चार्टर एक्ट, 1813 : परिचय
➣ चार्टर एक्ट, 1813 (आधिकारिक नाम: ईस्ट इंडिया कंपनी एक्ट, 1813। उद्धरण: 53 Geo. 3, c. 155) ब्रिटिश संसद द्वारा पारित वह महत्वपूर्ण अधिनियम था, जिसने कंपनी के भारत के साथ सामान्य व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया।
➣ हालांकि चाय के व्यापार, चीन के साथ व्यापार तथा अफीम के व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार अभी भी बना रहा।
➣ चार्टर एक्ट, 1793 के समय कंपनी को भारत के साथ व्यापार करने का विशेष अधिकार अगले 20 वर्षों के लिए जारी रखा गया था। लेकिन अगले दो दशकों में ब्रिटेन और भारत की परिस्थितियों में महत्वपूर्ण परिवर्तन आने लगे, जिन्होंने अंततः चार्टर एक्ट, 1813 की आवश्यकता को जन्म दिया।
➣ इस अधिनियम का महत्व केवल व्यापारिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था। पहली बार ब्रिटिश संसद ने भारत में शिक्षा के प्रसार तथा ईसाई मिशनरियों को भारत में कार्य करने की अनुमति देने से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान भी किए।
➣ साथ ही, इसी अधिनियम में पहली बार स्पष्ट शब्दों में भारत पर ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्च प्रभुसत्ता की घोषणा भी की गई।
➣ इस प्रकार चार्टर एक्ट, 1813 कंपनी के शासन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इसने कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को कमजोर किया और भारत में ब्रिटिश व्यापार, शिक्षा तथा मिशनरी गतिविधियों के विस्तार के लिए नई परिस्थितियाँ तैयार कीं।
| पूर्ण/वैकल्पिक नाम | ईस्ट इंडिया कंपनी एक्ट, 1813 |
| राजस्वीकृति | 22 जुलाई, 1813 |
| अवधि | कंपनी के क्षेत्रीय अधिकार व राजस्व अगले 20 वर्षों (1813-1833) के लिए जारी |
| प्रकृति | व्यापारिक एकाधिकार को आंशिक रूप से समाप्त करने वाला तथा शिक्षा-धर्म संबंधी नए प्रावधान जोड़ने वाला अधिनियम |
| प्रमुख उद्देश्य | कंपनी के सामान्य व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त करना, भारत पर क्राउन की सर्वोच्चता को स्पष्ट घोषित करना, तथा शिक्षा व मिशनरी गतिविधियों को वैधानिक आधार देना। |
चार्टर एक्ट, 1813 की पृष्ठभूमि
कंपनी के चार्टर की अवधि समाप्त होना
➣ 1793 में कंपनी के चार्टर को 20 वर्षों के लिए बढ़ाया गया था, इसलिए इसकी अवधि 1813 तक थी। जैसे-जैसे यह समय निकट आने लगा, ब्रिटिश संसद के सामने फिर से यह प्रश्न आया कि कंपनी के चार्टर और व्यापारिक अधिकारों को आगे भी जारी रखा जाए या उनमें परिवर्तन किया जाए।
➣ इस बार परिस्थिति 1793 से अलग थी – पिछले बीस वर्षों में ब्रिटेन में व्यापारिक और औद्योगिक क्षेत्र में बड़े परिवर्तन हो चुके थे, इसलिए कंपनी के पुराने व्यापारिक एकाधिकार को उसी रूप में आगे जारी रखने की मांग पहले जैसी मजबूत नहीं रही थी।
कंपनी की बढ़ती राजनीतिक-प्रशासनिक शक्ति एवं क्षेत्रीय विस्तार
➣ 1793 से 1813 के बीच कंपनी का मुख्य स्वरूप केवल व्यापारिक संस्था का नहीं रहा, बल्कि वह भारत में एक बड़े क्षेत्र पर शासन करने वाली राजनीतिक एवं प्रशासनिक शक्ति भी बन चुकी थी।
➣ अब उसे राजस्व वसूली, न्याय-व्यवस्था, कानून-व्यवस्था तथा विशाल क्षेत्र के प्रशासन को भी संभालना था। इसी अवधि में पंजाब, नेपाल और सिंध को छोड़कर लगभग संपूर्ण भारत पर कंपनी का प्रभाव या सत्ता स्थापित हो चुकी थी।
➣ इससे ब्रिटेन में यह प्रश्न भी उठने लगा कि क्या एक ही संस्था के लिए व्यापारिक निगम और राजनीतिक शासक दोनों भूमिकाओं को साथ-साथ निभाना व्यावहारिक है।
➣ कंपनी के सामने एक ओर भारत में शासन चलाने की जिम्मेदारी बढ़ती जा रही थी, तो दूसरी ओर उसके व्यापारिक अधिकारों को लेकर ब्रिटेन में दबाव बढ़ रहा था – इससे कंपनी के व्यापारिक और राजनीतिक स्वरूप के बीच अंतर अधिक स्पष्ट होने लगा।
याद रखें: 1793–1813 के बीच कंपनी एक बड़े क्षेत्र की शासक शक्ति बन चुकी थी (पंजाब, नेपाल व सिंध को छोड़कर लगभग पूरा भारत उसके प्रभाव में)। उसकी प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ बढ़ीं, जबकि उसके व्यापारिक एकाधिकार के विरुद्ध ब्रिटेन में दबाव लगातार बढ़ता गया।
आर्थिक दबाव: औद्योगिक क्रांति, मुक्त व्यापार की मांग और कंपनी का प्रतिरोध
➣ 18वीं शताब्दी के अंतिम भाग और 19वीं शताब्दी के प्रारंभ तक ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति का प्रभाव तेजी से बढ़ चुका था। कारखानों में बड़े पैमाने पर उत्पादन होने लगा था और ब्रिटिश उद्योगपतियों को अपने तैयार माल के लिए नए बड़े बाजारों की आवश्यकता थी।
➣ ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार इस विशाल भारतीय बाजार में स्वतंत्र प्रवेश की एक बड़ी बाधा बना हुआ था, इसलिए लिवरपूल और मैनचेस्टर जैसे औद्योगिक केंद्रों के व्यापारी कंपनी के एकाधिकार को समाप्त कर मुक्त व्यापार की मांग करने लगे।
➣ इसी दौर में अर्थशास्त्री एडम स्मिथ के लेसे-फेयर (मुक्त व्यापार) सिद्धांत की ब्रिटेन में लोकप्रियता बढ़ रही थी। इसके साथ ही नेपोलियन बोनापार्ट के कॉन्टिनेंटल सिस्टम – विशेषकर बर्लिन डिक्री (1806) तथा मिलान डिक्री (1807) – ने यूरोपीय बाजारों में ब्रिटिश माल के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाकर ब्रिटिश व्यापारियों को अन्य बाजारों, विशेषकर भारत, की ओर देखने पर मजबूर कर दिया।
