रॉलेट एक्ट एवं जलियाँवाला बाग हत्याकांड (1919)
➣ रॉलेट एक्ट (1919) और जलियाँवाला बाग हत्याकांड भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास की दो महत्वपूर्ण घटनाएँ थीं। प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के बाद भारतीयों को राजनीतिक सुधारों और नागरिक स्वतंत्रताओं के विस्तार की अपेक्षा थी, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने इसके विपरीत दमनकारी नीतियों को जारी रखा।
➣ रॉलेट एक्ट के तहत ब्रिटिश सरकार को बिना मुकदमे के किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर हिरासत में रखने का अधिकार मिल गया। केवल संदेह के आधार पर भी व्यक्ति को लंबे समय तक हिरासत में रखा जा सकता था, जिसके कारण इस कानून का देशभर में व्यापक विरोध हुआ।
➣ रॉलेट एक्ट के विरोध में महात्मा गांधी के नेतृत्व में रॉलेट सत्याग्रह प्रारंभ हुआ, जिसने भारतीय राजनीति में व्यापक जनभागीदारी को बढ़ावा दिया। इसी दौर में 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में निहत्थी भीड़ पर ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर के आदेश पर की गई गोलीबारी ने ब्रिटिश शासन की दमनकारी प्रवृत्ति को उजागर किया।
➣ इन सभी घटनाओं ने भारतीयों में ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष को और गहरा किया तथा राष्ट्रीय आंदोलन को एक नए और अधिक व्यापक चरण की ओर अग्रसर किया।
रॉलेट एक्ट की पृष्ठभूमि
प्रथम विश्व युद्ध और क्रांतिकारी गतिविधियाँ
➣ प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के समय भारत में राष्ट्रीय आंदोलन का एक हिस्सा संवैधानिक तरीकों से आगे बढ़ रहा था, वहीं दूसरी ओर कुछ क्रांतिकारी संगठन ब्रिटिश शासन को सशस्त्र तरीके से चुनौती देने की कोशिश कर रहे थे। बंगाल, पंजाब और महाराष्ट्र के अलावा विदेशों में रह रहे भारतीय क्रांतिकारी भी ब्रिटिश शासन के विरुद्ध गतिविधियाँ चला रहे थे। युद्ध शुरू होने के बाद इन गतिविधियों को लेकर ब्रिटिश सरकार की चिंता और बढ़ गई।
➣ विदेशों में सक्रिय गदर आंदोलन के क्रांतिकारियों ने युद्ध को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह का अवसर माना। भारत में सैनिक विद्रोह भड़काने तथा ब्रिटिश शासन को कमजोर करने के प्रयास किए गए। इसी तरह बंगाल की क्रांतिकारी संस्थाओं ने भी अपनी गतिविधियाँ जारी रखीं।
➣ ब्रिटिश सरकार को आशंका थी कि जर्मनी और अन्य ब्रिटेन-विरोधी शक्तियाँ भारतीय क्रांतिकारियों को सहायता देकर भारत में विद्रोह की स्थिति पैदा कर सकती हैं। इसलिए सरकार ने क्रांतिकारी गतिविधियों को रोकने के लिए सामान्य कानूनी प्रक्रिया से हटकर कठोर उपायों का सहारा लिया।
डिफेन्स ऑफ इंडिया एक्ट (1915)
➣ क्रांतिकारी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1915 ई. में डिफेन्स ऑफ इंडिया एक्ट लागू किया। यह एक युद्धकालीन आपात कानून था, जिसने सरकार को राजनीतिक असंतोष और क्रांतिकारी गतिविधियों पर कठोर कार्रवाई करने की व्यापक शक्तियाँ प्रदान कीं।
➣ इस अधिनियम के तहत सरकार को ऐसे व्यक्तियों को गिरफ्तार और नजरबंद करने की शक्ति मिली, जिन पर सरकार-विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का संदेह था। सामान्य न्यायिक प्रक्रिया को सीमित करते हुए संदिग्ध व्यक्तियों के विरुद्ध विशेष व्यवस्था के माध्यम से कार्रवाई की जा सकती थी।
➣ सरकार ने इस कानून का इस्तेमाल क्रांतिकारी संगठनों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं तथा सरकार-विरोधी गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए किया। प्रेस और राजनीतिक गतिविधियों पर भी इसका प्रभाव पड़ा। इस प्रकार युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने अपना नियंत्रण काफी बढ़ा दिया।
➣ लेकिन यह कानून मूल रूप से युद्धकालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाया गया था। इसलिए युद्ध समाप्त होने के बाद भारतीयों को उम्मीद थी कि ऐसी दमनकारी व्यवस्थाएँ समाप्त कर दी जाएँगी और राजनीतिक स्वतंत्रता तथा नागरिक अधिकारों का विस्तार किया जाएगा।
युद्ध के बाद राजनीतिक परिस्थितियाँ
➣ प्रथम विश्व युद्ध में भारत ने ब्रिटिश सरकार को सैनिकों, धन और अन्य संसाधनों के रूप में व्यापक सहायता दी थी। बड़ी संख्या में भारतीय सैनिकों ने युद्ध में भाग लिया। भारतीय नेताओं को उम्मीद थी कि युद्ध में भारत के सहयोग के बदले ब्रिटिश सरकार राजनीतिक सुधारों को आगे बढ़ाएगी और भारत को अधिक स्वशासन की दिशा में ले जाएगी।
