नेहरू रिपोर्ट (1928) : परिचय
नेहरू रिपोर्ट भारतीयों द्वारा तैयार किया गया पहला व्यापक संवैधानिक प्रारूप था। इसे 28 अगस्त 1928 को लखनऊ में आयोजित सर्वदलीय सम्मेलन के समक्ष मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली नेहरू समिति ने प्रस्तुत किया।
यह रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार की एक चुनौती के उत्तर में भारतीय नेताओं द्वारा स्वयं तैयार की गई थी, जिसकी पूरी पृष्ठभूमि आगे विस्तार से दी गई है।
इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसे ब्रिटिश सरकार ने नहीं, बल्कि स्वयं भारतीय नेताओं ने तैयार किया था। इसलिए इसे भारतीयों द्वारा निर्मित प्रथम संगठित संवैधानिक दस्तावेज माना जाता है।
नेहरू रिपोर्ट में डोमिनियन स्टेटस, उत्तरदायी शासन, संघीय शासन व्यवस्था, मौलिक अधिकार, संयुक्त निर्वाचन तथा स्वतंत्र न्यायपालिका जैसी अनेक महत्वपूर्ण संवैधानिक सिफारिशें प्रस्तुत की गईं। इनमें से कई विचार आगे चलकर भारत के संविधान (1950) में भी किसी न किसी रूप में दिखाई देते हैं।
यद्यपि नेहरू रिपोर्ट को सभी राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त नहीं हुआ और विशेष रूप से मुस्लिम लीग तथा सिख नेताओं के एक बड़े वर्ग ने इसका विरोध किया, फिर भी भारतीय संवैधानिक विकास के इतिहास में इसका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
इसी रिपोर्ट के विरोध में मोहम्मद अली जिन्ना ने आगे चलकर अपने प्रसिद्ध चौदह सूत्र (1929) प्रस्तुत किए, जो भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुए।
UPSC/PCS दृष्टिकोण से महत्व: नेहरू रिपोर्ट साइमन कमीशन, जिन्ना के चौदह सूत्र, लाहौर अधिवेशन (पूर्ण स्वराज्य) तथा गोलमेज सम्मेलनों को आपस में जोड़ने वाली एक कड़ी है। इसलिए इसका अध्ययन “स्वतंत्र भारत की संवैधानिक यात्रा” (1919 से 1935 तक) के व्यापक क्रम में करना चाहिए, न कि एक अलग-थलग घटना के रूप में।
पृष्ठभूमि एवं नेहरू समिति का गठन
साइमन कमीशन का बहिष्कार
➣ नेहरू रिपोर्ट की पृष्ठभूमि में ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन भारत सचिव लॉर्ड बिर्कनहेड की वह चुनौती थी, जिसमें उन्होंने 1925 में यह दावा किया था कि भारतीय राजनीतिक दल आपस में मिलकर एक सर्वसम्मत संविधान तैयार करने में सक्षम ही नहीं हैं।
साइमन कमीशन के बहिष्कार के बाद भारतीय नेताओं ने इसी चुनौती को स्वीकार करते हुए स्वयं एक संवैधानिक प्रारूप तैयार करने का निर्णय लिया, जिसके परिणामस्वरूप आगे चलकर नेहरू रिपोर्ट अस्तित्व में आई।
➣ साइमन कमीशन के गठन (नवंबर 1927) के साथ ही भारत में व्यापक असंतोष फैल गया, क्योंकि इसमें एक भी भारतीय सदस्य को शामिल नहीं किया गया था। भारतीय नेताओं का मत था कि जिस आयोग को भारत के संवैधानिक भविष्य पर विचार करना है, उसमें भारतीयों की अनुपस्थिति राष्ट्रीय स्वाभिमान के विरुद्ध है।
➣ परिणामस्वरूप भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सहित अधिकांश राजनीतिक दलों ने साइमन कमीशन का बहिष्कार किया और 3 फरवरी 1928 को आयोग के भारत पहुँचने पर Simon Go Back के नारे के साथ अनेक स्थानों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हड़तालें आयोजित किये।
➣ साइमन कमीशन के विरोध के दौरान भारतीय नेताओं के सामने यह प्रश्न उठा कि यदि वे ब्रिटिश सरकार द्वारा भेजे गए आयोग को अस्वीकार कर रहे हैं, तो उन्हें भारत के लिए अपनी ओर से भी एक वैकल्पिक संवैधानिक व्यवस्था प्रस्तुत करनी चाहिए।
लॉर्ड बिर्कनहेड की चुनौती से मिली इसी प्रेरणा ने आगे चलकर भारतीयों द्वारा स्वयं संविधान का प्रारूप तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सर्वदलीय सम्मेलन एवं नेहरू समिति का गठन
➣ दिसंबर 1927 में कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में साइमन कमीशन के बहिष्कार के साथ-साथ यह भी निर्णय लिया गया कि भारत के लिए एक साझा संविधान तैयार करने हेतु विभिन्न दलों को मिलाकर एक सर्वदलीय सम्मेलन बुलाया जाए। इसी क्रम में फरवरी 1928 में दिल्ली में सम्मेलन का पहला सत्र आयोजित हुआ।
➣ सम्मेलन में इस बात पर व्यापक सहमति बनी कि भारत की संवैधानिक समस्याओं का समाधान केवल ब्रिटिश सरकार पर छोड़ने के बजाय भारतीयों को स्वयं एक संविधान का प्रारूप तैयार करना चाहिए।
➣ इसी उद्देश्य से सर्वदलीय सम्मेलन के मई 1928 के बम्बई सत्र में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई, जिसे उनके नाम पर ही नेहरू समिति कहा गया।
➣ समिति में मोतीलाल नेहरू (अध्यक्ष) के साथ सर अली इमाम, सर तेज बहादुर सप्रू, एम. एस. अणे, एम. आर. जयकर, शोएब कुरैशी, सरदार मंगल सिंह, जी. आर. प्रधान तथा एन. एम. जोशी सदस्य के रूप में शामिल थे। जवाहरलाल नेहरू इस समिति के सचिव थे और रिपोर्ट के प्रारूपण में उनकी सक्रिय भूमिका रही।
