मॉन्टेग्यू घोषणा (1917) : पृष्ठभूमि, प्रमुख प्रावधान, भारतीय प्रतिक्रिया, महत्त्व और सीमाएँ

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मॉर्ले-मिंटो सुधार : परिचय

➣ मॉन्टेग्यू घोषणा 20 अगस्त 1917 को तत्कालीन भारत सचिव एडविन सैमुअल मॉन्टेग्यू द्वारा ब्रिटिश संसद में की गई एक ऐतिहासिक घोषणा थी।

➣ इस घोषणा में पहली बार ब्रिटिश सरकार ने यह स्वीकार किया कि भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी शासन स्थापित करना उसकी आधिकारिक नीति होगी।

➣ यह घोषणा ऐसे समय में की गई जब प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) जारी था और भारत ब्रिटिश साम्राज्य को सैनिकों, धन तथा अन्य संसाधनों के रूप में व्यापक सहयोग दे रहा था।

➣ दूसरी ओर, भारत में होमरूल आंदोलन, लखनऊ समझौता (1916) तथा बढ़ती राष्ट्रीय चेतना के कारण स्वशासन की मांग लगातार मजबूत होती जा रही थी। इन परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को राजनीतिक सुधारों का आश्वासन देने के उद्देश्य से मॉन्टेग्यू घोषणा की।

➣ यद्यपि इस घोषणा में तत्काल स्वशासन देने का कोई वचन नहीं दिया गया था, फिर भी यह भारतीय संवैधानिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुई। इसी घोषणा के आधार पर आगे चलकर मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) तैयार की गई।

➣ इसके परिणामस्वरूप भारत सरकार अधिनियम, 1919 लागू हुआ। इसलिए मॉन्टेग्यू घोषणा को भारतीय संवैधानिक सुधारों की दिशा में पहला आधिकारिक ब्रिटिश आश्वासन माना जाता है।

➣ भारत परिषद अधिनियम, 1909 से लेकर भारत सरकार अधिनियम, 1919 तक की प्रमुख संवैधानिक घटनाओं का क्रम और उनके आपसी संबंध को नीचे दिए गए फ्लो डायग्राम से आसानी से समझा जा सकता है।

भारत परिषद अधिनियम, 1909 (सीमित सुधार)
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मॉन्टेग्यू घोषणा, 1917 (आगे और सुधारों की घोषणा)
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मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट, 1918 (सुधारों की सिफारिश)
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भारत सरकार अधिनियम, 1919 (सुधार लागू किए गए)

➣ इन सभी संवैधानिक सुधारों का उद्देश्य भारतीयों की भागीदारी बढ़ाना था, किन्तु वास्तविक नियंत्रण ब्रिटिश सरकार, वायसराय और गवर्नरों के पास ही बना रहा।

पृष्ठभूमि

➣ 20 अगस्त 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा किसी एक घटना का परिणाम नहीं थी, बल्कि प्रथम विश्व युद्ध, भारत में बढ़ती राष्ट्रवादी चेतना, होमरूल आंदोलन और लखनऊ समझौते जैसी राजनीतिक परिस्थितियों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम थी।

➣ इन घटनाओं के कारण ब्रिटिश सरकार पर भारतीयों को संवैधानिक सुधारों और स्वशासन की दिशा में आगे बढ़ने का आश्वासन देने का दबाव बढ़ता गया।

प्रथम विश्व युद्ध और भारत की बढ़ती राजनीतिक अपेक्षाएँ

➣ 1914 ई. में प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ होने पर भारत ने ब्रिटिश साम्राज्य का व्यापक सहयोग किया। बड़ी संख्या में भारतीय सैनिकों ने युद्ध में भाग लिया तथा भारतीय जनता और देशी रियासतों ने धन, सामग्री और अन्य संसाधनों के रूप में भी सहायता प्रदान की।

➣ भारत ने युद्ध में लगभग 13 लाख सैनिकों एवं श्रमिकों का योगदान दिया तथा युद्ध-ऋण (War Loan) के रूप में लगभग 10 करोड़ पाउंड की आर्थिक सहायता ब्रिटिश सरकार को दी। इस दौरान भारतीय सैनिकों को भारी जन-हानि भी उठानी पड़ी।

➣ इस सहयोग के बदले भारतीय नेताओं को आशा थी कि ब्रिटिश सरकार भारत में राजनीतिक सुधारों और स्वशासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाएगी।

➣ युद्ध के दौरान भारतीय राजनीति भी अधिक सक्रिय होती गई। 1916 के लखनऊ समझौते ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग को संवैधानिक सुधारों की संयुक्त मांग के लिए एक मंच पर ला दिया। कांग्रेस ने भारत में स्वशासन की दिशा में शीघ्र प्रगति की मांग को भी अधिक स्पष्ट रूप से सामने रखा।

होमरूल आंदोलन और राष्ट्रवादी दबाव

➣ 1916 ई. में बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट के नेतृत्व में होमरूल आंदोलन ने भारत में स्वशासन की मांग को व्यापक बनाया। आंदोलन के प्रचार, राजनीतिक सभाओं और जनजागरण से स्वशासन का प्रश्न भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गया।

➣ 1917 में एनी बेसेंट की नजरबंदी के बाद होमरूल आंदोलन के पक्ष में देशव्यापी राजनीतिक प्रतिक्रिया और तेज हुई। इससे ब्रिटिश सरकार को यह अनुभव होने लगा कि भारतीय राजनीतिक आकांक्षाओं की उपेक्षा करना परिस्थितियों को और गंभीर बना सकता है।

➣ समकालीन विवरणों में भी होमरूल आंदोलन और लखनऊ समझौते को 20 अगस्त 1917 की घोषणा की पृष्ठभूमि से जोड़ा गया है।

ब्रिटिश सरकार की नीति में परिवर्तन

➣ युद्धकालीन परिस्थितियों, भारत की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता और कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग की संयुक्त मांगों के बीच ब्रिटिश सरकार ने भारत की संवैधानिक नीति पर पुनर्विचार किया।

➣ इससे पहले मेसोपोटामिया (कूत) में ब्रिटिश-भारतीय सेना की पराजय को लेकर हुई आलोचना के कारण तत्कालीन भारत सचिव ऑस्टेन चेम्बरलेन ने जुलाई 1917 में त्यागपत्र दे दिया था। इसी पृष्ठभूमि में 17 जुलाई 1917 को एडविन सैमुअल मॉन्टेग्यू को नया भारत सचिव नियुक्त किया गया। उन्होंने भारतीय प्रशासन-व्यवस्था की खुलकर आलोचना करते हुए इसमें भारतीय राजनीतिक प्रश्न पर अधिक स्पष्ट नीति अपनाने की दिशा में काम किया।

