जिन्ना के चौदह सूत्र (1929) : परिचय
➣ जिन्ना के चौदह सूत्र मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा 28 मार्च 1929 को प्रस्तुत किए गए ऐसे संवैधानिक प्रस्ताव थे, जिनका उद्देश्य भारत के भावी संविधान में विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक अधिकारों एवं हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था।
➣ इन्हेंजिन्ना का चौदह सूत्री फार्मूला के नाम से भी जाना जाता है। ये सूत्र मुख्यतः नेहरू रिपोर्ट (1928) के उत्तर के रूप में सामने आए और आगे चलकर मुस्लिम लीग की प्रमुख संवैधानिक माँगों का आधार बन गए।
➣ ये प्रस्ताव दिल्ली में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की परिषद की बैठक में रखे गए थे, जिसमें उस समय आपस में विभाजित मुस्लिम लीग के दोनों प्रमुख गुट- जिन्ना गुट तथा मुहम्मद शफी–आगा खान गुट, एक साथ सम्मिलित हुए।
इस अर्थ में चौदह सूत्र मुस्लिम लीग में अस्थायी राजनीतिक एकता स्थापित करने का माध्यम भी बने। स्वयं जिन्ना ने इस अवसर पर अपने विचार को कांग्रेस के साथ मार्गों के विभाजन (Parting of the Ways) की संज्ञा दी, जो आगे चलकर कांग्रेस–मुस्लिम लीग संबंधों में स्थायी दूरी का प्रतीक बन गया।➣ जिन्ना का मत था कि भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुजातीय देश में केवल बहुमत के आधार पर शासन-व्यवस्था स्थापित करना पर्याप्त नहीं होगा। उनका मानना था कि विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक समुदायों, विशेषकर मुसलमानों, के राजनीतिक अधिकारों की संवैधानिक सुरक्षा आवश्यक है, ताकि वे भविष्य में बहुसंख्यक समुदाय के प्रभाव में अपने अधिकारों से वंचित न हो जाएँ।
➣ इसी उद्देश्य से जिन्ना ने संघीय शासन व्यवस्था, प्रांतीय स्वायत्तता, पृथक निर्वाचन प्रणाली, मुसलमानों के लिए पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व, धार्मिक स्वतंत्रता तथा संविधान संशोधन में प्रांतों की भूमिका जैसे विषयों पर अपने चौदह सूत्र प्रस्तुत किए।
➣ यद्यपि इन चौदह सूत्रों को सभी भारतीय राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त नहीं हुआ, फिर भी भारतीय संवैधानिक विकास के इतिहास में इनका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
➣ आगे चलकर गोलमेज सम्मेलनों (1930–32), सांप्रदायिक निर्णय (1932), भारत सरकार अधिनियम, 1935 तथा मुस्लिम लीग की भावी राजनीति पर इनका स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
जिन्ना के चौदह सूत्र की पृष्ठभूमि
➣ जिन्ना के चौदह सूत्र नेहरू रिपोर्ट के विरोध में तत्काल तैयार नहीं किए गए थे। पहले कलकत्ता सर्वदलीय सम्मेलन (1928) में जिन्ना ने संशोधनों के माध्यम से समझौता कराने का प्रयास किया। जब वे स्वीकार नहीं हुए, तब 28 मार्च 1929 को उन्होंने अपने प्रसिद्ध चौदह सूत्र प्रस्तुत किए।
दिल्ली प्रस्ताव (1927): जिन्ना का समझौतावादी प्रयास
➣ चौदह सूत्रों की पृष्ठभूमि समझने के लिए दिल्ली प्रस्ताव, दिसंबर 1927 को जानना आवश्यक है, क्योंकि यह नेहरू रिपोर्ट से भी पहले की घटना है।
साइमन कमीशन में किसी भी भारतीय सदस्य को शामिल न किए जाने के विरोध के बीच जब भारतीय नेता स्वयं संवैधानिक सुधारों का प्रारूप तैयार करने में जुटे, तब मुस्लिम लीग ने भी अपनी माँगें प्रस्तुत करने का निर्णय लिया।➣ दिसंबर 1927 में मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने दिल्ली में चार प्रस्ताव रखे, जिन्हें दिल्ली प्रस्ताव कहा जाता है।
इनकी प्रमुख माँगें थीं- (i) पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन, बशर्ते मुसलमानों के लिए सीटें आरक्षित रहें, (ii) केंद्रीय विधान सभा में मुसलमानों को एक-तिहाई प्रतिनिधित्व, (iii) पंजाब और बंगाल में मुसलमानों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व, तथा (iv) सिंध, बलूचिस्तान एवं उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) को नए प्रांतों के रूप में गठित करना।➣ उल्लेखनीय है कि इन प्रस्तावों में जिन्ना ने स्वयं पृथक निर्वाचन प्रणाली को त्यागने की सहमति दी थी, बशर्ते मुसलमानों के अन्य राजनीतिक हित सुरक्षित रहें।
कांग्रेस ने अपने मद्रास अधिवेशन (दिसंबर 1927) में इन प्रस्तावों को स्वीकार भी कर लिया था। किंतु हिंदू महासभा तथा कुछ अन्य हिंदू संगठनों ने विशेष रूप से नए प्रांतों के गठन तथा पंजाब-बंगाल में आरक्षित प्रतिनिधित्व की माँगों का विरोध किया।➣ इन आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए जब नेहरू रिपोर्ट (1928) तैयार की गई, तो उसमें दिल्ली प्रस्तावों की तुलना में कई रियायतें दे दी गईं- जैसे मुस्लिम सीटों का आरक्षण केवल उन्हीं प्रांतों तक सीमित रखा गया जहाँ मुसलमान अल्पसंख्यक थे, तथा सिंध के पृथक्करण को डोमिनियन स्टेटस प्राप्त होने की शर्त से जोड़ दिया गया। इसी कारण मुस्लिम लीग के एक बड़े वर्ग ने नेहरू रिपोर्ट को दिल्ली प्रस्तावों से एक पीछे हटना माना, जिसने आगे चलकर जिन्ना के चौदह सूत्रों की ज़मीन तैयार की।
नेहरू रिपोर्ट (1928) और मतभेद
