मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) : संवैधानिक सुधारों की रूपरेखा एवं उत्तरदायी शासन की दिशा

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मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) : परिचय

➣ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट जुलाई 1918 ई. में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रतिवेदन था। इसे तत्कालीन भारत सचिव एडविन सैमुअल मॉन्टेग्यू तथा भारत के वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने संयुक्त रूप से तैयार किया था। इस रिपोर्ट का आधिकारिक नाम Report on Indian Constitutional Reforms था।

➣ यह रिपोर्ट 20 अगस्त 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा के बाद तैयार की गई, जिसमें ब्रिटिश सरकार ने पहली बार भारत में उत्तरदायी शासन की दिशा में क्रमिक रूप से आगे बढ़ने की नीति घोषित की थी।

➣ उसी घोषणा को व्यवहार में लागू करने के लिए भारत की शासन-व्यवस्था में आवश्यक संवैधानिक सुधारों का प्रस्ताव इस रिपोर्ट में प्रस्तुत किया गया।

➣ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट में प्रांतीय प्रशासन में द्वैध शासन लागू करने, विधान परिषदों का विस्तार करने, भारतीयों की प्रशासन में भागीदारी बढ़ाने तथा सीमित स्तर पर उत्तरदायी शासन की व्यवस्था विकसित करने जैसी महत्वपूर्ण सिफारिशें की गईं।

➣ इसी रिपोर्ट के आधार पर आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1919 पारित किया गया, जिसने ब्रिटिश भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए।

➣ इसलिए भारतीय संवैधानिक इतिहास में मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट को मॉन्टेग्यू घोषणा (1917) और भारत सरकार अधिनियम, 1919 के बीच की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है।

मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट का उद्देश्य भारत में तत्काल उत्तरदायी शासन स्थापित करना नहीं था, बल्कि सीमित संवैधानिक सुधारों के माध्यम से भारतीयों की प्रशासनिक भागीदारी बढ़ाते हुए उन्हें भविष्य के उत्तरदायी शासन के लिए तैयार करना था।

रिपोर्ट की पृष्ठभूमि

➣ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) किसी एक घटना का परिणाम नहीं थी। यह 20 अगस्त 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा को व्यवहार में लागू करने के उद्देश्य से तैयार की गई थी।

➣ मॉन्टेग्यू-घोषणा के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत की प्रशासनिक व्यवस्था का अध्ययन कर संवैधानिक सुधारों का विस्तृत प्रारूप तैयार करने का निर्णय लिया।

मॉन्टेग्यू घोषणा (1917)

➣ 20 अगस्त 1917 को ब्रिटिश सरकार ने पहली बार आधिकारिक रूप से भारत में उत्तरदायी शासन की दिशा में क्रमिक रूप से आगे बढ़ने की नीति घोषित की।

➣ किन्तु इस घोषणा में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि संवैधानिक सुधार किस प्रकार लागू किए जाएंगे। इसलिए घोषणा को कार्यरूप देने के लिए एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने की आवश्यकता महसूस हुई।

➣ मॉन्टेग्यू घोषणा के बाद भारत सचिव एडविन सैमुअल मॉन्टेग्यू नवंबर 1917 में भारत आए। उन्होंने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड के साथ मिलकर भारत की राजनीतिक एवं प्रशासनिक परिस्थितियों का अध्ययन किया।

➣ इस दौरान उन्होंने महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, एनी बेसेंट, मोहम्मद अली जिन्ना, सुरेंद्रनाथ बनर्जी सहित अनेक भारतीय नेताओं से विचार-विमर्श किया। इसके अतिरिक्त प्रांतीय सरकारों, देशी रियासतों तथा विभिन्न प्रशासनिक अधिकारियों से भी सुझाव प्राप्त किए गए।

➣ इन विचार-विमर्शों और प्राप्त सुझावों के आधार पर 8 जुलाई 1918 को मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट प्रकाशित की गई, जिसमें भारत में लागू किए जाने वाले संवैधानिक सुधारों की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की गई।

➣ मॉन्टेग्यू ने यह रिपोर्ट तैयार करने में भूपेंद्रनाथ बोस, लॉर्ड डोनॉफमोर, विलियम ड्यूक तथा चार्ल्स रॉबर्ट्स जैसे सहयोगियों की सहायता ली। रिपोर्ट को 24 मई तथा 7 जून 1918 को ब्रिटिश मंत्रिमंडल के समक्ष प्रस्तुत किया गया, जिसके बाद इसे अंतिम रूप देकर प्रकाशित किया गया।

रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें

➣ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) का मुख्य उद्देश्य भारत में ऐसी संवैधानिक व्यवस्था विकसित करना था, जिससे भारतीयों की प्रशासन में भागीदारी बढ़े, किन्तु ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण भी बना रहे। इस उद्देश्य से रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण सिफारिशें की गईं।

प्रांतों में द्वैध शासन

➣ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश प्रांतों में द्वैध शासन लागू करने की थी। इसके अंतर्गत प्रांतीय प्रशासन को आरक्षित तथा हस्तांतरित विषयों में विभाजित करने का प्रस्ताव रखा गया।

आरक्षित विषय (Reserved Subjects) हस्तांतरित विषय (Transferred Subjects)
  • वित्त (Finance)
  • पुलिस (Police)
  • कानून एवं व्यवस्था (Law & Order)
  • न्याय (Justice)
  • राजस्व (Revenue)
  • सिंचाई (Irrigation)
  • शिक्षा (Education)
  • स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government)
  • जनस्वास्थ्य (Public Health)
  • कृषि (Agriculture)
  • उद्योग (Industries)
  • सहकारिता आदि (Co-operation etc.)

