भारत का संवैधानिक विकास (1773–1947) : प्रमुख अधिनियम और संवैधानिक परिवर्तन

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परिचय

ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC)
स्थापना 31 दिसम्बर 1600, महारानी एलिजाबेथ प्रथम के राजलेख द्वारा
मुख्यालय लंदन (ब्रिटेन)
प्रथम गवर्नर थॉमस स्माइथ (Thomas Smythe)
मूल नाम The Governor and Company of Merchants of London Trading into the East Indies
उपनाम जॉन कम्पनी
स्वरूप संयुक्त उद्यम कम्पनी

➣ कंपनी के प्रशासन हेतु इंग्लैंड में स्थित दो प्रमुख संस्थाएँ थीं-

  • स्वत्वधारी या हितधारकों का मण्डल (Court of Proprietors – COP) : कंपनी के स्वामियों/शेयरधारकों की आम सभा।
  • निदेशक मण्डल (Court of Directors – COD) : कंपनी के प्रशासन और संचालन को नियंत्रित करने वाला प्रमुख निकाय।

ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना और प्रारंभिक संरचना

➣ ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) की स्थापना इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम द्वारा जारी राजलेख (Royal Charter / Letters Patent) के माध्यम से 31 दिसम्बर 1600 को हुई।

➣ इस राजलेख द्वारा कंपनी को पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिए विशेषाधिकार प्रदान किया गया। कंपनी का मूल नाम The Governor and Company of Merchants of London Trading into the East Indies था।

➣ कंपनी प्रारम्भ में एक व्यापारिक कंपनी थी, जिसका मुख्य उद्देश्य पूर्वी देशों के साथ व्यापार करना था। बाद में भारत में व्यापारिक बस्तियों, कारखानों और किलों की स्थापना के साथ उसका प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ता गया। ब्रिटिश अभिलेखों में कंपनी को एक विधिवत गठित corporate body के रूप में दर्ज किया गया है।

➣ कंपनी के प्रारम्भिक संगठन में साझेदारों/हितधारकों का मण्डल और निदेशक मण्डल (Court of Directors) प्रमुख संस्थाएँ थीं। Court of Proprietors कंपनी के स्वामियों या शेयरधारकों का प्रतिनिधित्व करता था, जबकि निदेशक मण्डल कंपनी के वास्तविक प्रशासन और संचालन में प्रमुख भूमिका निभाता था। बाद के अभिलेखों में निदेशक मण्डल की संख्या 24 सदस्यों की बताई गई है।

➣ 1600 के राजलेख ने कंपनी को केवल व्यापार करने का अधिकार ही नहीं दिया, बल्कि कंपनी के संगठन और उसके व्यापारिक उपक्रमों को विधिक आधार भी प्रदान किया। आगे चलकर विभिन्न राजलेखों के माध्यम से कंपनी के अधिकारों का विस्तार होता गया।

1757 से 1765 : कंपनी का राजनीतिक शक्ति के रूप में उदय

➣ 1757 का प्लासी का युद्ध कंपनी के इतिहास में निर्णायक मोड़ था। इसके बाद बंगाल की राजनीति पर ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रभाव स्थापित हो गया और कंपनी एक व्यापारिक संस्था से धीरे-धीरे राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित होने लगी।

➣ 1764 के बक्सर के युद्ध ने कंपनी की इस राजनीतिक शक्ति को और मजबूत कर दिया। बंगाल, अवध और मुगल सत्ता की संयुक्त शक्ति पर विजय के बाद कंपनी की स्थिति उत्तर भारत में भी अधिक प्रभावशाली हो गई।

➣ इन विजयों का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम 1765 में दीवानी अधिकार की प्राप्ति थी। मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय से कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा में राजस्व वसूलने का अधिकार प्राप्त हुआ।

➣ दीवानी मिलने के बाद कंपनी के पास व्यापार के साथ-साथ विशाल राजस्व-स्रोत भी आ गया। इससे उसकी आर्थिक और राजनीतिक शक्ति तेजी से बढ़ी तथा वह भारतीय क्षेत्रों के शासन में प्रत्यक्ष भूमिका निभाने लगी।

➣ इस परिवर्तन का व्यापक प्रभाव यह हुआ कि ईस्ट इंडिया कंपनी का स्वरूप केवल व्यापारिक कंपनी का नहीं रहा। उसके पास अब क्षेत्रीय सत्ता, राजस्व और प्रशासन से जुड़े अधिकार आ गए थे।

प्लासी (1757) ने कंपनी को राजनीतिक प्रभाव दिया, बक्सर (1764) ने उसकी राजनीतिक-सैन्य स्थिति को मजबूत किया। इस प्रकार 1765 तक कंपनी एक व्यापारिक संस्था से शासकीय शक्ति में बदल चुकी थी।

1765 से 1773 : कंपनी शासन की समस्या

➣ दीवानी अधिकार प्राप्त होने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक संस्था से आगे बढ़कर राजस्व और राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने लगी। लेकिन उसके पास इतनी व्यापक सत्ता के अनुरूप प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था और नियंत्रण-तंत्र अभी विकसित नहीं हुआ था।

लंदन स्थित निदेशक मण्डल से भारत के विस्तृत क्षेत्रों का प्रभावी प्रशासन करना कठिन था और भारत में कंपनी के अधिकारियों के कार्यों पर भी पर्याप्त नियंत्रण नहीं था। ब्रिटिश संसद के अनुसार कंपनी का प्रशासन खराब था और उसके अधिकारियों के बीच भ्रष्टाचार तथा निजी लाभ की प्रवृत्ति गंभीर समस्या बन चुकी थी।

➣ कंपनी के अनेक अधिकारी निजी व्यापार, उपहार और अन्य माध्यमों से व्यक्तिगत संपत्ति अर्जित करने लगे। इंग्लैंड में अत्यधिक धन लेकर लौटने वाले ऐसे कंपनी अधिकारियों को “Nabobs” कहा जाने लगा। इससे कंपनी के शासन और उसके अधिकारियों के आचरण को लेकर ब्रिटेन में भी आलोचना बढ़ी।

➣ कंपनी के प्रशासन की एक बड़ी समस्या यह थी कि व्यापारिक हित और शासकीय दायित्व एक ही संस्था के हाथों में थे। कंपनी का मूल उद्देश्य व्यापार और लाभ कमाना था, जबकि अब उसे विशाल क्षेत्रों के राजस्व और प्रशासन का संचालन भी करना पड़ रहा था। इस दोहरी भूमिका से शासन में अनेक व्यावहारिक समस्याएँ उत्पन्न हुईं।

➣ 1770 का बंगाल का भीषण अकाल कंपनी के शासन की कमजोरियों को और स्पष्ट करने वाली घटना बनी। अकाल के बाद बंगाल की आर्थिक स्थिति और राजस्व व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ा तथा कंपनी की प्रशासनिक नीतियों की आलोचना बढ़ी।

➣ कंपनी की आर्थिक स्थिति भी लगातार बिगड़ती गई। 1772 में कंपनी गंभीर वित्तीय संकट में फँस गई और उसे ब्रिटिश सरकार से आर्थिक सहायता की आवश्यकता पड़ी। इसी समय ब्रिटिश संसद में कंपनी के प्रशासन और उसके भारतीय मामलों की जाँच तथा आलोचना अधिक तीव्र हुई।

➣ इस प्रकार 1765 के बाद कंपनी के सामने एक विरोधाभास पैदा हो गया था-उसके पास भारत में व्यापक राजनीतिक और राजस्व अधिकार थे, लेकिन उसके प्रशासन पर प्रभावी सार्वजनिक या संसदीय नियंत्रण नहीं था। कंपनी की खराब प्रशासनिक व्यवस्था, अधिकारियों का भ्रष्टाचार और वित्तीय संकट ने ब्रिटिश संसद को कंपनी के भारतीय शासन में हस्तक्षेप के लिए प्रेरित किया।

समस्या संवैधानिक महत्व
कंपनी का राजनीतिक शक्ति बनना व्यापारिक संस्था के लिए बने पुराने ढाँचे पर शासन का अतिरिक्त भार आया।
प्रशासनिक अव्यवस्था भारतीय क्षेत्रों पर प्रभावी और केंद्रीकृत नियंत्रण की आवश्यकता महसूस हुई।
अधिकारियों में भ्रष्टाचार एवं निजी व्यापार कंपनी के प्रशासन पर बाहरी नियंत्रण की माँग बढ़ी।
बंगाल की आर्थिक कठिनाइयाँ कंपनी की राजस्व एवं प्रशासनिक नीतियों की आलोचना बढ़ी।
वित्तीय संकट (1772) ब्रिटिश सरकार और संसद को कंपनी के मामलों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप का अवसर मिला।

