चार्टर एक्ट, 1793 : परिचय
➣ चार्टर एक्ट, 1793 (जिसे ईस्ट इंडिया कंपनी एक्ट, 1793 के नाम से भी जाना जाता है) ब्रिटिश संसद द्वारा पारित वह अधिनियम था, जिसके माध्यम से ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत तथा पूर्व के साथ व्यापार करने और भारतीय क्षेत्रों पर शासन करने के अधिकार को अगले 20 वर्षों (1793-1813) के लिए नवीनीकृत किया गया।
➣ यह अधिनियम ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम पिट (कनिष्ठ) के कार्यकाल में पारित हुआ और इसने पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 के बाद बनी द्वैध-नियंत्रण की प्रशासनिक व्यवस्था को बिना किसी बड़े बदलाव के आगे जारी रखा। कंपनी के शासन को तत्काल समाप्त करने के बजाय उसकी मौजूदा व्यवस्था को कुछ और समय के लिए बनाए रखा गया।
➣ भारतीय संवैधानिक विकास की दृष्टि से यह कोई क्रांतिकारी परिवर्तन वाला अधिनियम नहीं था, परंतु यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने कंपनी के शासन और व्यापारिक अधिकारों को अगले चरण तक जारी रखते हुए गवर्नर-जनरल की शक्तियों, बोर्ड ऑफ कंट्रोल और प्रशासनिक ढाँचे को अधिक स्पष्ट रूप दिया। इसी कारण इसे भारत में ब्रिटिश शासन के क्रमिक संवैधानिक विकास की एक कड़ी माना जाता है।
➣ यद्यपि 1773, 1781, 1784 और 1786 के अधिनियम भी कंपनी के चार्टर से जुड़े हुए थे, परंतु चार्टर एक्ट नाम से जानी जाने वाली शृंखला औपचारिक रूप से 1793 से ही शुरू होती है।
➣ इसके बाद 1813, 1833 एवं 1853 के अधिनियम भी इसी नाम से जाने गए, क्योंकि इनका मुख्य उद्देश्य कंपनी के व्यापारिक चार्टर का समय-समय पर नवीनीकरण करना था।
आधिकारिक उद्धरण – 33 Geo. 3, c. 52; राजस्वीकृति एवं प्रवर्तन – 11 जून, 1793। यह अधिनियम 1786 के ईस्ट इंडिया कंपनी अधिनियम को निरस्त करता था तथा स्वयं अंततः भारत शासन अधिनियम, 1915 द्वारा निरस्त हुआ।
चार्टर एक्ट, 1793 की पृष्ठभूमि
पूर्ववर्ती चार्टर की समाप्ति और नवीनीकरण की आवश्यकता
➣ ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत तथा पूर्व के अन्य क्षेत्रों में व्यापार करने का अधिकार ब्रिटिश संसद द्वारा जारी चार्टर के माध्यम से प्राप्त होता था, जो स्थायी नहीं बल्कि एक निश्चित अवधि के लिए दिया जाता था।
➣ 1793 तक कंपनी का पिछला चार्टर अपनी अवधि के अंत के निकट पहुँच चुका था, इसलिए ब्रिटिश संसद के सामने यह प्रश्न था कि कंपनी के व्यापारिक एवं प्रशासनिक अधिकारों को किन शर्तों के साथ आगे जारी रखा जाए।
➣ उस समय तक ईस्ट इंडिया कंपनी केवल व्यापार करने वाली संस्था नहीं रह गई थी, बल्कि बंगाल, बिहार और उड़ीसा सहित भारत के बड़े भू-भाग पर शासन करते हुए विशाल राजस्व भी अर्जित कर रही थी। इसलिए उसके चार्टर का नवीनीकरण केवल व्यापारिक विषय न होकर भारत में ब्रिटिश शासन की आगे की व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ था।
कंपनी की बढ़ती शक्ति और ब्रिटिश नियंत्रण की आवश्यकता
➣ 18वीं शताब्दी के अंतिम दशकों तक कंपनी के निर्णयों का प्रभाव केवल व्यापार तक सीमित न रहकर भारत के बड़े भू-भाग के राजनीतिक, प्रशासनिक और आर्थिक जीवन पर पड़ने लगा था।
➣ इस बढ़ती शक्ति के कारण ब्रिटिश सरकार के लिए यह आवश्यक हो गया कि कंपनी के शासन पर संसदीय एवं क्राउन का नियंत्रण स्पष्ट और मजबूत बना रहे, ताकि कंपनी पूरी तरह स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति न बन जाए।
➣ इसी कारण 1793 में जब चार्टर के नवीनीकरण का प्रश्न आया, तब कंपनी के व्यापारिक अधिकारों के साथ-साथ उसके राजनीतिक एवं प्रशासनिक अधिकारों और उन पर ब्रिटिश नियंत्रण की व्यवस्था को भी ध्यान में रखा गया।
कॉर्नवालिस का प्रशासनिक अनुभव और सुदृढ़ीकरण की नीति
➣ लॉर्ड कॉर्नवालिस ने 1786 से 1793 तक गवर्नर-जनरल के रूप में कार्य किया, जिसमें स्थायी बंदोबस्त (1793) तथा कॉर्नवालिस कोड जैसे बड़े प्रशासनिक सुधार हुए।
➣ उनके कार्यकाल में, विशेषकर आंग्ल-मैसूर संघर्षों जैसी युद्ध-परिस्थितियों में, गवर्नर-जनरल को परिषद् के साथ मिलकर निर्णय लेने की व्यवस्था में शीघ्रता की कमी महसूस हुई।
➣ इसी अनुभव के आधार पर उन्हें 1786 में अपनी परिषद् के निर्णय को अस्वीकार करने की विशेष शक्ति दी गई थी (इसका विस्तृत विवरण आगे ‘गवर्नर-जनरल की शक्तियों में वृद्धि’ शीर्षक के अंतर्गत दिया गया है)।
