मराठा साम्राज्य : विजयनगर के बाद मध्यकालीन भारत का प्रमुख हिंदू साम्राज्य
| व्यक्ति | महत्त्व |
|---|---|
| छत्रपति शिवाजी (1630-1680 ई.) |
मराठा साम्राज्य के संस्थापक। |
| पेशवा बालाजी विश्वनाथ (1713-1720 ई.) |
मराठा साम्राज्य के द्वितीय संस्थापक। वे प्रसिद्ध पेशवा बाजीराव प्रथम (बाजीराव-मस्तानी के नाम से प्रसिद्ध) के पिता थे। |
➣ छत्रपति शिवाजी महाराज भारत के महान योद्धा, कुशल प्रशासक एवं रणनीतिकार थे, जिन्होंने 1674 ई. में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की स्थापना की। उन्होंने मुगल सम्राट औरंगज़ेब, बीजापुर तथा अन्य दक्कनी शक्तियों से संघर्ष करते हुए एक सशक्त स्वराज्य की स्थापना की। 6 जून, 1674 ई. को रायगढ़ में उनका राज्याभिषेक हुआ और उन्होंने छत्रपति की उपाधि धारण की।
➣ शिवाजी मालोजी भोंसले के पौत्र तथा शाहजी भोंसले के पुत्र थे। शाहजी की दो पत्नियाँ थीं, जिनमें पहली पत्नी जीजाबाई (जाधव/यादव कुल) से छत्रपति शिवाजी का जन्म हुआ।
➣ छत्रपति शिवाजी के दो प्रमुख पुत्र थे— शंभाजी (1681–1689 ई.) तथा राजाराम (1689–1700 ई.)। 1689 ई. में औरंगज़ेब ने शंभाजी को बंदी बनाकर उनका वध कर दिया तथा उनके पुत्र शाहू को बंदी बना लिया।
➣ शंभाजी की मृत्यु के पश्चात् मराठा साम्राज्य की गद्दी पर उनके अनुज राजाराम बैठे।
➣ 1700 ई. में राजाराम की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ताराबाई ने अपने अल्पवयस्क पुत्र शिवाजी द्वितीय को छत्रपति घोषित किया और स्वयं उसकी संरक्षिका बनकर शासन का संचालन किया।
➣ 1707 ई. में औरंगज़ेब की मृत्यु के पश्चात् मुगल सम्राट बहादुर शाह प्रथम ने शाहू को मुक्त कर दिया।
➣ मुक्त होने के बाद शाहू और ताराबाई के बीच उत्तराधिकार के लिए खेड़ का युद्ध (1707 ई.) हुआ, जिसमें शाहू विजयी हुए। इसके परिणामस्वरूप मराठा राज्य दो शाखाओं- सतारा एवं कोल्हापुर में विभाजित हो गया।
➣ शाहू (1708–1749 ई.) के शासनकाल में बालाजी विश्वनाथ (1713–1720 ई.), बाजीराव प्रथम (1720–1740 ई.) तथा बालाजी बाजीराव (1740–1761 ई.) पेशवा बने। पेशवाओं का विस्तृत अध्ययन आधुनिक भारत के इतिहास में किया जाता है।
➣ मराठा इतिहास में संगोला की संधि (1750 ई.) अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह राजाराम द्वितीय (रामराजा) तथा बालाजी बाजीराव के मध्य हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप वास्तविक सत्ता पेशवा के हाथों में आ गई और छत्रपति नाममात्र के शासक रह गए।
➣ बालाजी बाजीराव के पेशवा काल में पानीपत का तृतीय युद्ध (1761 ई.) हुआ, जिसमें मराठों को अहमदशाह अब्दाली के हाथों पराजय का सामना करना पड़ा।
मराठा शक्ति का उदय: पृष्ठभूमि
➣ मराठा राज्य, विजयनगर साम्राज्य के पतन (1565 ई., तालीकोटा का युद्ध) के बाद दक्षिण भारत में उभरने वाला प्रमुख स्वतंत्र हिन्दू राज्य था।
➣ विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद लगभग एक शताब्दी तक दक्षिण भारत पर बीजापुर की आदिलशाही, अहमदनगर की निजामशाही, गोलकुण्डा की क़ुतुबशाही तथा उत्तर से बढ़ते मुग़ल प्रभाव का वर्चस्व बना रहा।
➣ 17वीं शताब्दी के प्रारम्भ में उत्तर भारत में मुगल सम्राट शाहजहाँ का शासन था, जबकि दक्षिण भारत में बीजापुर तथा गोलकुण्डा जैसे शक्तिशाली दक्कनी मुस्लिम राज्य विद्यमान थे। इन राज्यों के सैनिक एवं असैनिक प्रशासन में मराठा सरदारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।
➣ बीदर को 1619 ई. में बीजापुर ने अपने राज्य में मिला लिया था। बाद में 1636 ई. में गोलकुण्डा ने शाहजहाँ की अधीनता स्वीकार कर ली।
➣ किन्तु उसका मुग़ल साम्राज्य में वास्तविक विलय 1687 ई. में औरंगज़ेब ने किया। इसी प्रकार 1686 ई. में औरंगज़ेब ने बीजापुर को भी मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया। उस समय वहाँ का शासक सिकंदर आदिलशाह था।
