सविनय अवज्ञा आंदोलन
➣ सविनय अवज्ञा आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का वह चरण था, जिसमें महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार के अन्यायपूर्ण कानूनों का शांतिपूर्ण ढंग से उल्लंघन करके उनका विरोध किया।
➣ इसका उद्देश्य केवल किसी एक कानून का विरोध करना नहीं था, बल्कि ब्रिटिश शासन की वैधता को चुनौती देते हुए स्वराज्य की मांग को व्यापक जनआंदोलन का रूप देना था।
➣ इस आंदोलन की शुरुआत 1930 ई. में गांधीजी के दांडी मार्च और नमक कानून के उल्लंघन से हुई। इसके बाद आंदोलन देश के विभिन्न हिस्सों में फैल गया और बड़ी संख्या में लोगों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रत्यक्ष रूप से कानून तोड़कर अपनी राजनीतिक असहमति व्यक्त की।
➣ 1930 से 1934 के बीच चले इस आंदोलन के दौरान कई महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं, जिनमें गांधी-इरविन समझौता, द्वितीय गोलमेज सम्मेलन तथा आंदोलन का पुनः आरंभ प्रमुख थे। इस पूरे दौर ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई राजनीतिक दिशा दी और आगे के स्वतंत्रता संघर्ष पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा।
सविनय अवज्ञा आंदोलन की पृष्ठभूमि
➣ सविनय अवज्ञा आंदोलन के पीछे कई वर्षों से विकसित हो रहा राजनीतिक असंतोष, संवैधानिक निराशा, आर्थिक कठिनाइयाँ और पूर्ण स्वतंत्रता की बढ़ती मांग जिम्मेदार थीं। इन परिस्थितियों ने भारतीय जनता और कांग्रेस को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अधिक निर्णायक संघर्ष के लिए तैयार किया।
राजनीतिक असंतोष और संवैधानिक निराशा
➣ साइमन कमीशन में एक भी भारतीय सदस्य न होने के कारण भारतीयों में यह भावना मजबूत हुई कि ब्रिटिश सरकार भारत के संवैधानिक भविष्य का निर्णय भारतीयों की भागीदारी के बिना करना चाहती है। इसके विरोध ने देश में ब्रिटिश शासन के प्रति राजनीतिक असंतोष को और बढ़ा दिया।
➣ भारतीय नेताओं ने अपनी ओर से नेहरू रिपोर्ट के माध्यम से संवैधानिक व्यवस्था का प्रारूप प्रस्तुत करने का प्रयास किया, लेकिन इसके प्रावधानों को लेकर भारतीय नेताओं के बीच मतभेद सामने आए।
➣ दूसरी ओर, ब्रिटिश सरकार ने भी भारत को स्वशासन देने के प्रश्न पर कोई संतोषजनक कदम नहीं उठाया। इससे भारतीयों में यह विश्वास बढ़ा कि केवल संवैधानिक सुधारों और बातचीत के माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्त करना कठिन है।
➣ भारतीय राजनीति में बढ़ते मतभेद और ब्रिटिश सरकार द्वारा संवैधानिक प्रश्न पर स्पष्ट समाधान न मिलने के बीच दिसंबर 1929 में कांग्रेस का ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन आयोजित हुआ। इसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की।
➣ इस अधिवेशन में कांग्रेस ने पहली बार स्पष्ट रूप से पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य घोषित किया। इसके साथ डोमिनियन स्टेटस की मांग के स्थान पर पूर्ण स्वतंत्रता को राष्ट्रीय आंदोलन का लक्ष्य बना दिया गया। इससे राष्ट्रीय आंदोलन का लक्ष्य अधिक स्पष्ट और व्यापक हो गया।
➣ कांग्रेस ने यह भी निर्णय लिया कि यदि ब्रिटिश सरकार भारत को वास्तविक राजनीतिक स्वतंत्रता देने के लिए तैयार नहीं होती, तो कांग्रेस सविनय अवज्ञा सहित व्यापक जनआंदोलन का मार्ग अपनाएगी।
आर्थिक कठिनाइयाँ और जन-असंतोष
➣ ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों, भारी करों, नमक कर, विदेशी वस्तुओं के प्रभाव और भारतीय उद्योगों की उपेक्षा से जनता में असंतोष बढ़ रहा था। किसानों पर लगान का बोझ और कृषि क्षेत्र की समस्याओं ने ग्रामीण जनता की स्थिति को भी कठिन बना दिया। आर्थिक मंदी के प्रभावों ने इन समस्याओं को और गंभीर कर दिया।
➣ इन परिस्थितियों के कारण राष्ट्रीय आंदोलन केवल राजनीतिक नेताओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि किसानों, मजदूरों, व्यापारियों और आम जनता की समस्याओं से भी जुड़ने लगा। इससे व्यापक जनभागीदारी वाले आंदोलन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनीं।