➣ इन्हीं आर्थिक दबावों के कारण ब्रिटेन के निजी व्यापारियों और कंपनी के बीच संघर्ष तेज हो गया – कंपनी अपने पुराने विशेषाधिकार बनाए रखना चाहती थी, जबकि निजी व्यापारी तर्क दे रहे थे कि भारत के साथ व्यापार एक ही कंपनी तक सीमित रहने से ब्रिटिश उद्योग और व्यापार के विस्तार को पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहा।
➣ दूसरी ओर कंपनी का तर्क था कि वह भारत में केवल व्यापार ही नहीं, बल्कि एक विशाल क्षेत्र का प्रशासन और शासन भी संभाल रही थी, इसलिए उसके व्यापारिक अधिकारों को अचानक समाप्त करने से प्रशासन और ब्रिटिश हितों पर प्रभाव पड़ सकता था।
➣ अंततः ब्रिटिश संसद को कंपनी के पुराने व्यापारिक एकाधिकार और बढ़ते मुक्त व्यापार के दबाव के बीच संतुलन बनाना पड़ा। इसका परिणाम यह हुआ कि चार्टर एक्ट, 1813 में कंपनी के व्यापारिक अधिकारों में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया गया, परंतु कंपनी के शासन को तत्काल समाप्त नहीं किया गया।
ईसाई मिशनरियों एवं धार्मिक-सामाजिक सुधारकों का दबाव
➣ कंपनी के अधिकारी सामान्यतः ऐसी धार्मिक गतिविधियों से सावधान रहते थे, जिनसे भारतीय समाज में असंतोष या राजनीतिक परेशानी उत्पन्न हो सकती थी। इसी कारण कंपनी लंबे समय तक ईसाई मिशनरियों को भारत में स्वतंत्र रूप से धार्मिक प्रचार करने की अनुमति देने के पक्ष में नहीं थी।
➣ दूसरी ओर, 18वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों और 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में ब्रिटेन में ईसाई मिशनरी संगठनों और धार्मिक-मानवीय समूहों (जैसे विलियम विल्बरफोर्स तथा क्लैफम सेक्ट) का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था।
➣ उनका मानना था कि भारत में ईसाई धर्म के प्रचार के साथ-साथ शिक्षा, नैतिक सुधार और सामाजिक सुधार के कार्य भी किए जाने चाहिए।
➣ कंपनी को आशंका थी कि बिना नियंत्रण के मिशनरियों को अनुमति देने से भारतीय धार्मिक भावनाएँ प्रभावित हो सकती हैं और उसके शासन के लिए कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं, जबकि ब्रिटिश जनमत और संसद के कुछ वर्गों का दबाव कंपनी की पुरानी नीति के विरुद्ध लगातार बढ़ रहा था।
➣ इसलिए जब 1813 में चार्टर के नवीनीकरण का प्रश्न आया, तब मिशनरियों को भारत में प्रवेश देने तथा शिक्षा के प्रसार से संबंधित प्रश्न भी व्यापारिक एकाधिकार जितने ही महत्वपूर्ण बन चुके थे। अंततः इस विषय पर समझौता हुआ और मिशनरियों के भारत आने का मार्ग खुला।
➣ इस प्रकार 1813 तक कंपनी के चार्टर का प्रश्न केवल व्यापार तक सीमित न रहकर व्यापार, प्रशासन, शिक्षा और धर्म से जुड़े व्यापक प्रश्नों से जुड़ गया था।
➣ ब्रिटिश संसद के सामने एक ऐसी व्यवस्था बनाने की आवश्यकता थी, जिसमें एक ओर ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में शासन जारी रह सके, तो दूसरी ओर उसके पुराने व्यापारिक एकाधिकार में आवश्यक परिवर्तन भी किए जा सकें। इन्हीं परिस्थितियों में चार्टर एक्ट, 1813 का मार्ग तैयार हुआ।
चार्टर एक्ट, 1813 के प्रमुख प्रावधान
ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार का अंत
➣ जैसा ऊपर पृष्ठभूमि में बताया गया, 1793 का 20-वर्षीय एकाधिकार और उस पर बढ़ते औद्योगिक-मुक्त व्यापार के दबाव के परिणामस्वरूप चार्टर एक्ट, 1813 ने कंपनी के भारत के साथ सामान्य व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त कर दिया। अब ब्रिटेन के अन्य व्यापारी भी निर्धारित नियमों और लाइसेंस के अंतर्गत भारत के साथ व्यापार कर सकते थे।
➣ हालांकि यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कंपनी का एकाधिकार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। चाय के व्यापार, अफीम के व्यापार तथा चीन के साथ व्यापार – इन तीनों अत्यंत लाभदायक क्षेत्रों पर कंपनी का विशेष अधिकार अभी भी बना रहा।
➣ इसलिए 1813 के अधिनियम को कंपनी के सामान्य व्यापारिक एकाधिकार के अंत के रूप में समझना चाहिए, न कि उसके सभी व्यापारिक अधिकारों के पूर्ण अंत के रूप में।
➣ इस परिवर्तन से कंपनी का व्यापारिक महत्व धीरे-धीरे कम होने लगा और भारत में उसका राजनीतिक एवं प्रशासनिक स्वरूप अधिक महत्वपूर्ण होता गया।
➣ आगे चलकर चार्टर एक्ट, 1833 ने कंपनी के बचे हुए व्यापारिक अधिकारों (चाय व चीन व्यापार सहित) को भी समाप्त कर दिया और कंपनी को मुख्यतः एक प्रशासनिक संस्था बना दिया।
ईसाई मिशनरियों को भारत में आने की अनुमति
➣ जैसा ऊपर पृष्ठभूमि में बताया गया, मिशनरी संगठनों व धार्मिक-मानवीय समूहों के बढ़ते दबाव के परिणामस्वरूप चार्टर एक्ट, 1813 द्वारा (जिसे इसकी पायस क्लॉज़ भी कहा जाता है) ईसाई मिशनरियों को भारत में आने और अपने धार्मिक कार्य करने की अनुमति दी गई। अब वे निर्धारित नियमों/लाइसेंस के अंतर्गत भारत में रहकर ईसाई धर्म का प्रचार कर सकते थे।
➣ इस प्रावधान के कारण भारत में ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों का विस्तार हुआ। उन्होंने कई स्थानों पर धर्म-प्रचार के साथ शिक्षा, मुद्रण और सामाजिक गतिविधियों में भी कार्य करना शुरू किया, जिससे भारत में पश्चिमी शिक्षा और मिशनरी गतिविधियों के प्रसार को आगे बढ़ने का अवसर मिला।
➣ इस प्रकार चार्टर एक्ट, 1813 ने पहली बार मिशनरियों के भारत प्रवेश को वैधानिक आधार प्रदान किया – जो कंपनी की पुरानी धार्मिक-अहस्तक्षेप नीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
शिक्षा, साहित्य एवं विज्ञान के लिए वार्षिक अनुदान (धारा 43)