➣ अंततः 20 अगस्त 1917 को मॉन्टेग्यू ने ब्रिटिश संसद में घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार की नीति भारत में भारतीयों की प्रशासन में बढ़ती भागीदारी तथा उत्तरदायी शासन की क्रमिक स्थापना की दिशा में आगे बढ़ना है।

➣ यही घोषणा आगे चलकर मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों और भारत सरकार अधिनियम, 1919 की आधारभूमि बनी।

मॉन्टेग्यू घोषणा (20 अगस्त 1917)

➣ 20 अगस्त 1917 को तत्कालीन भारत सचिव एडविन सैमुअल मॉन्टेग्यू ने ब्रिटिश संसद में भारत की भावी शासन-व्यवस्था के संबंध में एक महत्वपूर्ण घोषणा की। इतिहास में यह मॉन्टेग्यू घोषणा अथवा अगस्त घोषणा के नाम से प्रसिद्ध है।

➣ मॉन्टेग्यू घोषणा का उद्देश्य भारतीयों को यह विश्वास दिलाना था कि ब्रिटिश सरकार भारत में राजनीतिक सुधार लागू करने तथा भविष्य में उत्तरदायी शासन की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रतिबद्ध है।

घोषणा का मूल कथन

➣ मॉन्टेग्यू ने घोषणा में कहा कि ब्रिटिश सरकार की नीति का उद्देश्य-भारत के शासन के प्रत्येक विभाग में भारतीयों की भागीदारी को क्रमशः बढ़ाना तथा ब्रिटिश साम्राज्य के अभिन्न अंग के रूप में भारत में उत्तरदायी शासन की क्रमिक स्थापना करना है।

अंग्रेजी में इस घोषणा का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य था-
The gradual development of self-governing institutions with a view to the progressive realisation of responsible government in India as an integral part of the British Empire.

➣ इस मुख्य वाक्य के आगे घोषणा में दो अन्य महत्वपूर्ण उपबंध भी जोड़े गए थे, जो इसकी सीमाओं को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं-

➣ पहला, यह कि इस दिशा में प्रगति केवल क्रमिक चरणों में ही हो सकती है। दूसरा, और सबसे महत्वपूर्ण यह कि- The British Government and the Government of India… must be the judges of the time and measure of each advance अर्थात् प्रत्येक अगले कदम के समय तथा सीमा का निर्णय स्वयं ब्रिटिश सरकार तथा भारत सरकार ही करेगी, न कि भारतीय जनता या उसके निर्वाचित प्रतिनिधि। यही वाक्यांश आगे चलकर घोषणा की सबसे अधिक आलोचना का आधार बना।

➣ घोषणा में यह भी उल्लेखनीय संकेत दिया गया कि भारत में स्वशासन की मांग करना अब राजद्रोह नहीं माना जाएगा– यह मॉर्ले-मिंटो सुधारों (1909) की तुलना में एक स्पष्ट नीतिगत बदलाव था, जब ऐसी मांगों को संदेह की दृष्टि से देखा जाता था।

घोषणा के प्रमुख बिंदु (सार-संक्षेप)

➣ उपर्युक्त कथन का सार संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है-

  • भारत के प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ाई जाएगी।
  • भारत में स्वशासी संस्थाओं का क्रमिक विकास किया जाएगा।
  • भारत में उत्तरदायी शासन स्थापित करने की दिशा में धीरे-धीरे कदम उठाए जाएंगे।
  • भारत, ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बना रहेगा और सभी सुधार उसी के अंतर्गत किए जाएंगे।
  • राजनीतिक सुधारों को चरणबद्ध तरीके से तथा ब्रिटिश सरकार के विवेकाधीन समय-सीमा पर लागू किया जाएगा।
  • भारत में स्वशासन की मांग को अब राजनीतिक रूप से वैध माँग माना जाएगा, न कि राजद्रोह।

घोषणा का वास्तविक आशय

➣ इस घोषणा में तत्काल स्वशासन या पूर्ण स्वतंत्रता का कोई वचन नहीं दिया गया था। ब्रिटिश सरकार ने केवल यह आश्वासन दिया कि भारत में राजनीतिक सुधार धीरे-धीरे लागू किए जाएंगे।

➣ साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि इन सुधारों की गति, सीमा और समय का निर्धारण ब्रिटिश सरकार ही करेगी। अर्थात् भारतीयों को कोई निश्चित समय-सीमा या संवैधानिक अधिकार प्रदान नहीं किए गए।

➣ ध्यान देने योग्य है कि घोषणा में प्रयुक्त शब्द उत्तरदायी शासन का तकनीकी अर्थ केवल प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाना भर नहीं, बल्कि ऐसी शासन-व्यवस्था है जिसमें कार्यपालिका निर्वाचित विधायिका के प्रति जवाबदेह हो। मॉर्ले-मिंटो सुधारों (1909) में परिषदों को केवल प्रश्न पूछने व चर्चा करने जैसे सीमित अधिकार मिले थे, जबकि 1917 की घोषणा में पहली बार यह स्वीकार किया गया कि अंतिम लक्ष्य कार्यपालिका को विधायिका के प्रति उत्तरदायी बनाना है, भले ही इसकी कोई समय-सीमा तय न हो।

आधारभारत परिषद अधिनियम, 1909मॉन्टेग्यू घोषणा, 1917
घोषित लक्ष्यसीमित प्रशासनिक भागीदारीउत्तरदायी शासन की क्रमिक स्थापना
स्वरूपविधिक अधिनियम (कानून)नीतिगत घोषणा, स्वयं में कानून नहीं
समय-सीमानिर्दिष्ट नहींनिर्दिष्ट नहीं
आगे का परिणाममॉन्टेग्यू घोषणा (1917) का मार्ग प्रशस्त कियामॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) व भारत सरकार अधिनियम, 1919 का आधार बनी

भारतीय संवैधानिक इतिहास में महत्व

➣ मॉन्टेग्यू घोषणा पहली ऐसी आधिकारिक ब्रिटिश घोषणा थी, जिसमें उत्तरदायी शासन को भारत की भावी संवैधानिक नीति का स्पष्ट एवं घोषित लक्ष्य स्वीकार किया गया।