गांधीजी की मांगें और सरकार की उदासीनता
➣ 31 जनवरी, 1930 को गांधीजी ने वायसराय लॉर्ड इरविन को एक पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने 11 मांगें रखीं। इन मांगों में नमक कर समाप्त करना, भू-राजस्व में कमी, सैन्य व्यय में कटौती, राजनीतिक बंदियों की रिहाई, विदेशी कपड़ों पर नियंत्रण, तटीय नौवहन में भारतीयों को सुविधा तथा भारतीयों को आर्थिक राहत देने से संबंधित मांगें प्रमुख थीं।
➣ गांधीजी ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार इन मांगों पर सकारात्मक कदम नहीं उठाती है, तो कांग्रेस को सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने के लिए आगे बढ़ना पड़ेगा। वायसराय की ओर से संतोषजनक प्रतिक्रिया न मिलने के बाद गांधीजी ने आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया।
➣ इस प्रकार इन सभी परिस्थितियों ने मिलकर सविनय अवज्ञा आंदोलन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया। अब भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन सीमित राजनीतिक सुधारों की मांग से आगे बढ़कर पूर्ण स्वतंत्रता के लिए व्यापक जनसंघर्ष की दिशा में पहुँच चुका था।
सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रारंभ
➣ 1929 ई. के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य घोषित करने के साथ कार्यकारिणी समिति को सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का अधिकार दिया था। इसके बाद आंदोलन की रूपरेखा को अंतिम रूप देने की जिम्मेदारी महात्मा गांधी को दी गई।
➣ फरवरी 1930 में साबरमती आश्रम में हुई कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में गांधीजी को सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का दायित्व सौंपा गया।
➣ इससे पहले गांधीजी ने वायसराय लॉर्ड इरविन के सामने अपनी 11 सूत्री मांगें रखी थीं। इन मांगों पर सरकार की ओर से संतोषजनक प्रतिक्रिया न मिलने के बाद गांधीजी ने आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया।
➣ गांधीजी ने आंदोलन की शुरुआत के लिए नमक कानून को चुना। नमक ऐसी वस्तु थी जिसका उपयोग समाज के प्रत्येक वर्ग द्वारा किया जाता था और जिस पर सरकार का कर तथा नियंत्रण आम जनता को सीधे प्रभावित करता था। इसलिए नमक कानून का विरोध व्यापक जनभागीदारी के लिए उपयुक्त मुद्दा बन गया।
दांडी मार्च और नमक कानून का उल्लंघन
➣ 12 मार्च, 1930 को महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम से दांडी की ओर पैदल यात्रा शुरू की। उनके साथ आश्रम के 78 सत्याग्रही थे। लगभग 24 दिनों की इस यात्रा में गांधीजी और उनके साथियों ने लगभग 240 मील (लगभग 390 किलोमीटर) की दूरी तय की।
➣ यात्रा के दौरान गांधीजी ने रास्ते में पड़ने वाले गाँवों में सभाएँ कीं और लोगों को सत्याग्रह, स्वदेशी, खादी तथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अहिंसक प्रतिरोध के लिए तैयार किया। इस कारण दांडी पहुँचने से पहले ही यह यात्रा पूरे देश में चर्चा का विषय बन चुकी थी।
➣ 5 अप्रैल, 1930 को गांधीजी दांडी पहुँचे। वहाँ उन्होंने उपस्थित भारतीय और विदेशी पत्रकारों को संबोधित करते हुए अपने संघर्ष की व्यापकता पर जोर दिया। अगले दिन 6 अप्रैल, 1930 को उन्होंने समुद्र तट से नमक उठाकर नमक कानून का सांकेतिक रूप से उल्लंघन किया। इसी के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन का औपचारिक शुभारंभ माना जाता है।
➣ दांडी यात्रा को नमक सत्याग्रह या “दांडी मार्च” के नाम से भी जाना जाता है। गांधीजी की इस यात्रा ने एक सामान्य-से दिखाई देने वाले नमक के प्रश्न को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय प्रतिरोध के प्रभावशाली प्रतीक में बदल दिया।