➣ चार्टर एक्ट, 1813 से पहले भारत में शिक्षा के प्रसार की कोई स्पष्ट एवं नियमित सरकारी नीति नहीं थी। 1765 में बंगाल की दीवानी प्राप्त होने के बाद से भी कंपनी के कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स का यह रुख रहा था कि शिक्षा एक निजी विषय है, जिसे व्यक्तियों तथा धार्मिक संस्थाओं पर छोड़ देना चाहिए – क्योंकि कंपनी को आशंका थी कि धार्मिक-सांस्कृतिक मामलों में दखल देने से भारतीय जनता में अशांति फैल सकती है।
➣ 1813 तक ब्रिटेन में यह विचार मजबूत होने लगा था कि भारत में शासन करने वाली ब्रिटिश सत्ता को शिक्षा के प्रसार की दिशा में भी कुछ जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
➣ इइसी पृष्ठभूमि में चार्टर एक्ट, 1813 ने अपनी प्रसिद्ध धारा 43 के अंतर्गत यह प्रावधान किया कि कंपनी के राजस्व से प्रतिवर्ष कम से कम 1 लाख रुपये की राशि भारतीय साहित्य के पुनरुद्धार व सुधार, भारत के विद्वान नागरिकों को प्रोत्साहन, तथा ब्रिटिश भारतीय क्षेत्रों के निवासियों में विज्ञान संबंधी ज्ञान के परिचय व प्रोत्साहन के लिए अलग रखी जाएगी।
➣ इस प्रावधान का महत्व इसलिए अधिक था क्योंकि पहली बार भारतीय शिक्षा के लिए सरकारी धन निर्धारित किया गया और शिक्षा के क्षेत्र में कंपनी सरकार की जिम्मेदारी को वैधानिक रूप से स्वीकार किया गया।
➣ इहालांकि धारा 43 में केवल शिक्षा के उद्देश्यों का उल्लेख था, यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इसे प्राप्त करने के लिए किस पद्धति अथवा माध्यम को अपनाया जाए। इसी अस्पष्टता के कारण अगले लगभग एक दशक तक इस राशि का व्यावहारिक उपयोग नहीं हो सका और यह कोष लगभग निष्क्रिय पड़ा रहा।
➣ इस अस्पष्टता को दूर करने तथा धन के उपयोग की दिशा तय करने हेतु 1823 में गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल द्वारा जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन नामक समिति का गठन किया गया।
➣ इसमिति के अधिकांश सदस्य प्राच्यवादी विचारधारा के समर्थक थे, इसलिए प्रारंभ में इस अनुदान का बड़ा भाग संस्कृत, अरबी तथा फारसी जैसी पारंपरिक भारतीय विद्याओं के संरक्षण व संवर्धन पर ही खर्च किया गया।
➣ चूंकि अधिनियम ने यह स्पष्ट नहीं किया था कि इस धनराशि का उपयोग प्राच्य शिक्षा (संस्कृत, अरबी, फारसी) के लिए किया जाए या पाश्चात्य शिक्षा (अंग्रेज़ी भाषा व पश्चिमी विज्ञान) के लिए, इसी कारण आगे चलकर भारतीय शिक्षा की दिशा को लेकर प्राच्यवादियों और पाश्चात्यवादियों/आंग्लवादियों के बीच तीव्र वैचारिक विवाद उत्पन्न हुआ।
➣ इयह विवाद अंततः 1835 में लॉर्ड मैकाले के प्रसिद्ध शिक्षा संबंधी मिनट के माध्यम से आंग्लवादियों के पक्ष में हल हुआ, जिसने अंग्रेज़ी को शिक्षा के माध्यम के रूप में स्थापित किया।
प्रांतीय परिषदों के विनियमों को ब्रिटिश संसद के समक्ष रखना
➣ 1813 से पहले मद्रास, बंबई तथा कलकत्ता की परिषदों द्वारा बनाए गए विनियम मुख्यतः कंपनी के आंतरिक ढाँचे के भीतर ही सीमित रहते थे, और ब्रिटिश संसद के पास उनकी नियमित एवं व्यवस्थित जानकारी पहुँचाने की कोई बाध्यकारी व्यवस्था नहीं थी। इससे भारत में बनने वाले कानूनों पर संसदीय निगरानी कमज़ोर रह जाती थी।
➣ चार्टर एक्ट, 1813 ने यह अनिवार्य कर दिया कि मद्रास, बंबई तथा कलकत्ता की परिषदों द्वारा बनाए गए समस्त विनियम अब ब्रिटिश संसद के समक्ष रखे जाएँगे। इस प्रकार भारत में बनने वाले कानूनों को पहली बार औपचारिक संसदीय निगरानी के दायरे में लाया गया।
➣ यह प्रावधान केवल प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं था, बल्कि इसका गहरा संवैधानिक निहितार्थ था – इसने व्यवहार में यह स्थापित किया कि भारत का विधायी ढाँचा अंततः ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता के अधीन है।
➣ यही सिद्धांत उसी अधिनियम में घोषित क्राउन की निर्विवाद प्रभुसत्ता को व्यावहारिक रूप देता था, और आगे चलकर चार्टर एक्ट, 1833 में केंद्रीकृत विधायी व्यवस्था तथा कानूनों को औपचारिक रूप से Acts कहे जाने की प्रक्रिया का आधार बना।
यह प्रावधान UPSC प्रारंभिक परीक्षा 2019 में पूछे गए प्रश्न का एक महत्वपूर्ण घटक था। प्रश्न में यह परखा गया था कि क्या अभ्यर्थी जानते हैं कि 1813 के अधिनियम ने (क) चाय तथा चीन व्यापार को छोड़कर एकाधिकार समाप्त किया, (ख) मद्रास/बंबई/कलकत्ता परिषदों के विनियमों को संसद के समक्ष रखना अनिवार्य करके भारत में ब्रिटिश क्षेत्रों की संवैधानिक स्थिति परिभाषित की, तथा (ग) कंपनी का राजस्व, प्रशासन व नियुक्तियों पर नियंत्रण अछूता ही रहा – केवल बोर्ड ऑफ कंट्रोल की पर्यवेक्षण-शक्ति बढ़ाई गई।
कंपनी के प्रशासनिक खर्चों की जिम्मेदारी
➣ यह सिद्धांत पहले ही चार्टर एक्ट, 1793 द्वारा स्थापित किया जा चुका था कि भारत में कंपनी द्वारा किए जाने वाले प्रशासनिक, सैन्य तथा शासन-संबंधी खर्च पहले भारत से प्राप्त राजस्व से ही चुकाए जाएंगे, और उसके बाद बची अधिशेष राशि में से ब्रिटिश सरकार को प्रतिवर्ष 5 लाख पाउंड का भुगतान किया जाएगा।
➣ चार्टर एक्ट, 1813 के समय तक ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापारिक गतिविधियों के साथ-साथ भारत में व्यापक प्रशासनिक और सैन्य कार्य भी कर रही थी। इसलिए कंपनी के व्यापारिक वित्त और भारत के प्रशासन से संबंधित वित्त के बीच स्पष्ट अंतर करना आवश्यक हो गया।