➣ 20 अगस्त, 1917 को भारत सचिव एडविन मॉन्टेग्यू ने ब्रिटिश सरकार की ओर से एक महत्वपूर्ण घोषणा की। इसमें भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी शासन स्थापित करने को ब्रिटिश नीति का उद्देश्य बताया गया। इस घोषणा से भारतीयों में राजनीतिक सुधारों को लेकर उम्मीद बढ़ी।
➣ इसके बाद मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन इसी समय ब्रिटिश सरकार क्रांतिकारी गतिविधियों को लेकर अपनी चिंता भी बनाए हुए थी। सरकार को लगता था कि युद्ध के दौरान लागू किए गए कठोर कानूनों को पूरी तरह समाप्त करने से क्रांतिकारी गतिविधियाँ फिर से बढ़ सकती हैं।
➣ भारतीयों के लिए स्थिति इसलिए भी निराशाजनक थी क्योंकि एक ओर सरकार उत्तरदायी शासन की दिशा में आगे बढ़ने की बात कर रही थी, जबकि दूसरी ओर राजनीतिक गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए दमनकारी शक्तियों को बनाए रखने की तैयारी कर रही थी। यही विरोधाभास आगे चलकर रॉलेट एक्ट के विरोध का एक महत्वपूर्ण कारण बना।
रॉलेट समिति का गठन
➣ इसी पृष्ठभूमि में ब्रिटिश सरकार ने भारत में चल रही क्रांतिकारी एवं षड्यंत्रकारी गतिविधियों की जाँच करने तथा उनसे निपटने के लिए आवश्यक कानूनी उपाय सुझाने के उद्देश्य से 1917 ई. में एक समिति गठित की। इसकी अध्यक्षता सर सिडनी रॉलेट ने की। इसी कारण यह समिति आगे चलकर रॉलेट समिति के नाम से प्रसिद्ध हुई।
➣ समिति का मुख्य उद्देश्य भारत में क्रांतिकारी अपराधों की प्रकृति, उनके प्रसार तथा उनसे निपटने के लिए सरकार को प्राप्त कानूनी शक्तियों की समीक्षा करना था। समिति ने अपनी रिपोर्ट 1918 ई. में प्रस्तुत की।
➣ समिति ने यह निष्कर्ष निकाला कि क्रांतिकारी गतिविधियों का खतरा अभी समाप्त नहीं हुआ है और सरकार को उनसे निपटने के लिए विशेष एवं कठोर कानूनी शक्तियों की आवश्यकता बनी हुई है। इसी आधार पर युद्धकालीन दमनकारी व्यवस्थाओं को युद्ध समाप्त होने के बाद भी किसी रूप में जारी रखने की सिफारिश की गई।
➣ रॉलेट समिति की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने आगे चलकर ऐसे विधेयक तैयार किए, जिन्हें भारतीय जनता ने नागरिक स्वतंत्रताओं पर हमला माना। इन्हीं विधेयकों ने आगे रॉलेट एक्ट, 1919 का रूप लिया और इसके विरोध में महात्मा गांधी के नेतृत्व में रॉलेट सत्याग्रह शुरू हुआ।
रॉलेट एक्ट (1919)
➣ रॉलेट समिति की सिफारिशों के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने 6 फरवरी, 1919 को इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में दो विधेयक प्रस्तुत किए। इन विधेयकों का उद्देश्य सरकार को क्रांतिकारी एवं षड्यंत्रकारी गतिविधियों से निपटने के लिए युद्धकालीन दमनकारी शक्तियों को बनाए रखने का अधिकार देना था।
➣ इन दोनों विधेयकों को भारतीय जनता के बीच काले विधेयक के नाम से जाना गया। भारतीय नेताओं का मानना था कि इनके प्रावधान नागरिक स्वतंत्रताओं और सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के विरुद्ध थे। विशेष रूप से बिना सामान्य मुकदमे के नजरबंदी तथा सरकार को संदिग्ध व्यक्तियों के विरुद्ध असाधारण शक्तियाँ देने का प्रावधान सबसे अधिक विवादास्पद था।
➣ इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में मौजूद भारतीय सदस्यों ने इन विधेयकों का प्रबल और लगभग एकमत विरोध किया। उनका तर्क था कि प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हो चुका है, इसलिए युद्धकाल में लागू किए गए असाधारण दमनकारी कानूनों को समाप्त किया जाना चाहिए, न कि उन्हें सामान्य परिस्थितियों में भी जारी रखा जाए।
➣ इन विधेयकों का विरोध केवल केंद्रीय विधान परिषद तक सीमित नहीं था। बंगाल, संयुक्त प्रांत, पंजाब तथा मध्य प्रांत की प्रांतीय विधानसभाओं ने भी पहले ही इनके विरुद्ध अपना विरोध दर्ज कराया था। इसके बावजूद ब्रिटिश सरकार ने भारतीय जनमत की उपेक्षा करते हुए केंद्रीय स्तर पर विधेयकों को आगे बढ़ाया।
➣ प्रबल विरोध के बावजूद इनमें से एक विधेयक को पारित कर दिया गया और 18 मार्च, 1919 को इसे गवर्नर-जनरल की स्वीकृति प्राप्त हो गई। इसके बाद यह कानून रॉलेट एक्ट अथवा अराजक तथा क्रांतिकारी अपराध अधिनियम (1919) के नाम से जाना गया।
➣ रॉलेट एक्ट के पारित होने का विरोध इतना तीव्र था कि इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के समस्त भारतीय सदस्यों ने सामूहिक रूप से त्यागपत्र दे दिया। यह घटना इस बात का स्पष्ट संकेत थी कि भारतीय राजनीतिक नेतृत्व इस कानून को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था।
➣ रॉलेट अधिनियम के द्वारा अंग्रेजी सरकार किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए और आवश्यकता के अनुसार जब तक चाहे जेल में बंद रख सकती थी। इसी कारण इस कानून को बिना वकील, बिना अपील और बिना दलील का कानून कहा गया।