➣ आरक्षित विषयों का प्रशासन गवर्नर तथा उसकी कार्यकारिणी परिषद के नियंत्रण में रहता, जबकि हस्तांतरित विषयों का संचालन भारतीय मंत्रियों द्वारा किया जाता, जो प्रांतीय विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी होते।

➣ इस व्यवस्था का उद्देश्य भारतीय नेताओं को सीमित प्रशासनिक अनुभव प्रदान करना था, जबकि महत्वपूर्ण विभागों पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण बनाए रखा गया।

द्वैध शासन की व्यवस्था केवल प्रांतीय सरकारों के लिए प्रस्तावित की गई थी। केंद्र स्तर पर उत्तरदायी शासन की कोई व्यवस्था नहीं की गई थी।

विधान परिषदों का विस्तार

➣ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट ने केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान परिषदों का विस्तार करने की सिफारिश की, ताकि प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी पहले की अपेक्षा बढ़ाई जा सके।

➣ रिपोर्ट में सुझाव दिया गया कि विधान परिषदों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए, जिससे परिषदों में लगभग 70 प्रतिशत सदस्य प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने जा सकें- यह भारत में प्रत्यक्ष निर्वाचन के सिद्धांत की पहली शुरुआत थी। इससे भारतीय जनता के प्रतिनिधियों को कानून निर्माण और प्रशासनिक विषयों पर अपने विचार रखने का अधिक अवसर मिल सके।

➣ साथ ही, परिषदों को बजट पर चर्चा, प्रश्न पूछने, प्रस्ताव रखने तथा सरकारी कार्यों की समीक्षा करने जैसे कुछ अतिरिक्त अधिकार देने की भी सिफारिश की गई।

➣ यद्यपि इन परिषदों की शक्तियों में वृद्धि का प्रस्ताव रखा गया था, फिर भी गवर्नर तथा वायसराय के पास विशेष परिस्थितियों में उनके निर्णयों को अस्वीकार करने तथा अध्यादेश जारी करने जैसी व्यापक शक्तियाँ बनी रहतीं। इसलिए वास्तविक विधायी अधिकार अभी भी ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण में ही थे।

रिपोर्ट ने विधान परिषदों का विस्तार और भारतीय प्रतिनिधित्व बढ़ाने की सिफारिश अवश्य की, किन्तु उन्हें पूर्ण विधायी स्वतंत्रता या उत्तरदायी शासन का अधिकार देने का प्रस्ताव नहीं रखा।

केंद्रीय विधानमंडल का पुनर्गठन

➣ रिपोर्ट की एक अत्यंत महत्वपूर्ण किन्तु प्रायः कम चर्चित सिफारिश यह थी कि 1909 के भारत परिषद अधिनियम के अंतर्गत गठित एकसदनीय शाही विधान परिषद को समाप्त कर उसके स्थान पर केंद्र में पहली बार द्विसदनीय विधानमंडल स्थापित किया जाए।

सदनप्रस्तावित सदस्य संख्याकार्यकाल
निम्न सदन- केंद्रीय विधान सभा (Legislative Assembly)लगभग 145 सदस्य (अधिकांश निर्वाचित)3 वर्ष
उच्च सदन- राज्य परिषद (Council of State)60 सदस्य5 वर्ष

➣ रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई कि भारतीय लोक सेवाओं में भर्ती तथा सेवा-शर्तों के निर्धारण हेतु एक स्वतंत्र लोक सेवा आयोग की स्थापना की जाए (जिसकी वास्तविक स्थापना आगे चलकर 1926 में हुई)।

केंद्रीय स्तर पर द्विसदनीय विधानमंडल की स्थापना अवश्य प्रस्तावित की गई, किन्तु वायसराय तथा उसकी कार्यकारिणी परिषद केंद्रीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं बनाए गए- अर्थात् उत्तरदायी शासन का सिद्धांत केंद्र में लागू नहीं हुआ, केवल प्रांतों तक ही सीमित रहा।

मताधिकार का विस्तार

➣ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट ने विधान परिषदों में अधिक भारतीय प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए मताधिकार का विस्तार करने की सिफारिश की। इसका उद्देश्य अधिक भारतीयों को निर्वाचन प्रक्रिया में सम्मिलित करना था।

➣ किन्तु रिपोर्ट ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का समर्थन नहीं किया। मतदान का अधिकार केवल उन्हीं व्यक्तियों को दिया जाना था, जो सरकार द्वारा निर्धारित संपत्ति, आय, कर-भुगतान, शिक्षा अथवा अन्य योग्यताओं को पूरा करते हों।

➣ परिणामस्वरूप भारत की अधिकांश जनता, विशेषकर किसान, मजदूर, महिलाएँ तथा निम्न आय वर्ग के लोग मतदान के अधिकार से वंचित रहे। इस सीमित मताधिकार के आधार पर आगे चलकर कुल मिलाकर केवल लगभग 50-55 लाख व्यक्तियों (कुल जनसंख्या के लगभग 3 प्रतिशत) को ही मताधिकार प्राप्त हो सका।