➣ इस प्रकार प्रारम्भिक समय में कंपनी का स्वरूप मुख्यतः व्यापारिक था, लेकिन समय के साथ उसे अपनी व्यापारिक बस्तियों के प्रशासन, सुरक्षा और न्यायिक व्यवस्था से जुड़े अधिकार भी प्राप्त होते गए। इसके परिणामस्वरूप कंपनी का स्वरूप धीरे-धीरे व्यापारिक संस्था से शासकीय शक्ति में बदलने लगा और उसके प्रशासन पर संवैधानिक नियंत्रण की आवश्यकता महसूस होने लगी, जिसके परिणामस्वरूप रेग्यूलेटिंग एक्ट, 1773 सामने आया।

➣ ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना के समय भारत में कंपनी के शासन पर ब्रिटिश संसद का प्रत्यक्ष संवैधानिक नियंत्रण नहीं था। बाद में कंपनी के राजनीतिक और प्रशासनिक अधिकार बढ़ने के साथ रेग्यूलेटिंग एक्ट, 1773 द्वारा ब्रिटिश संसद ने पहली बार कंपनी के भारतीय शासन पर संवैधानिक नियंत्रण स्थापित किया। इसके साथ ही भारत में संवैधानिक विकास की एक क्रमिक प्रक्रिया शुरू हुई।

भारत में संवैधानिक विकास का क्रम (1773–1947)

➣ भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान समय-समय पर ब्रिटिश संसद द्वारा विभिन्न संवैधानिक अधिनियम पारित किए गए। इन अधिनियमों के माध्यम से ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन, प्रशासनिक नियंत्रण, भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी, प्रतिनिधित्व और उत्तरदायी शासन की व्यवस्था में क्रमशः परिवर्तन होते गए।

➣ 1773 से 1853 के बीच हुए संवैधानिक परिवर्तनों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक शासन को धीरे-धीरे एक केंद्रीकृत औपनिवेशिक प्रशासन में बदल दिया।

➣ 1773 में कंपनी के शासन पर संसदीय नियंत्रण की शुरुआत हुई, 1813 में उसके व्यापारिक एकाधिकार में कमी आई और 1833 में कंपनी का व्यापारिक स्वरूप पूरी तरह समाप्त हो गया। 1853 तक कंपनी का प्रमुख स्वरूप प्रशासनिक रह गया था और विधायी तथा प्रशासनिक केंद्रीकरण की प्रक्रिया काफी आगे बढ़ चुकी थी।

➣ 1858 से 1909 के बीच कंपनी शासन की समाप्ति के बाद भारतीय संवैधानिक व्यवस्था ब्रिटिश क्राउन के प्रत्यक्ष शासन में प्रवेश कर गई। इसके बाद भारतीयों की विधायी भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ी और संवैधानिक विकास प्रतिनिधित्व तथा निर्वाचन के प्रश्न तक पहुँचा। 1909 तक परिषदों में भारतीय भागीदारी पहले की तुलना में काफी बढ़ चुकी थी।

➣ 1909 के बाद संवैधानिक विकास का केंद्र केवल प्रतिनिधित्व बढ़ाना नहीं, बल्कि शासन में भारतीयों की वास्तविक जिम्मेदारी का प्रश्न बन गया।

➣ 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा ने भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी शासन स्थापित करने को ब्रिटिश नीति का घोषित लक्ष्य बनाया और भारत सरकार अधिनियम, 1919 ने प्रांतों में द्वैध शासन के माध्यम से इसकी सीमित शुरुआत की।

➣ 1919 से 1935 के बीच द्वैध शासन के अनुभव, भारतीयों की संवैधानिक माँगों और ब्रिटिश सरकार के विभिन्न सुधार प्रयासों के परिणामस्वरूप संवैधानिक व्यवस्था में आगे परिवर्तन हुए।

➣ इस प्रक्रिया का सबसे व्यापक परिणाम भारत सरकार अधिनियम, 1935 रहा, जिसने प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता की दिशा खोली तथा केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियों के विभाजन को अधिक स्पष्ट रूप दिया।

➣ 1935 से 1947 के अंतिम औपनिवेशिक चरण में भारतीयों को प्रांतीय शासन का व्यापक अनुभव मिला और संवैधानिक सत्ता का प्रश्न धीरे-धीरे ब्रिटिश नियंत्रण से भारतीयों की ओर स्थानांतरित होने लगा।

➣ 1946 में संविधान सभा के गठन के साथ संविधान निर्माण की प्रक्रिया भारतीय नेतृत्व के हाथों में पहुँची और 1947 में ब्रिटिश शासन का अंत हुआ। इस प्रकार संवैधानिक विकास की पूरी प्रक्रिया कंपनी शासन पर नियंत्रण से शुरू होकर भारतीयों द्वारा स्वयं संविधान निर्माण तक पहुँची।

रेग्यूलेटिंग एक्ट, 1773 : संसदीय नियंत्रण की शुरुआत

  • पहली बार ब्रिटिश संसद ने ईस्ट इंडिया कंपनी के भारतीय प्रशासन में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप किया। इसे कंपनी के शासन पर संसदीय नियंत्रण की शुरुआत माना जाता है।
  • बंगाल के गवर्नर को गवर्नर-जनरल ऑफ बंगाल बनाया गया। वारेन हेस्टिंग्स इस पद पर नियुक्त होने वाले प्रथम व्यक्ति थे।
  • गवर्नर-जनरल की सहायता के लिए चार सदस्यों की कार्यकारी परिषद बनाई गई। निर्णय बहुमत से लिए जाने थे तथा बराबर मत होने पर गवर्नर-जनरल को निर्णायक मत प्राप्त था।
  • मद्रास और बंबई की प्रेसिडेंसियों को युद्ध और संधि जैसे महत्वपूर्ण मामलों में बंगाल के गवर्नर-जनरल और उसकी परिषद के अधीन किया गया। इससे केंद्रीकरण की प्रक्रिया मजबूत हुई।
  • कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट स्थापित करने का प्रावधान किया गया, जो 1774 में स्थापित हुआ। इसमें एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश थे। इसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पे थे।
  • सुप्रीम कोर्ट को अभिलेख न्यायालय (Court of Record) का दर्जा प्राप्त था तथा उसके निर्णयों के विरुद्ध निर्धारित परिस्थितियों में प्रिवी काउंसिल में अपील की जा सकती थी।
  • गवर्नर-जनरल और उसकी परिषद को नियम, विनियम तथा अध्यादेश बनाने की शक्ति दी गई।
  • कंपनी के अधिकारियों को निजी व्यापार करने से प्रतिबंधित किया गया तथा भारतीयों से उपहार, भेंट और रिश्वत लेने पर रोक लगाई गई।
  • कंपनी के कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के कार्यकाल को व्यवस्थित किया गया। निदेशकों का कार्यकाल चार वर्ष किया गया तथा प्रत्येक वर्ष एक-चौथाई निदेशकों के सेवानिवृत्त होने की व्यवस्था की गई।
  • कंपनी के निदेशकों को भारत के नागरिक, सैन्य और राजस्व प्रशासन से संबंधित पत्राचार को ब्रिटिश सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना आवश्यक किया गया। इससे कंपनी के भारतीय प्रशासन पर ब्रिटिश निगरानी बढ़ी।
  • यह अधिनियम कंपनी के शासन को पहली बार एक वैधानिक ढाँचे में नियंत्रित करने का महत्वपूर्ण प्रयास था और आगे के संवैधानिक विकास की आधारभूमि बना।

बंगाल की द्वैध शासन व्यवस्था 1773 के रेग्यूलेटिंग एक्ट से समाप्त नहीं हुई। इसे वारेन हेस्टिंग्स ने 1772 में समाप्त किया था।

एक्ट ऑफ सेटिलमेंट, 1781 : सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र की सीमा स्पष्ट