➣ जहाँगीर के शासनकाल में मुग़लों ने मराठा सरदारों के बढ़ते सामरिक महत्त्व को समझना प्रारम्भ किया। 1615-16 ई. के दक्कन अभियानों के दौरान कुछ प्रभावशाली मराठा सरदार मुग़ल सेना के संपर्क में आए तथा उन्होंने समय-समय पर मुग़लों के साथ भी सहयोग किया।
➣ 1616 ई. में मुग़ल सेना ने दक्कनी संयुक्त सेना (निजामशाही-आदिलशाही गठबंधन), जिसका नेतृत्व मलिक अम्बर कर रहे थे, के विरुद्ध उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की।
➣ मालोजी भोंसले की मृत्यु के बाद उनके पुत्र शाहजी भोंसले ने दक्कन की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर निजामशाही, आदिलशाही तथा मुग़लों-तीनों की सेवा की। इसी कारण उन्हें दक्कन की राजनीति का अत्यंत अनुभवी सेनानायक माना जाता है।
➣ उल्लेखनीय है कि अहमदनगर की निजामशाही के हब्शी प्रधानमंत्री मलिक अम्बर ने सर्वप्रथम बड़े पैमाने पर मराठा सैनिकों की भर्ती कर उन्हें गुरिल्ला युद्ध-पद्धति (गनीमी कावा) का प्रभावी प्रशिक्षण दिया। यही युद्ध-पद्धति आगे चलकर शिवाजी की सैन्य नीति का आधार बनी।
➣ मराठा शक्ति का उत्कर्ष किसी एक व्यक्ति अथवा किसी विशेष वर्ग का कार्य नहीं था और न ही यह किसी आकस्मिक घटना का परिणाम था। इसके पीछे महाराष्ट्र की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं भौगोलिक परिस्थितियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।
➣ महाराष्ट्र के लोगों ने जाति, भाषा, धर्म, साहित्य तथा भौगोलिक एकता के आधार पर सामूहिक चेतना का विकास किया, जिसने एक स्वतंत्र मराठा राज्य की स्थापना की भावना को बल प्रदान किया।
➣ महाराष्ट्र की दुर्गम पर्वतीय भौगोलिक परिस्थितियाँ, सुदृढ़ दुर्ग-व्यवस्था तथा शिवाजी एवं अन्य मराठा नेताओं की उत्कृष्ट नेतृत्व क्षमता ने मराठा शक्ति के उत्कर्ष में निर्णायक योगदान दिया।
➣ इस प्रकार मराठा शक्ति का प्रारम्भिक विकास दक्कनी सल्तनतों की सैन्य सेवा से प्रारम्भ होकर शिवाजी के नेतृत्व में एक संगठित एवं स्वतंत्र मराठा राज्य की स्थापना तक पहुँचा।
शाहजी भोंसले
➣ शाहजी भोंसले ने अहमदनगर के निजामशाही राज्य की सेना में एक सैनिक के रूप में अपना जीवन प्रारम्भ किया और अपनी योग्यता के बल पर धीरे-धीरे उच्च पद प्राप्त किया।
➣ मुगल सम्राट शाहजहाँ द्वारा 1636 ई. में अहमदनगर पर अधिकार करने के बाद शाहजी ने बीजापुर की सेवा स्वीकार कर ली, जहाँ उन्होंने अपनी सैन्य प्रतिभा से पर्याप्त प्रतिष्ठा अर्जित की।
➣ बीजापुर की ओर से उन्हें कर्नाटक में एक विशाल जागीर प्राप्त हुई। जब उनके पुत्र शिवाजी ने बीजापुर राज्य के विरुद्ध अभियान प्रारम्भ किया,
➣ तब शाहजी पर शिवाजी को प्रोत्साहित करने का संदेह किया गया और उन्हें कुछ समय के लिए बंदी बना लिया गया। बाद में मुगल सम्राट शाहजहाँ के हस्तक्षेप के उपरान्त उन्हें मुक्त कर दिया गया।
➣ 1649 ई. में शाहजी ने बीजापुर के सुल्तान और शिवाजी के बीच एक अस्थायी समझौता कराया, जिसके बाद शिवाजी को अपनी शक्ति संगठित करने तथा आगे की सैन्य गतिविधियों के लिए पर्याप्त अवसर प्राप्त हुआ।
➣ शाहजी भोंसले की दो प्रमुख पत्नियाँ थीं- जीजाबाई तथा तुकाबाई मोहिते। जीजाबाई से उन्हें छत्रपति शिवाजी प्राप्त हुए।
➣ शाहजी के कर्नाटक चले जाने के बाद जीजाबाई और बालक शिवाजी पूना की जागीर तथा लाल महल में रहे, जहाँ जीजाबाई के संरक्षण एवं दादाजी कोंडदेव के मार्गदर्शन में शिवाजी का पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा हुई।
➣ तुकाबाई मोहिते से शाहजी को व्यंकोजी (एकोजी) नामक पुत्र हुआ, जिसने बाद में तंजावुर (तंजौर) में मराठा शासन की स्थापना की और शाहजी की दक्षिणी जागीर का उत्तराधिकारी बना।
शिवाजी : जीवन परिचय
➣ शिवाजी का जन्म 19 फ़रवरी, 1630 ई. को शिवनेरी दुर्ग (जुन्नार, वर्तमान पुणे जिला, महाराष्ट्र) में हुआ था। माना जाता है कि शिवाई देवी के नाम पर उनका नाम शिवाजी रखा गया।
➣ शिवाजी के पिता का नाम शाहजी भोंसले तथा माता का नाम जीजाबाई था। परंपरा के अनुसार भोंसले वंश स्वयं को मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश से संबंधित मानता था, जबकि जीजाबाई देवगिरि के जाधव (यादव) कुल से थीं।