➣ इससे पहले 1858 की महारानी विक्टोरिया की उद्घोषणा में केवल प्रशासनिक सेवाओं में भेदभाव न करने का आश्वासन दिया गया था, तथा 1909 के भारत परिषद अधिनियम में भी परिषदों को केवल सीमित परामर्शी अधिकार ही दिए गए थे। इसकी तुलना में 1917 की घोषणा पहली बार भारत के अंतिम संवैधानिक लक्ष्य (उत्तरदायी शासन) को स्पष्ट शब्दों में परिभाषित करती है।

➣ इसी घोषणा के आधार पर मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) तैयार की गई, जिसके परिणामस्वरूप आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1919 लागू किया गया।

➣ इस प्रकार यह घोषणा केवल एक कथन मात्र नहीं, बल्कि आगामी तीन दशकों के संवैधानिक सुधारों (1919, 1935) की वैचारिक आधारशिला सिद्ध हुई।

भारतीय नेताओं की प्रतिक्रिया

➣ 20 अगस्त 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा का भारतीय राजनीतिक दलों और नेताओं ने सामान्य रूप से स्वागत किया, क्योंकि पहली बार ब्रिटिश सरकार ने आधिकारिक रूप से उत्तरदायी शासन को अपनी नीति का लक्ष्य स्वीकार किया था।

➣ इसी कारण इस घोषणा को 1858 की महारानी विक्टोरिया की उद्घोषणा के लगभग साठ वर्ष बाद भारत के संवैधानिक इतिहास में इतना महत्वपूर्ण माना गया कि इसे कभी-कभी भारत का मैग्नाकार्टा भी कहा जाता है।

➣ किन्तु घोषणा की अस्पष्ट भाषा, निश्चित समय-सीमा के अभाव तथा तत्काल स्वशासन का आश्वासन न दिए जाने के कारण अनेक नेताओं ने इसे अपर्याप्त भी माना।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रतिक्रिया

➣ घोषणा से पूर्व ही 28-29 जुलाई 1917 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी तथा मुस्लिम लीग परिषद की एक संयुक्त बैठक हुई, जिसमें दोनों संगठनों ने वायसराय तथा भारत सचिव को संयुक्त रूप से एक प्रतिवेदन भेजने का निर्णय लिया। इससे स्पष्ट होता है कि 1916 के लखनऊ समझौते के बाद बना कांग्रेस-लीग एकता ही मॉन्टेग्यू घोषणा के लिए दबाव का एक प्रमुख स्रोत थी।

➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 20 अगस्त 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा का सामान्य रूप से स्वागत किया, क्योंकि पहली बार ब्रिटिश सरकार ने आधिकारिक रूप से भारत में संवैधानिक सुधारों तथा उत्तरदायी शासन की दिशा में आगे बढ़ने की घोषणा की थी।

➣ साथ ही कांग्रेस ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल घोषणा पर्याप्त नहीं है। भारतीयों को शीघ्र वास्तविक राजनीतिक अधिकार तथा उत्तरदायी शासन प्रदान किया जाना चाहिए।

➣ दिसंबर 1917 में आयोजित कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (32वाँ अधिवेशन) में घोषणा की अस्पष्ट भाषा तथा सुधारों के लिए कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित न किए जाने पर निराशा व्यक्त की गई। साथ ही, कांग्रेस ने भारत में शीघ्र होमरूल (गृह-शासन) स्थापित करने की मांग दोहराई।

➣ घोषणा के बाद नवंबर 1917 में एडविन सैमुअल मॉन्टेग्यू भारत आए और वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड के साथ मिलकर भारतीय नेताओं से विस्तृत विचार-विमर्श किया। इस दौरान उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना तथा मोहनदास करमचंद गांधी सहित अनेक प्रमुख नेताओं से भी व्यक्तिगत रूप से भेंट की।

➣ इन चर्चाओं के आधार पर जुलाई 1918 में मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (आधिकारिक शीर्षक- Report on Indian Constitutional Reforms) प्रकाशित की गई।

➣ इसकी समीक्षा के लिए कांग्रेस ने अगस्त 1918 में बंबई में एक विशेष अधिवेशन आयोजित किया, जिसकी अध्यक्षता सैयद हसन इमाम ने की।

➣ इस अधिवेशन में मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट को अपर्याप्त, असंतोषजनक तथा निराशाजनक (Inadequate, Unsatisfactory and Disappointing) घोषित किया गया तथा इसके स्थान पर प्रभावी स्वशासन की मांग की गई।

➣ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट को लेकर कांग्रेस के भीतर पुनः मतभेद उभर आए। सुरेंद्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में नरमपंथी नेताओं ने नवंबर 1918 में आयोजित एक पृथक सम्मेलन में प्रस्तावित सुधारों का समर्थन किया, जबकि बाल गंगाधर तिलक, एनी बेसेंट तथा अन्य उग्रवादी नेताओं ने इन्हें अपर्याप्त मानते हुए आलोचना जारी रखी।

➣ परिणामस्वरूप सुरेंद्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में नरमपंथी नेता कांग्रेस से अलग होकर भारतीय राष्ट्रीय उदारवादी संघ के रूप में संगठित हो गए, जिसके प्रमुख नेताओं में तेज बहादुर सप्रू तथा वी.एस. श्रीनिवास शास्त्री भी शामिल थे।

बाल गंगाधर तिलक की प्रतिक्रिया

➣ बाल गंगाधर तिलक ने प्रारम्भ में मॉन्टेग्यू घोषणा का स्वागत किया, क्योंकि पहली बार ब्रिटिश सरकार ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया था कि भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी शासन की दिशा में आगे बढ़ा जाएगा। किन्तु शीघ्र ही तिलक इस घोषणा से असंतुष्ट हो गए।

➣ उनका मत था कि इसमें केवल भविष्य के सुधारों का आश्वासन दिया गया है, जबकि न तो सुधारों की कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित की गई थी और न ही यह स्पष्ट किया गया था कि उत्तरदायी शासन की दिशा में अगला कदम कब और कैसे उठाया जाएगा।

➣ दिसम्बर 1917 में आयोजित कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन, जिसकी अध्यक्षता एनी बेसेंट ने की, तिलक तथा अन्य उग्रवादी नेताओं ने मॉन्टेग्यू घोषणा की तीखी आलोचना की।

➣ तिलक ने इसे अयोग्य और निराशाजनक – एक सूर्यविहीन उषाकाल (Unworthy and Disappointing – A Sunless Dawn) कहा। उनका आशय था कि घोषणा में आकर्षक शब्द तो हैं, परन्तु भारतीयों को वास्तविक राजनीतिक अधिकार देने की स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं है।