➣ इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए 1813 के अधिनियम ने एक नया प्रावधान जोड़ा – कंपनी को अपने वाणिज्यिक लेन-देन तथा क्षेत्रीय राजस्व के पृथक-पृथक लेखे रखने होंगे, ताकि यह स्पष्ट पता चल सके कि कंपनी की आय का कितना भाग व्यापार से और कितना भाग भारत के प्रशासन-राजस्व से आ रहा है। यह 1793 के सिद्धांत को दोहराने के बजाय उसे और अधिक पारदर्शी बनाने वाला कदम था।
➣ इसी वित्तीय व्यवस्था के अंतर्गत भारत से प्राप्त आय में से पहले प्रशासनिक एवं सैन्य खर्च, ऋण पर ब्याज, शेयरधारकों का लाभांश तथा अधिकारियों के वेतन जैसे आवश्यक खर्च चुकाए जाने थे।
➣ इसके बाद शेष राशि में से कंपनी द्वारा ब्रिटिश सरकार को 5 लाख पाउंड का वार्षिक भुगतान जारी रहा। इसके साथ ही इंग्लैंड में स्थित होम गवर्नमेंट (कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स व बोर्ड ऑफ कंट्रोल) के कर्मचारियों का वेतन एवं प्रशासनिक खर्च भी भारतीय राजस्व से ही चुकाए जाने की व्यवस्था बनी रही, जो 1919 तक जारी रही।
➣ इस प्रकार स्पष्ट होता है कि चार्टर एक्ट, 1813 ने कंपनी के व्यापार-प्रशासन के लेखों को अलग करने का नया कदम जोड़ा, जबकि भारत के प्रशासन का आर्थिक भार भारत से प्राप्त राजस्व पर ही रखने का मूल सिद्धांत 1793 से यथावत चला आ रहा था।
भारतीय क्षेत्रों पर ब्रिटिश क्राउन की प्रभुसत्ता
➣ पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 तथा चार्टर एक्ट, 1793 ने यह सैद्धांतिक आधार रखा था कि कंपनी की प्रभुसत्ता क्राउन की ओर से ही अर्जित मानी जाएगी (न्यासी सिद्धांत)। फिर भी इन अधिनियमों में भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्रों की संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट एवं औपचारिक रूप से घोषित नहीं किया गया था।
➣ चार्टर एक्ट, 1813 ने इस अस्पष्टता को पूर्णतः समाप्त कर दिया। इस अधिनियम में पहली बार स्पष्ट-शब्दों में यह घोषित किया गया कि भारत में ब्रिटिश अधिकार वाले क्षेत्र तथा उनसे प्राप्त राजस्व, संयुक्त राजशाही के क्राउन की निर्विवाद प्रभुसत्ता के अधीन हैं। यह वाक्यांश अधिनियम में शब्दशः प्रयुक्त किया गया, जिससे यह विषय कानूनी रूप से पूर्णतः स्पष्ट हो गया।
➣ इसका व्यावहारिक अर्थ यह था कि कंपनी अब कानूनी दृष्टि से भारत की स्वामी नहीं, बल्कि मात्र एक पट्टेदार अथवा प्रबंधक के समान मानी गई, जो क्राउन की ओर से भारत का प्रशासन चला रही थी।
➣ इस प्रकार कंपनी को भारत में अपने क्षेत्रीय अधिकार तथा राजस्व अगले 20 वर्षों (1813 से 1833) तक बनाए रखने की अनुमति अवश्य दी गई, परंतु यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि इससे ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्च एवं निर्विवाद प्रभुसत्ता तनिक भी सीमित नहीं होगी।
➣ आगे चलकर सन् 1858 में, 1857 के विद्रोह के पश्चात, कंपनी शासन की समाप्ति और भारत पर क्राउन के प्रत्यक्ष शासन की स्थापना के संदर्भ में, 1813 में स्थापित यह संवैधानिक सिद्धांत एक तार्किक तथा स्वाभाविक आधार-स्तंभ सिद्ध हुआ।
कंपनी के लाभांश की दर में वृद्धि
➣ चार्टर एक्ट, 1793 के समय शेयरधारकों को अधिकतम 10 प्रतिशत तक लाभांश देने की अनुमति दी गई थी (बोर्ड ऑफ कंट्रोल के तत्कालीन अध्यक्ष हेनरी डंडास के प्रस्ताव पर)। यह मुख्यतः कंपनी के व्यापारिक-वित्तीय हितों को ध्यान में रखकर बनाई गई व्यवस्था थी।
➣ चार्टर एक्ट, 1813 द्वारा (इसकी धारा 57 के अंतर्गत) लाभांश की दर बढ़ाकर 10.5 प्रतिशत कर दी गई। साथ ही इससे पूर्व लाभांश की दर एक अधिकतम सीमा भर थी, परंतु 1813 ने इसे एक निश्चित एवं गारंटीशुदा दर का स्वरूप दे दिया – अर्थात अब शेयरधारकों को भारतीय राजस्व से ही 10.5 प्रतिशत लाभांश मिलना सुनिश्चित कर दिया गया, चाहे कंपनी का व्यापारिक लाभ किसी भी स्तर पर क्यों न हो।
➣ यह प्रावधान इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि इसी अधिनियम के माध्यम से कंपनी का सामान्य व्यापारिक एकाधिकार समाप्त किया जा रहा था, जिससे उसकी भावी व्यापारिक आय में कमी की आशंका थी। इसलिए शेयरधारकों को यह आश्वासन देना आवश्यक समझा गया कि व्यापारिक स्वरूप कमजोर होने के बावजूद उनके निवेश पर एक निश्चित एवं सुरक्षित प्रतिफल जारी रहेगा – जो अंततः भारतीय राजस्व पर ही निर्भर था।
स्थानीय सरकारों को कर लगाने की शक्ति
➣ चार्टर एक्ट, 1813 से पहले भारत में रहने वाले उन ब्रिटिश प्रजाजनों पर, जो सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के अधिकार-क्षेत्र में आते थे (जैसे व्यापारी, वकील अथवा अन्य यूरोपीय निवासी), स्थानीय सरकारों की कर लगाने की शक्ति स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं थी, जिससे स्थानीय सरकारों के लिए अपने प्रशासनिक कार्यों हेतु आवश्यक राजस्व जुटाना कठिन होता था।
➣ इसी उद्देश्य से चार्टर एक्ट, 1813 द्वारा भारत की स्थानीय सरकारों को ऐसे व्यक्तियों पर कर लगाने की शक्ति प्रदान की गई, जो सुप्रीम कोर्ट के अधिकार-क्षेत्र के अधीन थे – इसमें लाइसेंसधारी व्यापारी भी शामिल थे।
➣ यह भी व्यवस्था की गई कि कर न चुकाने पर स्थानीय सरकार कानूनी कार्रवाई कर सकती है, और ऐसे मामलों की सुनवाई हेतु जस्टिस ऑफ द पीस नामक पदाधिकारी नियुक्त किए गए।
➣ इस प्रावधान से स्थानीय सरकारों की वित्तीय एवं प्रशासनिक शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और केंद्रीय कोष पर उनकी निर्भरता कुछ हद तक कम हुई।
भारतीय न्यायालयों की ब्रिटिश प्रजाजनों पर अधिकारिता
