चंपारण सत्याग्रह : परिचय
➣ चंपारण सत्याग्रह (1917) महात्मा गांधी के नेतृत्व में बिहार के चंपारण के नील किसानों की समस्याओं के विरुद्ध चलाया गया एक ऐतिहासिक किसान आंदोलन था।
➣ इसे गांधी के भारत में किए गए पहले प्रमुख सफल सत्याग्रह के रूप में जाना जाता है। इस आंदोलन के माध्यम से गांधी ने किसानों की शिकायतों को सामने लाने के साथ-साथ अहिंसा, सविनय अवज्ञा और सत्याग्रह की अपनी पद्धति का भारत में प्रभावी प्रयोग किया।
➣ चंपारण में किसानों को नील की खेती और उससे जुड़ी विभिन्न आर्थिक वसूली के कारण गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। तीनकठिया प्रथा के कारण किसान अपनी भूमि के एक निश्चित हिस्से पर नील की खेती करने के लिए बाध्य थे।
➣ इसके अतिरिक्त शरहबेशी, तावान और अबवाब जैसी वसूली ने भी किसानों का आर्थिक बोझ बढ़ा दिया था।
➣ राजकुमार शुक्ल के आग्रह के बाद गांधी 10 अप्रैल 1917 को बिहार पहुँचे और 16 अप्रैल 1917 को चंपारण छोड़ने के सरकारी आदेश की अवज्ञा करने के साथ गांधी के प्रत्यक्ष सत्याग्रही संघर्ष का महत्वपूर्ण चरण शुरू हुआ।
➣ इसके बाद गांधी ने किसानों की शिकायतों की व्यापक जाँच की, हजारों किसानों के बयान दर्ज किए और सरकार को औपचारिक जाँच के लिए बाध्य किया।
➣ आगे चलकर चंपारण जाँच समिति की सिफारिशों के आधार पर तीनकठिया प्रथा के अंत और किसानों को राहत देने का मार्ग खुला।
➣ इस प्रकार चंपारण सत्याग्रह ने किसान प्रश्न, सत्याग्रह और रचनात्मक सामाजिक कार्य को एक साथ जोड़ने वाली गांधीवादी कार्यपद्धति का प्रारंभिक उदाहरण प्रस्तुत किया।
पृष्ठभूमि
➣ चंपारण तत्कालीन बिहार एवं उड़ीसा प्रांत के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित एक प्रमुख कृषि क्षेत्र था। इसका अधिकांश ग्रामीण जीवन खेती पर निर्भर था और यहाँ बड़ी संख्या में किसान छोटी तथा मध्यम जोतों पर खेती करते थे।
➣ 1917 से पहले चंपारण में एक ऐसी ग्रामीण परिस्थिति बन चुकी थी जिसमें कृषि पर अत्यधिक निर्भरता, नील की खेती का दबाव, यूरोपीय प्लांटरों का प्रभाव, किसानों की आर्थिक कमजोरी और युद्ध के कारण नील के व्यापार में आए तेज बदलाव एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
➣ इसी पृष्ठभूमि में आगे चलकर नील किसानों की विशिष्ट शिकायतें राजनीतिक प्रश्न बन गईं।
नील की खेती का महत्व
➣ चंपारण की कृषि अर्थव्यवस्था में नील की खेती का विशेष महत्व था। 19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में यहाँ बड़े पैमाने पर नील का उत्पादन होता था।
1892–97 के सर्वेक्षण के अनुसार चंपारण में लगभग 95,970 एकड़ भूमि पर नील की खेती होती थी, जो कुल खेती योग्य भूमि का लगभग 6.63 प्रतिशत थी।➣ इस कारण नील केवल एक फसल नहीं थी, बल्कि चंपारण की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और यूरोपीय नील-कारखानों से जुड़े आर्थिक संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी थी।
➣ चंपारण में बड़ी संख्या में यूरोपीय नीलहे प्लांटर कारखाने स्थापित करके किसानों से नील की खेती कराते थे। इन प्लांटरों का ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक और सामाजिक प्रभाव काफी मजबूत था।
➣ कई स्थानों पर नील-कारखाने केवल कृषि उत्पादन तक सीमित नहीं थे, बल्कि स्थानीय किसानों के साथ भूमि, लगान और खेती से जुड़े संबंधों पर भी उनका प्रभाव रहता था।
➣ चंपारण के किसानों की स्थिति सामान्यतः कमजोर थी। वे खेती पर निर्भर होने के साथ-साथ कर्ज, कम कृषि आय और विभिन्न प्रकार के आर्थिक दबावों से प्रभावित थे।
➣ नील की खेती से किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिलता था और नील-कारखानों के प्रभाव के कारण वे अपनी कृषि संबंधी स्वतंत्रता का पूरा उपयोग नहीं कर पाते थे। स्रोतों में भी उस समय किसानों के शोषण और नील की खेती से जुड़े आर्थिक दबावों का उल्लेख मिलता है।
प्रथम विश्व युद्ध से पहले/बाद की सामान्य आर्थिक-सामाजिक स्थिति
➣ प्रथम विश्व युद्ध से पहले ही जर्मनी में तैयार होने वाली कृत्रिम नील ने प्राकृतिक नील के व्यापार को गंभीर चुनौती देना शुरू कर दिया था। इसके परिणामस्वरूप चंपारण में नील की खेती का क्षेत्र तेजी से घटा।
➣ राजेंद्र प्रसाद के विवरण के अनुसार नील की खेती का क्षेत्र 1905 में लगभग 47,800 एकड़ और 1914 में केवल लगभग 8,100 एकड़ रह गया था। इससे नीलहे प्लांटरों के पुराने लाभ और कृषि व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया।
➣ लेकिन 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के बाद जर्मनी से कृत्रिम नील का आयात रुक गया। इसके कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्राकृतिक नील की मांग फिर बढ़ी और चंपारण के नील-उत्पादकों का महत्व कुछ समय के लिए दोबारा बढ़ गया।
➣ राजेंद्र प्रसाद के विवरण के अनुसार नील की खेती का क्षेत्र 1916 में लगभग 21,900 एकड़ और 1917 में लगभग 26,848 एकड़ तक पहुँच गया।
➣ इस युद्धकालीन परिवर्तन से चंपारण की नील अर्थव्यवस्था में अस्थिरता पैदा हुई। एक ओर प्राकृतिक नील की मांग बढ़ रही थी, वहीं दूसरी ओर किसान पहले से ही आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे थे।
➣ नील की खेती से जुड़े कम भुगतान, भूमि पर नियंत्रण और विभिन्न आर्थिक दबावों के कारण किसानों में असंतोष धीरे-धीरे बढ़ता गया।