➣ दांडी मार्च की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा हुई। अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने नमक सत्याग्रह और उसके बाद हुए सत्याग्रहों का विस्तृत विवरण दुनिया के सामने प्रस्तुत किया। विदेशी पत्रकारों की रिपोर्टों के कारण ब्रिटिश दमन और भारतीय सत्याग्रह को अंतरराष्ट्रीय ध्यान मिला।
➣ दांडी मार्च की प्रभावशीलता को लेकर ब्रिटिश हलकों में उपहास भी किया गया। एक अंग्रेजी संवाददाता ब्रेल्सफोर्ड ने यह प्रश्न उठाया कि क्या समुद्र के पानी को एक केतली में उबालने से ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी जा सकती है। इसके जवाब में द स्टेट्समैन ने व्यंग्यात्मक रूप से लिखा कि गांधी समुद्र के पानी को तब तक उबाल सकते हैं, जब तक उन्हें डोमिनियन स्टेटस नहीं मिल जाता।
➣ गांधीजी की दांडी यात्रा के राजनीतिक प्रभाव को देखते हुए सुभाषचंद्र बोस ने इसकी तुलना नेपोलियन के एल्बा से लौटने के बाद पेरिस मार्च तथा मुसोलिनी के रोम मार्च से की थी।
➣ दांडी में नमक कानून तोड़े जाने के बाद देश के अनेक हिस्सों में लोगों ने भी नमक बनाकर, नमक बेचकर और सरकारी नमक कानूनों का उल्लंघन करके सविनय अवज्ञा शुरू कर दी। इस प्रकार आंदोलन शीघ्र ही दांडी से बाहर निकलकर व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन में बदल गया।
प्रथम चरण (1930) में गिरफ्तारियाँ
➣ सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रारंभ होते ही ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियाँ शुरू कर दीं। गिरफ्तारियों का उद्देश्य केवल नेतृत्व को अलग करना नहीं था, बल्कि आंदोलन के संगठन और जनभागीदारी को कमजोर करना भी था।
➣ वल्लभभाई पटेल को दांडी यात्रा शुरू होने से पहले ही सूरत में गिरफ्तार कर लिया गया था। वे सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रारंभिक चरण में गिरफ्तार होने वाले प्रमुख नेताओं में से एक थे।
➣ खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी) को 23 अप्रैल, 1930 को पेशावर में गिरफ्तार किया गया। उनकी गिरफ्तारी के विरोध में गढ़वाल राइफल्स के भारतीय सैनिकों ने निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने से इनकार कर दिया। यह घटना भारतीय सैनिकों के बीच राष्ट्रीय भावना के बढ़ते प्रभाव का महत्वपूर्ण उदाहरण बनी।
➣ सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) ने दक्षिण भारत में तिरुचिरापल्ली से वेदारण्यम तक नमक यात्रा का नेतृत्व किया। इसके बाद उन्हें 30 अप्रैल, 1930 को गिरफ्तार कर लिया गया।
➣ जवाहरलाल नेहरू को भी दांडी मार्च के दौरान ही गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्होंने रायबरेली में भू-राजस्व के विरोध में भाषण दिया था। इसी दौर में मोतीलाल नेहरू को भी गिरफ्तार किया गया।
➣ महात्मा गांधी को 5 मई, 1930 को आधी रात के बाद गिरफ्तार किया गया। उनकी गिरफ्तारी के बाद आंदोलन का अगला महत्वपूर्ण चरण धरासना नमक कारखाने पर सत्याग्रह से जुड़ा।
➣ गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद अब्बास तैयबजी ने धरासना सत्याग्रह का नेतृत्व संभालने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद कस्तूरबा गांधी सहित अन्य नेताओं और स्वयंसेवकों ने आंदोलन को आगे बढ़ाया।
➣ इसके बाद सरोजिनी नायडू ने धरासना नमक कारखाने पर सत्याग्रह का नेतृत्व किया। 21 मई, 1930 को सरोजिनी नायडू, इमाम साहिब और मणिलाल गांधी के नेतृत्व में लगभग 2,500 सत्याग्रही धरासना नमक कारखाने की ओर बढ़े। वहाँ पुलिस ने शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर लाठीचार्ज किया।
➣ दक्षिण भारत में के. केलप्पन ने मालाबार क्षेत्र में नमक सत्याग्रह को आगे बढ़ाया और आंदोलन के दौरान गिरफ्तार हुए। इस प्रकार गिरफ्तारियाँ केवल कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं तक फैल गईं।
सविनय अवज्ञा आंदोलन का विस्तार