➣ 1793 में ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य कंपनी के शासन को समाप्त करना नहीं, बल्कि पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 के बाद स्थापित नियंत्रण-व्यवस्था को मूल रूप से बनाए रखना था।
➣ इसी कारण चार्टर एक्ट, 1793 के माध्यम से कोई आमूल-चूल परिवर्तन नहीं किया गया, बल्कि पहले से चली आ रही व्यवस्थाओं को आगे बढ़ाते हुए जहाँ आवश्यक था वहाँ उन्हें अधिक स्पष्ट और मजबूत बना दिया गया।
➣ इसी कारण इस अधिनियम को भारत के संवैधानिक विकास में मुख्यतः एक सुदृढ़ीकरण अधिनियम के रूप में देखा जाता है – जैसा कि 1813 और 1833 के चार्टर एक्ट भी आगे चलकर बने।
| पूर्ण/वैकल्पिक नाम | ईस्ट इंडिया कंपनी एक्ट, 1793 |
| पारित होने की तिथि | राजस्वीकृति (Royal Assent) – 11 जून, 1793; आधिकारिक उद्धरण – 33 Geo. 3, c. 52; प्रवृत्त (Commencement) – 11 जून, 1793 |
| गवर्नर-जनरल | लॉर्ड कॉर्नवालिस (1786–1793) |
| कॉर्नवालिस के बाद | सर जॉन शोर ने गवर्नर-जनरल का पद संभाला। |
| प्रकृति | मुख्यतः सुदृढ़ीकरण अधिनियम (Consolidating Act)। |
| प्रमुख उद्देश्य | कंपनी की मौजूदा व्यापारिक, राजनीतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था को आगे जारी रखना और आवश्यक स्थानों पर उसे मजबूत करना। |
चार्टर एक्ट, 1793 के प्रमुख प्रावधान
व्यापारिक अधिकारों का नवीनीकरण
➣ चार्टर एक्ट, 1793 द्वारा कंपनी के चार्टर तथा उसके भारत एवं पूर्व के साथ व्यापार करने के एकाधिकार को अगले 20 वर्षों के लिए, अर्थात 1813 तक, बढ़ा दिया गया।
➣ इस व्यापारिक एकाधिकार का अर्थ था कि ब्रिटेन के अन्य स्वतंत्र व्यापारी कंपनी की अनुमति के बिना भारत के साथ प्रत्यक्ष रूप से व्यापार नहीं कर सकते थे।
➣ हालांकि, इस एकाधिकार में एक सीमित छूट भी दी गई। कंपनी को व्यक्तियों तथा अपने कर्मचारियों को लाइसेंस देकर सीमित रूप से व्यापार करने की अनुमति देने का अधिकार प्राप्त हुआ, जिसे कंट्री ट्रेड अथवा प्रिविलेज ट्रेड कहा जाता था।
➣ इसी व्यवस्था के अंतर्गत लाइसेंस-प्राप्त व्यापारियों द्वारा चीन को अफीम के निर्यात जैसे व्यापार को भी बढ़ावा मिला, जो आगे चलकर 19वीं शताब्दी में ब्रिटेन और चीन के बीच गंभीर तनाव का कारण बना।
➣ इस प्रकार चार्टर एक्ट, 1793 ने कंपनी के मूल व्यापारिक चरित्र और एकाधिकार को बनाए रखते हुए ही प्रशासनिक-राजनीतिक ढाँचे में कुछ परिवर्तन किए।
➣ व्यापारिक एकाधिकार में बड़ा परिवर्तन आगे चलकर चार्टर एक्ट, 1813 द्वारा किया गया, जिसके तहत सामान्य व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार समाप्त कर दिया गया, यद्यपि चाय तथा चीन के साथ व्यापार पर उसका एकाधिकार कुछ समय तक बना रहा।
कंपनी के लाभांश में वृद्धि
➣ ईस्ट इंडिया कंपनी एक संयुक्त-पूंजी व्यापारिक कंपनी थी, जिसके शेयरधारकों को लाभ में से लाभांश दिया जाता था।
➣ इससे पहले, 1781 के संशोधन अधिनियम के अंतर्गत यह व्यवस्था थी कि यदि कंपनी का लाभांश 8 प्रतिशत से अधिक हो, तो अतिरिक्त राशि का तीन-चौथाई भाग ब्रिटिश सरकार को और केवल एक-चौथाई भाग शेयरधारकों को मिलेगा। इस कारण 8 प्रतिशत को व्यावहारिक रूप से लाभांश की ऊपरी सीमा माना जाता था।
➣ 1790 के दशक तक कंपनी का व्यापार, क्षेत्रीय अधिकार तथा राजस्व काफी बढ़ चुके थे, जिससे शेयरधारकों की ओर से लाभांश की सीमा बढ़ाने की मांग तेज हुई।
➣ इसी पृष्ठभूमि में बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अध्यक्ष हेनरी डंडास ने प्रस्ताव रखा कि कंपनी प्रतिवर्ष ब्रिटिश सरकार को 5 लाख पाउंड की निश्चित राशि देने के बदले अपने शेयरधारकों को 10 प्रतिशत तक निश्चित लाभांश देने के लिए स्वतंत्र होगी।
➣ इस प्रस्ताव को कंपनी तथा संसद, दोनों ने स्वीकार कर लिया और चार्टर एक्ट, 1793 में लाभांश की अधिकतम दर 8 प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत कर दी गई।
➣ यह परिवर्तन मुख्यतः कंपनी के व्यापारिक एवं वित्तीय पक्ष से संबंधित था और इसका भारत में कंपनी के राजनीतिक अथवा प्रशासनिक अधिकार-क्षेत्र पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा।
➣ इससे यह भी स्पष्ट होता है कि चार्टर एक्ट, 1793 केवल भारत के प्रशासन तक सीमित न होकर कंपनी, उसके शेयरधारकों और ब्रिटिश सरकार के वित्तीय हितों को संतुलित करने से भी जुड़ा था।