➣ चंपारण का ग्रामीण समाज केवल आर्थिक समस्याओं से ही प्रभावित नहीं था। यहाँ शिक्षा का स्तर कम, स्वास्थ्य सुविधाएँ सीमित और ग्रामीण जीवन में सामाजिक पिछड़ापन भी मौजूद था।
➣ बाद में गांधी ने इन परिस्थितियों को केवल नील के प्रश्न से अलग नहीं देखा और अपने रचनात्मक कार्यक्रम में शिक्षा, स्वच्छता तथा स्वास्थ्य को भी शामिल किया।
तीनकठिया प्रथा और नील किसानों का शोषण
➣ चंपारण में यूरोपीय नीलहे प्लांटरों द्वारा किसानों से नील की खेती कराने की सबसे प्रमुख व्यवस्था तीनकठिया प्रथा थी।
➣ इसके अंतर्गत किसान को अपनी जोत के प्रत्येक बीघे के 20 कठ्ठों में से 3 कठ्ठों पर नील की खेती करनी पड़ती थी। इस प्रकार लगभग 3/20 अर्थात 15 प्रतिशत भूमि पर किसान को अपनी इच्छा के विरुद्ध नील उगाना पड़ता था।
➣ तीनकठिया व्यवस्था मुख्यतः असामीवार प्रकार की खेती से जुड़ी थी, जिसमें किसान अपनी भूमि पर खेती करता था, लेकिन नील की खेती के संबंध में प्लांटरों की शर्तें मानने के लिए बाध्य रहता था।
➣ कई मामलों में किसानों से लंबे समय के लिखित अनुबंध कराए जाते थे। नील की खेती के बदले किसानों को मिलने वाली कीमत कम और पहले से निर्धारित होती थी, जबकि फसल खराब होने पर किसान को उसका नुकसान स्वयं उठाना पड़ता था।
नील की जबरन खेती और किसानों पर दबाव
➣ नील किसानों के लिए इसलिए भी नुकसानदेह था क्योंकि जिस भूमि पर नील बोया जाता था, उस पर किसान अपनी पसंद की अधिक लाभदायक खाद्यान्न या अन्य फसल नहीं उगा सकता था।
➣ इस कारण नील की खेती से किसान की कृषि स्वतंत्रता और संभावित आय दोनों प्रभावित होती थीं। विशेष रूप से ऐसे समय में जब खाद्यान्न और अन्य फसलों से बेहतर लाभ मिलने की संभावना थी, किसानों के लिए नील की खेती अधिक बोझ बन गई।
➣ प्लांटरों और उनके अमलों (कारखानों के एजेंटों) द्वारा किसानों पर दबाव डाला जाता था। यदि कोई किसान नील की खेती करने से बचना चाहता, तो उसे आर्थिक दंड, अतिरिक्त भुगतान या अन्य शर्तों का सामना करना पड़ सकता था।
➣ कई मामलों में नीलहे किसानों की कमजोर स्थिति का लाभ उठाकर अनुबंध और वसूली की शर्तें लागू करते थे।
➣ नील की खेती में किसानों के लिए एक और समस्या यह थी कि फसल का मूल्य किसान स्वयं तय नहीं करता था। प्लांटर द्वारा निर्धारित दर पर नील की उपज ली जाती थी।
➣ इसलिए खेती का जोखिम किसान उठाता था, जबकि उत्पादन से मिलने वाला लाभ मुख्य रूप से प्लांटर के पक्ष में जाता था।
कृत्रिम नील और शोषण का नया रूप
➣ 19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में जर्मनी में कृत्रिम नील के उत्पादन ने प्राकृतिक नील के व्यापार को गंभीर चुनौती दी। इससे प्राकृतिक नील का बाजार कमजोर होने लगा और चंपारण के यूरोपीय प्लांटरों के लिए पुरानी व्यवस्था से प्राप्त लाभ कम होने लगे।
➣ नील की खेती से लाभ कम होने के बाद कुछ प्लांटरों ने किसानों को तीनकठिया की बाध्यता से मुक्त करने के बदले अतिरिक्त धन लेने के तरीके अपनाए।
➣ यानी जिस व्यवस्था से किसान पहले नील की खेती करने के लिए मजबूर था, उससे मुक्त होने के लिए भी उसे भुगतान करना पड़ता था। इस प्रकार कृत्रिम नील के कारण खेती समाप्त करने की स्थिति भी किसानों के लिए राहत की बजाय नए आर्थिक बोझ में बदल गई।
शरहबेशी और तावान
➣ तीनकठिया की बाध्यता से किसानों को मुक्त करने के लिए प्लांटरों द्वारा लगाए जाने वाले अतिरिक्त भार के दो महत्वपूर्ण रूप शरहबेशी और तावान थे।
➣ शरहबेशी का अर्थ था नील की खेती की बाध्यता समाप्त करने के बदले किसान के किराए में वृद्धि करना। यानी किसान को नील नहीं उगाना है तो उसे बढ़ा हुआ किराया देना होगा।
➣ कुछ मामलों में यह वृद्धि पुराने किराए की तुलना में बहुत अधिक थी और लगभग 50–60 प्रतिशत तक पहुँच सकती थी। इससे नील की खेती से मुक्ति भी किसानों के लिए आर्थिक बोझ बन गई।
➣ तावान एक प्रकार की मुआवजा या हर्जाने के रूप में ली जाने वाली एकमुश्त राशि थी। जब प्लांटर नील की खेती की बाध्यता समाप्त करते थे, तो कुछ किसानों से इसके बदले बड़ी रकम वसूल की जाती थी।
➣ जिन किसानों के पास नकद धन नहीं होता था, उन्हें ऋण-पत्र या बंधक जैसे साधनों का सहारा लेना पड़ता था, जिससे उनका कर्ज और बढ़ जाता था।
➣ इस प्रकार कृत्रिम नील के कारण जब प्राकृतिक नील की खेती कम लाभदायक होने लगी, तब प्लांटर किसानों को नील की खेती से मुक्त करके भी शरहबेशी और तावान के माध्यम से आर्थिक लाभ प्राप्त करने लगे। यह चंपारण के किसान असंतोष का महत्वपूर्ण कारण बना।
अबवाब और अन्य अवैध वसूली
➣ किसानों से केवल लगान या शरहबेशी-तावान ही नहीं लिया जाता था। प्लांटरों द्वारा विभिन्न प्रकार के अबवाब या अतिरिक्त अवैध उपकर भी वसूले जाते थे। इनका स्वरूप अलग-अलग स्थानों और प्लांटेशनों के अनुसार अलग था।
➣ इन अतिरिक्त वसूलियों में कभी सिंचाई या पानी, विवाह, संतान के जन्म, भूमि के उत्तराधिकार जैसे अवसरों से जुड़े शुल्क शामिल होते थे।
➣ कुछ प्लांटरों द्वारा व्यक्तिगत खर्चों के लिए भी किसानों से धन लेने के उदाहरण मिलते हैं। इस प्रकार अबवाब ने किसानों के नियमित आर्थिक बोझ को और बढ़ा दिया।
➣ प्लांटरों के कर्मचारियों या अमलों द्वारा भी किसानों से अतिरिक्त रकम लेने की शिकायतें थीं। दस्तूरी जैसे अनौपचारिक भुगतान भी किसानों पर अतिरिक्त भार डालते थे।
