बंगाल के नवाब (1717–1772 ई.) : उदय, नवाबी शासन एवं पतन

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत बंगाल के नवाब (1717–1772 ई.)
📚 विषय सूची

बंगाल का संक्षिप्त इतिहास

काल/वर्ष प्रमुख घटना
प्राचीन काल वंग (बंग), गौड़, पुण्ड्र, राढ़ एवं समतट जैसे प्राचीन जनपद।
मौर्य काल बंगाल मौर्य साम्राज्य के अधीन।
गुप्त काल व्यापार, कला एवं संस्कृति का उत्कर्ष।
8वीं–12वीं शताब्दी पाल वंश का शासन।
12वीं शताब्दी सेन वंश का शासन; लक्ष्मण सेन अंतिम प्रमुख हिन्दू शासक।
1204 ई. बख्तियार खिलजी द्वारा लक्ष्मण सेन की पराजय; बंगाल में तुर्क शासन की स्थापना।
1280 ई. बलबन द्वारा तुग़रिल ख़ाँ के विद्रोह का दमन।
1494–1538 ई. हुसैन शाही वंश (बंगाल सल्तनत का स्वर्णकाल)।
1538–1576 ई. अफ़ग़ान कर्रानी वंश का शासन।
1576 ई. राजमहल के युद्ध के बाद बंगाल मुग़ल साम्राज्य में शामिल।
17वीं शताब्दी यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों का आगमन।
1707 ई. के बाद मुग़ल सत्ता कमजोर; सूबेदारों की स्वायत्तता।
1717–1727 ई. मुर्शिद कुली ख़ाँ के नेतृत्व में स्वतंत्र बंगाल के नवाबों का उदय।

बंगाल के नवाब

बंगाल मुग़ल साम्राज्य के सबसे समृद्ध, सम्पन्न एवं महत्त्वपूर्ण सूबों में से एक था। इसके अंतर्गत वर्तमान पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, बिहार तथा उड़ीसा (ओडिशा) के विशाल भू-भाग शामिल थे।

➣ अपनी उर्वर भूमि, विकसित कृषि, वस्त्र एवं रेशम उद्योग, नौवहन तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार के कारण बंगाल को उस समय भारत का सबसे धनी प्रान्त माना जाता था। गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा की उपजाऊ मिट्टी के कारण यहाँ धान, गन्ना, तिलहन तथा अन्य कृषि उत्पादों की प्रचुर पैदावार होती थी।

➣ इसके अतिरिक्त मलमल, रेशम, सूती वस्त्र, शोरा, चीनी तथा अन्य हस्तशिल्प उत्पादों की देश-विदेश में भारी माँग थी। समुद्री एवं नदी मार्गों के विकसित नेटवर्क ने बंगाल को भारत, एशिया तथा यूरोप के प्रमुख व्यापारिक क्षेत्रों से जोड़ रखा था।

बंगाल के नवाब : एक नज़र में

नवाब (शासनकाल) प्रमुख घटनाएँ / उपलब्धियाँ
मुर्शिद कुली ख़ाँ
(1717–1727 ई.)
स्वतंत्र बंगाल राज्य की नींव रखी, राजधानी मुर्शिदाबाद बनाई, इजारेदारी व्यवस्था लागू की तथा राजस्व एवं प्रशासनिक सुधार किए।
शुजाउद्दीन मुहम्मद ख़ाँ
(1727–1739 ई.)
1733 ई. में बिहार को बंगाल में सम्मिलित किया गया तथा अलीवर्दी ख़ाँ को बिहार का नायब सूबेदार नियुक्त किया।
सरफ़राज ख़ाँ
(1739–1740 ई.)
1739 ई. में नादिरशाह का आक्रमण हुआ तथा 1740 ई. में गिरिया के युद्ध में अलीवर्दी ख़ाँ से पराजित होकर मारा गया।
अलीवर्दी ख़ाँ
(1740–1756 ई.)
मराठा आक्रमणों का सामना किया, 1751 ई. में मराठों से संधि की, अंग्रेज़ों की किलेबंदी का विरोध किया तथा सिराजुद्दौला को उत्तराधिकारी बनाया।
सिराजुद्दौला
(1756–1757 ई.)
कलकत्ता पर अधिकार किया, ब्लैक होल घटना हुई, अलीनगर की संधि हुई तथा 1757 ई. में प्लासी का युद्ध लड़ा गया।
मीर जाफ़र
(1757–1760 एवं 1763–1765 ई.)
बंगाल का प्रथम कठपुतली नवाब बना, कम्पनी को 24 परगनों की ज़मींदारी दी, 1759 ई. में बेदारा के युद्ध में डचों की पराजय हुई तथा दो बार नवाब बना।
मीर क़ासिम
(1760–1763 ई.)
राजधानी मुंगेर स्थानांतरित की, सेना का आधुनिकीकरण किया, 1762 ई. में आंतरिक चुंगी समाप्त की, 1763 ई. में पटना हत्याकाण्ड हुआ तथा बक्सर के युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हुई।
नज़्मुद्दौला
(1765–1766 ई.)
1765 ई. की इलाहाबाद की संधियाँ हुईं, कम्पनी को बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा की दीवानी प्राप्त हुई तथा द्वैध शासन लागू किया गया।
सैफ़ुद्दौला
(1766–1770 ई.)
नवाब केवल औपचारिक शासक रहा तथा वास्तविक सत्ता अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के हाथों में रही।
मुबारकुद्दौला
(1770–1793 ई.)
1770 ई. का बंगाल अकाल पड़ा तथा 1772 ई. में वारेन हेस्टिंग्स ने द्वैध शासन समाप्त कर कम्पनी का प्रत्यक्ष प्रशासन स्थापित किया।

नवाबों का उदय

➣ प्रारम्भ में बंगाल पर मुग़ल सम्राटों द्वारा नियुक्त सूबेदार शासन करते थे, किन्तु 1707 ई. में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति कमजोर होने लगी। इस अवसर का लाभ उठाकर बंगाल के सूबेदारों ने अपनी प्रशासनिक, सैन्य एवं आर्थिक शक्ति को सुदृढ़ किया और धीरे-धीरे व्यवहार में स्वतंत्र शासक बन गए।

➣ यद्यपि वे औपचारिक रूप से मुग़ल सम्राट की अधीनता स्वीकार करते रहे तथा उसके नाम के सिक्के चलाते रहे, परन्तु वास्तविक शासन उनके अपने हाथों में था। इसी प्रकार बंगाल में स्वतंत्र नवाबों का उदय हुआ।

➣ बंगाल के नवाबों ने प्रभावी राजस्व एवं प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित कर प्रान्त की आर्थिक समृद्धि को बनाए रखा। यही कारण था कि 18वीं शताब्दी के प्रारम्भ में बंगाल भारत का सबसे समृद्ध एवं राजस्व-संपन्न प्रान्त माना जाता था।

➣ बंगाल की अपार समृद्धि ने पुर्तग़ाली, डच, अंग्रेज़, फ्रांसीसी तथा अन्य यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों को आकर्षित किया। उन्होंने यहाँ अनेक व्यापारिक केन्द्र स्थापित किए और समय के साथ उनका प्रभाव केवल व्यापार तक सीमित न रहकर स्थानीय राजनीति तक पहुँच गया।

➣ परिणामस्वरूप बंगाल के नवाबों और विशेषकर अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच संघर्ष बढ़ता गया। इनमें प्लासी का युद्ध (1757 ई.) सबसे निर्णायक सिद्ध हुआ, जिसने बंगाल में नवाबी शासन के पतन तथा भारत में अंग्रेज़ी सत्ता की नींव रखी।

मुर्शिद कुली ख़ाँ, शुजाउद्दीन तथा अलीवर्दी ख़ाँ के शासनकाल में बंगाल अपनी समृद्धि के चरम पर पहुँच गया, इसलिए इसे भारत का स्वर्ग कहा जाने लगा था।
अलीवर्दी ख़ाँ (1740–1756 ई.) बंगाल का एकमात्र ऐसा नवाब था, जिसने अंग्रेज़ों एवं फ्रांसीसियों की गतिविधियों को प्रभावी रूप से नियंत्रित रखा। यूरोपीय कम्पनियों के संबंध में मधुमक्खियों वाला कथन इसी नवाब का है।
बंगाल के नवाब

मुर्शिद कुली ख़ाँ (1717–1727 ई.)

मुर्शिद कुली ख़ाँ को स्वतंत्र बंगाल राज्य का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है, क्योंकि उसी ने मुग़ल साम्राज्य की कमजोर होती केंद्रीय सत्ता का लाभ उठाकर बंगाल में एक शक्तिशाली एवं लगभग स्वतंत्र नवाबी शासन की नींव रखी।

➣यद्यपि वह औपचारिक रूप से मुग़ल सम्राट की अधीनता स्वीकार करता रहा, किन्तु व्यवहार में बंगाल का शासन पूरी तरह उसके नियंत्रण में था।

प्रारम्भिक जीवन

➣ मुर्शिद कुली ख़ाँ का प्रारम्भिक जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण था। अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार उसका जन्म दक्षिण भारत के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

➣ बचपन में उसे दास के रूप में बेच दिया गया, जहाँ एक फ़ारसी (ईरानी) व्यापारी ने उसका पालन-पोषण किया। बाद में उसने इस्लाम धर्म स्वीकार किया तथा फ़ारसी भाषा, लेखा-जोखा और प्रशासनिक कार्यों में दक्षता प्राप्त की।

➣ अपनी योग्यता, ईमानदारी एवं वित्तीय प्रबंधन की क्षमता के कारण वह शीघ्र ही मुग़ल प्रशासन की दृष्टि में आ गया।

➣ मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब ने उसकी प्रशासनिक एवं वित्तीय दक्षता से प्रभावित होकर उसे विभिन्न उत्तरदायित्व सौंपे। राजस्व प्रशासन में उसकी विशेष योग्यता के कारण उसे धीरे-धीरे साम्राज्य के महत्त्वपूर्ण अधिकारियों में स्थान प्राप्त हो गया।

1700 ई. में औरंगज़ेब ने मुर्शिद कुली ख़ाँ को बंगाल का दीवान नियुक्त किया। उस समय बंगाल का सूबेदार अजीमुश्शान (औरंगज़ेब का पौत्र) था।

➣ मुग़ल प्रशासन में दीवान का कार्य राजस्व एवं वित्तीय व्यवस्था का संचालन करना होता था, जबकि सूबेदार प्रशासन एवं सेना का प्रमुख होता था।

➣ अजीमुश्शान अधिकांश समय शाही दरबार के कार्यों के कारण दिल्ली में रहता था। परिणामस्वरूप बंगाल के दैनिक प्रशासन, राजस्व वसूली तथा वित्तीय व्यवस्था का वास्तविक नियंत्रण मुर्शिद कुली ख़ाँ के हाथों में आ गया।

➣ आगे चलकर अपनी कुशल कार्यशैली, कठोर अनुशासन तथा राजस्व संग्रह की दक्षता के कारण उसने शीघ्र ही बंगाल में अपना प्रभाव स्थापित कर लिया।

1701 ई. में औरंगज़ेब ने मुर्शिद कुली ख़ाँ को बंगाल का नायब सूबेदार (उप-सूबेदार) भी नियुक्त कर दिया। इसके साथ ही उसके हाथों में प्रशासनिक और वित्तीय दोनों प्रकार की शक्तियाँ आ गईं।

➣ इस समय वह बंगाल का सबसे प्रभावशाली अधिकारी बन गया तथा आगे चलकर स्वतंत्र नवाबी शासन की स्थापना का आधार तैयार हुआ।

➣ जब अठारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में मुग़ल साम्राज्य का पतन आरम्भ हुआ, तब मुर्शिद कुली ख़ाँ ने परिस्थितियों का कुशलतापूर्वक लाभ उठाया।

➣ उसने पहले प्रशासन एवं राजस्व व्यवस्था पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया और बाद में इसी आधार पर बंगाल में एक शक्तिशाली, लगभग स्वतंत्र नवाबी शासन की नींव रखी।

स्वतंत्र नवाब के रूप में उदय एवं बंगाल में नवाबी शासन की स्थापना

1707 ई. में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के युद्धों, दरबारी षड्यंत्रों तथा प्रान्तीय सूबेदारों की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के कारण दिल्ली की केंद्रीय सत्ता दिन-प्रतिदिन कमजोर होती चली गई। इस राजनीतिक अस्थिरता का सबसे अधिक लाभ बंगाल, अवध और हैदराबाद जैसे समृद्ध प्रान्तों के शक्तिशाली सूबेदारों ने उठाया।

➣ बंगाल में मुर्शिद कुली ख़ाँ ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए पहले राजस्व एवं प्रशासनिक व्यवस्था पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया और फिर धीरे-धीरे स्वयं को एक स्वतंत्र शासक के रूप में स्थापित करना प्रारम्भ किया।

➣ यद्यपि उसने मुग़ल सम्राट के प्रति औपचारिक निष्ठा बनाए रखी, किन्तु व्यवहार में बंगाल की समस्त प्रशासनिक एवं आर्थिक शक्ति उसके हाथों में केन्द्रित हो चुकी थी।

1713 ई. में फर्रुखसियर मुग़ल सम्राट बना। उसके शासनकाल में बंगाल का महत्त्व और भी बढ़ गया क्योंकि यह साम्राज्य का सबसे अधिक राजस्व देने वाला प्रान्त था। इसी काल में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भी अपने व्यापारिक विशेषाधिकारों को बढ़ाने के प्रयास तेज कर दिए।

1717 ई. में फर्रुखसियर के शाही फ़रमान से अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी को बंगाल में लगभग शुल्क-मुक्त व्यापार सहित अनेक व्यापारिक विशेषाधिकार प्राप्त हुए।

➣ बाद में कम्पनी ने इन विशेषाधिकारों का दुरुपयोग किया, जिससे बंगाल के नवाबों और अंग्रेज़ों के बीच संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार हुई।

➣ इसी वर्ष 1717 ई. में फर्रुखसियर ने मुर्शिद कुली ख़ाँ को बंगाल का सूबेदार (नाज़िम) भी नियुक्त कर दिया। इससे पहले वह बंगाल का दीवान था, परन्तु अब उसके हाथों में प्रशासनिक तथा वित्तीय दोनों प्रकार की सर्वोच्च शक्तियाँ आ गईं।

▪ मुर्शिद कुली ख़ाँ को सामान्यतः मुग़ल सम्राट द्वारा सीधे नियुक्त बंगाल का अंतिम शक्तिशाली सूबेदार माना जाता है। उसके बाद बंगाल में नवाबी पद व्यावहारिक रूप से वंशानुगत हो गया और दिल्ली का हस्तक्षेप लगातार कम होता गया।

➣ सूबेदार बनने के बाद मुर्शिद कुली ख़ाँ ने मुग़ल साम्राज्य की कमजोर स्थिति का पूरा लाभ उठाया। उसने दिल्ली को नियमित राजस्व भेजना जारी रखा तथा औपचारिक रूप से मुग़ल सम्राट की अधीनता स्वीकार की।

➣ किन्तु उसने बंगाल के आंतरिक प्रशासन, नियुक्तियों, सेना तथा वित्तीय मामलों में मुग़लों का किसी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया। इस प्रकार बंगाल व्यवहार में एक स्वतंत्र नवाबी राज्य बन गया।

➣ स्वतंत्र शासन को अधिक संगठित बनाने के उद्देश्य से मुर्शिद कुली ख़ाँ ने अपनी राजधानी ढाका से मक़सूदाबाद स्थानांतरित कर दी। बाद में उसने मक़सूदाबाद का नाम बदलकर मुर्शिदाबाद रख दिया। शीघ्र ही मुर्शिदाबाद बंगाल की राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक राजधानी बन गया।

➣ राजधानी परिवर्तन केवल स्थान परिवर्तन नहीं था, बल्कि यह बंगाल में एक नए स्वतंत्र नवाबी शासन की स्थापना का प्रतीक भी था। मुर्शिदाबाद में राजकोष, प्रशासनिक कार्यालय तथा प्रमुख अधिकारियों को स्थापित कर मुर्शिद कुली ख़ाँ ने शासन को अधिक प्रभावी एवं संगठित बनाया।

1719 ई. में उड़ीसा को भी बंगाल प्रशासन के अधीन कर दिया गया। इसके परिणामस्वरूप बंगाल नवाबी राज्य का क्षेत्रफल, आय तथा सामरिक महत्त्व और अधिक बढ़ गया। बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा तीनों प्रदेशों पर मुर्शिद कुली ख़ाँ का प्रभावी नियंत्रण स्थापित हो गया।

प्रशासनिक एवं राजस्व सुधार

➣ मुर्शिद कुली ख़ाँ केवल एक कुशल प्रशासक ही नहीं, बल्कि एक उत्कृष्ट वित्त एवं राजस्व विशेषज्ञ भी था। उसकी अधिकांश नीतियों का उद्देश्य राजस्व संग्रह बढ़ाना, प्रशासन को सुदृढ़ बनाना तथा भ्रष्टाचार पर नियंत्रण स्थापित करना था।

➣ बंगाल का शासन सँभालने के समय राजस्व व्यवस्था अत्यन्त अव्यवस्थित थी। अनेक जागीरदार एवं ज़मींदार समय पर लगान जमा नहीं करते थे तथा सरकारी अधिकारियों में भी भ्रष्टाचार व्याप्त था।

➣ इस स्थिति को सुधारने के लिए उसने व्यापक प्रशासनिक एवं वित्तीय सुधार लागू किए, जिनसे बंगाल मुग़ल साम्राज्य का सबसे समृद्ध एवं सर्वाधिक राजस्व देने वाला प्रान्त बन गया।

नाज़िम एवं दीवान के पदों का एकीकरण

➣ मुग़ल प्रशासन में सामान्यतः नाज़िम (सूबेदार) और दीवान के पद अलग-अलग अधिकारियों के पास होते थे। नाज़िम प्रशासन एवं सेना का प्रमुख होता था, जबकि दीवान राजस्व एवं वित्तीय व्यवस्था का संचालन करता था।

➣ मुर्शिद कुली ख़ाँ ने दोनों पदों की शक्तियों को अपने अधिकार में केन्द्रित कर लिया। इससे प्रशासनिक निर्णयों में गति आई, शासन एवं वित्त पर उसका नियंत्रण मजबूत हुआ तथा बंगाल के स्वतंत्र नवाबी शासन की आधारशिला पड़ी।

भू-राजस्व व्यवस्था में सुधार

➣ मुर्शिद कुली ख़ाँ ने भू-राजस्व व्यवस्था का व्यापक पुनर्गठन किया। उसने सम्पूर्ण प्रान्त का सर्वेक्षण कर भूमि की उपज एवं आय का पुनर्मूल्यांकन कराया तथा उसी के आधार पर लगान निर्धारित किया। इससे राजस्व संग्रह अधिक नियमित एवं प्रभावी हो गया।

➣ उसने राजस्व वसूली में पारदर्शिता लाने के लिए भूमि अभिलेखों को व्यवस्थित कराया तथा अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ाई। परिणामस्वरूप सरकारी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

➣ उसका सबसे महत्त्वपूर्ण सुधार जागीर भूमि के बड़े भाग को खालसा भूमि में परिवर्तित करना था। खालसा भूमि की आय सीधे राज्य के राजकोष में जमा होती थी, जबकि जागीर भूमि की आय जागीरदारों को प्राप्त होती थी।

➣ इस व्यवस्था से राज्य की आय में वृद्धि हुई, जागीरदारों की शक्ति कम हुई तथा पूरे प्रान्त पर नवाब का नियंत्रण और अधिक मजबूत हो गया।

इजारेदारी व्यवस्था की शुरुआत

➣ मुर्शिद कुली ख़ाँ ने राजस्व संग्रह को अधिक प्रभावी बनाने के लिए इजारेदारी व्यवस्थाको प्रोत्साहित किया।

➣ इस व्यवस्था में सरकार निश्चित राशि पर राजस्व वसूली का अधिकार ठेके पर देती थी। जो व्यक्ति सर्वाधिक बोली लगाता था, उसे किसी क्षेत्र का इजारा (ठेका) मिल जाता था। ऐसे व्यक्ति को इजारेदार कहा जाता था।

➣ इजारेदार निर्धारित धनराशि राज्य को जमा करता था तथा बदले में किसानों एवं ज़मींदारों से लगान वसूल करता था। यदि वह निर्धारित राशि से अधिक राजस्व एकत्र करता, तो अतिरिक्त धन उसका लाभ माना जाता था।

➣ इस व्यवस्था से सरकार को निश्चित एवं नियमित आय प्राप्त होने लगी। साथ ही राजस्व संग्रह की जिम्मेदारी सीधे सरकारी अधिकारियों के स्थान पर इजारेदारों पर आ गई।

➣ यद्यपि इससे प्रारम्भिक वर्षों में राजस्व संग्रह बढ़ा, किन्तु अनेक इजारेदार अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से किसानों पर अत्यधिक कर का बोझ डालने लगे। फलस्वरूप किसानों की आर्थिक स्थिति कई क्षेत्रों में प्रभावित हुई।

इजारेदारी व्यवस्था
▪ भू-राजस्व वसूली की ठेका प्रणाली।
▪ राजस्व वसूली का अधिकार सबसे अधिक बोली लगाने वाले व्यक्ति (इजारेदार) को दिया जाता था।
▪ सरकार को निश्चित आय मिलती थी, जबकि अतिरिक्त वसूली इजारेदार का लाभ होती थी।

➣ उसने राजस्व संग्रह को अधिक प्रभावी बनाने के लिए अपने प्रतिनिधियों एवं इजारेदारों के माध्यम से रैयतों (किसानों) से सीधे लगान वसूल करने की व्यवस्था विकसित की। इससे राजस्व संग्रह पर नवाब का नियंत्रण मजबूत हुआ तथा स्थानीय ज़मींदारों का प्रभाव कम हो गया।