➣ दांडी में नमक कानून तोड़े जाने के बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन तेजी से देश के विभिन्न हिस्सों में फैल गया। अलग-अलग क्षेत्रों में आंदोलन का स्वरूप वहाँ की स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बदलता गया।
➣ कहीं नमक कानून को चुनौती दी गई, कहीं चौकीदारी कर का विरोध हुआ, तो कहीं किसानों, आदिवासियों और स्थानीय जनता ने अपने मुद्दों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ लिया।
➣ बंबई सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रमुख केंद्रों में था। यहाँ जमनालाल बजाज, एस. के. पाटिल, के. एफ. नरीमन और यूसुफ मेहर अली जैसे नेताओं ने आंदोलन को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, धरनों और अन्य सत्याग्रह गतिविधियों के माध्यम से आंदोलन को शहरी जनता तक पहुँचाया गया।
➣ तमिलनाडु में गांधीवादी नेता सी. राजगोपालाचारी ने दांडी मार्च की तर्ज पर नमक सत्याग्रह का नेतृत्व किया। उन्होंने तिरुचिरापल्ली से वेदारण्यम तक नमक यात्रा निकाली और तटीय क्षेत्र में नमक कानून का उल्लंघन किया।
➣ इसी प्रकार केरल के मालाबार क्षेत्र में के. केलप्पन जैसे नेताओं के नेतृत्व में नमक सत्याग्रह और अन्य सविनय अवज्ञा गतिविधियाँ हुईं।
➣ उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में पठानों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में महत्वपूर्ण भागीदारी की। उनके द्वारा संगठित खुदाई खिदमतगार स्वयंसेवक संगठन के सदस्यों को उनकी लाल वर्दी के कारण “लाल कुर्ती” भी कहा जाता था।
➣ पेशावर में आंदोलन के दौरान गढ़वाल राइफल्स के भारतीय सैनिकों ने चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया। यह घटना भारतीय सैनिकों के बीच बढ़ती राष्ट्रीय चेतना का महत्वपूर्ण उदाहरण बनी।
➣ सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौर में मणिपुर और आसपास के जनजातीय क्षेत्रों में भी औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध गतिविधियाँ हुईं। जदोनांग ने नागा क्षेत्रों में एक धार्मिक-सामाजिक आंदोलन चलाया, जिसे बाद में रानी गैडिनल्यू ने आगे बढ़ाया। यह पूर्वोत्तर क्षेत्र में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनजातीय प्रतिरोध का महत्वपूर्ण उदाहरण था।
➣ बिहार में भी आंदोलन ने स्थानीय स्वरूप ग्रहण किया। सारण और बेगूसराय जैसे क्षेत्रों में चौकीदारी कर के विरोध में प्रदर्शन हुए। ग्रामीण जनता ने कर देने से इनकार करके औपनिवेशिक प्रशासन की आर्थिक व्यवस्था को चुनौती दी।
➣ दिसंबर 1930 में उत्तरी बिहार के सारण जिले में चौकीदारी कर के विरोध में प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों के दौरान जनता ने सरकारी दमन के बावजूद आंदोलन जारी रखा। इस प्रकार बिहार में सविनय अवज्ञा केवल नमक कानून तक सीमित न रहकर स्थानीय करों और ग्रामीण प्रशासन के विरोध से भी जुड़ गया।
➣ शोलापुर में सविनय अवज्ञा आंदोलन ने अपेक्षाकृत उग्र रूप ले लिया। सरकारी दमन और नेताओं की गिरफ्तारियों के बाद वहाँ हिंसक घटनाएँ हुईं और कुछ समय के लिए प्रशासनिक व्यवस्था भी गंभीर रूप से प्रभावित हुई। इसी प्रकार पेशावर और चिटगाँव में भी आंदोलन के दौरान गंभीर संघर्ष और हिंसक घटनाएँ सामने आईं।
➣ आंदोलन में किसानों और व्यावसायिक वर्ग की उल्लेखनीय भागीदारी रही। व्यापारियों और भारतीय पूंजीपतियों के एक वर्ग ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तथा स्वदेशी के समर्थन में आंदोलन को सहयोग दिया।
➣ महिलाओं की भागीदारी भी पहले की तुलना में अधिक व्यापक हुई। सरोजिनी नायडू, कमला देवी चट्टोपाध्याय और राजकुमारी अमृत कौर जैसी महिलाओं के साथ बड़ी संख्या में सामान्य महिलाएँ भी सत्याग्रह और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार में शामिल हुईं।
➣ मुस्लिम समुदाय की भागीदारी असहयोग-खिलाफत आंदोलन की तुलना में अपेक्षाकृत कम रही, लेकिन यह पूरी तरह अनुपस्थित नहीं थी। उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत में मुस्लिम जनता की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही।