➣ इससे किसान और प्लांटर के बीच संबंध केवल नील की खेती तक सीमित नहीं रहे, बल्कि ग्रामीण जीवन के अनेक क्षेत्रों में आर्थिक शोषण का रूप लेने लगे।
| तीनकठिया प्रथा | प्रत्येक बीघे के 20 कठ्ठों में से 3 कठ्ठों पर नील की खेती। अर्थात लगभग 15% भूमि पर नील की खेती। |
| शरहबेशी | नील की खेती की बाध्यता से मुक्ति के बदले किराए/लगान में वृद्धि। |
| तावान | नील की खेती की बाध्यता समाप्त करने के बदले ली जाने वाली एकमुश्त रकम/हर्जाना। |
| अबवाब | नियमित लगान के अतिरिक्त ली जाने वाली विभिन्न प्रकार की अतिरिक्त वसूली/उपकर। |
किसानों की आर्थिक स्थिति और बढ़ता असंतोष
➣ तीनकठिया के कारण किसान अपनी भूमि के एक हिस्से पर ऐसी फसल उगाने के लिए बाध्य थे जिसकी कीमत उनके नियंत्रण में नहीं थी। इसके साथ कम भुगतान, बढ़ा हुआ किराया, तावान, शरहबेशी और अबवाब जैसे आर्थिक भार जुड़े थे। परिणामस्वरूप किसान अपनी भूमि पर मेहनत करने के बावजूद पर्याप्त लाभ प्राप्त नहीं कर पाते थे।
➣ स्थिति उस समय और गंभीर हो गई जब प्राकृतिक नील की बाजार-स्थिति बदलने लगी। यूरोप में कृत्रिम नील के विकास से प्लांटरों के पारंपरिक लाभ में कमी आई और उन्होंने इस नुकसान की भरपाई के लिए किसानों से अलग-अलग प्रकार की वसूली शुरू की। इस प्रकार नील के बाजार में संकट का बोझ भी काफी हद तक किसानों पर डाल दिया गया।
➣ किसानों के लिए समस्या केवल आर्थिक नहीं थी। नीलहों के प्रभाव के कारण उन्हें अपनी भूमि और कृषि संबंधी निर्णयों पर पूर्ण स्वतंत्रता नहीं थी।
➣ प्लांटरों के एजेंटों का दबाव, अतिरिक्त वसूली और अनुबंधों की कठोर शर्तों ने ग्रामीण समाज में भय और असंतोष का वातावरण पैदा कर दिया।
➣ इसलिए चंपारण सत्याग्रह की पृष्ठभूमि को केवल गांधी के आगमन से नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे लंबे समय से विकसित हो रही नील-आधारित कृषि व्यवस्था, यूरोपीय प्लांटरों का प्रभाव और किसानों की आर्थिक-सामाजिक कमजोर स्थिति थी।
राजकुमार शुक्ल और गांधी का चंपारण आगमन
➣ चंपारण के किसानों की समस्याओं को व्यापक राजनीतिक मंच तक पहुँचाने में राजकुमार शुक्ल की महत्वपूर्ण भूमिका थी। वे चंपारण के एक किसान और नील की खेती से जुड़े शोषण के विरोधी थे।
➣ उन्होंने स्वयं इस समस्या का सामना किया था और किसानों की शिकायतों को लेकर लगातार प्रयास कर रहे थे।
➣ राजकुमार शुक्ल की कोशिश थी कि कोई ऐसा राष्ट्रीय नेता चंपारण आए जो किसानों की वास्तविक स्थिति को स्वयं देखे और उनके पक्ष में आवाज उठाए। इसी प्रयास के दौरान उनका संपर्क लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन (दिसंबर 1916) में महात्मा गांधी से हुआ।
➣ उन्होंने गांधी को चंपारण आने और किसानों की स्थिति देखने के लिए लगातार आग्रह किया। गांधी उस समय देश के विभिन्न भागों की राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों को समझ रहे थे, इसलिए उन्होंने तुरंत चंपारण जाने का निर्णय नहीं लिया।
➣ लेकिन राजकुमार शुक्ल ने गांधी का पीछा नहीं छोड़ा। वे गांधी के साथ अन्य स्थानों तक गए और बार-बार चंपारण आने का आग्रह करते रहे। अंततः गांधी ने उनकी बात स्वीकार कर 1917 में चंपारण आने का निर्णय लिया।
➣ यह घटना महत्वपूर्ण थी क्योंकि एक स्थानीय किसान की निरंतर कोशिश ने चंपारण के किसान प्रश्न को राष्ट्रीय नेता गांधी तक पहुँचाया।
गांधी का पटना आगमन और राजेंद्र प्रसाद से संपर्क
➣ 10 अप्रैल 1917 को गांधी राजकुमार शुक्ल के साथ पटना पहुँचे। उनका उद्देश्य चंपारण के नील किसानों की स्थिति की जाँच करना था।
➣ पटना पहुँचकर वे डॉ. राजेंद्र प्रसाद के निवास पर गए, लेकिन उस समय राजेंद्र प्रसाद वहाँ मौजूद नहीं थे। घर के कर्मचारियों ने गांधी को एक सामान्य ग्रामीण व्यक्ति समझा और उनके साथ अपेक्षित सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया।
➣ यह प्रसंग गांधी को बिहार के उस समय के सामाजिक वातावरण और ग्रामीण लोगों के प्रति व्यवहार का अनुभव कराने वाला था।
➣ इसी समय मजहरुल हक, जो गांधी के इंग्लैंड के समय के परिचित थे, ने उन्हें सहायता और आतिथ्य प्रदान किया। गांधी ने चंपारण जाने से पहले स्थानीय परिस्थितियों को समझने के लिए बिहार के कुछ प्रमुख लोगों से संपर्क स्थापित करना शुरू किया।
मुजफ्फरपुर में जे. बी. कृपलानी से मुलाकात
➣ 10 अप्रैल 1917 की रात गांधी राजकुमार शुक्ल के साथ मुजफ्फरपुर पहुँचे। वहाँ उनका स्वागत प्रोफेसर जे. बी. कृपलानी ने किया, जो उस समय मुजफ्फरपुर के ग्रियर भूमि कॉलेज से जुड़े थे।
➣ गांधी और कृपलानी की यह मुलाकात उनके बीच आगे बनने वाले राजनीतिक संबंधों की महत्वपूर्ण शुरुआत थी। गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार संभवतः दोनों की यह पहली मुलाकात थी।
➣ गांधी मुजफ्फरपुर में स्थानीय वकीलों, शिक्षित लोगों और किसानों से जुड़े कार्यकर्ताओं से मिले। उन्होंने महसूस किया कि चंपारण के किसानों की समस्याओं को समझने के लिए केवल स्थानीय नेताओं की बातें सुनना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि किसानों से सीधे मिलकर उनकी स्थिति की जाँच करना आवश्यक है।
➣ 11 अप्रैल 1917 को गांधी ने मुजफ्फरपुर में इंडिगो प्लांटर्स एसोसिएशन के सचिव से भी मुलाकात की और अपने चंपारण आने का उद्देश्य बताया।