➣ कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मुर्शिद कुली ख़ाँ ने किसानों के लिए तकावी ऋण की व्यवस्था की। यह ऋण बीज, बैल, कृषि उपकरण तथा खेती के अन्य आवश्यक कार्यों के लिए दिया जाता था। अच्छी फसल होने पर किसान इसका भुगतान करते थे। इससे कृषि उत्पादन के साथ-साथ राज्य के राजस्व में भी वृद्धि हुई।

तकावी ऋण
▪ कृषि विकास हेतु किसानों को दिया जाने वाला सरकारी ऋण।
▪ इसका उद्देश्य कृषि उत्पादन बढ़ाना तथा किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान करना था।

दक्षिण का टोडरमल

➣ भू-राजस्व व्यवस्था में व्यापक सुधार, राजस्व संग्रह की दक्षता तथा वित्तीय प्रशासन को सुदृढ़ बनाने के कारण मुर्शिद कुली ख़ाँ को दक्षिण का टोडरमल कहा जाता है।

➣ जिस प्रकार अकबर के शासनकाल में राजा टोडरमल ने सम्पूर्ण मुग़ल साम्राज्य की राजस्व व्यवस्था को संगठित किया था, उसी प्रकार मुर्शिद कुली ख़ाँ ने बंगाल में प्रभावी वित्तीय एवं भू-राजस्व व्यवस्था स्थापित की।

कठोर राजस्व नीति

➣ मुर्शिद कुली ख़ाँ ने बंगाल की राजस्व व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए कठोर नीति अपनाई। उसका उद्देश्य राज्य की आय बढ़ाना तथा नियमित रूप से राजस्व की वसूली सुनिश्चित करना था।

➣ उसने किसानों को कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए तकावी ऋण उपलब्ध कराया, जिससे वे बीज, पशु, कृषि उपकरण तथा अन्य आवश्यक संसाधन प्राप्त कर सकें।

➣ दूसरी ओर, कर वसूली के मामलों में वह अत्यन्त कठोर था। जो किसान अथवा ज़मींदार समय पर लगान जमा नहीं करते थे, उनके विरुद्ध कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई की जाती थी तथा आवश्यकता पड़ने पर उनकी सम्पत्ति या ज़मींदारी भी जब्त कर ली जाती थी।

➣ उसने शक्तिशाली एवं विद्रोही ज़मींदारों पर नियंत्रण स्थापित किया, नियमित राजस्व वसूली सुनिश्चित की तथा राजस्व अधिकारियों और इजारेदारों को भ्रष्टाचार एवं वित्तीय अनियमितता के विरुद्ध सख्त निर्देश दिए। इससे प्रशासन अधिक प्रभावी हुआ और राज्य की आय में वृद्धि हुई।

धार्मिक नीति

➣ मुर्शिद कुली ख़ाँ का शासन मुख्यतः प्रशासनिक एवं आर्थिक सुधारों के लिए जाना जाता है। कुछ समकालीन फ़ारसी ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि कर न देने वाले कुछ व्यक्तियों के साथ कठोर व्यवहार किया जाता था तथा धर्म परिवर्तन जैसी घटनाओं का भी उल्लेख मिलता है।

➣ किन्तु अधिकांश आधुनिक इतिहासकार इन विवरणों को उसकी सामान्य अथवा आधिकारिक राज्य नीति नहीं मानते। इसलिए उसके शासन का मूल्यांकन मुख्यतः उसकी प्रशासनिक क्षमता, राजस्व सुधारों तथा राजनीतिक उपलब्धियों के आधार पर किया जाता है।

प्रमुख विद्रोह

➣ कठोर प्रशासनिक एवं राजस्व नीतियों के कारण मुर्शिद कुली ख़ाँ के शासनकाल में कुछ स्थानीय विद्रोह हुए। यद्यपि इन विद्रोहों का प्रभाव सीमित था, फिर भी उन्होंने नवाब के अधिकार को चुनौती देने का प्रयास किया। मुर्शिद कुली ख़ाँ ने सभी विद्रोहों का दृढ़तापूर्वक दमन कर अपनी सत्ता को और अधिक सुदृढ़ बनाया।

1. सीताराम राय, उदय नारायण एवं ग़ुलाम मुहम्मद का विद्रोह

➣ बंगाल के कुछ स्थानीय ज़मींदारों एवं सामन्तों ने नवाब की कठोर राजस्व नीति का विरोध किया। इनमें सीताराम राय, उदय नारायण तथा ग़ुलाम मुहम्मद प्रमुख थे।

➣ इन विद्रोहियों ने लगान देने से इंकार किया तथा स्थानीय स्तर पर नवाब के अधिकार को चुनौती दी। मुर्शिद कुली ख़ाँ ने अपने अधिकारियों एवं सेना की सहायता से इस विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन किया। इसके बाद संबंधित ज़मींदारों की शक्ति काफी हद तक समाप्त हो गई।

2. शुजात ख़ाँ का विद्रोह

शुजात ख़ाँ ने भी नवाब की सत्ता के विरुद्ध विद्रोह किया। उसका उद्देश्य स्थानीय स्तर पर अपनी स्वतंत्र स्थिति बनाए रखना था, किन्तु मुर्शिद कुली ख़ाँ की संगठित प्रशासनिक एवं सैन्य व्यवस्था के सामने उसका विद्रोह अधिक समय तक नहीं टिक सका।

➣ नवाब की सेना ने शीघ्र ही इस विद्रोह को दबा दिया तथा क्षेत्र में पुनः शांति स्थापित कर दी।

3. नजात ख़ाँ का विद्रोह

➣ मुर्शिद कुली ख़ाँ के शासनकाल में नजात ख़ाँ ने भी नवाबी शासन के विरुद्ध विद्रोह किया। इसका उद्देश्य भी प्रशासनिक नियंत्रण से मुक्त होना तथा स्थानीय शक्ति को बढ़ाना था।

➣ मुर्शिद कुली ख़ाँ ने इस विद्रोह का भी कठोरता से दमन किया। परिणामस्वरूप उसके शासनकाल में कोई भी विद्रोह व्यापक रूप धारण नहीं कर सका और बंगाल में राजनीतिक स्थिरता बनी रही।

शासन का प्रभाव

➣ मुर्शिद कुली ख़ाँ की कठोर लेकिन प्रभावी प्रशासनिक नीति के कारण बंगाल में राजनीतिक स्थिरता स्थापित हुई। राजस्व संग्रह नियमित हुआ, सरकारी आय में वृद्धि हुई तथा प्रशासन पर नवाब का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया।

➣ उसके शासनकाल में हुए विद्रोह स्थानीय स्तर तक ही सीमित रहे और कोई भी विद्रोह नवाबी शासन के लिए गंभीर चुनौती नहीं बन सका। यही कारण है कि उसके शासनकाल को बंगाल के स्वतंत्र नवाबी शासन की सबसे मजबूत आधारशिला माना जाता है।

मृत्यु, उत्तराधिकारी

➣ लगभग एक दशक तक बंगाल पर सफलतापूर्वक शासन करने के बाद 1727 ई. में मुर्शिद कुली ख़ाँ की मृत्यु हो गई। अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक उसने बंगाल की प्रशासनिक एवं राजस्व व्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखा तथा प्रान्त को राजनीतिक रूप से स्थिर एवं आर्थिक रूप से समृद्ध बनाया।

➣ मुर्शिद कुली ख़ाँ की कोई पुत्र संतान नहीं थी। इसलिए उसने अपने दामाद शुजाउद्दीन मुहम्मद ख़ाँ को अपना उत्तराधिकारी बनाया। उसकी मृत्यु के बाद शुजाउद्दीन बंगाल का नवाब बना और उसी के साथ बंगाल में नवाबी शासन पूर्णतः वंशानुगत हो गया।

मुर्शिद कुली ख़ाँ का व्यक्तित्व

➣ मुर्शिद कुली ख़ाँ एक कुशल प्रशासक, योग्य वित्त विशेषज्ञ तथा अनुशासनप्रिय शासक था। उसकी सबसे बड़ी विशेषता प्रशासन पर मजबूत नियंत्रण तथा प्रभावी राजस्व व्यवस्था थी।

➣ उसने मुग़ल प्रशासन की परम्पराओं को अपनाते हुए उन्हें बंगाल की परिस्थितियों के अनुसार अधिक व्यवस्थित एवं प्रभावशाली बनाया।

➣ वह व्यक्तिगत जीवन में सादगी, कठोर अनुशासन तथा कार्यकुशलता के लिए प्रसिद्ध था। राजस्व वसूली एवं प्रशासनिक मामलों में वह किसी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं करता था। इसी कारण उसके शासनकाल में भ्रष्टाचार एवं प्रशासनिक अव्यवस्था पर काफी हद तक नियंत्रण स्थापित हुआ।

➣ दूसरी ओर उसकी कठोर कर नीति तथा विद्रोही ज़मींदारों के प्रति सख्त व्यवहार के कारण कुछ इतिहासकार उसकी आलोचना भी करते हैं। फिर भी अधिकांश इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि उसकी कठोरता का मुख्य उद्देश्य राज्य की आय बढ़ाना तथा प्रशासन को सुदृढ़ बनाना था।

शासनकाल 1717–1727 ई.
वास्तविक संस्थापक स्वतंत्र बंगाल राज्य
1700 ई. बंगाल का दीवान नियुक्त
1701 ई. नायब सूबेदार नियुक्त
1717 ई. फर्रुखसियर द्वारा बंगाल का सूबेदार नियुक्त
राजधानी ढाका → मुर्शिदाबाद
1719 ई. उड़ीसा को बंगाल के अधीन किया गया
प्रमुख सुधार खालसा भूमि का विस्तार, इजारेदारी व्यवस्था, तकावी ऋण
उपाधि दक्षिण का टोडरमल
उत्तराधिकारी शुजाउद्दीन मुहम्मद ख़ाँ
मृत्यु 1727 ई.

एक नज़र में : मुर्शिद कुली ख़ाँ

विषय विवरण
शासनकाल 1717–1727 ई.
पहचान स्वतंत्र बंगाल राज्य का वास्तविक संस्थापक
1700 ई. औरंगज़ेब द्वारा बंगाल का दीवान नियुक्त
1701 ई. औरंगज़ेब द्वारा बंगाल का नायब सूबेदार नियुक्त; इसी समय से बंगाल की वास्तविक प्रशासनिक एवं वित्तीय शक्ति उसके हाथों में आने लगी।
1717 ई. फर्रुखसियर द्वारा बंगाल का सूबेदार (नाज़िम) नियुक्त
राजधानी ढाका से मक़सूदाबाद स्थानांतरित कर उसका नाम मुर्शिदाबाद रखा।
प्रमुख राजनीतिक उपलब्धि स्वतंत्र एवं वंशानुगत नवाबी शासन की मजबूत नींव रखी तथा 1719 ई. में उड़ीसा को बंगाल प्रशासन के अधीन किया।
प्रशासनिक सुधार दीवान एवं नाज़िम दोनों पदों की शक्तियाँ अपने हाथों में केन्द्रित कीं।
राजस्व सुधार खालसा भूमि का विस्तार, इजारेदारी व्यवस्था लागू तथा भूमि-राजस्व व्यवस्था का पुनर्गठन किया।
कृषि सुधार किसानों को कृषि विकास हेतु तकावी ऋण प्रदान किया।
प्रमुख विद्रोह सीताराम राय, उदय नारायण, ग़ुलाम मुहम्मद, शुजात ख़ाँ तथा नजात ख़ाँ के विद्रोह।
उपाधि दक्षिण का टोडरमल
उत्तराधिकारी शुजाउद्दीन मुहम्मद ख़ाँ
मृत्यु 1727 ई.

शुजाउद्दीन मुहम्मद ख़ाँ (1727–1739 ई.)

शुजाउद्दीन मुहम्मद ख़ाँ बंगाल का द्वितीय स्वतंत्र नवाब था। वह मुर्शिद कुली ख़ाँ का दामाद था तथा उसकी पुत्री ज़ीनतुन्निसा बेगम का पति था। मुर्शिद कुली ख़ाँ की मृत्यु के बाद 1727 ई. में वह बंगाल के नवाब के पद पर आसीन हुआ।

➣ शुजाउद्दीन के नवाब बनने के साथ ही बंगाल में नवाबी शासन व्यावहारिक रूप से वंशानुगत हो गया। यद्यपि मुग़ल सम्राट से औपचारिक स्वीकृति प्राप्त की जाती थी, किन्तु उत्तराधिकार का निर्धारण अब नवाब के परिवार के भीतर ही होने लगा।

➣ उस समय दिल्ली में मुहम्मद शाह रंगीला (1719–1748 ई.) का शासन था। यह वही मुग़ल शासक है जिसके समय नाद्रिशाह का आक्रमण हुआ था। मयूर सिहांसन पर बैठने वाला अंतिम मुग़ल शासक भी यही था।

➣ शुजाउद्दीन ने परम्परा के अनुसार मुग़ल सम्राट की अधीनता स्वीकार की तथा नियमित रूप से राजस्व (ख़िराज) दिल्ली भेजता रहा, किन्तु व्यवहार में उसका शासन पूर्णतः स्वतंत्र था। बंगाल के आंतरिक प्रशासन, नियुक्तियों, वित्त तथा सैन्य मामलों में मुग़ल दरबार का कोई प्रभावी हस्तक्षेप नहीं था।

➣ मुर्शिद कुली ख़ाँ की भाँति शुजाउद्दीन भी एक सक्षम प्रशासक था, किन्तु उसका स्वभाव अपेक्षाकृत उदार एवं सौम्य माना जाता है। उसने अपने पूर्ववर्ती द्वारा स्थापित प्रशासनिक व्यवस्था में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं किया, बल्कि उसी व्यवस्था को बनाए रखते हुए राज्य की समृद्धि एवं स्थिरता पर विशेष ध्यान दिया।

➣ उसके शासनकाल में बंगाल आर्थिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध बना रहा। कृषि, वस्त्र उद्योग, रेशम उत्पादन तथा विदेशी व्यापार निरंतर बढ़ता रहा, जिससे राज्य की आय में वृद्धि हुई। इसी कारण बंगाल अठारहवीं शताब्दी में भी भारत का सबसे समृद्ध प्रान्त बना रहा।

➣ शुजाउद्दीन ने प्रशासनिक पदों पर योग्य एवं विश्वसनीय अधिकारियों की नियुक्ति की। उसने प्रान्त में शांति एवं कानून-व्यवस्था बनाए रखने का प्रयास किया तथा मुर्शिद कुली ख़ाँ द्वारा स्थापित सुदृढ़ प्रशासनिक ढाँचे को और अधिक स्थिर बनाया।

➣ यद्यपि उसके शासनकाल में कोई बड़ा आंतरिक विद्रोह या बाहरी आक्रमण नहीं हुआ, फिर भी यह काल राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। इसी समय बंगाल की नवाबी सत्ता और अधिक संगठित हुई तथा आगे चलकर अलीवर्दी ख़ाँ के उदय की पृष्ठभूमि तैयार हुई।

प्रशासन निति

➣ शुजाउद्दीन मुहम्मद ख़ाँ एक उदार, व्यवहारकुशल तथा शांतिप्रिय शासक था। उसने अपने शासनकाल में किसी बड़े प्रशासनिक परिवर्तन के स्थान पर मुर्शिद कुली ख़ाँ द्वारा स्थापित प्रशासनिक ढाँचे को बनाए रखा।

➣ उसने योग्य अधिकारियों को प्रशासन में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया तथा प्रान्त की आर्थिक समृद्धि और राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने का प्रयास किया। उसके शासनकाल में कृषि, उद्योग तथा विदेशी व्यापार निरंतर उन्नति करते रहे, जिससे राज्य की आय में भी वृद्धि हुई।

➣ उसकी सबसे बड़ी प्रशासनिक उपलब्धियों में अलीवर्दी ख़ाँ जैसे योग्य अधिकारी की पहचान कर उसे बिहार का नायब सूबेदार नियुक्त करना था। आगे चलकर यही अलीवर्दी ख़ाँ बंगाल का सबसे शक्तिशाली नवाब सिद्ध हुआ।

अलीवर्दी ख़ाँ की नियुक्ति

➣ शुजाउद्दीन के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना 1732 ई. में अलीवर्दी ख़ाँ की बिहार का नायब सूबेदार (नायब नाज़िम) के रूप में नियुक्ति थी।

➣ अलीवर्दी ख़ाँ एक कुशल प्रशासक एवं योग्य सैनिक अधिकारी था, जिसने अल्प समय में बिहार के प्रशासन एवं राजस्व व्यवस्था को सुदृढ़ बना दिया।

➣ बिहार में अलीवर्दी ख़ाँ की सफलता के कारण उसकी प्रतिष्ठा लगातार बढ़ती गई। आगे चलकर इसी प्रतिष्ठा और सैन्य शक्ति के आधार पर उसने बंगाल की नवाबी प्राप्त की तथा बंगाल के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया।

1732 ई. – शुजाउद्दीन ने अलीवर्दी ख़ाँ को बिहार का नायब सूबेदार (नायब नाज़िम) नियुक्त किया।

➣ उसकी सबसे बड़ी प्रशासनिक उपलब्धियों में अलीवर्दी ख़ाँ जैसे योग्य अधिकारी की पहचान कर उसे बिहार का नायब सूबेदार नियुक्त करना था। आगे चलकर यही अलीवर्दी ख़ाँ बंगाल का सबसे शक्तिशाली नवाब सिद्ध हुआ।

बिहार का बंगाल प्रशासन में सम्मिलन

1733 ई. में मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह ने बिहार की सूबेदारी भी शुजाउद्दीन को प्रदान कर दी। इसके परिणामस्वरूप बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा तीनों प्रान्तों का प्रशासन एक ही नवाब के अधीन आ गया।

➣ इस व्यवस्था से बंगाल नवाबी राज्य का क्षेत्रफल, आय तथा सामरिक महत्त्व और अधिक बढ़ गया। तीनों प्रान्तों के संयुक्त प्रशासन ने बंगाल को उत्तर-पूर्वी भारत की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक इकाई बना दिया।

➣ बिहार का प्रशासन अलीवर्दी ख़ाँ के हाथों में होने के कारण वहाँ शासन सुचारु रूप से चलता रहा, जबकि शुजाउद्दीन सम्पूर्ण नवाबी राज्य की नीतियों एवं प्रशासन पर नियंत्रण बनाए रखता था।

यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों से संबंध

➣ शुजाउद्दीन के शासनकाल में अंग्रेज़, डच, फ्रांसीसी तथा अन्य यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियाँ बंगाल में व्यापार करती रहीं। इस काल में नवाब और यूरोपीय कम्पनियों के बीच किसी बड़े सैन्य संघर्ष का उल्लेख नहीं मिलता।

➣ नवाब का मुख्य उद्देश्य प्रान्त की आर्थिक समृद्धि बनाए रखना था। इसलिए उसने विदेशी व्यापार को जारी रखा, किन्तु प्रशासनिक अधिकार अपने नियंत्रण में रखे। इसी कारण उसके शासनकाल में बंगाल की व्यापारिक उन्नति निरंतर जारी रही।

मृत्यु एवं उत्तराधिकारी

➣ लगभग बारह वर्षों तक बंगाल पर शासन करने के बाद 1739 ई. में शुजाउद्दीन मुहम्मद ख़ाँ की मृत्यु हो गई।

➣ उसके शासनकाल में बंगाल राजनीतिक रूप से स्थिर, आर्थिक रूप से समृद्ध तथा प्रशासनिक दृष्टि से संगठित बना रहा। उसने अपने पूर्ववर्ती मुर्शिद कुली ख़ाँ द्वारा स्थापित शासन व्यवस्था को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया।

➣ शुजाउद्दीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सरफ़राज़ ख़ाँ बंगाल का नवाब बना। यद्यपि उसका शासनकाल बहुत छोटा रहा, किन्तु उसके समय बंगाल की राजनीति में एक नया मोड़ आया।

➣ बिहार के नायब सूबेदार अलीवर्दी ख़ाँ ने अपनी बढ़ती शक्ति के बल पर 1740 ई. में गिरिया के युद्ध में सरफ़राज़ ख़ाँ को पराजित एवं मृत्युदंड देकर स्वयं बंगाल का नवाब बन गया।

एक नज़र में : शुजाउद्दीन मुहम्मद ख़ाँ

विषय विवरण
शासनकाल 1727–1739 ई.
पहचान बंगाल का द्वितीय स्वतंत्र नवाब
पूर्ववर्ती मुर्शिद कुली ख़ाँ
संबंध मुर्शिद कुली ख़ाँ का दामाद एवं उत्तराधिकारी
मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह (1719–1748 ई.)
शासन की प्रकृति औपचारिक रूप से मुग़ल अधीनता स्वीकार की, किन्तु व्यवहार में स्वतंत्र शासन किया।
1732 ई. अलीवर्दी ख़ाँ को बिहार का नायब सूबेदार (नायब नाज़िम) नियुक्त किया।
1733 ई. बिहार की सूबेदारी प्राप्त हुई; बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा एक ही नवाब के अधीन आए।
प्रशासन मुर्शिद कुली ख़ाँ की प्रशासनिक एवं राजस्व व्यवस्था को प्रभावी ढंग से बनाए रखा।
आर्थिक स्थिति कृषि, वस्त्र उद्योग एवं विदेशी व्यापार की निरंतर उन्नति; बंगाल की समृद्धि बनी रही।
प्रमुख उपलब्धि राजनीतिक स्थिरता बनाए रखी तथा अलीवर्दी ख़ाँ जैसे योग्य प्रशासक को उभरने का अवसर दिया।
उत्तराधिकारी सरफ़राज़ ख़ाँ
मृत्यु 1739 ई.
▪ शुजाउद्दीन मुहम्मद ख़ाँ का 1732 ई. में अलीवर्दी ख़ाँ को बिहार का नायब सूबेदार नियुक्त करना उसके शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना थी।

सरफ़राज़ ख़ाँ (1739–1740 ई.)