➣ रिपोर्ट का उद्देश्य एक ही बार में लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू करना नहीं था, बल्कि ब्रिटिश सरकार की निगरानी में धीरे-धीरे भारतीयों को प्रतिनिधिक शासन का अनुभव कराना था।

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार भारत में स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान (1950) के लागू होने पर प्राप्त हुआ।

सांप्रदायिक एवं विशेष वर्गों का प्रतिनिधित्व

➣ रिपोर्ट ने 1909 में मुसलमानों को दी गई पृथक निर्वाचन प्रणाली को न केवल बनाए रखने, बल्कि उसका दायरा और अधिक विस्तृत करने की सिफारिश की।

➣ इसके अंतर्गत सिखों (पंजाब में), भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों तथा यूरोपीय समुदाय को भी पृथक निर्वाचन-मंडलों के माध्यम से प्रतिनिधित्व देने का प्रस्ताव रखा गया।

➣ मद्रास प्रेसीडेंसी की जस्टिस पार्टी द्वारा उठाई गई गैर-ब्राह्मणों के लिए पूर्ण पृथक निर्वाचन प्रणाली की मांग को रिपोर्ट ने अस्वीकार कर दिया, किन्तु उन्हें तथा दलित वर्गों को कुछ मनोनीत स्थानों के माध्यम से सीमित प्रतिनिधित्व देने का सुझाव अवश्य दिया।

रिपोर्ट की इस सिफारिश ने प्रतिनिधित्व के आधार को धर्म व जाति पर और अधिक केंद्रित कर दिया, जिसे अनेक आलोचकों ने फूट डालो और शासन करो नीति का विस्तार माना।

अन्य प्रशासनिक सिफारिशें

➣ रिपोर्ट में केंद्रीय तथा प्रांतीय बजट को पृथक करने का सुझाव दिया गया, जिससे प्रांतीय विधान परिषदों को अपना बजट स्वयं बनाने का अधिकार प्राप्त हो सके।

आयकर को केंद्रीय सरकार के राजस्व का स्रोत बनाए रखा गया, किन्तु बंगाल तथा बंबई प्रांतों की आपत्तियों को दूर करने के लिए उन्हें आयकर की आय का 25 प्रतिशत हिस्सा देने का प्रावधान भी सुझाया गया।

➣ इसी क्रम में यह भी सिफारिश की गई कि भारत सचिव का वेतन अब तक की भाँति भारतीय राजस्व से न देकर ब्रिटिश राजकोष से दिया जाए- यह भारतीय राष्ट्रवादियों की एक पुरानी शिकायत (कि भारत का धन भारत पर शासन करने वाले ब्रिटिश अधिकारी के वेतन में ही खर्च होता है) के समाधान की दिशा में एक कदम था।

➣ लंदन में भारत सचिव के प्रशासनिक भार को कम करने हेतु वहाँ एक नए पद- भारत के उच्चायुक्त (High Commissioner for India) – की स्थापना की सिफारिश की गई।

➣ इस पद का मुख्य दायित्व यूरोप में भारतीय व्यापार तथा वाणिज्य की देखरेख करना था, तथा भारत सचिव द्वारा पहले निभाए जाने वाले कुछ प्रशासनिक एवं वाणिज्यिक कार्य अब इसी पद को सौंपे जाने थे।

➣ रिपोर्ट में देशी रियासतों के साथ समन्वय हेतु एक नरेंद्र मंडल (Chamber of Princes) की स्थापना का सुझाव भी दिया गया। इसका उद्देश्य रियासतों को राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर विचार-विमर्श करने तथा अपने सामूहिक विचार भारत सरकार तक पहुँचाने के लिए एक मंच प्रदान करना था।

➣ इसका औपचारिक गठन भारत सरकार अधिनियम, 1919 को राजस्वीकृति मिलने के साथ ही (23 दिसंबर 1919 को शाही उद्घोषणा द्वारा) घोषित हुआ, तथा इसका औपचारिक उद्घाटन 1921 में हुआ।

➣ इसमें 108 प्रमुख रियासतों के शासक तथा शेष छोटी रियासतों के 12 प्रतिनिधि– कुल 120 सदस्य सम्मिलित थे, और इसकी अध्यक्षता स्वयं वायसराय (गवर्नर-जनरल) करते थे। ध्यातव्य है कि यह मंच केवल परामर्शदात्री प्रकृति का था; इसे ब्रिटिश भारत के विषयों पर कोई विधायी अथवा कार्यकारी अधिकार प्राप्त नहीं था।

इन प्रशासनिक सिफारिशों (बजट पृथक्करण, उच्चायुक्त पद, नरेंद्र मंडल) से स्पष्ट होता है कि मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट का उद्देश्य केवल विधायी सुधार करना ही नहीं, बल्कि ब्रिटिश-भारतीय शासन तंत्र के प्रत्येक स्तर- केंद्र, प्रांत, लंदन कार्यालय तथा देशी रियासतें– को नए सिरे से संगठित करना भी था।

भारतीयों की प्रशासन में भागीदारी

➣ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट का एक प्रमुख उद्देश्य भारत के प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी को पहले की अपेक्षा बढ़ाना था। ब्रिटिश सरकार का मानना था कि भारतीयों को धीरे-धीरे प्रशासनिक उत्तरदायित्व सौंपकर उन्हें स्वशासन के लिए तैयार किया जा सकता है।