➣ साइमन कमीशन के बहिष्कार के बाद भारतीय नेताओं ने स्वयं भारत के लिए एक संवैधानिक प्रारूप तैयार करने का निर्णय लिया। इसी उद्देश्य से मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित नेहरू समिति ने 28 अगस्त 1928 को नेहरू रिपोर्ट प्रस्तुत की।
➣ इस रिपोर्ट में भारत के लिए डोमिनियन स्टेटस, उत्तरदायी शासन, संघीय व्यवस्था, मौलिक अधिकार तथा संयुक्त निर्वाचन प्रणाली जैसी महत्वपूर्ण सिफारिशें की गईं।
➣ यद्यपि नेहरू रिपोर्ट भारतीयों द्वारा तैयार किया गया पहला व्यापक संवैधानिक प्रारूप थी, फिर भी इसके कुछ प्रावधानों पर विशेष रूप से मुस्लिम लीग के एक बड़े वर्ग ने गंभीर आपत्ति व्यक्त की।
➣ उनका मत था कि रिपोर्ट में मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों और संवैधानिक सुरक्षा का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया है।
➣ मोहम्मद अली जिन्ना ने विशेष रूप से पृथक निर्वाचन प्रणाली समाप्त करने, अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को देने तथा कुछ प्रांतों में मुसलमानों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से संबंधित प्रावधानों पर असहमति व्यक्त की। उनके अनुसार ये व्यवस्थाएँ भविष्य में मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक हितों को प्रभावित कर सकती थीं।
➣ उल्लेखनीय है कि उस समय अखिल भारतीय मुस्लिम लीग स्वयं दो गुटों में विभाजित थी – एक गुट का नेतृत्व जिन्ना कर रहे थे, जबकि दूसरे गुट का नेतृत्व आगा खान एवं मुहम्मद शफी कर रहे थे।
➣ 9 मार्च 1929 को मुस्लिम लीग के समक्ष रखी गई नेहरू रिपोर्ट की आगा खान तथा शफी गुट ने भी कड़ी आलोचना की, क्योंकि इसमें पृथक निर्वाचन तथा मुसलमानों के लिए सीट-आरक्षण संबंधी माँगों को अस्वीकार कर दिया गया था।
कलकत्ता सर्वदलीय सम्मेलन (1928)
➣ नेहरू रिपोर्ट पर विचार करने के लिए दिसंबर 1928 में कलकत्ता सर्वदलीय सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने रिपोर्ट पर चर्चा की और व्यापक सहमति बनाने का प्रयास किया।
➣ इस सम्मेलन में मोहम्मद अली जिन्ना ने नेहरू रिपोर्ट में कुछ संशोधन प्रस्तावित किए। उनका उद्देश्य रिपोर्ट का विरोध करना नहीं, बल्कि उसमें ऐसे परिवर्तन कराना था, जिनसे मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक सुरक्षा और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।
➣ किन्तु जिन्ना द्वारा प्रस्तुत संशोधनों को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला और उन्हें स्वीकार नहीं किया गया। इसके परिणामस्वरूप कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच संवैधानिक प्रश्नों पर मतभेद और अधिक गहरे हो गए।
➣ अपने संशोधन अस्वीकार होने के बाद मोहम्मद अली जिन्ना इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक माँगों को स्पष्ट और संगठित रूप में प्रस्तुत करना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से उन्होंने 28 मार्च 1929 को अपने प्रसिद्ध चौदह सूत्र प्रस्तुत किए।
➣ ये चौदह सूत्र केवल नेहरू रिपोर्ट का विरोध नहीं थे, बल्कि भारत के भावी संविधान के संबंध में मुस्लिम लीग की न्यूनतम संवैधानिक माँगों का औपचारिक घोषणापत्र भी थे। आगे चलकर यही सूत्र मुस्लिम लीग की संवैधानिक नीति का आधार बन गए।
जिन्ना के चौदह सूत्र
जिन्ना के चौदह सूत्रों की पूर्ण सूची
➣ नीचे दी गई तालिका में जिन्ना के सभी चौदह सूत्र उनके मूल क्रमांक के अनुसार संक्षेप में दिए गए हैं। आगे के उपभागों में इन्हीं सूत्रों को विषयवार समूहों में विस्तार से समझाया गया है, ताकि स्मरण करना और समझना दोनों आसान हो सकें।
| क्रम सं. | सूत्र (माँग) |
|---|---|
| 1 | भावी संविधान का स्वरूप संघात्मक (Federal) हो तथा अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों में निहित हों। |
| 2 | सभी प्रांतों को समान स्तर की स्वायत्तता प्रदान की जाए। |
| 3 | सभी विधानमंडलों एवं निर्वाचित निकायों का गठन इस सिद्धांत पर हो कि प्रत्येक प्रांत में अल्पसंख्यकों को पर्याप्त व प्रभावी प्रतिनिधित्व मिले, परंतु किसी प्रांत के बहुसंख्यक समुदाय को अल्पसंख्यक या समसंख्यक स्थिति में न लाया जाए। |
| 4 | केंद्रीय विधानमंडल में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कम-से-कम एक-तिहाई (1/3) हो। |
| 5 | सांप्रदायिक समूहों का प्रतिनिधित्व पृथक निर्वाचन मंडल के आधार पर हो; कोई समुदाय चाहे तो भविष्य में संयुक्त निर्वाचन अपना सकता है। |
| 6 | पंजाब, बंगाल एवं उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) में किसी भी प्रकार का क्षेत्रीय पुनर्गठन मुस्लिम बहुमत को प्रभावित न करे। |
| 7 | सभी समुदायों को धर्म, पूजा, प्रचार, संगठन एवं शिक्षा की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त हो। |
| 8 | किसी भी विधानमंडल में ऐसा कोई विधेयक पारित न हो, जिसका किसी समुदाय के तीन-चौथाई (3/4) सदस्य विरोध करें। |
| 9 | सिंध को बंबई प्रेसीडेंसी से अलग कर स्वतंत्र प्रांत बनाया जाए। |
| 10 | उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) एवं बलूचिस्तान में अन्य प्रांतों के समान संवैधानिक सुधार लागू किए जाएँ। |
| 11 | मुसलमानों को उनकी योग्यता के अनुसार सरकारी सेवाओं एवं स्वशासी निकायों में उचित प्रतिनिधित्व मिले। |