➣ इसी व्यवस्था के साथ चार्टर एक्ट, 1793 ने एक महत्वपूर्ण वित्तीय प्राथमिकता-क्रम का सिद्धांत भी स्थापित किया: भारत में कंपनी द्वारा किए जाने वाले प्रशासनिक, सैन्य तथा शासन-संबंधी खर्च सबसे पहले भारत से प्राप्त राजस्व से ही चुकाए जाएंगे, और उसके बाद जो अधिशेष राशि बचेगी, उसी में से ब्रिटिश सरकार को प्रतिवर्ष 5 लाख पाउंड का भुगतान किया जाएगा।
➣ इस प्रकार यह 5 लाख पाउंड का भुगतान कोई अलग या अतिरिक्त शुल्क नहीं था, बल्कि भारतीय राजस्व के व्यय-क्रम में सबसे अंत में आने वाला एक निश्चित हिस्सा था।
बोर्ड ऑफ कंट्रोल की व्यवस्था में परिवर्तन
➣ पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 के अंतर्गत स्थापित बोर्ड ऑफ कंट्रोल को चार्टर एक्ट, 1793 द्वारा समाप्त नहीं किया गया, बल्कि उसकी संरचना को स्पष्ट करते हुए इसमें एक अध्यक्ष तथा दो कनिष्ठ सदस्य होने का प्रावधान किया गया।
➣ बोर्ड के सबसे वरिष्ठ आयुक्त को अध्यक्ष बनाया जाता था, और अब दोनों कनिष्ठ सदस्यों के लिए प्रिवी काउंसिल का सदस्य होना अनिवार्य नहीं रहा।
➣ एक महत्वपूर्ण परिवर्तन यह था कि बोर्ड ऑफ कंट्रोल के सदस्यों तथा कर्मचारियों के वेतन और खर्च का भार अब ईस्ट इंडिया कंपनी पर डाल दिया गया, जिसे भारतीय राजस्व से पूरा किया जाना था।
➣ यह व्यवस्था केवल अस्थायी नहीं थी, बल्कि 1919 ई. तक जारी रही, और यह औपनिवेशिक शासन की उस प्रवृत्ति को भी दर्शाती है जिसमें ब्रिटिश प्रशासनिक खर्चों का भार भारत के राजस्व पर डाला जाता रहा।
गवर्नर-जनरल की शक्तियों में वृद्धि
➣ पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 के बाद गवर्नर-जनरल की स्थिति पहले से मजबूत हुई थी, लेकिन अनेक मामलों में उसे अपनी परिषद् के बहुमत के अनुसार ही कार्य करना पड़ता था, जिससे संकट अथवा युद्ध जैसी परिस्थितियों में शीघ्र निर्णय लेने में कठिनाई होती थी।
➣ इस समस्या को दूर करने के लिए सबसे पहले 1786 के संशोधन अधिनियम द्वारा विशेष व्यवस्था की गई। उस समय गवर्नर-जनरल पद पर नियुक्त हो रहे लॉर्ड कॉर्नवालिस ने पद स्वीकार करने की शर्त के रूप में मांग रखी कि असाधारण परिस्थितियों में उन्हें अपनी परिषद् के निर्णय को अस्वीकार करके स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की शक्ति दी जाए।
➣ उस समय आंग्ल-मैसूर संघर्ष चल रहे थे, इसलिए ब्रिटिश सरकार ने यह मांग स्वीकार कर ली। साथ ही उन्हें सेनाध्यक्ष का पद भी दिया गया, जिससे असैनिक और सैनिक अधिकार एक ही व्यक्ति के हाथ में केंद्रित हो गए।
➣ परंतु 1786 में यह विशेष शक्ति केवल लॉर्ड कॉर्नवालिस को व्यक्तिगत रूप से प्रदान की गई थी, इसे भविष्य के गवर्नर-जनरलों के लिए स्थायी व्यवस्था नहीं बनाया गया था।
➣ चार्टर एक्ट, 1793 ने 1786 की इस व्यवस्था को एक स्थायी संवैधानिक व्यवस्था का रूप दे दिया। अब गवर्नर-जनरल को विशेष परिस्थितियों में परिषद् के बहुमत के निर्णय को अस्वीकार करके अपना निर्णय लागू करने का अधिकार प्राप्त हो गया,
➣ बशर्ते ऐसी स्थिति में उसे अपने निर्णय की पूरी जिम्मेदारी स्वयं लेनी होती थी। यह शक्ति अब केवल कॉर्नवालिस तक सीमित न रहकर भविष्य के सभी गवर्नर-जनरलों के लिए स्थायी रूप से लागू कर दी गई।
➣ इसी प्रकार मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी के गवर्नरों को भी असाधारण परिस्थितियों में अपनी परिषद् के निर्णय को अस्वीकार करने की शक्ति दी गई, जिससे केंद्रीय एवं प्रांतीय दोनों स्तरों पर कार्यपालिका की स्थिति परिषद् की तुलना में मजबूत हुई।
➣ इसके साथ ही चार्टर एक्ट, 1793 ने सेनाध्यक्ष की परिषद्-सदस्यता को भी स्पष्ट किया। अब सेनाध्यक्ष स्वतः ही गवर्नर-जनरल की परिषद् का सदस्य नहीं माना जाता था, उसे परिषद् का सदस्य बनने के लिए कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा विशेष रूप से नियुक्त किया जाना आवश्यक था।
| 1786 की व्यवस्था | वीटो शक्ति केवल लॉर्ड कॉर्नवालिस को व्यक्तिगत रूप से। भविष्य के गवर्नर-जनरलों के लिए स्थायी नहीं। |
| 1793 की व्यवस्था | वीटो शक्ति पद से जुड़ी स्थायी संवैधानिक व्यवस्था। भविष्य के सभी गवर्नर-जनरलों तथा मद्रास/बंबई के गवर्नरों पर भी लागू। |
गवर्नर-जनरल की प्रेसीडेंसियों पर सर्वोच्चता