➣ तिलक का दृढ़ विश्वास था कि स्वराज्य भारतीयों का जन्मसिद्ध अधिकार है, इसलिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार से केवल आश्वासनों के बजाय स्पष्ट, ठोस और समयबद्ध संवैधानिक सुधारों की मांग की।

एनी बेसेंट की प्रतिक्रिया

➣ जून 1917 में एनी बेसेंट को होमरूल आंदोलन के कारण ऊटकमंड में नजरबंद कर दिया गया था, परंतु देश-विदेश में हुए व्यापक विरोध के दबाव में सितंबर 1917 में (मॉन्टेग्यू घोषणा, 20 अगस्त 1917 के तुरंत बाद) उन्हें रिहा कर दिया गया। इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने घोषणा पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की।

➣ एनी बेसेंट ने घोषणा का स्वागत तो किया, किन्तु बाल गंगाधर तिलक की तरह वे भी इससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं थीं। उनका मत था कि केवल भविष्य के आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं। भारत को स्पष्ट और शीघ्र स्वशासन की दिशा में आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

➣ दिसंबर 1917 में आयोजित कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (32वाँ अधिवेशन) में एनी बेसेंट भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष चुनी गईं।

➣ अपने अध्यक्षीय भाषण द केस फॉर इंडिया में उन्होंने मॉन्टेग्यू घोषणा की आलोचना करते हुए कहा कि यह इंग्लैंड के प्रस्तुत करने और भारत के स्वीकार करने, दोनों के लिए अयोग्य है (Unworthy of England to offer and India to accept)।

➣ एनी बेसेंट का मानना था कि यदि ब्रिटिश सरकार वास्तव में भारत के प्रति ईमानदार है, तो उसे केवल घोषणाएँ करने के बजाय स्पष्ट, प्रभावी और समयबद्ध संवैधानिक सुधार लागू करने चाहिए। उन्होंने अपने भाषण में यह भी कहा कि जिस प्रकार युद्ध में विजय के लिए स्वतंत्रता आवश्यक है, उसी प्रकार भारत की प्रगति के लिए होमरूल अनिवार्य है।

मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया

➣ अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने भी कांग्रेस की तरह मॉन्टेग्यू घोषणा का स्वागत किया और आशा व्यक्त की कि इसके आधार पर भारत में संवैधानिक सुधारों की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

➣ 1916 के लखनऊ समझौते के बाद कांग्रेस और लीग की संयुक्त मांगों को देखते हुए लीग ने इस घोषणा को अपने राजनीतिक प्रयासों की आंशिक सफलता के रूप में भी देखा।

➣ 30 दिसंबर 1917 – 1 जनवरी 1918 को कलकत्ता में आयोजित लीग के दसवें अधिवेशन की अध्यक्षता प्रथम विश्व युद्ध-विरोधी गतिविधियों के आरोप में नज़रबंद मोहम्मद अली जौहर को (अनुपस्थिति में) सौंपी गई थी।

➣ इस अधिवेशन में मोहम्मद अली जौहर, शौकत अली, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद तथा मौलाना हसरत मोहानी जैसे नज़रबंद नेताओं की रिहाई की मांग करने वाले प्रस्ताव पारित किए गए।

➣ मोहम्मद अली जिन्ना सहित लीग के अनेक नेताओं ने घोषणा को एक सकारात्मक कदम माना, किन्तु उनका मत था कि भविष्य के संवैधानिक सुधारों में सभी समुदायों, विशेषकर मुस्लिम समुदाय, को उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए तथा 1909 और 1916 में स्वीकृत पृथक निर्वाचन प्रणाली को बनाए रखा जाना चाहिए।

➣ जुलाई 1918 में मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद लीग ने भी, कांग्रेस के समानांतर, 31 अगस्त – 1 सितंबर 1918 को बंबई में एक विशेष अधिवेशन आयोजित किया, जिसकी अध्यक्षता मोहम्मद अली मोहम्मद खान ने की।

➣ इस अधिवेशन में रिपोर्ट की उस टिप्पणी पर कड़ा विरोध दर्ज कराया गया जिसमें यह संकेत दिया गया था कि भारत की जनता अभी उत्तरदायी शासन के लिए उपयुक्त नहीं है।

➣ लीग ने घोषणा का समर्थन करते हुए भी इस बात पर बल दिया कि भविष्य में होने वाले संवैधानिक सुधारों में मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व की पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

गैर-ब्राह्मण आंदोलन (जस्टिस पार्टी) तथा दलित वर्गों की प्रतिक्रिया

➣ मद्रास प्रेसीडेंसी में 1916 में गठित दक्षिण भारतीय उदारवादी संघ (जो आगे चलकर अपनी पत्रिका जस्टिस के नाम पर जस्टिस पार्टी कहलाई) ने कांग्रेस तथा होमरूल आंदोलन के नेतृत्व पर ब्राह्मण वर्चस्व का आरोप लगाया तथा गैर-ब्राह्मणों के लिए अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग की।

➣ मॉन्टेग्यू घोषणा के तुरंत बाद 19 अगस्त 1917 को कोयंबटूर में जस्टिस पार्टी का पहला बड़ा सम्मेलन आयोजित हुआ।

➣ पार्टी के नेता पी. त्यागराय चेट्टी ने मॉन्टेग्यू को तार भेजकर मांग की कि जिस प्रकार 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों में मुसलमानों को पृथक निर्वाचन प्रणाली दी गई थी, उसी प्रकार गैर-ब्राह्मणों को भी प्रांतीय विधान परिषदों में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व दिया जाए।

➣ 14 दिसंबर 1917 को मॉन्टेग्यू मद्रास पहुँचे और विभिन्न पक्षों के विचार सुने। मद्रास के गवर्नर लॉर्ड पेंटलैंड ने गैर-ब्राह्मणों के लिए सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का समर्थन किया, किन्तु मॉन्टेग्यू इतने व्यापक स्तर पर सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के पक्ष में नहीं थे।

➣ परिणामस्वरूप मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (जुलाई 1918) में गैर-ब्राह्मणों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग को अस्वीकार कर दिया गया, यद्यपि आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत मद्रास विधान परिषद में गैर-ब्राह्मणों के लिए आरक्षित स्थानों की व्यवस्था की गई।

➣ जस्टिस पार्टी के विरोध में कांग्रेस से जुड़े गैर-ब्राह्मण नेताओं-जिनमें पेरियार ई.वी. रामासामी भी शामिल थे-ने 20 सितंबर 1917 को मद्रास प्रेसीडेंसी एसोसिएशन का गठन किया, ताकि कांग्रेस के भीतर रहते हुए ही गैर-ब्राह्मणों के हितों की रक्षा की जा सके।