| 12 | मुस्लिम भाषा, संस्कृति, शिक्षा, धर्म एवं व्यक्तिगत विधि की संवैधानिक सुरक्षा एवं उन्नति सुनिश्चित की जाए। |
| 13 | केंद्रीय एवं प्रांतीय मंत्रिमंडलों में कम-से-कम एक-तिहाई (1/3) मुसलमान शामिल हों। |
| 14 | संविधान में कोई भी महत्वपूर्ण संशोधन तब तक न किया जाए, जब तक संघ की सभी घटक इकाइयों (प्रांतों) की सहमति प्राप्त न हो जाए। |
संघीय शासन व्यवस्था एवं प्रांतीय स्वायत्तता
➣ जिन्ना के चौदह सूत्रों का पहला प्रमुख उद्देश्य भारत में संघीय शासन व्यवस्था की स्थापना करना था। उनका मत था कि भारत का संविधान ऐसा हो, जिसमें केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन हो तथा दोनों अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकें।
➣ जिन्ना ने विशेष रूप से यह माँग की कि अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के बजाय प्रांतों को दी जाएँ। उनका तर्क था कि यदि केंद्र के पास अत्यधिक शक्तियाँ होंगी, तो प्रांतों की स्वायत्तता प्रभावित होगी और विविधताओं वाले भारत में संतुलित शासन स्थापित करना कठिन हो जाएगा। यह प्रस्ताव नेहरू रिपोर्ट से भिन्न था, क्योंकि नेहरू रिपोर्ट ने अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को देने की सिफारिश की थी।
➣ जिन्ना ने यह भी माँग की कि भारत के सभी प्रांतों को समान स्तर की स्वायत्तता प्रदान की जाए। उनका मत था कि किसी भी प्रांत के साथ संवैधानिक अधिकारों या प्रशासनिक शक्तियों के मामले में भेदभाव नहीं होना चाहिए।
➣ चौदह सूत्रों में यह भी प्रस्ताव रखा गया कि भविष्य में भारत के संविधान में कोई भी महत्वपूर्ण संशोधन संघ की सभी इकाइयों (प्रांतों) की सहमति के बिना न किया जाए। ताकि केंद्र किसी भी प्रांत की इच्छा के विरुद्ध उसके अधिकारों में परिवर्तन न कर सके।
➣ इस प्रकार जिन्ना ने एक ऐसे संघीय ढाँचे की कल्पना की, जिसमें केंद्र की अपेक्षा प्रांतों को अधिक संवैधानिक सुरक्षा और स्वायत्तता प्राप्त हो। उनके अनुसार यही व्यवस्था भारत जैसे बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुजातीय देश में विभिन्न समुदायों के हितों की प्रभावी रक्षा कर सकती थी।
इसमें जिन्ना के प्रथम, द्वितीय एवं चौदहवें सूत्र का वर्णन किया गया है। इनमें प्रमुख माँगें थीं-संघीय संविधान, अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों को, सभी प्रांतों को समान स्वायत्तता तथा संविधान संशोधन के लिए प्रांतों की सहमति।
मुसलमानों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व
➣ जिन्ना के चौदह सूत्रों का एक प्रमुख उद्देश्य भारत की भावी शासन-व्यवस्था में मुस्लिम समुदाय के प्रभावी राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करना था। उनका मत था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में केवल जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व निर्धारित करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि अल्पसंख्यकों के हितों की संवैधानिक सुरक्षा भी आवश्यक है।
➣ इसी उद्देश्य से जिन्ना ने प्रस्ताव रखा कि केंद्रीय विधानमंडल में मुसलमानों को कम-से-कम एक-तिहाई (1/3) प्रतिनिधित्व दिया जाए। उनका तर्क था कि इससे राष्ट्रीय स्तर पर बनने वाली नीतियों और कानूनों में मुस्लिम समुदाय की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित होगी।
➣ जिन्ना ने यह भी माँग की कि प्रत्येक प्रांत की विधान परिषद में अल्पसंख्यकों को पर्याप्त एवं प्रभावी प्रतिनिधित्व दिया जाए। साथ ही, किसी भी प्रांत में बहुसंख्यक समुदाय को इस प्रकार अतिरिक्त प्रतिनिधित्व न दिया जाए कि वहाँ के अल्पसंख्यकों के राजनीतिक अधिकार प्रभावित हों।
➣ चौदह सूत्रों में यह भी कहा गया कि सरकारी सेवाओं में मुसलमानों को उनकी योग्यता के साथ-साथ उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए। जिन्ना का मत था कि प्रशासन में सभी समुदायों की भागीदारी से शासन अधिक संतुलित और न्यायपूर्ण बनेगा।
➣ इसके अतिरिक्त उन्होंने यह भी प्रस्ताव रखा कि केंद्र एवं प्रांतों के मंत्रिमंडलों में भी मुसलमानों को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए, ताकि कार्यपालिका में भी उनकी भागीदारी सुनिश्चित हो सके और शासन के महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी प्रभावी भूमिका बनी रहे।
इसमें जिन्ना के तृतीय, चतुर्थ, ग्यारहवें एवं तेरहवें सूत्र का वर्णन किया गया है। इनका मुख्य उद्देश्य विधानमंडलों, सरकारी सेवाओं तथा मंत्रिमंडलों में मुसलमानों के पर्याप्त एवं प्रभावी राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करना था।
पृथक निर्वाचन प्रणाली एवं अल्पसंख्यकों के अधिकार
➣ जिन्ना के चौदह सूत्रों में पृथक निर्वाचन प्रणाली को बनाए रखने पर विशेष बल दिया गया। उनका मत था कि भारत जैसे बहुधार्मिक देश में मुसलमानों सहित अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने का अधिकार मिलना चाहिए, ताकि उनके राजनीतिक हित सुरक्षित रह सकें।
➣ जिन्ना ने स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में कोई समुदाय आपसी सहमति से संयुक्त निर्वाचन प्रणाली स्वीकार करना चाहे, तो वह अपनी पृथक निर्वाचन प्रणाली को छोड़ सकता है।