➣ पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 के अंतर्गत बंगाल के गवर्नर-जनरल को युद्ध, संधि तथा वित्त जैसे मामलों में बंबई और मद्रास प्रेसीडेंसियों की तुलना में विशेष स्थान प्राप्त था, फिर भी दोनों प्रेसीडेंसियों के अपने गवर्नर और कुछ स्वायत्तता बनी रहती थी।
➣ व्यवहार में बंगाल से दूर स्थित मद्रास और बंबई के गवर्नर कभी-कभी केंद्रीय निर्देशों की अपने ढंग से व्याख्या कर लेते थे, जिससे प्रेसीडेंसियों के बीच नीतिगत टकराव की स्थिति बन जाती थी।
➣ इस समस्या को दूर करने के लिए चार्टर एक्ट, 1793 में प्रावधान किया गया कि जब गवर्नर-जनरल स्वयं मद्रास अथवा बंबई प्रेसीडेंसी में उपस्थित हो, तो वहाँ के स्थानीय गवर्नर की तुलना में गवर्नर-जनरल का अधिकार सर्वोच्च हो जाएगा और अंतिम निर्णय लेने का अधिकार उसी के पास रहेगा।
➣ इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि गवर्नर-जनरल के प्रत्यक्ष निरीक्षण के दौरान, विशेषकर युद्ध अथवा संकटपूर्ण परिस्थिति में, प्रशासनिक निर्णयों में कोई द्वंद्व या विलंब न हो। इस प्रावधान से भारत में केंद्रीकृत एवं एकीकृत प्रशासनिक ढाँचे को मजबूती मिली।
गवर्नर-जनरल की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष की नियुक्ति
➣ चार्टर एक्ट, 1793 से पहले यह स्पष्ट नहीं था कि गवर्नर-जनरल के बंगाल से बाहर रहने पर उसकी परिषद् के कार्यों की अध्यक्षता कौन करेगा। यह समस्या केवल सैद्धांतिक नहीं थी – स्वयं लॉर्ड कॉर्नवालिस को तीसरे आंग्ल-मैसूर युद्ध जैसे सैन्य अभियानों के दौरान बंगाल से दूर रहकर सैन्य नेतृत्व करना पड़ा था।
➣ इस समस्या को दूर करने के लिए प्रावधान किया गया कि यदि गवर्नर-जनरल बंगाल से अनुपस्थित हो, तो वह अपनी परिषद् के असैनिक सदस्यों में से किसी एक को उपाध्यक्ष नियुक्त कर सकता है, जो उसकी अनुपस्थिति में परिषद् की बैठकों की अध्यक्षता करेगा।
➣ उपाध्यक्ष का चयन जान-बूझकर असैनिक सदस्यों में से किया जाना था, ताकि सैन्य पद के बजाय प्रशासनिक अनुभव वाले सदस्य को यह जिम्मेदारी मिले। इस व्यवस्था से गवर्नर-जनरल की अनुपस्थिति में भी केंद्रीय प्रशासन में निरंतरता बनी रही।
➣ इसी प्रावधान से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि गवर्नर-जनरल को बंगाल से अनुपस्थित रहते हुए भी भारत के किसी अन्य प्रांत या प्रेसीडेंसी को आदेश जारी करने का अधिकार प्राप्त था, और इसके लिए उसे अनिवार्य रूप से पूर्व में अपनी परिषद् से परामर्श लेने की आवश्यकता नहीं थी।
कंपनी की राजनीतिक प्रभुसत्ता पर ब्रिटिश क्राउन का अधिकार (न्यासी सिद्धांत)
➣ रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 और पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा कंपनी के प्रशासन पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण तो स्थापित हुआ, लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि भारत में कंपनी द्वारा प्राप्त राजनीतिक प्रभुसत्ता वास्तव में कंपनी की मानी जाए या ब्रिटिश क्राउन की।
➣ यह प्रश्न केवल सैद्धांतिक नहीं था – यदि कंपनी का अधिकार उसकी अपनी स्वतंत्र संपत्ति माना जाता, तो उस पर संसद और क्राउन का नियंत्रण सीमित रह जाता।
➣ इसी अस्पष्टता को दूर करने के लिए चार्टर एक्ट, 1793 में यह सिद्धांत स्पष्ट किया गया कि क्राउन की प्रजा द्वारा प्राप्त प्रभुसत्ता क्राउन की ओर से होती है, न कि उनके अपने अधिकार से।
➣ अर्थात कंपनी द्वारा भारत में किया जाने वाला युद्ध, संधि, क्षेत्र-विस्तार तथा शासन-प्रबंध जैसा हर राजनीतिक कार्य कंपनी की स्वतंत्र प्रभुसत्ता के आधार पर नहीं, बल्कि ब्रिटिश क्राउन की ओर से किए गए प्रत्यायोजित कार्य के रूप में देखा जाने लगा। इससे कंपनी और क्राउन के बीच संबंध एक प्रकार का न्यासी संबंध बन गया।
➣ 1793 में स्थापित यह सिद्धांत आगे चलकर उस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण आधार बना, जिसके परिणामस्वरूप 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त होकर भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन चला गया।
प्रमुख अधिकारियों की नियुक्ति (एवं वापसी) में क्राउन की स्वीकृति
➣ भारत के प्रमुख पदों पर नियुक्तियाँ पहले मुख्यतः कंपनी के निदेशक मंडल के अधिकार-क्षेत्र में आती थीं। पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 के बाद भारत के राजनीतिक मामलों पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण बढ़ चुका था, फिर भी प्रमुख अधिकारियों की नियुक्ति में कंपनी की भूमिका बनी हुई थी।
