शासन की संवैधानिक सीमाओं को उजागर किया तथा भारतीय जनता में राजनीतिक चेतना को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उपलब्धियाँ

  • विधान परिषदों में सशक्त राष्ट्रवादी विपक्ष की स्थापना – स्वराज पार्टी ने पहली बार केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों में एक संगठित और प्रभावशाली विपक्ष का निर्माण किया, जिसने ब्रिटिश सरकार की नीतियों को खुली चुनौती दी।
  • औपनिवेशिक शासन की नीतियों का प्रभावी विरोध – पार्टी ने ली कमीशन, मुडिमैन समिति तथा अन्य सरकारी प्रस्तावों का संसदीय माध्यमों से विरोध कर ब्रिटिश शासन की कमजोरियों को उजागर किया।
  • संसदीय परंपराओं का विकास – स्वराजवादी नेताओं ने प्रश्नकाल, बहस, संशोधन प्रस्ताव तथा मतदान जैसी संसदीय प्रक्रियाओं का प्रभावी उपयोग कर भारतीय नेताओं में संसदीय कार्यप्रणाली का व्यावहारिक अनुभव विकसित किया।
  • विठ्ठलभाई पटेल का अध्यक्ष निर्वाचित होना1925 ई. में विठ्ठलभाई पटेल का केंद्रीय विधान सभा का प्रथम भारतीय निर्वाचित अध्यक्ष बनना स्वराज पार्टी की सबसे बड़ी संसदीय उपलब्धियों में से एक था।
  • राष्ट्रीय आंदोलन की निरंतरता बनाए रखनाअसहयोग आंदोलन की समाप्ति और सविनय अवज्ञा आंदोलन के आरम्भ के बीच स्वराज पार्टी ने राष्ट्रीय आंदोलन को सक्रिय बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • उत्तरदायी शासन की माँग को सशक्त बनाना – पार्टी ने ब्रिटिश सरकार पर संवैधानिक सुधारों के लिए निरंतर दबाव बनाया तथा उत्तरदायी शासन की माँग को राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख मुद्दा बनाए रखा।

➣ इस प्रकार स्वराज पार्टी ने अपने सीमित अस्तित्व के बावजूद भारतीय संसदीय लोकतंत्र, राष्ट्रवादी राजनीति तथा संवैधानिक संघर्ष की परंपरा को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रमुख व्यक्तित्व

व्यक्तित्व योगदान / महत्व
देशबंधु चित्तरंजन दास स्वराज पार्टी के सह-संस्थापक, प्रथम अध्यक्ष तथा प्रमुख वैचारिक नेता; काउंसिल प्रवेश की नीति के मुख्य समर्थक।
पंडित मोतीलाल नेहरू स्वराज पार्टी के सह-संस्थापक; केंद्रीय विधान सभा में स्वराजवादी दल के प्रमुख नेता; ली कमीशन एवं मुडिमैन समिति का प्रभावी विरोध किया।
विठ्ठलभाई झावेरभाई पटेल 1925 ई. में केंद्रीय विधान सभा के प्रथम भारतीय निर्वाचित अध्यक्ष बने; भारतीय संसदीय इतिहास की महत्वपूर्ण उपलब्धि।
महात्मा गांधी असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद परिषदों के बहिष्कार तथा रचनात्मक कार्यक्रमों के समर्थक; अपरिवर्तनवादी (No-Changers) गुट के प्रमुख नेता।
एन. सी. केलकर देशबंधु दास की मृत्यु के बाद उत्तरदायी सहयोग (Responsive Cooperation) की नीति के प्रमुख समर्थकों में से एक।
एम. आर. जयकर उत्तरदायी सहयोग की नीति के समर्थक; परिषदों में व्यावहारिक संसदीय रणनीति अपनाने के पक्षधर।
सर अलेक्जेंडर मुडिमैन मुडिमैन समिति (1924) के अध्यक्ष; समिति ने द्वैध शासन (Dyarchy) की समीक्षा की।
लॉर्ड ली ऑफ़ फ़ेयरहैम ली कमीशन (1923) के अध्यक्ष; भारतीय उच्च प्रशासनिक सेवाओं (ICS) से संबंधित आयोग का नेतृत्व किया।

कुछ महत्वपूर्ण भ्रम-बिंदु

स्वराज पार्टी की स्थापना गया अधिवेशन (दिसंबर 1922) में नहीं हुई थी। इसकी स्थापना अधिवेशन के बाद 1 जनवरी 1923 ई. को की गई थी।

चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस नहीं छोड़ी थी। उन्होंने कांग्रेस के भीतर रहकर स्वराज पार्टी का गठन किया था।

स्वराज पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग राजनीतिक दल नहीं थी। इसके नेता कांग्रेस के सदस्य बने रहे; मतभेद केवल कार्यपद्धति को लेकर था।

स्वराज पार्टी का उद्देश्य असहयोग आंदोलन का विरोध करना नहीं था। उसका मत था कि राष्ट्रीय आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए विधान परिषदों का भी उपयोग किया जाना चाहिए।

स्वराज पार्टी का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग करना नहीं था। वह विधान परिषदों में प्रवेश कर औपनिवेशिक शासन का संवैधानिक रूप से विरोध करना चाहती थी।

स्वराज पार्टी ने विधान परिषदों में प्रवेश अवश्य किया, लेकिन उसका उद्देश्य सरकारी पद या सत्ता प्राप्त करना नहीं था, बल्कि सरकार की नीतियों का प्रभावी विरोध करना था।

स्वराज पार्टी का उद्देश्य विधान परिषदों में सरकार चलाना नहीं था। उसका उद्देश्य परिषदों का उपयोग औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राजनीतिक संघर्ष के प्रभावी मंच के रूप में करना था।

अवरोध की नीति का अर्थ परिषदों के कार्य को पूरी तरह ठप करना नहीं था। इसका उद्देश्य संसदीय उपायों के माध्यम से सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करना था।

उत्तरदायी सहयोग स्वराज पार्टी की प्रारम्भिक नीति नहीं थी। प्रारम्भ में पार्टी ने अवरोध की नीति अपनाई थी, जबकि उत्तरदायी सहयोग की नीति बाद में विकसित हुई।

स्वराज पार्टी केवल केंद्रीय विधान सभा तक सीमित नहीं थी। उसने केंद्रीय तथा प्रांतीय दोनों विधान परिषदों के चुनावों में भाग लिया था।

विठ्ठलभाई पटेल स्वतंत्र भारत के पहले लोकसभा अध्यक्ष नहीं थे। वे केंद्रीय विधान सभा के प्रथम भारतीय निर्वाचित अध्यक्ष थे।

स्वराज पार्टी का प्रभाव केवल कुछ वर्षों तक सीमित नहीं रहा। इसने भारतीय राजनीति में संसदीय विपक्ष की परंपरा को मजबूत किया और आगे की संसदीय राजनीति को भी प्रभावित किया।

📚 Chapters

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    Swipe left/right to change content

    Share This Page

    WhatsApp Telegram