सरफ़राज़ ख़ाँ बंगाल का तृतीय स्वतंत्र नवाब था। वह शुजाउद्दीन मुहम्मद ख़ाँ का पुत्र तथा मुर्शिद कुली ख़ाँ का दौहित्र (पुत्री का पुत्र) था। शुजाउद्दीन की मृत्यु के बाद 1739 ई. में वह बंगाल की गद्दी पर बैठा।

➣ नवाब बनने पर उसने ‘आलम-उद-दौला हैदर जंग’ की उपाधि धारण की। यद्यपि उसे अपने पिता से एक समृद्ध एवं संगठित राज्य विरासत में मिला था, किन्तु वह अपने पूर्ववर्तियों की भाँति प्रशासनिक एवं राजनीतिक दक्षता का परिचय नहीं दे सका।

➣ सरफ़राज़ ख़ाँ धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था और उसका अधिक ध्यान धार्मिक कार्यों एवं व्यक्तिगत जीवन पर रहता था। परिणामस्वरूप प्रशासनिक कार्यों में उसकी रुचि अपेक्षाकृत कम रही। इसी कारण राज्य के अनेक प्रभावशाली अधिकारी उससे असंतुष्ट हो गए।

➣ सरफ़राज़ ख़ाँ का शासनकाल अत्यन्त अल्पकालीन था, इसलिए वह प्रशासनिक अथवा आर्थिक क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं कर सका। उसके शासन की सबसे महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना अलीवर्दी ख़ाँ के साथ हुआ गिरिया का युद्ध माना जाता है।

➣ सरफ़राज़ ख़ाँ के शासनकाल की एक महत्त्वपूर्ण समकालीन घटना 1739 ई. में फ़ारस के शासक नादिरशाह का भारत पर आक्रमण था।

➣ इस आक्रमण में मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह करनाल के युद्ध में पराजित हुआ तथा दिल्ली की व्यापक लूट हुई। इस घटना ने मुग़ल साम्राज्य की दुर्बलता को पूरी तरह उजागर कर दिया, जिसका लाभ प्रान्तीय शासकों ने उठाया।

गिरिया (घेरिया) का युद्ध (1740 ई.)

➣ सरफ़राज़ ख़ाँ के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना 1740 ई. का गिरिया (घेरिया) का युद्ध था। यही युद्ध बंगाल के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ, क्योंकि इसके परिणामस्वरूप बंगाल में नवाबों के एक नए वंश का उदय हुआ।

➣ उसके शासनकाल में बिहार के नायब सूबेदार अलीवर्दी ख़ाँ की शक्ति निरंतर बढ़ रही थी। उसने अपनी प्रशासनिक क्षमता, सैन्य शक्ति तथा राजनीतिक प्रभाव के बल पर बंगाल की नवाबी प्राप्त करने का निश्चय किया और मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह को भी अपने पक्ष में कर लिया।

➣ दूसरी ओर सरफ़राज़ ख़ाँ अपने दरबार के आन्तरिक षड्यंत्रों तथा अधिकारियों के बीच बढ़ते मतभेदों को नियंत्रित नहीं कर सका। परिणामस्वरूप उसकी राजनीतिक स्थिति कमजोर होती गई, जिसका लाभ अलीवर्दी ख़ाँ ने उठाया।

10 अप्रैल 1740 ई. को गिरिया (वर्तमान मुर्शिदाबाद के निकट) में सरफ़राज़ ख़ाँ और अलीवर्दी ख़ाँ की सेनाओं के बीच निर्णायक युद्ध हुआ।

➣ युद्ध के दौरान सरफ़राज़ ख़ाँ ने स्वयं सेना का नेतृत्व किया, किन्तु अलीवर्दी ख़ाँ की संगठित रणनीति तथा अनुभवी सेना के सामने वह अधिक समय तक टिक नहीं सका। युद्ध के दौरान ही सरफ़राज़ ख़ाँ मारा गया और उसकी सेना पराजित हो गई।

➣ इस विजय के साथ ही अलीवर्दी ख़ाँ ने बंगाल की नवाबी पर अधिकार कर लिया। इसके बाद बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा तीनों प्रान्त उसके नियंत्रण में आ गए और बंगाल में एक नए नवाबी वंश का आरम्भ हुआ।

युद्ध गिरिया (घेरिया) का युद्ध
वर्ष 1740 ई.
प्रतिद्वन्द्वी सरफ़राज़ ख़ाँ एवं अलीवर्दी ख़ाँ
परिणाम सरफ़राज़ ख़ाँ की मृत्यु एवं अलीवर्दी ख़ाँ की विजय

मृत्यु एवं उत्तराधिकारी

➣ गिरिया के युद्ध में पराजित होने के साथ ही 1740 ई. में सरफ़राज़ ख़ाँ की मृत्यु हो गई। उसका शासनकाल लगभग एक वर्ष तक ही चला।

➣ उसकी मृत्यु के बाद अलीवर्दी ख़ाँ बंगाल का नवाब बना। उसने शीघ्र ही मुग़ल सम्राट से अपनी नवाबी की औपचारिक स्वीकृति भी प्राप्त कर ली और अगले लगभग सोलह वर्षों तक बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा पर सफलतापूर्वक शासन किया।

अलीवर्दी ख़ाँ (1740–1756 ई.)

अलीवर्दी ख़ाँ बंगाल के स्वतंत्र नवाबों में सबसे योग्य, दूरदर्शी एवं प्रभावशाली शासकों में से एक था। उसने भी पूर्वर्ती नवाबों की भांति औपचारिक रूप से मुग़ल सम्राट की अधीनता स्वीकार की, किन्तु व्यवहार में वह एक स्वतंत्र शासक की भाँति शासन करता था।

➣ अलीवर्दी ख़ाँ का मूल नाम मिर्ज़ा मुहम्मद ख़ाँ था। उसका परिवार मुग़ल प्रशासन से जुड़ा हुआ था और उसने प्रारम्भ से ही सैनिक तथा प्रशासनिक सेवाओं में अपनी योग्यता का परिचय दिया। अपनी कार्यकुशलता, राजनीतिक सूझबूझ तथा सैन्य क्षमता के कारण वह शीघ्र ही बंगाल के नवाबी प्रशासन का एक महत्त्वपूर्ण अधिकारी बन गया।

➣ बंगाल के द्वितीय नवाब शुजाउद्दीन मुहम्मद ख़ाँ ने उसकी प्रतिभा से प्रभावित होकर 1732 ई. में उसे बिहार का नायब नाज़िम (उप-सूबेदार) नियुक्त किया। अलीवर्दी ख़ाँ ने इस पद पर रहते हुए बिहार में प्रशासन को सुदृढ़ बनाया तथा राजस्व व्यवस्था को व्यवस्थित किया। इससे उसकी प्रतिष्ठा एवं प्रभाव निरंतर बढ़ता गया।

➣ बिहार के प्रशासन में उसकी सफलता ने उसे बंगाल के सबसे शक्तिशाली सरदारों में शामिल कर दिया। उसके बड़े भाई हाजी अहमद भी एक प्रभावशाली दरबारी थे, जिन्होंने अलीवर्दी ख़ाँ की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ उस समय बंगाल का सबसे प्रभावशाली बैंकिंग एवं वित्तीय परिवार जगत सेठ था। जगत सेठ परिवार का बंगाल की राजनीति पर गहरा प्रभाव था और वह नवाबों को आर्थिक सहायता प्रदान करता था।

➣अलीवर्दी ख़ाँ ने हाजी अहमद तथा जगत सेठ परिवार का समर्थन प्राप्त कर अपनी राजनीतिक स्थिति को और अधिक मजबूत बनाया।

1739 ई. में शुजाउद्दीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सरफ़राज़ ख़ाँ बंगाल का नवाब बना था। उसके शासनकाल में दरबारी गुटबंदी बढ़ने लगी तथा अनेक प्रभावशाली अधिकारी उससे असंतुष्ट हो गए।

➣ अलीवर्दी ख़ाँ ने इस परिस्थिति का लाभ उठाया। उसने अपने समर्थकों का संगठन किया तथा मुग़ल दरबार के प्रभावशाली अमीरों को अपने पक्ष में कर लिया। इसके साथ ही उसने बंगाल की नवाबी प्राप्त करने की योजना बनाई।

➣ कहा जाता है कि अलीवर्दी ख़ाँ ने मुग़ल दरबार में पर्याप्त धन देकर अपने पक्ष में समर्थन प्राप्त किया तथा अपनी नवाबी के लिए शाही स्वीकृति (फ़रमान) हासिल करने का प्रयास किया। इसके बाद उसने सरफ़राज़ ख़ाँ के विरुद्ध विद्रोह का मार्ग अपनाया।

➣ अपने भाई हाजी अहमद, जगत सेठ तथा अन्य प्रभावशाली सरदारों के सहयोग से अलीवर्दी ख़ाँ ने सरफ़राज़ ख़ाँ को सत्ता से हटाने की तैयारी प्रारम्भ कर दी।

➣ अंततः दोनों पक्षों के बीच निर्णायक संघर्ष 10 अप्रैल 1740 ई. को गिरिया (वर्तमान मुर्शिदाबाद के निकट) नामक स्थान पर हुआ। युद्ध के दौरान सरफ़राज़ ख़ाँ मारा गया।

➣ गिरिया के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद अलीवर्दी ख़ाँ ने बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इसके साथ ही बंगाल में एक नए नवाबी वंश का आरम्भ हुआ।

नवाब के रूप में मान्यता

➣ गिरिया के युद्ध में विजय के बाद अलीवर्दी ख़ाँ ने मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह से अपनी नवाबी की औपचारिक स्वीकृति प्राप्त की। कहा जाता है कि उसने दिल्ली दरबार को लगभग दो करोड़ रुपये नज़राने के रूप में भेजे, जिसके बाद उसकी नवाबी को शाही मान्यता मिल गई।

➣ मुग़ल सम्राट ने अलीवर्दी ख़ाँ को ‘महावत जंग’ की उपाधि प्रदान की। इस प्रकार वह विधिवत् बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा का नवाब स्वीकार कर लिया गया।

➣ नवाब बनने के बाद अलीवर्दी ख़ाँ ने प्रारम्भ में मुग़ल सम्राट के प्रति औपचारिक सम्मान बनाए रखा, किन्तु शीघ्र ही उसने दिल्ली दरबार को नियमित नज़राना भेजना तथा महत्त्वपूर्ण नियुक्तियों के लिए शाही अनुमति लेना लगभग बंद कर दिया।

बंगाल की वास्तविक स्वतंत्रता

➣ अलीवर्दी ख़ाँ के शासनकाल में बंगाल व्यवहारतः पूर्णतः स्वतंत्र हो गया। यद्यपि सिक्के मुग़ल सम्राट के नाम से ढाले जाते रहे और औपचारिक अधीनता बनी रही, किन्तु दिल्ली का प्रशासनिक एवं राजनीतिक नियंत्रण लगभग समाप्त हो गया था।

➣ नवाब स्वयं सेना, प्रशासन, राजस्व, न्याय तथा उच्च अधिकारियों की नियुक्तियों से संबंधित सभी निर्णय लेने लगा। इस प्रकार बंगाल एक शक्तिशाली एवं स्वायत्त नवाबी राज्य के रूप में स्थापित हो गया।

▪ इतिहासकारों के अनुसार मुर्शिद कुली ख़ाँ ने स्वतंत्र बंगाल राज्य की नींव रखी थी, जबकि अलीवर्दी ख़ाँ ने उसे वास्तविक राजनीतिक स्वतंत्रता प्रदान की। इसी कारण अनेक इतिहासकार उसे बंगाल की वास्तविक स्वतंत्रता का जन्मदाता भी मानते हैं।

➣ अलीवर्दी ख़ाँ ने अपने शासन के प्रारम्भिक वर्षों में प्रशासन को सुदृढ़ किया, राजस्व व्यवस्था को व्यवस्थित बनाए रखा तथा बंगाल की आंतरिक शांति एवं आर्थिक समृद्धि को बनाए रखने का प्रयास किया। किन्तु शीघ्र ही उसे मराठों के लगातार आक्रमणों जैसी गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ा, जिसने उसके शासन की दिशा बदल दी।

मराठा आक्रमण (बर्गी आक्रमण) एवं 1751 ई. की संधि

➣ अलीवर्दी ख़ाँ के शासनकाल की सबसे बड़ी चुनौती मराठों के लगातार आक्रमण थे। इन आक्रमणों ने लगभग एक दशक तक बंगाल की शांति, समृद्धि तथा आर्थिक व्यवस्था को गम्भीर रूप से प्रभावित किया।

➣ अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक मराठा शक्ति उत्तर एवं पूर्वी भारत में तीव्र गति से फैल रही थी। मराठा शासक उन प्रदेशों से ‘चौथ’ वसूल करना चाहते थे, जो उनके प्रत्यक्ष नियंत्रण में नहीं थे। बंगाल की अपार समृद्धि के कारण वह मराठों का प्रमुख लक्ष्य बन गया।

➣ नागपुर के मराठा शासक रघुजी भोंसले ने बंगाल से चौथ वसूल करने का निश्चय किया। उसने अपने विश्वसनीय मंत्री एवं सेनापति भास्कर पंडित (भास्कर पंत) को बंगाल भेजा, ताकि अलीवर्दी ख़ाँ से चौथ की माँग की जा सके।

➣ अलीवर्दी ख़ाँ ने मराठों की इस माँग को स्वीकार करने से स्पष्ट रूप से इंकार कर दिया। इसके बाद मराठों ने बंगाल पर लगातार आक्रमण प्रारम्भ कर दिए।

➣ मराठा सेना के तीव्र गति से आक्रमण करने वाले घुड़सवार सैनिकों को ‘बर्गी’ कहा जाता था। इन्हीं के कारण बंगाल पर हुए मराठा आक्रमण ‘बर्गी आक्रमण’ कहलाए।

➣ बर्गियों ने बंगाल के अनेक क्षेत्रों में गाँवों, नगरों तथा कृषि भूमि को भारी क्षति पहुँचाई। उन्होंने लूटपाट, आगज़नी तथा धन-संपत्ति की व्यापक लूट की। परिणामस्वरूप हजारों लोग अपने गाँव छोड़ने को विवश हुए तथा बंगाल की कृषि एवं व्यापार पर गंभीर प्रभाव पड़ा।

➣ मराठा आक्रमणों के कारण बंगाल की आर्थिक समृद्धि को भारी आघात पहुँचा। राजस्व संग्रह में कमी आई, कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ तथा अनेक व्यापारिक मार्ग असुरक्षित हो गए।

बर्गी
▪ मराठा सेना के हल्के एवं तेज़ गति वाले घुड़सवार सैनिक।
▪ इन्हीं के नाम पर बंगाल में हुए मराठा आक्रमण बर्गी आक्रमण कहलाए।

➣ मराठा आक्रमणों को रोकने के उद्देश्य से अलीवर्दी ख़ाँ ने कूटनीति का सहारा लिया। 1744 ई. में उसने वार्ता के बहाने मराठा सेनापति भास्कर पंडित को अपने शिविर में बुलाया।

➣ अवसर मिलते ही भास्कर पंडित तथा उसके कई साथियों की हत्या करवा दी गई। अलीवर्दी ख़ाँ को आशा थी कि इससे मराठा आक्रमण समाप्त हो जाएंगे, किन्तु इसका परिणाम इसके विपरीत हुआ।

➣ अपने सेनापति की हत्या से क्रोधित होकर रघुजी भोंसले ने बंगाल पर और भी अधिक तीव्र आक्रमण प्रारम्भ कर दिए। मराठा सेना ने बंगाल के अनेक भागों में पुनः व्यापक लूटपाट की।

मराठा डिच

➣ मराठा आक्रमणों से विशेष रूप से कलकत्ता की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो गया। इस कारण 1742 ई. में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने कलकत्ता की रक्षा के लिए नगर के चारों ओर एक गहरी खाई खुदवानी प्रारम्भ की।

➣ यह खाई मराठा डिच के नाम से प्रसिद्ध हुई। यद्यपि इसका निर्माण पूरा नहीं हो सका, फिर भी यह बंगाल पर मराठा आक्रमणों की स्मृति के रूप में इतिहास में प्रसिद्ध है।

1751 ई. की संधि

➣ लगभग दस वर्षों तक चले निरंतर युद्धों से अलीवर्दी ख़ाँ तथा मराठा दोनों पक्ष थक चुके थे। अंततः 1751 ई. में अलीवर्दी ख़ाँ और रघुजी भोंसले के बीच एक संधि हुई।

➣ इस संधि के अनुसार अलीवर्दी ख़ाँ ने उड़ीसा पर मराठों का अधिकार स्वीकार कर लिया तथा मराठों को प्रतिवर्ष 12 लाख रुपये चौथ देने पर सहमति व्यक्त की। इसके बाद बंगाल पर मराठा आक्रमणों में काफी कमी आ गई।

➣ यद्यपि इस संधि से बंगाल को तत्काल शांति मिली, किन्तु उड़ीसा पर नियंत्रण खोने तथा वार्षिक चौथ देने के कारण बंगाल की प्रतिष्ठा और आर्थिक स्थिति को क्षति पहुँची।

मराठा आक्रमणों का प्रभाव

➣ मराठा आक्रमणों ने बंगाल की आर्थिक समृद्धि को गम्भीर क्षति पहुँचाई। अनेक गाँव उजड़ गए, कृषि उत्पादन घट गया, व्यापारिक गतिविधियाँ प्रभावित हुईं तथा राज्य के राजस्व में भी कमी आई।

➣ यद्यपि अलीवर्दी ख़ाँ मराठों को पूरी तरह रोकने में सफल नहीं हुआ, फिर भी उसने लगभग एक दशक तक साहसपूर्वक उनका सामना किया और अंततः संधि के माध्यम से बंगाल में शांति स्थापित की।

➣ इतिहासकारों के अनुसार मराठा आक्रमणों ने बंगाल की शक्ति को काफी कमजोर कर दिया। यही दुर्बलता आगे चलकर सिराजुद्दौला के शासनकाल में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए लाभदायक सिद्ध हुई।

प्रशासन

➣ अलीवर्दी ख़ाँ ने अपने शासनकाल में राजस्व व्यवस्था को व्यवस्थित बनाए रखा, अधिकारियों पर नियंत्रण रखा तथा प्रान्त में कानून-व्यवस्था बनाए रखने का प्रयास किया। निरंतर युद्धों और मराठा आक्रमणों के बावजूद उसने बंगाल के प्रशासन को पूरी तरह विफल नहीं होने दिया।

➣ इतिहासकारों के अनुसार उसकी सबसे बड़ी सफलता यह थी कि उसने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी बंगाल की राजनीतिक एकता को बनाए रखा तथा विदेशी व्यापारिक कम्पनियों को तत्काल राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने से रोके रखा।

अफ़ग़ान विद्रोह (1748 ई.)

➣ मराठा आक्रमणों के अतिरिक्त अलीवर्दी ख़ाँ को 1748 ई. में मुस्तफ़ा ख़ाँ के नेतृत्व में हुए अफ़ग़ान विद्रोह का भी सामना करना पड़ा।

➣ मुस्तफ़ा ख़ाँ एक प्रभावशाली अफ़ग़ान सरदार था, जिसने नवाब के विरुद्ध विद्रोह कर अपनी शक्ति स्थापित करने का प्रयास किया। इस विद्रोह से कुछ समय के लिए बंगाल के पश्चिमी एवं उत्तरी क्षेत्रों में अशांति फैल गई।

➣ अलीवर्दी ख़ाँ ने अपनी सैन्य क्षमता और राजनीतिक कौशल का परिचय देते हुए इस विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन किया। इसके बाद बंगाल में पुनः शांति एवं प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित हो गई।

यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों के प्रति नीति

➣ अलीवर्दी ख़ाँ भली-भाँति समझता था कि यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियाँ केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहना चाहतीं। वह उनके बढ़ते राजनीतिक प्रभाव से सावधान था और उन्हें केवल व्यापारिक गतिविधियों तक सीमित रखना चाहता था।

➣ उसके शासनकाल में बंगाल में अंग्रेज़, फ्रांसीसी, डच तथा अन्य यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियाँ सक्रिय थीं। नवाब ने सभी कम्पनियों के साथ संतुलित व्यवहार किया और किसी एक कम्पनी को विशेष राजनीतिक लाभ नहीं दिया।

➣ अलीवर्दी ख़ाँ का मानना था कि विदेशी कम्पनियों को केवल व्यापार करने की अनुमति दी जानी चाहिए, न कि उन्हें सैन्य शक्ति बढ़ाने या राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार दिया जाए।

➣ अलीवर्दी ख़ाँ के शासनकाल में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने कलकत्ता तथा फ्रांसीसियों ने चन्द्रनगर की किलेबन्दी प्रारम्भ की। नवाब ने इसका कड़ा विरोध किया।

➣ उसने स्पष्ट शब्दों में कहा कि व्यापारिक कम्पनियों को किलों की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनका उद्देश्य व्यापार करना है, युद्ध करना नहीं।

अलीवर्दी ख़ाँ का कथन- तुम व्यापारी हो, तुम्हें किलों का क्या करना है?