  • रेग्यूलेटिंग एक्ट, 1773 के बाद गवर्नर-जनरल, उसकी परिषद और कलकत्ता के सुप्रीम कोर्ट के बीच अधिकार-क्षेत्र को लेकर उत्पन्न विवादों को दूर करने के लिए 1781 का एक्ट ऑफ सेटिलमेंट पारित किया गया।
  • इसे अमेंडिंग एक्ट, 1781 तथा बंगाल ज्यूडिकेचर एक्ट, 1781 भी कहा जाता है।
  • गवर्नर-जनरल और उसकी परिषद द्वारा अपने आधिकारिक कार्यों में किए गए कार्यों को सुप्रीम कोर्ट के अधिकार-क्षेत्र से बाहर रखा गया। इसी प्रकार कंपनी के अधिकारियों को भी उनके आधिकारिक कार्यों के लिए न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र से संरक्षण मिला।
  • राजस्व से संबंधित मामलों तथा राजस्व की वसूली से जुड़े मामलों को सुप्रीम कोर्ट के अधिकार-क्षेत्र से बाहर कर दिया गया।
  • सुप्रीम कोर्ट का अधिकार-क्षेत्र कलकत्ता के निवासियों तक स्पष्ट किया गया तथा भारतीयों के व्यक्तिगत मामलों में हिंदुओं के लिए हिंदू कानून और मुसलमानों के लिए मुस्लिम कानून लागू करने की व्यवस्था की गई।
  • प्रांतीय अदालतों के निर्णयों के विरुद्ध अपील का अधिकार गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल को दिया गया, न कि सुप्रीम कोर्ट को।
  • गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल को प्रांतीय अदालतों और परिषदों के लिए नियम-विनियम बनाने की शक्ति प्रदान की गई।
  • इस अधिनियम ने कार्यपालिका और न्यायपालिका के अधिकार-क्षेत्र को अधिक स्पष्ट किया तथा 1773 के रेग्यूलेटिंग एक्ट से उत्पन्न न्यायिक विवादों को कम करने का प्रयास किया।

• 1773 में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना का प्रावधान हुआ, जबकि 1781 में उसके अधिकार-क्षेत्र को सीमित और स्पष्ट किया गया। विशेष रूप से राजस्व मामले तथा सरकारी अधिकारियों के आधिकारिक कार्य सुप्रीम कोर्ट के अधिकार-क्षेत्र से बाहर कर दिए गए।

पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 : ब्रिटिश सरकार का राजनीतिक नियंत्रण मजबूत

  • पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 ने कंपनी के भारतीय प्रशासन पर ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण को और मजबूत किया। इसके द्वारा कंपनी के व्यापारिक और राजनीतिक कार्यों के बीच स्पष्ट अंतर किया गया।
  • ब्रिटिश सरकार को कंपनी के राजनीतिक मामलों पर प्रभावी नियंत्रण देने के लिए बोर्ड ऑफ कंट्रोल (Board of Control) की स्थापना की गई। इसमें 6 सदस्य होते थे और ये ब्रिटिश क्राउन द्वारा नियुक्त किए जाते थे।
  • बोर्ड ऑफ कंट्रोल को भारत के नागरिक, सैन्य और राजनीतिक मामलों पर नियंत्रण तथा निर्देश देने का अधिकार मिला, जबकि कंपनी के व्यापारिक मामलों का प्रबंधन कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के पास रहा।
  • इस प्रकार भारत के प्रशासन में दोहरे नियंत्रण (Dual Control) की व्यवस्था स्थापित हुई-कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स कंपनी के व्यापार और प्रशासनिक कार्यों से जुड़ा रहा तथा बोर्ड ऑफ कंट्रोल राजनीतिक मामलों पर प्रभावी नियंत्रण रखने लगा।
  • कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स भारत को आदेश और निर्देश भेज सकता था, लेकिन उन्हें बोर्ड ऑफ कंट्रोल द्वारा संशोधित या नियंत्रित किया जा सकता था। इस प्रकार कंपनी का राजनीतिक प्रशासन ब्रिटिश सरकार के अधीन होता गया।
  • महत्वपूर्ण और गोपनीय राजनीतिक मामलों, विशेषकर युद्ध, शांति और भारतीय शासकों के साथ संधि से संबंधित मामलों के लिए Secret Committee की व्यवस्था की गई।
  • भारत में कंपनी के अधीन आने वाले क्षेत्रों को पहली बार वैधानिक रूप से “British possessions in India” के रूप में ब्रिटिश राज्य की राजनीतिक व्यवस्था से जोड़ा गया। इससे कंपनी की संप्रभु भूमिका के बजाय ब्रिटिश सरकार की सर्वोच्चता अधिक स्पष्ट हुई।
  • कंपनी के भारतीय क्षेत्रों पर शासन का अधिकार कंपनी के पास बना रहा, लेकिन उसके राजनीतिक कार्यों पर अंतिम नियंत्रण ब्रिटिश सरकार के हाथों में चला गया। इस प्रकार कंपनी धीरे-धीरे ब्रिटिश सरकार की अधीनस्थ प्रशासनिक संस्था बनती गई।
  • इस अधिनियम के बाद भारत के शासन में दोहरे नियंत्रण की व्यवस्था 1858 तक बनी रही। 1858 में कंपनी शासन समाप्त होने के साथ ही यह व्यवस्था भी समाप्त हो गई।

• रेग्यूलेटिंग एक्ट, 1773 संसदीय नियंत्रण की शुरुआत। पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 → ब्रिटिश सरकार का राजनीतिक नियंत्रण मजबूत और Board of Control द्वारा दोहरे नियंत्रण की शुरुआत।

अधिनियम, 1786 : गवर्नर-जनरल की कार्यकारी शक्ति मजबूत

  • 1786 के अधिनियम का मुख्य उद्देश्य भारत में गवर्नर-जनरल की कार्यकारी शक्ति को मजबूत करना था।
  • इस अधिनियम के तहत गवर्नर-जनरल को आवश्यकता पड़ने पर अपनी परिषद के बहुमत के निर्णय को अस्वीकार करने की विशेष शक्ति दी गई, बशर्ते वह उस निर्णय की व्यक्तिगत जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हो।
  • गवर्नर-जनरल को कमांडर-इन-चीफ का पद भी धारण करने की अनुमति दी गई। लॉर्ड कॉर्नवालिस इस प्रावधान का प्रमुख उदाहरण थे।
  • इससे भारत में गवर्नर-जनरल की स्थिति और केंद्रीय कार्यपालिका अधिक शक्तिशाली हुई तथा प्रशासन में निर्णय लेने का केंद्रीकरण बढ़ा।
  • यह अधिनियम मुख्यतः कार्यपालिका को मजबूत करने के लिए जाना जाता है और पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा स्थापित नियंत्रण व्यवस्था को बनाए रखते हुए गवर्नर-जनरल के पद को अधिक प्रभावशाली बनाता है।

1786 का अधिनियम: गवर्नर-जनरल को विशेष अधिकार + कमांडर-इन-चीफ का पद। इसका संबंध विशेष रूप से लॉर्ड कॉर्नवालिस से जोड़ा जाता है।

चार्टर एक्ट, 1793 : कंपनी शासन का नवीनीकरण और प्रशासनिक नियंत्रण

  • ईस्ट इंडिया कंपनी के चार्टर को 20 वर्षों के लिए नवीनीकृत किया गया और कंपनी को भारत में अपने क्षेत्रों पर शासन जारी रखने का अधिकार दिया गया।
  • इस अधिनियम ने गवर्नर-जनरल और प्रांतीय गवर्नरों की परिषद के निर्णय को विशेष परिस्थितियों में अस्वीकार करने की शक्ति को स्पष्ट रूप से मान्यता दी। यह शक्ति पहले 1786 में लॉर्ड कॉर्नवालिस को विशेष रूप से दी गई थी।
  • गवर्नर-जनरल का अधीनस्थ प्रेसिडेंसियों पर नियंत्रण मजबूत किया गया। उसकी अनुपस्थिति में भी उसे बंगाल के बाहर रहते हुए अन्य प्रेसिडेंसियों को आदेश और निर्देश देने की शक्ति दी गई।
  • भारत में बनाए गए नियमों और विनियमों को व्यवस्थित करने के लिए नियमों की संहिताबद्ध व्यवस्था विकसित की गई तथा न्यायालयों को इन्हीं नियमों के आधार पर निर्णय देने की व्यवस्था की गई।
  • कंपनी की सिविल सेवाओं में नियुक्तियों को संबंधित प्रेसिडेंसी के कंपनी कर्मचारियों तक सीमित किया गया। इससे कंपनी की सिविल सेवा एक अधिक बंद और विशिष्ट सेवा के रूप में विकसित हुई।
  • कंपनी की सेवा में राइटर (Writer) के रूप में प्रवेश की अधिकतम आयु को बढ़ाकर 22 वर्ष किया गया।
  • Board of Control के सदस्यों और कर्मचारियों के वेतन तथा खर्चों का भुगतान भारत के राजस्व से करने की व्यवस्था की गई। इससे भारत के राजस्व पर ब्रिटिश नियंत्रण तंत्र का खर्च भी डाला गया।
  • कुल मिलाकर 1793 का अधिनियम किसी बड़े नए संवैधानिक परिवर्तन की तुलना में 1784 के बाद विकसित कंपनी शासन और ब्रिटिश नियंत्रण की व्यवस्था को जारी रखने तथा मजबूत करने वाला अधिनियम था।