➣ चार्टर एक्ट, 1813 से पहले कलकत्ता, मद्रास और बंबई के प्रेसीडेंसी नगरों से बाहर रहने वाले ब्रिटिश प्रजाजन सामान्यतः कंपनी के स्थानीय न्यायालयों के अधिकार-क्षेत्र के अधीन नहीं थे, बल्कि उनके मामले मुख्यतः ब्रिटिश क्राउन के न्यायालयों से जुड़े थे। इससे भारतीय निवासियों के लिए ऐसे प्रजाजनों के विरुद्ध प्रभावी कानूनी कार्रवाई करना कठिन होता था।
➣ चार्टर एक्ट, 1813 ने इस स्थिति में परिवर्तन करते हुए प्रेसीडेंसी नगरों से बाहर रहने वाले ब्रिटिश प्रजाजनों को कुछ मामलों में स्थानीय न्यायालयों के अधिकार-क्षेत्र के अधीन लाने की व्यवस्था की।
➣ यदि कोई ब्रिटिश प्रजाजन किसी भारतीय निवासी के विरुद्ध मारपीट, जबरन प्रवेश अथवा बलपूर्वक किए गए अन्य अपराध करता था, तो जस्टिस ऑफ द पीस को कार्रवाई का अधिकार दिया गया।
➣ यदि किसी ब्रिटिश प्रजाजन पर 50 रुपये तक का ऋण बकाया था, तो संबंधित जिले का मजिस्ट्रेट ऐसे मामले की संक्षिप्त सुनवाई कर सकता था। इसके अतिरिक्त, दीवानी तथा राजस्व संबंधी मामलों में भी उन्हें उसी क्षेत्र के भारतीय निवासियों वाले स्थानीय न्यायालयों के अधीन किया गया।
➣ इस प्रावधान से कंपनी सरकार की स्थानीय न्यायिक व्यवस्था का अधिकार-क्षेत्र कुछ हद तक विस्तृत हुआ, और भारतीय निवासियों को ब्रिटिश प्रजाजनों के विरुद्ध कानूनी राहत प्राप्त करने के अधिक अवसर मिले।
भारत में बिशप की नियुक्ति एवं चर्च व्यवस्था
➣ चार्टर एक्ट, 1813 से पहले भारत में ईसाई धार्मिक व्यवस्था हेतु कोई स्पष्ट एवं केंद्रीकृत सरकारी व्यवस्था नहीं थी, जबकि भारत में ब्रिटिश अधिकारियों, सैनिकों तथा अन्य यूरोपीय निवासियों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। इसी पृष्ठभूमि में चार्टर एक्ट, 1813 द्वारा भारत में एक बिशप की नियुक्ति का प्रावधान किया गया।
➣ इसके अंतर्गत कलकत्ता में एक बिशप की नियुक्ति की गई, जो भारत में ब्रिटिश ईसाई समुदाय के धार्मिक मामलों की देखरेख करता था। उसके अधीन तीन आर्चडीकन रखने की व्यवस्था भी की गई, जिनका संबंध कलकत्ता, मद्रास और बंबई से था।
➣ इस प्रकार भारत में ब्रिटिश ईसाई धार्मिक संस्थाओं को पहली बार एक अधिक संगठित एवं वैधानिक ढाँचा प्राप्त हुआ – यह व्यवस्था मुख्यतः भारत में रहने वाले ब्रिटिश प्रजाजनों के चर्च-संबंधी मामलों को व्यवस्थित करने से जुड़ी थी, न कि सीधे धर्म-प्रचार से।
बोर्ड ऑफ कंट्रोल की शक्तियों में वृद्धि
➣ पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा स्थापित बोर्ड ऑफ कंट्रोल के माध्यम से भारत का राजनीतिक नियंत्रण बोर्ड के हाथ में तथा वाणिज्यिक शक्ति कंपनी के कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के हाथ में केंद्रित थी। चार्टर एक्ट, 1793 ने इस ढांचे को कुछ हद तक स्पष्ट किया था, फिर भी बोर्ड की शक्तियों की सीमाएं पूर्णतः स्पष्ट नहीं थीं।
➣ चार्टर एक्ट, 1813 ने यह स्पष्ट रूप से घोषित किया कि बोर्ड ऑफ कंट्रोल की पर्यवेक्षण एवं निर्देशन संबंधी शक्तियां न केवल परिभाषित की जाएं, बल्कि उन्हें बहुत बड़े स्तर पर विस्तारित भी किया जाए।
➣ बोर्ड को कंपनी के भारतीय शासन से संबंधित समस्त राजनीतिक तथा असैनिक (Civil) मामलों की निगरानी और निर्देशन करने का व्यापक अधिकार प्राप्त हुआ, विशेषकर कंपनी के क्षेत्रीय राजस्व तथा उससे जुड़े मामलों पर।
➣ इस प्रकार चार्टर एक्ट, 1813 ने कंपनी के शासन को पूर्णतः समाप्त नहीं किया, बल्कि उसके ऊपर ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण को और सुदृढ़ किया। आगे चलकर चार्टर एक्ट, 1833 के माध्यम से बोर्ड ऑफ कंट्रोल को कंपनी पर संपूर्ण एवं निर्णायक अधिकार तक प्राप्त हो गया।
कंपनी की सेना एवं सैन्य व्यवस्था संबंधी प्रावधान
➣ कंपनी के क्षेत्रों की रक्षा, भारतीय राज्यों के साथ युद्ध (जैसे आंग्ल-मराठा तथा आंग्ल-नेपाल युद्ध) तथा निरंतर क्षेत्रीय विस्तार के लिए एक बड़ी एवं स्थायी सैन्य व्यवस्था की आवश्यकता थी। कंपनी की सेना में बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक (Sepoys) भी शामिल थे, जिनसे संबंधित अनुशासन एवं सेवा-शर्तों को व्यवस्थित करना आवश्यक था।
➣ इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए यह निर्धारित किया गया कि सेना का रख-रखाव कंपनी के राजस्व पर पहला दायित्व (First Charge) होगा, इसके पश्चात ऋण पर ब्याज भुगतान दूसरा तथा असैनिक व वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों का रख-रखाव तीसरा दायित्व माना जाएगा। साथ ही यह व्यवस्था की गई कि कंपनी के राजस्व से अधिकतम लगभग 29 हजार सैनिकों का ही रख-रखाव किया जा सकेगा, ताकि सैन्य व्यय अनियंत्रित रूप से न बढ़े।
➣ चार्टर एक्ट, 1813 ने कंपनी को यह अधिकार भी दिया कि वह भारतीय सैनिकों के लिए नियम, विनियम तथा आर्टिकल्स ऑफ वॉर बना सके, ताकि सैन्य अनुशासन एक निश्चित विधिक ढांचे के अंतर्गत संचालित हो। सैन्य अनुशासन के उल्लंघन की सुनवाई तथा दंड-निर्धारण के लिए सैन्य न्यायालय (Court-Martial) के आयोजन को भी विधिक मान्यता दी गई।
कंपनी के ऋण को कम करने का प्रावधान
➣ चार्टर एक्ट, 1813 के समय तक कंपनी पर भारी मात्रा में ऋण चढ़ चुका था – भारत में लगातार होने वाले युद्धों, क्षेत्रीय विस्तार तथा नागरिक एवं सैन्य प्रशासन के बढ़ते खर्च के कारण उसे बड़ी रकम उधार लेनी पड़ी थी, जबकि इंग्लैंड में भी कंपनी पर Bond Debt का दायित्व था।
➣ इसी उद्देश्य से चार्टर एक्ट, 1813 में कंपनी के ऋण को क्रमशः कम करने की एक वित्तीय व्यवस्था की गई। इसके अनुसार भारत में कंपनी का ब्याज वाला ऋण घटाकर 10 million पौण्ड तक तथा इंग्लैंड में उसका Bond Debt घटाकर 3 मिलियन पौण्ड तक लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया।