➣ चार्टर एक्ट, 1793 द्वारा प्रावधान किया गया कि गवर्नर-जनरल, प्रेसीडेंसी के गवर्नरों तथा सेनाध्यक्ष की नियुक्ति के लिए ब्रिटिश क्राउन की स्वीकृति आवश्यक होगी।
➣ अर्थात कंपनी इन पदों के लिए व्यक्ति का चयन कर सकती थी, लेकिन नियुक्ति को अंतिम रूप देने के लिए क्राउन की स्वीकृति आवश्यक हो गई। इस प्रकार भारत के सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक और सैन्य पदों पर ब्रिटिश सरकार का प्रभाव और अधिक बढ़ गया।
➣ इसी के साथ नियुक्ति की तरह ही, इन पदों से हटाने का अधिकार भी क्राउन को दिया गया — अर्थात गवर्नर-जनरल, प्रेसीडेंसी गवर्नर अथवा सेनाध्यक्ष को यदि ब्रिटिश सरकार अनुचित समझे तो कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स की सिफ़ारिश के बिना भी क्राउन उन्हें वापस बुला सकता था। इससे कंपनी के इन वरिष्ठतम पदाधिकारियों की जवाबदेही सीधे ब्रिटिश सरकार के प्रति भी सुनिश्चित हो गई, न कि केवल कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के प्रति।
▪ प्रमुख पद – गवर्नर-जनरल, प्रेसीडेंसी के गवर्नर और सेनाध्यक्ष
▪ 1793 का परिवर्तन – नियुक्ति के लिए ब्रिटिश क्राउन की स्वीकृति आवश्यक; साथ ही क्राउन को वापस बुलाने (Recall) की शक्ति भी प्राप्त।
▪ परिणाम – भारत के प्रशासनिक और सैन्य नेतृत्व पर क्राउन का प्रभाव और मजबूत हुआ।
गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल की विनियम बनाने की शक्ति एवं संहिताकरण
➣ 1793 से पहले कंपनी के अधिकारियों के पास भारत में शासन हेतु स्पष्ट, संहिताबद्ध कानून बनाने की कोई औपचारिक विधायी शक्ति नहीं थी; प्रशासन काफी हद तक तदर्थ (ad hoc) आदेशों और परंपराओं पर आधारित था।
➣ चार्टर एक्ट, 1793 ने पहली बार गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल (तथा मद्रास व बंबई की प्रेसीडेंसी सरकारों) को अपने-अपने क्षेत्रों के लिए नियम व विनियम (Regulations) बनाने की शक्ति प्रदान की।
➣ इन विनियमों को लागू होने के लिए कलकत्ता के सुप्रीम कोर्ट में पंजीकृत कराना आवश्यक था; पंजीकरण के बाद ही उन्हें न्यायालयों में विधिक बल प्राप्त होता था।
➣ इसी व्यवस्था के अंतर्गत आगे चलकर बंगाल कोड, मद्रास कोड और बॉम्बे कोड जैसे विनियम-संग्रह तैयार हुए, जो लॉर्ड कॉर्नवालिस के प्रशासनिक-न्यायिक सुधारों (कॉर्नवालिस कोड, 1793) का आधार बने।
प्रेसीडेंसी नगरों (कलकत्ता, मद्रास, बंबई) के शासन संबंधी प्रावधान
➣ 18वीं शताब्दी के अंत तक कलकत्ता, मद्रास और बंबई केवल व्यापारिक बस्तियाँ न रहकर तेज़ी से बढ़ते हुए नगर बन चुके थे, जहाँ भारतीय एवं यूरोपीय दोनों प्रकार की आबादी निवास करती थी। इन नगरों में कानून-व्यवस्था, नगर-प्रशासन तथा सामान्य सुव्यवस्था बनाए रखने के लिए स्पष्ट वैधानिक ढाँचे का अभाव था।
➣ इसी आवश्यकता को देखते हुए चार्टर एक्ट, 1793 के आधिकारिक शीर्षक में ही इन तीनों प्रेसीडेंसी नगरों की सुव्यवस्था एवं शासन हेतु प्रावधान करने का उल्लेख किया गया।
➣ अधिनियम ने इन नगरों में शांति-व्यवस्था बनाए रखने, नगर-प्रशासन संचालित करने तथा स्थानीय कानूनी व्यवस्था को सुदृढ़ करने से संबंधित नियम बनाने की व्यवस्था की। इस प्रावधान ने भारत में नगरीय प्रशासन को वैधानिक आधार देने की दिशा में एक प्रारंभिक कदम उठाया।
➣ आगे चलकर 1815 के भारतीय प्रेसीडेंसी नगर अधिनियम तथा 19वीं शताब्दी के नगरपालिका अधिनियमों के माध्यम से इसी प्रक्रिया का क्रमिक विकास हुआ, जिसने अंततः भारत में आधुनिक नगरपालिका संस्थाओं की नींव रखी।
कंपनी की सिविल सेवाओं में नियुक्ति की व्यवस्था
➣ जैसे-जैसे कंपनी के अधीन भारत में क्षेत्रों का विस्तार होता गया, वैसे-वैसे राजस्व-प्रबंधन, न्याय-व्यवस्था तथा सामान्य प्रशासन चलाने के लिए प्रशिक्षित सिविल अधिकारियों की आवश्यकता बढ़ती गई। इन्हें कवनेन्टेड सिविल सर्वेंट्स कहा जाता था, क्योंकि नियुक्ति के समय वे कंपनी के साथ एक औपचारिक अनुबंध पर हस्ताक्षर करते थे।
➣ चार्टर एक्ट, 1793 ने इस नियुक्ति-व्यवस्था में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं किया – यह अधिकार पहले की तरह कंपनी के कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के पास ही बना रहा, जो उनके लिए एक महत्वपूर्ण संरक्षण-शक्ति का स्रोत था।