➣ अगले दिन उन्होंने तिरहुत के कमिश्नर एल. एफ. मॉर्सहेड को पत्र लिखकर अपनी यात्रा और किसानों की स्थिति की जाँच के उद्देश्य से अवगत कराया तथा सरकारी सहयोग माँगा। 13 अप्रैल को गांधी ने कमिश्नर से मुलाकात भी की।
चंपारण की ओर गांधी का प्रस्थान
➣ मुजफ्फरपुर में स्थानीय परिस्थितियों की प्रारंभिक जानकारी लेने के बाद गांधी ने चंपारण जाने का निर्णय लिया। 15 अप्रैल 1917 को वे मोतिहारी पहुँचे।
➣ वहाँ उन्होंने गोरख प्रसाद के घर ठहरकर किसानों की स्थिति की जाँच का काम आगे बढ़ाने की तैयारी की।
➣ मोतिहारी पहुँचने के बाद गांधी का उद्देश्य किसानों से प्रत्यक्ष संपर्क करना और उनके बयान प्राप्त करना था।
➣ 16 अप्रैल 1917 को वे एक किसान की स्थिति देखने के लिए जसौलीपट्टी की ओर जा रहे थे, तभी पुलिस ने उन्हें रोका और चंपारण छोड़ने का आदेश दिया। यहीं से गांधी के चंपारण अभियान का अगला और निर्णायक चरण शुरू हुआ।
चंपारण सत्याग्रह का आरंभ (1917) : गांधी की सविनय अवज्ञा
➣ 15 अप्रैल 1917 को मोतिहारी पहुँचने के बाद गांधी ने चंपारण के किसानों की स्थिति की प्रत्यक्ष जाँच शुरू करने का निर्णय लिया।
➣ वे किसानों से मिलकर उनकी शिकायतों को समझना चाहते थे और इसी उद्देश्य से अगले दिन जसौलीपट्टी जाने के लिए निकले। गांधी के साथ धरनीधर प्रसाद भी थे।
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➣ 16 अप्रैल 1917 को गांधी सुबह लगभग 9 बजे जसौलीपट्टी की ओर निकले।। रास्ते में चंद्रहिया के पास पहुँचे ही थे कि उन्हें पुलिस द्वारा रोका गया और चंपारण छोड़ने का लिखित आदेश दिया गया।
➣ यह आदेश दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 के अंतर्गत जारी किया गया था। गांधी को तत्काल जिला छोड़ने और आगे की जाँच रोक देने के लिए कहा गया।
➣ गांधी ने आदेश की सूचना स्वीकार करने से इनकार नहीं किया, लेकिन उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वे चंपारण नहीं छोड़ेंगे। उनका तर्क था कि वे किसी राजनीतिक आंदोलन को भड़काने के उद्देश्य से नहीं आए हैं, बल्कि किसानों की वास्तविक स्थिति की जाँच करने आए हैं।
➣ यही वह क्षण था जब गांधी ने भारत में सत्याग्रह को सविनय अवज्ञा के रूप में प्रत्यक्ष रूप से प्रयोग किया। गांधी हेरिटेज पोर्टल इसी घटना को भारत में सत्याग्रह की शुरुआत बताता है।
गांधी हेरिटेज पोर्टल इसी घटना को This was the beginning of satyagraha in India के रूप में दर्ज करता है।
➣ गांधी ने उसी दिन प्रशासन तथा उच्च अधिकारियों को पत्र लिखकर अपने निर्णय का कारण बताया। उनका कहना था कि वे चंपारण में किसी प्रकार की अशांति फैलाने नहीं आए हैं।
➣ उनका उद्देश्य केवल किसानों की स्थिति की निष्पक्ष जाँच करना है। यदि सरकार को उनके काम पर आपत्ति है, तो वह उन्हें कानूनी रूप से दंडित कर सकती है, लेकिन वे स्वयं स्वेच्छा से चंपारण छोड़कर नहीं जाएँगे।
गांधी के विरुद्ध मुकदमा और अदालत में पेशी
➣ आदेश की अवज्ञा के कारण गांधी को अगले दिन अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया। 18 अप्रैल 1917 को वे मोतिहारी की अदालत में पेश हुए।
➣ उनके विरुद्ध सरकारी आदेश की अवज्ञा का मामला था। गांधी ने अदालत में अपने बचाव के लिए तकनीकी तर्क देने के बजाय आदेश की अवज्ञा स्वीकार की।
➣ गांधी ने अदालत से दया या विशेष सुविधा की मांग नहीं की। उनका रुख स्पष्ट था कि यदि कानून के अनुसार उन्हें सजा दी जाती है, तो वे उसे स्वीकार करेंगे।
➣ इस प्रकार उन्होंने सत्याग्रह की उस मूल पद्धति को सामने रखा जिसमें अन्यायपूर्ण आदेश की अहिंसक अवज्ञा और दंड को स्वेच्छा से स्वीकार करना दोनों साथ चलते हैं।
किसानों का भारी जनसमर्थन
➣ गांधी की अदालत में पेशी की खबर फैलते ही बड़ी संख्या में स्थानीय किसान और ग्रामीण मोतिहारी की अदालत के आसपास एकत्र होने लगे। वे गांधी के समर्थन में वहाँ पहुँचे थे।
➣ सरकारी विवरण के अनुसार लगभग 2,000 स्थानीय लोग गांधी के साथ अदालत तक पहुँचे। इतनी बड़ी संख्या में किसानों की उपस्थिति ने प्रशासन को भी आश्चर्यचकित कर दिया।
➣ किसानों की उपस्थिति चंपारण के सामाजिक वातावरण में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत थी। जिन किसान समुदायों पर लंबे समय से नीलहों और स्थानीय अधिकारियों का दबाव बना हुआ था, वे पहली बार बड़ी संख्या में एक ऐसे नेता के पीछे खड़े दिखाई दिए जो उनके प्रश्नों को सार्वजनिक रूप से उठा रहा था।
➣ गांधी ने इस जनसमर्थन को हिंसक विरोध में बदलने के बजाय किसानों को शांत और अनुशासित रहने की दिशा दी। उनके लिए किसानों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण यह था कि उनका समर्थन अहिंसक और संगठित रहे।
सरकार का मुकदमा वापस लेना
➣ अदालत में गांधी द्वारा स्वयं दोष स्वीकार करने और उनके पक्ष में उमड़े भारी जनसमर्थन के कारण प्रशासन के सामने स्थिति जटिल हो गई।
➣ मजिस्ट्रेट ने मामले की सुनवाई स्थगित करने की कोशिश की, लेकिन गांधी ने स्पष्ट किया कि उन्होंने अवज्ञा स्वीकार कर ली है और वे निर्णय के लिए तैयार हैं।
➣ इसके बाद बिहार के लेफ्टिनेंट-गवर्नर ने गांधी के विरुद्ध चल रहे मुकदमे को वापस लेने का आदेश दिया और मोतिहारी के कलेक्टर ने गांधी को सूचित किया कि वे चंपारण में किसानों की जाँच स्वतंत्र रूप से जारी रख सकते हैं।