रॉलेट एक्ट के प्रमुख प्रावधान
➣ इस अधिनियम के तहत सरकार को ऐसे व्यक्तियों को बिना सामान्य मुकदमे के नजरबंद करने की शक्ति प्राप्त थी, जिन पर क्रांतिकारी या सरकार-विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का संदेह था।
➣ राजनीतिक मामलों में सामान्य न्यायिक प्रक्रिया को सीमित किया जा सकता था और संदिग्ध व्यक्तियों के विरुद्ध विशेष न्यायिक व्यवस्था के माध्यम से कार्रवाई की जा सकती थी।
➣ सरकार को प्रेस और राजनीतिक गतिविधियों पर नियंत्रण रखने तथा संदिग्ध व्यक्तियों की गतिविधियों पर निगरानी बढ़ाने की अतिरिक्त शक्तियाँ प्राप्त थीं।
➣ इस कानून के अंतर्गत नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामान्य कानूनी अधिकारों को सीमित करने की व्यापक शक्तियाँ सरकार को दी गई थीं। इसी कारण भारतीय नेताओं ने इसका तीव्र विरोध किया और इसे काला कानून कहा।
रॉलेट सत्याग्रह
➣ रॉलेट एक्ट के विरोध में महात्मा गांधी ने देशव्यापी सत्याग्रह शुरू करने का निर्णय लिया। गांधीजी का मानना था कि इस कानून के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने नागरिक स्वतंत्रताओं पर गंभीर प्रहार किया है। इसलिए उन्होंने पहली बार किसी अखिल भारतीय राजनीतिक मुद्दे पर सत्याग्रह और अहिंसक जनप्रतिरोध को व्यापक स्तर पर अपनाने का प्रयास किया।
➣ 24 फरवरी, 1919 को बंबई में सत्याग्रह सभा का गठन किया गया। महात्मा गांधी इसके प्रमुख नेताओं में थे। सभा से जमनालाल बजाज, द्वारकादास, शंकरलाल बैंकर, उमर सोमानी तथा बी. जी. हॉर्निमैन जैसे लोग भी जुड़े थे। इसका उद्देश्य रॉलेट एक्ट का विरोध करना तथा लोगों को सत्याग्रह और अहिंसा के माध्यम से इसके विरुद्ध संगठित करना था।
➣ सत्याग्रह से जुड़े लोगों ने प्रतिज्ञा की कि वे रॉलेट एक्ट का शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करेंगे और आवश्यकता पड़ने पर इसका अहिंसक रूप से उल्लंघन भी करेंगे। गांधीजी ने स्पष्ट किया कि पूरे आंदोलन में सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों का पालन किया जाएगा।
➣ गांधीजी ने प्रारम्भ में 30 मार्च, 1919 को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। बाद में पर्याप्त तैयारी के लिए इसकी तिथि बदलकर 6 अप्रैल, 1919 कर दी गई। हालांकि कुछ स्थानों पर पुराने कार्यक्रम के अनुसार 30 मार्च को ही हड़ताल आयोजित कर दी गई।
➣ 30 मार्च, 1919 को दिल्ली में हड़ताल और प्रदर्शन हुआ। यहाँ पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ तथा पुलिस गोलीबारी में कई लोगों की मृत्यु हुई। इस घटना ने रॉलेट विरोधी आंदोलन को और अधिक तीव्र कर दिया।
➣ 6 अप्रैल, 1919 को देश के अनेक हिस्सों में हड़ताल आयोजित की गई। दुकानें और व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रहे, लोगों ने जुलूस निकाले तथा प्रार्थना और सभाएँ आयोजित कीं। बंबई, दिल्ली, अहमदाबाद, कलकत्ता सहित कई प्रमुख शहरों में रॉलेट एक्ट के विरोध में व्यापक जनभागीदारी दिखाई दी।
➣ रॉलेट सत्याग्रह में पहली बार हिंदू-मुस्लिम एकता का व्यापक प्रदर्शन देखने को मिला। अनेक स्थानों पर दोनों समुदायों के लोगों ने मिलकर हड़ताल और विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया। इस कारण ब्रिटिश सरकार रॉलेट विरोधी आंदोलन को लेकर और अधिक चिंतित हो गई।
➣ आंदोलन के बढ़ते प्रभाव के बीच गांधीजी ने पंजाब जाने का निर्णय लिया, जहाँ रॉलेट एक्ट के विरोध में स्थिति तेजी से तनावपूर्ण हो रही थी। लेकिन 9 अप्रैल, 1919 को पंजाब जाते समय उन्हें पलवल के पास गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें पंजाब में प्रवेश करने से रोक दिया गया। बाद में उन्हें बंबई वापस भेज दिया गया।
➣ गांधीजी की गिरफ्तारी की खबर फैलते ही कई स्थानों पर स्थिति बिगड़ गई। अहमदाबाद और पंजाब सहित कुछ क्षेत्रों में हिंसक घटनाएँ हुईं। सरकारी इमारतों पर हमले, आगजनी और पुलिस के साथ टकराव की घटनाएँ सामने आईं। गांधीजी ने आंदोलन में हिंसा होने पर चिंता व्यक्त की और बाद में इसे अपनी हिमालय जैसी भूल बताया।
गांधीजी ने स्वीकार किया कि उन्होंने जनता को बिना पर्याप्त प्रशिक्षण के सविनय अवज्ञा के लिए आह्वान करके एक गंभीर भूल की थी – जनता अभी अनुशासित अहिंसा के लिए तैयार नहीं थी। उन्होंने 18 अप्रैल, 1919 को सत्याग्रह स्थगित कर दिया और अपनी इस हिमालय जैसी भूल के प्रायश्चित हेतु तीन दिन का उपवास भी रखा।
जलियाँवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल, 1919)