➣ समिति ने भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों, विधि विशेषज्ञों तथा सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तियों के विचारों का अध्ययन किया और इलाहाबाद में हुई कई बैठकों के बाद अपनी रिपोर्ट तैयार की।
➣ अंततः 28 अगस्त 1928 को इस रिपोर्ट को लखनऊ में आयोजित सर्वदलीय सम्मेलन के समक्ष प्रस्तुत किया गया, जो आगे चलकर नेहरू रिपोर्ट (1928) के नाम से प्रसिद्ध हुई।
नेहरू समिति का गठन मई 1928 में सर्वदलीय सम्मेलन के बम्बई सत्र द्वारा मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में किया गया था, जिसमें जवाहरलाल नेहरू ने सचिव के रूप में कार्य किया। समिति ने 28 अगस्त 1928 को लखनऊ में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
रिपोर्ट के प्रमुख उद्देश्य
➣ नेहरू समिति का मुख्य उद्देश्य ऐसा संवैधानिक प्रारूप तैयार करना था, जो अधिकतम राजनीतिक दलों की सहमति प्राप्त कर सके तथा देश में उत्तरदायी शासन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करे।
➣ इसके साथ ही यह प्रदर्शित करना भी उद्देश्य था कि भारतीय स्वयं अपने लिए संवैधानिक सुधारों की रूपरेखा तैयार करने की क्षमता रखते हैं – अर्थात यह रिपोर्ट साइमन कमीशन के वैकल्पिक भारतीय उत्तर के रूप में भी प्रस्तुत की गई।
➣ समिति ने ऐसी शासन-व्यवस्था का प्रस्ताव तैयार करने का लक्ष्य रखा, जिसमें उत्तरदायी शासन, मौलिक अधिकारों की सुरक्षा, स्वतंत्र न्यायपालिका, संघीय शासन व्यवस्था तथा केंद्र-प्रांत के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन सुनिश्चित हो, साथ ही भारत की विभिन्न धार्मिक व सामाजिक समुदायों के हितों में संतुलन स्थापित करते हुए राष्ट्रीय एकता को बल मिले।
नेहरू रिपोर्ट का उद्देश्य केवल ब्रिटिश सरकार की आलोचना करना नहीं था, बल्कि भारतीयों द्वारा स्वयं तैयार एक व्यावहारिक एवं उत्तरदायी संवैधानिक प्रारूप प्रस्तुत करना भी था।
नेहरू रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें
डोमिनियन स्टेटस की सिफारिश
➣ नेहरू रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश यह थी कि भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत डोमिनियन स्टेटस प्रदान किया जाए। समिति का मत था कि भारत को कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड तथा दक्षिण अफ्रीका जैसे ब्रिटिश डोमिनियनों के समान स्वशासी दर्जा मिलना चाहिए।
➣ डोमिनियन स्टेटस के अंतर्गत भारत को आंतरिक शासन में पूर्ण उत्तरदायित्व प्राप्त होता, जबकि ब्रिटिश सम्राट केवल संवैधानिक प्रमुख के रूप में बने रहते। इस व्यवस्था में भारतीय मंत्रिमंडल और विधानमंडल देश के प्रशासन के प्रति उत्तरदायी होते।
➣ हालांकि इस सिफारिश से सभी भारतीय नेता सहमत नहीं थे। जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा नेताओं का मत था कि भारत का लक्ष्य केवल डोमिनियन स्टेटस नहीं, बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता होना चाहिए। बाद में यही मत भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में अधिक प्रभावशाली होता गया।
नेहरू रिपोर्ट ने पूर्ण स्वतंत्रता के स्थान पर डोमिनियन स्टेटस की सिफारिश की थी। बाद में 1929 के लाहौर अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य को अपना अंतिम लक्ष्य घोषित कर दिया, जिससे डोमिनियन स्टेटस की अवधारणा पीछे छूट गई।
उत्तरदायी शासन एवं शासन संरचना
➣ नेहरू रिपोर्ट ने भारत में उत्तरदायी शासन की स्थापना की सिफारिश की। समिति का मत था कि शासन की वास्तविक शक्ति निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधियों के हाथों में होनी चाहिए तथा कार्यपालिका को विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी बनाया जाना चाहिए।
➣ समिति ने यह भी सिफारिश की कि गवर्नर जनरल तथा प्रांतीय गवर्नर सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करें और प्रशासन में अनावश्यक हस्तक्षेप न करें।
➣ केंद्रीय विधानमंडल के लिए द्विसदनीय व्यवस्था प्रस्तावित की गई – एक सीनेट (प्रांतीय परिषदों द्वारा निर्वाचित) तथा एक प्रतिनिधि सभा , जो वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित होती।
➣ कार्यपालिका के रूप में गवर्नर जनरल द्वारा नियुक्त एक प्रधानमंत्री तथा छह अन्य मंत्रियों की परिषद का प्रस्ताव रखा गया, जो विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी होती।
➣ रिपोर्ट में राज्य और धर्म को पूर्णतः पृथक रखने की सिफारिश भी की गई, अर्थात राज्य का कोई राजकीय धर्म नहीं होगा – यह विचार भारत की भावी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक व्यवस्था की दिशा में एक प्रारंभिक कदम था।