➣ यह गांधी की बड़ी नैतिक और राजनीतिक सफलता थी। उन्होंने न तो हिंसा का सहारा लिया, न सरकारी अधिकारियों के साथ टकराव किया और न ही दंड से बचने की कोशिश की। इसके बावजूद सरकार को मुकदमा वापस लेकर उनकी जाँच को जारी रखने की अनुमति देनी पड़ी।
➣ गांधी ने बाद में चंपारण की इस घटना को भारत में सविनय अवज्ञा का पहला प्रत्यक्ष पाठ माना। इस घटना ने यह दिखाया कि अहिंसक ढंग से कानून की अवज्ञा करके और दंड स्वीकार करने के लिए तैयार रहकर भी औपनिवेशिक प्रशासन पर नैतिक दबाव डाला जा सकता है।
किसानों की गवाही और सरकारी जाँच की प्रक्रिया
➣ गांधी के विरुद्ध मुकदमा वापस लिए जाने के बाद चंपारण आंदोलन का अगला चरण किसानों की शिकायतों को व्यवस्थित रूप से दर्ज करना था।
➣ गांधी का मानना था कि किसानों की समस्याओं को केवल मौखिक रूप से बताने के बजाय उनके प्रत्यक्ष बयान, दस्तावेज और अनुभवों के आधार पर सरकार के सामने रखा जाना चाहिए।
➣ इसी उद्देश्य से उन्होंने स्थानीय वकीलों और स्वयंसेवकों को गाँव-गाँव जाकर किसानों की गवाही लेने के लिए संगठित किया।
गाँव-गाँव जाकर किसानों के बयान
➣ किसानों से उनकी नील की खेती, तीनकठिया, लगान, शरहबेशी, तावान, अबवाब तथा नीलहों के दबाव से जुड़ी शिकायतों के बारे में जानकारी ली गई।
➣ जिन किसानों ने अपनी शिकायत दर्ज कराई, उनके बयान लिखे गए और उनसे हस्ताक्षर या अंगूठे का निशान लिया जाता था। जो लोग बयान देने के लिए तैयार नहीं थे, उनके ऐसा न करने का कारण भी दर्ज किया जाता था।
➣ इस कार्य में बाबू राजेंद्र प्रसाद, धरनीधर प्रसाद, गोरख प्रसाद, रामनवमी प्रसाद, शंभुशरण तथा अनुग्रह नारायण सिन्हा जैसे स्थानीय वकीलों और कार्यकर्ताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ मोतीहारी और बेतिया में बयान दर्ज करने के लिए केंद्र बनाए गए। यहाँ किसानों की संख्या इतनी अधिक थी कि स्वयंसेवकों के लिए रोज आने वाले लोगों की शिकायतें दर्ज करना कठिन होने लगा।
➣ जाँच केवल इन केंद्रों तक सीमित नहीं रही। स्वयंसेवक विभिन्न गाँवों में जाकर किसानों के घरों पर भी उनके बयान दर्ज करते थे।
➣ इस प्रकार गांधी के अभियान को केवल नेताओं और स्थानीय वकीलों की जानकारी पर निर्भर रहने के बजाय सीधे किसानों के अनुभवों से जोड़ा गया। इससे चंपारण की समस्या का व्यापक स्वरूप सामने आने लगा।
➣ सरकारी अधिकारियों की निगरानी भी इस प्रक्रिया के दौरान बनी रही। कई अवसरों पर C.I.D. के अधिकारी बयान दर्ज किए जाने के समय उपस्थित रहते थे।
➣ इसके बावजूद किसानों की शिकायतें बड़ी संख्या में सामने आती रहीं। आधिकारिक विवरण के अनुसार लगभग एक महीने में करीब 4,000 किसानों के बयान दर्ज किए गए।
➣ बाद के चरण में गांधी ने 14 जून 1917 को सरकार को सूचित किया कि लगभग 850 गाँवों के 8,000 किसानों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं।
➣ इसलिए 4,000 और 8,000 के आँकड़ों को विरोधाभासी नहीं समझना चाहिए। ये जाँच के अलग-अलग चरणों में दर्ज किए गए बयानों को दर्शाते हैं।
| मुख्य जाँच केंद्र | मोतीहारी और बेतिया। |
| प्रमुख सहयोगी | राजेंद्र प्रसाद, धरनीधर प्रसाद, गोरख प्रसाद, रामनवमी प्रसाद, शंभुशरण और अनुग्रह नारायण सिन्हा। |
| प्रारंभिक चरण | लगभग 4,000 किसानों के बयान दर्ज किए गए। |
| 14 जून 1917 तक | गांधी ने लगभग 850 गाँवों के 8,000 किसानों के बयान दर्ज होने की सूचना दी। |
| 1 जून 1917 | नील प्लांटरों ने सरकार के सामने अपना प्रतिनिधित्व प्रस्तुत किया। |
| 4 जून 1917 | गांधी ने रांची में बिहार के लेफ्टिनेंट-गवर्नर सर एडवर्ड गेट से बातचीत की। |
नीलहों का पक्ष और सरकार पर बढ़ता दबाव
➣ किसानों की बड़ी संख्या में गवाही दर्ज होने के साथ नील प्लांटरों ने भी अपना पक्ष सरकार के सामने रखना शुरू किया। वे गांधी के चंपारण में लंबे समय तक रहने और किसानों की शिकायतें दर्ज करने से चिंतित थे।
➣ 1 जून 1917 को प्लांटरों ने सरकार के सामने अपना प्रतिनिधित्व प्रस्तुत किया और गांधी को चंपारण से हटाने की मांग भी की गई।
➣ कुछ प्लांटर गांधी से स्वयं मिले और उन्होंने अपने पक्ष में यह तर्क दिया कि वे किसानों के हितैषी हैं तथा किसानों को साहूकारों के कर्ज और आर्थिक कठिनाइयों से बचाने में मदद करते हैं।
➣ दूसरी ओर किसानों की गवाही इन दावों से काफी अलग तस्वीर प्रस्तुत कर रही थी। इस प्रकार सरकार के सामने किसानों और प्लांटरों के परस्पर विरोधी दावों की जाँच का प्रश्न अधिक गंभीर हो गया।
➣ गांधी के लंबे समय तक चंपारण में रहने और हजारों किसानों की गवाही दर्ज होने से बिहार प्रशासन पर दबाव बढ़ने लगा। सरकार को अब यह महसूस हुआ कि समस्या को केवल स्थानीय अधिकारियों या नील प्लांटरों के स्तर पर सुलझाना पर्याप्त नहीं होगा।
➣ 4 जून 1917 को गांधी को रांची बुलाकर बिहार के लेफ्टिनेंट-गवर्नर सर एडवर्ड गेट ने उनसे विस्तृत बातचीत की। यह बातचीत आगे सरकारी स्तर पर औपचारिक जाँच की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बनी।
चंपारण जाँच समिति (1917) : गठन, कार्यवाही एवं सिफारिशें
➣ किसानों के हजारों बयान सामने आने और गांधी के लगातार चंपारण में रहने के बाद बिहार सरकार ने इस पूरे मामले की औपचारिक जाँच कराने का निर्णय लिया। 4 जून 1917 को गांधी ने रांची में बिहार के लेफ्टिनेंट-गवर्नर सर एडवर्ड गेट से मुलाकात की।
➣ इसके बाद सरकार ने चंपारण के भूमि-स्वामी और किसान संबंधों तथा नील की खेती से जुड़े विवादों की जाँच के लिए एक आधिकारिक समिति गठित करने का निर्णय लिया।