➣ शिवाजी के व्यक्तित्व पर उनकी माता जीजाबाई तथा उनके संरक्षक एवं शिक्षक दादाजी कोंडदेव का गहरा प्रभाव पड़ा। 1647 ई. में दादाजी कोंडदेव का निधन हो गया।
➣ आध्यात्मिक क्षेत्र में शिवाजी पर समर्थ रामदास का विशेष प्रभाव माना जाता है। समर्थ रामदास ने दासबोध तथा आनंदवन भुवन जैसे ग्रंथों की रचना की।
➣ शिवाजी का प्रथम विवाह साइबाई निम्बालकर के साथ 1640 ई. में बंगलौर में हुआ था। शंभाजी इन्हीं के पुत्र थे।
➣ शिवाजी की प्रमुख रानियों में सोयराबाई तथा पुतलाबाई का उल्लेख मिलता है। राजाराम, सोयराबाई के पुत्र थे। पुतलाबाई शिवाजी की मृत्यु के बाद सती हो गई थीं।
प्रारम्भिक कार्य एवं उद्देश्य
➣ बचपन में पुणे की जागीर का प्रबंधन जीजाबाई एवं दादाजी कोंडदेव के संरक्षण में हुआ। यहीं शिवाजी ने प्रशासन, सैन्य संगठन तथा दुर्ग प्रबंधन का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया।
➣ 1645 ई. में किशोर शिवाजी ने दादाजी नरस प्रभु को लिखे एक पत्र में पहली बार हिंदवी स्वराज्य की स्थापना का विचार व्यक्त किया। इसे मराठा स्वराज्य की आधारशिला माना जाता है।
➣ उस समय उत्तर भारत में मुगल साम्राज्य तथा दक्षिण भारत में बीजापुर एवं गोलकुण्डा जैसे दक्कनी मुस्लिम राज्य विद्यमान थे। शिवाजी ने इन्हीं राजनीतिक परिस्थितियों में अपने स्वतंत्र राज्य के निर्माण का अभियान प्रारम्भ किया।
➣ शिवाजी का प्रमुख उद्देश्य हिंदवी स्वराज्य की स्थापना करना था। उन्होंने सुदृढ़ प्रशासन, दुर्ग नीति, छापामार युद्ध प्रणाली तथा शक्तिशाली नौसेना के आधार पर मराठा राज्य का विस्तार किया।
| विषय | तथ्य |
|---|---|
| मुख्य उद्देश्य | हिंदवी स्वराज्य की स्थापना |
| प्रमुख प्रेरणा | जीजाबाई, दादाजी कोंडदेव एवं समर्थ रामदास |
| प्रथम राजनीतिक घोषणा | 1645 ई. में दादाजी नरस प्रभु को लिखे पत्र में हिंदवी स्वराज्य का उल्लेख |
| युद्ध नीति | गनिमी कावा (छापामार युद्ध) |
हिंदवी स्वराज्य शिवाजी महाराज का मूल राजनीतिक आदर्श था। जबकि हिंदू पद पादशाही की अवधारणा का व्यापक विकास बाद में पेशवा काल में हुआ।
प्रारम्भिक सैन्य अभियान किलों पर अधिकार
➣ शिवाजी की पहली महत्वपूर्ण सैन्य विजय 1646 ई. में तोरणा दुर्ग पर अधिकार करने से हुई। यह उनका पहला प्रमुख किला था, जिसके बाद मराठा शक्ति का विस्तार प्रारम्भ हुआ।
➣ इसके बाद शिवाजी ने 1647 ई. में कोंडाना (वर्तमान सिंहगढ़) तथा पुरंदर सहित अनेक दुर्गों पर अधिकार स्थापित किया।
➣ शिवाजी द्वारा कल्याण एवं कोंकण क्षेत्र में विस्तार करने पर बीजापुर के सुल्तान ने उनके पिता शाहजी भोंसले को बंदी बना लिया। इसके परिणामस्वरूप कुछ समय के लिए शिवाजी को बीजापुर के विरुद्ध अपने अभियान रोकने पड़े।
➣ 1649 ई. में शाहजी की रिहाई के बाद शिवाजी ने पुनः अपने राज्य विस्तार का अभियान प्रारम्भ किया।
➣ 1656 ई. में शिवाजी ने चन्द्रराव मोरे को पराजित कर जावली पर अधिकार कर लिया। पश्चिमी घाट के इस दुर्गम क्षेत्र पर विजय मराठा राज्य के विस्तार की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई।
➣ तोरणा पर अधिकार के बाद शिवाजी ने निकटवर्ती मुरुंबदेव दुर्ग का पुनर्निर्माण कराया, जिसे आगे चलकर राजगढ़ नाम दिया गया। यही उनकी प्रारम्भिक राजधानी बनी। बाद में राजधानी रायगढ़ स्थानांतरित की गई, जहाँ 1674 ई. में उनका राज्याभिषेक हुआ।
➣ 1646–1656 ई. के बीच शिवाजी ने चाकन, कोंडाना (सिंहगढ़), पुरंदर, तिकोना, लोहगढ़, विसापुर, सूपा, बारामती आदि अनेक दुर्गों एवं क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर अपनी शक्ति को सुदृढ़ किया।
➣ उस समय बीजापुर तथा मुगल साम्राज्य दोनों शिवाजी के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थे। इस अवधि में औरंगज़ेब दक्कन का सूबेदार था और दक्षिण भारत की राजनीतिक परिस्थितियों पर उसकी विशेष दृष्टि थी।
मुगलों से पहली मुठभेड़ (1657 ई.)