➣ रॉलेट एक्ट के विरोध में पंजाब में पहले से ही तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई थी। अमृतसर में डॉ. सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के बाद लोगों में आक्रोश बढ़ गया था। 10 अप्रैल, 1919 को इन नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस और जनता के बीच संघर्ष हुआ, जिसमें कई लोग मारे गए।
➣ इसी तनावपूर्ण वातावरण में 13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियाँवाला बाग में बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए। यह स्थान चारों ओर से दीवारों से घिरा हुआ था और यहाँ आने-जाने के रास्ते बहुत संकरे थे। लोग यहाँ मुख्य रूप से रॉलेट एक्ट के विरोध तथा गिरफ्तार किए गए नेताओं की रिहाई के समर्थन में सभा करने के लिए एकत्र हुए थे। बैसाखी का मेला होने के कारण आसपास के क्षेत्रों से आए ग्रामीणों की संख्या भी काफी थी।
➣ उस समय अमृतसर में ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर सैन्य बल का अधिकारी था। उसे जलियाँवाला बाग में लोगों के एकत्र होने की जानकारी मिली। लगभग 50 सैनिकों को साथ लेकर वह जलियाँवाला बाग पहुँचा। सैनिकों के पास राइफलें थीं और उनके साथ दो बख्तरबंद गाड़ियाँ भी थीं, लेकिन संकरे रास्ते के कारण ये गाड़ियाँ बाग के भीतर प्रवेश नहीं कर सकीं।
➣ डायर ने वहाँ पहुँचकर भीड़ को तितर-बितर होने के लिए पर्याप्त चेतावनी नहीं दी। उसने सैनिकों को लोगों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। सैनिकों ने भीड़ पर लगातार गोलीबारी की। लोग बचने के लिए इधर-उधर भागने लगे, लेकिन चारों ओर दीवारें और संकरे रास्ते होने के कारण बड़ी संख्या में लोग बाहर नहीं निकल सके।
➣ गोलीबारी लगभग 10 मिनट तक चली और सैनिकों ने तब तक गोली चलाई जब तक उनके पास उपलब्ध गोलियों का बड़ा हिस्सा समाप्त नहीं हो गया। ब्रिटिश आधिकारिक जाँच में बाद में बताया गया कि सैनिकों ने लगभग 1,650 राउंड गोलियाँ चलाई थीं। गोलीबारी के दौरान कई लोग जान बचाने के लिए जलियाँवाला बाग के कुएँ में कूद गए।
➣ इस गोलीबारी में बड़ी संख्या में लोग मारे गए और घायल हुए। ब्रिटिश सरकार के आधिकारिक आँकड़े के अनुसार 379 लोगों की मृत्यु हुई और लगभग 1,200 लोग घायल हुए। दूसरी ओर, भारतीय नेताओं और अन्य समकालीन स्रोतों ने मृतकों की संख्या इससे कहीं अधिक बताई। कांग्रेस की जाँच समिति ने भी सरकारी आँकड़ों से अधिक संख्या में लोगों के मारे जाने की बात कही थी।
➣ जलियाँवाला बाग हत्याकांड की खबर पूरे देश में तेजी से फैली और भारतीयों में ब्रिटिश शासन के प्रति आक्रोश और गहरा हो गया। यह घटना भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई और इसके बाद ब्रिटिश शासन की न्यायप्रियता तथा सुधारवादी दावों पर भारतीयों का विश्वास तेजी से कमजोर हुआ।
जलियाँवाला बाग हत्याकांड की प्रतिक्रिया
➣ जलियाँवाला बाग हत्याकांड के बाद पंजाब में जारी दमन के विरुद्ध जनआक्रोश बढ़ा, कई प्रतिष्ठित भारतीयों ने ब्रिटिश सम्मान और पदों का त्याग किया तथा इस घटना की जाँच के लिए ब्रिटिश सरकार और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अलग-अलग स्तर पर जाँच कराई। ब्रिटेन में भी जनरल डायर की कार्रवाई को लेकर तीखा मतभेद सामने आया।
पंजाब में जारी दमन और सैन्य आतंक
➣ जलियाँवाला बाग की घटना के बाद पंजाब में ब्रिटिश प्रशासन ने दमन और बढ़ा दिया। कई क्षेत्रों में मार्शल लॉ जैसी कठोर व्यवस्थाएँ लागू की गईं और जनता पर विभिन्न प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए।
➣ पंजाब में लोगों को अनेक अमानवीय दंडों और अपमानजनक कार्रवाइयों का सामना करना पड़ा। अमृतसर में कुख्यात रेंगने का आदेश(Crawling Order) लागू किया गया, जिसके तहत एक विशेष गली से गुजरने वाले भारतीयों को पेट के बल रेंगने के लिए मजबूर किया गया। सार्वजनिक रूप से कोड़े मारने तथा अन्य कठोर दंड देने की घटनाएँ भी सामने आईं।
➣ प्रशासन ने सेंसरशिप और अन्य नियंत्रणों के माध्यम से पंजाब में हुई घटनाओं की जानकारी को बाहर जाने से रोकने का प्रयास किया। जब इन दमनकारी कार्रवाइयों की खबरें धीरे-धीरे देश के अन्य भागों तक पहुँचीं, तो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आक्रोश और अधिक बढ़ गया।
प्रतिष्ठित भारतीयों द्वारा विरोध
➣ जलियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने 31 मई, 1919 को ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदान की गई नाइटहुड की उपाधि वापस कर दी। उन्हें यह सम्मान 1915 में प्रदान किया गया था। ठाकुर ने पंजाब में हुए दमन को देखते हुए ब्रिटिश सम्मान स्वीकार करना उचित नहीं माना।