➣ आवश्यक भुगतानों (प्रशासनिक-सैन्य खर्च, ऋण-ब्याज, 10.5% लाभांश) के बाद बची अतिरिक्त राशि को ऋण की शीघ्र अदायगी में लगाया जाना था, और यदि भविष्य में ऋण पुनः इन सीमाओं से अधिक हो जाता, तो अधिशेष राशि को पुनः ऋण घटाने में ही लगाया जाना था।
➣ यह भी निर्धारित किया गया कि कंपनी की आय से आवश्यक भुगतानों (जैसे प्रशासनिक एवं सैन्य खर्च, ऋण पर ब्याज तथा शेयरधारकों के 10.5 प्रतिशत लाभांश) को पूरा करने के बाद यदि कोई अतिरिक्त राशि बचती है, तो उसका उपयोग कंपनी के ऋण की शीघ्र अदायगी के लिए किया जाएगा।
➣ इस प्रकार चार्टर एक्ट, 1813 ने कंपनी की वित्तीय व्यवस्था में ऋण-नियंत्रण को महत्वपूर्ण स्थान दिया, जिससे स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश संसद कंपनी के प्रशासनिक-सैन्य विस्तार के साथ-साथ उसकी वित्तीय स्थिरता को भी नियंत्रित करना चाहती थी।
चार्टर एक्ट, 1793 और 1813 की तुलना
चूंकि दोनों अधिनियमों में कई विषय (व्यापार, लाभांश, बोर्ड ऑफ कंट्रोल, क्राउन-कंपनी संबंध) समान होते हुए भी अलग-अलग रूप में सामने आते हैं, इसलिए इन दोनों के बीच भ्रम होना स्वाभाविक है। नीचे दी गई तालिका दोनों अधिनियमों के मुख्य अंतर को स्पष्ट करती है:
| विषय | चार्टर एक्ट, 1793 | चार्टर एक्ट, 1813 |
| व्यापारिक एकाधिकार | भारत के साथ सामान्य व्यापारिक एकाधिकार जारी रखा गया (अगले 20 वर्षों के लिए) | भारत के साथ सामान्य व्यापारिक एकाधिकार समाप्त। केवल चाय, चीन व अफीम व्यापार पर एकाधिकार बरकरार |
| चार्टर/अधिकारों की अवधि | अगले 20 वर्ष (1793-1813) | अगले 20 वर्ष (1813-1833) |
| निजी व्यापार | केवल लाइसेंस द्वारा सीमित ‘कंट्री ट्रेड/प्रिविलेज ट्रेड’ की अनुमति | ब्रिटिश व्यापारियों को लाइसेंस द्वारा व्यापक रूप से भारत में व्यापार की अनुमति |
| लाभांश की दर | अधिकतम 10% (ऊपरी सीमा मात्र) | बढ़ाकर 10.5% (धारा 57 अंतर्गत निश्चित/गारंटीशुदा दर) |
| बोर्ड ऑफ कंट्रोल | संरचना स्पष्ट (1 अध्यक्ष + 2 कनिष्ठ सदस्य)। वेतन भारतीय राजस्व से | पर्यवेक्षण एवं निर्देशन शक्तियां परिभाषित एवं बड़े स्तर पर विस्तारित |
| क्राउन-कंपनी संबंध / प्रभुसत्ता सिद्धांत | परोक्ष सिद्धांत: प्रभुसत्ता क्राउन की ओर से प्रत्यायोजित मानी गई (न्यासी/Trustee संबंध) | पहली बार स्पष्ट-शब्दों में घोषणा: भारतीय क्षेत्र “क्राउन की निर्विवाद प्रभुसत्ता” के अधीन। कंपनी मात्र प्रशासक/पट्टेदार |
| गवर्नर-जनरल की शक्ति | परिषद् के निर्णय को अस्वीकार करने की वीटो शक्ति सभी भावी गवर्नर-जनरलों के लिए स्थायी की गई | गवर्नर-जनरल की परिषद्-शक्ति संबंधी कोई नया परिवर्तन नहीं (मुख्य बदलाव व्यापार, शिक्षा व धर्म क्षेत्र में) |
| राजस्व-न्याय पृथक्करण | कलेक्टरों के न्यायिक अधिकार समाप्त। माल अदालतें बंद | इस विषय पर कोई नया प्रावधान नहीं। बल्कि ब्रिटिश प्रजाजनों को स्थानीय न्यायालयों के अधीन लाने पर केंद्रित |
| संसदीय निगरानी | प्रांतीय विनियमों को संसद के समक्ष रखने की कोई अनिवार्यता नहीं | मद्रास, बंबई व कलकत्ता परिषदों के विनियम ब्रिटिश संसद के समक्ष रखना अनिवार्य |
| शिक्षा | कोई प्रावधान नहीं | पहली बार धारा 43 के अंतर्गत 1 लाख रुपये वार्षिक – साहित्य, विद्वानों व विज्ञान हेतु |
| मिशनरी/धर्म | कोई प्रावधान नहीं (कंपनी विरोध में थी) | पहली बार मिशनरियों को भारत आने व धर्म-प्रचार की अनुमति (‘पायस क्लॉज़’)। कलकत्ता में बिशप + 3 आर्चडीकन नियुक्त |
| स्थानीय कराधान | कोई प्रावधान नहीं | स्थानीय सरकारों को सुप्रीम कोर्ट क्षेत्राधिकार वाले व्यक्तियों पर कर लगाने की शक्ति |
| ऋण एवं सेना | कोई विशेष ऋण-नियंत्रण प्रावधान नहीं | ऋण घटाने के लक्ष्य (£1 करोड़ भारत, £30 लाख इंग्लैंड) व सेना की सीमा (~29,000 सैनिक) निर्धारित |
| प्रकृति | मुख्यतः सुदृढ़ीकरण अधिनियम (मौजूदा व्यवस्था को आगे बढ़ाना) | व्यापारिक एकाधिकार समाप्त करने वाला तथा शिक्षा-धर्म में नए द्वार खोलने वाला परिवर्तनकारी अधिनियम |
1793 = निरंतरता (सुदृढ़ीकरण) – पुरानी व्यवस्था आगे बढ़ी, व्यापारिक एकाधिकार बरकरार रहा। 1813 = परिवर्तन की शुरुआत – व्यापारिक एकाधिकार टूटा, शिक्षा व मिशनरी के नए द्वार खुले, और क्राउन की सर्वोच्चता पहली बार स्पष्ट शब्दों में घोषित हुई।
चार्टर एक्ट, 1813 का महत्व
➣ कंपनी के व्यापारिक स्वरूप के कमजोर होने की शुरुआत:- चार्टर एक्ट, 1813 ने भारत के साथ व्यापार पर ईस्ट इंडिया कंपनी के सामान्य एकाधिकार को समाप्त कर दिया। यद्यपि चाय, अफीम तथा चीन के साथ व्यापार पर उसका एकाधिकार अभी बना रहा, फिर भी इससे कंपनी के पुराने एकाधिकारवादी व्यापारिक स्वरूप के अंत की प्रक्रिया शुरू हुई। आगे चलकर चार्टर एक्ट, 1833 ने कंपनी की शेष व्यापारिक गतिविधियों को भी समाप्त कर दिया।
➣ भारतीय व्यापार को ब्रिटिश व्यापारियों के लिए खोलना:- कंपनी के सामान्य व्यापारिक एकाधिकार की समाप्ति के बाद लाइसेंस प्राप्त ब्रिटिश निजी व्यापारियों के लिए भारत के साथ व्यापार करने का मार्ग खुल गया, जिससे भारत-ब्रिटेन आर्थिक संबंध व्यापक ब्रिटिश व्यापारिक हितों से जुड़ने लगे।
➣ कंपनी के प्रशासकीय स्वरूप की ओर संक्रमण:- व्यापारिक एकाधिकार के कमजोर होने के बावजूद कंपनी के राजनीतिक एवं प्रशासनिक अधिकार जारी रहे, जिससे कंपनी का स्वरूप धीरे-धीरे व्यापारिक संस्था से मुख्यतः प्रशासनिक संस्था की दिशा में बढ़ने लगा। यह प्रक्रिया 1833 में और स्पष्ट हुई।