➣ नवाब के विरोध के बाद फ्रांसीसियों ने उसकी बात मान ली और अपनी गतिविधियों में संयम रखा, किन्तु अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने किलेबन्दी की नीति पूरी तरह नहीं छोड़ी। आगे चलकर यही नीति सिराजुद्दौला और अंग्रेज़ों के बीच संघर्ष का एक प्रमुख कारण बनी।

➣ अलीवर्दी ख़ाँ यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों की आर्थिक उपयोगिता को समझता था। उनका व्यापार बंगाल के राजस्व एवं विदेशी वाणिज्य के लिए लाभदायक था, इसलिए वह उन्हें पूरी तरह हटाना नहीं चाहता था।

➣ दूसरी ओर वह यह भी जानता था कि यदि उन्हें अनियंत्रित छोड़ दिया गया, तो वे भविष्य में राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने का प्रयास करेंगी। इसी कारण उसने उनके प्रति सावधानी, संतुलन एवं नियंत्रण की नीति अपनाई।

अलीवर्दी ख़ाँ का प्रसिद्ध कथन- यूरोपीय लोग मधुमक्खियों के समान हैं। यदि उन्हें न छेड़ा जाए तो वे शहद देंगी, किन्तु यदि उन्हें छेड़ा जाए तो वे डंक मारेंगी।

➣ इस कथन से स्पष्ट होता है कि अलीवर्दी ख़ाँ यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों की आर्थिक उपयोगिता और उनकी संभावित राजनीतिक महत्वाकांक्षा—दोनों को भली-भाँति समझता था।

➣ एक अन्य अवसर पर उसने यह भी कहा कि वह अंग्रेज़ों को बंगाल से निकाल तो सकता है, किन्तु उनकी समुद्री शक्ति के कारण ऐसा करना व्यावहारिक रूप से कठिन होगा। यह कथन उसकी राजनीतिक दूरदर्शिता तथा अंग्रेज़ों की नौसैनिक शक्ति के प्रति उसके यथार्थवादी दृष्टिकोण को दर्शाता है।

अलीवर्दी ख़ाँ का एक अन्य प्रसिद्ध कथन – अंग्रेज़ों को बंगाल की भूमि से निकालना कठिन नहीं, परन्तु उनकी समुद्री शक्ति का सामना करना समुद्र में आग लगाने के समान है।

उत्तराधिकार विवाद

➣ अपने शासनकाल के अंतिम वर्षों में अलीवर्दी ख़ाँ का सबसे बड़ा उद्देश्य बंगाल में उत्तराधिकार के प्रश्न का शांतिपूर्ण समाधान करना था। वह चाहता था कि उसकी मृत्यु के बाद भी बंगाल में राजनीतिक स्थिरता बनी रहे और नवाबी शासन सुरक्षित रहे।

➣ अलीवर्दी ख़ाँ की कोई पुत्र संतान नहीं थी। उसकी तीन पुत्रियाँ थीं, जिनका विवाह क्रमशः ढाका, पूर्णिया तथा पटना के प्रभावशाली अधिकारियों एवं शासकों से हुआ था। इन वैवाहिक संबंधों के कारण बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में उसका राजनीतिक प्रभाव मजबूत बना रहा।

➣ अलीवर्दी ख़ाँ अपनी सबसे छोटी पुत्री आमिना बेगम के पुत्र सिराजुद्दौला से अत्यधिक स्नेह करता था। उसने बचपन से ही सिराजुद्दौला को अपने संरक्षण में रखा तथा उसे भावी नवाब के रूप में तैयार किया।

➣ अपनी वृद्धावस्था में अलीवर्दी ख़ाँ ने सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। उसका विश्वास था कि सिराजुद्दौला बंगाल की स्वतंत्रता की रक्षा करेगा तथा विदेशी व्यापारिक कम्पनियों की बढ़ती राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का सामना कर सकेगा।

➣ अलीवर्दी ख़ाँ के इस निर्णय का सभी दरबारी सरदारों ने समर्थन नहीं किया। विशेषकर घसीटी बेगम (अलीवर्दी ख़ाँ की बड़ी पुत्री तथा सिराजुद्दौला की मौसी) सिराजुद्दौला के नवाब बनने के पक्ष में नहीं थी। वह स्वयं बंगाल की राजनीति में अत्यधिक प्रभावशाली थी और दरबार के अनेक अधिकारियों पर उसका प्रभाव था।

➣ दूसरी ओर पूर्णिया के फौजदार शौकत जंग ने भी नवाबी पर अपना दावा प्रस्तुत किया। परिणामस्वरूप अलीवर्दी ख़ाँ के जीवनकाल के अंतिम वर्षों में ही दरबार के भीतर विभिन्न गुट बन गए।

➣ इस गुटबंदी में कुछ प्रभावशाली दरबारी, बड़े व्यापारी तथा वित्तीय परिवार भी शामिल हो गए, जिससे नवाबी शासन की आंतरिक एकता कमजोर होने लगी और राजनीतिक अस्थिरता का वातावरण बन गया।

➣ इस दरबारी गुटबंदी का लाभ अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने उठाना प्रारम्भ कर दिया। कम्पनी के अधिकारी बंगाल की आंतरिक राजनीति और उत्तराधिकार विवाद पर लगातार नज़र रखे हुए थे।

➣ अलीवर्दी ख़ाँ के जीवनकाल में कम्पनी खुलकर हस्तक्षेप नहीं कर सकी, क्योंकि वह नवाब के कठोर एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व से परिचित थी। किन्तु उसकी मृत्यु के बाद कम्पनी के लिए बंगाल की राजनीति में हस्तक्षेप करने का सबसे बड़ा अवसर सिद्ध हुए।

➣आगे चलकर इसी का लाभ उठाकर अंग्रेज़ों ने सिराजुद्दौला के विरुद्ध षड्यंत्र रचा, जिसका परिणाम 1757 ई. के प्लासी के युद्ध के रूप में सामने आया।

मृत्यु

➣ लगभग सोलह वर्षों तक शासन करने के बाद 9 अप्रैल 1756 ई. को लगभग 80 वर्ष की आयु में अलीवर्दी ख़ाँ की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद उसके द्वारा घोषित उत्तराधिकारी सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना।

➣ अलीवर्दी ख़ाँ की मृत्यु के साथ ही बंगाल के इतिहास में एक नए अध्याय का आरम्भ हुआ, जिसमें अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी और बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के बीच संघर्ष देखने को मिलता है।

एक नज़र में : अलीवर्दी ख़ाँ

विषय विवरण
शासनकाल 1740–1756 ई.
मूल नाम मिर्ज़ा मुहम्मद ख़ाँ
पहला महत्त्वपूर्ण पद 1732 ई. — बिहार का नायब नाज़िम (शुजाउद्दीन द्वारा नियुक्त)
नवाब कैसे बना? 1740 ई. में गिरिया (घेरिया) के युद्ध में सरफ़राज़ ख़ाँ को पराजित कर बंगाल का नवाब बना।
उपाधि महावत जंग
दिल्ली से संबंध प्रारम्भ में दो करोड़ रुपये नज़राना भेजकर नवाबी की स्वीकृति प्राप्त की, बाद में व्यवहारतः स्वतंत्र शासन किया।
सबसे बड़ी चुनौती मराठा (बर्गी) आक्रमण
मराठा शासक रघुजी भोंसले
मराठा सेनापति भास्कर पंडित (भास्कर पंत)
1742 ई. कलकत्ता की सुरक्षा हेतु अंग्रेज़ों ने मराठा डिच का निर्माण प्रारम्भ किया।
1744 ई. भास्कर पंडित की हत्या।
1751 ई. की संधि मराठों को उड़ीसा पर अधिकार स्वीकार किया तथा 12 लाख रुपये वार्षिक चौथ देना स्वीकार किया।
1748 ई. मुस्तफ़ा ख़ाँ के नेतृत्व में अफ़ग़ान विद्रोह का दमन।
यूरोपीय नीति अंग्रेज़ों एवं फ्रांसीसियों की किलेबन्दी का विरोध किया तथा उन्हें केवल व्यापार तक सीमित रखना चाहा।
प्रसिद्ध कथन तुम व्यापारी हो, तुम्हें किलों का क्या करना है?
प्रसिद्ध उपमा यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों की तुलना मधुमक्खियों से की।
उत्तराधिकारी सिराजुद्दौला
मृत्यु 9 अप्रैल 1756 ई. (लगभग 80 वर्ष की आयु में)

सिराजुद्दौला (1756–1757 ई.)

➣ सिराजुद्दौला बंगाल का अंतिम स्वतंत्र नवाब था (इसके बाद के सारे नवाब अंग्रेजो की हाथो की कठपुतली साबित हुए थे)। सिराजुद्दौला का शासनकाल यद्यपि केवल लगभग एक वर्ष (1756–1757 ई.) का रहा, किन्तु भारतीय इतिहास पर उसका प्रभाव अत्यंत गहरा पड़ा।

➣ उसके शासनकाल में बंगाल और अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच संघर्ष अपने चरम पर पहुँच गया। उसके शासनकाल में हुई घटनाओं ने भारत की राजनीतिक दिशा ही बदल दी। इसी संघर्ष का परिणाम प्लासी के युद्ध के रूप में सामने आया।

सत्ता प्राप्ति

➣ सिराजुद्दौला का वास्तविक नाम मिर्ज़ा मुहम्मद था। वह बंगाल के नवाब अलीवर्दी ख़ाँ का दौहित्र (पुत्री का पुत्र) था। उसकी माता आमिना बेगम अलीवर्दी ख़ाँ की सबसे छोटी पुत्री थीं।

➣ अलीवर्दी ख़ाँ अपने जीवनकाल में ही सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर चुके थे तथा उसे प्रशासन एवं शासन का व्यावहारिक अनुभव भी प्रदान किया था।

9 अप्रैल 1756 ई. को अलीवर्दी ख़ाँ की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा का नवाब बना। उस समय उसकी आयु लगभग 23 वर्ष थी।

▪ शासनकाल — 1756–1757 ई.
▪ वास्तविक नाम — मिर्ज़ा मुहम्मद
▪ अलीवर्दी ख़ाँ का दौहित्र (पुत्री का पुत्र)
9 अप्रैल 1756 ई. को बंगाल का नवाब बना।
▪ प्रमुख विरोधी — घसीटी बेगम, मीर जाफ़र, जगत सेठ तथा शौकत जंग
▪ उसके शासनकाल में बंगाल और अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच निर्णायक संघर्ष प्रारम्भ हुआ।

उत्तराधिकार का विरोध

➣ सिराजुद्दौला के नवाब बनते ही बंगाल के दरबार में उसके विरुद्ध एक शक्तिशाली विरोधी गुट सक्रिय हो गया। इस गुट में उसके कई निकट संबंधी, प्रभावशाली दरबारी तथा बड़े व्यापारी सम्मिलित थे, जो उसे नवाब के रूप में स्वीकार करने के इच्छुक नहीं थे।

➣ सिराजुद्दौला की सबसे बड़ी विरोधी उसकी मौसी घसीटी बेगम (मेहर-उन-निसा बेगम) थी। घसीटी बेगम अत्यंत धनी एवं प्रभावशाली महिला थी और बंगाल के अनेक उच्च अधिकारियों तथा व्यापारिक परिवारों पर उसका प्रभाव था।

➣ नवाब की सेना के मीर बख्शी मीर जाफ़र भी सिराजुद्दौला से असंतुष्ट थे। वे स्वयं बंगाल की नवाबी प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा रखते थे और अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे।

➣ बंगाल का प्रसिद्ध बैंकिंग एवं वित्तीय परिवार जगत सेठ भी सिराजुद्दौला का समर्थक नहीं था। दरबार की राजनीति में इस परिवार का अत्यधिक प्रभाव था और आगे चलकर इसने अंग्रेज़ों तथा मीर जाफ़र के साथ मिलकर सिराजुद्दौला के विरुद्ध षड्यंत्र रचने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

➣ इस प्रकार सिराजुद्दौला को नवाब बनने के साथ ही आंतरिक विरोध, दरबारी षड्यंत्र तथा उत्तराधिकार विवाद जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए अत्यंत अनुकूल सिद्ध हुईं।

आंतरिक विरोध का दमन

➣ उसे स्पष्ट रूप से ज्ञात था कि यदि इन आंतरिक विरोधियों पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो वे उसके शासन के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं। इसलिए उसने सत्ता संभालते ही अपने विरोधियों के विरुद्ध कठोर कदम उठाने प्रारम्भ कर दिए।

➣ घसीटी बेगम का निवास मोतीझील महल (मोतीझील पैलेस) था, जो उस समय बंगाल की राजनीतिक गतिविधियों का एक प्रमुख केन्द्र बन गया था। यहाँ उसके समर्थक दरबारी एवं विरोधी गुट अक्सर एकत्रित होते थे।

➣ सिराजुद्दौला ने इस षड्यंत्र को समाप्त करने के उद्देश्य से मोतीझील महल पर अधिकार कर लिया। उसने घसीटी बेगम की विशाल संपत्ति जब्त कर ली तथा उसे नज़रबंद (कैद) कर दिया। इस कार्रवाई से नवाब के प्रमुख विरोधी गुट को प्रारम्भिक झटका लगा।

➣ नवाब बनने के बाद सिराजुद्दौला को यह भी संदेह था कि सेना का मीर बख्शी (प्रधान सेनापति) मीर जाफ़र उसके प्रति पूर्णतः निष्ठावान नहीं है। इसलिए उसने मीर जाफ़र को हटाकर उसकी जगह अपने विश्वसनीय सेनानायक मीर मदन को मीर बख्शी नियुक्त कर दिया।

➣ इस निर्णय से मीर जाफ़र अत्यंत असंतुष्ट हो गया। आगे चलकर यही असंतोष अंग्रेज़ों के साथ उसके गुप्त षड्यंत्र का प्रमुख कारण बना और उसने प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला के साथ विश्वासघात किया।

शौकत जंग का विद्रोह

➣ सिराजुद्दौला के नवाब बनने का विरोध केवल दरबार तक ही सीमित नहीं था। पूर्णिया का शासक शौकत जंग, जो सिराजुद्दौला का चचेरा भाई था, ने भी नवाबी पर अपना दावा प्रस्तुत किया। उसे विश्वास था कि बंगाल के कुछ प्रभावशाली दरबारी और व्यापारी उसका समर्थन करेंगे।

➣ शौकत जंग ने स्वयं को स्वतंत्र बनाने का प्रयास किया तथा नवाब के आदेशों की अवहेलना प्रारम्भ कर दी। सिराजुद्दौला ने इसे नवाबी सत्ता के लिए सीधी चुनौती माना और उसके विरुद्ध सैन्य अभियान चलाने का निर्णय लिया।

1756 ई. में सिराजुद्दौला ने पूर्णिया पर आक्रमण किया। दोनों पक्षों के बीच हुए संघर्ष में शौकत जंग मारा गया तथा उसका विद्रोह पूरी तरह समाप्त हो गया।

➣ शौकत जंग की पराजय के बाद सिराजुद्दौला की स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक मजबूत हो गई। बंगाल के अधिकांश स्थानीय शासकों ने उसकी सत्ता को स्वीकार कर लिया, किन्तु दरबार के भीतर मीर जाफ़र, जगत सेठ तथा अन्य विरोधी गुट अभी भी सक्रिय बने रहे।

अंग्रेज़ों से संघर्ष

➣ आंतरिक विरोधियों पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद सिराजुद्दौला का ध्यान अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी की गतिविधियों की ओर गया। इसी समय यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध (1756–1763 ई.) प्रारम्भ हो चुका था, जिसके कारण भारत में अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों के बीच भी तनाव बढ़ने लगा।

➣ अंग्रेज़ी कम्पनी ने कलकत्ता तथा फ्रांसीसियों ने चन्द्रनगर की सुरक्षा बढ़ाने के लिए अपनी बस्तियों की किलेबन्दी प्रारम्भ कर दी। सिराजुद्दौला ने इसे अपनी संप्रभुता के विरुद्ध माना और दोनों यूरोपीय कम्पनियों को बिना अनुमति किलेबन्दी न करने का आदेश दिया।

फ्रांसीसियों ने नवाब की आज्ञा स्वीकार कर ली, किन्तु अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने आदेश की अवहेलना करते हुए फोर्ट विलियम (कलकत्ता) की किलेबन्दी जारी रखी।

➣ अंग्रेज़ों ने केवल किलेबन्दी ही नहीं की, बल्कि नवाब के कुछ विरोधियों को भी शरण देना प्रारम्भ कर दिया तथा व्यापारिक विशेषाधिकारों का दुरुपयोग करते हुए राजस्व नियमों की भी अवहेलना की। इन घटनाओं से सिराजुद्दौला और कम्पनी के बीच तनाव और अधिक बढ़ गया।

संघर्ष के प्रमुख कारण
▪ अंग्रेज़ों द्वारा फोर्ट विलियम की किलेबन्दी।
▪ नवाब की अनुमति के बिना सैन्य तैयारी।
▪ नवाब के विरोधियों को संरक्षण देना।
▪ व्यापारिक विशेषाधिकारों का दुरुपयोग।

कासिमबाज़ार एवं कलकत्ता पर अधिकार (1756 ई.)

➣ अंग्रेज़ों की अवज्ञा से क्रोधित होकर सिराजुद्दौला ने सैन्य कार्रवाई करने का निर्णय लिया। 4 जून 1756 ई. को उसने अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी की महत्त्वपूर्ण व्यापारिक कोठी कासिमबाज़ार पर आक्रमण कर दिया।

➣ कम्पनी के अधिकारी नवाब की विशाल सेना का सामना नहीं कर सके और शीघ्र ही कासिमबाज़ार की फैक्ट्री नवाब के अधिकार में आ गई। इस सफलता के बाद सिराजुद्दौला ने सीधे कलकत्ता की ओर कूच किया।

➣ कासिमबाज़ार पर अधिकार करने के बाद सिराजुद्दौला 15 जून 1756 ई. को अपनी सेना के साथ कलकत्ता की ओर बढ़ा। अंग्रेज़ों ने फोर्ट विलियम की रक्षा का प्रयास किया, किन्तु उनकी तैयारियाँ अपर्याप्त थीं और नवाब की सेना के सामने वे अधिक समय तक टिक नहीं सके।

16 जून से 20 जून 1756 ई. तक चले संघर्ष के बाद सिराजुद्दौला की सेना ने फोर्ट विलियम पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार कलकत्ता पर बंगाल के नवाब का नियंत्रण स्थापित हो गया।

➣ युद्ध के दौरान बंगाल में अंग्रेज़ों के गवर्नर रॉजर ड्रेक तथा सेनानायक मिनचिन (Minchin) अपने अनेक साथियों के साथ जहाज़ों द्वारा भागकर फुल्टा (Fulta) पहुँच गए।

➣ दूसरी ओर कम्पनी के अधिकारी जॉन ज़ेफ़ानिया हॉलवेल तथा उसके कुछ सहयोगियों ने नवाब की सेना के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।

अलीनगर की स्थापना

➣ कलकत्ता पर विजय प्राप्त करने के बाद सिराजुद्दौला ने उसका नाम बदलकर अलीनगर रख दिया। यह नाम उसके नाना अलीवर्दी ख़ाँ की स्मृति में रखा गया था।

➣ नवाब ने मानिकचंद को अलीनगर (पूर्व नाम कलकत्ता) का प्रभारी नियुक्त किया तथा प्रशासन की व्यवस्था उसके हाथों में सौंप दी। इसके बाद वह स्वयं अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद लौट गया।

➣ कलकत्ता पर सिराजुद्दौला की विजय बंगाल की नवाबी सत्ता की एक बड़ी सफलता थी, किन्तु अंग्रेज़ों ने इसे अपनी प्रतिष्ठा पर आघात माना। मद्रास में स्थित कम्पनी के अधिकारियों ने कलकत्ता को पुनः प्राप्त करने की योजना बनानी प्रारम्भ कर दी।

सप्तवर्षीय युद्ध 1756–1763 ई.
4 जून 1756 कासिमबाज़ार पर अधिकार
20 जून 1756 फोर्ट विलियम (कलकत्ता) पर अधिकार
गवर्नर रॉजर ड्रेक (फुल्टा भाग गया)
आत्मसमर्पण करने वाला अधिकारी जे. ज़ेड. हॉलवेल
कलकत्ता का नया नाम अलीनगर
अलीनगर का प्रभारी मानिकचंद

ब्लैक होल घटना (1756 ई.)