➣ रिपोर्ट में सिफारिश की गई कि प्रांतीय सरकारों में भारतीय मंत्रियों की संख्या बढ़ाई जाए तथा उन्हें हस्तांतरित विषयों का प्रशासन सौंपा जाए। इससे भारतीय नेताओं को शासन चलाने का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त होगा।

➣ इसके अतिरिक्त रिपोर्ट ने विधान परिषदों में भारतीय प्रतिनिधित्व बढ़ाने तथा सार्वजनिक सेवाओं में भी भारतीयों को अधिक अवसर देने पर बल दिया। इससे प्रशासन में भारतीयों की भूमिका पहले की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण होने लगी।

➣ यद्यपि भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने की बात कही गई थी, फिर भी रक्षा, विदेश नीति, वित्त, पुलिस तथा कानून-व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण विभाग ब्रिटिश अधिकारियों के नियंत्रण में ही रखे गए। इसलिए प्रशासन की वास्तविक बागडोर अभी भी अंग्रेजों के हाथों में बनी रही।

मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट का उद्देश्य भारतीयों को तुरंत पूर्ण शासन सौंपना नहीं था, बल्कि उन्हें सीमित प्रशासनिक उत्तरदायित्व देकर भविष्य के उत्तरदायी शासन के लिए तैयार करना था।

केंद्र और प्रांतों के संबंध

➣ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट ने सुझाव दिया कि केंद्र और प्रांतीय सरकारों के कार्यों तथा अधिकारों को अधिक स्पष्ट रूप से विभाजित किया जाए, ताकि प्रांतों को स्थानीय प्रशासन में अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता मिल सके।

➣ रिपोर्ट के अनुसार, जिन विषयों का संबंध ब्रिटिश भारत के समग्र प्रशासन से था, वे केंद्रीय सरकार के अधीन रहने चाहिए, जबकि शिक्षा, कृषि, स्थानीय प्रशासन तथा जन-कल्याण जैसे विषयों में प्रांतीय सरकारों की भूमिका बढ़ाई जानी चाहिए।

➣ रिपोर्ट का उद्देश्य प्रांतीय प्रशासन को अधिक सक्रिय बनाना था, जिससे स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर किया जा सके और भारतीय प्रतिनिधियों को प्रशासनिक अनुभव प्राप्त हो।

➣ हालांकि प्रांतों को कुछ अतिरिक्त अधिकार देने की सिफारिश की गई, फिर भी केंद्रीय सरकार तथा वायसराय की सर्वोच्च शक्तियों में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं किया गया। रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा तथा अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण पहले की तरह बना रहा।

मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट ने प्रांतीय स्वायत्तता की दिशा में प्रारम्भिक कदम अवश्य बढ़ाया, किन्तु केंद्र को अभी भी प्रांतों से अधिक शक्तिशाली बनाए रखा। पूर्ण प्रांतीय स्वायत्तता बाद में भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत लागू की गई।

भारतीय नेताओं की प्रतिक्रिया

➣ जुलाई 1918 में मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद भारतीय नेताओं ने इसका मिश्रित रूप से स्वागत किया। अधिकांश नेताओं ने इसे संवैधानिक सुधारों की दिशा में एक कदम माना,

➣ किन्तु उनका मत था कि रिपोर्ट में प्रस्तावित सुधार भारतीयों की अपेक्षाओं से काफी कम थे। विशेष रूप से द्वैध शासन, सीमित मताधिकार तथा केंद्र में उत्तरदायी शासन के अभाव की व्यापक आलोचना की गई।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रतिक्रिया

➣ रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसकी समीक्षा के लिए अगस्त 1918 में बंबई में एक विशेष अधिवेशन आयोजित किया, जिसकी अध्यक्षता सैयद हसन इमाम ने की।

➣ कांग्रेस ने माना कि रिपोर्ट में कुछ संवैधानिक सुधारों का प्रस्ताव अवश्य है, किन्तु यह भारतीयों की उत्तरदायी शासन की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। विशेष रूप से केंद्र में उत्तरदायी शासन न दिए जाने तथा गवर्नर एवं वायसराय की व्यापक शक्तियों पर कांग्रेस ने असंतोष व्यक्त किया।

➣ कांग्रेस ने रिपोर्ट में प्रस्तावित द्वैध शासन की व्यवस्था की भी आलोचना की। उसका मत था कि प्रशासन को दो भागों में बाँटने से उत्तरदायी शासन स्थापित नहीं होगा, बल्कि प्रशासन और अधिक जटिल हो जाएगा।

उदारवादी नेताओं की प्रतिक्रिया

➣ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट के प्रति उदारवादी नेताओं का दृष्टिकोण कांग्रेस की तुलना में अधिक अनुकूल था। उनका मानना था कि यद्यपि रिपोर्ट भारतीयों की सभी अपेक्षाओं को पूरा नहीं करती, फिर भी यह संवैधानिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

➣ सुरेंद्रनाथ बनर्जी सहित अनेक उदारवादी नेताओं ने रिपोर्ट में प्रस्तावित सुधारों का समर्थन किया। उनका विश्वास था कि यदि इन सुधारों को सफलतापूर्वक लागू किया जाए, तो भविष्य में भारत को और अधिक राजनीतिक अधिकार प्राप्त हो सकते हैं।