नेहरू रिपोर्ट केंद्र एवं प्रांतों दोनों स्तरों पर पूर्ण उत्तरदायी शासन की समर्थक थी। यह साइमन कमीशन से भिन्न थी, जिसने केवल प्रांतों में स्वायत्तता का समर्थन किया था।
संघीय शासन व्यवस्था
➣ नेहरू रिपोर्ट ने भारत के लिए संघीय शासन व्यवस्था की सिफारिश की। समिति का मत था कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के प्रभावी प्रशासन के लिए ऐसी शासन-व्यवस्था आवश्यक है, जिसमें केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन हो।
➣ रिपोर्ट के अनुसार प्रस्तावित संघ में ब्रिटिश भारतीय प्रांत तथा इच्छुक देशी रियासतें शामिल हो सकती थीं। साथ ही, जिन विषयों का स्पष्ट उल्लेख न हो, उन अवशिष्ट शक्तियों को केंद्र के अधीन रखने का प्रस्ताव किया गया, ताकि राष्ट्रीय एकता और प्रशासनिक समन्वय बनाए रखा जा सके।
नेहरू रिपोर्ट ने अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को देने की सिफारिश की थी। यही प्रावधान मोहम्मद अली जिन्ना सहित मुस्लिम लीग के अनेक नेताओं की प्रमुख आपत्तियों में से एक बना, क्योंकि वे इन शक्तियों को प्रांतों को दिए जाने के पक्षधर थे।
मौलिक अधिकार
➣ नेहरू रिपोर्ट ने पहली बार भारत के भावी संविधान में मौलिक अधिकारों को स्पष्ट रूप से सम्मिलित करने की सिफारिश की।
➣ समिति का मत था कि प्रत्येक नागरिक को ऐसे मूल अधिकार प्राप्त होने चाहिए, जिनकी रक्षा कानून द्वारा की जाए और जिन्हें सरकार भी मनमाने ढंग से समाप्त न कर सके।
➣ रिपोर्ट में कुल उन्नीस (19) मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया, जिनमें कानून के समक्ष समानता, विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा तथा संगठन बनाने का अधिकार, स्त्री-पुरुष समानता, वयस्क मताधिकार तथा प्राथमिक शिक्षा जैसे अधिकार प्रमुख थे। राज्य को किसी भी नागरिक के साथ धर्म, जाति या लिंग के आधार पर भेदभाव न करने का भी प्रावधान रखा गया।
➣ इतिहासकारों के अनुसार नेहरू रिपोर्ट में प्रस्तावित मौलिक अधिकारों ने आगे चलकर भारतीय संविधान (1950) में सम्मिलित मौलिक अधिकारों की अवधारणा को महत्वपूर्ण वैचारिक आधार प्रदान किया, यद्यपि दोनों में पूर्ण समानता नहीं थी।
आगे चलकर भारतीय संविधान के भाग III में इन सिद्धांतों का विस्तृत विकास हुआ।
संयुक्त निर्वाचन प्रणाली एवं अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व
➣ नेहरू रिपोर्ट ने संयुक्त निर्वाचन प्रणाली का समर्थन किया तथा 1916 के लखनऊ समझौते में स्वीकृत पृथक निर्वाचन प्रणाली को समाप्त करने की सिफारिश की।
➣ समिति का मत था कि पृथक निर्वाचन भारतीय समाज को धार्मिक आधार पर विभाजित करता है और राष्ट्रीय एकता के विकास में बाधा उत्पन्न करता है।
➣ यद्यपि पृथक निर्वाचन का विरोध किया गया, फिर भी अल्पसंख्यकों के हितों की पूर्ण उपेक्षा नहीं की गई – जिन प्रांतों में मुसलमान अल्पसंख्यक थे (जैसे संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत, बम्बई), वहाँ उनकी जनसंख्या के सख्त अनुपात में आरक्षित सीटों का प्रावधान रखा गया (यह आरक्षण 10 वर्ष बाद पुनरीक्षण के अधीन होता),
➣ जबकि पंजाब व बंगाल जैसे मुस्लिम-बहुल प्रांतों में कोई आरक्षण प्रस्तावित नहीं था। केंद्रीय विधानमंडल में मुसलमानों को लगभग एक-चौथाई प्रतिनिधित्व देने का प्रस्ताव भी रखा गया।
➣ नेहरू रिपोर्ट की यही सिफारिश आगे चलकर सबसे अधिक विवाद का विषय बनी। मोहम्मद अली जिन्ना तथा मुस्लिम लीग के एक बड़े वर्ग के साथ-साथ सिख नेताओं ने भी पृथक निर्वाचन समाप्त करने की सिफारिश का विरोध किया, क्योंकि पंजाब में सिख समुदाय भी अल्पसंख्यक स्थिति में था तथा पंजाब-बंगाल में मुसलमानों को आरक्षण न मिलना भी आपत्ति का विषय बना। यही मतभेद भी आगे जिन्ना के चौदह सूत्र (1929) की पृष्ठभूमि बना।
UPSC हेतु महत्वपूर्ण अंतर – आरक्षण बनाम वेटेज: नेहरू रिपोर्ट ने अल्पसंख्यकों को केवल उनकी जनसंख्या के सख्त अनुपात में सीटें देने की बात कही, किसी अतिरिक्त की नहीं। इसके ठीक विपरीत, बाद में साम्प्रदायिक निर्णय (1932) में ब्रिटिश सरकार ने अल्पसंख्यकों को उनकी जनसंख्या से अधिक वेटेज (अतिरिक्त प्रतिनिधित्व) भी दिया। यही अंतर परीक्षा में अक्सर भ्रमित करने वाला प्रश्न बनता है।
स्वतंत्र न्यायपालिका एवं सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना
➣ नेहरू रिपोर्ट ने भारत में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका की स्थापना पर विशेष बल दिया तथा भारत के लिए एक सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना का प्रस्ताव रखा।