20 जून 1756 ई. को फोर्ट विलियम पर सिराजुद्दौला का अधिकार हो जाने के बाद एक विवादास्पद घटना घटी, जिसे अंग्रेज़ इतिहासकारों ने ‘ब्लैक होल ऑफ़ कलकत्ता अथवा कालकोठरी घटना के नाम से प्रसिद्ध किया।

➣ इस घटना का सबसे प्रसिद्ध विवरण अंग्रेज़ अधिकारी जॉन ज़ेफ़ानिया हॉलवेल ने दिया। उसके अनुसार फोर्ट विलियम पर अधिकार करने के बाद नवाब के सैनिकों ने 146 अंग्रेज़ बंदियों (जिनमें कुछ स्त्रियाँ एवं बच्चे भी सम्मिलित बताए गए) को एक छोटी-सी कालकोठरी में बंद कर दिया।

➣ हॉलवेल के अनुसार वह कमरा लगभग 18 फुट लंबा तथा 14 फुट 10 इंच चौड़ा था। भीषण गर्मी, घुटन और पानी के अभाव के कारण 20 जून 1756 की पूरी रात बंदियों को अत्यधिक कष्ट सहना पड़ा।

➣ उसने यह भी दावा किया कि जब अगले दिन प्रातःकाल कोठरी खोली गई, तब 146 में से केवल 23 व्यक्ति ही जीवित बचे, जबकि शेष लोगों की दम घुटने से मृत्यु हो चुकी थी। हॉलवेल स्वयं भी जीवित बचे लोगों में शामिल था।

➣ आधुनिक इतिहासकारों ने हॉलवेल के इस विवरण पर गंभीर संदेह व्यक्त किया है। उनका मानना है कि उसने बंदियों की संख्या तथा मृतकों की संख्या को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया, ताकि अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी सिराजुद्दौला के विरुद्ध कठोर कार्रवाई को उचित ठहरा सके।

➣ अनेक इतिहासकारों का मत है कि जिस कमरे का उल्लेख किया गया है, उसमें 146 व्यक्तियों का एक साथ बंद होना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं था। इसके अतिरिक्त इस घटना की पुष्टि समकालीन भारतीय स्रोतों से भी नहीं होती।

➣ प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. भोलानाथ, आर. सी. मजूमदार, ब्रिजेन गुप्ता तथा अन्य आधुनिक विद्वानों ने भी हॉलवेल के विवरण को अतिरंजित माना है। उनके अनुसार यह घटना हुई अवश्य थी, किन्तु अंग्रेज़ों द्वारा प्रस्तुत विवरण पूर्णतः विश्वसनीय नहीं माना जा सकता।

➣ अधिकांश इतिहासकारों का यह भी मत है कि स्वयं सिराजुद्दौला ने बंदियों को कालकोठरी में बंद करने का कोई प्रत्यक्ष आदेश नहीं दिया था। सम्भवतः यह स्थानीय सैनिक अधिकारियों की लापरवाही अथवा अव्यवस्था का परिणाम था।

राजनीतिक प्रभाव

➣ यद्यपि ब्लैक होल घटना की वास्तविकता पर इतिहासकारों में मतभेद है, फिर भी अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने इसका व्यापक प्रचार किया। कम्पनी ने इसे नवाब की क्रूरता का प्रमाण बताते हुए इंग्लैंड तथा भारत में जनमत तैयार किया।

➣ इसी घटना को आधार बनाकर कम्पनी ने मद्रास से रॉबर्ट क्लाइव तथा एडमिरल चार्ल्स वाट्सन के नेतृत्व में एक शक्तिशाली सेना बंगाल भेजी। आगे चलकर इसी सैन्य अभियान के परिणामस्वरूप अंग्रेज़ों ने पुनः कलकत्ता पर अधिकार कर लिया।

➣ इतिहासकारों के अनुसार ब्लैक होल घटना से अधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस घटना का उपयोग अंग्रेज़ों ने बंगाल की राजनीति में हस्तक्षेप करने तथा सिराजुद्दौला के विरुद्ध सैन्य अभियान को उचित ठहराने के लिए किया।

कलकत्ता पर अंग्रेज़ों का पुनः अधिकार

➣ कलकत्ता पर सिराजुद्दौला की विजय तथा ब्लैक होल घटना के बाद अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल में अपनी प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करने का निश्चय किया। कम्पनी के अधिकारियों ने मद्रास से एक शक्तिशाली सैन्य अभियान भेजने का निर्णय लिया।

➣ इस अभियान का नेतृत्व रॉबर्ट क्लाइव को सौंपा गया, जबकि नौसेना का नेतृत्व एडमिरल चार्ल्स वाट्सन कर रहे थे। दोनों के संयुक्त नेतृत्व में अंग्रेज़ी सेना जल एवं थल मार्ग से बंगाल पहुँची।

➣ इस समय कलकत्ता से भागे हुए अंग्रेज़ अधिकारी फुल्टा में शरण लिए हुए थे। क्लाइव के पहुँचने के बाद उन्होंने भी अंग्रेज़ी सेना का साथ दिया और कलकत्ता को पुनः प्राप्त करने की योजना बनाई।

➣ अंग्रेज़ी सेना ने सबसे पहले हुगली नदी के मार्ग से आगे बढ़ते हुए कलकत्ता की ओर अभियान प्रारम्भ किया। इस समय नवाब द्वारा नियुक्त मानिकचंद वहाँ का प्रभारी था।

➣ अनेक स्रोतों के अनुसार अंग्रेज़ों ने मानिकचंद को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया और उसकी कमजोरी का लाभ उठाया। परिणामस्वरूप अंग्रेज़ी सेना को अपेक्षित प्रतिरोध नहीं मिला।

2 जनवरी 1757 ई. को अंग्रेज़ों ने पुनः कलकत्ता (फोर्ट विलियम) पर अधिकार कर लिया। इसके कुछ ही दिनों बाद उन्होंने हुगली पर भी आक्रमण कर वहाँ भारी लूटपाट की, जिससे सिराजुद्दौला और अधिक क्रोधित हो गया।

➣ नवाब स्वयं एक विशाल सेना लेकर कलकत्ता पहुँचा। दोनों पक्ष युद्ध की तैयारी करने लगे, किन्तु परिस्थितियों को देखते हुए किसी भी पक्ष ने तत्काल निर्णायक युद्ध उचित नहीं समझा। परिणामस्वरूप दोनों के बीच समझौते की बातचीत प्रारम्भ हुई।

अलीनगर की संधि (9 फ़रवरी 1757 ई.)

➣ बढ़ते तनाव को समाप्त करने के उद्देश्य से 9 फ़रवरी 1757 ई. को सिराजुद्दौला और अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच अलीनगर की संधि हुई। अंग्रेज़ों की ओर से इस संधि पर रॉबर्ट क्लाइव और एडमिरल वाट्सन ने प्रतिनिधित्व किया।

➣ इस संधि के अनुसार अंग्रेज़ों को मुग़ल सम्राट द्वारा पूर्व में प्रदान किए गए व्यापारिक विशेषाधिकार पुनः प्राप्त हो गए। कम्पनी को बिना किसी बाधा के व्यापार करने की अनुमति दी गई।

➣ अंग्रेज़ों को कलकत्ता (अलीनगर) की किलेबन्दी एवं फोर्ट विलियम की मरम्मत करने की अनुमति भी प्रदान कर दी गई। साथ ही कम्पनी को टकसाल (मिंट) स्थापित कर सिक्के ढालने का अधिकार भी मिल गया।

➣ दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के विरुद्ध शत्रुतापूर्ण कार्यवाही न करने तथा शांति बनाए रखने का वचन दिया। इस प्रकार कुछ समय के लिए नवाब और कम्पनी के बीच संघर्ष समाप्त हो गया।

संधि का परिणाम

➣ अलीनगर की संधि से तत्कालीन संकट तो समाप्त हो गया, किन्तु दोनों पक्ष एक-दूसरे पर विश्वास नहीं करते थे। सिराजुद्दौला को आशंका थी कि अंग्रेज़ भविष्य में उसके विरुद्ध षड्यंत्र करेंगे, जबकि कम्पनी के अधिकारी भी नवाब को हटाकर किसी ऐसे व्यक्ति को सत्ता में लाना चाहते थे, जो उनके हितों की रक्षा कर सके।

➣ इसी बीच अंग्रेज़ों ने 23 मार्च 1757 ई. को चन्द्रनगर स्थित फ्रांसीसी बस्ती पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया। यह कार्य अलीनगर की संधि की भावना के विपरीत था और इससे सिराजुद्दौला तथा अंग्रेज़ों के बीच अविश्वास और अधिक बढ़ गया।

➣ चन्द्रनगर पर अधिकार करने के बाद अंग्रेज़ों ने बंगाल के असंतुष्ट दरबारियों से गुप्त संपर्क स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने मीर जाफ़र, जगत सेठ तथा अन्य विरोधी सरदारों के साथ मिलकर सिराजुद्दौला को गद्दी से हटाने की योजना बनानी शुरू कर दी।

➣ इस प्रकार अलीनगर की संधि स्थायी शांति स्थापित करने में असफल रही और शीघ्र ही बंगाल की राजनीति एक ऐसे षड्यंत्र की ओर बढ़ने लगी, जिसका परिणाम 23 जून 1757 ई. के प्लासी के युद्ध के रूप में सामने आया।

सिराजुद्दौला के विरुद्ध षड्यंत्र

अलीनगर की संधि (9 फ़रवरी 1757 ई.) के बाद भी अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी और सिराजुद्दौला के बीच अविश्वास समाप्त नहीं हुआ। कम्पनी के अधिकारियों को विश्वास हो गया था कि जब तक सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब रहेगा, तब तक वे अपने राजनीतिक एवं आर्थिक हितों की पूर्ति नहीं कर सकेंगे। इसलिए उन्होंने उसे गद्दी से हटाकर अपने अनुकूल नवाब बनाने की योजना बनाई।

➣ दूसरी ओर सिराजुद्दौला भी अंग्रेज़ों की गतिविधियों से सशंकित था। विशेषकर 23 मार्च 1757 ई. को अंग्रेज़ों द्वारा चन्द्रनगर पर अधिकार कर लेने के बाद उसे यह स्पष्ट हो गया कि कम्पनी केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि बंगाल की राजनीति में भी हस्तक्षेप करना चाहती है।

➣ अंग्रेज़ों ने बंगाल के उन प्रभावशाली व्यक्तियों से संपर्क स्थापित किया, जो सिराजुद्दौला से असंतुष्ट थे। इनमें प्रमुख थे—

  • मीर जाफ़र — सेना का पूर्व मीर बख्शी।
  • राय दुर्लभ — नवाब का दीवान एवं सेनानायक।
  • यार लुत्फ़ ख़ाँ — प्रमुख सैन्य अधिकारी।
  • जगत सेठ — बंगाल का प्रभावशाली बैंकिंग एवं वित्तीय परिवार।
  • ओमीचंद (अमीचंद) — धनी व्यापारी एवं मध्यस्थ।

➣ इन सभी का उद्देश्य अलग-अलग था, किन्तु एक बात समान थी—वे सिराजुद्दौला को सत्ता से हटाना चाहते थे। अंग्रेज़ों ने इसी असंतोष का लाभ उठाकर एक व्यापक षड्यंत्र तैयार किया।

➣ अंग्रेज़ों ने मीर जाफ़र को बंगाल का अगला नवाब बनाने का प्रस्ताव दिया। बदले में मीर जाफ़र ने वचन दिया कि यदि अंग्रेज़ उसे नवाब बनाने में सहायता करेंगे, तो वह कम्पनी को पर्याप्त धन, व्यापारिक सुविधाएँ तथा राजनीतिक संरक्षण प्रदान करेगा।

➣ अप्रैल और मई 1757 ई. के दौरान अंग्रेज़ों और षड्यंत्रकारियों के बीच कई गुप्त बैठकों का आयोजन हुआ। इन्हीं बैठकों में सिराजुद्दौला को सत्ता से हटाने तथा युद्ध की स्थिति में मीर जाफ़र द्वारा अंग्रेज़ों का साथ देने की योजना बनाई गई।

➣ इस षड्यंत्र में धनी व्यापारी ओमीचंद (अमीचंद) ने प्रारम्भ में मध्यस्थ की भूमिका निभाई। बाद में उसने अंग्रेज़ों से बड़ी धनराशि की माँग करते हुए धमकी दी कि यदि उसकी माँग पूरी नहीं की गई तो वह पूरे षड्यंत्र की जानकारी सिराजुद्दौला को दे देगा।

➣ रॉबर्ट क्लाइव ने ओमीचंद को धोखा देने के लिए दो अलग-अलग संधि-पत्र तैयार करवाए। एक वास्तविक संधि-पत्र था, जबकि दूसरे नकली संधि-पत्र में ओमीचंद को बड़ी धनराशि देने का उल्लेख किया गया था।

➣ कहा जाता है कि एडमिरल चार्ल्स वाट्सन ने नकली संधि-पत्र पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था। बाद में क्लाइव ने उसके हस्ताक्षर की नकल करवाकर दस्तावेज़ तैयार कराया। प्लासी के युद्ध के बाद जब ओमीचंद को वास्तविक स्थिति का पता चला, तो उसे कोई धनराशि नहीं मिली।

➣ नवाब को इस व्यापक षड्यंत्र की पूरी जानकारी नहीं मिल सकी और वह अपने ही प्रमुख अधिकारियों पर विश्वास करता रहा। दूसरी ओर अंग्रेज़ों ने सैन्य तैयारी पूरी कर ली। इस प्रकार अप्रैल–मई 1757 ई. में तैयार किया गया यह षड्यंत्र आगे चलकर प्लासी के युद्ध का प्रमुख कारण बना।

प्लासी का युद्ध (23 जून 1757 ई.)

प्लासी का युद्ध भारतीय इतिहास की सबसे निर्णायक घटनाओं में से एक माना जाता है। इस युद्ध ने भारत में अंग्रेज़ी राजनीतिक प्रभुत्व की नींव रखी तथा बंगाल के स्वतंत्र नवाबी शासन के पतन का मार्ग प्रशस्त किया।

➣ इतिहासकारों के अनुसार यह केवल दो सेनाओं के बीच का युद्ध नहीं था, बल्कि विश्वासघात, राजनीतिक षड्यंत्र और साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा का परिणाम था।

23 जून 1757 ई. को प्लासी (पालाशी) नामक स्थान पर भागीरथी नदी के तट पर बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच युद्ध हुआ। अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व रॉबर्ट क्लाइव कर रहा था।

➣ संख्या की दृष्टि से नवाब की सेना अंग्रेज़ों से कहीं अधिक बड़ी थी। उसके पास लगभग 50,000 सैनिक, बड़ी संख्या में घुड़सवार सेना तथा लगभग 50 से अधिक तोपें थीं। इसके विपरीत अंग्रेज़ों की सेना अपेक्षाकृत छोटी थी, किन्तु वह अनुशासित, प्रशिक्षित तथा आधुनिक युद्ध प्रणाली से लैस थी।

➣ युद्ध के दौरान सिराजुद्दौला के सबसे विश्वसनीय सेनानायक मीर मदन तथा मोहनलाल ने अत्यंत वीरता के साथ अंग्रेज़ों का सामना किया। प्रारम्भिक चरण में नवाब की सेना को बढ़त भी प्राप्त हुई।

➣ इसी बीच तोप के एक गोले से मीर मदन गंभीर रूप से घायल हो गया और शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो गई। उसके निधन से नवाब की सेना का मनोबल कमजोर पड़ गया।

➣ दूसरी ओर षड्यंत्र के अनुसार मीर जाफ़र, राय दुर्लभ तथा यार लुत्फ़ ख़ाँ ने अपनी विशाल सेनाओं के साथ युद्ध में कोई सक्रिय भाग नहीं लिया। वे युद्धभूमि में उपस्थित तो रहे, किन्तु जानबूझकर निष्क्रिय बने रहे। यही विश्वासघात युद्ध का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ।

प्लासी के युद्ध में विश्वासघात करने वाले प्रमुख सेनापति-
▪ मीर जाफ़र
▪ राय दुर्लभ
▪ यार लुत्फ़ ख़ाँ

➣ अपने प्रमुख सेनानायकों के विश्वासघात से निराश होकर सिराजुद्दौला ने युद्ध जारी रखने का प्रयास किया, किन्तु परिस्थितियाँ उसके विरुद्ध होती चली गईं। मीर जाफ़र ने उसे मुर्शिदाबाद लौटकर सेना को पुनः संगठित करने की सलाह दी।

➣ सिराजुद्दौला युद्धभूमि छोड़कर मुर्शिदाबाद पहुँच गया, किन्तु वहाँ भी उसे अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। कुछ समय बाद वह भागने का प्रयास करते हुए पकड़ा गया।

2 जुलाई 1757 ई. को मीर जाफ़र के पुत्र मीरन के आदेश पर मुहम्मद बेग ने सिराजुद्दौला की हत्या कर दी। इसके साथ ही बंगाल के अंतिम स्वतंत्र नवाब का अंत हो गया।

➣ यद्यपि वह प्लासी के युद्ध में पराजित हुआ, फिर भी उसका संघर्ष भारत में औपनिवेशिक विस्तार के विरुद्ध प्रारम्भिक प्रतिरोध का प्रतीक माना जाता है।

➣ इतिहासकारों के अनुसार प्लासी का युद्ध केवल सिराजुद्दौला की पराजय नहीं था, बल्कि भारत में एक नए औपनिवेशिक युग की शुरुआत थी। बंगाल की अपार संपत्ति अंग्रेज़ों के हाथ लग गई, जिसने उन्हें आगे चलकर सम्पूर्ण भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने की आर्थिक शक्ति प्रदान की।

युद्ध के परिणाम

➣ प्लासी के युद्ध के बाद 28 जून 1757 ई. को मीर जाफ़र को बंगाल का नवाब बना दिया गया। यद्यपि वह नाममात्र का नवाब था, किन्तु वास्तविक शक्ति अब अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के हाथों में आ गई।

➣ इस युद्ध के बाद कम्पनी को बंगाल में व्यापक आर्थिक एवं राजनीतिक लाभ प्राप्त हुए। उसे 24 परगनों की ज़मींदारी प्रदान की गई तथा भारी धनराशि युद्ध-क्षतिपूर्ति एवं उपहार के रूप में मिली।

रॉबर्ट क्लाइव को व्यक्तिगत रूप से लगभग 2,34,000 पाउंड की भेंट दी गई। इसके अतिरिक्त कम्पनी के अधिकारियों, सैनिकों तथा नाविकों को भी लाखों रुपये पुरस्कार स्वरूप प्रदान किए गए।

➣ बंगाल की अपार संपत्ति पर अधिकार मिलने से अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी की आर्थिक स्थिति अत्यंत सुदृढ़ हो गई। इतिहासकारों के अनुसार बंगाल की संपदा ने भारत में अंग्रेज़ी साम्राज्य के विस्तार के लिए आवश्यक आर्थिक आधार प्रदान किया।

➣ प्लासी के युद्ध में उसकी पराजय का प्रमुख कारण अंग्रेज़ों की सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि उसके अपने सेनानायकों एवं दरबारियों का विश्वासघात था। यदि मीर जाफ़र तथा अन्य सेनानायक युद्ध में ईमानदारी से लड़ते, तो सम्भवतः युद्ध का परिणाम भिन्न हो सकता था।

प्लासी के युद्ध का महत्त्व

➣ प्लासी का युद्ध भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। इसके बाद बंगाल का नवाब कम्पनी के हाथों की कठपुतली बन गया तथा कम्पनी का राजनीतिक हस्तक्षेप निरंतर बढ़ता गया।

➣ इस युद्ध ने भारत में अंग्रेज़ी साम्राज्य की वास्तविक स्थापना की नींव रखी। आगे चलकर कम्पनी ने बंगाल की आर्थिक शक्ति का उपयोग करके भारत के अन्य भागों पर भी अपना प्रभुत्व स्थापित किया।

➣ प्रसिद्ध इतिहासकार नवीनचन्द्र सेन ने प्लासी के युद्ध को भारत के इतिहास की दुःखभरी रात्रि कहा है। इसी प्रकार सुब्रह्मण्य भारती ने भी इसे भारत के लिए अत्यंत दुखद घटना बताया है।

▪ इस उपलब्धि से प्रभावित होकर तत्कालीन इंग्लैंड के प्रधानमंत्री विलियम पिट (द एल्डर) ने रॉबर्ट क्लाइव को स्वर्ग से उत्पन्न सेनानायक की उपाधि दी थी।

व्यक्तित्व

➣ सिराजुद्दौला साहसी, स्वाभिमानी तथा स्वतंत्र विचारों वाला शासक था। उसने नवाब बनते ही बंगाल में केंद्रीय सत्ता को सुदृढ़ करने का प्रयास किया तथा अपने विरोधी दरबारियों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए कठोर कदम उठाए।

➣ उसने अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी की बढ़ती राजनीतिक एवं सैन्य गतिविधियों का भी दृढ़तापूर्वक विरोध किया। उसने कासिमबाज़ार और कलकत्ता पर आक्रमण कर नवाबी अधिकारों की रक्षा करने का प्रयास किया।

➣ किन्तु वह अपने दरबार में व्याप्त षड्यंत्रों और विश्वासघात को समय रहते पूरी तरह समझ नहीं सका। उसने मीर जाफ़र, राय दुर्लभ तथा अन्य प्रभावशाली दरबारियों की महत्वाकांक्षाओं का सही आकलन नहीं किया, जिसका लाभ अंग्रेज़ों ने उठाया।

➣ प्लासी के युद्ध में उसकी पराजय का प्रमुख कारण अंग्रेज़ों की सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि उसके अपने सेनानायकों एवं दरबारियों का विश्वासघात था। यदि मीर जाफ़र तथा अन्य सेनानायक युद्ध में ईमानदारी से लड़ते, तो सम्भवतः युद्ध का परिणाम भिन्न हो सकता था।

➣ सिराजुद्दौला भारतीय इतिहास में विदेशी हस्तक्षेप का विरोध करने वाले उन प्रारम्भिक भारतीय शासकों में गिना जाता है, जिन्होंने अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को चुनौती दी। उसने कम्पनी को केवल एक व्यापारिक संस्था तक सीमित रखने का प्रयास किया।

एक नज़र में : सिराजुद्दौला

विषय विवरण
शासनकाल 1756–1757 ई.
वास्तविक नाम मिर्ज़ा मुहम्मद
उत्तराधिकारी किसके? अलीवर्दी ख़ाँ
प्रमुख विरोधी घसीटी बेगम, मीर जाफ़र, जगत सेठ, शौकत जंग
1756 ई. कासिमबाज़ार एवं कलकत्ता पर अधिकार
ब्लैक होल घटना 20 जून 1756 ई. (विवादास्पद)
9 फ़रवरी 1757 अलीनगर की संधि
23 मार्च 1757 अंग्रेज़ों द्वारा चन्द्रनगर पर अधिकार
23 जून 1757 प्लासी का युद्ध
पराजय का कारण मीर जाफ़र एवं अन्य दरबारियों का विश्वासघात
मृत्यु 2 जुलाई 1757 ई.
ऐतिहासिक महत्त्व बंगाल का अंतिम स्वतंत्र नवाब, उसकी पराजय से भारत में अंग्रेज़ी राजनीतिक प्रभुत्व की शुरुआत हुई।

मीर जाफ़र (1757–1760 ई. एवं 1763–1765 ई.)