➣ इसी दौर में दलित वर्गों की राजनीतिक चेतना भी सक्रिय होने लगी थी। 1916 में आयोजित एक सम्मेलन में दलित वर्गों की वास्तविक स्थिति की जाँच तथा उनके हितों की सुरक्षा हेतु उपायों की मांग की गई थी।

➣ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की पृष्ठभूमि में दलित वर्गों तथा गैर-ब्राह्मण आंदोलन के बीच एक राजनीतिक निकटता भी बनी, जो आगे चलकर दक्षिण बरो समिति (1919) के समक्ष दलित वर्गों के लिए पृथक प्रतिनिधित्व की मांग में परिणत हुई।

महात्मा गांधी की प्रतिक्रिया

➣ अगस्त 1917 में मॉन्टेग्यू घोषणा के समय मोहनदास करमचंद गांधी भारतीय राष्ट्रीय राजनीति में अपेक्षाकृत नए ही थे तथा उस समय वे चंपारण सत्याग्रह (1917) तथा आगे खेड़ा एवं अहमदाबाद मिल सत्याग्रह (1918) जैसे स्थानीय जन-आंदोलनों में सक्रिय थे। इसलिए संवैधानिक सुधारों के प्रश्न पर उनकी सार्वजनिक प्रतिक्रिया आरम्भ में अपेक्षाकृत संयत रही।

➣ मॉन्टेग्यू ने भारत यात्रा के दौरान गांधीजी से भी भेंट की थी। बाद में जब मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) प्रकाशित हुई, तो गांधीजी ने भी इसे भारतीयों की वास्तविक राजनीतिक आकांक्षाओं के अनुरूप अपर्याप्त माना, यद्यपि इस दौरान वे युद्ध में ब्रिटिश सरकार के प्रति सहयोग की नीति पर बल दे रहे थे।

यूरोपीय समुदाय तथा निष्ठावान वर्गों की प्रतिक्रिया

➣ भारत में बसे यूरोपीय तथा एंग्लो-इंडियन समुदाय तथा सरकार के प्रति निष्ठावान वर्गों ने मॉन्टेग्यू घोषणा तथा प्रस्तावित सुधारों को राष्ट्रवादी नेताओं के विपरीत दृष्टिकोण से देखा।

➣ उनका मत था कि बिना समुचित कार्यकारी उत्तरदायित्व के निर्वाचित बहुमत को शीघ्रता से अधिकार सौंपना प्रशासनिक अस्थिरता उत्पन्न कर सकता है।

➣ इन वर्गों की चिंताओं को भी दृष्टिगत रखते हुए आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1919 में सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों तथा यूरोपीय समुदाय के लिए भी पृथक निर्वाचन की व्यवस्था की गई, जिससे सांप्रदायिक तथा वर्गीय प्रतिनिधित्व का दायरा 1909 की तुलना में और व्यापक हो गया।

मॉन्टेग्यू घोषणा की आलोचना/सीमा

➣ यद्यपि मॉन्टेग्यू घोषणा (1917) भारतीय संवैधानिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जाती है, फिर भी तत्कालीन भारतीय नेताओं और बाद के इतिहासकारों ने इसकी अनेक आधारों पर आलोचना की।

➣ उनका मत था कि यह घोषणा भारतीयों को संतुष्ट करने का एक राजनीतिक आश्वासन अधिक थी, जबकि इसमें वास्तविक सत्ता हस्तांतरण की कोई स्पष्ट योजना नहीं थी।

प्रारूपण में ही सीमा – लॉर्ड कर्जन की भूमिका

➣ ऐतिहासिक अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि घोषणा की सीमाएँ इसके प्रारूपण के स्तर पर ही तय कर दी गई थीं। मॉन्टेग्यू ने मूलतः अपने प्रस्तावित वक्तव्य में स्वशासन की दिशा में कार्य करने पर अधिक बल दिया था।

➣ युद्ध मंत्रिमंडलके सदस्य तथा भारत के भूतपूर्व वायसराय लॉर्ड कर्जन का मत था कि यह शब्दावली आवश्यकता से अधिक उदार है। उन्होंने इसके स्थान पर अपेक्षाकृत सीमित एवं सतर्क शब्द उत्तरदायी शासन प्रस्तावित किया, जिसे युद्ध मंत्रिमंडल ने मॉन्टेग्यू के मूल प्रारूप के स्थान पर स्वीकार कर लिया।

➣ इस प्रकार जिस घोषणा को भारतीयों की आकांक्षाओं का प्रतीक माना गया, वह वस्तुतः प्रारम्भ से ही एक सतर्कतापूर्वक सीमित की गई प्रतिबद्धता थी।

वैधानिक दर्जे का अभाव

➣ मॉन्टेग्यू घोषणा स्वयं में कोई विधिक अथवा संवैधानिक दस्तावेज़ नहीं थी, बल्कि केवल ब्रिटिश मंत्रिमंडल की एक नीतिगत वक्तव्य थी, जिसे हाउस ऑफ कॉमन्स में पढ़कर सुनाया गया था।

➣ जब तक इसे भारत सरकार अधिनियम, 1919 के रूप में विधिक स्वरूप नहीं दिया गया, तब तक यह भारतीयों के लिए किसी भी प्रकार से लागू करने योग्य नहीं थी।

उत्तरदायी शासन का अस्पष्ट वादा

➣ घोषणा में भारत में उत्तरदायी शासन (Responsible Government) स्थापित करने की बात कही गई, किन्तु यह नहीं बताया गया कि इसे कब और किस प्रकार लागू किया जाएगा।

➣ Progressive Realisation अर्थात् क्रमिक रूप से शब्द का प्रयोग जानबूझकर किया गया था, जिससे ब्रिटिश सरकार भविष्य में अपनी सुविधानुसार सुधारों की गति निर्धारित कर सके। परिणामस्वरूप भारतीय नेताओं ने इसे एक अस्पष्ट एवं अनिश्चित आश्वासन माना।

स्वशासन की कोई निश्चित समय-सीमा नहीं

➣ घोषणा में स्वशासन की दिशा में आगे बढ़ने की बात तो कही गई, किन्तु इसके लिए कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई।

➣ भारतीय नेताओं का मानना था कि यदि ब्रिटिश सरकार वास्तव में राजनीतिक सुधार लागू करना चाहती है, तो उसे उनके लिए स्पष्ट कार्यक्रम और समय-सीमा भी घोषित करनी चाहिए थी।