➣ समिति का विचार था कि यह न्यायालय संविधान की व्याख्या करे, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे तथा केंद्र और प्रांतों के बीच उत्पन्न संवैधानिक विवादों का अंतिम निर्णय दे।
➣ न्यायपालिका को कानून के शासन तथा नागरिकों के मौलिक अधिकारों का संरक्षक बनाए जाने की भी सिफारिश की गई, ताकि शासन की प्रत्येक शाखा संविधान की सीमाओं के भीतर कार्य करे।
आगे चलकर भारतीय संविधान, 1950 के अंतर्गत 28 जनवरी 1950 को सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना हुई, जिसने संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य प्रारम्भ किया।
भाषाई आधार पर प्रांतों का पुनर्गठन
➣ नेहरू रिपोर्ट ने प्रशासनिक सुविधा और जनता की सांस्कृतिक पहचान को ध्यान में रखते हुए भाषाई आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन का समर्थन किया।
➣ रिपोर्ट में विशेष रूप से सिंध को बंबई प्रांत से अलग कर एक पृथक प्रांत बनाने तथा उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) को अन्य गवर्नर प्रांतों के समान संवैधानिक दर्जा और उत्तरदायी शासन प्रदान करने की सिफारिश की गई।
➣ इसके अतिरिक्त दक्षिण भारत में कन्नड़भाषी क्षेत्रों को मिलाकर एक नए कर्नाटक प्रांत के गठन का सुझाव भी दिया गया।
➣ रिपोर्ट में हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाए जाने की सिफारिश भी की गई, यद्यपि यह प्रावधान गैर-हिंदीभाषी क्षेत्रों में विवाद का विषय बना।
➣ स्वतंत्रता के बाद यही विचार आगे विकसित हुआ और राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के माध्यम से अधिकांश राज्यों का पुनर्गठन भाषाई आधार पर किया गया।
आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत सिंध को 1936 में पृथक प्रांत बना दिया गया।
नेहरू रिपोर्ट की कमियाँ एवं आलोचना
➣ यद्यपि नेहरू रिपोर्ट भारतीय संवैधानिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, फिर भी इसकी अनेक सीमाओं तथा कमियों के कारण यह सभी वर्गों की सहमति प्राप्त करने में असफल रही।
➣ अल्पसंख्यक सुरक्षा उपायों की अपर्याप्तता: पृथक निर्वाचन की समाप्ति और जनसंख्या-अनुपात आधारित सीमित आरक्षण को मुस्लिम लीग तथा सिख नेताओं के एक बड़े वर्ग ने अपर्याप्त माना। इससे 1916 के लखनऊ समझौते से बनी हिन्दू-मुस्लिम एकता की भावना को भी आघात पहुँचा।
➣ अत्यधिक केंद्रीकृत संघीय ढाँचा: अवशिष्ट शक्तियों को केंद्र के अधीन रखने के प्रस्ताव से यह आशंका उत्पन्न हुई कि प्रांतों, विशेषकर मुस्लिम-बहुल प्रांतों, की स्वायत्तता सीमित रह जाएगी।
➣ हिन्दी को राजभाषा बनाने की सिफारिश तथा कुछ प्रावधानों को बहुसंख्यकवादी दृष्टिकोण से प्रेरित माना गया, जिससे गैर-हिंदीभाषी एवं गैर-हिन्दू समुदायों में असंतोष उत्पन्न हुआ।
➣ कांग्रेस के भीतर भी असहमति: डोमिनियन स्टेटस को अंतिम लक्ष्य मानने की सिफारिश से जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा व वामपंथी नेता सहमत नहीं थे, जिससे रिपोर्ट को कांग्रेस के भीतर भी पूर्ण समर्थन नहीं मिल सका।
➣ कोई कानूनी बाध्यता नहीं: यह रिपोर्ट भारतीय दलों के बीच एक सहमति-दस्तावेज मात्र थी, इसे कोई संवैधानिक अथवा कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं था। ब्रिटिश सरकार ने इसकी अधिकांश सिफारिशों को स्वीकार नहीं किया, जिससे यह व्यावहारिक रूप से लागू नहीं हो सकी।
➣ सीमित प्रतिनिधित्व: समिति में सदस्यों की संख्या सीमित थी और इसमें अधिकांशतः उदारवादी व कांग्रेस-समर्थक नेता शामिल थे, जिस कारण इसे भारत के संपूर्ण सामाजिक-धार्मिक वैविध्य का सच्चा प्रतिनिधि दस्तावेज नहीं माना गया।
नेहरू रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमी यह रही कि यह राष्ट्रीय एकता तथा सांप्रदायिक सद्भाव स्थापित करने के अपने मूल उद्देश्य में सफल नहीं हो सकी, बल्कि इसके विपरीत इसने कांग्रेस-मुस्लिम लीग संबंधों में दरार को और गहरा कर दिया, जिसका दीर्घकालिक प्रभाव आगे चलकर भारतीय राजनीति पर पड़ा।
| नेहरू रिपोर्ट (1928) में सिफारिश | भारतीय संविधान (1950) में स्थिति |
|---|---|
| 19 मौलिक अधिकारों की सिफारिश | संविधान के भाग III में मौलिक अधिकार सम्मिलित (अनुच्छेद 12-35) |
| स्वतंत्र न्यायपालिका एवं सर्वोच्च न्यायालय का प्रस्ताव | 28 जनवरी 1950 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना |
| संघीय शासन व्यवस्था, अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को | संविधान में संघीय ढाँचा अपनाया गया, अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को (अनुच्छेद 248) |
| संयुक्त निर्वाचन प्रणाली | स्वतंत्र भारत में संयुक्त निर्वाचन प्रणाली लागू, केवल SC/ST हेतु सीट आरक्षण |
| वयस्क मताधिकार | अनुच्छेद 326 के अंतर्गत सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार अपनाया गया |