➣ इसके साथ ही सिविल सेवा में पदोन्नति को मुख्यतः वरिष्ठता और सेवा-अवधि के आधार पर अधिक व्यवस्थित किया गया, और कवनेन्टेड सिविल सर्वेंट्स को सदाचार के दौरान पद पर बने रहने की सुरक्षा दी गई – अर्थात कदाचार सिद्ध हुए बिना उन्हें मनमाने ढंग से पद से नहीं हटाया जा सकता था।
वरिष्ठ अधिकारियों के भारत छोड़ने पर नियंत्रण
➣ कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी भारत में महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर कार्य करते थे, और उनके अचानक भारत छोड़ देने से प्रशासनिक कार्यों में बाधा उत्पन्न हो सकती थी।
➣ इसलिए चार्टर एक्ट, 1793 में प्रावधान किया गया कि वरिष्ठ अधिकारी बिना अनुमति भारत नहीं छोड़ सकते। यदि कोई ऐसा अधिकारी उचित अनुमति प्राप्त किए बिना भारत छोड़ देता, तो उसके इस कार्य को उसके पद से इस्तीफा देने के समान माना जा सकता था।
➣ इस व्यवस्था से वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही और प्रशासनिक निरंतरता सुनिश्चित करने में सहायता मिली।
राजस्व एवं न्यायिक कार्यों का पृथक्करण
➣ 1793 से पहले कंपनी के राजस्व अधिकारियों, विशेषकर कलेक्टरों के पास भू-राजस्व वसूलने के साथ-साथ कुछ न्यायिक अधिकार भी होते थे, जिससे राजस्व वसूलने वाला अधिकारी ही उससे जुड़े विवाद में निर्णायक भी बन जाता था और हितों के टकराव की संभावना बनी रहती थी।
➣ इस समस्या को दूर करने के लिए कलेक्टरों से उनके न्यायिक अधिकार वापस ले लिए गए और उनके कार्य को राजस्व वसूली तक सीमित कर दिया गया, जबकि न्यायिक कार्य अलग न्यायालयों को सौंप दिए गए।
➣ इसके साथ ही माल अदालतों की व्यवस्था समाप्त कर दी गई और राजस्व से संबंधित न्यायिक मामलों को नियमित दीवानी न्यायालयों के अधीन कर दिया गया।
➣ इस प्रकार 1793 के सुधारों ने भारत में राजस्व और न्यायिक प्रशासन के पृथक्करण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया, जो आगे चलकर प्रशासनिक-न्यायिक संस्थाओं के अलग-अलग विकास की प्रक्रिया का एक चरण बना।
▪ 1793 – कलेक्टरों के न्यायिक अधिकार वापस लिए गए।
▪ राजस्व कार्य और न्यायिक कार्य अलग किए गए।
▪ माल अदालतों की व्यवस्था समाप्त की गई।
▪ न्यायिक मामलों को नियमित दीवानी न्यायालयों के अधीन किया गया।
चार्टर एक्ट, 1793 के प्रावधान – एक नज़र में
| क्षेत्र | प्रावधान |
| व्यापार | कंपनी के व्यापारिक चार्टर व एकाधिकार का 20 वर्ष (1813 तक) के लिए नवीनीकरण; लाइसेंस द्वारा सीमित ‘कंट्री ट्रेड’ की अनुमति। |
| लाभांश | शेयरधारकों के लाभांश की अधिकतम दर 8% से बढ़ाकर 10% की गई; बदले में कंपनी हर वर्ष ब्रिटिश सरकार को 5 लाख पाउंड देगी। |
| बोर्ड ऑफ कंट्रोल | संरचना स्पष्ट – 1 अध्यक्ष + 2 कनिष्ठ सदस्य; सदस्यों/कर्मचारियों का वेतन भारतीय राजस्व से (1919 तक जारी)। |
| गवर्नर-जनरल की शक्ति | 1786 में कॉर्नवालिस को दी गई परिषद्-वीटो शक्ति अब सभी भावी गवर्नर-जनरलों व प्रेसीडेंसी गवर्नरों के लिए स्थायी। |
| प्रेसीडेंसियों पर नियंत्रण | गवर्नर-जनरल की मद्रास/बंबई में प्रत्यक्ष उपस्थिति पर वहाँ के गवर्नर से भी उसका अधिकार सर्वोच्च। |
| उपाध्यक्ष व्यवस्था | गवर्नर-जनरल की बंगाल से अनुपस्थिति में परिषद् के असैनिक सदस्यों में से उपाध्यक्ष नियुक्ति। |
| प्रभुसत्ता का सिद्धांत | कंपनी की राजनीतिक प्रभुसत्ता को क्राउन की ओर से प्रत्यायोजित (न्यासी सिद्धांत) घोषित किया गया। |
| प्रमुख नियुक्तियाँ | गवर्नर-जनरल, प्रेसीडेंसी गवर्नर व सेनाध्यक्ष की नियुक्ति के लिए क्राउन की स्वीकृति अनिवार्य। |
| सिविल सेवा | नियुक्ति-अधिकार कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के पास बना रहा; पदोन्नति वरिष्ठता पर आधारित; सदाचार तक पद-सुरक्षा। |
| वरिष्ठ अधिकारी | बिना अनुमति भारत छोड़ना पद से इस्तीफा माना जाएगा। |
| राजस्व-न्याय पृथक्करण | कलेक्टरों के न्यायिक अधिकार समाप्त; माल अदालतें बंद; मामले दीवानी न्यायालयों को सौंपे गए। |
| प्रेसीडेंसी नगर | कलकत्ता, मद्रास व बंबई की “सुव्यवस्था एवं शासन” हेतु प्रावधान – नगरीय प्रशासन को वैधानिक आधार। |
चार्टर एक्ट, 1793 का महत्व
➣ कंपनी शासन की निरंतरता बनी रही:- चार्टर एक्ट, 1793 ने ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को समाप्त करने के बजाय उसे आगे जारी रखा, जिससे कंपनी का प्रशासन अगले चरण तक बिना किसी बड़े राजनीतिक परिवर्तन के चलता रहा।