चार्टर एक्ट, 1813 : कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार में कमी

  • ईस्ट इंडिया कंपनी का चार्टर 20 वर्षों के लिए नवीनीकृत किया गया।
  • कंपनी का भारत के साथ व्यापारिक एकाधिकार समाप्त कर दिया गया और भारतीय बाजार को अन्य ब्रिटिश व्यापारियों के लिए खोल दिया गया।
  • हालाँकि कंपनी का चाय के व्यापार और चीन के साथ व्यापार पर एकाधिकार जारी रखा गया।
  • इस अधिनियम ने पहली बार ब्रिटिश भारतीय क्षेत्रों पर ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्चता को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया। कंपनी को इन क्षेत्रों पर शासन जारी रखने का अधिकार मिला, लेकिन यह क्राउन की संप्रभुता के अधीन था।
  • कंपनी के व्यापारिक आय और क्षेत्रीय राजस्व के लिए अलग-अलग लेखे रखने की व्यवस्था की गई।
  • भारतीय शिक्षा के लिए पहली बार कंपनी के राजस्व से प्रति वर्ष कम से कम 1 लाख रुपये निर्धारित किए गए। इसका उद्देश्य साहित्य के पुनरुत्थान, भारतीय विद्वानों के प्रोत्साहन तथा विज्ञान के ज्ञान के प्रसार को बढ़ावा देना था।
  • ईसाई मिशनरियों को भारत में आने और धार्मिक तथा शैक्षिक गतिविधियाँ संचालित करने की अनुमति दी गई।
  • कंपनी के शासन में पहली बार शिक्षा के क्षेत्र में राज्य की जिम्मेदारी स्वीकार किए जाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा।
  • कंपनी की व्यापारिक भूमिका कमजोर होने के साथ उसका प्रशासनिक और राजनीतिक स्वरूप अधिक स्पष्ट होने लगा। आगे चलकर 1833 के चार्टर एक्ट ने इस प्रक्रिया को और आगे बढ़ाते हुए कंपनी के व्यापारिक कार्य पूरी तरह समाप्त कर दिए।
  • इस अधिनियम ने कंपनी के भारतीय प्रशासन पर ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण को और मजबूत किया तथा Board of Control की निगरानी संबंधी भूमिका को भी अधिक स्पष्ट किया।

चार्टर एक्ट, 1833 : प्रशासनिक और विधायी केंद्रीकरण

  • कंपनी के व्यापारिक कार्य पूरी तरह समाप्त कर दिए गए। कंपनी अब मुख्यतः भारत के प्रशासनिक शासन तक सीमित हो गई।
  • कंपनी की भारत में व्यापारिक गतिविधियों का पूर्ण अंत हुआ। इस प्रकार 1813 में शुरू हुई कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार की समाप्ति की प्रक्रिया 1833 में पूरी हुई।
  • बंगाल के गवर्नर-जनरल को भारत का गवर्नर-जनरल (Governor-General of India) बनाया गया। लॉर्ड विलियम बेंटिंक इस पद पर नियुक्त होने वाले प्रथम व्यक्ति थे।
  • भारत के प्रशासन और शासन से संबंधित सभी महत्वपूर्ण शक्तियाँ केंद्रीय सरकार के अधीन कर दी गईं। इससे भारत में प्रशासनिक केंद्रीकरण और मजबूत हुआ।
  • पहली बार भारत के लिए कानून बनाने की शक्ति किसी एक केंद्रीय प्राधिकारी-गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल-में निहित की गई। इस प्रकार भारत के लिए एकीकृत केंद्रीय विधायी व्यवस्था विकसित हुई।
  • मद्रास और बंबई की सरकारों की स्वतंत्र विधायी शक्तियाँ समाप्त कर दी गईं और पूरे ब्रिटिश भारत के लिए कानून बनाने का अधिकार केंद्रीय सरकार के पास आ गया।
  • गवर्नर-जनरल की परिषद में कानून बनाने के कार्य के लिए एक अतिरिक्त विधि सदस्य (Law Member) जोड़ा गया। थॉमस बैबिंगटन मैकॉले इस पद पर नियुक्त होने वाले प्रथम व्यक्ति थे।
  • विधि सदस्य को मुख्यतः विधायी कार्यों में भाग लेने का अधिकार था। इससे गवर्नर-जनरल की परिषद में विशेषीकृत विधायी कार्य को अलग पहचान मिली।
  • भारतीय कानूनों को व्यवस्थित और संहिताबद्ध करने के लिए प्रथम विधि आयोग (Law Commission) की स्थापना का प्रावधान किया गया। इसका उद्देश्य कानूनों के संकलन और संहिताकरण को आगे बढ़ाना था।
  • सरकारी सेवाओं में नियुक्ति के संबंध में यह सिद्धांत स्वीकार किया गया कि धर्म, जन्मस्थान, वंश या रंग के आधार पर किसी व्यक्ति को सरकारी पद से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि व्यवहार में इस सिद्धांत का पूर्ण पालन नहीं हुआ।
  • कंपनी के निदेशकों का भारत की स्थानीय सरकारों और प्रशासन पर पहले जैसा प्रत्यक्ष नियंत्रण सीमित होता गया तथा केंद्रीय प्रशासन अधिक प्रमुख हो गया।

चार्टर एक्ट, 1853 : विधायी पृथक्करण और प्रतियोगी प्रशासन की दिशा

  • कंपनी के चार्टर को पहले की तरह 20 वर्षों के लिए निश्चित अवधि में नवीनीकृत नहीं किया गया। कंपनी को भारत पर शासन जारी रखने की अनुमति तब तक दी गई, जब तक ब्रिटिश संसद अन्यथा निर्णय न ले। इससे कंपनी के शासन के भविष्य को अनिश्चित बनाया गया।
  • गवर्नर-जनरल की परिषद के कार्यकारी और विधायी कार्यों को अलग करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। इसके लिए परिषद में अतिरिक्त विधायी सदस्यों को शामिल किया गया।
  • केंद्रीय विधान परिषद का विस्तार किया गया और इसमें स्थानीय सरकारों तथा अन्य क्षेत्रों से प्रतिनिधियों को शामिल करने की व्यवस्था की गई। इससे विधायी कार्य में प्रतिनिधित्व का तत्व बढ़ा।
  • गवर्नर-जनरल की परिषद में छह अतिरिक्त सदस्यों को विधायी कार्यों के लिए शामिल किया गया। इस प्रकार विधायी परिषद ने एक अलग स्वरूप ग्रहण किया।
  • सिविल सेवा में खुली प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से नियुक्ति के सिद्धांत को स्वीकार किया गया। इससे कंपनी की सिविल सेवा में नियुक्ति को योग्यता आधारित चयन की दिशा मिली।
  • भारतीयों के लिए सिविल सेवा में प्रवेश पर किसी वैधानिक जातीय प्रतिबंध का सिद्धांततः निषेध था, लेकिन प्रतियोगी परीक्षा ब्रिटेन में होने के कारण व्यवहार में भारतीयों के लिए प्रवेश कठिन बना रहा।
  • बंगाल के लिए एक अलग लेफ्टिनेंट-गवर्नर नियुक्त करने की व्यवस्था की गई, जिससे गवर्नर-जनरल को पूरे भारत के शासन और केंद्रीय कार्यों पर अधिक ध्यान देने का अवसर मिला।
  • केंद्र और प्रांतीय प्रशासन के बीच विधायी कार्यों को अधिक व्यवस्थित करने तथा केंद्रीय विधान व्यवस्था को विकसित करने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम था।