| भाषाई आधार पर प्रांतों का पुनर्गठन | राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के माध्यम से भाषाई आधार पर राज्यों का गठन |
| डोमिनियन स्टेटस (ब्रिटिश ताज के अधीन स्वशासन) | संविधान में पूर्ण संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना (अनुच्छेद 1) |
उपर्युक्त तुलना से स्पष्ट है कि नेहरू रिपोर्ट के अनेक विचार – विशेषकर मौलिक अधिकार, न्यायपालिका की स्वतंत्रता तथा संघीय ढाँचा – भारतीय संविधान (1950) में विकसित रूप में स्वीकार किए गए, जबकि डोमिनियन स्टेटस जैसी सिफारिशें कालांतर में पूर्ण स्वराज्य की माँग के आगे अप्रासंगिक हो गईं।
भारतीय नेताओं एवं राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
➣ नेहरू रिपोर्ट पर उत्पन्न प्रतिक्रियाओं को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि समिति के सामने पहले से ही एक जटिल स्थिति थी। दिसंबर 1927 के मद्रास अधिवेशन में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के दिल्ली प्रस्तावों (1927) को स्वीकार कर लिया था, जिनमें संयुक्त निर्वाचन के बदले पंजाब व बंगाल में मुसलमानों को उनकी जनसंख्या के अनुरूप स्थान, केंद्रीय विधानमंडल में एक-तिहाई प्रतिनिधित्व, तथा सिंध, बलूचिस्तान एवं NWFP को नए मुस्लिम-बहुल प्रांतों के रूप में गठित करने जैसी माँगें शामिल थीं।
➣ नेहरू समिति ने जब इन रियायतों से आगे बढ़कर संयुक्त निर्वाचन प्रणाली को पूर्ण रूप से लागू करने की सिफारिश की, तो यह मुस्लिम लीग तथा हिन्दू महासभा – दोनों ओर से गंभीर असंतोष का कारण बनी। यह दो-मोर्चों की दुविधा ही आगे चलकर रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमजोरी सिद्ध हुई।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रतिक्रिया
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने नेहरू रिपोर्ट का सामान्यतः स्वागत किया और इसे भारत में उत्तरदायी शासन तथा लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था की स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना। दिसंबर 1928 में आयोजित कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस ने नेहरू रिपोर्ट पर विस्तृत विचार-विमर्श किया।
➣ यद्यपि अधिकांश वरिष्ठ नेताओं ने इसका समर्थन किया, फिर भी जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस तथा सत्यमूर्ति जैसे युवा एवं वामपंथी झुकाव वाले नेताओं का मत था कि भारत का लक्ष्य केवल डोमिनियन स्टेटस नहीं, बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता होना चाहिए। इन नेताओं के दबाव में ही अधिवेशन में एक समझौता सूत्र निकाला गया।
जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस ने इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग (1928) के माध्यम से पूर्ण स्वराज की माँग को उठाया था। दोनों इस लीग के संस्थापक थे। ध्यान दें – पूर्ण स्वराज की जड़ें 1927 के मद्रास अधिवेशन के पूर्ण राष्ट्रीय स्वतंत्रता प्रस्ताव से जुड़ी हैं, जिसे नेहरू ने प्रस्तुत किया और बोस व अन्य वामपंथी नेताओं के समर्थन से पास करवाया था।
➣ विचार-विमर्श के बाद कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार को एक वर्ष का समय दिया और घोषणा की कि यदि इस अवधि के भीतर नेहरू रिपोर्ट के आधार पर भारत को डोमिनियन स्टेटस प्रदान नहीं किया गया, तो कांग्रेस पूर्ण स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य घोषित करेगी तथा देशव्यापी आंदोलन प्रारंभ करेगी।
➣ यह प्रस्ताव स्वयं महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तुत किया गया था, जो इस दौरान सक्रिय राजनीति में सीधे भाग नहीं ले रहे थे किंतु कांग्रेस के भीतर युवा एवं वरिष्ठ धड़ों के बीच सेतु का कार्य कर रहे थे।
➣ जब ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस की इस माँग को स्वीकार नहीं किया, तब दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य को अपना अंतिम लक्ष्य घोषित कर दिया।
➣ इस प्रकार नेहरू रिपोर्ट भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ सिद्ध हुई – एक ऐसा दस्तावेज जो स्वयं संवैधानिक समझौते के रूप में असफल रहा, परंतु जिसकी असफलता ने कांग्रेस को क्रमिक सुधार की राजनीति से पूर्ण स्वतंत्रता की राजनीति की ओर धकेल दिया।
कलकत्ता अधिवेशन (1928) में दिए गए एक वर्ष की समय-सीमा समाप्त होने पर लाहौर अधिवेशन (1929) में पूर्ण स्वराज्य को कांग्रेस का अंतिम लक्ष्य घोषित कर दिया गया। इसका विस्तृत विवरण इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग एवं लाहौर अधिवेशन (1929) अध्याय में दिया गया है।
मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया
➣ नेहरू रिपोर्ट के प्रति मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया एक समान नहीं थी। कुछ नेताओं ने इसे भारतीयों द्वारा तैयार किया गया महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रयास माना, जबकि एक बड़े वर्ग ने इसके अनेक प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति व्यक्त की।
➣ स्वयं समिति के एकमात्र मुस्लिम सदस्य शोएब कुरैशी ने भी रिपोर्ट की कुछ सिफारिशों से असहमति जताई थी, किंतु उनका सुझाव स्वीकार नहीं किया गया।
➣ यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि रिपोर्ट के मसौदे की चर्चा के दौरान मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों ने सम्मेलन की कार्यवाही में सक्रिय भाग लेना ही बंद कर दिया था, क्योंकि उनका मत था कि जब तक सांप्रदायिक प्रश्न पर सहमति न बन जाए, तब तक अन्य संवैधानिक विषयों पर विचार निरर्थक है।
➣ मोहम्मद अली जिन्ना ने प्रारंभ में समझौता स्थापित करने का प्रयास करते हुए कुछ संशोधन प्रस्तावित किए, जिनका उद्देश्य मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को अधिक सुरक्षित बनाना था।
➣ उनकी प्रमुख आपत्तियाँ पृथक निर्वाचन प्रणाली को समाप्त करने, केंद्रीय विधानमंडल में मुसलमानों को पर्याप्त (एक-तिहाई) प्रतिनिधित्व न मिलने, पंजाब-बंगाल में वयस्क मताधिकार लागू न होने तक मुसलमानों के लिए आरक्षण सुनिश्चित न होने, तथा अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के बजाय प्रांतों को देने संबंधी प्रावधानों पर थीं।
➣ जिन्ना द्वारा सुझाए गए संशोधनों को दिसंबर 1928 के कलकत्ता सम्मेलन में अस्वीकार कर दिया गया, जिसके विरोध में मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों ने सम्मेलन से बहिर्गमन (वॉकआउट) किया। जिन्ना ने इसे भारतीय राजनीति में हिन्दू-मुस्लिम सहयोग के रास्तों का बिछड़ना (Parting of the Ways) कहा।
➣ इसके बाद जनवरी 1929 में दिल्ली में आगा खाँ की अध्यक्षता में हुए अखिल भारतीय मुस्लिम सम्मेलन में मुसलमानों की माँगों को स्पष्ट रूप से रखा गया, और अंततः जिन्ना ने मार्च 1929 में अपने प्रसिद्ध चौदह सूत्र प्रस्तुत किए, जिन्हें आगामी दशकों तक मुस्लिम लीग की संवैधानिक माँगों का आधार माना गया।
➣ इस प्रकार नेहरू रिपोर्ट भारतीय नेताओं के बीच पूर्ण सहमति स्थापित करने में सफल नहीं हो सकी। विशेष रूप से कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच संवैधानिक प्रश्नों पर मतभेद और अधिक स्पष्ट हो गए, जिनका प्रभाव आगे की भारतीय राजनीति – विशेषकर सांप्रदायिक निर्वाचक मंडल की बहस तथा अंततः विभाजन तक की राजनीतिक यात्रा – पर भी पड़ा।
हिन्दू महासभा की प्रतिक्रिया
➣ नेहरू रिपोर्ट को केवल मुस्लिम लीग के विरोध का ही सामना नहीं करना पड़ा, बल्कि दूसरी ओर हिन्दू महासभा – जिसके प्रमुख नेताओं में लाला लाजपत राय तथा डॉ. बी. एस. मुंजे जैसे नाम शामिल थे – ने भी रिपोर्ट की कुछ सिफारिशों का कड़ा विरोध किया।
➣ महासभा का मत था कि नेहरू समिति द्वारा दिल्ली प्रस्तावों (1927) में पहले से स्वीकृत रियायतें (जैसे पंजाब व बंगाल में मुस्लिम-बहुल प्रांतीय व्यवस्था, और मुसलमानों के लिए सीटों का आरक्षण) ही अनावश्यक थीं।
➣ महासभा ने भारत के लिए एक सुदृढ़ एकात्मक शासन-व्यवस्था की माँग की तथा अल्पसंख्यकों के लिए किसी भी प्रकार के विशेष संवैधानिक संरक्षण अथवा आरक्षण का विरोध किया।
➣ परिणामस्वरूप मोतीलाल नेहरू तथा समिति के अन्य नेताओं को एक कठिन दुविधा का सामना करना पड़ा – मुस्लिम लीग की माँगें मानने पर हिन्दू महासभा का समर्थन खोने का खतरा था, और महासभा को संतुष्ट करने पर मुस्लिम लीग और अधिक अलग-थलग पड़ जाती।
➣ अंततः समिति द्वारा अपनाया गया मध्यम मार्ग (सीमित आरक्षण, संयुक्त निर्वाचन) किसी भी पक्ष को पूर्णतः संतुष्ट नहीं कर सका।
नेहरू रिपोर्ट एक साथ दो विपरीत दिशाओं से आलोचना की शिकार हुई – मुस्लिम लीग को यह सुरक्षा-उपाय अपर्याप्त लगे, जबकि हिन्दू महासभा को यही उपाय अनावश्यक रियायत प्रतीत हुए। यह दोहरी असंतुष्टि (भुवन कुमार झा के शोध-अनुसार) रिपोर्ट की सबसे मौलिक संरचनात्मक कमजोरी थी।
सिख एवं अन्य नेताओं की प्रतिक्रिया
➣ पंजाब के सिख नेताओं में भी नेहरू रिपोर्ट को लेकर गहरे मतभेद उभरे। अक्टूबर 1928 में गुजरांवाला में आयोजित सेंट्रल सिख लीग के अधिवेशन में यह आपत्ति व्यक्त की गई कि रिपोर्ट ने सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की अवधारणा को स्वीकार करके पंजाब में सिख अल्पसंख्यकों के हितों की उपेक्षा की है।
➣ लीग के अध्यक्ष बाबा खड़क सिंह ने यह भी तर्क दिया कि रिपोर्ट ने राष्ट्रीय लक्ष्य को केवल डोमिनियन स्टेटस तक सीमित कर भारतीयों को दोहरी लड़ाई (पहले डोमिनियन स्टेटस, फिर पूर्ण स्वराज) के लिए बाध्य कर दिया।