➣ जमीयत उलेमा-ए-हिंद, मुस्लिम राष्ट्रवादी समूह और खुदाई खिदमतगार जैसे संगठनों ने अलग-अलग स्तर पर आंदोलन को समर्थन दिया।
➣ सविनय अवज्ञा आंदोलन के विस्तृत होते प्रभाव और राजनीतिक दबाव के बीच 26 जनवरी, 1931 को महात्मा गांधी को जेल से रिहा किया गया। इसके बाद गांधीजी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच बातचीत का रास्ता खुला, जो आगे चलकर गांधी-इरविन समझौते का आधार बना।
गांधी-इरविन समझौता (1931)
➣ सविनय अवज्ञा आंदोलन के बढ़ते प्रभाव और लगातार हो रहे सरकारी दमन के बावजूद ब्रिटिश सरकार को यह महसूस होने लगा कि केवल दमन के माध्यम से भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नियंत्रित करना आसान नहीं होगा।
➣ इसी परिस्थिति में कांग्रेस और सरकार के बीच बातचीत की संभावना बनी। 26 जनवरी, 1931 को महात्मा गांधी की रिहाई के बाद दोनों पक्षों के बीच वार्ता का रास्ता साफ हुआ।
➣ इस वार्ता में सर तेज बहादुर सप्रू और एम. आर. जयकर जैसे उदारवादी नेताओं ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। इसके बाद महात्मा गांधी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच कई दौर की बातचीत हुई।
➣ अंततः 5 मार्च, 1931 को गांधीजी और लॉर्ड इरविन के बीच एक समझौता हुआ, जिसे गांधी-इरविन समझौता कहा गया। इसके तहत कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित करने और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर सहमति व्यक्त की।
➣ सरकार की ओर से राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े अनेक राजनीतिक बंदियों को रिहा करने, जब्त की गई संपत्तियों को कुछ शर्तों के साथ वापस करने तथा दमनात्मक कार्रवाइयों को समाप्त करने जैसे कदम उठाने पर सहमति बनी। हालांकि हिंसा के आरोप में दोषी ठहराए गए व्यक्तियों को इन रियायतों से बाहर रखा गया।
➣ समझौते में भारतीयों को अपने घरेलू उपयोग के लिए समुद्र के किनारे नमक बनाने की सीमित अनुमति देने पर भी सहमति बनी। इस प्रकार नमक सत्याग्रह के दौरान उठाए गए एक प्रमुख मुद्दे को सरकार ने आंशिक रूप से स्वीकार किया।
➣ समझौते के बाद कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया। इसके बदले ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस को संवैधानिक सुधारों पर होने वाली बातचीत में भाग लेने का अवसर दिया।
➣ गांधी-इरविन समझौते का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह था कि कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के बीच पहली बार सीधे राजनीतिक स्तर पर समझौता हुआ। गांधीजी ने स्वयं कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में सरकार के साथ बातचीत की, जिससे कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति और प्रतिनिधित्व को एक अलग महत्व मिला।
➣ हालांकि समझौते से कांग्रेस की सभी मांगें पूरी नहीं हुईं। पूर्ण स्वराज्य की मांग स्वीकार नहीं की गई और नमक कानून भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। इसी कारण कांग्रेस के भीतर और बाहर कुछ नेताओं ने समझौते को लेकर असंतोष व्यक्त किया।
➣ भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी को रोकने के लिए गांधीजी द्वारा प्रयास किए जाने के बावजूद सरकार ने उन्हें क्षमा नहीं दी। 23 मार्च, 1931 को तीनों को फाँसी दे दी गई। इस घटना ने गांधी-इरविन समझौते को लेकर युवाओं और क्रांतिकारी विचारधारा से जुड़े वर्गों में असंतोष को और बढ़ाया।
➣ इसके बावजूद गांधी-इरविन समझौते ने तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में एक महत्वपूर्ण मोड़ पैदा किया। इसके बाद गांधीजी कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन गए, जहाँ भारत के संवैधानिक भविष्य पर चर्चा होनी थी।
सविनय अवज्ञा आंदोलन का पुनः आरंभ (1932)