भारत शासन अधिनियम, 1858 : कंपनी शासन का अंत और क्राउन शासन की शुरुआत

  • 1858 के भारत शासन अधिनियम द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया गया और भारत का प्रशासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दिया गया।
  • कंपनी की कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स और बोर्ड ऑफ कंट्रोल जैसी संस्थाएँ समाप्त कर दी गईं। कंपनी के माध्यम से शासन करने की व्यवस्था का अंत हुआ।
  • भारत के प्रशासन के लिए ब्रिटिश मंत्रिमंडल में एक नए पद Secretary of State for India (भारत सचिव) का सृजन किया गया। उसे भारत के प्रशासन पर व्यापक नियंत्रण दिया गया।
  • भारत सचिव की सहायता के लिए 15 सदस्यों वाली Council of India बनाई गई। इसके अधिकांश सदस्य ऐसे थे जिन्हें पूर्व में भारत में प्रशासनिक अनुभव प्राप्त था।
  • भारत सचिव ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था और भारत से संबंधित महत्वपूर्ण मामलों पर ब्रिटिश सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित हुआ।
  • भारत में कंपनी के गवर्नर-जनरल को अब वायसराय (Viceroy) के रूप में भी मान्यता मिली। लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वायसराय बने।
  • इस अधिनियम के बाद भारत का प्रशासन “ब्रिटिश भारत” के रूप में सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन संचालित होने लगा।
  • भारत शासन से संबंधित कंपनी की सभी संपत्तियाँ, अधिकार और दायित्व ब्रिटिश क्राउन को हस्तांतरित कर दिए गए।
  • ब्रिटिश क्राउन की ओर से 1858 की महारानी की घोषणा जारी की गई, जिसमें भारतीय प्रजा के प्रति धार्मिक सहिष्णुता, देशी रियासतों के अधिकारों के सम्मान तथा सरकारी सेवाओं में समान अवसर का आश्वासन दिया गया।
  • इस अधिनियम के साथ भारत के संवैधानिक विकास में कंपनी शासन से क्राउन शासन का संक्रमण हुआ। इसके बाद के संवैधानिक सुधार मुख्यतः ब्रिटिश क्राउन के अधीन भारतीय प्रशासन और भारतीयों की क्रमिक राजनीतिक भागीदारी से संबंधित रहे।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 : भारतीयों की सीमित विधायी भागीदारी

  • इस अधिनियम द्वारा वायसराय की कार्यकारी परिषद में विभागों के आधार पर कार्य-विभाजन की व्यवस्था को वैधानिक आधार मिला। इसी से भारत में पोर्टफोलियो प्रणाली को औपचारिक रूप मिला।
  • वायसराय को अपनी कार्यकारी परिषद के कार्यों को अलग-अलग सदस्यों के बीच विभाजित करने तथा शासन के कार्यों को अधिक व्यवस्थित ढंग से संचालित करने की शक्ति मिली।
  • वायसराय की विधायी परिषद का विस्तार किया गया और पहली बार कुछ भारतीय गैर-सरकारी सदस्यों को नामित करके विधायी प्रक्रिया में शामिल करने का रास्ता खुला।
  • इससे भारतीयों की विधायी भागीदारी की शुरुआत हुई, हालांकि यह भागीदारी नामांकन पर आधारित थी और वास्तविक सत्ता ब्रिटिश अधिकारियों के हाथों में ही रही।
  • मद्रास और बंबई की विधायी शक्तियों को पुनः बहाल किया गया, जिन्हें 1833 के चार्टर एक्ट द्वारा समाप्त कर दिया गया था। इससे विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया फिर शुरू हुई।
  • अन्य प्रांतों में भी आवश्यकता के अनुसार विधायी परिषदें गठित करने की दिशा खुली, जिससे प्रांतीय विधायी संस्थाओं के विकास का आधार तैयार हुआ।
  • वायसराय को आपातकाल में अध्यादेश (Ordinance) जारी करने की शक्ति दी गई। ऐसा अध्यादेश अधिकतम 6 महीने तक प्रभावी रह सकता था।
  • वायसराय को परिषद के कार्यों के संचालन के लिए नियम और आदेश बनाने की शक्ति दी गई। इसी आधार पर पोर्टफोलियो प्रणाली व्यवस्थित रूप से विकसित हुई।
  • इस अधिनियम ने 1833 में किए गए अत्यधिक केंद्रीकरण को कुछ हद तक कम किया और केंद्र तथा प्रांतों के बीच विधायी शक्तियों के विकेंद्रीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया।

• 1861 : भारतीयों की नामित विधायी भागीदारी + पोर्टफोलियो प्रणाली को वैधानिक आधार + मद्रास-बंबई की विधायी शक्तियों की पुनर्स्थापना + वायसराय की अध्यादेश शक्ति + विकेंद्रीकरण की शुरुआत।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 : प्रतिनिधित्व और विधायी अधिकारों का विस्तार

  • भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 ने केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान परिषदों की सदस्य संख्या में वृद्धि की और भारतीयों की विधायी भागीदारी को 1861 की तुलना में विस्तृत किया।
  • इस अधिनियम द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन के सिद्धांत को सीमित रूप में स्वीकार किया गया। विभिन्न स्थानीय संस्थाओं और संगठनों को परिषद के सदस्यों के चयन के लिए सिफारिश करने का अधिकार दिया गया।
  • अधिनियम में “निर्वाचन” (Election) शब्द का स्पष्ट प्रयोग नहीं किया गया था। सदस्यों की नियुक्ति औपचारिक रूप से नामांकन के माध्यम से होती थी, लेकिन नामांकन संबंधित संस्थाओं की सिफारिश पर आधारित होने लगा।
  • केंद्रीय विधान परिषद में सरकारी सदस्यों का बहुमत बनाए रखा गया, जबकि प्रांतीय परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या बढ़ाने की अनुमति दी गई।
  • विधायी परिषदों के सदस्यों को पहली बार वार्षिक बजट पर चर्चा करने का अधिकार मिला। हालांकि वे बजट की किसी मद को स्वीकृत या अस्वीकार नहीं कर सकते थे।
  • सदस्यों को सार्वजनिक हित के विषयों पर प्रश्न पूछने की अनुमति दी गई। लेकिन प्रश्न पूछने के लिए पूर्व सूचना आवश्यक थी और पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं था।
  • विधायी परिषदों के सदस्यों की भूमिका केवल कानून बनाने तक सीमित न रहकर सरकार के कार्यों पर चर्चा और सीमित आलोचना करने तक विस्तृत हुई।
  • यह अधिनियम भारतीयों को शासन में प्रतिनिधित्व देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था, लेकिन कार्यपालिका को विधायिका के प्रति उत्तरदायी बनाने की व्यवस्था अभी नहीं हुई थी।
  • इस अधिनियम के बाद परिषदें केवल नामित सदस्यों की संस्थाएँ न रहकर सीमित प्रतिनिधिक संस्थाओं का रूप लेने लगीं। आगे चलकर 1909 के अधिनियम ने इसी प्रतिनिधित्व को अधिक स्पष्ट निर्वाचित रूप दिया।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 : निर्वाचित प्रतिनिधित्व और पृथक निर्वाचक मंडल

  • इस अधिनियम को मॉर्ले-मिंटो सुधार कहा जाता है। इसका नाम तत्कालीन भारत सचिव लॉर्ड मॉर्ले और वायसराय लॉर्ड मिंटो के नाम पर पड़ा।
  • पहली बार केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान परिषदों के सदस्यों के संबंध में निर्वाचन के सिद्धांत को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया।
  • केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान परिषदों की सदस्य संख्या में वृद्धि की गई, जिससे भारतीयों की विधायी भागीदारी पहले की अपेक्षा बढ़ी।
  • प्रांतीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत संभव हुआ, जबकि केंद्रीय विधान परिषद में सरकारी बहुमत बना रहा।
  • मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorates) की व्यवस्था लागू की गई। इसके तहत मुस्लिम मतदाता अपने समुदाय के प्रतिनिधियों का चुनाव करते थे। यह भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की औपचारिक शुरुआत थी।
  • प्रांतीय स्तर पर विभिन्न हित-समूहों और समुदायों के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था भी विस्तृत की गई तथा विधान परिषदों का स्वरूप पहले की अपेक्षा अधिक प्रतिनिधिक हुआ।
  • विधायी परिषदों के सदस्यों को बजट पर चर्चा करने तथा सार्वजनिक महत्व के विषयों पर प्रश्न पूछने के अधिक अवसर मिले।
  • केंद्र और प्रांतों की कार्यकारी परिषदों के विस्तार की व्यवस्था की गई। बंबई, मद्रास और बंगाल में कार्यकारी परिषदों के गठन/विस्तार का प्रावधान किया गया।
  • वायसराय तथा प्रांतीय गवर्नरों की परिषदों में उपाध्यक्ष (Vice-President) नियुक्त करने की व्यवस्था की गई।
  • इस अधिनियम ने भारतीयों को शासन में प्रतिनिधित्व तो बढ़ाया, लेकिन उत्तरदायी शासन स्थापित नहीं किया। कार्यपालिका अभी भी विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं थी।
  • अधिनियम द्वारा दिया गया मताधिकार सीमित था और चुनाव के लिए विभिन्न योग्यता एवं संपत्ति संबंधी शर्तें लागू थीं। इसलिए इसे सार्वभौमिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था नहीं माना जा सकता।