➣ अर्थात् पृथक निर्वाचन को प्रत्येक समुदाय के लिए बनाए रखने का विकल्प दिया गया था, लेकिन उसे छोड़कर संयुक्त निर्वाचन अपनाने की स्वतंत्रता भी रखी गई थी।
➣ चौदह सूत्रों में यह भी प्रस्ताव रखा गया कि किसी भी विधानमंडल में ऐसा कोई विधेयक या प्रस्ताव पारित न किया जाए, जिसका किसी विशेष समुदाय के तीन-चौथाई (3/4) सदस्य विरोध करें। जिन्ना का तर्क था कि इससे किसी भी समुदाय के हितों के विरुद्ध बहुमत के बल पर निर्णय नहीं लिया जा सकेगा।
➣ उनके अनुसार यह व्यवस्था अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक थी और इससे विभिन्न समुदायों के हितों को संवैधानिक सुरक्षा मिल सकती थी।
➣ इतिहासकारों के अनुसार जिन्ना द्वारा पृथक निर्वाचन और सामुदायिक वीटो जैसी व्यवस्थाओं पर दिया गया बल उस समय की भारतीय राजनीति में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर व्याप्त चिंताओं का परिणाम था।
➣ दूसरी ओर, कांग्रेस का मत था कि ऐसी व्यवस्थाएँ राष्ट्रीय एकता के स्थान पर सांप्रदायिक राजनीति को प्रोत्साहित करेंगी।
इस उपभाग में जिन्ना के पाँचवें एवं आठवें सूत्र का वर्णन किया गया है। इनमें पृथक निर्वाचन प्रणाली को बनाए रखने तथा किसी समुदाय के तीन-चौथाई सदस्यों के विरोध की स्थिति में संबंधित विधेयक पारित न करने की माँग की गई थी।
मुस्लिम बहुल प्रांत एवं प्रांतीय पुनर्गठन
➣ जिन्ना के चौदह सूत्रों में मुस्लिम बहुल प्रांतों की राजनीतिक स्थिति को सुरक्षित रखने पर विशेष बल दिया गया।
➣ उनका मत था कि भविष्य में होने वाले किसी भी प्रांतीय पुनर्गठन अथवा सीमाओं में परिवर्तन के कारण पंजाब, बंगाल तथा उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) में मुसलमानों के बहुमत पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।
➣ जिन्ना ने यह भी माँग की कि सिंध को बंबई प्रेसीडेंसी से अलग कर एक स्वतंत्र प्रांत बनाया जाए। इसका उद्देश्य सिंध को एक अलग प्रशासनिक इकाई के रूप में स्थापित करना था।
➣ इसके अतिरिक्त उन्होंने उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) तथा बलूचिस्तान में भी अन्य प्रांतों के समान संवैधानिक सुधार लागू करने की माँग की। उनका मत था कि इन क्षेत्रों को भी उत्तरदायी शासन तथा प्रशासनिक अधिकारों के मामले में अन्य प्रांतों के समान दर्जा मिलना चाहिए।
➣ जिन्ना का उद्देश्य केवल नए प्रांतों का निर्माण करना नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की राजनीतिक पहचान और प्रशासनिक अधिकार सुरक्षित रहें।
➣ आगे चलकर जिन्ना की इन माँगों में से कुछ को स्वीकार किया गया। विशेष रूप से भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत 1936 में सिंध को बंबई प्रांत से अलग कर एक पृथक प्रांत बना दिया गया। इसी अधिनियम के तहत उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में भी प्रांतीय शासन-व्यवस्था से संबंधित संवैधानिक सुधार किए गए।
इसमें जिन्ना के छठे, नौवें एवं दसवें सूत्र का वर्णन किया गया है। इनमें मुस्लिम बहुल प्रांतों के बहुमत की सुरक्षा, सिंध को बंबई से अलग करना तथा NWFP एवं बलूचिस्तान में संवैधानिक सुधार लागू करना प्रमुख माँगें थीं।
धार्मिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार
➣ जिन्ना के चौदह सूत्रों में सभी समुदायों को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करने पर विशेष बल दिया गया। उनका मत था कि प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने, उसका प्रचार करने, धार्मिक संस्थाओं का संचालन करने तथा अपनी धार्मिक परंपराओं के अनुसार जीवन व्यतीत करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
➣ जिन्ना का मानना था कि भारत जैसे बहुधार्मिक देश में स्थायी राष्ट्रीय एकता तभी संभव है, जब प्रत्येक समुदाय को अपने धार्मिक विश्वासों और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण का संवैधानिक आश्वासन प्राप्त हो। इसलिए उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता को भावी संविधान का एक अनिवार्य अंग बनाने पर बल दिया।
➣ चौदह सूत्रों में मुस्लिम समुदाय की भाषा, संस्कृति, शिक्षा, व्यक्तिगत विधि तथा धार्मिक संस्थाओं को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करने की माँग भी की गई। जिन्ना का मत था कि किसी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान उसकी भाषा, शिक्षा और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी होती है, इसलिए इनकी सुरक्षा आवश्यक है।
➣ इतिहासकारों के अनुसार जिन्ना के इन प्रस्तावों का उद्देश्य केवल धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करना नहीं था, बल्कि भारत की बहुलतावादी संरचना में विभिन्न समुदायों की सांस्कृतिक एवं शैक्षिक पहचान को भी संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करना था।
➣ इतिहासकारों के अनुसार जिन्ना के इन प्रस्तावों का उद्देश्य केवल धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करना नहीं था, बल्कि भारत की बहुलतावादी संरचना में विभिन्न समुदायों की सांस्कृतिक पहचान को भी संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करना था।