चंपारण जाँच समिति का गठन
➣ जून 1917 में बिहार सरकार ने चंपारण जाँच समिति की नियुक्ति की। इसके अध्यक्ष एफ. जी. स्लाई थे, जो तत्कालीन सेंट्रल प्रोविंसेज के कमिश्नर थे।
➣ समिति में प्रशासन, जमींदारों, नील प्लांटरों और किसानों के प्रश्न को समझने वाले प्रतिनिधियों को शामिल किया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि महात्मा गांधी को भी समिति का सदस्य बनाया गया।
➣ समिति के प्रमुख सदस्यों में एल. सी. एडमी, राजा हरिहर प्रसाद नारायण सिंह, डी. जे. रीड, जी. रैनी, ई. एल. टैन्नर और एम. के. गांधी शामिल थे।
➣ समिति का उद्देश्य चंपारण में जमींदार–किरायेदार संबंधों तथा नील की खेती और उससे जुड़े सभी विवादों की जाँच करना था।
➣ गांधी का समिति में शामिल होना विशेष महत्व रखता था। वे पहले किसानों की शिकायतों को लेकर आंदोलन कर रहे थे, लेकिन अब उन्हें उसी सरकारी जाँच प्रक्रिया के भीतर किसानों के पक्ष को रखने का अवसर मिला। गांधी ने यह सुनिश्चित किया कि किसानों के पहले से दर्ज बयान और उनके पास उपलब्ध प्रमाण समिति के सामने प्रस्तुत किए जाएँ।
समिति की कार्यवाही
➣ समिति की प्रारंभिक बैठक 11 जुलाई 1917 को हुई। इसके बाद समिति ने चंपारण की कृषि व्यवस्था, नील की खेती और किसानों तथा प्लांटरों के संबंधों से जुड़े मामलों की जाँच शुरू की।
➣ गांधी ने किसानों की शिकायतों के समर्थन में पहले से जुटाए गए प्रमाणों को सामने रखा, जबकि प्लांटरों ने अपने पक्ष में नील की खेती और उनके द्वारा अपनाई गई व्यवस्थाओं को उचित ठहराने का प्रयास किया। इस प्रक्रिया से विवाद के विभिन्न पक्ष आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा बने।
अबवाब और तीनकठिया पर निर्णय➣ 8 अगस्त 1917 को समिति में गांधी द्वारा उठाए गए अबवाब के प्रश्न पर सहमति बनी। किसानों से नियमित किराए के अतिरिक्त लिए जाने वाले इन अवैध उपकरों को समाप्त करने की दिशा में निर्णय लिया गया। इससे किसानों पर लंबे समय से पड़ रहे अतिरिक्त आर्थिक भार को हटाने का रास्ता खुला।
➣ इसके बाद 10 अगस्त 1917 को समिति ने तीनकठिया प्रथा को समाप्त करने पर सहमति व्यक्त की। यह चंपारण के किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण निर्णय था, क्योंकि तीनकठिया के कारण उन्हें अपनी भूमि के एक निश्चित हिस्से पर नील की खेती करने के लिए बाध्य होना पड़ता था।
➣ तीनकठिया की समाप्ति के साथ नील की खेती को किसान की स्वतंत्र सहमति और अनुबंध से जोड़ने की दिशा तय हुई। इससे नीलहे प्लांटरों की वह पुरानी व्यवस्था समाप्त होने लगी जिसमें किसानों पर जबरन नील उगाने का दबाव रहता था।
शरहबेशी और 25 प्रतिशत वापसी का समझौता➣ 11 अगस्त 1917 को समिति के सामने शरहबेशी का प्रश्न प्रमुखता से आया। गांधी ने शरहबेशी के रूप में किसानों पर डाले गए अतिरिक्त किराए को कम करने का प्रस्ताव रखा। अगले दिनों में इस विषय पर प्लांटरों के साथ भी चर्चा हुई।
➣ गांधी चाहते थे कि किसानों को अवैध वसूली से उचित राहत मिले। समिति की चर्चा के दौरान पूरी राशि वापस कराने के प्रश्न पर मतभेद रहा। अंततः 25 प्रतिशत राशि किसानों को लौटाने का समझौता स्वीकार किया गया।
➣ यह प्रतिशत केवल आर्थिक मुआवजा नहीं था। गांधी के दृष्टिकोण से इसका महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि नीलहे प्लांटरों को पहली बार किसानों के दावों के सामने झुकना और रकम वापस करना पड़ा।
➣ गांधी ने 25 प्रतिशत वापसी को स्वीकार करके यह दिखाया कि सत्याग्रह में हर मांग को शत-प्रतिशत स्वीकार कराना ही सफलता का एकमात्र पैमाना नहीं है।
➣ उनके लिए अधिक महत्वपूर्ण यह था कि प्लांटरों की मनमानी और किसानों पर उनके पुराने प्रभुत्व को चुनौती मिली और किसानों के अधिकार को आधिकारिक रूप से मान्यता मिली।
समिति की अंतिम रिपोर्ट
➣ समिति की कार्यवाही कई महीनों तक चली। 3 अक्टूबर 1917 को समिति की अंतिम रिपोर्ट तैयार हुई और 4 अक्टूबर 1917 को गांधी सहित समिति के सदस्यों ने उस रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किए। यह रिपोर्ट सर्वसम्मति से तैयार हुई थी।
➣ समिति की रिपोर्ट में तीनकठिया प्रथा समाप्त करने, अबवाब को अवैध मानने, किसानों को अवैध वसूली से राहत देने तथा किराए और नील की खेती से जुड़े संबंधों में सुधार की सिफारिश की गई।
➣ इससे चंपारण की पुरानी नील-व्यवस्था के कानूनी एवं प्रशासनिक आधार को कमजोर कर दिया गया।
➣ 6 अक्टूबर 1917 को बिहार के लेफ्टिनेंट-गवर्नर ने समिति की रिपोर्ट स्वीकार करने की दिशा में निर्णय लिया और 18 अक्टूबर 1917 को सरकार ने समिति की सिफारिशों को औपचारिक रूप से स्वीकार कर प्रकाशित किया। इस प्रकार किसानों की प्रमुख शिकायतों को सरकारी स्तर पर मान्यता मिल गई।
| जून 1917 | चंपारण जाँच समिति का गठन। |
| अध्यक्ष | एफ. जी. स्लाई (F. G. Sly)। |
| गांधी की भूमिका | समिति के सदस्य के रूप में किसानों का पक्ष प्रस्तुत किया। |
| 11 जुलाई 1917 | समिति की प्रारंभिक बैठक हुई। |
| 8 अगस्त 1917 | अबवाब के प्रश्न पर समिति में सहमति बनी। |
| 10 अगस्त 1917 | तीनकठिया प्रथा समाप्त करने पर समिति की सहमति बनी। |
| 11 अगस्त 1917 | शरहबेशी के प्रश्न पर गांधी ने प्रस्ताव प्रस्तुत किया। |
| 25% | किसानों से ली गई राशि की वापसी का समझौता हुआ। |