➣ इस समय मुगल साम्राज्य और बीजापुर के बीच संघर्ष चल रहा था। शिवाजी ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए मुगलों से मैत्री स्थापित करने का प्रयास किया, किंतु औरंगज़ेब ने इसमें विशेष रुचि नहीं दिखाई।
➣ नवंबर, 1656 ई. में मोहम्मद आदिल शाह की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनका लगभग 18 वर्षीय पुत्र अली आदिल शाह द्वितीय (1656–1672 ई.) बीजापुर का सुल्तान बना।
➣ बीजापुर की राजनीतिक कमजोरी का लाभ उठाते हुए मुगल सम्राट शाहजहाँ ने अपने पुत्र एवं दक्कन के सूबेदार औरंगज़ेब को बीजापुर पर आक्रमण करने का आदेश दिया।
➣ जब मुगल सेना बीजापुर के विरुद्ध अभियान में व्यस्त थी, तब शिवाजी ने मुगल क्षेत्रों पर आक्रमण प्रारम्भ कर दिया। 1657 ई. में उन्होंने जुन्नार पर धावा बोलकर लगभग तीन लाख हूण मूल्य की संपत्ति प्राप्त की।
➣ बाद में मुगलों और अली आदिल शाह द्वितीय के बीच संधि हो गई। इसके पश्चात् बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी के बढ़ते प्रभाव को समाप्त करने का निश्चय किया, क्योंकि शिवाजी उसके अनेक किलों एवं क्षेत्रों पर अधिकार कर चुके थे।
➣ इसी बीच 1657 ई. में मुगल सम्राट शाहजहाँ के गंभीर रूप से बीमार पड़ने पर उत्तराधिकार का युद्ध प्रारम्भ हो गया। परिणामस्वरूप औरंगज़ेब उत्तर भारत लौट गया और दक्कन में मुगल गतिविधियाँ कुछ समय के लिए मंद पड़ गईं।
➣ मुगल उत्तराधिकार युद्ध का लाभ उठाकर 1657–1658 ई. के दौरान शिवाजी ने कोंकण क्षेत्र में अपना प्रभाव और अधिक बढ़ा लिया।
उल्लेखनीय है कि बाद में 1686 ई. में मुगल सम्राट औरंगज़ेब ने सिकंदर आदिल शाह के शासनकाल में बीजापुर को मुगल साम्राज्य में मिला लिया।
अफ़ज़ल ख़ाँ की हत्या (1659 ई.)
➣ शिवाजी की बढ़ती शक्ति को समाप्त करने के लिए 1659 ई. में बीजापुर के सुल्तान अली आदिल शाह द्वितीय ने अपने प्रसिद्ध सेनापति अफ़ज़ल ख़ाँ (अब्दुल्ला भटारी अफ़ज़ल ख़ाँ) को शिवाजी के विरुद्ध भेजा।
➣ अफ़ज़ल ख़ाँ ने अपने दूत कृष्णाजी भास्कर के माध्यम से शिवाजी को संधि वार्ता के लिए आमंत्रित किया। शिवाजी ने अपने प्रतिनिधि पंताजी गोपीनाथ के माध्यम से इस प्रस्ताव को स्वीकार किया।
➣ अफ़ज़ल ख़ाँ का अंगरक्षक सैयद बांदा था, जबकि शिवाजी के साथ जीवा महाला तथा संभाजी कावजी उपस्थित थे।
➣ दोनों नेताओं की भेंट प्रतापगढ़ के निकट निर्धारित की गई। शिवाजी संभावित विश्वासघात की आशंका से सुरक्षा कवच पहनकर तथा वाघनख एवं बिछवा (कटार) जैसे गुप्त हथियारों के साथ पहुँचे।
➣ 10 नवम्बर, 1659 ई. को भेंट के दौरान अफ़ज़ल ख़ाँ ने शिवाजी पर आक्रमण करने का प्रयास किया। आत्मरक्षा में शिवाजी ने पहले वाघनख से तथा बाद में बिछवा से प्रहार कर अफ़ज़ल ख़ाँ का वध कर दिया। इसके बाद जीवा महाला ने सैयद बांदा को मार गिराया।
➣ अफ़ज़ल ख़ाँ की मृत्यु के बाद शिवाजी ने तीव्र गति से बीजापुर के अनेक दुर्गों एवं क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। 1660 ई. तक उन्होंने पन्हाला, वसंतगढ़, खेलना (विशालगढ़) तथा पवनगढ़ जैसे महत्वपूर्ण दुर्गों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।
➣ इसके बाद शिवाजी ने जंजीरा के सिद्दियों की शक्ति को चुनौती दी तथा दक्षिण कोंकण में अपना प्रभाव बढ़ाया। साथ ही दमन के पुर्तगालियों से वार्षिक कर (चौथ) भी प्राप्त किया।
➣ कल्याण एवं भिवंडी पर अधिकार करने के बाद शिवाजी ने वहाँ नौसैनिक अड्डों का विकास किया। इस समय तक उनके अधिकार में लगभग 40 दुर्ग आ चुके थे।
औरंगज़ेब से संघर्ष
➣ 1658 ई. में मुगल सम्राट बनने के बाद औरंगज़ेब ने दक्षिण भारत की ओर विशेष ध्यान दिया। शिवाजी की बढ़ती शक्ति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से उसने 1660 ई. में अपने मामा शाइस्ता ख़ाँ को दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया।
➣ शाइस्ता ख़ाँ एक विशाल मुगल सेना के साथ दक्कन पहुँचा और सूपा तथा चाकन जैसे क्षेत्रों पर अधिकार करने के बाद पूना पहुँचा। वहाँ उसने बीजापुर के साथ मिलकर शिवाजी की शक्ति को समाप्त करने की योजना बनाई।
➣ 5 अप्रैल, 1663 ई. की रात्रि में शिवाजी ने अपने चुनिंदा सैनिकों के साथ पूना स्थित लाल महल में ठहरे शाइस्ता ख़ाँ पर अचानक आक्रमण कर दिया। इस हमले में शाइस्ता ख़ाँ किसी प्रकार बच निकला, किंतु उसके हाथ की तीन उँगलियाँ कट गईं तथा उसका पुत्र फ़तह ख़ाँ मारा गया।
➣ इस घटना से औरंगज़ेब अत्यंत क्रोधित हुआ और उसने शाइस्ता ख़ाँ का दक्कन से स्थानांतरण कर उसे बंगाल का सूबेदार नियुक्त कर दिया। उसके स्थान पर शहज़ादा मुअज्ज़म (बाद में बहादुर शाह प्रथम) को दक्कन भेजा गया।
सूरत की पहली लूट (1664 ई.)