➣ नवंबर 1918 में उदारवादी नेताओं ने एक पृथक सम्मेलन आयोजित कर मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट का समर्थन किया। इसके विपरीत कांग्रेस के अधिकांश नेता इन सुधारों को अपर्याप्त मानते हुए अधिक व्यापक उत्तरदायी शासन की मांग कर रहे थे।

➣ विचारों में बढ़ते मतभेद के कारण उदारवादी नेता धीरे-धीरे कांग्रेस से अलग हो गए और आगे चलकर नवंबर 1918 में भारतीय राष्ट्रीय उदारवादी संघ की स्थापना की, जिसके प्रमुख नेताओं में सुरेंद्रनाथ बनर्जी, तेज बहादुर सप्रू तथा वी.एस. श्रीनिवास शास्त्री शामिल थे। इस संगठन ने संवैधानिक सुधारों के माध्यम से राजनीतिक प्रगति की नीति का समर्थन जारी रखा।

मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट को लेकर उत्पन्न मतभेदों ने कांग्रेस और उदारवादी नेताओं के बीच वैचारिक दूरी को और बढ़ा दिया, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय राष्ट्रीय उदारवादी संघ का गठन हुआ।

उग्रवादी नेताओं (तिलक तथा बेसेंट) की प्रतिक्रिया

➣ रिपोर्ट प्रकाशित होते ही बाल गंगाधर तिलक तथा एनी बेसेंट सहित उग्रवादी खेमे के नेताओं ने इसकी कड़ी आलोचना की। बंबई के विशेष अधिवेशन (अगस्त 1918) में रिपोर्ट को अपर्याप्त, असंतोषजनक तथा निराशाजनक (Inadequate, Unsatisfactory and Disappointing) घोषित किया गया।

➣ एनी बेसेंट ने पूर्व में दिसंबर 1917 के कलकत्ता अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण “द केस फॉर इंडिया” में जिस असंतोष को व्यक्त किया था, मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट प्रकाशित होने पर वही आशंका और गहरी हो गई।

➣ उनका तथा तिलक का साझा मत था कि द्वैध शासन तथा केंद्र में उत्तरदायी शासन की अनुपस्थिति भारतीयों की वास्तविक आकांक्षाओं के विपरीत है, और रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार की सुधारों को यथासंभव सीमित रखने की मंशा को ही उजागर करती है।

मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया

➣ अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने भी, कांग्रेस के समानांतर, रिपोर्ट की समीक्षा हेतु 31 अगस्त – 1 सितंबर 1918 को बंबई में एक विशेष अधिवेशन आयोजित किया, जिसकी अध्यक्षता मोहम्मद अली मोहम्मद खान ने की।

➣ इस अधिवेशन में रिपोर्ट की उस विवादास्पद टिप्पणी पर कड़ा विरोध दर्ज कराया गया, जिसमें यह संकेत दिया गया था कि भारत की जनता अभी उत्तरदायी शासन के लिए उपयुक्त नहीं है। लीग ने इसे भारतीयों की राजनीतिक क्षमता का अपमान माना।

➣ इसके साथ ही लीग ने यह भी मांग की कि भविष्य के संवैधानिक सुधारों में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली तथा पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

गैर-ब्राह्मण आंदोलन (जस्टिस पार्टी) की प्रतिक्रिया

➣ मद्रास प्रेसीडेंसी की जस्टिस पार्टी ने गैर-ब्राह्मणों के लिए मुसलमानों जैसी पृथक निर्वाचन व्यवस्था की मांग रखी थी, जिसे मद्रास के गवर्नर लॉर्ड पेंटलैंड का समर्थन भी प्राप्त था। किन्तु मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट में यह मांग अस्वीकार कर दी गई, जिससे पार्टी में गहरा असंतोष उत्पन्न हुआ।

➣ यद्यपि आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1919 में मद्रास विधान परिषद में गैर-ब्राह्मणों के लिए आरक्षित स्थानों की व्यवस्था अवश्य की गई।

➣ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) को भारतीय संवैधानिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है, किन्तु इसके अधिकांश प्रावधान भारतीय नेताओं की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे। कांग्रेस, होमरूल नेताओं तथा अनेक राष्ट्रवादियों ने इसकी विभिन्न आधारों पर आलोचना की।

द्वैध शासन की जटिल व्यवस्था

➣ रिपोर्ट की सबसे अधिक आलोचना द्वैध शासन की व्यवस्था को लेकर हुई। प्रशासन को आरक्षित और हस्तांतरित विषयों में बाँटने से उत्तरदायित्व स्पष्ट नहीं रहता था और प्रशासनिक टकराव की संभावना बढ़ जाती थी।

➣ आलोचकों का मत था कि एक ही प्रांत में दो प्रकार की कार्यपालिका होने से प्रशासन प्रभावी होने के बजाय अधिक जटिल हो जाएगा।

उत्तरदायी शासन का अभाव

➣ रिपोर्ट में उत्तरदायी शासन की बात तो की गई, किन्तु उसे केवल प्रांतीय स्तर तक सीमित रखा गया। केंद्र सरकार को भारतीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी बनाने का कोई प्रस्ताव नहीं था। परिणामस्वरूप वास्तविक सत्ता वायसराय और ब्रिटिश सरकार के हाथों में ही बनी रही।