मीर जाफ़र बंगाल का पाँचवाँ नवाब था। वह मूलतः बंगाल की सेना का मीर बख्शी (प्रधान सेनापति) था।

➣ प्लासी के युद्ध (1757 ई.) से पूर्व उसने अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के साथ गुप्त समझौता कर सिराजुद्दौला के विरुद्ध षड्यंत्र में भाग लिया। इसी विश्वासघात के कारण अंग्रेज़ों की विजय हुई और बंगाल के इतिहास में एक नए युग का आरम्भ हुआ।

23 जून 1757 ई. को प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला की पराजय तथा 2 जुलाई 1757 ई. को उसकी मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों ने अपने वचन के अनुसार 28 जून 1757 ई. को मीर जाफ़र को बंगाल का नवाब घोषित कर दिया।

➣ यद्यपि वह नाममात्र का नवाब था, किन्तु वास्तविक सत्ता अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी, विशेषकर रॉबर्ट क्लाइव के हाथों में थी। मीर जाफ़र के नवाब बनने के साथ ही बंगाल में कम्पनी का राजनीतिक हस्तक्षेप खुलकर प्रारम्भ हो गया।

इसी कारण इतिहासकार मीर जाफ़र को बंगाल का पहला कठपुतली नवाब मानते हैं।

➣ प्लासी के युद्ध के बाद कम्पनी ने बंगाल के नवाब के दरबार में अपने हितों की रक्षा के लिए ल्यूक स्क्राफ्टन को पहला अंग्रेज़ रेजिडेंट नियुक्त किया। उसका कार्य नवाब की गतिविधियों पर नज़र रखना तथा कम्पनी के हितों को सुरक्षित रखना था।

➣ नवाब बनने के उपलक्ष्य में मीर जाफ़र ने अंग्रेज़ों को अनेक आर्थिक एवं राजनीतिक सुविधाएँ प्रदान कीं। उसने कम्पनी को 24 परगनों की ज़मींदारी प्रदान की, जिससे कम्पनी को स्थायी भू-राजस्व का महत्त्वपूर्ण स्रोत प्राप्त हुआ।

➣ मीर जाफ़र ने मुग़ल सम्राट आलमगीर द्वितीय से रॉबर्ट क्लाइव के लिए उमरा की उपाधि भी दिलवाई। इससे क्लाइव की प्रतिष्ठा केवल कम्पनी के अधिकारी के रूप में ही नहीं, बल्कि मुग़ल साम्राज्य के एक उच्च अमीर के रूप में भी बढ़ गई।

➣ इसके अतिरिक्त मीर जाफ़र ने बंगाल में उपस्थित अधिकांश फ्रांसीसी अधिकारियों एवं सैनिकों को अंग्रेज़ों के हवाले कर दिया। इससे बंगाल में फ्रांसीसी प्रभाव लगभग समाप्त हो गया और अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थिति और अधिक मजबूत हो गई।

➣ इस प्रकार मीर जाफ़र के शासन के प्रारम्भिक दिनों में ही यह स्पष्ट हो गया कि नवाब की नीतियाँ अब कम्पनी के हितों से प्रभावित होंगी। यही कारण था कि उसके शासनकाल में बंगाल की वास्तविक राजनीतिक शक्ति धीरे-धीरे नवाब से निकलकर अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के हाथों में चली गई।

अंग्रेज़ों का बढ़ता प्रभाव

प्लासी के युद्ध (1757 ई.) के बाद रॉबर्ट क्लाइव को पुनः बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया गया। इसके पहले प्लासी के समय रॉजर ड्रेक बंगाल का गवर्नर था, जो सिराजुद्दौला के कलकत्ता पर आक्रमण के समय फुल्टा भाग गया था।

➣ मीर जाफ़र स्वभाव से दुर्बल, अनिर्णायक तथा प्रशासनिक दृष्टि से अपेक्षाकृत कमजोर शासक था। नवाब बनने के बाद वह अंग्रेज़ों पर अत्यधिक निर्भर हो गया, जिसके कारण उसके अपने अनेक सहयोगी भी उससे असंतुष्ट होने लगे।

➣ बिहार के उप-शासक राजा रामनारायण, बंगाल के प्रभावशाली अधिकारी राय दुर्लभ तथा अन्य दरबारी सरदार समय के साथ मीर जाफ़र से दूर होते गए। इससे बंगाल के प्रशासन में गुटबंदी बढ़ी और नवाब की स्थिति लगातार कमजोर होती चली गई।

➣ प्लासी के युद्ध से पूर्व अंग्रेज़ों ने मीर जाफ़र को नवाब बनाने के बदले भारी धनराशि, उपहार तथा व्यापारिक सुविधाओं का वचन लिया था। नवाब बनने के बाद उसे कम्पनी, उसके अधिकारियों तथा सैनिकों को यह समस्त धन उपलब्ध कराना पड़ा।

1757 से 1760 ई. के बीच मीर जाफ़र ने कम्पनी और उसके अधिकारियों को लगभग तीन करोड़ रुपये विभिन्न मदों—युद्ध-क्षतिपूर्ति, उपहार, भेंट तथा वित्तीय भुगतान—के रूप में प्रदान किए। इससे बंगाल के राजकोष पर अत्यधिक दबाव पड़ा।

➣ रॉबर्ट क्लाइव सहित अनेक अंग्रेज़ अधिकारियों ने भी व्यक्तिगत रूप से भारी धनराशि एवं बहुमूल्य उपहार प्राप्त किए। परिणामस्वरूप कम्पनी के अधिकारी अत्यंत समृद्ध हो गए, जबकि बंगाल का खजाना तेजी से खाली होने लगा।

➣ कहा जाता है कि अंग्रेज़ों की लगातार आर्थिक माँगों को पूरा करने के लिए मीर जाफ़र को अपने महल के सोने-चाँदी के बर्तन तथा बहुमूल्य वस्तुएँ तक बेचनी पड़ीं। यद्यपि इस कथन का पूर्ण ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

अंग्रेज़ों की फूट डालो और शासन करो नीति

➣ मीर जाफ़र के शासनकाल में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल की आंतरिक गुटबंदी का भरपूर लाभ उठाना प्रारम्भ किया। कम्पनी एक गुट को दूसरे गुट के विरुद्ध समर्थन देकर अपनी राजनीतिक शक्ति बढ़ाने लगी।

➣ आगे चलकर यही नीति फूट डालो और शासन करो (Divide and Rule) के रूप में प्रसिद्ध हुई। यद्यपि यह नीति बाद के वर्षों में अधिक व्यवस्थित रूप से अपनाई गई, किन्तु इसकी प्रारम्भिक झलक मीर जाफ़र के शासनकाल में ही दिखाई देने लगी थी।

➣ अंग्रेज़ों ने बंगाल के दरबार, जमींदारों तथा प्रभावशाली व्यापारिक वर्ग के बीच उत्पन्न मतभेदों का लाभ उठाकर अपनी स्थिति लगातार मजबूत की। इससे नवाब की स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता और अधिक सीमित हो गई।

कर्नल जी. बी. मैलिसनका कथन- कम्पनी के अधिकारियों का उद्देश्य यह था कि मीर जाफ़र को सोने की थैली की तरह उपयोग किया जाए और जब आवश्यकता हो, उसमें हाथ डाल दिया जाए।

➣ यह टिप्पणी स्पष्ट करती है कि कम्पनी के अनेक अधिकारी मीर जाफ़र को एक स्वतंत्र शासक नहीं, बल्कि आर्थिक लाभ प्राप्त करने के साधन के रूप में देखते थे।

➣ अंग्रेज़ों की निरंतर बढ़ती माँगों तथा हस्तक्षेप से मीर जाफ़र स्वयं भी असंतुष्ट होने लगा। धीरे-धीरे उसे यह अनुभव होने लगा कि अंग्रेज़ों की सहायता से प्राप्त की गई नवाबी अब उसी के लिए सबसे बड़ी समस्या बन गई है। इसी असंतोष के कारण उसने आगे चलकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध एक वैकल्पिक शक्ति की तलाश प्रारम्भ की।

▪ प्लासी के बाद रॉबर्ट क्लाइव पुनः बंगाल का गवर्नर बना।
▪ प्लासी के समय बंगाल का गवर्नर — रॉजर ड्रेक
▪ मीर जाफ़र के शासनकाल में कम्पनी ने फूट डालो और शासन करो की नीति की प्रारम्भिक शुरुआत की।
▪ कर्नल जी. बी. मैलिसन ने मीर जाफ़र को कम्पनी के लिए सोने की थैली के समान बताया।

डचों से गठबंधन

➣ कुछ ही समय बाद मीर जाफ़र को यह अनुभव होने लगा कि अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी उसकी स्वतंत्रता में निरंतर हस्तक्षेप कर रही है। कम्पनी के अधिकारी उससे भारी धनराशि, व्यापारिक सुविधाएँ तथा राजनीतिक रियायतें प्राप्त कर रहे थे, जिससे उसका राजकोष लगभग खाली हो चुका था।

➣ अंग्रेज़ों की बढ़ती माँगों और राजनीतिक हस्तक्षेप से असंतुष्ट होकर मीर जाफ़र ने कम्पनी के प्रभाव को कम करने का प्रयास किया। इसके लिए उसने बंगाल में सक्रिय अन्य यूरोपीय शक्ति डच ईस्ट इंडिया कम्पनी से संपर्क स्थापित किया।

➣ उस समय डचों का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र चिनसुरा (चुचुड़ा) था। मीर जाफ़र का उद्देश्य डचों की सहायता से अंग्रेज़ों के बढ़ते प्रभाव को चुनौती देना तथा बंगाल में शक्ति-संतुलन स्थापित करना था।

बेदारा का युद्ध (1759 ई.)

➣ जब अंग्रेज़ों को मीर जाफ़र और डचों के बीच बढ़ते संपर्क की जानकारी मिली, तो उन्होंने इसे अपने हितों के लिए गंभीर खतरा माना। कम्पनी ने डचों की सैन्य गतिविधियों पर नज़र रखनी प्रारम्भ कर दी।

1759 ई. में डचों ने बंगाल में अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने का प्रयास किया। उन्होंने सैनिकों और युद्ध सामग्री को बंगाल भेजा, किन्तु अंग्रेज़ों ने उन्हें आगे बढ़ने से रोकने का निर्णय लिया।

➣ अंततः 25 नवम्बर 1759 ई. को बेदारा नामक स्थान पर अंग्रेज़ों और डचों के बीच निर्णायक युद्ध हुआ। इस युद्ध में अंग्रेज़ी सेना ने डचों को पराजित कर दिया।

➣ बेदारा के युद्ध में पराजय के बाद डचों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ समाप्त हो गईं। वे आगे चलकर केवल व्यापार तक सीमित रह गए और बंगाल की राजनीति में उनका प्रभाव लगभग समाप्त हो गया।

बेदारा का युद्ध बंगाल के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। इस युद्ध के बाद डचों की राजनीतिक शक्ति का अंत हो गया और अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी बंगाल की सबसे प्रभावशाली यूरोपीय शक्ति बन गई।

मीर जाफ़र की पदच्युति(1760 ई.)

➣ बेदारा के युद्ध (1759 ई.) के बाद अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थिति बंगाल में अत्यंत सुदृढ़ हो गई। अब कम्पनी को ऐसा नवाब चाहिए था, जो उसकी आर्थिक माँगों को पूरा कर सके तथा उसके राजनीतिक हितों की रक्षा करे।

➣ दूसरी ओर मीर जाफ़र भी अंग्रेज़ों के निरंतर हस्तक्षेप तथा आर्थिक शोषण से असंतुष्ट था। डचों से सहायता प्राप्त करने का उसका प्रयास असफल हो चुका था। इससे अंग्रेज़ों का उस पर से विश्वास लगभग समाप्त हो गया।

➣ परिणामस्वरूप उन्होंने उसके स्थान पर किसी अधिक सक्षम और उपयोगी व्यक्ति को नवाब बनाने की योजना बनानी शुरू कर दी।

मीर क़ासिम के साथ गुप्त समझौता

फरवरी 1760 ई. में रॉबर्ट क्लाइव अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद इंग्लैंड लौट गया। उसके प्रस्थान के बाद कुछ समय के लिए जॉन ज़ेफ़ानिया हॉलवेल ने बंगाल के कार्यवाहक गवर्नर के रूप में कार्यभार संभाला।

➣ हॉलवेल का मत था कि मीर जाफ़र अब कम्पनी के लिए उपयोगी नहीं रहा है। उसने कम्पनी के अधिकारियों के बीच यह विचार रखा कि उसके स्थान पर किसी अधिक सक्षम एवं सहयोगी व्यक्ति को बंगाल का नवाब बनाया जाना चाहिए।

➣ हॉलवेल के बाद हेनरी वेन्सिटार्ट बंगाल का नया गवर्नर नियुक्त हुआ। उसने भी यह निष्कर्ष निकाला कि कम्पनी के हितों की पूर्ति के लिए मीर जाफ़र को हटाना आवश्यक है।

➣ कम्पनी के अधिकारियों ने मीर जाफ़र के दामाद मीर क़ासिम से गुप्त रूप से संपर्क स्थापित किया। उसने कम्पनी को आर्थिक एवं राजनीतिक रियायतें देने का आश्वासन दिया।

27 सितम्बर 1760 ई. को वेन्सिटार्ट और मीर क़ासिम के बीच एक गुप्त समझौता जिसके अनुसार कम्पनी मीर क़ासिम को बंगाल का नवाब बनाएगी और बदले में मीर क़ासिम कम्पनी को धन तथा अन्य सुविधाएँ प्रदान करेगा।

मीर जाफ़र की पदच्युति (1760 ई.)

➣ गुप्त समझौते के बाद कम्पनी ने मीर जाफ़र पर त्यागपत्र देने का दबाव डाला। अंग्रेज़ों की शक्ति के सामने वह कोई प्रभावी प्रतिरोध नहीं कर सका। अंततः अक्टूबर 1760 ई. में उसे नवाबी का पद छोड़ना पड़ा।

➣ इसके बाद कम्पनी ने मीर क़ासिम को बंगाल का नया नवाब घोषित कर दिया। इस प्रकार एक बार फिर अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपनी इच्छा के अनुसार बंगाल के नवाब को हटाकर दूसरे व्यक्ति को गद्दी पर बैठा दिया।

➣ इस घटना ने स्पष्ट कर दिया कि बंगाल की नवाबी अब पूरी तरह कम्पनी की कृपा पर निर्भर हो चुकी थी। नवाबों की नियुक्ति और पदच्युति का वास्तविक अधिकार अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के हाथों में आ गया था।

ऐतिहासिक महत्त्व

➣ मीर जाफ़र को हटाकर मीर क़ासिम को नवाब बनाए जाने की घटना से यह सिद्ध हो गया कि अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी अब केवल व्यापारिक संस्था नहीं रह गई थी। वह बंगाल की राजनीति को अपनी इच्छानुसार नियंत्रित करने वाली वास्तविक शक्ति बन चुकी थी।

➣ कुछ इतिहासकार इस घटना को बंगाल की दूसरी क्रान्ति भी कहते हैं, क्योंकि इस अवसर पर भी अंग्रेज़ों ने अपनी सुविधा के अनुसार नवाब को बदल दिया। हालांकि यह शब्द सभी इतिहासकारों द्वारा समान रूप से स्वीकार नहीं किया गया है।

➣ आगे चलकर मीर क़ासिम ने कम्पनी के बढ़ते हस्तक्षेप का विरोध किया। यही विरोध बाद में बक्सर के युद्ध (1764 ई.) की पृष्ठभूमि बना, जिसने भारत के इतिहास की दिशा को और अधिक बदल दिया।

द्वितीय शासनकाल (1763–1765 ई.)

1760 ई. में पदच्युत किए जाने के बाद मीर जाफ़र कुछ समय तक सक्रिय राजनीति से दूर रहा, किन्तु बंगाल की परिस्थितियाँ शीघ्र ही बदल गईं। मीर क़ासिम ने अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के बढ़ते हस्तक्षेप का विरोध किया तथा बंगाल की स्वतंत्रता पुनः स्थापित करने का प्रयास किया।

➣ मीर क़ासिम और अंग्रेज़ों के बीच बढ़ते संघर्ष के परिणामस्वरूप 1763 ई. में युद्ध प्रारम्भ हो गया। मीर क़ासिम ने बंगाल छोड़कर अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय के साथ मिलकर अंग्रेज़ों का सामना करने का निर्णय लिया।

➣ मीर क़ासिम के बंगाल छोड़ने के बाद अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने पुनः मीर जाफ़र को बंगाल का नवाब बना दिया। इस प्रकार उसने 1763 ई. से 1765 ई. तक दूसरी बार बंगाल की नवाबी संभाली।

▪ प्रथम शासनकाल — 1757–1760 ई.
▪ द्वितीय शासनकाल — 1763–1765 ई.

➣ दूसरी बार नवाब बनने के बाद भी मीर जाफ़र की स्थिति पहले जैसी ही रही। वास्तविक सत्ता अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के हाथों में थी और नवाब केवल औपचारिक शासक के रूप में कार्य कर रहा था।

➣ इस अवधि में कम्पनी का बंगाल के प्रशासन, वित्त तथा सैन्य मामलों पर नियंत्रण और अधिक बढ़ गया। मीर जाफ़र अंग्रेज़ों की सहायता के बिना कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम नहीं था।

➣ दूसरी ओर कम्पनी ने भी मीर जाफ़र का उपयोग केवल तब तक किया, जब तक उसके माध्यम से अपने राजनीतिक एवं आर्थिक हितों की पूर्ति होती रही। बंगाल का नवाब अब वस्तुतः कम्पनी की इच्छा पर निर्भर पद बन चुका था।

मृत्यु

➣ अपने द्वितीय शासनकाल के दौरान मीर जाफ़र का स्वास्थ्य लगातार गिरता गया। अंततः 5 फ़रवरी 1765 ई. को उसकी मृत्यु हो गई।

➣ उसकी मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों ने उसके पुत्र नज़्मुद्दौला (नज्म-उद-दौला) को बंगाल का नवाब बनाया। इस समय तक बंगाल की वास्तविक सत्ता पूर्णतः अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के हाथों में जा चुकी थी।

➣ इतिहास में मीर जाफ़र को प्लासी के युद्ध के विश्वासघाती तथा बंगाल के प्रथम कठपुतली नवाब के रूप में जाना जाता है। उसके कार्यों ने बंगाल में अंग्रेज़ी राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभाई।

➣ इतिहासकारों के अनुसार मीर जाफ़र की सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूमिका यह रही कि उसके शासनकाल में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी एक व्यापारिक संस्था से बढ़कर भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने लगी।

एक नज़र में : मीर जाफ़र

विषय विवरण
शासनकाल 1757–1760 ई. एवं 1763–1765 ई.
पद बंगाल का प्रथम कठपुतली नवाब
नवाब कैसे बना? प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेज़ों द्वारा
प्रमुख अंग्रेज़ अधिकारी रॉबर्ट क्लाइव
प्रथम अंग्रेज़ रेजिडेंट ल्यूक स्क्राफ्टन
महत्त्वपूर्ण उपलब्धि कम्पनी को 24 परगनों की ज़मींदारी प्रदान की
1759 ई. बेदारा के युद्ध में डचों की पराजय
1760 ई. मीर क़ासिम के पक्ष में पदच्युत
1763 ई. दूसरी बार नवाब बनाया गया
मृत्यु 5 फ़रवरी 1765 ई.
ऐतिहासिक महत्त्व उसके शासनकाल में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी का राजनीतिक प्रभुत्व निर्णायक रूप से स्थापित हुआ।

मीर क़ासिम (1760–1763 ई.)