➣ ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्चता को स्पष्ट करना:- अधिनियम ने कंपनी के अधीन भारतीय क्षेत्रों पर ब्रिटिश क्राउन की निर्विवाद प्रभुसत्ता को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया, जिससे भारत पर ब्रिटिश सरकार के संवैधानिक दावे को मजबूती मिली।
➣ शिक्षा को सरकार की जिम्मेदारी से जोड़ना:- भारतीय साहित्य, विद्वानों तथा विज्ञान संबंधी ज्ञान के प्रोत्साहन के लिए प्रतिवर्ष 1 लाख रुपये निर्धारित करना भारतीय शिक्षा के इतिहास में महत्वपूर्ण परिवर्तन था। इसी से भारत की शिक्षा-नीति और प्राच्यवादी-आंग्लवादी विवाद के विकास का आधार तैयार हुआ।
➣ भारत में ईसाई मिशनरी गतिविधियों के लिए मार्ग प्रशस्त करना:- मिशनरियों को भारत में आने की अनुमति मिलने से कंपनी की पूर्ववर्ती धार्मिक अहस्तक्षेप नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया, और बिशप-आर्चडीकन व्यवस्था ने ब्रिटिश ईसाई धार्मिक संस्थाओं को अधिक संगठित आधार प्रदान किया।
➣ ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण का विस्तार:- बोर्ड ऑफ कंट्रोल की शक्तियों को अधिक स्पष्ट और व्यापक बनाए जाने से कंपनी के भारतीय प्रशासन पर ब्रिटिश सरकार का प्रभाव और मजबूत हुआ, जिससे कंपनी की स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका क्रमशः सीमित होती गई।
➣ व्यापारिक और क्षेत्रीय वित्त के पृथक्करण की दिशा में कदम:- कंपनी के वाणिज्यिक लेन-देन और क्षेत्रीय राजस्व के पृथक लेखे रखने की व्यवस्था ने कंपनी की व्यापारिक तथा शासकीय भूमिकाओं के बीच वित्तीय अंतर को अधिक स्पष्ट किया।
➣ औपनिवेशिक शासन के वित्तीय एवं सैन्य ढाँचे का सुदृढ़ीकरण:- राजस्व-उपयोग, ऋण-भुगतान, सैन्य व्यय तथा सेना के अनुशासन से संबंधित व्यवस्थाओं ने ब्रिटिश भारतीय शासन के वित्तीय-सैन्य आधार को अधिक संगठित किया।
➣ 1833 के व्यापक परिवर्तन की भूमिका तैयार करना:- चार्टर एक्ट, 1813 ने कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को आंशिक रूप से समाप्त करके, प्रशासन पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाकर और व्यापार-शासन के बीच अंतर स्पष्ट करके उस परिवर्तन की नींव तैयार की, जिसे चार्टर एक्ट, 1833 ने आगे बढ़ाया।
चार्टर एक्ट, 1813 की सीमाएँ / कमियाँ
➣ शिक्षा हेतु अपर्याप्त राशि:- भारत जैसी विशाल जनसंख्या और शिक्षा की व्यापक आवश्यकता की तुलना में 1 लाख रुपये की वार्षिक राशि अत्यंत कम थी, और इसे शिक्षा में वास्तविक निवेश के बजाय केवल एक प्रतीकात्मक कदम माना जाता है। इसके क्रियान्वयन में भी लगभग एक दशक की देरी हुई।
➣ कंपनी की सत्ता का बड़ा हिस्सा बरकरार:- व्यापारिक एकाधिकार में परिवर्तन के बावजूद कंपनी का प्रशासन, राजस्व-संग्रह तथा प्रमुख नियुक्तियों पर नियंत्रण जारी रहा – अर्थात कंपनी की सत्ता में कोई गुणात्मक कमी नहीं आई, केवल उसका व्यापारिक आधार सिकुड़ा।
➣ व्यापारिक एकाधिकार अधूरा समाप्त:- चाय, चीन तथा अफीम के लाभदायक व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार बना रहने से व्यापार का उदारीकरण केवल आंशिक रहा।
➣ भारतीय उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव:- ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं के लिए भारतीय बाजार खुलने से स्वदेशी हस्तशिल्प एवं वस्त्र उद्योग (जैसे हथकरघा वस्त्र-उद्योग) पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, जिससे कारीगरों में बेरोजगारी और आर्थिक संकट बढ़ा।
➣ मिशनरी प्रावधान पर सांस्कृतिक विवाद:- मिशनरियों को दी गई अनुमति को कुछ वर्गों ने भारतीय समाज पर पश्चिमी सांस्कृतिक-धार्मिक हस्तक्षेप के रूप में देखा, जिससे संदेह एवं प्रतिरोध की भावना पैदा हुई।
➣ शिक्षा-नीति में स्पष्टता का अभाव:- धारा 43 में शिक्षा की पद्धति और माध्यम स्पष्ट न होने के कारण फंड का उपयोग वर्षों तक अनिश्चित रहा और आगे चलकर प्राच्यवादी-आंग्लवादी विवाद को जन्म दिया।
चार्टर एक्ट, 1793 और 1813 की तुलना
चूंकि दोनों अधिनियमों में कई विषय (व्यापार, लाभांश, बोर्ड ऑफ कंट्रोल, क्राउन-कंपनी संबंध) समान होते हुए भी अलग-अलग रूप में सामने आते हैं, इसलिए इन दोनों के बीच भ्रम होना स्वाभाविक है। नीचे दी गई तालिका दोनों अधिनियमों के मुख्य अंतर को स्पष्ट करती है:
| विषय | चार्टर एक्ट, 1793 | चार्टर एक्ट, 1813 |
| व्यापारिक एकाधिकार | भारत के साथ सामान्य व्यापारिक एकाधिकार जारी रखा गया (अगले 20 वर्षों के लिए) | भारत के साथ सामान्य व्यापारिक एकाधिकार समाप्त। केवल चाय, चीन व अफीम व्यापार पर एकाधिकार बरकरार |
| चार्टर/अधिकारों की अवधि | अगले 20 वर्ष (1793-1813) | अगले 20 वर्ष (1813-1833) |
| निजी व्यापार | केवल लाइसेंस द्वारा सीमित ‘कंट्री ट्रेड/प्रिविलेज ट्रेड’ की अनुमति | ब्रिटिश व्यापारियों को लाइसेंस द्वारा व्यापक रूप से भारत में व्यापार की अनुमति |
| लाभांश की दर | अधिकतम 10% (ऊपरी सीमा मात्र) | बढ़ाकर 10.5% (धारा 57 अंतर्गत निश्चित/गारंटीशुदा दर) |
| बोर्ड ऑफ कंट्रोल | संरचना स्पष्ट (1 अध्यक्ष + 2 कनिष्ठ सदस्य)। वेतन भारतीय राजस्व से | पर्यवेक्षण एवं निर्देशन शक्तियां परिभाषित एवं बड़े स्तर पर विस्तारित |
| क्राउन-कंपनी संबंध / प्रभुसत्ता सिद्धांत | परोक्ष सिद्धांत: प्रभुसत्ता क्राउन की ओर से प्रत्यायोजित मानी गई (न्यासी/Trustee संबंध) | पहली बार स्पष्ट-शब्दों में घोषणा: भारतीय क्षेत्र “क्राउन की निर्विवाद प्रभुसत्ता” के अधीन। कंपनी मात्र प्रशासक/पट्टेदार |