➣ महात्मा गांधी ने भी जलियाँवाला बाग हत्याकांड और पंजाब में हुए दमन की कड़ी आलोचना की। उन्होंने बाद में अपने प्रारम्भिक रॉलेट सत्याग्रह के दौरान हुई हिंसक घटनाओं की भी आलोचना की और आंदोलन को वापस लेने का निर्णय किया।
➣ वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के सदस्य तथा प्रसिद्ध न्यायविद सर चेट्टूर शंकरन नायर ने पंजाब में हुए दमन के विरोध में कार्यकारिणी परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उनका इस्तीफा ब्रिटिश शासन-तंत्र के भीतर से आया एक महत्वपूर्ण विरोध था।
कांग्रेस की स्वतंत्र जाँच समिति
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने जलियाँवाला बाग हत्याकांड तथा पंजाब में हुए व्यापक दमन की अपनी स्वतंत्र जाँच कराई। कांग्रेस की जाँच का उद्देश्य केवल जलियाँवाला बाग की गोलीबारी ही नहीं, बल्कि पंजाब में लागू दमनकारी उपायों और मार्शल लॉ की वास्तविक स्थिति सामने लाना भी था।
➣ कांग्रेस की जाँच से जुड़े प्रमुख नेताओं में महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू, चित्तरंजन दास (सी. आर. दास) तथा अब्बास तैयबजी शामिल थे। समिति ने पंजाब में हुए दमन की कड़ी आलोचना की और जनरल डायर की कार्रवाई को गंभीर रूप से अमानवीय बताया।
➣ कांग्रेस की रिपोर्ट ने विशेष रूप से इस बात को सामने रखा कि पंजाब में केवल जलियाँवाला बाग की गोलीबारी ही नहीं, बल्कि उसके बाद की सामूहिक दंडात्मक कार्रवाइयाँ भी ब्रिटिश प्रशासन की दमनकारी नीति का हिस्सा थीं।
हंटर कमेटी की स्थापना एवं उसकी रिपोर्ट (1920)
➣ जलियाँवाला बाग हत्याकांड और पंजाब में हुए दमन की व्यापक आलोचना के बाद ब्रिटिश सरकार ने 14 अक्टूबर, 1919 को हंटर कमेटी का गठन किया। इसका आधिकारिक नाम Disorders Inquiry Committee (अशांति जाँच समिति) था। इसके अध्यक्ष लॉर्ड विलियम हंटर थे।
➣ यह एक 9 सदस्यीय समिति थी, जिसमें ब्रिटिश सदस्यों के साथ भारतीय सदस्य भी शामिल थे। भारतीय सदस्यों में सर चिमनलाल हरिलाल सीतलवाड़, पंडित जगत नारायण तथा सरदारज़ादा सुल्तान अहमद खान प्रमुख थे। समिति को पंजाब में हुए उपद्रवों, सरकारी कार्रवाई तथा विशेष रूप से जलियाँवाला बाग की गोलीबारी की परिस्थितियों की जाँच करनी थी।
➣ हंटर कमेटी की रिपोर्ट आने से पहले ही ब्रिटिश सरकार ने अधिकारियों और कर्मचारियों को कानूनी कार्रवाई से बचाने के उद्देश्य से इंडेम्निटी कानून पारित किया। इस कदम की भारतीयों ने तीखी आलोचना की, क्योंकि इससे पंजाब में दमन करने वाले अधिकारियों को कानूनी संरक्षण मिलने की आशंका थी।
हंटर कमेटी की रिपोर्ट (1920)➣ हंटर कमेटी ने 1920 ई. में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। समिति ने जनरल डायर की कार्रवाई को गलत माना और उसकी आलोचना की। विशेष रूप से बिना पर्याप्त चेतावनी दिए भीड़ पर गोली चलाने तथा आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग करने को अनुचित माना गया।
➣ हालांकि समिति ने डायर के विरुद्ध किसी आपराधिक मुकदमे या दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश नहीं की। डायर को सैन्य सेवा से हटा दिया गया और उसके आगे भारत में सेवा करने का रास्ता बंद कर दिया गया। इस कार्रवाई को भारतीय जनता ने अत्यंत अपर्याप्त माना।
➣ डायर ने अपने निर्णय का बचाव करते हुए यह तर्क दिया कि यदि उसने गोली नहीं चलाई होती तो पंजाब में विद्रोह की स्थिति पैदा हो सकती थी। उसने गोलीबारी को केवल भीड़ को हटाने की कार्रवाई न मानकर ऐसा कदम बताया जिससे नैतिक प्रभाव पैदा हो और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लोगों में भय स्थापित हो।
ब्रिटेन में डायर के समर्थन और विरोध की प्रतिक्रिया
➣ ब्रिटेन में भी जनरल डायर की कार्रवाई को लेकर विरोधाभासी प्रतिक्रिया सामने आई। हाउस ऑफ कॉमन्स में तत्कालीन युद्ध सचिव विंस्टन चर्चिल ने जलियाँवाला बाग की गोलीबारी की कड़ी आलोचना की और इसे ब्रिटिश शासन के लिए शर्मनाक घटना माना।
➣ इसके विपरीत, हाउस ऑफ लॉर्ड्स में जनरल डायर के प्रति सहानुभूति और समर्थन देखने को मिला। उसके समर्थकों ने उसे ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करने वाला अधिकारी बताया।
➣ उसके सम्मान में पंजाब का रक्षक उत्कीर्ण एक तलवार भी भेंट की गई। डायर के प्रति इस प्रकार के समर्थन ने भारत में इस धारणा को और मजबूत किया कि ब्रिटिश शासन भारतीयों के जीवन और अधिकारों को समान महत्व नहीं देता था।
➣ ब्रिटेन के कुछ समाचार-पत्रों और साम्राज्यवादी समर्थकों ने भी डायर का समर्थन किया। Morning Post ने उसके समर्थन में धन जुटाने का अभियान चलाया, जिसमें लगभग 26,000 पाउंड की राशि एकत्र हुई।