➣ केंद्रीय प्रशासन को मजबूती मिली:- गवर्नर-जनरल की स्थिति अधिक मजबूत हुई और प्रेसीडेंसियों पर केंद्रीय नियंत्रण को स्पष्टता मिली, जिससे भारत में एक अधिक केंद्रीकृत शासन-व्यवस्था विकसित होने लगी।
➣ ब्रिटिश सरकार का प्रभाव बढ़ता गया:- कंपनी का शासन जारी रहते हुए भी उसके राजनीतिक-प्रशासनिक कार्यों पर ब्रिटिश सरकार का प्रभाव लगातार बढ़ता गया, जिससे कंपनी शासन धीरे-धीरे ब्रिटिश राज्य के अधिक प्रत्यक्ष नियंत्रण की दिशा में आगे बढ़ा।
➣ प्रशासन में स्थायित्व आया:- सिविल सेवा, उच्च अधिकारियों की नियुक्ति तथा राजस्व-न्यायिक पृथक्करण जैसी व्यवस्थाओं को जारी रखने और व्यवस्थित करने से कंपनी के प्रशासन में स्थिरता एवं निरंतरता बनी रही।
➣ व्यापारिक चरित्र बना रहा:- इस अधिनियम ने कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त नहीं किया, जिससे स्पष्ट होता है कि 1793 में ब्रिटिश सरकार कंपनी को केवल प्रशासनिक संस्था में बदलने के बजाय उसके व्यापारिक और राजनीतिक दोनों स्वरूप को बनाए रखना चाहती थी।
➣ आगे के संवैधानिक विकास की आधारभूमि बनी:- चार्टर एक्ट, 1793 ने कोई बहुत बड़ा संवैधानिक परिवर्तन नहीं किया, लेकिन पहले से चली आ रही व्यवस्था को मजबूत किया। आगे चलकर चार्टर एक्ट, 1813 और चार्टर एक्ट, 1833 द्वारा कंपनी के व्यापारिक और प्रशासनिक अधिकारों में बड़े परिवर्तन किए गए, जिस दृष्टि से 1793 का अधिनियम उस क्रमिक संवैधानिक विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी था।
चार्टर एक्ट, 1793 की सीमाएँ / कमियाँ
➣ भारतीय राजस्व पर वित्तीय बोझ:- बोर्ड ऑफ कंट्रोल के सदस्यों और कर्मचारियों का वेतन अब भारतीय राजस्व से दिया जाने लगा, अर्थात एक ब्रिटिश गृह-संस्था के खर्च का भार भी अंततः भारत की जनता पर डाल दिया गया।
➣ व्यापारिक एकाधिकार बना रहना:- कंपनी का भारत के साथ व्यापारिक एकाधिकार अगले 20 वर्षों के लिए जारी रहा, जिससे ब्रिटेन के अन्य व्यापारियों के लिए भारतीय बाजार बंद रहा और कंपनी की एकाधिकारी व्यापारिक प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता रहा।
➣ केंद्रीकरण के कारण प्रांतीय स्वायत्तता में कमी:- गवर्नर-जनरल को दी गई व्यापक शक्तियों तथा प्रेसीडेंसियों पर उसकी सर्वोच्चता से मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसियों की स्वायत्तता सीमित हुई, जिससे प्रशासनिक विकेंद्रीकरण का सिद्धांत कमजोर पड़ा।
➣ भारतीयों की भागीदारी की उपेक्षा:- अधिनियम का पूरा ध्यान कंपनी, बोर्ड ऑफ कंट्रोल और गवर्नर-जनरल जैसे ब्रिटिश ढाँचे को व्यवस्थित करने पर केंद्रित रहा; भारतीय प्रशासन अथवा निर्णय-प्रक्रिया में भारतीयों की किसी भूमिका या भागीदारी की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया।
➣ संरक्षण-प्रथा (Patronage) की निरंतरता:- सिविल सेवा में नियुक्ति का अधिकार कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के पास ही बना रहने दिया गया, जिससे योग्यता के बजाय व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर नियुक्ति की प्रवृत्ति बनी रही। इसे समाप्त करने में साठ वर्ष और लगे (चार्टर एक्ट, 1853)।
➣ मौलिक प्रश्नों पर मौन:- अधिनियम ने कंपनी की राजनीतिक प्रभुसत्ता को क्राउन की ओर से प्रत्यायोजित तो घोषित किया, परंतु इससे कंपनी शासन की उत्तरदायित्व-संबंधी अंतर्निहित समस्याएँ (जैसे भारतीय हितों की उपेक्षा, शोषणकारी राजस्व-नीति) हल नहीं हुईं – इनका समाधान बाद के चार्टर एक्टों तथा अंततः 1858 में कंपनी-शासन की समाप्ति के बाद ही संभव हो सका।
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ चार्टर एक्ट, 1793 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया और इसे 11 जून, 1793 को राजस्वीकृति (Royal Assent) प्राप्त हुई। इसका आधिकारिक उद्धरण 33 Geo. 3, c. 52 है, और यह अंततः भारत शासन अधिनियम, 1915 द्वारा निरस्त किया गया।
➣ इस समय भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस थे, जिनका कार्यकाल 1786 से 1793 तक रहा। उनके बाद सर जॉन शोर ने गवर्नर-जनरल का पद संभाला।
➣ इस अधिनियम द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के चार्टर तथा व्यापारिक अधिकारों को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ाया गया।