| 3 अक्टूबर 1917 | समिति की अंतिम रिपोर्ट तैयार हुई। |
| 4 अक्टूबर 1917 | गांधी सहित समिति के सदस्यों द्वारा रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किए गए। |
| 18 अक्टूबर 1917 | सरकार ने समिति की सिफारिशें स्वीकार कर लीं। |
| 4 मार्च 1918 | चंपारण एग्रेरियन एक्ट विधान परिषद से पारित हुआ। |
चंपारण एग्रेरियन एक्ट, 1918
➣ समिति की सिफारिशों को लागू करने के लिए आगे चंपारण एग्रेरियन एक्ट, 1918 लाया गया। 4 मार्च 1918 को बिहार एवं उड़ीसा की विधान परिषद ने इसे पारित किया।
➣ इस कानून ने तीनकठिया जैसी जबरन नील-खेती की व्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में समिति के निर्णयों को कानूनी आधार दिया।
➣ इस प्रकार चंपारण का संघर्ष केवल एक अस्थायी प्रशासनिक समझौते पर समाप्त नहीं हुआ, बल्कि समिति की सिफारिशें आगे कानूनी व्यवस्था का हिस्सा बनीं। इससे किसानों की शिकायतों को स्थायी रूप से संबोधित करने की प्रक्रिया शुरू हुई।
चंपारण का रचनात्मक कार्यक्रम
➣ चंपारण में किसानों की समस्याओं की जाँच और नील के प्रश्न के समाधान के साथ महात्मा गांधी ने ग्रामीण जीवन की दूसरी समस्याओं पर भी ध्यान दिया।
➣ उन्होंने देखा कि यहाँ अशिक्षा, गंदगी, खराब स्वास्थ्य और सामाजिक पिछड़ापन भी किसानों की कमजोर स्थिति के महत्वपूर्ण कारण थे। इसलिए उन्होंने सत्याग्रह के साथ रचनात्मक कार्यक्रम शुरू किया।
शिक्षा के क्षेत्र में पहल
➣ गांधी ने चंपारण में ग्रामीण शिक्षा को विशेष महत्व दिया। उन्होंने शिक्षकों और स्वयंसेवकों से गाँवों में विद्यालय खोलने का आग्रह किया।
➣ इस कार्य में महादेव देसाई और नरहरि पारिख जैसे सहयोगियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी पत्नियों ने भी इस कार्य में भाग लिया। गांधी के आश्रम से देवदास गांधी और कस्तूरबा गांधी भी चंपारण आए।
➣ चंपारण में कुल छह ग्रामीण विद्यालय शुरू किए गए। इनमें सबसे पहले 14 नवंबर 1917 को बड़हरवा लखनसेन में विद्यालय स्थापित किया गया। इसके बाद 20 नवंबर 1917 को भितिहरवा और 17 जनवरी 1918 को मधुबन में विद्यालय शुरू हुए।
➣ बड़हरवा लखनसेन विद्यालय के प्रारंभिक शिक्षकों में बबन गोखले और उनकी पत्नी अवंतिकाबाई गोखले का नाम महत्वपूर्ण है। भितिहरवा में कस्तूरबा गांधी ने भी लंबे समय तक शिक्षण और सामाजिक कार्य किया।
➣ मधुबन के विद्यालय के संचालन में नरहरि पारिख और महादेव देसाई की महत्वपूर्ण भूमिका रही। बाद में जे. बी. कृपलानी और विष्णु सीताराम रांदिवे (अप्पाजी) ने भी वहाँ काम किया।
➣ इन विद्यालयों का उद्देश्य केवल बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाना नहीं था। गांधी शिक्षा को चरित्र निर्माण, स्वावलंबन, स्वच्छता और व्यावहारिक जीवन से जोड़ना चाहते थे।
➣ इस प्रकार चंपारण में किए गए ये प्रयोग आगे चलकर गांधी की बुनियादी शिक्षा संबंधी सोच के विकास से भी जुड़े।
स्वच्छता और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य
➣ गांधी ने चंपारण के गाँवों में गंदगी और अस्वच्छ परिस्थितियों को गंभीर समस्या के रूप में देखा। इसलिए स्वयंसेवकों ने गाँवों की सफाई, व्यक्तिगत स्वच्छता और सामुदायिक स्वच्छता के बारे में लोगों को जागरूक किया।
➣ कस्तूरबा गांधी ने विशेष रूप से महिलाओं और ग्रामीण परिवारों के बीच व्यक्तिगत साफ-सफाई तथा स्वच्छ रहने की आदतों के बारे में समझाया।
➣ चंपारण के रचनात्मक कार्यक्रम में स्वास्थ्य सेवा भी शामिल थी। गांधी ने एक डॉक्टर को लगभग छह महीने तक ग्रामीणों की सेवा करने के लिए तैयार किया।
➣ उस समय प्राथमिक उपचार के लिए अरंडी का तेल (Castor Oil), कुनैन और सल्फर मरहम जैसी सीमित दवाओं का उपयोग किया जाता था।
➣ इस कार्य से गांधी का उद्देश्य केवल बीमार लोगों का इलाज करना नहीं था। वे ग्रामीणों को यह समझाना चाहते थे कि स्वच्छता, स्वास्थ्य और स्वस्थ जीवन-शैली भी सामाजिक सुधार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
➣ चंपारण में स्वच्छता को स्वतंत्रता और ग्रामीण सुधार से जोड़ने की गांधी की सोच बाद के उनके रचनात्मक कार्यक्रमों में भी दिखाई देती है।
सामाजिक सुधार और महिलाओं के बीच जागरूकता
➣ गांधी ने चंपारण के सामाजिक जीवन में व्याप्त अशिक्षा, छुआछूत, अस्वच्छता और सामाजिक रूढ़ियों को भी चुनौती देने का प्रयास किया।
➣ उनका मानना था कि किसान की स्थिति में स्थायी सुधार के लिए केवल आर्थिक शोषण समाप्त करना पर्याप्त नहीं है। ग्रामीण समाज के जीवन-स्तर में भी बदलाव आवश्यक है।
➣ कस्तूरबा गांधी ने महिलाओं के बीच विशेष रूप से व्यक्तिगत स्वच्छता और साफ-सफाई के विषय में काम किया।
➣ गांधी ने ग्रामीण महिलाओं की खराब स्वास्थ्य और कपड़ों की स्थिति पर भी ध्यान दिया और कस्तूरबा को उनसे बातचीत करके स्वच्छता की आदतों के प्रति जागरूक करने के लिए कहा।
➣ इस प्रकार चंपारण में महिलाएँ केवल किसान आंदोलन के पीछे खड़े परिवारों का हिस्सा नहीं थीं, बल्कि रचनात्मक कार्यक्रम की सक्रिय भागीदार भी बनीं। इससे गांधी के आंदोलन का सामाजिक आधार और व्यापक हुआ।
| कुल छह ग्रामीण विद्यालय | चंपारण में गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम के तहत खोले गए। |
| 14 नवंबर 1917 | बड़हरवा लखनसेन में पहला विद्यालय खोला गया। |
| 20 नवंबर 1917 | भितिहरवा में दूसरा विद्यालय खोला गया। |