➣ शाइस्ता ख़ाँ के दक्कन अभियान (1660-1663 ई.) के दौरान मुग़ल सेना ने लगभग तीन वर्षों तक शिवाजी के अनेक क्षेत्रों में व्यापक क्षति पहुँचाई तथा खेती-बाड़ी को भी बुरी तरह नष्ट कर दिया।
➣ इससे स्वराज्य की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने तथा युद्ध व्यय की पूर्ति के लिए शिवाजी ने मुग़ल साम्राज्य के समृद्ध व्यापारिक नगरों को लक्ष्य बनाने का निश्चय किया।
➣ उस समय सूरत पश्चिमी व्यापारियों (अंग्रेज़, डच तथा अन्य यूरोपीय व्यापारियों) का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र तथा हज यात्रा पर जाने वाले भारतीय मुसलमानों का प्रमुख बंदरगाह था। यह मुग़ल साम्राज्य के सबसे समृद्ध नगरों में से एक माना जाता था।
➣ 15 दिसम्बर, 1663 ई. को लगभग 8,000 (कुछ विवरणों के अनुसार 4,000) घुड़सवारों के साथ राजगढ़ से प्रस्थान कर वे 5 जनवरी, 1664 ई. को सूरत के निकट पहुँचे।
➣ 6 जनवरी, 1664 ई. को शिवाजी ने एक साहसिक अभियान के अंतर्गत मुग़ल बंदरगाह सूरत पर आक्रमण किया।
➣ इससे पूर्व उन्होंने अपने दूत के माध्यम से फ़ौजदार इनायत ख़ाँ तथा नगर के प्रमुख व्यापारियों को संदेश भेजा कि यदि निर्धारित खण्डनी (क्षतिपूर्ति) दे दी जाए, तो नगर को कोई क्षति नहीं पहुँचाई जाएगी।
➣ किंतु इनायत ख़ाँ ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और प्रभावी प्रतिरोध किए बिना किले में जाकर छिप गया।
➣ इसके बाद लगभग छह दिनों तक नगर में लूटपाट चली, जिसमें शिवाजी ने मुख्यतः धनाढ्य व्यापारियों, मुग़ल अधिकारियों तथा शाही सम्पत्ति को निशाना बनाया।
➣ सामान्य जनता, महिलाओं, मन्दिरों, मस्जिदों तथा गिरजाघरों को यथासंभव क्षति नहीं पहुँचाई गई। शिवाजी के आदेश पर एक ईसाई मिशनरी तथा एक डच परिवार को भी सुरक्षित रहने दिया गया।
➣ इस लूट में शिवाजी को अनुमानतः एक करोड़ रुपये मूल्य की सम्पत्ति (नक़दी, सोना, चाँदी, मोती एवं बहुमूल्य वस्त्र) प्राप्त हुई, जिसे सुरक्षित रूप से राजगढ़ पहुँचाया गया।
➣ इसी धन के एक बड़े भाग का उपयोग आगे चलकर सिंधुदुर्ग किले (निर्माण प्रारम्भ: 25 नवम्बर, 1664 ई.) तथा मराठा नौसेना के विस्तार में किया गया।
➣ इस घटना का उल्लेख अंग्रेज़, डच तथा अन्य यूरोपीय व्यापारियों के समकालीन अभिलेखों में भी मिलता है। विशेष रूप से सूरत स्थित अंग्रेज़ फैक्ट्री के अध्यक्ष जॉर्ज ऑक्सिंडेन के अभिलेख इस घटना की ऐतिहासिक प्रामाणिकता की पुष्टि करते हैं।
➣ सूरत की लूट से क्षुब्ध होकर औरंगज़ेब ने इनायत ख़ाँ को हटाकर ग़यासुद्दीन ख़ाँ को नया फ़ौजदार नियुक्त किया तथा शिवाजी का दमन करने के लिए अनुभवी राजपूत सेनापति राजा जयसिंह एवं दिलेर ख़ाँ को दक्षिण भेजा।
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 15 दिसम्बर, 1663 | राजगढ़ से प्रस्थान |
| 5 जनवरी, 1664 | सूरत के निकट पहुँचे |
| 6 जनवरी, 1664 | सूरत पर आक्रमण |
| लगभग 6 दिन | लूट जारी रही |
शिवाजी एवं मिर्जा राजा जयसिंह (1665 ई.)