मीर क़ासिम बंगाल का छठा नवाब था। वह मीर जाफ़र का दामाद था और उसे बंगाल के नवाबों में अलीवर्दी ख़ाँ के बाद सबसे योग्य, दूरदर्शी एवं सक्षम शासक माना जाता है।

➣ उसने अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के बढ़ते राजनीतिक एवं आर्थिक हस्तक्षेप का दृढ़तापूर्वक विरोध किया तथा बंगाल की स्वतंत्रता पुनः स्थापित करने का प्रयास किया।

➣ मीर जाफ़र के शासनकाल के अंतिम वर्षों में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी उसकी प्रशासनिक कमजोरी तथा आर्थिक असमर्थता से असंतुष्ट हो चुकी थी।

➣ कम्पनी को ऐसा नवाब चाहिए था, जो तत्काल उसकी आर्थिक माँगों को पूरा कर सके तथा प्रारम्भ में उसके साथ सहयोग करे। इसी उद्देश्य से कम्पनी के अधिकारियों ने मीर जाफ़र के स्थान पर मीर क़ासिम को नवाब बनाने की योजना बनाई।

27 सितम्बर 1760 ई. को बंगाल के गवर्नर हेनरी वेन्सिटार्ट और मीर क़ासिम के बीच एक गुप्त समझौता हुआ। इस समझौते के अनुसार कम्पनी मीर क़ासिम को बंगाल का नवाब बनाएगी और बदले में वह कम्पनी को पर्याप्त धन तथा क्षेत्रीय रियायतें प्रदान करेगा।

➣ इसके बाद अक्टूबर 1760 ई. में मीर जाफ़र को पदच्युत कर मीर क़ासिम को बंगाल का नवाब बना दिया गया। प्रारम्भ में उसने कम्पनी के साथ सहयोग की नीति अपनाई, हालाँकि यह सहयोग ज्यादा लम्बे समय तक टिक नहीं सका।

कम्पनी को दी गई रियायतें

➣ नवाबी प्राप्त करने के बदले मीर क़ासिम ने अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी को अनेक महत्त्वपूर्ण आर्थिक एवं क्षेत्रीय रियायतें प्रदान कीं। उसने बर्दवान, मिदनापुर तथा चटगाँव के तीन समृद्ध जिलों का अधिकार कम्पनी को सौंप दिया। इन जिलों से कम्पनी को पर्याप्त भू-राजस्व प्राप्त होने लगा।

➣ इसके अतिरिक्त उसने कलकत्ता कौंसिल को लगभग 20 लाख रुपये नकद भी प्रदान किए। कम्पनी के अनेक अधिकारियों को व्यक्तिगत उपहार एवं धनराशि भी दी गई। इन रियायतों के कारण प्रारम्भ में कम्पनी और मीर क़ासिम के संबंध मधुर दिखाई देने लगे।

➣ मीर क़ासिम का उद्देश्य कम्पनी को संतुष्ट करके अपने शासन को स्थिर करना था। वह जानता था कि अंग्रेज़ों के सहयोग के बिना बंगाल की गद्दी पर बने रहना कठिन होगा। किन्तु दूसरी ओर वह यह भी चाहता था कि एक बार शासन सुदृढ़ हो जाने पर नवाब की वास्तविक शक्ति पुनः स्थापित की जाए।

➣ इसी समय मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय ने बिहार क्षेत्र पर अपना प्रभाव स्थापित करने का प्रयास किया। मीर क़ासिम ने इस चुनौती का भी सफलतापूर्वक सामना किया और अपनी प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया।

व्यक्तित्व

➣ मीर क़ासिम बंगाल के नवाबों में अलीवर्दी ख़ाँ के बाद सबसे योग्य, दूरदर्शी तथा कुशल शासक माना जाता है। उसने अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के बढ़ते राजनीतिक एवं आर्थिक हस्तक्षेप को चुनौती देने का साहस किया।

➣यद्यपि उसका शासनकाल केवल 1760 से 1763 ई. तक रहा, फिर भी उसने बंगाल की स्वतंत्रता और नवाबी सत्ता को पुनः सुदृढ़ बनाने का गंभीर प्रयास किया।

➣ मीर जाफ़र के विपरीत मीर क़ासिम कम्पनी का कठपुतली नवाब बनकर शासन नहीं करना चाहता था। उसने नवाब बनते ही प्रशासन, वित्त तथा सेना में व्यापक सुधार प्रारम्भ किए और एक शक्तिशाली एवं आत्मनिर्भर राज्य की स्थापना का प्रयास किया।

प्रमुख उपलब्धियाँ

➣ मीर क़ासिम ने राजधानी को मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित कर अंग्रेज़ों के प्रभाव से दूर स्वतंत्र प्रशासन स्थापित करने का प्रयास किया।

➣ उसने सेना का यूरोपीय ढंग से पुनर्गठन कराया, गुर्गिन ख़ाँ के नेतृत्व में सैनिकों को आधुनिक प्रशिक्षण दिया तथा मुंगेर में तोप एवं हथियार निर्माण के कारखाने स्थापित कर सैन्य शक्ति को सुदृढ़ बनाया।

➣ उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण आर्थिक नीति 1762 ई. में सभी व्यापारियों के लिए आंतरिक चुंगी समाप्त करना थी। इस निर्णय से भारतीय व्यापारियों को भी वही सुविधा प्राप्त हुई, जो पहले केवल अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी को मिलती थी।

➣ मीर क़ासिम ने प्रशासनिक अनुशासन स्थापित करने, राजस्व व्यवस्था में सुधार करने तथा भ्रष्ट अधिकारियों पर नियंत्रण करने का भी प्रयास किया। इन सुधारों से बंगाल की नवाबी सत्ता पहले की अपेक्षा अधिक संगठित होने लगी।

प्रशासनिक एवं सैन्य सुधार

➣ नवाब बनने के बाद मीर क़ासिम ने शीघ्र ही यह अनुभव कर लिया कि यदि बंगाल की स्वतंत्रता और नवाबी सत्ता को सुरक्षित रखना है, तो प्रशासन, वित्त तथा सेना में व्यापक सुधार करना आवश्यक होगा।

➣ वह अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के बढ़ते हस्तक्षेप से असंतुष्ट था और एक शक्तिशाली एवं आत्मनिर्भर शासन स्थापित करना चाहता था।

➣ मीर क़ासिम अपने पूर्ववर्ती नवाबों की भाँति अंग्रेज़ों का कठपुतली शासक बनकर शासन नहीं करना चाहता था। इसलिए उसने नवाबी प्रशासन को सुदृढ़ बनाने तथा कम्पनी के प्रभाव को सीमित करने के उद्देश्य से अनेक महत्त्वपूर्ण सुधार प्रारम्भ किए।

राजधानी को मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित करना

➣ मीर क़ासिम का पहला महत्त्वपूर्ण निर्णय अपनी राजधानी को मुर्शिदाबाद से मुंगेर (मोंगहिर) स्थानांतरित करना था। उसने अनुभव किया कि मुर्शिदाबाद में अंग्रेज़ी अधिकारियों का प्रभाव अत्यधिक बढ़ चुका है, जिसके कारण स्वतंत्र रूप से शासन करना कठिन हो गया था।

➣ मुंगेर भौगोलिक दृष्टि से अधिक सुरक्षित था तथा वहाँ से बिहार और बंगाल दोनों क्षेत्रों पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सकता था। इसी कारण उसने मुंगेर को अपनी नई राजधानी बनाया और वहीं से प्रशासन का संचालन प्रारम्भ किया।

➣ राजधानी परिवर्तन का उद्देश्य केवल स्थान बदलना नहीं था, बल्कि अंग्रेज़ों के प्रभाव से दूर रहकर एक स्वतंत्र एवं सुदृढ़ शासन की स्थापना करना था।

▪ मीर क़ासिम ने राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित की।
▪ उद्देश्य — अंग्रेज़ों के प्रभाव से दूर रहकर स्वतंत्र शासन स्थापित करना।

प्रशासनिक सुधार

➣ मीर क़ासिम ने प्रशासन में अनुशासन स्थापित करने के लिए अनेक कठोर कदम उठाए। उसने भ्रष्ट एवं अयोग्य अधिकारियों को पदों से हटाया तथा राजस्व व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास किया।

➣ बिहार के नायब सूबेदार राजा रामनारायण पर राजस्व में अनियमितता तथा नवाब के आदेशों की अवहेलना का आरोप था। मीर क़ासिम ने उसे पद से हटाकर गिरफ्तार कर लिया। बाद में उसकी मृत्यु हो गई

➣ उसने राजस्व अधिकारियों पर भी कड़ा नियंत्रण स्थापित किया तथा सरकारी आय बढ़ाने के लिए वित्तीय व्यवस्था को अधिक संगठित बनाने का प्रयास किया।

सैन्य सुधार

➣ मीर क़ासिम भली-भाँति समझता था कि अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी की सबसे बड़ी शक्ति उसकी प्रशिक्षित एवं अनुशासित सेना है। इसलिए उसने अपनी सेना को आधुनिक बनाने का निर्णय लिया।

➣ उसने सैनिकों की संख्या में वृद्धि की तथा उन्हें यूरोपीय पद्धति के अनुसार प्रशिक्षण देना प्रारम्भ किया। इससे बंगाल की सेना पहले की अपेक्षा अधिक संगठित एवं अनुशासित बन गई।

➣ मीर क़ासिम ने अपनी सेना के संगठन और प्रशिक्षण का दायित्व गुर्गिन ख़ाँ नामक एक आर्मेनियाई अधिकारी को सौंपा। गुर्गिन ख़ाँ ने सेना में आधुनिक युद्धक तकनीकों का प्रयोग प्रारम्भ किया और सैनिकों को यूरोपीय शैली में प्रशिक्षित किया।

➣ इसके अतिरिक्त मीर क़ासिम ने मुंगेर में तोपों तथा आग्नेयास्त्रों (बंदूकों) के निर्माण के लिए कारखानों की स्थापना कराई। इससे बंगाल की सेना विदेशी हथियारों पर कम निर्भर होने लगी और उसकी सैन्य शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

सुधारों का प्रभाव

➣ मीर क़ासिम के प्रशासनिक एवं सैन्य सुधारों से बंगाल की नवाबी सत्ता पहले की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ होने लगी। अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भी यह अनुभव किया कि मीर क़ासिम अब मीर जाफ़र की तरह निर्बल शासक नहीं रहा, बल्कि वह एक स्वतंत्र एवं शक्तिशाली नवाब बनने का प्रयास कर रहा है।

➣ कम्पनी के अधिकारियों को आशंका होने लगी कि यदि मीर क़ासिम के सुधार सफल हो गए, तो बंगाल में उनका राजनीतिक एवं आर्थिक प्रभाव सीमित हो जाएगा। परिणामस्वरूप दोनों पक्षों के बीच तनाव धीरे-धीरे बढ़ने लगा।

➣ आगे चलकर यही तनाव व्यापारिक विशेषाधिकारों (दस्तक एवं चुंगी) के विवाद में परिवर्तित हुआ, जिसने मीर क़ासिम और अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच खुले संघर्ष की भूमिका तैयार की।

व्यापारिक नीति एवं चुंगी (दस्तक) विवाद

➣ मीर क़ासिम और अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच संघर्ष का सबसे बड़ा कारण व्यापारिक विशेषाधिकार (दस्तक) तथा आंतरिक चुंगी का प्रश्न था।

➣ कम्पनी के अधिकारी इन विशेषाधिकारों का दुरुपयोग करके भारी आर्थिक लाभ कमा रहे थे, जिससे बंगाल के राजस्व को बड़ी हानि पहुँच रही थी।

1717 ई. में मुग़ल सम्राट फ़र्रुख़सियर ने अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी को एक विशेष फ़रमान जारी किया था।

➣ इस फ़रमान के अनुसार कम्पनी को बंगाल में अपने व्यापारिक माल पर लगभग चुंगी-मुक्त व्यापार की सुविधा प्राप्त थी। कम्पनी इस सुविधा का प्रमाण-पत्र दस्तक कहलाने वाले पास के रूप में प्रयोग करती थी।

➣ प्रारम्भ में यह सुविधा केवल कम्पनी के आधिकारिक व्यापार तक सीमित थी, किन्तु समय के साथ कम्पनी के अधिकारी अपने निजी व्यापार में भी दस्तकों का उपयोग करने लगे।

➣ इतना ही नहीं, वे भारतीय व्यापारियों को भी धन लेकर दस्तक उपलब्ध कराने लगे। इससे राज्य को मिलने वाला चुंगी-कर तेजी से घटने लगा।

वेन्सिटार्ट का समझौता

➣ बंगाल के गवर्नर हेनरी वेन्सिटार्ट ने इस विवाद को समाप्त करने का प्रयास किया। उसके और मीर क़ासिम के बीच एक समझौता हुआ, जिसके अनुसार कम्पनी के निजी व्यापार पर अन्य व्यापारियों से ली जाने वाली 40% चुंगी के स्थान पर केवल 9% चुंगी देने का प्रस्ताव रखा गया।

➣ मीर क़ासिम इस समझौते के माध्यम से कम्पनी और नवाबी शासन के बीच संतुलन स्थापित करना चाहता था, किन्तु कम्पनी के अनेक अधिकारियों ने इस व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया। वे पहले की भाँति पूर्ण कर-मुक्त व्यापार जारी रखना चाहते थे।

➣ परिणामस्वरूप यह समझौता अधिक समय तक प्रभावी नहीं रह सका और दोनों पक्षों के बीच विवाद और गहरा गया।

आंतरिक चुंगी समाप्त करना (1762 ई.)

➣ जब मीर क़ासिम ने देखा कि कम्पनी के अधिकारी दस्तक का निरंतर दुरुपयोग कर रहे हैं तथा भारतीय व्यापारियों के साथ अन्याय हो रहा है, तब उसने एक अत्यंत साहसिक निर्णय लिया।

1762 ई. में उसने पूरे बंगाल में आंतरिक व्यापारिक चुंगी समाप्त कर दी। अब भारतीय व्यापारियों को भी वही सुविधा मिलने लगी, जो पहले केवल अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी को प्राप्त थी।

➣ मीर क़ासिम का उद्देश्य सभी व्यापारियों को समान अवसर प्रदान करना तथा व्यापार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा स्थापित करना था। इस निर्णय से भारतीय व्यापारियों को लाभ मिला और कम्पनी का विशेषाधिकार व्यवहारतः समाप्त हो गया।

संघर्ष की शुरुआत

➣ कम्पनी के अधिकारियों ने मीर क़ासिम के इस निर्णय का तीव्र विरोध किया। उनका मानना था कि 1717 ई. के फ़रमान द्वारा प्राप्त व्यापारिक विशेषाधिकार केवल कम्पनी के लिए थे, जबकि मीर क़ासिम ने वही सुविधा सभी व्यापारियों को देकर कम्पनी के आर्थिक हितों को नुकसान पहुँचाया था।

➣ दूसरी ओर मीर क़ासिम का तर्क था कि यदि कम्पनी कर नहीं देती, तो भारतीय व्यापारियों से भी कर नहीं लिया जाना चाहिए। उसका उद्देश्य सभी व्यापारियों के साथ समान व्यवहार करना था।

➣ इस प्रकार व्यापारिक विशेषाधिकारों का विवाद धीरे-धीरे राजनीतिक संघर्ष में परिवर्तित हो गया। अब अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी को यह स्पष्ट हो गया कि मीर क़ासिम उसके आर्थिक प्रभुत्व को चुनौती दे रहा है।

➣ इतिहासकारों के अनुसार मीर क़ासिम द्वारा आंतरिक चुंगी समाप्त करना अंग्रेज़ों के विरुद्ध सबसे प्रभावशाली आर्थिक कदम था। यही निर्णय आगे चलकर दोनों पक्षों के बीच खुले युद्ध का प्रमुख कारण बना।

अंग्रेज़ों से संघर्ष एवं युद्ध (1763 ई.)

➣ मीर क़ासिम द्वारा आंतरिक चुंगी समाप्त किए जाने तथा अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के व्यापारिक विशेषाधिकारों को चुनौती दिए जाने के बाद दोनों पक्षों के बीच संबंध तेजी से बिगड़ने लगे। कम्पनी के अधिकारी मीर क़ासिम को अब अपने आर्थिक हितों के लिए सबसे बड़ा खतरा मानने लगे थे।

➣ दूसरी ओर मीर क़ासिम भी अंग्रेज़ों के निरंतर हस्तक्षेप से असंतुष्ट था। उसने स्पष्ट कर दिया कि बंगाल में सभी व्यापारियों के साथ समान व्यवहार किया जाएगा और कम्पनी को कोई विशेष सुविधा नहीं दी जाएगी। यही मतभेद शीघ्र ही खुले युद्ध में बदल गया।

पटना की घटना

पटना में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रमुख अधिकारी मिस्टर एलिस था। उसने नवाब की अनुमति के बिना पटना पर अधिकार करने का प्रयास किया और नगर पर कब्ज़ा कर लिया।

➣ मीर क़ासिम ने तत्काल अपनी सेना भेजकर अंग्रेज़ों का सामना किया। उसकी सेना ने एलिस को पराजित कर पुनः पटना पर अधिकार स्थापित कर लिया। इस संघर्ष में एलिस सहित अनेक अंग्रेज़ अधिकारी बंदी बना लिए गए।

➣ इस घटना के बाद मीर क़ासिम और कम्पनी के बीच समझौते की सभी संभावनाएँ समाप्त हो गईं। अब दोनों पक्ष निर्णायक युद्ध की तैयारी करने लगे।

मेजर एडम्स का अभियान

➣ मीर क़ासिम की बढ़ती शक्ति को समाप्त करने के लिए अंग्रेज़ी ईस्ट India कम्पनी ने मेजर थॉमस एडम्स (Major Thomas Adams) के नेतृत्व में एक शक्तिशाली सेना बंगाल भेजी।

1763 ई. में मेजर एडम्स ने मीर क़ासिम के विरुद्ध लगातार सैन्य अभियान चलाया। दोनों पक्षों के बीच कई महत्त्वपूर्ण युद्ध हुए, जिनमें अंततः अंग्रेज़ों को सफलता मिली।

1763 ई. के प्रमुख युद्ध

➣ मीर क़ासिम और अंग्रेज़ों के बीच 1763 ई. में कई निर्णायक युद्ध लड़े गए। इन युद्धों में नवाब की सेना ने साहसपूर्वक संघर्ष किया, किन्तु अंततः अंग्रेज़ों की संगठित सैन्य शक्ति के सामने उसे पीछे हटना पड़ा।

युद्ध तिथि परिणाम
कटवा का युद्ध 19 जुलाई 1763 ई. अंग्रेज़ों की विजय
गीरिया का युद्ध 2 अगस्त 1763 ई. मीर क़ासिम पराजित
उदयनाला का युद्ध सितम्बर 1763 ई. अंग्रेज़ों की निर्णायक विजय

➣ 1763 ई. में लगातार सैन्य पराजयों के बाद मीर क़ासिम की स्थिति अत्यंत संकटपूर्ण हो गई। अंग्रेज़ी सेना ने बंगाल के अधिकांश भागों पर पुनः अधिकार कर लिया और मीर क़ासिम को अपनी राजधानी मुंगेर छोड़कर पटना पहुँचा, जहाँ उसने अंग्रेज़ों के विरुद्ध अंतिम प्रयास करने का निर्णय लिया।

➣ मीर क़ासिम के विरुद्ध सैन्य सफलता प्राप्त करने के बाद अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने पुनः मीर जाफ़र को बंगाल का नवाब घोषित कर दिया। इस प्रकार 1763 ई. में मीर जाफ़र दूसरी बार बंगाल का नवाब बना।

➣ इस समय तक अंग्रेज़ों और मीर क़ासिम के बीच संघर्ष अपने चरम पर पहुँच चुका था। दोनों पक्ष एक-दूसरे को किसी भी प्रकार की रियायत देने के लिए तैयार नहीं थे। इसी तनावपूर्ण परिस्थिति में इतिहास की एक अत्यंत दुखद घटना घटी, जिसे पटना हत्याकाण्ड के नाम से जाना जाता है।

पटना हत्याकाण्ड (1763 ई.)

➣ पटना पर पुनः अधिकार करने के बाद मीर क़ासिम ने अनेक अंग्रेज़ अधिकारियों एवं सैनिकों को बंदी बना लिया था। जब अंग्रेज़ी सेना लगातार आगे बढ़ने लगी और मीर क़ासिम की पराजय लगभग निश्चित दिखाई देने लगी,

➣ तब उसे आशंका हुई कि यदि ये बंदी अंग्रेज़ मुक्त हो गए, तो वे पुनः कम्पनी की सैन्य शक्ति को बढ़ा देंगे। इसी परिस्थिति में मीर क़ासिम ने अपने बंदी अंग्रेज़ अधिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने का निर्णय लिया।

अक्टूबर 1763 ई. में मीर क़ासिम के आदेश पर पटना में बंदी बनाए गए अनेक अंग्रेज़ अधिकारियों एवं सैनिकों की हत्या कर दी गई। समकालीन अंग्रेज़ी स्रोतों के अनुसार इस घटना में लगभग 148 अंग्रेज़ बंदी मारे गए।

➣ इस हत्याकाण्ड को अंजाम देने का कार्य वाल्टर रेनहार्ड ने किया, जो एक जर्मन मूल का सैनिक अधिकारी था। भारतीय इतिहास में वह समरू के नाम से अधिक प्रसिद्ध है।

➣ पटना हत्याकाण्ड ने अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी को अत्यंत आक्रोशित कर दिया। कम्पनी ने इसे मीर क़ासिम के विरुद्ध व्यापक सैन्य अभियान चलाने का प्रमुख आधार बनाया।

अवध की ओर प्रस्थान

➣ पटना हत्याकाण्ड के बाद मीर क़ासिम के लिए बंगाल में टिके रहना असंभव हो गया। अंग्रेज़ी सेना लगातार आगे बढ़ रही थी और उसके अधिकांश सहयोगी भी उसका साथ छोड़ चुके थे।

दिसम्बर 1763 ई. में मीर क़ासिम बंगाल छोड़कर अवध पहुँचा और वहाँ के नवाब शुजाउद्दौला से सहायता माँगी। उसने मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय से भी संपर्क स्थापित किया।

➣ तीनों शासकों का उद्देश्य अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी को उत्तर भारत से बाहर निकालना तथा भारतीय राज्यों की राजनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा करना था। परिणामस्वरूप एक शक्तिशाली त्रिपक्षीय गठबंधन का निर्माण हुआ।

बक्सर का युद्ध (1764 ई.)