इसमें जिन्ना के सातवें एवं बारहवें सूत्र का वर्णन किया गया है। इनमें सभी समुदायों को धार्मिक स्वतंत्रता तथा मुस्लिम भाषा, संस्कृति, शिक्षा, व्यक्तिगत विधि एवं धार्मिक संस्थाओं की संवैधानिक सुरक्षा की माँग की गई थी।
नेहरू रिपोर्ट एवं जिन्ना के चौदह सूत्र : समानताएँ एवं अंतर
➣ नेहरू रिपोर्ट (1928) और जिन्ना के चौदह सूत्र (1929) दोनों ही भारत के भावी संविधान की रूपरेखा से संबंधित महत्वपूर्ण संवैधानिक दस्तावेज थे। यद्यपि दोनों के दृष्टिकोण में कई मूलभूत मतभेद थे, फिर भी कुछ विषयों पर दोनों के विचार समान थे।
समानताएँ
| आधार | समान दृष्टिकोण |
|---|---|
| संवैधानिक सुधार | दोनों का उद्देश्य भारत के लिए एक नई संवैधानिक व्यवस्था प्रस्तुत करना था। |
| संघीय शासन व्यवस्था | दोनों ने भारत में संघीय शासन का समर्थन किया। |
| प्रांतीय स्वायत्तता | दोनों ने प्रांतों को अधिक अधिकार एवं स्वायत्तता देने का समर्थन किया। |
| उत्तरदायी शासन | दोनों भारतीयों की शासन-व्यवस्था में अधिक भागीदारी चाहते थे। |
अंतर
| आधार | नेहरू रिपोर्ट (1928) | जिन्ना के चौदह सूत्र (1929) |
|---|---|---|
| मुख्य उद्देश्य | राष्ट्रीय एकता पर आधारित संयुक्त संवैधानिक व्यवस्था। | मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक एवं संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा। |
| निर्वाचन प्रणाली | संयुक्त निर्वाचन (Joint Electorate) का समर्थन। | पृथक निर्वाचन (Separate Electorate) बनाए रखने की माँग। |
| अवशिष्ट शक्तियाँ | केंद्र को देने की सिफारिश। | प्रांतों को देने की माँग। |
| मुस्लिम प्रतिनिधित्व | कोई निश्चित अनुपात निर्धारित नहीं किया गया। | केंद्रीय विधानमंडल में कम-से-कम 1/3 प्रतिनिधित्व की माँग। |
| अल्पसंख्यकों की सुरक्षा | संयुक्त निर्वाचन के साथ सीमित आरक्षण। | पृथक निर्वाचन एवं व्यापक संवैधानिक सुरक्षा पर बल। |
| राजनीतिक प्रभाव | भारतीयों द्वारा तैयार पहला व्यापक संवैधानिक प्रारूप। | मुस्लिम लीग की भावी संवैधानिक नीति का आधार बना। |
➣ नेहरू रिपोर्ट (1928) और जिन्ना के चौदह सूत्र (1929) दोनों भारत के भावी संविधान की रूपरेखा प्रस्तुत करते थे।
➣ दोनों संघीय शासन और प्रांतीय स्वायत्तता के पक्षधर थे, किन्तु निर्वाचन प्रणाली, अल्पसंख्यकों के अधिकार, मुस्लिम प्रतिनिधित्व तथा अवशिष्ट शक्तियों जैसे विषयों पर उनके विचारों में मूलभूत अंतर था।
भारतीय नेताओं की प्रतिक्रिया
कांग्रेस की प्रतिक्रिया
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने जिन्ना के चौदह सूत्रों को स्वीकार नहीं किया। कांग्रेस का मत था कि इन प्रस्तावों में राष्ट्रीय एकता की अपेक्षा सांप्रदायिक आधार पर राजनीतिक अधिकारों को अधिक महत्व दिया गया है, जिससे भारत में लोकतांत्रिक एवं राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था के विकास में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
➣ कांग्रेस विशेष रूप से पृथक निर्वाचन प्रणाली को बनाए रखने की माँग से असहमत थी। उसका मानना था कि पृथक निर्वाचन भारतीय समाज को धार्मिक आधार पर विभाजित करेगा तथा राष्ट्रीय एकता को कमजोर करेगा। इसलिए कांग्रेस ने संयुक्त निर्वाचन प्रणाली को ही भारत के लिए अधिक उपयुक्त माना।
➣ कांग्रेस ने अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों को देने के प्रस्ताव का भी समर्थन नहीं किया। उसका मत था कि भारत जैसे विशाल देश में एक सशक्त केंद्र राष्ट्रीय एकता, प्रशासनिक समन्वय तथा आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है।
➣ कांग्रेस के अनेक नेताओं का यह भी विचार था कि यदि संविधान में विभिन्न समुदायों के लिए अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाएँ बनाई जाएँगी, तो भविष्य में एक साझा भारतीय राष्ट्र का निर्माण कठिन हो जाएगा। इसलिए उन्होंने समान नागरिकता, संयुक्त राजनीतिक प्रक्रिया तथा लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को अधिक महत्व दिया।
➣ यद्यपि कांग्रेस ने जिन्ना के चौदह सूत्रों को स्वीकार नहीं किया, फिर भी उसने यह स्वीकार किया कि भारत के विभिन्न समुदायों के बीच संवैधानिक सहमति स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है। यही कारण था कि आगे चलकर गोलमेज सम्मेलनों में इन प्रश्नों पर पुनः व्यापक चर्चा हुई।
कांग्रेस ने जिन्ना के चौदह सूत्रों का मुख्यतः पृथक निर्वाचन प्रणाली, प्रांतों को अवशिष्ट शक्तियाँ देने तथा सांप्रदायिक आधार पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व संबंधी प्रस्तावों के कारण विरोध किया। कांग्रेस का लक्ष्य एक संयुक्त, लोकतांत्रिक एवं राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना था।
मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया
➣ मुस्लिम लीग ने जिन्ना के चौदह सूत्रों को मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक अधिकारों एवं संवैधानिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक माना।