➣ 1664 ई. में सूरत की लूट से क्रोधित होकर औरंगज़ेब ने शिवाजी के विरुद्ध एक व्यापक सैन्य अभियान चलाने का निश्चय किया। इसके लिए मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम को प्रधान सेनापति तथा दिलेर ख़ाँ को उनके सहयोगी के रूप में दक्कन भेजा गया।
➣ इससे पूर्व दक्कन में शहज़ादा मुअज्ज़म तथा राजा जसवंत सिंह मुगल अभियान का नेतृत्व कर रहे थे, किंतु अपेक्षित सफलता न मिलने पर उनकी जगह मिर्जा राजा जयसिंह और दिलेर ख़ाँ को नियुक्त किया गया।
➣ मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम ने बीजापुर के सुल्तान से समझौता कर अपनी रणनीति के प्रथम चरण में अप्रैल, 1665 ई. में वज्रगढ़ (रुद्रमाल) के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इसके बाद मुगल सेना ने पुरंदर दुर्ग का घेरा डाल दिया।
➣ पुरंदर दुर्ग की रक्षा करते हुए शिवाजी के वीर सेनानायक मुरारबाजी देशपांडे वीरगति को प्राप्त हुए।
➣ परिस्थितियाँ प्रतिकूल होने पर शिवाजी ने मिर्जा राजा जयसिंह के साथ संधि करने का निर्णय लिया, जिसके परिणामस्वरूप आगे चलकर पुरंदर की संधि (1665 ई.) संपन्न हुई।
पुरंदर की संधि (1665 ई.)
➣ 11 जून, 1665 ई. (कुछ स्रोतों में 24 जून, 1665 ई.) को मिर्जा राजा जयसिंह तथा शिवाजी के मध्य पुरंदर की संधि हुई। यह संधि पुरंदर दुर्ग के मुगल घेरे तथा प्रतिकूल परिस्थितियों के परिणामस्वरूप संपन्न हुई।
❖ शिवाजी ने लगभग चार लाख हूण वार्षिक आय वाले 23 दुर्ग मुगलों को सौंप दिए तथा लगभग एक लाख हूण वार्षिक आय वाले 12 दुर्ग अपने अधिकार में रखे।
❖ शिवाजी के पुत्र शंभाजी को पंचहज़ारी मनसब प्रदान किया गया तथा उन्हें 5,000 घुड़सवारों के साथ मुगल सेवा में रहने की व्यवस्था की गई।
❖ शिवाजी को कोंकण एवं बालाघाट के कुछ क्षेत्र जागीर के रूप में दिए जाने थे। इसके बदले उन्हें 40 लाख हूण की राशि 13 वार्षिक किस्तों में मुगलों को अदा करनी थी।
❖ साथ ही उन्होंने बीजापुर के विरुद्ध मुगलों की सहायता करने का भी वचन दिया।
➣ औरंगज़ेब ने इस संधि को स्वीकार करते हुए शिवाजी के लिए फ़रमान तथा खिलअत (सम्मानस्वरूप राजकीय पोशाक एवं उपहार) भेजे।
➣ पुरंदर की संधि के बाद शिवाजी ने मिर्जा राजा जयसिंह के साथ मिलकर बीजापुर के विरुद्ध मुगल अभियान में भाग लिया। इसी संधि के परिणामस्वरूप आगे चलकर 1666 ई. में शिवाजी का आगरा जाना हुआ।
शिवाजी की आगरा यात्रा एवं कैद (1666 ई.)
➣ पुरंदर की संधि (1665 ई.) के पश्चात् मिर्जा राजा जयसिंह के आग्रह तथा सुरक्षा के आश्वासन पर शिवाजी मुगल सम्राट औरंगज़ेब से मिलने के लिए आगरा जाने को तैयार हुए।
➣ 12 मई, 1666 ई. को शिवाजी अपने पुत्र शंभाजी के साथ आगरा स्थित मुगल दरबार में उपस्थित हुए। उस दिन औरंगज़ेब का जन्मोत्सव समारोह आयोजित किया गया था।
➣ दरबार में अपेक्षित सम्मान न मिलने तथा निम्न श्रेणी के मनसबदारों के बीच खड़ा किए जाने से शिवाजी अत्यंत अप्रसन्न हुए। उन्होंने तत्काल अपना विरोध व्यक्त किया और दरबार से बाहर चले गए।
➣ इस घटना के बाद औरंगज़ेब ने शिवाजी एवं अल्पवयस्क पुत्र शंभाजी को जयपुर भवन में नज़रबंद कर दिया, जहाँ उन पर कड़ी निगरानी रखी गई।
➣ किन्तु 17 अगस्त, 1666 ई. को शिवाजी और शंभाजी नज़रबंदी से निकलने में सफल हुए। प्रचलित मत के अनुसार वे फल एवं मिठाइयों की टोकरियों के माध्यम से बाहर निकले। इसके पश्चात् वे विभिन्न स्थानों से होते हुए सितंबर, 1666 ई. में सुरक्षित रायगढ़ पहुँच गए।
शिवाजी एवं मुग़लों का पुनः समझौता (1667 ई.)