➣ गांधी-इरविन समझौते के बाद महात्मा गांधी कांग्रेस की ओर से द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने लंदन गए। लेकिन सम्मेलन में भारत के संवैधानिक भविष्य और विभिन्न राजनीतिक समूहों के बीच महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी।
➣ दिसंबर 1931 में भारत लौटने के बाद गांधीजी ने देखा कि ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस और उसके कार्यकर्ताओं के विरुद्ध फिर से दमनात्मक नीति अपनानी शुरू कर दी है। अनेक स्थानों पर गिरफ्तारियाँ की गईं और कांग्रेस की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाए गए।
➣ सरकार की इस नीति और गोलमेज सम्मेलन की विफलता के कारण कांग्रेस तथा ब्रिटिश सरकार के बीच समझौते की स्थिति समाप्त हो गई। परिणामस्वरूप सविनय अवज्ञा आंदोलन को पुनः शुरू करने का निर्णय लिया गया।
➣ हालांकि आंदोलन दोबारा शुरू हुआ, लेकिन 1930 के पहले चरण जैसी व्यापक जनभागीदारी और राजनीतिक ऊर्जा लंबे समय तक कायम नहीं रह सकी। लगातार दमन, गिरफ्तारियों और संगठन पर प्रतिबंधों के कारण आंदोलन धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा।
द्वितीय चरण (1932) में गिरफ्तारियाँ
➣ दूसरे चरण में ब्रिटिश सरकार ने पहले की तुलना में अधिक व्यापक दमन का सहारा लिया। कांग्रेस को अवैध घोषित करना, सभाओं और जुलूसों पर प्रतिबंध, प्रेस पर नियंत्रण तथा बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ इसके प्रमुख उपाय थे।
➣ जनवरी 1932 में आंदोलन के पुनः आरंभ होते ही महात्मा गांधी और उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष वल्लभभाई पटेल को गिरफ्तार कर लिया गया।
➣ जवाहरलाल नेहरू तथा खान अब्दुल गफ्फार खान को भी इस दौर में पुनः गिरफ्तार किया गया। आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए कांग्रेस के संगठन और उसके स्थानीय नेटवर्क पर भी व्यापक कार्रवाई की गई।
➣ 1932 के पहले नौ महीनों में ही 60,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि दूसरे चरण में ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए व्यापक स्तर पर गिरफ्तारी और दमन का सहारा लिया।
➣ आचार्य विनोबा भावे भी सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सत्याग्रह में सक्रिय रहे। 1932 ई. में उन्हें गिरफ्तार कर धुलिया जेल भेजा गया और उन्हें छह महीने के कारावास की सजा दी गई। इस बार वह दूसरी बार जेल गए थे। (पहली बार 1923 में)
सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रभाव एवं परिणाम
➣ राष्ट्रीय आंदोलन का व्यापक जनाधार:- सविनय अवज्ञा आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को और अधिक जन-आधारित बना दिया। किसानों, महिलाओं, व्यापारियों तथा समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी से स्वतंत्रता आंदोलन का आधार पहले की तुलना में काफी व्यापक हुआ।
➣ ब्रिटिश शासन की वैधता को चुनौती:- इस आंदोलन ने पहली बार बड़े पैमाने पर भारतीयों को औपनिवेशिक कानूनों का शांतिपूर्ण ढंग से उल्लंघन करने के लिए प्रेरित किया। इससे ब्रिटिश शासन की दमनकारी प्रकृति और उसकी वैधता पर गंभीर प्रश्न खड़े हुए।
➣ आर्थिक राष्ट्रवाद को मजबूती:- नमक सत्याग्रह, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और खादी के प्रचार ने स्वदेशी तथा आत्मनिर्भरता की भावना को मजबूत किया। इससे राष्ट्रीय आंदोलन का आर्थिक पक्ष भी अधिक प्रभावशाली बना।
➣ महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में वृद्धि:- सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं ने पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय भूमिका निभाई। सरोजिनी नायडू, कमला देवी चट्टोपाध्याय और राजकुमारी अमृत कौर जैसी महिलाओं के साथ बड़ी संख्या में सामान्य महिलाएँ भी सत्याग्रह और बहिष्कार आंदोलनों में शामिल हुईं।