भारत सरकार अधिनियम, 1919 : द्वैध शासन और सीमित उत्तरदायित्व

  • इस अधिनियम को मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार के आधार पर लागू किया गया। इसका उद्देश्य भारत में उत्तरदायी शासन की दिशा में क्रमिक प्रगति करना था।
  • प्रांतीय स्तर पर पहली बार द्वैध शासन (Dyarchy) लागू किया गया। प्रांतीय विषयों को आरक्षित (Reserved) और हस्तांतरित (Transferred) विषयों में बाँटा गया।
  • हस्तांतरित विषय भारतीय मंत्रियों को सौंपे गए, जो विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी थे, जबकि आरक्षित विषय गवर्नर और उसकी कार्यकारी परिषद के नियंत्रण में रहे।
  • इस प्रकार भारतीयों को पहली बार प्रांतीय प्रशासन के कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रत्यक्ष कार्यकारी जिम्मेदारी मिली, लेकिन गवर्नर के पास व्यापक विशेष शक्तियाँ बनी रहीं।
  • केंद्र में पहली बार द्विसदनीय विधानमंडल की स्थापना की गई-काउंसिल ऑफ स्टेट और सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली।
  • केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान परिषदों के सदस्यों के लिए निर्वाचन का विस्तार किया गया और मताधिकार का दायरा 1909 की तुलना में बढ़ाया गया, हालांकि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार अभी नहीं था।
  • केंद्र और प्रांतों के विषयों को अलग करने के लिए केंद्रीय और प्रांतीय विषयों का विभाजन किया गया। इससे प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
  • प्रांतीय विधानमंडलों को अपने प्रांतीय विषयों पर कानून बनाने की अधिक शक्ति दी गई, हालांकि गवर्नर और गवर्नर-जनरल के पास व्यापक नियंत्रणकारी शक्तियाँ बनी रहीं।
  • केंद्र में कार्यपालिका को विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं बनाया गया। इसलिए 1919 का अधिनियम पूर्ण उत्तरदायी शासन के बजाय उसकी ओर एक सीमित संवैधानिक प्रयोग था।
  • अधिनियम में प्रांतीय स्वायत्तता के क्रमिक विकास और आगे संवैधानिक सुधार के लिए दस वर्ष बाद व्यवस्था की समीक्षा का प्रावधान किया गया। इसी समीक्षा के लिए बाद में साइमन कमीशन नियुक्त किया गया।
  • लोक सेवा आयोग (Public Service Commission) की स्थापना का प्रावधान किया गया, जिसे बाद में 1926 में स्थापित किया गया।
  • इस अधिनियम ने भारत के संवैधानिक विकास में प्रतिनिधित्व से आगे बढ़कर सीमित उत्तरदायी शासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम रखा, लेकिन वास्तविक सत्ता अभी भी ब्रिटिश कार्यपालिका के हाथों में रही।

भारत सरकार अधिनियम, 1935 : प्रांतीय स्वायत्तता और संघीय योजना

  • भारत सरकार अधिनियम, 1935 ब्रिटिश शासनकाल का सबसे व्यापक संवैधानिक अधिनियम था। इसका उद्देश्य भारत की शासन-व्यवस्था में व्यापक संस्थागत परिवर्तन करना था।
  • प्रांतों में लागू द्वैध शासन समाप्त कर दिया गया और उसके स्थान पर प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy) स्थापित की गई।
  • प्रांतीय मंत्रियों को अपने विभागों का प्रशासन करने के लिए अधिक अधिकार दिए गए और प्रांतीय सरकारें विधानमंडलों के प्रति अधिक उत्तरदायी बनाई गईं।
  • भारत के लिए संघीय शासन (Federation of India) स्थापित करने की योजना बनाई गई, जिसमें ब्रिटिश भारतीय प्रांतों और देशी रियासतों को शामिल किया जाना था। हालांकि यह संघीय व्यवस्था व्यवहार में लागू नहीं हो सकी।
  • केंद्र और प्रांतों के बीच विधायी शक्तियों के विभाजन के लिए तीन सूचियाँ बनाई गईं-संघीय सूची, प्रांतीय सूची और समवर्ती सूची। इससे भारतीय शासन में शक्तियों के संवैधानिक विभाजन को व्यवस्थित आधार मिला।
  • प्रांतों में द्विसदनीय विधानमंडल की व्यवस्था का विस्तार किया गया और कुछ प्रांतों में दो सदनों वाली विधानसभाएँ स्थापित की गईं।
  • मताधिकार का विस्तार किया गया और पहले की अपेक्षा अधिक भारतीयों को चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर मिला, लेकिन सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार अभी स्थापित नहीं हुआ था।
  • अधिनियम के तहत फेडरल कोर्ट (Federal Court) की स्थापना की गई। यह केंद्र और प्रांतों के बीच संवैधानिक विवादों की सुनवाई तथा अधिनियम की व्याख्या से संबंधित मामलों में महत्वपूर्ण न्यायिक संस्था बनी।
  • फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन तथा प्रांतीय लोक सेवा आयोगों की व्यवस्था की गई, जिससे लोक सेवाओं की भर्ती के लिए संवैधानिक संस्थागत ढाँचा विकसित हुआ।
  • अधिनियम ने केंद्र में भी संघीय कार्यपालिका और विधायिका की व्यापक व्यवस्था प्रस्तावित की, लेकिन संघीय भाग लागू न होने के कारण इसका केंद्रीय संघीय ढाँचा व्यवहार में स्थापित नहीं हो सका।
  • प्रांतीय स्वायत्तता लागू होने के बाद 1937 के प्रांतीय चुनाव हुए और निर्वाचित दलों ने कई प्रांतों में सरकारें बनाई।
  • गवर्नरों को विशेष विवेकाधीन और विशेष उत्तरदायित्व संबंधी शक्तियाँ प्राप्त थीं। इसलिए प्रांतीय स्वायत्तता के बावजूद ब्रिटिश नियंत्रण पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था।
  • यह अधिनियम भारत के संवैधानिक विकास में प्रांतीय स्वायत्तता, संघीय ढाँचे, शक्तियों के विभाजन और न्यायिक संघवाद की दिशा में महत्वपूर्ण चरण बना। इसके अनेक संस्थागत तत्व बाद में भारतीय संविधान में भी दिखाई देते हैं।

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 : ब्रिटिश शासन का अंत और सत्ता का हस्तांतरण

  • भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ब्रिटिश संसद द्वारा 18 जुलाई 1947 को पारित किया गया। इसके द्वारा 15 अगस्त 1947 से भारत में भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र डोमिनियन स्थापित किए गए।
  • अधिनियम के साथ ब्रिटिश शासन का अंत हुआ और भारत तथा पाकिस्तान को अपने-अपने शासन के लिए स्वतंत्र विधायी अधिकार प्राप्त हुए।
  • भारत का विभाजन किया गया और बंगाल तथा पंजाब को क्रमशः पूर्वी बंगाल–पश्चिमी बंगाल तथा पश्चिमी पंजाब–पूर्वी पंजाब में विभाजित किया गया।
  • दोनों डोमिनियनों के लिए अलग-अलग गवर्नर-जनरल की व्यवस्था की गई। गवर्नर-जनरल ब्रिटिश क्राउन का प्रतिनिधि होता था।
  • भारत और पाकिस्तान की संविधान सभाओं को अपने-अपने डोमिनियन के लिए कानून बनाने की पूर्ण शक्ति दी गई तथा उन्हें संविधान निर्माण के साथ विधायिका के रूप में भी कार्य करने का अधिकार मिला।
  • अधिनियम के बाद ब्रिटिश संसद का भारत पर कोई विधायी अधिकार नहीं रहा और ब्रिटिश सरकार की भारत के शासन के संबंध में जिम्मेदारी समाप्त हो गई।
  • भारतीय रियासतों पर ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्चता (Suzerainty) समाप्त कर दी गई। इसके साथ ब्रिटिश सरकार और देशी रियासतों के बीच विद्यमान संधियाँ और समझौते समाप्त हो गए।
  • अंतरिम व्यवस्था के रूप में दोनों डोमिनियन में भारत सरकार अधिनियम, 1935 को आवश्यक संशोधनों के साथ शासन का आधार बनाए रखने की व्यवस्था की गई, जब तक नई संविधान सभा अपनी संवैधानिक व्यवस्था लागू न कर दे।
  • भारतीय संविधान सभा को ब्रिटिश संसद से संविधान की स्वीकृति लेने की आवश्यकता नहीं रही। वह स्वयं भारत के संविधान का निर्माण करने वाली सर्वोच्च संवैधानिक संस्था बनी।
  • भारत स्वतंत्र होने के बाद भी तत्काल डोमिनियन बना रहा और ब्रिटिश क्राउन से संवैधानिक संबंध बना रहा। यह संबंध 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने और भारत के गणराज्य बनने के साथ समाप्त हुआ।