➣ कुछ समय बाद शिवाजी ने औरंगज़ेब से पत्र-व्यवहार किया और प्रस्ताव रखा कि यदि उन्हें क्षमा कर दिया जाए, तो वे सम्राट की ओर से दक्षिण में युद्ध करने के लिए तैयार हैं।
➣ उन्होंने यह भी प्रस्ताव रखा कि अपने पुत्र शंभाजी को युवराज मुअज्जम की सेवा में भेज सकते हैं।
➣ औरंगज़ेब ने शिवाजी की शर्तें स्वीकार कर उन्हें पुनः राजा की उपाधि प्रदान की।
➣ इस प्रकार जसवंत सिंह की मध्यस्थता से 1667 ई. में शिवाजी और मुग़लों के बीच पुनः संधि हुई।
➣ औरंगज़ेब ने शिवाजी को बरार की जागीर प्रदान की तथा उनके पुत्र शंभाजी को पुनः 5000 के मनसब और 1000 सवारों के साथ मुग़ल सेवा में नियुक्त करने का निर्णय लिया।
मिर्जा राजा जयसिंह की मृत्यु 1667 ई. में बुरहानपुर के निकट हुई। जयसिंह, औरंगज़ेब और शिवाजी के बीच समझौता कराने वाले प्रमुख मध्यस्थ थे।
सवाई जय सिंह जय सिंह के प्रपौत्र थे। ये वही सवाई जय सिंह थे जिन्होंने आगे चलकर जयपुर नगर की स्थापना की तथा जंतर-मंतर वेधशालाओं का निर्माण कराया।
संधि का उल्लंघन (1670 ई.)
➣ 1667-1669 ई. के लगभग तीन वर्षों का उपयोग शिवाजी ने अपने विजित प्रदेशों को सुदृढ़ करने तथा प्रशासनिक व्यवस्था को सशक्त बनाने में किया।
➣ 1670 ई. में शिवाजी ने पुरन्दर की संधि का उल्लंघन करते हुए मुग़लों को दिए गए 23 किलों में से अधिकांश पर पुनः अधिकार कर लिया।
➣ इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण कोंडाना दुर्ग था, जिसे शिवाजी के सेनापति तानाजी मालुसरे ने जीता। फ़रवरी, 1670 ई. में शिवाजी ने इसका नाम बदलकर सिंहगढ़ रख दिया।
➣ कोंडाना दुर्ग को जीतते समय तानाजी मालुसरे वीरगति को प्राप्त हुए। इस पर शिवाजी ने कहा- गढ़ आया, पर सिंह चला गया।
सूरत की दूसरी लूट (1670 ई.)
➣ 3-6 अक्टूबर, 1670 ई. को शिवाजी ने अत्यंत तीव्र गति से घुड़सवार सेना के साथ लगभग 300 किमी की दूरी तय कर सूरत पर आक्रमण कर दिया और लगातार तीन-चार दिनों तक इस समृद्ध बंदरगाह नगर को लूटा।
यह उनकी दूसरी सूरत-लूट थी (पहली लूट जनवरी 1664 ई. में हुई थी)।
➣ इस बार सूरत का मुग़ल फ़ौजदार इनायत खाँ था, जो नगर की रक्षा किए बिना क़िले में जा छिपा। शिवाजी ने पहले उससे हर्जाने के रूप में एक करोड़ रुपये की माँग की थी, किंतु मुग़ल अधिकारी ने इसे अनसुना कर दिया, जिसके बाद लूट प्रारम्भ हुई।
➣ इस लूट में शिवाजी को कुल मिलाकर लगभग 66 लाख रुपये की सम्पत्ति प्राप्त हुई (कुछ अंग्रेज़ी विवरणों में यह राशि अधिक बताई गई है)। ध्यातव्य है कि इस दौरान शिवाजी ने डच, फ़्रांसीसी तथा अंग्रेज़ों की व्यापारिक कोठियों (फैक्ट्रियों) को क्षति न पहुँचाने का आदेश दिया, जिससे उनकी युद्ध-नीति में चयनात्मकता स्पष्ट झलकती है।
➣ इस महत्त्वपूर्ण सफलता के बाद शिवाजी ने दक्षिण की मुग़ल रियासतों ही नहीं, बल्कि उनके अधीनस्थ राज्यों से भी चौथ (भू-राजस्व का 1/4 भाग) एवं सरदेशमुखी (अतिरिक्त 1/10 भाग) वसूल करना प्रारम्भ कर दिया, जो आगे चलकर मराठा राजस्व-व्यवस्था का स्थायी आधार बना।
➣ सूरत की दूसरी लूट से लौटते समय शिवाजी की सेना का सामना मुग़ल सेनापति दाऊद खाँ (दाऊद ख़ाँ क़ुरैशी) के नेतृत्व में आ रही एक बड़ी मुग़ल सेना से हुआ।
➣ कंचन-मंचन दर्रे के निकट हुए इस वाणी-डिंडोरी के युद्ध (17 अक्टूबर, 1670 ई.) में शिवाजी की सेना ने मुग़ल सेना को निर्णायक रूप से पराजित किया, जिससे लूट का सम्पूर्ण धन सुरक्षित स्वराज्य तक पहुँच गया।
दुर्गों पर पुनः अधिकार
➣ 1672 ई. में शिवाजी ने पन्हाला दुर्ग को बीजापुर से पुनः जीत लिया। इसके बाद उन्होंने पाली एवं सतारा के दुर्गों पर भी अधिकार कर लिया।
➣ 15 फ़रवरी, 1672 ई. को शिवाजी ने सलेहर दुर्ग पर भी अधिकार कर लिया।
➣ शिवाजी के विजय अभियान को रोकने के लिए औरंगज़ेब ने महावत ख़ाँ तथा बहादुर ख़ाँ को दक्षिण भेजा।
➣ इन दोनों की असफलता के बाद औरंगज़ेब ने बहादुर ख़ाँ के साथ दिलेर ख़ाँ को भी अभियान पर भेजा।
➣ 1670-1674 ई. के मध्य हुए लगभग सभी मुग़ल आक्रमणों में शिवाजी को सफलता मिली। इस दौरान उन्होंने सलेहर, मुलेहर, जवाहर एवं रामनगर सहित अनेक दुर्गों पर अधिकार कर लिया।
➣ 1674 ई. तक शिवाजी ने उन अधिकांश प्रदेशों पर पुनः अधिकार कर लिया था, जिन्हें पुरन्दर की संधि के अंतर्गत मुग़लों को सौंपना पड़ा था।
➣ शिवाजी ने इन नव-विजित प्रदेशों के प्रशासन की व्यवस्था सुदृढ़ करने के लिए रघुनाथ नारायण हनुमते सहित अपने विश्वस्त अधिकारियों को विभिन्न प्रशासनिक दायित्व सौंपे।
शिवाजी का राज्याभिषेक (1674 ई.)