➣ लीग का मत था कि भारत जैसे बहुधार्मिक देश में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की स्पष्ट संवैधानिक सुरक्षा के बिना लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था संतुलित रूप से कार्य नहीं कर सकती।
➣ मुस्लिम लीग ने विशेष रूप से पृथक निर्वाचन प्रणाली, केंद्रीय विधानमंडल में मुसलमानों के लिए एक-तिहाई प्रतिनिधित्व, अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों को देने तथा प्रांतीय स्वायत्तता संबंधी माँगों को अपने राजनीतिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया।
➣ लीग का तर्क था कि इन प्रावधानों से भारत की विविध सामाजिक एवं धार्मिक संरचना के अनुरूप संतुलित शासन-व्यवस्था स्थापित की जा सकेगी।
➣ मुस्लिम लीग के नेताओं का यह भी मत था कि नेहरू रिपोर्ट में मुस्लिम समुदाय की प्रमुख चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया था। इसलिए जिन्ना के चौदह सूत्रों के माध्यम से मुस्लिम लीग ने पहली बार अपनी संवैधानिक माँगों को एक व्यवस्थित एवं स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया।
➣ आगे चलकर यही चौदह सूत्र मुस्लिम लीग की आधिकारिक संवैधानिक नीति का आधार बन गए। गोलमेज सम्मेलनों (1930–32) तथा उसके बाद की संवैधानिक चर्चाओं में भी मुस्लिम लीग ने इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर अपनी माँगें प्रस्तुत कीं।
➣ इतिहासकारों के अनुसार जिन्ना के चौदह सूत्रों ने मुस्लिम लीग की राजनीति को एक स्पष्ट संवैधानिक दिशा प्रदान की। बाद के वर्षों में लीग की अनेक राजनीतिक माँगों में इन सिद्धांतों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
जिन्ना के चौदह सूत्र केवल तत्कालीन राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं थे, बल्कि आगे चलकर मुस्लिम लीग की आधिकारिक संवैधानिक नीति का आधार बन गए। गोलमेज सम्मेलनों तथा बाद की संवैधानिक चर्चाओं में भी लीग ने मुख्यतः इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर अपनी माँगें रखीं।
अन्य नेताओं एवं राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
➣ जिन्ना के चौदह सूत्रों पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के अतिरिक्त अन्य राजनीतिक दलों एवं नेताओं ने भी अपने-अपने विचार व्यक्त किए।
➣ अधिकांश उदारवादी (Liberal) नेताओं का मत था कि भारत की संवैधानिक समस्याओं का समाधान सभी समुदायों के बीच आपसी सहमति और समझौते से ही संभव है।
➣ कुछ नेताओं ने जिन्ना के इस प्रयास की सराहना की कि उन्होंने मुस्लिम समुदाय की संवैधानिक माँगों को पहली बार एक व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया।
➣ उनके अनुसार इससे विभिन्न समुदायों के बीच संवैधानिक प्रश्नों पर खुली चर्चा का अवसर मिला और भविष्य के संविधान पर विचार-विमर्श को नई दिशा मिली।
➣ दूसरी ओर, अनेक राष्ट्रवादी नेताओं ने यह आशंका व्यक्त की कि यदि संविधान का आधार धार्मिक समुदायों की पृथक राजनीतिक माँगों पर रखा गया, तो इससे राष्ट्रीय एकता प्रभावित हो सकती है। उनका मत था कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करे और राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दे।
➣ इतिहासकारों के अनुसार जिन्ना के चौदह सूत्रों ने भारतीय राजनीति में संवैधानिक मतभेदों को और अधिक स्पष्ट कर दिया। इसके बाद कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच संवैधानिक समझौता और कठिन हो गया, जिसके कारण आगे चलकर गोलमेज सम्मेलनों (1930–32) में इन प्रश्नों पर व्यापक चर्चा हुई।
जिन्ना के चौदह सूत्रों ने भारतीय राजनीति में विभिन्न समुदायों की संवैधानिक अपेक्षाओं को स्पष्ट रूप से सामने रखा। इसके बाद भारत के भावी संविधान से संबंधित लगभग सभी प्रमुख चर्चाओं में ये प्रश्न केंद्रीय विषय बने रहे।
जिन्ना के चौदह सूत्रों की आलोचनात्मक समीक्षा (सीमाएँ एवं कमियाँ)
➣ UPSC दृष्टिकोण से जिन्ना के चौदह सूत्रों का मूल्यांकन केवल उनके ऐतिहासिक महत्व तक सीमित न रखकर उनकी संरचनात्मक सीमाओं के आलोक में भी करना आवश्यक है।
➣ सांप्रदायिक राजनीति को संस्थागत रूप: पृथक निर्वाचन तथा सामुदायिक वीटो (तीन-चौथाई बहुमत की शर्त) जैसे प्रावधानों ने भारतीय राजनीति में धर्म को प्रतिनिधित्व का आधार बना दिया। इससे अल्पकाल में तो अल्पसंख्यकों को संवैधानिक आश्वासन मिला, किंतु दीर्घकाल में इसने समुदायों के बीच राजनीतिक विभाजन को और गहरा किया।
➣ कुलीनतावादी दृष्टिकोण: चौदह सूत्रों का केंद्रबिंदु मुख्यतः विधानमंडलों, मंत्रिमंडलों और सरकारी सेवाओं में सत्ता-साझेदारी तक सीमित था। आम मुस्लिम जनता से जुड़े भूमि-सुधार, गरीबी, शिक्षा जैसे सामाजिक-आर्थिक प्रश्नों को इसमें विशेष स्थान नहीं मिला।
➣ कठोर एवं अपरिवर्तनीय रुख: जिन्ना ने इन्हें मुस्लिम समुदाय की न्यूनतम माँगों के रूप में प्रस्तुत किया, जिनमें समझौते की गुंजाइश बहुत सीमित थी। इसी कारण इसे स्वयं जिन्ना ने कांग्रेस के साथ “मार्गों के विभाजन” की संज्ञा दी, जिससे आगामी वर्षों में दोनों दलों के बीच संवैधानिक समझौता और कठिन हो गया।