➣ इस घटनाओ से स्पष्ट हुआ कि ब्रिटिश समाज का एक प्रभावशाली वर्ग पंजाब में डायर की कार्रवाई को ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के नाम पर उचित मानता था।
शहीद ऊधम सिंह
➣ ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर, 1899 को सुनाम में हुआ था, जो उस समय पंजाब के पटियाला राज्य का हिस्सा था। उनका बचपन कठिन परिस्थितियों में बीता। कम उम्र में ही माता-पिता की मृत्यु हो जाने के बाद उनका पालन-पोषण अनाथालय में हुआ।
➣ 13 अप्रैल को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में जनरल डायर के आदेश पर हुई गोलीबारी ने ऊधम सिंह के जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने इस घटना को ब्रिटिश शासन की क्रूरता का प्रतीक माना और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों को दंडित करने का संकल्प लिया।
➣ जलियाँवाला बाग हत्याकांड के समय माइकल ओ’ड्वायर पंजाब का लेफ्टिनेंट गवर्नर था। उसने जनरल डायर की कार्रवाई का समर्थन किया था। इसलिए ऊधम सिंह ने उसे भी इस हत्याकांड के लिए जिम्मेदार माना।
➣ इसके बाद ऊधम सिंह लंबे समय तक भारत और विदेशों में रहे। उन्होंने विभिन्न देशों की यात्राएँ कीं और ब्रिटिश अधिकारियों तक पहुँचने का अवसर तलाशते रहे। इसी दौरान उन्होंने अपना नाम राम मोहम्मद सिंह आजाद भी इस्तेमाल किया, जो भारत की विभिन्न धार्मिक समुदायों की एकता और स्वतंत्रता की उनकी भावना को दर्शाता था।
➣ लगभग 21 वर्षों तक अपने संकल्प को पूरा करने का अवसर तलाशने के बाद 13 मार्च, 1940 को ऊधम सिंह ने लंदन के कैक्सटन हॉल में आयोजित एक सभा के दौरान माइकल ओ’ड्वायर को गोली मार दी। ओ’ड्वायर की मौके पर ही मृत्यु हो गई।
➣ ऊधम सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर मुकदमा चलाया गया। अदालत में उन्होंने अपने कार्य को जलियाँवाला बाग हत्याकांड के प्रतिशोध से जोड़ा। उन्हें मृत्युदंड दिया गया और 31 जुलाई, 1940 को लंदन की पेंटनविल जेल में फाँसी दे दी गई।
➣ ऊधम सिंह की मृत्यु के बाद वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शहीद के रूप में याद किए जाने लगे। जलियाँवाला बाग हत्याकांड के प्रति उनके लंबे प्रतिशोध को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में ब्रिटिश दमन के विरुद्ध तीव्र प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है।
➣ ऊधम सिंह के नाम पर उत्तराखंड में ऊधम सिंह नगर जिले का नाम रखा गया है। यह जिला पहले नैनीताल जिले का हिस्सा था और अक्टूबर, 1995 में अलग जिला बनाया गया।
➣ इस प्रकार ऊधम सिंह का जीवन जलियाँवाला बाग हत्याकांड से शुरू हुई उस प्रतिशोध की भावना से जुड़ा रहा, जो लगभग दो दशकों तक उनके साथ रही और अंततः 1940 में माइकल ओ’ड्वायर की हत्या के रूप में सामने आई।
रॉलेट एक्ट एवं जलियाँवाला बाग हत्याकांड के प्रभाव
➣ ब्रिटिश शासन के प्रति विश्वास को गहरा आघात:- रॉलेट एक्ट और जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने भारतीयों के बीच ब्रिटिश सरकार की न्यायप्रियता और सुधारवादी नीतियों के प्रति बचे हुए विश्वास को कमजोर कर दिया। विशेष रूप से पंजाब में हुए दमन ने यह स्पष्ट कर दिया कि ब्रिटिश सरकार राजनीतिक असंतोष को दबाने के लिए कठोर बल प्रयोग से पीछे नहीं हटेगी।
➣ गांधीजी की राजनीति में निर्णायक परिवर्तन:- जलियाँवाला बाग हत्याकांड के बाद महात्मा गांधी का ब्रिटिश शासन के प्रति दृष्टिकोण अधिक कठोर हुआ। वे अब केवल संवैधानिक सुधारों की प्रतीक्षा करने के बजाय व्यापक जनआंदोलन के माध्यम से ब्रिटिश शासन का विरोध करने की दिशा में आगे बढ़े।
➣ असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हुई:- रॉलेट सत्याग्रह और पंजाब के दमन ने आगे चलकर असहयोग आंदोलन (1920–1922) के लिए राजनीतिक वातावरण तैयार किया। गांधीजी ने ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग समाप्त करने को राजनीतिक संघर्ष का प्रमुख साधन बनाया।
➣ कांग्रेस का जनआंदोलन की ओर बढ़ना:- इन घटनाओं के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राजनीति में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। कांग्रेस ने धीरे-धीरे सीमित संवैधानिक विरोध से आगे बढ़कर व्यापक जनसहभागिता और प्रत्यक्ष राजनीतिक संघर्ष को अधिक महत्व देना शुरू किया।
➣ सत्याग्रह और अहिंसक प्रतिरोध को व्यापक आधार:- रॉलेट सत्याग्रह ने गांधीजी को देशव्यापी स्तर पर सत्याग्रह और अहिंसक जनप्रतिरोध को संगठित करने का अनुभव दिया। आगे चलकर यही तरीका असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और अन्य आंदोलनों में महत्वपूर्ण राजनीतिक हथियार बना।