| गवर्नर-जनरल की शक्ति | परिषद् के निर्णय को अस्वीकार करने की वीटो शक्ति सभी भावी गवर्नर-जनरलों के लिए स्थायी की गई | गवर्नर-जनरल की परिषद्-शक्ति संबंधी कोई नया परिवर्तन नहीं (मुख्य बदलाव व्यापार, शिक्षा व धर्म क्षेत्र में) |
| राजस्व-न्याय पृथक्करण | कलेक्टरों के न्यायिक अधिकार समाप्त। माल अदालतें बंद | इस विषय पर कोई नया प्रावधान नहीं। बल्कि ब्रिटिश प्रजाजनों को स्थानीय न्यायालयों के अधीन लाने पर केंद्रित |
| संसदीय निगरानी | प्रांतीय विनियमों को संसद के समक्ष रखने की कोई अनिवार्यता नहीं | मद्रास, बंबई व कलकत्ता परिषदों के विनियम ब्रिटिश संसद के समक्ष रखना अनिवार्य |
| शिक्षा | कोई प्रावधान नहीं | पहली बार धारा 43 के अंतर्गत 1 लाख रुपये वार्षिक – साहित्य, विद्वानों व विज्ञान हेतु |
| मिशनरी/धर्म | कोई प्रावधान नहीं (कंपनी विरोध में थी) | पहली बार मिशनरियों को भारत आने व धर्म-प्रचार की अनुमति (‘पायस क्लॉज़’)। कलकत्ता में बिशप + 3 आर्चडीकन नियुक्त |
| स्थानीय कराधान | कोई प्रावधान नहीं | स्थानीय सरकारों को सुप्रीम कोर्ट क्षेत्राधिकार वाले व्यक्तियों पर कर लगाने की शक्ति |
| ऋण एवं सेना | कोई विशेष ऋण-नियंत्रण प्रावधान नहीं | ऋण घटाने के लक्ष्य (£1 करोड़ भारत, £30 लाख इंग्लैंड) व सेना की सीमा (~29,000 सैनिक) निर्धारित |
| प्रकृति | मुख्यतः सुदृढ़ीकरण अधिनियम (मौजूदा व्यवस्था को आगे बढ़ाना) | व्यापारिक एकाधिकार समाप्त करने वाला तथा शिक्षा-धर्म में नए द्वार खोलने वाला परिवर्तनकारी अधिनियम |
1793 = निरंतरता (सुदृढ़ीकरण) – पुरानी व्यवस्था आगे बढ़ी, व्यापारिक एकाधिकार बरकरार रहा। 1813 = परिवर्तन की शुरुआत – व्यापारिक एकाधिकार टूटा, शिक्षा व मिशनरी के नए द्वार खुले, और क्राउन की सर्वोच्चता पहली बार स्पष्ट शब्दों में घोषित हुई।
चार्टर एक्ट, 1813 – भ्रम बिंदु
➣ चार्टर एक्ट, 1813 ने कंपनी का भारत के साथ संपूर्ण व्यापारिक एकाधिकार समाप्त नहीं किया था। चाय, चीन के साथ व्यापार तथा अफीम पर कंपनी का एकाधिकार अभी भी बना रहा।
➣ 1 लाख रुपये वार्षिक का प्रावधान केवल सामान्य शिक्षा के लिए नहीं था, बल्कि भारतीय साहित्य के पुनरुद्धार व सुधार, विद्वानों को प्रोत्साहन तथा विज्ञान संबंधी ज्ञान के प्रसार से भी संबंधित था (धारा 43)।
➣ 1793 में कंपनी के शेयरधारकों के लिए लाभांश की अधिकतम दर 10% थी, जबकि 1813 में इसे बढ़ाकर 10.5% किया गया।
➣ बोर्ड ऑफ कंट्रोल की स्थापना पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा हुई थी, न कि 1813 में। चार्टर एक्ट, 1813 ने इसकी पर्यवेक्षण एवं निर्देशन संबंधी शक्तियों को और अधिक स्पष्ट एवं व्यापक किया।
➣ भारत में ब्रिटिश क्राउन की निर्विवाद प्रभुसत्ता का स्पष्ट-शब्दों में उल्लेख चार्टर एक्ट, 1813 से संबंधित है, न कि 1793 का। 1793 में यह सिद्धांत केवल परोक्ष रूप (न्यासी सिद्धांत) में मौजूद था।
➣ ईसाई मिशनरियों को भारत में प्रवेश की अनुमति चार्टर एक्ट, 1813 की महत्वपूर्ण विशेषता थी, न कि 1793 की। इससे कंपनी की पूर्व धार्मिक अहस्तक्षेप की नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।
➣ बिशप की व्यवस्था और मिशनरियों को भारत आने की अनुमति एक ही बात नहीं थी। बिशप की नियुक्ति भारत में ब्रिटिश ईसाई धार्मिक व्यवस्था को संगठित करने से संबंधित थी, जबकि मिशनरियों का प्रावधान धार्मिक प्रचार एवं गतिविधियों से संबंधित था।
➣ चार्टर एक्ट, 1813 ने कंपनी का शासन समाप्त नहीं किया था। कंपनी के राजनीतिक एवं प्रशासनिक अधिकार अभी भी बने रहे। मुख्य परिवर्तन उसके व्यापारिक एकाधिकार तथा उस पर ब्रिटिश नियंत्रण से संबंधित थे।
➣ यह न समझें कि 1813 के अधिनियम ने कंपनी के राजस्व, प्रशासन तथा नियुक्तियों पर नियंत्रण में भी कोई कटौती की – ये तीनों क्षेत्र पूर्णतः अछूते रहे। इस अधिनियम ने केवल बोर्ड ऑफ कंट्रोल की पर्यवेक्षण एवं निर्देशन शक्ति को विस्तारित किया। (यह ठीक वही बिंदु है जिस पर UPSC प्रारंभिक परीक्षा 2019 में अभ्यर्थियों को भ्रमित करने वाला कथन दिया गया था।)
➣ कंपनी के वाणिज्यिक लेन-देन और क्षेत्रीय राजस्व के पृथक लेखे रखने का प्रावधान कंपनी की व्यापारिक तथा प्रशासनिक भूमिकाओं के बीच वित्तीय अंतर स्पष्ट करने के लिए किया गया था।
➣ चार्टर एक्ट, 1813 को कंपनी के व्यापारिक स्वरूप के अंत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है, लेकिन कंपनी का व्यापार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था – उसका शेष व्यापारिक स्वरूप चार्टर एक्ट, 1833 में समाप्त हुआ।
➣ गवर्नर-जनरल का आधिकारिक पद-नाम ‘गवर्नर-जनरल ऑफ बंगाल’ से बदलकर ‘गवर्नर-जनरल ऑफ इंडिया’ करने का कार्य चार्टर एक्ट, 1813 में नहीं हुआ था – यह परिवर्तन चार्टर एक्ट, 1833 में हुआ (कुछ स्रोतों में यह भ्रामक रूप से 1813 से जोड़ दिया जाता है, जो गलत है)।
▪ 1773 – कंपनी के शासन पर ब्रिटिश संसद के नियंत्रण की शुरुआत।
▪ 1784 – बोर्ड ऑफ कंट्रोल और द्वैध नियंत्रण की स्थापना।
▪ 1793 – मौजूदा व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण और कंपनी के चार्टर का 20 वर्षों के लिए नवीनीकरण। प्रभुसत्ता का परोक्ष (न्यासी) सिद्धांत।
▪ 1813 – कंपनी के भारत संबंधी सामान्य व्यापारिक एकाधिकार में बड़ा परिवर्तन (समाप्ति)। क्राउन की निर्विवाद प्रभुसत्ता का पहली बार स्पष्ट उल्लेख। शिक्षा (धारा 43) व मिशनरी प्रवेश के नए द्वार।
Leave a Reply