ब्रिटिश सरकार का पूर्ण नियंत्रण बना रहा

➣ घोषणा में यह स्पष्ट कर दिया गया कि भारत में संवैधानिक सुधारों की गति, सीमा तथा स्वरूप का निर्णय ब्रिटिश सरकार ही करेगी।

➣ अर्थात् भारतीयों को किसी संवैधानिक अधिकार की गारंटी नहीं दी गई, बल्कि सभी सुधार ब्रिटिश सरकार की इच्छा पर निर्भर रहे। इससे स्पष्ट था कि अंतिम सत्ता अभी भी ब्रिटिश संसद और ब्रिटिश सरकार के हाथों में ही रहने वाली थी।

तत्काल राजनीतिक सुधारों का अभाव

➣ मॉन्टेग्यू घोषणा केवल एक नीतिगत घोषणा थी। इसमें न तो किसी नए संवैधानिक सुधार को तत्काल लागू किया गया और न ही भारतीयों को कोई नया राजनीतिक अधिकार प्रदान किया गया।

➣ इसलिए अनेक राष्ट्रवादी नेताओं ने इसे वादा अधिक, अधिकार कम वाली घोषणा माना।

सांप्रदायिक विभाजन को और गहरा करना

➣ घोषणा के आधार पर लागू सुधारों ने “उत्तरदायी शासन” की दिशा में बढ़ते हुए भी प्रतिनिधित्व का आधार धर्म एवं जाति पर आधारित सांप्रदायिक निर्वाचन-मंडलों को ही अधिक व्यापक बना दिया- मुसलमानों के अतिरिक्त अब सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों, यूरोपीय समुदाय तथा गैर-ब्राह्मणों तक भी पृथक्/आरक्षित प्रतिनिधित्व का दायरा बढ़ा दिया गया।

➣ आलोचकों का मत है कि इससे भारतीय राष्ट्रवाद की एकता की भावना कमजोर हुई तथा फूट डालो और शासन करो की नीति को संस्थागत आधार मिला, जिसके दूरगामी परिणाम आगे चलकर सांप्रदायिक राजनीति के रूप में सामने आए।

भारतीय राष्ट्रवाद को शांत करने का प्रयास

➣ कुछ इतिहासकारों का मत है कि प्रथम विश्व युद्ध, होमरूल आंदोलन तथा बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन के कारण ब्रिटिश सरकार दबाव में थी। ऐसे समय में मॉन्टेग्यू घोषणा का उद्देश्य भारतीय जनता को तत्काल कुछ ठोस अधिकार देना नहीं, बल्कि राजनीतिक असंतोष को अस्थायी रूप से शांत करना था।

➣ इस दृष्टि से घोषणा को ब्रिटिश सरकार की एक राजनीतिक एवं कूटनीतिक रणनीति भी माना जाता है।

इतिहासकारों का मूल्यांकन

➣ आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि मॉन्टेग्यू घोषणा ने पहली बार उत्तरदायी शासन को ब्रिटिश नीति का घोषित लक्ष्य अवश्य बनाया, किन्तु इसके साथ ही ब्रिटिश सरकार ने सुधारों की पूरी प्रक्रिया अपने नियंत्रण में रखी।

➣ इसलिए यह घोषणा भारतीय संवैधानिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण आरम्भ तो थी, परन्तु यह भारतीयों की स्वशासन संबंधी आकांक्षाओं को तत्काल पूरा करने में असफल रही।

▪ मॉन्टेग्यू घोषणा का सबसे बड़ा सकारात्मक पक्ष यह था कि ब्रिटिश सरकार ने पहली बार भारत में उत्तरदायी शासन को अपनी आधिकारिक नीति के रूप में स्वीकार किया। वहीं इसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि घोषणा में न तो कोई निश्चित समय-सीमा थी और न ही तत्काल सत्ता हस्तांतरण की स्पष्ट योजना, और इसका शब्द-चयन भी प्रारम्भ से ही (लॉर्ड कर्जन के हस्तक्षेप से) सतर्कतापूर्वक सीमित रखा गया था। इसलिए इसे भारतीय संवैधानिक इतिहास में आशा और निराशा-दोनों का प्रतीक माना जाता है।

मॉन्टेग्यू घोषणा के परिणाम

➣ 20 अगस्त 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा ने भारतीय संवैधानिक विकास की दिशा में एक नए चरण की शुरुआत की। यद्यपि इस घोषणा से भारतीयों को तत्काल कोई राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं हुए, फिर भी इसके आधार पर आगे अनेक संवैधानिक सुधार लागू किए गए। साथ ही, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन तथा ब्रिटिश शासन-नीति दोनों पर इसका दीर्घकालीन प्रभाव पड़ा।

मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918)

➣ घोषणा के बाद भारत सचिव एडविन मॉन्टेग्यू भारत आए और वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड के साथ मिलकर भारतीय नेताओं, प्रांतीय सरकारों तथा अन्य प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श किया।

➣ इन चर्चाओं के आधार पर जुलाई 1918 में मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट प्रकाशित की गई, जिसमें भारत में संवैधानिक सुधारों के लिए विस्तृत सिफारिशें प्रस्तुत की गईं। यही रिपोर्ट आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1919 का आधार बनी।

➣ रिपोर्ट की सिफारिशों को ठोस संवैधानिक स्वरूप देने के लिए तीन समितियाँ गठित की गईं- लॉर्ड साउथबरो की अध्यक्षता में फ्रैंचाइज़ी समिति (मताधिकार निर्धारण हेतु), रिचर्ड फीथम की अध्यक्षता में कार्य-विभाजन समिति (केंद्र व प्रांतों के मध्य विषयों के बंटवारे हेतु) तथा लॉर्ड क्रू की अध्यक्षता में गृह-प्रशासन समिति (लंदन स्थित भारत सचिव कार्यालय के प्रशासनिक ढाँचे हेतु)।

भारत सरकार अधिनियम, 1919

➣ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट के आधार पर ब्रिटिश संसद ने भारत सरकार अधिनियम, 1919 पारित किया, जिसे 23 दिसंबर 1919 को राजस्वीकृति प्राप्त हुई।

➣ यह मॉन्टेग्यू घोषणा के अनुरूप लागू किया गया पहला प्रमुख संवैधानिक सुधार था। अधिनियम की प्रस्तावना में यह दोहराया गया कि भारत ब्रिटिश साम्राज्य का अभिन्न अंग बना रहेगा तथा उत्तरदायी शासन की क्रमिक स्थापना ही ब्रिटिश नीति का लक्ष्य है।