➣ हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा:- रॉलेट विरोधी आंदोलन में कई स्थानों पर हिंदू और मुस्लिम समुदायों ने मिलकर भाग लिया। इसी वातावरण ने आगे खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन के दौरान दोनों समुदायों की संयुक्त राजनीतिक भागीदारी के लिए आधार तैयार किया।
➣ ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनआक्रोश में वृद्धि:- जलियाँवाला बाग हत्याकांड और पंजाब में हुए दमन ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक जनआक्रोश पैदा किया। राष्ट्रीय आंदोलन अब केवल शिक्षित राजनीतिक वर्ग तक सीमित न रहकर समाज के अन्य वर्गों तक भी तेजी से फैलने लगा।
➣ क्रांतिकारी गतिविधियों पर प्रभाव:- जलियाँवाला बाग की घटना ने कुछ क्रांतिकारियों के बीच ब्रिटिश शासन के प्रति प्रतिशोध की भावना को भी मजबूत किया। उधम सिंह ने इस घटना को अपने जीवन की निर्णायक प्रेरणाओं में माना और 1940 में माइकल ओ’ड्वायर की हत्या की।
➣ ब्रिटिश साम्राज्य की नैतिक प्रतिष्ठा को नुकसान:- जलियाँवाला बाग हत्याकांड की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आलोचना हुई। ब्रिटेन में जनरल डायर की कार्रवाई को लेकर समर्थन और विरोध दोनों सामने आए, जिससे ब्रिटिश शासन की नैतिकता और भारत में उसकी नीतियों को लेकर गंभीर प्रश्न उठे।
➣ राष्ट्रीय आंदोलन में निर्णायक मोड़:- रॉलेट एक्ट और जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नए चरण में पहुँचा दिया। अब आंदोलन का स्वरूप केवल याचिकाओं और संवैधानिक सुधारों की मांग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जनसहभागिता, सत्याग्रह और व्यापक राजनीतिक संघर्ष इसकी प्रमुख विशेषताएँ बनती गईं।
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ रॉलेट समिति का गठन 1917 ई. में सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में किया गया था। इसका उद्देश्य भारत में क्रांतिकारी एवं षड्यंत्रकारी गतिविधियों की जाँच करना और उनसे निपटने के उपाय सुझाना था।
➣ रॉलेट समिति ने अपनी रिपोर्ट 1918 ई. में प्रस्तुत की और सरकार को क्रांतिकारी गतिविधियों से निपटने के लिए कठोर कानूनी शक्तियाँ बनाए रखने की सिफारिश की।
➣ 6 फरवरी, 1919 को रॉलेट समिति की सिफारिशों के आधार पर दो विधेयक इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में प्रस्तुत किए गए। भारतीय सदस्यों ने इनका कड़ा विरोध किया।
➣ इनमें से एक विधेयक को 18 मार्च, 1919 को गवर्नर-जनरल की स्वीकृति मिली और यह रॉलेट एक्ट अथवा Anarchical and Revolutionary Crimes Act, 1919 बना।
➣ भारतीयों ने रॉलेट एक्ट को इसके दमनकारी प्रावधानों के कारण काला कानून कहा।
➣ रॉलेट एक्ट के विरोध में महात्मा गांधी ने देशव्यापी रॉलेट सत्याग्रह शुरू किया। 6 अप्रैल, 1919 को देशव्यापी हड़ताल आयोजित की गई।
➣ गांधीजी ने पहले 30 मार्च, 1919 को हड़ताल का आह्वान किया था, लेकिन बाद में इसकी तिथि बदलकर 6 अप्रैल कर दी गई। दिल्ली में कुछ लोगों ने पुराने कार्यक्रम के अनुसार 30 मार्च को ही हड़ताल कर दी थी।
➣ अमृतसर में डॉ. सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन किचलू रॉलेट एक्ट के विरोध के प्रमुख नेताओं में थे। दोनों की गिरफ्तारी के बाद अमृतसर में तनाव और बढ़ गया।
➣ 13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियाँवाला बाग में जनरल रेजिनाल्ड डायर के आदेश पर निहत्थी भीड़ पर गोली चलाई गई।
➣ ब्रिटिश सरकार के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार जलियाँवाला बाग गोलीकांड में 379 लोगों की मृत्यु हुई और लगभग 1,200 लोग घायल हुए। भारतीय स्रोतों ने मृतकों की संख्या इससे अधिक बताई।
➣ 14 अक्टूबर, 1919 को ब्रिटिश सरकार ने जलियाँवाला बाग तथा पंजाब की घटनाओं की जाँच के लिए हंटर कमेटी (Disorders Inquiry Committee) का गठन किया। इसके अध्यक्ष लॉर्ड विलियम हंटर थे।
➣ हंटर कमेटी के भारतीय सदस्यों में सर चिमनलाल हरिलाल सीतलवाड़, पंडित जगत नारायण तथा सरदारज़ादा सुल्तान अहमद खान शामिल थे।
➣ हंटर कमेटी ने 1920 ई. में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और जनरल डायर की कार्रवाई की आलोचना की, लेकिन उसके विरुद्ध आपराधिक मुकदमे की सिफारिश नहीं की।
➣ जलियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में 31 मई, 1919 को रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपनी नाइटहुड की उपाधि वापस कर दी।
➣ सर चेट्टूर शंकरन नायर ने पंजाब में हुए दमन के विरोध में वायसराय की कार्यकारिणी परिषद से इस्तीफा दे दिया।
➣ महात्मा गांधी ने भी पंजाब में हुए दमन और जलियाँवाला बाग हत्याकांड के बाद अपना कैसर-ए-हिंद पदक ब्रिटिश सरकार को वापस कर दिया।