बक्सर का युद्ध आधुनिक भारतीय इतिहास की सबसे निर्णायक घटनाओं में से एक माना जाता है।

➣ यद्यपि प्लासी का युद्ध (1757 ई.) अंग्रेज़ों के राजनीतिक उदय की शुरुआत था, किन्तु बक्सर के युद्ध (1764 ई.) ने भारत में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रभुत्व को स्थायी एवं वैधानिक आधार प्रदान किया।

➣ पटना हत्याकाण्ड तथा बंगाल से निष्कासित होने के बाद मीर क़ासिम ने यह समझ लिया कि अकेले अंग्रेज़ों का सामना करना संभव नहीं है।

➣उसने अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय के साथ मिलकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा बनाया।

युद्ध के कारण

➣ मीर क़ासिम द्वारा अंग्रेज़ों के व्यापारिक विशेषाधिकारों का विरोध, आंतरिक चुंगी समाप्त करना, कम्पनी के अधिकारियों से बढ़ता संघर्ष, पटना हत्याकाण्ड तथा अंग्रेज़ों द्वारा मीर जाफ़र को पुनः नवाब बनाया जाना।

➣ दूसरी ओर अवध के नवाब शुजाउद्दौला को भी अंग्रेज़ों की बढ़ती शक्ति से अपने राज्य की सुरक्षा का खतरा दिखाई दे रहा था। मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय भी अपनी खोई हुई राजनीतिक शक्ति पुनः प्राप्त करना चाहता था। इस प्रकार तीनों शक्तियाँ अंग्रेज़ों के विरुद्ध एकजुट हो गईं।

अंग्रेज़ों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा-
मीर क़ासिम (पूर्व नवाब, बंगाल)
शुजाउद्दौला (नवाब, अवध)
शाह आलम द्वितीय (मुग़ल सम्राट)

22 अक्टूबर 1764 ई. को बक्सर (वर्तमान बिहार) के निकट गंगा नदी के तट पर अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी और संयुक्त भारतीय सेना के बीच निर्णायक युद्ध हुआ।

➣ अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व मेजर हेक्टर मुनरो ने किया। प्रारम्भिक सैन्य अभियानों में मेजर जॉन कार्नैक की भी भूमिका रही, किन्तु निर्णायक युद्ध का नेतृत्व हेक्टर मुनरो ने किया।

➣ संयुक्त भारतीय सेना संख्या में अंग्रेज़ों से अधिक थी, किन्तु तीनों पक्षों के बीच प्रभावी समन्वय का अभाव था। इसके विपरीत अंग्रेज़ी सेना अनुशासित, प्रशिक्षित तथा आधुनिक युद्ध प्रणाली से सुसज्जित थी।

➣ युद्ध के दौरान अंग्रेज़ों ने अपनी संगठित सैन्य रणनीति और अनुशासन का प्रभावी प्रदर्शन किया। संयुक्त सेना अंग्रेज़ों के समन्वित आक्रमण का सामना अधिक समय तक नहीं कर सकी और अंततः पराजित हो गई।

युद्ध का परिणाम

➣ बक्सर के युद्ध में पराजय के बाद मीर क़ासिम का राजनीतिक जीवन लगभग समाप्त हो गया। वह युद्धक्षेत्र से निकलकर उत्तर भारत की ओर चला गया और बाद में दिल्ली के निकट निर्वासन का जीवन व्यतीत किया। उसकी 1777 ई. में मृत्यु हुई।

➣ अवध के नवाब शुजाउद्दौला भी पराजित होकर भाग गए, जबकि मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय ने अंग्रेज़ों की अधीनता स्वीकार कर ली।

➣ इस विजय के बाद अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी उत्तर भारत की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी। अब कम्पनी केवल बंगाल तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने मुग़ल सम्राट और अवध दोनों पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया।

बक्सर के युद्ध का महत्त्व

➣ अनेक इतिहासकारों के अनुसार बक्सर का युद्ध, प्लासी के युद्ध से भी अधिक महत्त्वपूर्ण था। प्लासी की विजय ने अंग्रेज़ों को बंगाल में प्रवेश दिलाया, जबकि बक्सर की विजय ने उन्हें उत्तर भारत में राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने का अवसर प्रदान किया।

➣ प्रसिद्ध इतिहासकार सर जेम्स स्टीफन के अनुसार— भारत में ब्रिटिश सत्ता का वास्तविक प्रारम्भ बक्सर के युद्ध से होता है।

➣ इतिहासकारों का यह भी मत है कि प्लासी ने अंग्रेज़ों के राजनीतिक उदय की नींव रखी, जबकि बक्सर ने उस नींव को स्थायित्व प्रदान किया।

➣ बक्सर की विजय के परिणामस्वरूप अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी का बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर प्रभाव निर्णायक रूप से स्थापित हो गया। साथ ही अवध अंग्रेज़ों के प्रभाव क्षेत्र में आ गया और मुग़ल सम्राट भी कम्पनी पर निर्भर हो गया।

➣ आगे चलकर इसी विजय के आधार पर 1765 ई. में इलाहाबाद की संधि हुई, जिसके माध्यम से कम्पनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त हुई। इससे भारत में अंग्रेज़ी शासन की वास्तविक प्रशासनिक नींव रखी गई।

एक नज़र में : मीर क़ासिम

विषय विवरण
शासनकाल 1760–1763 ई.
पूर्व नवाब मीर जाफ़र
राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर
सेना का पुनर्गठन यूरोपीय पद्धति पर; गुर्गिन ख़ाँ के नेतृत्व में
सैन्य सुधार मुंगेर में तोप एवं हथियार निर्माण के कारखाने
आर्थिक सुधार 1762 ई. में सभी व्यापारियों के लिए आंतरिक चुंगी समाप्त
1763 ई. पटना हत्याकाण्ड
22 अक्टूबर 1764 ई. बक्सर का युद्ध
मृत्यु 1777 ई., दिल्ली के निकट
ऐतिहासिक महत्त्व अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के व्यापारिक एवं राजनीतिक प्रभुत्व को सबसे प्रभावी चुनौती देने वाला बंगाल का नवाब।

▪ चूँकि प्लासी एवं बक्सर युद्ध की विजय के पश्चात ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक संस्था से राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित हो गई, जोकि एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। इसलिए रॉबर्ट क्लाइव को भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का संस्थापक भी कहा जाता है।

नज़्मुद्दौला (1765–1766 ई.)

5 फ़रवरी 1765 ई. को मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद उसका अल्पवयस्क पुत्र नज़्मुद्दौला बंगाल का नवाब बनाया गया। वह बंगाल के उन नवाबों में था, जिनके समय तक नवाबी सत्ता लगभग पूरी तरह अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के नियंत्रण में आ चुकी थी।

➣ नज़्मुद्दौला के अल्पवयस्क होने के कारण उसकी माता मुन्नी बेगम ने उसके संरक्षकके रूप में दरबार के कार्यों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। किन्तु वास्तविक शक्ति न तो नवाब के हाथों में थी और न ही मुन्नी बेगम के, बल्कि सम्पूर्ण प्रशासन पर अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रभाव स्थापित हो चुका था।

➣ बक्सर के युद्ध (1764 ई.) में अंग्रेज़ों की विजय के बाद कम्पनी की स्थिति अत्यंत सुदृढ़ हो गई थी। परिणामस्वरूप नज़्मुद्दौला केवल नाममात्र का नवाब रह गया और उसके अधिकांश अधिकार कम्पनी के नियंत्रण में चले गए।

नवाब की शक्तियों में कमी

➣ नज़्मुद्दौला के शासनकाल में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल के प्रशासन पर अपना नियंत्रण और अधिक मजबूत कर लिया। नवाब से सेना, वित्त तथा प्रशासन से संबंधित अधिकांश अधिकार व्यवहारतः छीन लिए गए।

➣ बंगाल की सुरक्षा के लिए कम्पनी ने अपनी सेना नियुक्त की। इस सेना के रख-रखाव का पूरा खर्च नवाब पर डाल दिया गया। इसके लिए नज़्मुद्दौला ने कम्पनी को प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये देने की स्वीकृति दी।

➣ इसके अतिरिक्त नवाब को उच्च अधिकारियों की नियुक्ति तथा प्रशासनिक निर्णयों के लिए भी कम्पनी की स्वीकृति पर निर्भर रहना पड़ता था। इस प्रकार बंगाल का नवाब अब केवल औपचारिक शासक बनकर रह गया।

लॉर्ड क्लाइव का पुनः भारत आगमन

➣ बक्सर के युद्ध के बाद कम्पनी के निदेशकों ने भारत की राजनीतिक स्थिति को व्यवस्थित करने के लिए रॉबर्ट क्लाइव को पुनः भारत भेजा।

मई 1765 ई. में क्लाइव दूसरी बार बंगाल का गवर्नर बनकर भारत आया। उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती बंगाल, अवध तथा मुग़ल सम्राट के साथ स्थायी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना थी।

➣ क्लाइव ने स्थिति का आकलन करने के बाद क्रमशः मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय, अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा बंगाल के नवाब नज़्मुद्दौला के साथ समझौते किए। इन समझौतों को इतिहास में इलाहाबाद की संधियाँ (1765 ई.) कहा जाता है।

इलाहाबाद की प्रथम संधि (12 अगस्त 1765 ई.)

बक्सर के युद्ध (1764 ई.) में विजय के बाद अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी उत्तर भारत की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति बन चुकी थी। इस विजय के पश्चात् कम्पनी के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि बंगाल, बिहार, उड़ीसा, अवध तथा मुग़ल सम्राट के साथ अपने संबंधों को किस प्रकार व्यवस्थित किया जाए।

➣ इस उद्देश्य से रॉबर्ट क्लाइव ने 12 अगस्त 1765 ई. को इलाहाबाद में मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय के साथ एक महत्त्वपूर्ण संधि की। इस संधि को इतिहास में इलाहाबाद की प्रथम संधि कहा जाता है।

➣ इस संधि के परिणामस्वरूप अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी को पहली बार भारत में वैधानिक रूप से शासन करने का अधिकार प्राप्त हुआ। इतिहासकार इसे कम्पनी के राजनीतिक इतिहास का एक निर्णायक मोड़ मानते हैं।

संधि की प्रमुख शर्तें

➣ संधि के अनुसार मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी को सौंप दी। इसके साथ ही कम्पनी को इन प्रान्तों से भू-राजस्व (लगान) वसूलने तथा दीवानी (सिविल) न्याय का अधिकार प्राप्त हो गया।

➣ कम्पनी ने बदले में मुग़ल सम्राट को प्रतिवर्ष 26 लाख रुपये पेंशन (वार्षिक भुगतान) देने का वचन दिया। इस प्रकार सम्राट आर्थिक रूप से कम्पनी पर निर्भर हो गया।

➣ कम्पनी ने कड़ा और मानिकपुर के जिले मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय को प्रदान कर दिए, जिससे उसके निर्वाह की व्यवस्था की जा सके।

➣ एक शाही फ़रमान द्वारा मुग़ल सम्राट ने नज़्मुद्दौला को बंगाल का वैध नवाब भी स्वीकार कर लिया। इससे कम्पनी द्वारा नियुक्त नवाब को वैधानिक मान्यता प्राप्त हो गई।

➣ इतिहासकारों के अनुसार 12 अगस्त 1765 ई. की यह संधि भारत में अंग्रेज़ी शासन की वास्तविक प्रशासनिक नींव थी। इसके बाद कम्पनी केवल व्यापारी संस्था नहीं रही, बल्कि एक राजस्व-संग्रहकर्ता एवं शासक के रूप में स्थापित हो गई।

ऐतिहासिक महत्त्व

➣ इलाहाबाद की प्रथम संधि अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक थी। इस संधि ने कम्पनी को आर्थिक, प्रशासनिक तथा राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत सशक्त बना दिया।

➣ बंगाल, बिहार और उड़ीसा जैसे समृद्ध प्रान्तों का राजस्व कम्पनी के हाथों में आने से उसे भारत में अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए स्थायी आर्थिक आधार प्राप्त हो गया।

➣ आगे चलकर इन्हीं दीवानी अधिकारों के आधार पर रॉबर्ट क्लाइव ने 1765 ई. में द्वैध शासन की व्यवस्था लागू की, जो अगले सात वर्षों तक बंगाल में लागू रही।

बिंदु विवरण
संधि इलाहाबाद की प्रथम संधि
तिथि 12 अगस्त 1765 ई.
पक्ष रॉबर्ट क्लाइव एवं शाह आलम द्वितीय
मुख्य शर्तें कम्पनी को बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा की दीवानी; सम्राट को 26 लाख रुपये वार्षिक पेंशन; कड़ा एवं इलाहाबाद के जिले प्रदान किए गए।
परिणाम कम्पनी को वैधानिक दीवानी अधिकार प्राप्त हुए और भारत में उसके राजनीतिक शासन की नींव मजबूत हुई।

इलाहाबाद की द्वितीय संधि (16 अगस्त 1765 ई.)

इलाहाबाद की प्रथम संधि (12 अगस्त 1765 ई.) के बाद रॉबर्ट क्लाइव ने उत्तर भारत की राजनीतिक व्यवस्था को और अधिक स्थिर बनाने के उद्देश्य से अवध के नवाब शुजाउद्दौला के साथ भी एक समझौता किया।

➣ कम्पनी के सामने यह प्रश्न था कि अवध को अपने अधीन किया जाए या उसे एक मित्र राज्य के रूप में बनाए रखा जाए।

➣ क्लाइव का मत था कि यदि अवध को सीधे कम्पनी के अधीन कर लिया गया, तो उत्तर-पश्चिम से होने वाले संभावित विदेशी आक्रमणों का सामना कम्पनी को स्वयं करना पड़ेगा। इसलिए उसने अवध को एक बफर (Buffer) राज्य के रूप में बनाए रखने की नीति अपनाई।

➣ इसी उद्देश्य से 16 अगस्त 1765 ई. को इलाहाबाद में रॉबर्ट क्लाइव और अवध के नवाब शुजाउद्दौला के बीच एक संधि हुई, जिसे इतिहास में इलाहाबाद की द्वितीय संधि कहा जाता है।

संधि की प्रमुख शर्तें

➣ संधि के अनुसार अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अवध का अधिकांश भाग पुनः शुजाउद्दौला को लौटा दिया। इससे वह कम्पनी का मित्र शासक बन गया और अवध अंग्रेज़ों के लिए एक बफर राज्य के रूप में कार्य करने लगा।

➣ नवाब शुजाउद्दौला ने इलाहाबाद और कड़ा के जिले मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय को सौंप दिए। इससे सम्राट के निर्वाह की व्यवस्था की गई।

➣ युद्ध की क्षतिपूर्ति (War Indemnity) के रूप में शुजाउद्दौला ने अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी को 50 लाख रुपये देने का वचन दिया। यह राशि दो किस्तों में अदा की गई।

➣ संधि के अंतर्गत बनारस के ज़मींदार राजा बलवंत सिंह को उसकी जागीर वापस कर दी गई। कम्पनी ने इस प्रकार बनारस क्षेत्र में भी अपना राजनीतिक प्रभाव स्थापित कर लिया।

➣ शुजाउद्दौला ने अपने राज्य में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी को व्यापारिक सुविधाएँ प्रदान करने तथा दोनों राज्यों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने पर भी सहमति व्यक्त की।

संधि का महत्त्व

➣ इलाहाबाद की द्वितीय संधि के बाद अवध अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी का मित्र एवं आश्रित राज्य बन गया। यद्यपि वह औपचारिक रूप से स्वतंत्र रहा, किन्तु उसकी विदेश नीति और सुरक्षा पर कम्पनी का प्रभाव बढ़ गया।

➣ क्लाइव की यह नीति अत्यंत व्यावहारिक सिद्ध हुई। अवध को अपने अधीन करने के बजाय उसे बफर राज्य बनाए रखने से कम्पनी को उत्तर-पश्चिम दिशा से होने वाले आक्रमणों के विरुद्ध एक सुरक्षा क्षेत्र प्राप्त हो गया।

➣ प्रथम और द्वितीय दोनों इलाहाबाद संधियों ने मिलकर उत्तर भारत की राजनीतिक व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया। मुग़ल सम्राट कम्पनी पर आश्रित हो गया, बंगाल की दीवानी कम्पनी को मिल गई और अवध अंग्रेज़ों का सहयोगी राज्य बन गया।

➣ इस प्रकार 1765 ई. की इलाहाबाद संधियाँ अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनाने की दिशा में निर्णायक सिद्ध हुईं।

बिंदु विवरण
संधि इलाहाबाद की द्वितीय संधि
तिथि 16 अगस्त 1765 ई.
पक्ष रॉबर्ट क्लाइव एवं शुजाउद्दौला
मुख्य शर्तें 50 लाख रुपये क्षतिपूर्ति, कड़ा एवं इलाहाबाद शाह आलम द्वितीय को, बलवंत सिंह की जागीर वापस।
परिणाम अवध अंग्रेज़ों का मित्र (Buffer) राज्य बना।

बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना

12 अगस्त 1765 ई. को इलाहाबाद की प्रथम संधि के माध्यम से अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त हुई।

➣ यह घटना भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इसके साथ ही कम्पनी एक व्यापारिक संस्था से बढ़कर एक राजस्व-संग्रहकर्ता एवं शासक शक्ति बन गई।

दीवानी प्राप्त होने के बाद कम्पनी को इन प्रान्तों से भू-राजस्व (लगान) वसूलने, प्रशुल्क (कर) एकत्र करने तथा दीवानी (सिविल) न्याय का अधिकार मिल गया। इससे कम्पनी के पास विशाल आर्थिक संसाधन गया।

➣ दूसरी ओर निज़ामत अर्थात् कानून-व्यवस्था, पुलिस, रक्षा तथा फौजदारी न्याय का अधिकार औपचारिक रूप से बंगाल के नवाब के पास ही रहने दिया गया। किन्तु नवाब के पास न तो पर्याप्त आय थी और न ही स्वतंत्र सैन्य शक्ति। परिणामस्वरूप वह कम्पनी पर पूर्णतः निर्भर हो गया।

द्वैध शासन की भूमिका

➣ दीवानी प्राप्त करने के बाद रॉबर्ट क्लाइव ने 1765 ई. में बंगाल में द्वैध शासन की व्यवस्था लागू की। इस व्यवस्था में शासन की वास्तविक शक्ति कम्पनी के हाथों में थी, जबकि उत्तरदायित्व नवाब पर छोड़ दिया गया।

➣ कम्पनी राजस्व वसूल करती थी, किन्तु प्रशासन, कानून-व्यवस्था और जनता के कल्याण की जिम्मेदारी नवाब की मानी जाती थी। इस कारण अधिकार और उत्तरदायित्व अलग-अलग हाथों में चले गए, जिससे प्रशासनिक अव्यवस्था बढ़ने लगी।

➣ इतिहासकारों के अनुसार द्वैध शासन का सबसे बड़ा दोष यह था कि कम्पनी के पास अधिकार थे, पर उत्तरदायित्व नहीं, जबकि नवाब के पास उत्तरदायित्व था, पर वास्तविक अधिकार नहीं।

➣ यही व्यवस्था आगे चलकर बंगाल की आर्थिक एवं प्रशासनिक दुर्दशा का प्रमुख कारण बनी। अंततः 1772 ई. में वारेन हेस्टिंग्स ने इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया।

बिंदु विवरण
व्यवस्था द्वैध शासन (Dual Government)
प्रवर्तक रॉबर्ट क्लाइव
लागू 1765 ई.
लागू क्षेत्र बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा
समाप्ति 1772 ई. (वारेन हेस्टिंग्स द्वारा)
कम्पनी के अधिकार दीवानी (राजस्व वसूली, लगान तथा दीवानी/सिविल न्याय)
नवाब के अधिकार निज़ामत (कानून-व्यवस्था, पुलिस, रक्षा एवं फौजदारी न्याय)
मुख्य दोष कम्पनी के पास अधिकार थे, पर उत्तरदायित्व नहीं; जबकि नवाब के पास उत्तरदायित्व था, पर वास्तविक अधिकार नहीं।

मृत्यु एवं उत्तराधिकार

➣ नवाब बनने के लगभग एक वर्ष बाद ही 1766 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। इस कारण वह बंगाल के प्रशासन में कोई महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा सका और उसके शासनकाल में वास्तविक सत्ता अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के हाथों में ही बनी रही।

➣ अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार नज़्मुद्दौला की मृत्यु चेचक के कारण हुई थी। यद्यपि कुछ समकालीन स्रोतों में मृत्यु के कारण का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु सामान्यतः चेचक को ही उसकी मृत्यु का प्रमुख कारण माना जाता है।

सैफ़ुद्दौला (1766–1770 ई.)

नज़्मुद्दौला की मृत्यु के बाद 1766 ई. में उसका छोटा भाई सैफ़ुद्दौला बंगाल का नवाब बना। उस समय तक बंगाल की वास्तविक सत्ता अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के हाथों में जा चुकी थी और नवाब केवल नाममात्र का शासक रह गया था।

➣ सैफ़ुद्दौला के शासनकाल में कम्पनी के अधिकारियों का प्रशासन, वित्त तथा न्याय व्यवस्था पर नियंत्रण और अधिक सुदृढ़ हो गया। नवाब की भूमिका केवल औपचारिक रह गई तथा वह कम्पनी द्वारा निर्धारित वार्षिक पेंशन एवं भत्तों पर निर्भर था।

1767 ई. में कम्पनी ने नवाब के निजी व्ययों में भी कटौती कर दी, जिससे उसकी आर्थिक एवं राजनीतिक स्थिति और अधिक कमजोर हो गई।

1770 ई. में सैफ़ुद्दौला की मृत्यु हो गई। उसके शासनकाल में बंगाल में कम्पनी का प्रभुत्व लगभग निर्विवाद हो चुका था।

मुबारकउद्दौला (1770–1793 ई.)

1770 ई. में सैफ़ुद्दौला की मृत्यु के बाद उसका भाई मुबारकउद्दौला बंगाल का नवाब बना। उसके शासनकाल में भी नवाब की स्थिति पूर्णतः औपचारिक रही और सभी महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा लिए जाते थे।

➣ मुबारकउद्दौला के शासन के प्रारम्भ में ही 1770 ई. का भीषण बंगाल का अकाल पड़ा, जिसमें लाखों लोगों की मृत्यु हुई। अकाल के बावजूद कम्पनी ने भू-राजस्व वसूली में कोई विशेष राहत नहीं दी, जिससे जनता की स्थिति और भी दयनीय हो गई।

1772 ई. में वॉरेन हेस्टिंग्स ने द्वैध शासन को समाप्त कर दिया और कम्पनी ने प्रशासन को प्रत्यक्ष रूप से अपने हाथों में ले लिया। इसके साथ ही बंगाल के नवाब की राजनीतिक शक्ति लगभग पूरी तरह समाप्त हो गई।

➣ इसके बाद मुबारकउद्दौला केवल कम्पनी का पेंशनभोगी नवाब बनकर रह गया। उसके पास न तो प्रशासनिक अधिकार रहे और न ही सैन्य शक्ति।

बंगाल के नवाब : निष्कर्ष

➣ मुर्शिद कुली ख़ाँ द्वारा स्थापित बंगाल का स्वतंत्र नवाबी शासन लगभग पाँच दशकों तक भारत की सबसे समृद्ध और शक्तिशाली क्षेत्रीय सत्ता रहा। किन्तु आंतरिक उत्तराधिकार संघर्ष, दरबारी षड्यंत्र, यूरोपीय शक्तियों का बढ़ता हस्तक्षेप तथा अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी की कूटनीति के कारण इसका पतन हो गया।

प्लासी (1757 ई.) और बक्सर (1764 ई.) के युद्धों ने बंगाल के स्वतंत्र नवाबी शासन का अंत कर दिया। 1765 ई. में दीवानी अधिकार प्राप्त होने के बाद कम्पनी ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा की आर्थिक शक्ति पर अधिकार कर लिया, जिसने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को स्थायी रूप से मजबूत कर दिया।

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