| 17 जनवरी 1918 | मधुबन में तीसरा विद्यालय खोला गया। |
| बबन गोखले और अवंतिकाबाई गोखले | बड़हरवा लखनसेन विद्यालय से जुड़े प्रमुख शिक्षक। |
| कस्तूरबा गांधी | भितिहरवा में शिक्षण तथा महिलाओं के बीच स्वच्छता संबंधी कार्य से जुड़ीं। |
| महादेव देसाई और नरहरि पारिख | मधुबन विद्यालय तथा शिक्षा संबंधी कार्यक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। |
| देवदास गांधी | गांधी के आश्रम से चंपारण के रचनात्मक कार्य में शामिल हुए। |
| जे. बी. कृपलानी और विष्णु सीताराम रांदिवे (अप्पाजी) | मधुबन के शैक्षिक कार्य से जुड़े। |
| स्वास्थ्य सेवा | एक डॉक्टर ने लगभग छह महीने तक सेवा दी। |
| प्रमुख दवाएँ | अरंडी का तेल, कुनैन और सल्फर मरहम। |
| रचनात्मक कार्यक्रम | चंपारण में गांधी ने शिक्षा + स्वच्छता + स्वास्थ्य + सामाजिक जागरूकता को सत्याग्रह के साथ जोड़ा। |
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ चंपारण सत्याग्रह वर्ष 1917 में बिहार के चंपारण के नील किसानों की समस्याओं को लेकर महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाया गया आंदोलन था। इसे गांधी का भारत में पहला प्रमुख सत्याग्रह माना जाता है।
➣ राजकुमार शुक्ल चंपारण के किसान थे, जिन्होंने किसानों की समस्याओं को गांधी तक पहुँचाने और उन्हें चंपारण लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ दिसंबर 1916 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में राजकुमार शुक्ल ने महात्मा गांधी से मुलाकात कर उन्हें चंपारण आने का आग्रह किया।
➣ 10 अप्रैल 1917 को गांधी राजकुमार शुक्ल के साथ पटना पहुँचे और उसी रात मुजफ्फरपुर गए, जहाँ उनका स्वागत जे. बी. कृपलानी ने किया।
➣ 15 अप्रैल 1917 को गांधी मोतिहारी पहुँचे और चंपारण के किसानों की स्थिति की प्रत्यक्ष जाँच शुरू करने की तैयारी की।
➣ 16 अप्रैल 1917 को गांधी को चंपारण छोड़ने का सरकारी आदेश दिया गया, लेकिन उन्होंने आदेश मानने से इनकार कर दिया। गांधी हेरिटेज पोर्टल इसी घटना को भारत में सत्याग्रह की शुरुआत के रूप में दर्ज करता है।
➣ 18 अप्रैल 1917 को गांधी मोतिहारी की अदालत में पेश हुए और सरकारी आदेश की अवज्ञा स्वीकार करते हुए दंड भुगतने की तैयारी जताई।
➣ गांधी की अदालत में पेशी के समय लगभग 2,000 किसान उनके समर्थन में मोतिहारी में एकत्र हुए। इससे चंपारण के किसानों के बीच गांधी के प्रति बढ़ते जनसमर्थन का पता चला।
➣ गांधी के विरुद्ध चलाया गया मुकदमा अंततः वापस ले लिया गया और उन्हें चंपारण में किसानों की शिकायतों की जाँच जारी रखने की अनुमति मिल गई।
➣ गांधी और उनके सहयोगियों ने लगभग एक महीने में 4,000 किसानों के बयान दर्ज किए। इसके लिए गाँवों में जाकर किसानों से उनकी शिकायतें भी दर्ज की गईं।
➣ 4 जून 1917 को गांधी ने बिहार के लेफ्टिनेंट-गवर्नर सर एडवर्ड गेट से रांची में मुलाकात की। इसके बाद चंपारण की औपचारिक जाँच के लिए सरकारी समिति बनाने का निर्णय हुआ।
➣ चंपारण जाँच समिति के अध्यक्ष एफ. जी. स्लाई थे और महात्मा गांधी भी इसके सदस्य बनाए गए। समिति की प्रारंभिक बैठक 11 जुलाई 1917 को हुई।
➣ जाँच समिति की सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश तीनकठिया प्रथा का पूर्ण अंत थी। सरकार ने समिति की लगभग सभी प्रमुख सिफारिशों को स्वीकार कर लिया।
➣ किसानों से ली जाने वाली अबवाब जैसी अतिरिक्त वसूली को समाप्त करने तथा किसानों को राहत देने की दिशा में भी समिति ने महत्वपूर्ण सिफारिशें कीं।
➣ 25 प्रतिशत की राशि किसानों को वापस करने का समझौता हुआ। यह केवल धन वापसी नहीं थी, बल्कि नीलहे प्लांटरों की मनमानी के सामने किसानों के दावे की औपचारिक स्वीकृति का प्रतीक भी बना।
➣ 4 अक्टूबर 1917 को चंपारण जाँच समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की और सरकार ने उसकी प्रमुख सिफारिशों को स्वीकार किया।
➣ 4 मार्च 1918 को चंपारण एग्रेरियन एक्ट बिहार एवं उड़ीसा विधान परिषद में पारित हुआ। इसके साथ जबरन नील की खेती से जुड़ी पुरानी व्यवस्था के अंत को कानूनी आधार मिला।
➣ चंपारण में गांधी ने केवल किसान समस्या पर काम नहीं किया, बल्कि शिक्षा, स्वच्छता, स्वास्थ्य और सामाजिक सुधार का भी कार्यक्रम चलाया।
➣ चंपारण में गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम के अंतर्गत बड़हरवा लखनसेन, भितिहरवा और मधुबन जैसे स्थानों पर विद्यालय स्थापित किए गए।
➣ कस्तूरबा गांधी, महादेव देसाई, नरहरि पारिख, बबन गोखले और अवंतिकाबाई गोखले जैसे सहयोगियों ने चंपारण के रचनात्मक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ चंपारण सत्याग्रह की विशेषता थी कि गांधी ने सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा, तथ्य-संग्रह और रचनात्मक कार्य को एक साथ जोड़ा।
➣ चंपारण की सफलता ने गांधी को भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया और आगे के खेड़ा सत्याग्रह (1918) तथा अन्य गांधीवादी आंदोलनों के लिए आधार तैयार किया।
एन. जी. रंगा ने महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह (1917) का विरोध किया था। वे आगे चलकर 1933 के आंध्र रैयत आंदोलन के प्रमुख नेताओं में रहे तथा 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इसके महासचिव चुने गए।
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