➣ जलियाँवाला बाग हत्याकांड के बाद पंजाब में मार्शल लॉ तथा कई कठोर दमनात्मक उपाय लागू किए गए। अमृतसर का कुख्यात क्रॉलिंग ऑर्डर इसी दमन का उदाहरण था।
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पंजाब की घटनाओं की स्वतंत्र जाँच के लिए अपनी समिति गठित की। इसमें महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू, सी. आर. दास तथा अब्बास तैयबजी जैसे नेता शामिल थे।
➣ उधम सिंह ने जलियाँवाला बाग हत्याकांड को अपने जीवन की महत्वपूर्ण प्रेरणा माना और 13 मार्च, 1940 को लंदन में माइकल ओ’ड्वायर की हत्या की।
➣ रॉलेट एक्ट और जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को निर्णायक रूप से प्रभावित किया और आगे चलकर असहयोग आंदोलन (1920–1922) के लिए राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कुछ महत्वपूर्ण भ्रम बिंदु
➣ रॉलेट समिति और रॉलेट एक्ट एक ही चीज नहीं हैं। रॉलेट समिति का गठन 1917 ई. में सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में हुआ था, जबकि उसकी सिफारिशों के आधार पर 1919 ई. में रॉलेट एक्ट बनाया गया।
➣ डिफेन्स ऑफ इंडिया एक्ट, 1915 और रॉलेट एक्ट, 1919 अलग-अलग कानून थे। पहला प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लागू किया गया था, जबकि दूसरा युद्ध समाप्त होने के बाद भी दमनकारी शक्तियों को बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया।
➣ रॉलेट एक्ट के विरोध में 30 मार्च, 1919 और 6 अप्रैल, 1919 की दोनों तिथियाँ महत्वपूर्ण हैं। गांधीजी ने पहले 30 मार्च को हड़ताल का आह्वान किया था, लेकिन बाद में इसे बदलकर 6 अप्रैल कर दिया। दिल्ली में 30 मार्च को ही हड़ताल आयोजित हो गई थी।
➣ रॉलेट सत्याग्रह और जलियाँवाला बाग हत्याकांड एक ही घटना नहीं थे। रॉलेट सत्याग्रह रॉलेट एक्ट के विरोध में शुरू हुआ आंदोलन था, जबकि जलियाँवाला बाग हत्याकांड 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर में हुई गोलीबारी की घटना थी।
➣ जलियाँवाला बाग में गोली चलाने का आदेश जनरल रेजिनाल्ड डायर ने दिया था। माइकल ओ’ड्वायर ने गोलीबारी नहीं की थी; वह उस समय पंजाब का लेफ्टिनेंट गवर्नर था और पंजाब की दमनकारी नीति के लिए राजनीतिक रूप से जिम्मेदार प्रमुख अधिकारियों में था।
➣ 13 अप्रैल, 1919 को जलियाँवाला बाग की घटना बैसाखी के दिन हुई थी। इसे केवल रॉलेट एक्ट के विरोध की सभा मानना अधूरा है, क्योंकि बैसाखी के कारण आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग अमृतसर आए हुए थे।
➣ जलियाँवाला बाग हत्याकांड के सरकारी आँकड़ों के अनुसार 379 लोग मारे गए और लगभग 1,200 घायल हुए। भारतीय स्रोतों और कांग्रेस की जाँच में मृतकों की संख्या इससे अधिक बताई गई थी।
➣ हंटर कमेटी और कांग्रेस की जाँच समिति अलग-अलग थीं। हंटर कमेटी ब्रिटिश सरकार ने गठित की थी, जबकि कांग्रेस ने पंजाब में हुए दमन की स्वतंत्र जाँच के लिए अपनी अलग समिति बनाई थी।
➣ रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने जलियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में नाइटहुड की उपाधि लौटाई थी, जबकि महात्मा गांधी ने अपना कैसर-ए-हिंद पदक वापस किया था। दोनों घटनाओं को आपस में नहीं मिलाना चाहिए।
➣ सर चेट्टूर शंकरन नायर ने जलियाँवाला बाग और पंजाब के दमन के विरोध में वायसराय की कार्यकारिणी परिषद से इस्तीफा दिया था। वे स्वयं ब्रिटिश प्रशासन के उच्च पद पर कार्यरत भारतीय सदस्य थे।
➣ हंटर कमेटी ने जनरल डायर की कार्रवाई की आलोचना की थी, लेकिन उसके विरुद्ध आपराधिक मुकदमे या दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश नहीं की थी। डायर को सैन्य सेवा से हटा दिया गया।
➣ उधम सिंह ने 1919 में जनरल डायर की हत्या नहीं की थी। उन्होंने 13 मार्च, 1940 को लंदन में माइकल ओ’ड्वायर की हत्या की थी।
➣ रॉलेट एक्ट को भारतीयों ने काला कानून कहा था, जबकि डिफेन्स ऑफ इंडिया एक्ट को इसी नाम से नहीं जाना जाता था।
➣ रॉलेट एक्ट का विरोध करने वाले भारतीयों की संख्या और प्रभाव को केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं समझना चाहिए। व्यापक जनभागीदारी के कारण रॉलेट सत्याग्रह गांधीजी के शुरुआती अखिल भारतीय जनआंदोलनों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
➣ जलियाँवाला बाग हत्याकांड को केवल पंजाब की स्थानीय घटना मानना उचित नहीं है। इसने पूरे भारत में ब्रिटिश शासन के प्रति विश्वास को कमजोर किया और आगे चलकर असहयोग आंदोलन के लिए राजनीतिक वातावरण तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
Leave a Reply