गवर्नर एवं वायसराय की व्यापक शक्तियाँ

➣ रिपोर्ट में गवर्नर और वायसराय को विशेषाधिकार तथा वीटो जैसी व्यापक शक्तियाँ देने की सिफारिश की गई थी। वे आवश्यकता पड़ने पर भारतीय मंत्रियों तथा विधान परिषदों के निर्णयों को भी निरस्त कर सकते थे। इसलिए भारतीय नेताओं का मत था कि इस व्यवस्था में वास्तविक सत्ता अभी भी ब्रिटिश अधिकारियों के पास ही रहेगी।

सीमित मताधिकार

➣ रिपोर्ट ने मताधिकार का विस्तार तो किया, किन्तु मतदान का अधिकार केवल सीमित योग्यताओं वाले लोगों तक ही सीमित रखा। भारत की अधिकांश जनता निर्वाचन प्रक्रिया से बाहर रही। राष्ट्रवादियों का मत था कि यदि उत्तरदायी शासन स्थापित करना है, तो अधिक व्यापक जनप्रतिनिधित्व आवश्यक है।

ब्रिटिश नियंत्रण बना रहा

➣ रिपोर्ट में भारतीयों की प्रशासनिक भागीदारी बढ़ाने की बात कही गई, किन्तु रक्षा, विदेश नीति, वित्त तथा कानून-व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण विभाग ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण में ही रखे गए। इस कारण भारतीय नेताओं ने इसे वास्तविक सत्ता हस्तांतरण के बजाय सीमित प्रशासनिक सुधार माना।

इतिहासकारों का मूल्यांकन : मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट ने भारतीय संवैधानिक विकास की दिशा में एक नया चरण अवश्य प्रारम्भ किया, किन्तु इसके सुधार सीमित थे। इसलिए इसे उत्तरदायी शासन की ओर एक प्रारम्भिक कदम माना जाता है, न कि भारत को वास्तविक स्वशासन प्रदान करने वाला दस्तावेज।

मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट के परिणाम

➣ जुलाई 1918 में प्रकाशित मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट का भारतीय राजनीति तथा संवैधानिक विकास पर व्यापक प्रभाव पड़ा। यद्यपि इसकी अनेक सिफारिशों की आलोचना हुई, फिर भी इसी रिपोर्ट ने आगे होने वाले संवैधानिक सुधारों की आधारशिला रखी।

भारत सरकार अधिनियम, 1919 का आधार

➣ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट के आधार पर ब्रिटिश संसद ने भारत सरकार अधिनियम, 1919 पारित किया, जिसे 23 दिसंबर 1919 को राजस्वीकृति प्राप्त हुई। रिपोर्ट की अधिकांश प्रमुख सिफारिशों को इसी अधिनियम के माध्यम से लागू किया गया।

➣ अधिनियम को राजस्वीकृति मिलने के बावजूद यह तुरंत लागू नहीं हुआ। प्रथम चुनाव दिसंबर 1920 में हुए तथा नई द्वैध शासन-व्यवस्था के अंतर्गत गठित परिषदों ने जनवरी 1921 से वास्तविक रूप से कार्य करना आरम्भ किया। इसी कारण अधिनियम को व्यवहार में लागू होने में राजस्वीकृति के बाद भी लगभग एक वर्ष का समय लगा।

➣ प्रांतों में द्वैध शासन, विधान परिषदों का विस्तार, केंद्र में द्विसदनीय विधानमंडल तथा भारतीयों की प्रशासन में बढ़ी हुई भागीदारी जैसी व्यवस्थाएँ इसी अधिनियम का हिस्सा बनीं।।

➣ इसके साथ ही मुसलमानों के अतिरिक्त सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों तथा यूरोपीय समुदाय के लिए भी पृथक निर्वाचन की व्यवस्था कर दी गई, जिससे सांप्रदायिक/वर्गीय प्रतिनिधित्व का दायरा 1909 की तुलना में और व्यापक हो गया।

➣ कुछ इतिहासकारों का मत है कि इसी विस्तारित सांप्रदायिक निर्वाचन-व्यवस्था ने आगे चलकर 1920 के दशक (विशेषकर 1922-1927) में साम्प्रदायिक तनाव तथा दंगों की घटनाओं में वृद्धि को भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहित किया।

➣ रिपोर्ट की सिफारिशों को ठोस संवैधानिक स्वरूप देने के लिए तीन समितियाँ गठित की गईं- लॉर्ड साउथबरो की अध्यक्षता में फ्रैंचाइज़ी समिति (मताधिकार निर्धारण हेतु), रिचर्ड फीथम की अध्यक्षता में कार्य-विभाजन समिति (केंद्र व प्रांतों के मध्य विषयों के बंटवारे हेतु) तथा लॉर्ड क्रू की अध्यक्षता में गृह-प्रशासन समिति (लंदन स्थित भारत सचिव कार्यालय के प्रशासनिक ढाँचे हेतु)।

भारत सरकार अधिनियम, 1919 को प्रायः कृपालु निरंकुशता के अंत तथा भारत में उत्तरदायी शासन की शुरुआत के रूप में वर्णित किया जाता है, यद्यपि यह उत्तरदायित्व केवल प्रांतीय स्तर तक ही सीमित था।