➣ इस अधिनियम के माध्यम से आठ प्रमुख प्रांतों (बंगाल, बिहार-उड़ीसा, मध्य प्रांत, संयुक्त प्रांत, बंबई, मद्रास, पंजाब तथा असम) में द्वैध शासन लागू किया गया, जिसके अंतर्गत प्रांतीय विषयों को दो भागों में बाँटा गया-

विषय-श्रेणीउदाहरणप्रशासन
आरक्षित विषय (Reserved)कानून-व्यवस्था, वित्त, भू-राजस्व, सिंचाई, पुलिस, जेलगवर्नर एवं उसकी कार्यकारिणी परिषद द्वारा, विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी नहीं
हस्तांतरित विषय (Transferred)शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, स्थानीय स्वशासनगवर्नर द्वारा भारतीय मंत्रियों की सहायता से, विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी

➣ प्रांतीय विधान परिषदों का विस्तार किया गया तथा उनमें लगभग 70 प्रतिशत सदस्य प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने जाने लगे- यह भारत में प्रत्यक्ष निर्वाचन के सिद्धांत की पहली शुरुआत थी। मताधिकार भूमि-कर, संपत्ति अथवा शिक्षा जैसी शर्तों पर आधारित था और अत्यंत सीमित रहा- कुल लगभग 50-55 लाख मतदाताओं (जनसंख्या के लगभग 3 प्रतिशत) को ही मताधिकार प्राप्त हुआ। पहली बार कुछ शर्तों के साथ महिलाओं को भी मताधिकार दिया गया। मद्रास 1921 में महिलाओं को मताधिकार देने वाला पहला प्रांत बना।

➣ केंद्र में पहली बार द्विसदनीय विधायिका की स्थापना की गई- निम्न सदन केंद्रीय विधान सभा (145 सदस्य, 3 वर्ष का कार्यकाल) तथा उच्च सदन राज्य परिषद (60 सदस्य, 5 वर्ष का कार्यकाल)। किन्तु केंद्र में वास्तविक कार्यपालिका शक्ति अब भी वायसराय तथा उसकी कार्यकारिणी परिषद के पास ही रही।

➣ वायसराय के पास अस्वीकृत विधेयकों को प्रमाणित करने, अध्यादेश जारी करने तथा बजट में की गई कटौतियों को पुनर्स्थापित करने की शक्तियाँ बनी रहीं, जिससे केंद्रीय विधायिका का वायसराय पर कोई वास्तविक नियंत्रण नहीं था।

➣ अधिनियम में लोक सेवा आयोग की स्थापना का भी प्रावधान किया गया (जिसकी वास्तविक स्थापना 1926 में हुई) तथा प्रांतीय बजट को केंद्रीय बजट से पृथक कर प्रांतों को कुछ वित्तीय स्वायत्तता दी गई।

➣ अधिनियम में एक महत्वपूर्ण पुनरीक्षण उपबंध भी शामिल किया गया, जिसके अनुसार दस वर्ष पश्चात् (अर्थात् 1929 में) सुधारों की प्रगति की समीक्षा हेतु एक सांविधिक आयोग नियुक्त किया जाना था। इसी प्रावधान के आधार पर आगे चलकर 1927 में साइमन कमीशन का गठन हुआ (निर्धारित समय से पूर्व ही)।

राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव

➣ मॉन्टेग्यू घोषणा से भारतीय नेताओं को प्रारम्भ में आशा अवश्य मिली कि ब्रिटिश सरकार धीरे-धीरे उत्तरदायी शासन की ओर बढ़ेगी।

➣ किन्तु जब घोषणा के अनुरूप अपेक्षित राजनीतिक अधिकार नहीं मिले और भारत सरकार अधिनियम, 1919 भी सीमित तथा जटिल द्वैध शासन-व्यवस्था तक सिमटा रह गया, तो भारतीयों में गहरा असंतोष उत्पन्न हुआ।

➣ परिणामस्वरूप भारतीय नेतृत्व में यह विश्वास मजबूत होने लगा कि केवल संवैधानिक याचना तथा वार्ता से पर्याप्त राजनीतिक अधिकार नहीं मिल सकते, और व्यापक जन-आंदोलन की आवश्यकता है।

➣ आगे चलकर रॉलेट एक्ट (1919), जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919) तथा असहयोग आंदोलन (1920) जैसी घटनाओं ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को अधिक व्यापक, उग्र तथा जन-आधारित स्वरूप प्रदान किया और मॉन्टेग्यू घोषणा द्वारा जगाई गई आशा को गहरे मोहभंग में बदल दिया।

ब्रिटिश नीति में परिवर्तन

➣ मॉन्टेग्यू घोषणा पहली आधिकारिक ब्रिटिश घोषणा थी, जिसमें भारत के संबंध में उत्तरदायी शासन को दीर्घकालीन नीति के रूप में स्वीकार किया गया। इससे पहले ब्रिटिश सरकार केवल प्रशासनिक सुधारों तक ही सीमित रहती थी।

➣ यद्यपि इस घोषणा में स्वशासन की कोई निश्चित समय-सीमा नहीं दी गई थी, फिर भी इसके बाद होने वाले प्रमुख संवैधानिक सुधार-भारत सरकार अधिनियम, 1919 और भारत सरकार अधिनियम, 1935-इसी नीति की निरंतरता माने जाते हैं। इस दृष्टि से मॉन्टेग्यू घोषणा भारतीय संवैधानिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध हुई।

➣ 1917 में घोषित उत्तरदायी शासन का लक्ष्य क्रमिक संवैधानिक सुधारों की एक लंबी शृंखला के बाद अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता तथा 26 जनवरी 1950 को लागू हुए भारतीय संविधान के अंतर्गत पूर्ण उत्तरदायी एवं संसदीय शासन-प्रणाली की स्थापना के रूप में साकार हुआ।

भारतीय राजनीति में नई बहस की शुरुआत

➣ मॉन्टेग्यू घोषणा तथा उसके बाद के सीमित सुधारों ने भारतीय राजनीति में यह बहस तेज कर दी कि क्या केवल संवैधानिक सुधारों के माध्यम से स्वशासन प्राप्त किया जा सकता है, या इसके लिए व्यापक जन-आंदोलन आवश्यक होंगे।

➣ इसी बहस ने आगे चलकर कांग्रेस के भीतर उदारवादी तथा जन-आंदोलनकारी धाराओं के बीच स्पष्ट विभाजन को जन्म दिया- नरमपंथी नेता संवैधानिक साधनों में विश्वास रखते हुए भारतीय राष्ट्रीय उदारवादी संघ के रूप में अलग हो गए, जबकि शेष कांग्रेस आगे चलकर गांधीजी के नेतृत्व में जन-आंदोलन की राह पर अग्रसर हुई।