1773 से 1947 तक संवैधानिक विकास : संक्षेप में

अधिनियम (वर्ष) संवैधानिक महत्व
रेग्यूलेटिंग एक्ट (1773) भारत में कंपनी शासन पर ब्रिटिश संसद के प्रत्यक्ष नियंत्रण का पहला महत्वपूर्ण कदम।
संशोधन अधिनियम (1781) 1773 की न्यायिक एवं प्रशासनिक अस्पष्टताओं को दूर करने का प्रयास।
पिट्स इंडिया एक्ट (1784) भारतीय राजनीतिक मामलों पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण मजबूत हुआ।
चार्टर एक्ट (1786) भारत में केंद्रीय कार्यपालिका के केंद्रीकरण को बल मिला।
चार्टर एक्ट (1793) पूर्ववर्ती कंपनी शासन की व्यवस्था को आगे बढ़ाया गया।
चार्टर एक्ट (1813) कंपनी के व्यापारिक स्वरूप के कमजोर होने की शुरुआत।
चार्टर एक्ट (1833) कंपनी का रूप मुख्यतः प्रशासनिक संस्था में परिवर्तित। विधायी केंद्रीकरण।
चार्टर एक्ट (1853) केंद्रीय विधायिका के विकास और कंपनी शासन के अंतिम चरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम।
भारत शासन अधिनियम (1858) कंपनी शासन का अंत और क्राउन शासन की शुरुआत।
भारतीय परिषद अधिनियम (1861) भारत में प्रतिनिधिक संस्थाओं और विकेंद्रीकरण की प्रारंभिक दिशा।
भारतीय परिषद अधिनियम (1892) अप्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व और विधायी भागीदारी का विस्तार।
भारतीय परिषद अधिनियम (1909)
मॉर्ले-मिंटो सुधार
प्रतिनिधित्व का विस्तार, लेकिन साथ ही सांप्रदायिक निर्वाचन की शुरुआत।
भारत शासन अधिनियम (1919)
मॉण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार
उत्तरदायी शासन की दिशा में प्रांतीय स्तर पर प्रारंभिक प्रयोग।
भारत शासन अधिनियम (1935) ब्रिटिश काल का सबसे व्यापक संवैधानिक अधिनियम। आगे के भारतीय संविधान पर महत्वपूर्ण प्रभाव।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (1947) औपनिवेशिक शासन का संवैधानिक अंत।

गवर्नर-जनरल / वायसराय से सम्बंधित प्रमुख घटनाएं

अधिनियम (वर्ष) तत्कालीन गवर्नर-जनरल / वायसराय प्रमुख घटना / महत्व
रेग्यूलेटिंग एक्ट (1773) वारेन हेस्टिंग्स (1772–1785) • ब्रिटिश संसद द्वारा कंपनी के शासन पर प्रत्यक्ष नियंत्रण की शुरुआत।
• प्रथम बार कंपनी के शासन हेतु लिखित संविधान
• बंगाल के गवर्नर को गवर्नर-जनरल ऑफ बंगाल का पद।
• कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना का प्रावधान।
एक्ट ऑफ सेटिलमेंट (1781) वारेन हेस्टिंग्स (1772–1785) • सुप्रीम कोर्ट और गवर्नर-जनरल की परिषद के अधिकार-क्षेत्र की स्पष्टता।
• सरकारी अधिकारियों के आधिकारिक कार्य सुप्रीम कोर्ट के अधिकार-क्षेत्र से बाहर।
• राजस्व संबंधी मामले सुप्रीम कोर्ट के अधिकार-क्षेत्र से बाहर।
पिट्स इंडिया एक्ट (1784) वारेन हेस्टिंग्स (1772–1785) • Board of Control की स्थापना।
• कंपनी के राजनीतिक मामलों पर ब्रिटिश सरकार का प्रभावी नियंत्रण।
• दोहरे नियंत्रण (Dual Control) की व्यवस्था।
अधिनियम (1786) लॉर्ड कॉर्नवालिस (1786–1793) • गवर्नर-जनरल को विशेष परिस्थितियों में परिषद के निर्णय को अस्वीकार करने की शक्ति।
• गवर्नर-जनरल को कमांडर-इन-चीफ का पद धारण करने की अनुमति।
• केंद्रीय कार्यपालिका में गवर्नर-जनरल की स्थिति मजबूत।
चार्टर एक्ट (1793) लॉर्ड कॉर्नवालिस (1786–1793) • कंपनी का चार्टर 20 वर्षों के लिए नवीनीकृत।
• गवर्नर-जनरल का अधीनस्थ प्रेसिडेंसियों पर नियंत्रण मजबूत।
• Board of Control के सदस्यों और कर्मचारियों के खर्च का भार भारतीय राजस्व पर।
चार्टर एक्ट (1813) लॉर्ड मिंटो प्रथम (1807–1813) • भारत के साथ कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त।
• चाय और चीन के साथ व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार कायम।
• शिक्षा के लिए ₹1 लाख वार्षिक का प्रावधान।
• ईसाई मिशनरियों को भारत में धार्मिक एवं शैक्षिक गतिविधियों की अनुमति।
चार्टर एक्ट (1833) लॉर्ड विलियम बेंटिंक (1828–1835) • कंपनी के सभी व्यापारिक कार्य समाप्त।
• बंगाल के गवर्नर-जनरल को भारत का गवर्नर-जनरल बनाया गया।
• भारत के लिए केंद्रीय विधायी शक्ति का विकास और मद्रास-बंबई की स्वतंत्र विधायी शक्ति में कमी।
• प्रथम विधि आयोग और प्रथम विधि सदस्य मैकॉले।
चार्टर एक्ट (1853) लॉर्ड डलहौजी (1848–1856) • गवर्नर-जनरल की परिषद के कार्यकारी और विधायी कार्यों के पृथक्करण की दिशा।
• केंद्रीय विधान परिषद में अतिरिक्त विधायी सदस्यों की व्यवस्था।
• सिविल सेवा में खुली प्रतियोगी परीक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम।
• अंतिम चार्टर एक्ट। चार्टर के निश्चित 20-वर्षीय नवीनीकरण की परंपरा समाप्त।
भारत शासन अधिनियम (1858) लॉर्ड कैनिंग (1856–1862) • ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त।
• भारत पर ब्रिटिश क्राउन का प्रत्यक्ष शासन।
• भारत सचिव और Council of India की स्थापना।
• गवर्नर-जनरल को वायसराय के रूप में क्राउन का प्रतिनिधि बनाया गया।
भारतीय परिषद अधिनियम (1861) लॉर्ड कैनिंग (1856–1862) • भारतीयों की नामित विधायी भागीदारी की शुरुआत।
• पोर्टफोलियो प्रणाली को वैधानिक आधार।
• मद्रास और बंबई की विधायी शक्तियों की पुनर्स्थापना।
• केंद्रीयकरण के बाद विकेंद्रीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम।
• वायसराय को अध्यादेश जारी करने की शक्ति।
भारतीय परिषद अधिनियम (1892) लॉर्ड लैंसडाउन (1888–1894) • विधान परिषदों की सदस्य संख्या में वृद्धि।
• अप्रत्यक्ष निर्वाचन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम।
• सदस्यों को बजट पर चर्चा का अधिकार।
• सार्वजनिक विषयों पर प्रश्न पूछने का सीमित अधिकार।
• कार्यपालिका को विधायिका के प्रति उत्तरदायी बनाने की व्यवस्था नहीं।
भारतीय परिषद अधिनियम (1909) लॉर्ड मिंटो द्वितीय (1905–1910) • मॉर्ले-मिंटो सुधार।
• केंद्रीय तथा प्रांतीय परिषदों में निर्वाचित प्रतिनिधित्व का विस्तार।
• मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल।
• केंद्रीय विधान परिषद में सरकारी बहुमत कायम।
• परिषदों के सदस्यों को प्रश्न, पूरक प्रश्न और बजट पर चर्चा की अधिक सुविधा।
भारत सरकार अधिनियम (1919) लॉर्ड चेम्सफोर्ड (1916–1921) • मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार।
• प्रांतों में द्वैध शासन (Dyarchy)। आरक्षित और हस्तांतरित विषय।
• केंद्र में द्विसदनीय विधानमंडल।
• केंद्र और प्रांतों के बीच विषयों का विभाजन।
• लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान।
• मताधिकार का सीमित विस्तार।
भारत सरकार अधिनियम (1935) लॉर्ड विलिंगडन (1931–1936) • प्रांतों में द्वैध शासन की समाप्ति और प्रांतीय स्वायत्तता की स्थापना।
• ब्रिटिश भारतीय प्रांतों और देशी रियासतों को मिलाकर संघीय व्यवस्था स्थापित करने की योजना।
• शक्तियों के विभाजन के लिए संघीय, प्रांतीय और समवर्ती सूचियों की व्यवस्था।
• संवैधानिक विवादों के निपटारे के लिए फेडरल कोर्ट की व्यवस्था।
• कुछ प्रांतों में द्विसदनीय विधानमंडल।
• निर्वाचक मंडल और मताधिकार का व्यापक विस्तार।
• प्रांतीय स्तर पर उत्तरदायी शासन का अधिक व्यापक स्वरूप।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (1947) लॉर्ड माउंटबेटन (1947) • 15 अगस्त 1947 से भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र डोमिनियन।
• भारत में ब्रिटिश शासन और ब्रिटिश संसद का संवैधानिक नियंत्रण समाप्त।
• भारत का विभाजन तथा पंजाब और बंगाल का विभाजन।
• दोनों डोमिनियनों की संविधान सभाओं को विधायी एवं संविधान-निर्माण की शक्ति।
• देशी रियासतों पर ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्चता समाप्त।
• भारत सरकार अधिनियम, 1935 को अंतरिम संवैधानिक आधार के रूप में जारी रखने की व्यवस्था।