द्वैध शासन की व्यावहारिक विफलता

➣ द्वैध शासन की संरचनात्मक कमजोरियाँ शीघ्र ही व्यवहार में भी स्पष्ट हो गईं। 1923 में गठित स्वराज पार्टी (चित्तरंजन दास तथा मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में) ने परिषद-प्रवेश की नीति अपनाकर विधान परिषदों के भीतर ही सरकार का विरोध एवं गतिरोध उत्पन्न करने की रणनीति अपनाई।

➣ स्वराज पार्टी के सदस्यों ने विशेष रूप से बंबई तथा मध्य प्रांत की विधान परिषदों में मंत्रियों के वेतन तथा अनुदान संबंधी प्रस्तावों को बार-बार अस्वीकार करके प्रशासन को अवरुद्ध कर दिया।

➣ परिणामस्वरूप वहाँ के गवर्नरों को बाध्य होकर द्वैध शासन को प्रभावी रूप से निलंबित करते हुए हस्तांतरित विषयों को भी सीधे अपने नियंत्रण में लेना पड़ा। इससे यह स्पष्ट हो गया कि द्वैध शासन एक व्यावहारिक दृष्टि से अस्थिर एवं अंतर्विरोधी व्यवस्था थी।

भारतीय राजनीति में मतभेद

➣ रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद भारतीय नेताओं के बीच मतभेद और स्पष्ट हो गए। कांग्रेस तथा उग्रवादी नेताओं ने इसे अपर्याप्त बताया, जबकि उदारवादी नेताओं ने इसे संवैधानिक विकास की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना।

➣ इन मतभेदों के परिणामस्वरूप नवंबर 1918 में नरमपंथी नेता कांग्रेस से अलग होकर भारतीय राष्ट्रीय उदारवादी संघ के रूप में संगठित हुए, जिसके प्रमुख नेताओं में सुरेंद्रनाथ बनर्जी, तेज बहादुर सप्रू तथा वी.एस. श्रीनिवास शास्त्री शामिल थे। इस संगठन ने संवैधानिक सुधारों के मार्ग का समर्थन जारी रखा।

राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव

➣ रिपोर्ट से भारतीयों को अपेक्षित स्तर के राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं हुए। इससे ब्रिटिश सरकार के प्रति असंतोष बना रहा और अधिक व्यापक संवैधानिक सुधारों की मांग तेज होती गई।

➣ आगे चलकर रॉलेट एक्ट (1919), जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919) तथा असहयोग आंदोलन (1920) जैसी घटनाओं ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नए, अधिक जन-आधारित चरण में पहुँचा दिया।

साइमन कमीशन की पृष्ठभूमि

➣ रिपोर्ट में यह भी प्रावधान किया गया था कि सुधारों की प्रगति की समीक्षा हेतु दस वर्ष पश्चात् एक सांविधिक आयोग नियुक्त किया जाएगा। इसी प्रावधान के आधार पर आगे चलकर 1927 में साइमन कमीशन का गठन हुआ (निर्धारित समय से दो वर्ष पूर्व ही), जिसमें कोई भारतीय सदस्य सम्मिलित नहीं किया गया था।

➣ आयोग की संपूर्ण ब्रिटिश सदस्यता को भारतीय राजनीतिक दलों ने भारतीयों के आत्मसम्मान पर आघात माना, जिसके परिणामस्वरूप 1928 में साइमन कमीशन का देशव्यापी बहिष्कार हुआ-साइमन कमीशन, वापस जाओ का नारा इसी विरोध का प्रतीक बना।

भारतीय संवैधानिक विकास पर प्रभाव

➣ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट ने भारत में उत्तरदायी शासन की दिशा में संवैधानिक सुधारों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। यद्यपि इसकी सिफारिशें सीमित थीं, फिर भी इसने ब्रिटिश सरकार को भारतीय प्रशासन में परिवर्तन करने के लिए बाध्य किया।

➣ भारतीय संवैधानिक इतिहास में यह रिपोर्ट मॉन्टेग्यू घोषणा (1917) और भारत सरकार अधिनियम, 1919 के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है। इसकी सीमाओं से उत्पन्न असंतोष ने ही आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1935 (जिसने द्वैध शासन समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता स्थापित की) की पृष्ठभूमि तैयार की।

➣ इस प्रकार, प्रांतों तक सीमित तथा अधूरे उत्तरदायी शासन का जो प्रयोग 1918-19 में हुआ, वह क्रमिक संवैधानिक सुधारों की एक लंबी शृंखला के बाद अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता तथा 26 जनवरी 1950 को लागू हुए भारतीय संविधान के अंतर्गत पूर्ण उत्तरदायी एवं संसदीय शासन-प्रणाली की स्थापना के रूप में साकार हुआ।

मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट भारतीयों की स्वशासन संबंधी आकांक्षाओं को पूरी तरह पूरा नहीं कर सकी, किन्तु इसने भारत में संवैधानिक सुधारों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया और भारत सरकार अधिनियम, 1919 का आधार तैयार किया। इसलिए भारतीय संवैधानिक इतिहास में इसका विशेष महत्व है।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट का आधिकारिक नाम भारतीय संवैधानिक सुधारों पर रिपोर्ट (Report on Indian Constitutional Reforms) था।
  • यह रिपोर्ट 8 जुलाई 1918 को तत्कालीन भारत सचिव एडविन सैमुअल मॉन्टेग्यू तथा वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित की गई थी।
  • यह रिपोर्ट 20 अगस्त 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा के आधार पर तैयार की गई थी।
  • रिपोर्ट तैयार करने से पहले नवंबर 1917 से अप्रैल 1918 के बीच मॉन्टेग्यू ने भारत का दौरा कर भारतीय नेताओं, प्रांतीय सरकारों तथा देशी रियासतों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श किया था।
  • रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश प्रांतों में द्वैध शासन लागू करना थी।
  • रिपोर्ट ने 1909 की एकसदनीय शाही विधान परिषद के स्थान पर केंद्र में पहली बार द्विसदनीय विधानमंडल– केंद्रीय विधान सभा (लगभग 145 सदस्य) तथा राज्य परिषद (60 सदस्य)- स्थापित करने की सिफारिश की।
  • रिपोर्ट में विधान परिषदों के विस्तार, मताधिकार के सीमित विस्तार, लोक सेवा आयोग की स्थापना तथा भारतीयों की प्रशासन में भागीदारी बढ़ाने की सिफारिश की गई थी।
  • रिपोर्ट ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का समर्थन नहीं किया था। इसके आधार पर बनी व्यवस्था में केवल लगभग 50-55 लाख व्यक्तियों (लगभग 3% जनसंख्या) को ही मताधिकार प्राप्त हुआ।
  • रिपोर्ट ने मुसलमानों के अतिरिक्त सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों तथा यूरोपीय समुदाय के लिए भी पृथक निर्वाचन का प्रस्ताव रखा; गैर-ब्राह्मणों (जस्टिस पार्टी की मांग) की पूर्ण पृथक निर्वाचन की मांग अस्वीकार कर दी गई, किन्तु उन्हें व दलित वर्गों को कुछ मनोनीत स्थान दिए गए।
  • रिपोर्ट ने लंदन में भारत के उच्चायुक्त नामक नए पद की स्थापना की सिफारिश की, जिसका मुख्य दायित्व यूरोप में भारतीय व्यापार-वाणिज्य की देखरेख करना था तथा जिसे भारत सचिव के कुछ कार्य सौंपे जाने थे।
  • रिपोर्ट ने देशी रियासतों के समन्वय हेतु नरेंद्र मंडल की स्थापना का सुझाव दिया- 120 सदस्य (108 प्रमुख रियासतों के शासक + 12 अन्य प्रतिनिधि), वायसराय की अध्यक्षता में, केवल परामर्शदात्री प्रकृति का। इसका उद्घाटन 1921 में हुआ।
  • रिपोर्ट ने केंद्रीय एवं प्रांतीय बजट को पृथक करने की सिफारिश की। आयकर केंद्र का राजस्व-स्रोत बना रहा, किन्तु बंगाल व बंबई को इसका 25% हिस्सा देने का प्रावधान रखा गया।
  • रिपोर्ट ने यह भी सिफारिश की कि भारत सचिव का वेतन भारतीय राजस्व के बजाय ब्रिटिश राजकोष से दिया जाए।
  • रिपोर्ट में यह भी प्रावधान था कि दस वर्ष बाद सुधारों की समीक्षा हेतु एक सांविधिक आयोग नियुक्त किया जाएगा; इसी आधार पर 1927 में साइमन कमीशन का गठन हुआ।
  • रिपोर्ट की सिफारिशों को ठोस रूप देने हेतु तीन समितियाँ बनीं- साउथबरो (फ्रैंचाइज़ी), फीथम (कार्य-विभाजन) तथा क्रू (गृह-प्रशासन) समिति।
  • रिपोर्ट के आधार पर आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1919 पारित किया गया, जिसे 23 दिसंबर 1919 को राजस्वीकृति मिली, किन्तु यह वास्तव में जनवरी 1921 से ही लागू हो सका (चुनाव दिसंबर 1920 में हुए)।
  • भारत सरकार अधिनियम, 1919 को प्रायः कृपालु निरंकुशता के अंत के रूप में वर्णित किया जाता है।
  • 1923 में गठित स्वराज पार्टी (चित्तरंजन दास व मोतीलाल नेहरू) ने परिषद-प्रवेश व गतिरोध की नीति अपनाकर बंबई तथा मध्य प्रांत में द्वैध शासन को व्यावहारिक रूप से विफल कर दिया, जिससे वहाँ के गवर्नरों को हस्तांतरित विषय भी सीधे अपने नियंत्रण में लेने पड़े।
  • साइमन कमीशन (1927) में कोई भारतीय सदस्य न होने के कारण इसका 1928 में देशव्यापी बहिष्कार हुआ- साइमन कमीशन, वापस जाओ इसी विरोध का नारा था।
  • अगस्त 1918 में कांग्रेस ने रिपोर्ट की समीक्षा के लिए बंबई विशेष अधिवेशन आयोजित किया, जिसकी अध्यक्षता सैयद हसन इमाम ने की थी।
  • मुस्लिम लीग ने भी 31 अगस्त – 1 सितंबर 1918 को बंबई में विशेष अधिवेशन आयोजित कर रिपोर्ट की उस टिप्पणी का विरोध किया जिसमें भारतीयों को उत्तरदायी शासन के लिए अभी अनुपयुक्त बताया गया था।
  • रिपोर्ट को लेकर मतभेद बढ़ने के बाद नवंबर 1918 में सुरेंद्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय उदारवादी संघ की स्थापना हुई।

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