➣ आंतरिक विसंगति: एक ओर चौदह सूत्रों में प्रांतों को अधिकतम स्वायत्तता देने की माँग की गई, तो दूसरी ओर केंद्रीय विधानमंडल एवं मंत्रिमंडल में मुसलमानों के लिए निश्चित अनुपात में प्रतिनिधित्व की भी माँग की गई। कुछ इतिहासकार इसे संघीयता की भावना के साथ एक आंतरिक विरोधाभास मानते हैं।
➣ इतिहासकारों के एक वर्ग का मत है कि जिन्ना के चौदह सूत्रों ने आगे चलकर सांप्रदायिक आधार पर पृथक राजनीतिक पहचान को सुदृढ़ करने में योगदान दिया, जबकि दूसरा वर्ग इन्हें उस दौर में अल्पसंख्यकों की वास्तविक असुरक्षा की भावना का स्वाभाविक और तार्किक प्रत्युत्तर मानता है। भारत विभाजन के लिए उत्तरदायी कारकों को लेकर इतिहासकारों में मतभेद बना हुआ है, और यह विषय आज भी अकादमिक बहस का हिस्सा है।
जिन्ना के चौदह सूत्रों की मुख्य सीमाएँ थीं- सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को स्थायी संस्थागत रूप देना, सत्ता-साझेदारी तक सीमित कुलीनतावादी दृष्टिकोण, समझौते की सीमित गुंजाइश वाला कठोर रुख तथा संघीयता एवं केंद्रीय प्रतिनिधित्व की माँगों के बीच आंतरिक विरोधाभास।
जिन्ना के चौदह सूत्रों का महत्व एवं परिणाम
➣ जिन्ना के चौदह सूत्र (1929) भारतीय संवैधानिक विकास के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज सिद्ध हुए। यद्यपि इन्हें सभी राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त नहीं हुआ, फिर भी इन्होंने पहली बार मुस्लिम लीग की संवैधानिक माँगों को स्पष्ट, व्यवस्थित और लिखित रूप में प्रस्तुत किया। आगे चलकर यही सूत्र मुस्लिम लीग की राजनीतिक नीति का आधार बन गए।
➣ इन चौदह सूत्रों ने नेहरू रिपोर्ट (1928) और मुस्लिम लीग के बीच संवैधानिक मतभेदों को स्पष्ट रूप से सामने ला दिया, और आगे होने वाले गोलमेज सम्मेलनों (1930–32) में जिन्ना इन्हीं शर्तों को मनवाने पर अड़े रहे। प्रथम गोलमेज सम्मेलन में मुसलमानों सहित सिखों, ईसाइयों, आंग्ल-भारतीयों तथा दलित वर्गों ने भी पृथक प्रतिनिधित्व की माँग रखी और एक “अल्पसंख्यक गठजोड़” के रूप में संगठित हो गए, जिसकी वैचारिक बुनियाद काफी हद तक चौदह सूत्रों से जुड़ी थी।
चौदह सूत्रों का वास्तविक कार्यान्वयन: क्या स्वीकृत हुआ, क्या नहीं
➣ UPSC दृष्टिकोण से यह देखना महत्वपूर्ण है कि चौदह सूत्रों में उठाई गई माँगों में से कौन-सी आगे चलकर सांप्रदायिक निर्णय (1932) तथा भारत सरकार अधिनियम, 1935 में वास्तव में स्वीकृत हुईं और कौन-सी नहीं।
| चौदह सूत्रों की माँग | वास्तविक कार्यान्वयन की स्थिति |
|---|---|
| पृथक निर्वाचन प्रणाली (सूत्र 5) | स्वीकृत- सांप्रदायिक निर्णय (1932) द्वारा मुसलमानों के साथ-साथ सिखों, ईसाइयों, आंग्ल-भारतीयों एवं दलित वर्गों तक भी विस्तारित किया गया; भारत सरकार अधिनियम, 1935 में भी बरकरार रखा गया। |
| केंद्रीय विधानमंडल में 1/3 मुस्लिम प्रतिनिधित्व (सूत्र 4) | स्वीकृत- भारत सरकार अधिनियम, 1935 में केंद्रीय विधानमंडल में मुसलमानों के लिए एक-तिहाई प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया। |
| प्रांतीय स्वायत्तता (सूत्र 2) | स्वीकृत- 1935 अधिनियम के अंतर्गत 11 प्रांतों में द्वैध शासन (Dyarchy) समाप्त कर 1937 से प्रांतीय स्वायत्तता लागू की गई। |
| सिंध को बंबई से अलग करना (सूत्र 9) | स्वीकृत- 1936 में सिंध को बंबई प्रेसीडेंसी से अलग कर स्वतंत्र प्रांत बनाया गया। |
| संघीय ढाँचा एवं अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों को (सूत्र 1, 14) | आंशिक रूप से अस्वीकृत– अखिल भारतीय महासंघ का प्रस्ताव तो रखा गया, परंतु अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों के बजाय गवर्नर-जनरल के विवेकाधिकार में रखी गईं (UPSC प्रारंभिक परीक्षा 2018 में पूछा गया एक महत्वपूर्ण तथ्य)। इसके अतिरिक्त, पर्याप्त संख्या में देशी रियासतों के शामिल न होने से यह महासंघ वास्तव में कभी अस्तित्व में ही नहीं आ सका। |
➣ इस प्रकार चौदह सूत्रों में उठाई गई अधिकांश माँगें- विशेषकर प्रतिनिधित्व एवं सुरक्षा-उपायों से जुड़ी माँगें- संवैधानिक रूप से स्वीकार कर ली गईं, किंतु संघीय ढाँचे में सत्ता के वास्तविक बँटवारे से जुड़ी सबसे बुनियादी माँग (अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों को) पूरी नहीं हो सकी।
➣ इसके बावजूद, 1937 के प्रांतीय चुनावों में मुस्लिम लीग का प्रदर्शन अपेक्षाकृत निराशाजनक रहा और वह किसी भी मुस्लिम-बहुल प्रांत में स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं कर सकी।
➣ इससे यह स्पष्ट हुआ कि चौदह सूत्रों के माध्यम से प्राप्त संवैधानिक सुरक्षा-उपाय अकेले मुस्लिम लीग को व्यापक जनाधार तथा वास्तविक राजनीतिक सत्ता में परिवर्तित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
➣ इतिहासकारों के अनुसार जिन्ना के चौदह सूत्रों ने भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व तथा अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों से संबंधित बहस को और अधिक गहरा किया।
➣ इतिहासकारों का एक वर्ग इन्हें लखनऊ समझौता (1916) में स्वीकृत पृथक निर्वाचन से लेकर लाहौर प्रस्ताव (1940) में पृथक राष्ट्र की माँग तक की यात्रा का एक मध्यवर्ती पड़ाव मानता है, यद्यपि इस दीर्घकालीन कड़ी की व्याख्या को लेकर इतिहासकारों में मतभेद बना हुआ है।