निष्कर्ष : मॉन्टेग्यू घोषणा का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह था कि पहली बार ब्रिटिश सरकार ने उत्तरदायी शासन को अपनी आधिकारिक नीति के रूप में स्वीकार किया।

➣ यद्यपि तत्काल स्वशासन नहीं मिला, फिर भी इसी घोषणा ने मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) और भारत सरकार अधिनियम, 1919 का मार्ग प्रशस्त किया तथा भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को अगले चरण की ओर अग्रसर किया।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • 20 अगस्त 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा को अगस्त घोषणा भी कहा जाता है।
  • घोषणा का मूल प्रारूप मॉन्टेग्यू ने स्वशासन पर बल देकर तैयार किया था, किन्तु युद्ध मंत्रिमंडल के सदस्य तथा भूतपूर्व वायसराय लॉर्ड कर्जन के सुझाव पर इसे अधिक सतर्क शब्द उत्तरदायी शासन में बदल दिया गया।
  • मॉन्टेग्यू घोषणा स्वयं में कोई विधिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक नीतिगत वक्तव्य थी। इसे लागू करने योग्य बनाने के लिए ही भारत सरकार अधिनियम, 1919 पारित करना पड़ा।
  • मॉन्टेग्यू घोषणा ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स में तत्कालीन भारत सचिव एडविन सैमुअल मॉन्टेग्यू द्वारा की गई थी।
  • घोषणा में स्पष्ट कहा गया था कि प्रगति केवल क्रमिक चरणों में होगी तथा British Government and the Government of India… must be the judges of the time and measure of each advance अर्थात् अगले कदम के समय व सीमा का निर्णय स्वयं ब्रिटिश सरकार करेगी।
  • मॉन्टेग्यू घोषणा में यह भी संकेत दिया गया कि भारत में स्वशासन की मांग करना अब राजद्रोह नहीं माना जाएगा– 1909 की तुलना में यह एक उल्लेखनीय नीतिगत बदलाव था।
  • एडविन सैमुअल मॉन्टेग्यू ब्रिटेन के पहले यहूदी (Jewish) भारत सचिव थे। उनकी नियुक्ति मेसोपोटामिया (कूत) में सैन्य पराजय के बाद पूर्व भारत सचिव ऑस्टेन चेम्बरलेन के त्यागपत्र देने के बाद हुई।
  • प्रथम विश्व युद्ध में भारत ने लगभग 13 लाख सैनिकों-श्रमिकों तथा लगभग 10 करोड़ पाउंड के युद्ध-ऋण का योगदान दिया था।
  • मॉन्टेग्यू घोषणा के समय भारत के वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड थे, जिनके साथ मिलकर आगे मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) (आधिकारिक शीर्षक- Report on Indian Constitutional Reforms) तैयार की गई।
  • नवंबर 1917 से अप्रैल 1918 के बीच मॉन्टेग्यू ने भारत का दौरा कर विभिन्न राजनीतिक नेताओं, प्रांतीय सरकारों तथा देशी रियासतों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श किया।
  • मॉन्टेग्यू घोषणा में Progressive Realisation of Responsible Government (उत्तरदायी शासन की क्रमिक स्थापना) की अवधारणा प्रस्तुत की गई थी।
  • मॉन्टेग्यू घोषणा ब्रिटिश सरकार की पहली आधिकारिक घोषणा थी, जिसमें भारत में उत्तरदायी शासन को दीर्घकालीन लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया गया।
  • इस घोषणा में पूर्ण स्वराज अथवा तत्काल स्वशासन का कोई वादा नहीं किया गया था और न ही सुधारों के लिए कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित की गई थी।
  • मॉन्टेग्यू घोषणा के आधार पर 1918 में मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिसके आधार पर आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1919 लागू किया गया।
  • मॉन्टेग्यू घोषणा को कभी-कभी भारत का मैग्नाकार्टा भी कहा जाता है, क्योंकि यह 1858 की महारानी विक्टोरिया की उद्घोषणा के लगभग साठ वर्ष बाद आई पहली बड़ी आधिकारिक ब्रिटिश नीति-घोषणा थी।
  • मद्रास प्रेसीडेंसी में जस्टिस पार्टी (मूल नाम- दक्षिण भारतीय उदारवादी संघ, स्थापना 1916) ने पी. त्यागराय चेट्टी के नेतृत्व में गैर-ब्राह्मणों के लिए 1909 जैसी पृथक निर्वाचन व्यवस्था की मांग की। इसे मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट में अस्वीकार किया गया, किन्तु भारत सरकार अधिनियम, 1919 में मद्रास परिषद में गैर-ब्राह्मणों के लिए आरक्षित स्थान दिए गए।
  • भारत सरकार अधिनियम, 1919 को 23 दिसंबर 1919 को राजस्वीकृति मिली। इसने आठ प्रमुख प्रांतों में द्वैध शासन (Dyarchy) लागू किया, जिसमें विषयों को आरक्षित (वित्त, कानून-व्यवस्था आदि) तथा हस्तांतरित (शिक्षा, स्वास्थ्य आदि) श्रेणियों में बाँटा गया।
  • केंद्र में पहली बार द्विसदनीय विधायिका बनी- केंद्रीय विधान सभा (145 सदस्य) तथा राज्य परिषद (60 सदस्य)। मताधिकार केवल लगभग 50-55 लाख लोगों (लगभग 3%) तक ही सीमित था। मद्रास 1921 में महिलाओं को मताधिकार देने वाला पहला प्रांत बना।
  • भारत सरकार अधिनियम, 1919 में यह प्रावधान था कि दस वर्ष बाद (1929 में) सुधारों की समीक्षा हेतु एक सांविधिक आयोग बनेगा। इसी आधार पर 1927 में साइमन कमीशन का गठन हुआ।
  • मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट को ठोस रूप देने हेतु तीन समितियाँ बनीं- साउथबरो (फ्रैंचाइज़ी), फीथम (कार्य-विभाजन) तथा क्रू (गृह-प्रशासन) समिति।
  • मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट पर मतभेद के कारण सुरेंद्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में नरमपंथी नेता कांग्रेस से अलग होकर भारतीय राष्ट्रीय उदारवादी संघ के रूप में संगठित हो गए।
  • भारतीय संवैधानिक इतिहास में मॉन्टेग्यू घोषणा को भारत सरकार अधिनियम, 1919 तथा आगे के संवैधानिक सुधारों की आधारशिला माना जाता है।

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