➣ कुछ सिख नेताओं, जैसे सरदार मंगल सिंह (जो स्वयं नेहरू समिति के सदस्य भी थे) ने पंजाब विधानमंडल तथा केंद्रीय विधानमंडल में कम से कम 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व की माँग रखी।
➣ अधिकांश उदारवादी नेता, जैसे सर तेज बहादुर सप्रू तथा एम. आर. जयकर, इसे भारतीयों द्वारा तैयार किया गया पहला गंभीर संवैधानिक प्रयास मानते हुए इसका समर्थन करते रहे और इसे विभिन्न राजनीतिक विचारों के बीच संतुलन स्थापित करने का व्यावहारिक प्रयास बताया।
➣ ब्रिटिश सरकार ने, अपनी ओर से, रिपोर्ट पर कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं दी और अंततः इसे अस्वीकार करते हुए अपनी योजनाओं (जैसे सांप्रदायिक निर्णय एवं गोलमेज सम्मेलन) के साथ आगे बढ़ी।
नेहरू रिपोर्ट का विरोध किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं था – मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा तथा सेंट्रल सिख लीग, तीनों ने ही अलग-अलग (और परस्पर विरोधाभासी) कारणों से इस पर आपत्ति जताई, जो यह दर्शाता है कि रिपोर्ट सभी वर्गों की एक साथ संतुष्टि करने में असफल रही।
| पक्ष / संगठन | प्रमुख रुख |
|---|---|
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (वरिष्ठ नेतृत्व) | सामान्य समर्थन; डोमिनियन स्टेटस स्वीकार्य |
| कांग्रेस के युवा/वामपंथी नेता (जे. नेहरू, बोस, सत्यमूर्ति) | डोमिनियन स्टेटस का विरोध; पूर्ण स्वतंत्रता की माँग |
| मुस्लिम लीग (जिन्ना) | पृथक निर्वाचन समाप्ति व अपर्याप्त प्रतिनिधित्व का विरोध; चौदह सूत्र (1929) प्रस्तुत |
| हिन्दू महासभा | अल्पसंख्यकों को दी गई किसी भी रियायत का विरोध; एकात्मक शासन की माँग |
| सेंट्रल सिख लीग | पंजाब में सिखों हेतु अपर्याप्त सुरक्षा उपायों का विरोध |
| उदारवादी नेता (सप्रू, जयकर) | समर्थन; संतुलनकारी दस्तावेज माना |
| ब्रिटिश सरकार | औपचारिक अस्वीकृति; कोई कानूनी मान्यता नहीं दी |
नेहरू रिपोर्ट का महत्व एवं परिणाम
सकारात्मक महत्व – एक संवैधानिक मील का पत्थर
➣ नेहरू रिपोर्ट (1928) भारतीय संवैधानिक विकास के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध हुई।
➣ यह भारतीयों द्वारा तैयार किया गया पहला व्यापक संवैधानिक प्रारूप था, जिसने यह प्रमाणित किया कि भारतीय नेता स्वयं भी देश के लिए एक लोकतांत्रिक एवं उत्तरदायी शासन-व्यवस्था की रूपरेखा तैयार करने में सक्षम हैं। इस अर्थ में इसने लॉर्ड बिर्कनहेड की 1925 की चुनौती का व्यावहारिक उत्तर दिया – भले ही अंततः ब्रिटिश सरकार ने इसे अस्वीकार कर दिया।
➣ इस रिपोर्ट ने भारत में उत्तरदायी शासन, संघीय शासन व्यवस्था, मौलिक अधिकारों, स्वतंत्र न्यायपालिका, वयस्क मताधिकार तथा संयुक्त निर्वाचन प्रणाली जैसे आधुनिक संवैधानिक सिद्धांतों को पहली बार एक संगठित एवं विस्तृत रूप में प्रस्तुत किया।
➣ इनमें से अनेक सिद्धांत – विशेषकर मौलिक अधिकारों की सूची तथा सर्वोच्च न्यायालय की परिकल्पना – आगे चलकर भारतीय संविधान (1950) के लिए एक महत्वपूर्ण वैचारिक नींव बने, यद्यपि संविधान सभा ने इन्हें स्वतंत्र भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप विस्तृत एवं संशोधित रूप में अपनाया।
तात्कालिक राजनीतिक परिणाम
➣ रिपोर्ट का सबसे तात्कालिक और विरोधाभासी परिणाम यह रहा कि सांप्रदायिक दरार को पाटने के प्रयास ने वास्तव में इस दरार को और चौड़ा कर दिया। इतिहासकार कूपलैंड के अनुसार, नेहरू समिति ने सांप्रदायिक खाई को पाटने के बजाय उसे व्यापक बना दिया – क्योंकि यह किसी एक पक्ष (मुस्लिम लीग या हिन्दू महासभा) को पूर्णतः संतुष्ट किए बिना दोनों को असंतुष्ट कर बैठी।
➣ इसी असफलता ने कांग्रेस के भीतर आंतरिक बहस को तीव्र किया। ब्रिटिश सरकार द्वारा रिपोर्ट की सिफारिशों को स्वीकार न किए जाने पर दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य को अपना अंतिम लक्ष्य घोषित कर दिया, जिससे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन एक नए और अधिक उग्र चरण (26 जनवरी 1930 को प्रथम स्वतंत्रता दिवस की घोषणा, सविनय अवज्ञा आंदोलन) में प्रवेश कर गया।
➣ दूसरी ओर, सांप्रदायिक सहमति बनाने में विफलता ने ब्रिटिश सरकार को यह तर्क देने का अवसर दे दिया कि भारतीय स्वयं एक स्वीकार्य संविधान तैयार नहीं कर सकते, और इसलिए संवैधानिक सुधारों का निर्णय अंततः ब्रिटिश सरकार को ही करना होगा।
➣ इसी तर्क के आधार पर आगे चलकर गोलमेज सम्मेलनों तथा साम्प्रदायिक निर्णय के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने स्वयं अपनी योजना थोप दी।
दीर्घकालिक संवैधानिक श्रृंखला