➣ दूसरी ओर, कांग्रेस के भीतर भी चौदह सूत्रों की अस्वीकृति के बाद संवैधानिक समझौते की गुंजाइश घटती गई, जिसके परिणामस्वरूप कांग्रेस ने लाहौर अधिवेशन (दिसंबर 1929) में पूर्ण स्वराज का लक्ष्य अपनाया और 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया, तथा संवैधानिक वार्ता के स्थान पर सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसे प्रत्यक्ष जन-आंदोलनों की ओर रुख किया।
➣ इस प्रकार जिन्ना के चौदह सूत्र केवल तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की प्रतिक्रिया नहीं थे, बल्कि उन्होंने भारत के भावी संविधान, कांग्रेस–मुस्लिम लीग संबंधों तथा स्वतंत्रता-पूर्व संवैधानिक विकास की दिशा को भी गहराई से प्रभावित किया।
महत्वपूर्ण तथ्य
स्मरणीय तिथियाँ (Timeline)
| तिथि / वर्ष | घटना |
|---|---|
| दिसंबर 1916 | लखनऊ समझौता– कांग्रेस-मुस्लिम लीग एकता; सरोजिनी नायडू ने जिन्ना को Ambassador of Hindu-Muslim Unity की उपाधि दी। |
| दिसंबर 1927 | दिल्ली प्रस्ताव– जिन्ना द्वारा सीट-आरक्षण की शर्त पर पृथक निर्वाचन त्यागने की पेशकश; कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में स्वीकृत। |
| 28 अगस्त 1928 | नेहरू रिपोर्ट प्रस्तुत (मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता)। |
| दिसंबर 1928 | कलकत्ता सर्वदलीय सम्मेलन– जिन्ना के संशोधन अस्वीकृत। |
| 9 मार्च 1929 | आगा खान–शफी गुट द्वारा नेहरू रिपोर्ट की कड़ी आलोचना। |
| 28 मार्च 1929 | जिन्ना के चौदह सूत्र प्रस्तुत (दिल्ली, AIML परिषद बैठक)। |
| दिसंबर 1929 | कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन– पूर्ण स्वराज का लक्ष्य अपनाया गया। |
| 1930–32 | तीन गोलमेज सम्मेलन; जिन्ना चौदह सूत्रों पर अड़े रहे। |
| 1932 | सांप्रदायिक निर्णय (ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड द्वारा घोषित)। |
| 2 अगस्त 1935 | भारत सरकार अधिनियम, 1935 पारित। |
| 1936 | सिंध बंबई प्रेसीडेंसी से अलग कर स्वतंत्र प्रांत बनाया गया। |
| 1937 | प्रांतीय स्वायत्तता लागू; प्रांतीय चुनावों में मुस्लिम लीग का कमजोर प्रदर्शन। |
| मार्च 1940 | लाहौर प्रस्ताव– पृथक मुस्लिम राष्ट्र की माँग। |
एक-पंक्ति तथ्य (Quick Facts)
➣ जिन्ना के चौदह सूत्र मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा 28 मार्च 1929 को प्रस्तुत किए गए थे। इन्हें Fourteen Points of Jinnah भी कहा जाता है, और ये मुख्यतः नेहरू रिपोर्ट (1928) के उत्तर के रूप में सामने आए।
➣ चौदह सूत्रों में संघीय शासन व्यवस्था, अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों को, प्रांतीय स्वायत्तता, पृथक निर्वाचन प्रणाली, केंद्रीय विधानमंडल में मुसलमानों के लिए एक-तिहाई प्रतिनिधित्व तथा अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा जैसी प्रमुख माँगें शामिल थीं।
➣ जिन्ना ने सिंध को बंबई प्रांत से अलग करने, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) एवं बलूचिस्तान में अन्य प्रांतों के समान संवैधानिक सुधार लागू करने तथा मुस्लिम भाषा, संस्कृति, शिक्षा एवं व्यक्तिगत विधि की सुरक्षा की भी माँग की थी।
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने जिन्ना के चौदह सूत्रों का समर्थन नहीं किया, जबकि मुस्लिम लीग ने इन्हें अपनी प्रमुख संवैधानिक माँगों का आधार बनाया।
➣ चौदह सूत्रों से पहले दिसंबर 1927 में जिन्ना ने “दिल्ली प्रस्ताव” रखे थे, जिनमें उन्होंने सीट-आरक्षण की शर्त पर पृथक निर्वाचन त्यागने तक की सहमति दी थी। नेहरू रिपोर्ट में इन्हीं प्रस्तावों में कटौती किए जाने से मुस्लिम लीग असंतुष्ट हुई, जो चौदह सूत्रों का तात्कालिक कारण बनी।
➣ चौदह सूत्र दिल्ली में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की परिषद की बैठक में प्रस्तुत किए गए थे, जहाँ जिन्ना गुट तथा आगा खान–मुहम्मद शफी गुट एक साथ उपस्थित हुए। जिन्ना ने इसे कांग्रेस के साथ मार्गों के विभाजन(Parting of the Ways) की संज्ञा दी थी।
➣ दिलचस्प विरोधाभास: 1916 के लखनऊ समझौते के बाद सरोजिनी नायडू ने जिन्ना को हिंदू-मुस्लिम एकता का दूत कहकर सम्मानित किया था। मात्र तेरह वर्ष बाद वही जिन्ना चौदह सूत्रों के माध्यम से पृथक निर्वाचन की माँग पर कांग्रेस के साथ मार्गों के विभाजन की घोषणा कर रहे थे।
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत 1936 में सिंध को बंबई प्रांत से अलग कर एक पृथक प्रांत बनाया गया, जो जिन्ना की माँगों की आंशिक स्वीकृति का प्रमाण है। किंतु ध्यान रहे कि इसी अधिनियम में अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों को नहीं बल्कि गवर्नर-जनरल को दी गई थीं (UPSC प्रारंभिक परीक्षा 2018 का एक PYQ तथ्य), जो जिन्ना के पहले व चौदहवें सूत्र के विपरीत था।
➣ इतिहासकारों के अनुसार जिन्ना के चौदह सूत्र मुस्लिम लीग की प्रथम संगठित संवैधानिक माँगों का दस्तावेज थे। इन्होंने स्वतंत्रता-पूर्व भारत की संवैधानिक राजनीति को नई दिशा प्रदान की और कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच वैचारिक मतभेदों को स्पष्ट रूप से सामने रखा।
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