➣ कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति मजबूत:- आंदोलन की व्यापकता ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस केवल सीमित शिक्षित वर्ग का संगठन नहीं रही थी। वह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक जनसमर्थन जुटाने वाली प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक शक्ति बन चुकी थी।
➣ ब्रिटिश सरकार को राजनीतिक वार्ता के लिए बाध्य किया:- आंदोलन के दबाव के कारण ब्रिटिश सरकार को कांग्रेस के साथ प्रत्यक्ष बातचीत करनी पड़ी, जिसका परिणाम गांधी-इरविन समझौते (1931) के रूप में सामने आया। इससे कांग्रेस की राजनीतिक शक्ति और प्रतिनिधित्व को महत्वपूर्ण मान्यता मिली।
➣ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की पहचान:- दांडी मार्च और अहिंसक सत्याग्रह की व्यापक चर्चा भारत के बाहर भी हुई। विदेशी पत्रकारों की रिपोर्टों के कारण भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष और ब्रिटिश दमन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक ध्यान मिला।
➣ हिंदू-मुस्लिम एकता की सीमाएँ स्पष्ट:- जहाँ आंदोलन ने विभिन्न समुदायों को एक साझा राष्ट्रीय संघर्ष से जोड़ने का प्रयास किया, वहीं मुस्लिम समुदाय की भागीदारी असहयोग-खिलाफत आंदोलन की तुलना में कम रही। इससे राष्ट्रीय आंदोलन के सामने मौजूद सांप्रदायिक एकता की चुनौती भी स्पष्ट हुई।
➣ भविष्य के आंदोलनों के लिए आधार:- सविनय अवज्ञा आंदोलन ने भारतीय नेताओं और जनता को व्यापक जनआंदोलन, सत्याग्रह, संगठन तथा ब्रिटिश दमन का सामना करने का महत्वपूर्ण अनुभव दिया। यही अनुभव आगे के राष्ट्रीय आंदोलनों के लिए उपयोगी आधार बना।
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ सविनय अवज्ञा आंदोलन का औपचारिक प्रारंभ 6 अप्रैल, 1930 को दांडी में नमक कानून तोड़ने के साथ हुआ। इससे पहले 12 मार्च, 1930 को गांधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी की यात्रा शुरू की थी। उनके साथ प्रारंभ में 78 सत्याग्रही थे।
➣ आंदोलन के लिए नमक को चुनना गांधीजी की महत्वपूर्ण राजनीतिक रणनीति थी। नमक समाज के लगभग सभी वर्गों की आवश्यकता था, इसलिए इसके कानून का विरोध सीधे आम जनता को आंदोलन से जोड़ सकता था।
➣ 1929 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य घोषित किया था और कांग्रेस कार्यसमिति को सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का अधिकार दिया गया था। इसी निर्णय ने आगे चलकर दांडी मार्च का मार्ग तैयार किया।
➣ 31 जनवरी, 1930 को गांधीजी ने वायसराय लॉर्ड इरविन को अपनी 11 सूत्री मांगें भेजीं। सरकार द्वारा इन मांगों पर संतोषजनक प्रतिक्रिया न मिलने के बाद गांधीजी ने आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया।
➣ दांडी मार्च के समान ही देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थानीय नमक सत्याग्रह आयोजित किए गए। दक्षिण भारत में सी. राजगोपालाचारी ने तिरुचिरापल्ली से वेदारण्यम तक नमक यात्रा का नेतृत्व किया।
➣ गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद अब्बास तैयबजी ने धरासाना सत्याग्रह का नेतृत्व संभालने का प्रयास किया। उनकी गिरफ्तारी के बाद सरोजिनी नायडू ने 21 मई, 1930 को धरासाना नमक कारखाने पर सत्याग्रह का नेतृत्व किया।
➣ सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान कांग्रेस के प्रमुख नेता जेल में थे, इसलिए प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930) में कांग्रेस ने भाग नहीं लिया। इसके विपरीत मुस्लिम लीग और डॉ. भीमराव आंबेडकर सहित अन्य भारतीय प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में भाग लिया था।
➣ उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में खुदाई खिदमतगार संगठन ने आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके स्वयंसेवकों की लाल वर्दी के कारण उन्हें “लाल कुर्ती” के नाम से जाना जाता था।
➣ पेशावर में आंदोलन के दौरान गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया। चंद्र सिंह गढ़वाली इस घटना से जुड़े प्रमुख सैनिक नेता थे।