➣ कंपनी का भारत के साथ व्यापारिक एकाधिकार जारी रखा गया, जबकि कंपनी द्वारा लाइसेंस प्राप्त व्यक्तियों को सीमित रूप से व्यापार करने की अनुमति दी जा सकती थी।
➣ बोर्ड ऑफ कंट्रोल की व्यवस्था जारी रखते हुए उसकी संरचना को स्पष्ट किया गया – 1 अध्यक्ष और 2 कनिष्ठ सदस्य।
➣ गवर्नर-जनरल को विशेष परिस्थितियों में अपनी परिषद् के निर्णय को अस्वीकार करने की शक्ति स्थायी रूप से जारी रखी गई, जो मूल रूप से 1786 में लॉर्ड कॉर्नवालिस को दी गई थी।
➣ कंपनी के कवनेन्टेड सिविल सेवकों की नियुक्ति का अधिकार कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के पास बना रहा।
➣ कंपनी के शेयरधारकों को दिए जाने वाले लाभांश की अधिकतम दर को 8 प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत किया गया।
➣ बोर्ड ऑफ कंट्रोल के सदस्यों तथा कर्मचारियों के वेतन का भार भारतीय राजस्व पर डाला गया।
➣ चार्टर एक्ट, 1793 को मुख्यतः एक सुदृढ़ीकरण अधिनियम माना जाता है, क्योंकि इसने मौजूदा व्यवस्था को बड़े बदलाव के बिना आगे बढ़ाया और उसे अधिक व्यवस्थित किया।
▪ 1793 – चार्टर का नवीनीकरण
▪ 20 वर्ष – कंपनी के अधिकारों की अवधि
▪ 10% – अधिकतम लाभांश
▪ 1 + 2 – बोर्ड ऑफ कंट्रोल की नई संरचना
▪ 1786 की शक्ति – 1793 में भावी गवर्नर-जनरलों के लिए स्थायी
▪ प्रकृति – सुदृढ़ीकरण अधिनियम
भ्रम बिंदु
➣ चार्टर एक्ट, 1793 ने ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त नहीं किया था। कंपनी को भारत में शासन और व्यापार करने का अधिकार अगले 20 वर्षों के लिए जारी रखा गया था।
➣ चार्टर एक्ट, 1793 को पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 की तरह ब्रिटिश सरकार द्वारा कंपनी के राजनीतिक मामलों पर नियंत्रण स्थापित करने वाला मूल अधिनियम नहीं समझना चाहिए। 1784 में बोर्ड ऑफ कंट्रोल की स्थापना हुई थी, जबकि 1793 में पहले से स्थापित व्यवस्था को आगे बढ़ाया और व्यवस्थित किया गया।
➣ 1793 में कंपनी का भारत के साथ व्यापारिक एकाधिकार समाप्त नहीं हुआ था। कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार में बड़ा परिवर्तन चार्टर एक्ट, 1813 द्वारा किया गया।
➣ गवर्नर-जनरल की परिषद् के निर्णय को अस्वीकार करने की शक्ति पहली बार 1793 में नहीं दी गई थी। यह शक्ति सबसे पहले 1786 के संशोधन अधिनियम द्वारा लॉर्ड कॉर्नवालिस को दी गई थी; 1793 में इसे भविष्य के गवर्नर-जनरलों के लिए जारी किया गया।
➣ बोर्ड ऑफ कंट्रोल की स्थापना 1793 में नहीं, बल्कि पहले ही पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा हो चुकी थी। 1793 के अधिनियम ने इसकी व्यवस्था को आगे जारी रखा और उसमें कुछ परिवर्तन किए।
➣ कंपनी के सिविल सेवकों की नियुक्ति का अधिकार 1793 में ब्रिटिश क्राउन को नहीं दिया गया था। कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स का नियुक्ति-संबंधी Patronage बना रहा। खुली प्रतियोगिता आधारित भर्ती बाद में चार्टर एक्ट, 1853 से जुड़ी।
➣ चार्टर एक्ट, 1793 को भारत में ब्रिटिश क्राउन के प्रत्यक्ष शासन की शुरुआत नहीं माना जाना चाहिए। कंपनी का शासन अभी भी जारी था; क्राउन का प्रत्यक्ष शासन 1858 में कंपनी का शासन समाप्त होने के बाद स्थापित हुआ।
➣ 1793 में भी गवर्नर-जनरल का आधिकारिक पद ‘गवर्नर-जनरल ऑफ बंगाल’ ही बना रहा। इस पद का नाम बदलकर ‘गवर्नर-जनरल ऑफ इंडिया’ करने का कार्य चार्टर एक्ट, 1833 द्वारा किया गया।
➣ यह न समझें कि सेनाध्यक्ष (Commander-in-Chief) सदैव गवर्नर-जनरल की परिषद् का सदस्य होता था। 1793 के बाद वह तभी परिषद् का सदस्य बनता था, जब कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स उसे विशेष रूप से इसके लिए नियुक्त करते थे।
▪ 1773 – कंपनी के शासन पर ब्रिटिश संसद के नियंत्रण की शुरुआत।
▪ 1784 – बोर्ड ऑफ कंट्रोल और द्वैध नियंत्रण की स्थापना।
▪ 1793 – मौजूदा व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण और कंपनी के चार्टर का 20 वर्षों के लिए नवीनीकरण।
▪ 1813 – कंपनी के भारत संबंधी सामान्य व्यापारिक एकाधिकार में बड़ा परिवर्तन।
▪ 1853 – सिविल सेवा में खुली प्रतियोगिता की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन।
▪ 1858 – कंपनी शासन का अंत और ब्रिटिश क्राउन का प्रत्यक्ष शासन।
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