अन्य प्रमुख संवैधानिक प्रस्ताव, योजनाएँ और समझौते

➣ 1773 से 1947 के बीच भारत के संवैधानिक विकास को केवल ब्रिटिश संसद द्वारा पारित अधिनियमों से नहीं समझा जा सकता। कई महत्वपूर्ण घोषणाओं, आयोगों, संवैधानिक प्रस्तावों, सम्मेलनों और राजनीतिक समझौतों ने भी भारत की भावी शासन-व्यवस्था की दिशा निर्धारित की।

➣ इनमें कुछ पहल ब्रिटिश सरकार की ओर से थीं, जबकि कुछ भारतीय नेताओं द्वारा प्रस्तुत संवैधानिक प्रस्ताव या आपसी समझौते थे। इनका प्रत्यक्ष प्रभाव बाद के संवैधानिक सुधारों और अंततः भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 की पृष्ठभूमि पर पड़ा।

➣ नीचे दिए गए सभी पड़ाव अधिनियम नहीं हैं। इन्हें केवल उनके संवैधानिक प्रभाव और परीक्षा की दृष्टि से महत्व के आधार पर संक्षेप में दिया गया है। इनके विस्तृत विवरण के लिए संबंधित स्वतंत्र अध्याय देखें।

प्रस्ताव / घटना (वर्ष) प्रमुख व्यक्ति / संस्था प्रमुख घटना / संवैधानिक महत्व
मॉन्टेग्यू घोषणा (1917) एडविन मॉन्टेग्यू
भारत सचिव
• भारत में उत्तरदायी शासन की दिशा में क्रमिक विकास को ब्रिटिश नीति का लक्ष्य घोषित किया।
• भारतीयों की शासन में बढ़ती भागीदारी के लिए संवैधानिक सुधारों की आधारभूमि तैयार।
साइमन कमीशन (1927) सर जॉन साइमन
अध्यक्ष
• भारत सरकार अधिनियम, 1919 के कार्यान्वयन की समीक्षा के लिए आयोग।
• आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं।
• भारतीय विरोध के कारण संवैधानिक सुधारों में भारतीय भागीदारी का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण।
नेहरू रिपोर्ट (1928) मोतीलाल नेहरू
अध्यक्ष, सर्वदलीय समिति
• भारतीय नेताओं द्वारा प्रस्तुत भारत के भावी संविधान की प्रारूप-रूपरेखा।
• डोमिनियन स्टेटस को तत्कालीन संवैधानिक लक्ष्य के रूप में स्वीकार।
• संयुक्त निर्वाचक मंडल और मौलिक अधिकारों पर जोर।
• भारतीयों द्वारा स्वयं संवैधानिक प्रारूप प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण प्रयास।
इर्विन घोषणा (1929) लॉर्ड इर्विन
वायसराय
• भारत के लिए डोमिनियन स्टेटस को संवैधानिक विकास का अंतिम लक्ष्य मानने की ब्रिटिश सरकार की नीति की पुनर्पुष्टि।
• आगे गोलमेज सम्मेलन की दिशा में संवैधानिक वार्ता का आधार।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930–31) ब्रिटिश सरकार
प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड
• भारत के भावी संविधान पर संघीय व्यवस्था, अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व और प्रांतीय स्वायत्तता पर चर्चा।
• कांग्रेस ने सम्मेलन का बहिष्कार किया।
• भारतीय रियासतों और ब्रिटिश भारतीय प्रांतों को मिलाकर संघीय ढाँचे का विचार आगे बढ़ा।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) रैम्ज़े मैकडोनाल्ड
ब्रिटिश प्रधानमंत्री
• कांग्रेस की ओर से महात्मा गांधी ने भाग लिया।
• अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व, संघीय व्यवस्था और उत्तरदायी शासन पर मतभेद।
• संवैधानिक प्रश्नों पर भारतीय राजनीतिक समूहों के बीच सहमति का अभाव स्पष्ट।
तृतीय गोलमेज सम्मेलन (1932) रैम्ज़े मैकडोनाल्ड
ब्रिटिश प्रधानमंत्री
• भारत के भावी संवैधानिक ढाँचे पर आगे विचार-विमर्श।
• कांग्रेस की अनुपस्थिति में संघीय योजना और संवैधानिक सुधारों पर चर्चा।
• आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1935 की संवैधानिक पृष्ठभूमि।
सांप्रदायिक निर्णय / कम्यूनल अवॉर्ड (1932) रैम्ज़े मैकडोनाल्ड
ब्रिटिश प्रधानमंत्री
• विभिन्न समुदायों के लिए प्रतिनिधित्व और पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था का विस्तार।
• दलित वर्गों के लिए भी पृथक निर्वाचक मंडल का प्रावधान।
• इसी व्यवस्था के विरोध और वार्ता के परिणामस्वरूप पूना पैक्ट सामने आया।
पूना पैक्ट (1932) महात्मा गांधी और डॉ. बी.आर. आंबेडकर • दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल के स्थान पर संयुक्त निर्वाचक मंडल स्वीकार।
• प्रांतीय विधानसभाओं में आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाकर 148।
• प्रतिनिधित्व के प्रश्न में आरक्षण + संयुक्त निर्वाचन की व्यवस्था का महत्वपूर्ण प्रारंभ।
अगस्त प्रस्ताव (1940) लॉर्ड लिनलिथगो
वायसराय
• युद्ध के बाद भारतीयों को अपना संविधान बनाने का अधिकार देने की दिशा में प्रस्ताव।
• वायसराय की कार्यकारिणी और युद्ध सलाहकार परिषद में भारतीय प्रतिनिधित्व बढ़ाने का प्रस्ताव।
• कांग्रेस ने प्रस्ताव को अपर्याप्त माना।
क्रिप्स प्रस्ताव / क्रिप्स मिशन (1942) सर स्टैफर्ड क्रिप्स
ब्रिटिश सरकार
• युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस देने का प्रस्ताव।
• भारतीयों द्वारा संविधान सभा के माध्यम से संविधान निर्माण की योजना।
• प्रांतों को प्रस्तावित संघ से अलग रहने की संभावना का प्रावधान।
• कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों को प्रस्ताव स्वीकार्य नहीं।
वेवेल योजना / शिमला सम्मेलन (1945) लॉर्ड वेवेल
वायसराय
• वायसराय की कार्यकारिणी में भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाने और लगभग पूरी तरह भारतीय कार्यकारिणी बनाने का प्रस्ताव।
• कार्यकारिणी में हिंदू और मुसलमानों के प्रतिनिधित्व पर सहमति का प्रयास।
• कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर सहमति न बनने से योजना विफल।
कैबिनेट मिशन योजना (1946) पैथिक-लॉरेंस, स्टैफर्ड क्रिप्स, ए.वी. एलेक्जेंडर
वायसराय लॉर्ड वेवेल
• भारत के लिए संविधान सभा के गठन की योजना।
• ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों को मिलाकर भारतीय संघ की परिकल्पना।
• केंद्र के पास मुख्यतः रक्षा, विदेश मामले और संचार जैसे सीमित विषय।
• प्रांतों को समूहों में संगठित करने का प्रस्ताव।
• सत्ता के संवैधानिक हस्तांतरण की अंतिम प्रक्रिया का प्रमुख आधार।
माउंटबेटन योजना / 3 जून योजना (1947) लॉर्ड माउंटबेटन
वायसराय
• भारत के विभाजन और दो स्वतंत्र डोमिनियन के गठन की योजना।
• पंजाब और बंगाल के विभाजन का प्रावधान।
• सत्ता हस्तांतरण को 15 अगस्त 1947 तक पूरा करने की दिशा।
• आगे भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 का आधार।

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