➣ बिहार में सविनय अवज्ञा आंदोलन ने स्थानीय कर-विरोधी आंदोलनों का रूप भी लिया। सारण और बेगूसराय जैसे क्षेत्रों में चौकीदारी कर के विरोध में लोगों ने आंदोलन किया, जिससे ग्रामीण जनता की भागीदारी सामने आई।
➣ 5 मार्च, 1931 को गांधीजी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच गांधी-इरविन समझौता हुआ। इसके बाद कांग्रेस ने आंदोलन को अस्थायी रूप से स्थगित किया और गांधीजी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करने के लिए लंदन गए।
➣ द्वितीय गोलमेज सम्मेलन से कोई निर्णायक संवैधानिक समाधान नहीं निकल सका। भारत लौटने के बाद राजनीतिक परिस्थितियाँ फिर बिगड़ीं और जनवरी 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन दोबारा शुरू किया गया।
➣ दूसरे चरण में ब्रिटिश सरकार ने पहले की तुलना में अधिक कठोर दमन किया। 1932 के पहले नौ महीनों में 60,000 से अधिक लोगों की गिरफ्तारी इस व्यापक दमन का प्रमाण है।
➣ 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत के कुछ कबायली लोगों ने गांधीजी को सम्मानपूर्वक मलंग बाबा की उपाधि से संबोधित किया था।
➣ भाई दो ना पाई आंदोलन को सविनय अवज्ञा आंदोलन के विस्तार से संबंधित माना जाता है।
➣ सविनय अवज्ञा आंदोलन अंततः अप्रैल 1934 में समाप्त कर दिया गया। आंदोलन अपने तत्काल लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सका, लेकिन इसने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को व्यापक जनाधार और महत्वपूर्ण राजनीतिक अनुभव प्रदान किया।
कुछ महत्वपूर्ण भ्रम बिंदु
➣ दांडी मार्च और सविनय अवज्ञा आंदोलन का औपचारिक प्रारंभ एक ही तारीख को नहीं हुआ। गांधीजी ने 12 मार्च, 1930 को साबरमती से दांडी यात्रा शुरू की, जबकि 6 अप्रैल, 1930 को नमक कानून तोड़ने के साथ आंदोलन का औपचारिक शुभारंभ हुआ।
➣ गांधीजी की 11 सूत्री मांगें आंदोलन शुरू होने के बाद नहीं, बल्कि 31 जनवरी, 1930 को आंदोलन से पहले वायसराय लॉर्ड इरविन के सामने रखी गई थीं। सरकार की संतोषजनक प्रतिक्रिया न मिलने के बाद सविनय अवज्ञा शुरू हुई।
➣ वल्लभभाई पटेल और महात्मा गांधी की गिरफ्तारियों को एक साथ न समझें। पटेल को दांडी यात्रा से पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था, जबकि गांधीजी को 5 मई, 1930 को गिरफ्तार किया गया।
➣ गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद धरासाना सत्याग्रह का नेतृत्व क्रमशः अब्बास तैयबजी और उनकी गिरफ्तारी के बाद सरोजिनी नायडू ने संभाला। इसलिए धरासाना सत्याग्रह का नेतृत्व सीधे गांधीजी ने किया था, ऐसा नहीं लिखना चाहिए।
➣ खुदाई खिदमतगार और लाल कुर्ती अलग-अलग संगठन नहीं थे। खान अब्दुल गफ्फार खान द्वारा संगठित खुदाई खिदमतगार के स्वयंसेवकों को उनकी लाल वर्दी के कारण लाल कुर्ती कहा जाता था।
➣ गढ़वाल राइफल्स की घटना पेशावर से जुड़ी है। इसे खान अब्दुल गफ्फार खान की गिरफ्तारी या खुदाई खिदमतगार संगठन की स्थापना की घटना के साथ न मिलाएँ।
➣ गांधी-इरविन समझौता और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन एक ही घटना नहीं थे। पहले 5 मार्च, 1931 को गांधी-इरविन समझौता हुआ, जिसके बाद गांधीजी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने लंदन गए।
➣ सविनय अवज्ञा आंदोलन का पुनः आरंभ 1931 में नहीं, बल्कि जनवरी 1932 में हुआ। गांधी-इरविन समझौते के बाद आंदोलन कुछ समय के लिए स्थगित किया गया था।
➣ असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन को एक जैसा न समझें। असहयोग आंदोलन में मुख्य जोर ब्रिटिश संस्थाओं से सहयोग वापस लेने पर था, जबकि सविनय अवज्ञा आंदोलन में अन्यायपूर्ण कानूनों का जानबूझकर उल्लंघन भी आंदोलन का प्रमुख तरीका बना।
➣ सविनय अवज्ञा आंदोलन का अंत 1932 में नहीं हुआ। आंदोलन का दूसरा चरण 1932 में शुरू हुआ और अंततः अप्रैल 1934 में गांधीजी द्वारा आंदोलन समाप्त किया गया।
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