➣ नेहरू रिपोर्ट तथा उसके बाद उत्पन्न राजनीतिक परिस्थितियों ने आगे चलकर घटनाओं की एक लंबी शृंखला की पृष्ठभूमि तैयार की। सर्वप्रथम तीन गोलमेज सम्मेलन (1930-32) आयोजित हुए, जिनमें भारत के संवैधानिक भविष्य पर चर्चा हुई।
➣ इनकी विफलता के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने 16 अगस्त 1932 को साम्प्रदायिक निर्णय की घोषणा की, जिसमें दलित वर्गों सहित सभी अल्पसंख्यकों को पृथक निर्वाचन का अधिकार दे दिया गया – अर्थात नेहरू रिपोर्ट द्वारा अस्वीकृत की गई ठीक वही व्यवस्था, जिसे रोकने के लिए रिपोर्ट तैयार की गई थी।
➣ महात्मा गांधी द्वारा दलितों के लिए पृथक निर्वाचन का विरोध करते हुए किए गए आमरण अनशन के परिणामस्वरूप पूना पैक्ट (सितंबर 1932) हुआ, जिसके तहत दलितों को पृथक निर्वाचन के बदले संयुक्त निर्वाचन में आरक्षित सीटें दी गईं।
➣ अंततः इन सभी घटनाक्रमों के आधार पर भारत सरकार अधिनियम, 1935 पारित हुआ, जो 1947 तक भारत के शासन का ढाँचा बना रहा और जिसके प्रांतीय स्वायत्तता, संघीय ढाँचे तथा सूचियों-संबंधी अनेक प्रावधानों ने आगे चलकर 1950 के संविधान को भी प्रभावित किया।
➣ इस प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि नेहरू रिपोर्ट, अपनी असफलता के बावजूद (या यूँ कहें कि अपनी असफलता के कारण ही), भारत के संवैधानिक विकास की एक अनिवार्य कड़ी बन गई – इसने एक ऐसी श्रृंखला आरंभ की, जिसका समापन अंततः भारत सरकार अधिनियम, 1935 तथा दीर्घकाल में भारतीय संविधान (1950) के रूप में हुआ।
UPSC दृष्टिकोण: नेहरू रिपोर्ट का सही मूल्यांकन इसकी सफलता या असफलता के एकपक्षीय दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि इस बात से करना चाहिए कि इसने भारतीय राजनीति की दिशा को स्थायी रूप से कैसे प्रभावित किया – एक ओर इसने कांग्रेस को पूर्ण स्वराज्य की ओर धकेला, तो दूसरी ओर इसकी सांप्रदायिक असफलता ने मुस्लिम राजनीति को एक पृथक एवं अधिक मुखर दिशा दी, जो आगे चलकर विभाजन तक की राजनीतिक यात्रा का एक प्रारंभिक बिंदु सिद्ध हुई।
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ लॉर्ड बिर्कनहेड ने 1925 में यह चुनौती दी थी कि भारतीय दल आपस में मिलकर एक सर्वसम्मत संविधान नहीं बना सकते। नेहरू रिपोर्ट इसी चुनौती के उत्तर में तैयार भारतीयों द्वारा निर्मित पहला व्यापक संवैधानिक प्रारूप थी। इसे 28 अगस्त 1928 को लखनऊ सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया।
➣ नेहरू समिति का गठन मई 1928 में सर्वदलीय सम्मेलन के बम्बई सत्र द्वारा मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में किया गया था। इसके सदस्य थे – अली इमाम, तेज बहादुर सप्रू, एम. एस. अणे, एम. आर. जयकर, शोएब कुरैशी (एकमात्र मुस्लिम सदस्य), सरदार मंगल सिंह, जी. आर. प्रधान तथा एन. एम. जोशी। जवाहरलाल नेहरू इस समिति के सचिव थे।
➣ नेहरू रिपोर्ट ने भारत को डोमिनियन स्टेटस प्रदान करने, केंद्र एवं प्रांतों में उत्तरदायी शासन, संघीय शासन व्यवस्था, 19 मौलिक अधिकारों तथा स्वतंत्र न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय) की स्थापना की सिफारिश की। केंद्रीय विधानमंडल के लिए द्विसदनीय व्यवस्था (सीनेट + प्रतिनिधि सभा) का प्रस्ताव रखा गया।
➣ नेहरू रिपोर्ट ने पृथक निर्वाचन प्रणाली को समाप्त कर संयुक्त निर्वाचन प्रणाली लागू करने तथा अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को देने की सिफारिश की।
➣ नेहरू रिपोर्ट ने सिंध को बंबई प्रांत से अलग करने, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) को समान संवैधानिक दर्जा देने, एक नए “कर्नाटक” प्रांत के गठन तथा हिन्दी को राजभाषा बनाने का सुझाव दिया।
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सामान्यतः नेहरू रिपोर्ट का समर्थन किया, जबकि जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा नेता डोमिनियन स्टेटस के स्थान पर पूर्ण स्वतंत्रता के पक्षधर थे।
➣ नेहरू रिपोर्ट को एक साथ विपरीत दिशाओं से विरोध झेलना पड़ा – मुस्लिम लीग तथा सेंट्रल सिख लीग ने इसे अल्पसंख्यकों के लिए अपर्याप्त बताया, जबकि हिन्दू महासभा ने इसे अनावश्यक रियायत मानकर एकात्मक शासन की माँग की। जिन्ना ने मार्च 1929 में अपने चौदह सूत्र प्रस्तुत किए।
➣ नेहरू रिपोर्ट को ब्रिटिश सरकार से कोई औपचारिक स्वीकृति नहीं मिली, इसलिए इसका कोई कानूनी दर्जा नहीं था – फिर भी इसने आगे चलकर लाहौर अधिवेशन (1929) में पूर्ण स्वराज्य की घोषणा, गोलमेज सम्मेलन (1930-32), साम्प्रदायिक निर्णय (16 अगस्त 1932), पूना पैक्ट (सितंबर 1932) तथा अंततः भारत सरकार अधिनियम, 1935 की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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