➣ पश्चिमी महाराष्ट्र में स्वतंत्र हिन्दू राज्य (हिन्दवी स्वराज्य) की स्थापना के बाद शिवाजी ने अपना औपचारिक राज्याभिषेक कराने का निश्चय किया।
➣ किन्तु महाराष्ट्र के कुछ रूढ़िवादी ब्राह्मणों ने इसका विरोध करते हुए उनसे क्षत्रिय होने का शास्त्रोक्त प्रमाण माँगा, क्योंकि परम्परागत रूप से राज्याभिषेक का अधिकार केवल क्षत्रिय कुल को ही प्राप्त माना जाता था।
➣ शिवाजी के सचिव बालाजी आवजी चिटणीस ने शिवाजी का संबंध मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश से जोड़ने वाले वंशावली-प्रमाण प्रस्तुत किए।
➣ काशी के प्रकाण्ड पंडित गागा भट्ट (मूल नाम विश्वेश्वर भट्ट) ने इन प्रमाणों की जाँच कर उन्हें स्वीकार करते हुए शिवाजी को विधिवत क्षत्रिय घोषित किया।
➣ तत्पश्चात ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, 6 जून, 1674 ई. को रायगढ़ दुर्ग पर वैदिक रीति-रिवाज़ों तथा वेदमंत्रों के उद्घोष के मध्य गागा भट्ट द्वारा शिवाजी का भव्य राज्याभिषेक सम्पन्न कराया गया। इस समारोह में भोंसले कुल के पुरोहित बाळंभट्ट ने भी सहयोग किया, तथा लगभग 50,000 लोग इस अवसर पर रायगढ़ में एकत्रित हुए।
➣ राज्याभिषेक के उपरान्त शिवाजी ने छत्रपति, गौब्राह्मण प्रतिपालक (गौ एवं ब्राह्मणों के रक्षक), यवन-परपीड़क (म्लेच्छों का संहारक), क्षत्रिय कुलावतंस (क्षत्रिय कुल का भूषण), हिन्दव धर्मोद्धारक तथा हिन्दू पादशाही जैसी उपाधियाँ धारण कीं और औपचारिक रूप से रायगढ़ को अपनी राजधानी घोषित किया।
➣ राज्याभिषेक के लगभग 12 दिन बाद (18 जून, 1674 ई.) उनकी माता जीजाबाई का निधन हो गया, जिसे कुछ लोगों ने अशुभ संकेत के रूप में देखा।
इस आशंका के निवारण हेतु 4 अक्टूबर, 1674 ई. को तांत्रिक सम्प्रदाय के विद्वान निश्चलपुरी गोस्वामी के मार्गदर्शन में तांत्रिक विधि से उनका दूसरा राज्याभिषेक कराया गया, जिसमें पुनः छत्रपति की उपाधि ग्रहण की गई।➣ राज्याभिषेक के अवसर पर शिवाजी ने अपनी सम्प्रभुता के प्रतीक स्वरूप स्वतंत्र मुद्राएँ जारी कीं- ताँबे का शिवराई तथा सोने का हूण सिक्का- और राज्याभिषेक शक/संवत् का प्रवर्तन किया, जो आगे मराठा राजकीय दस्तावेज़ों में प्रयुक्त होता रहा।
➣ बाद में गागा भट्ट शिवाजी के राजपुरोहित भी नियुक्त हुए, जिससे मराठा राजदरबार में उनका स्थायी सम्मानजनक स्थान बना रहा।
➣ राज्याभिषेक के बाद भी मुग़ल-प्रभावित क्षेत्रों तथा कुछ रूढ़िवादी ब्राह्मण वर्गों में शिवाजी को पूर्ण मान्यता देने में संकोच बना रहा, किन्तु इससे उनके शासन अथवा राज्याभिषेक की धार्मिक-राजनीतिक वैधता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
विजयनगर साम्राज्य के पतन (1565 ई.) के बाद दक्षिण भारत में यह पहला स्वतंत्र हिन्दू राज्य की औपचारिक स्थापना का उद्घोष था, जिसने हिन्दवी स्वराज्य की अवधारणा को राजनीतिक-धार्मिक वैधता प्रदान की।
अन्तिम अभियान (1677-78 ई.)
➣ 1677-78 ई. का कर्नाटक अभियान शिवाजी का अंतिम महत्त्वपूर्ण सैन्य अभियान था। इसका उद्देश्य बीजापुर के आदिलशाही शासन के अधीन कर्नाटक-तमिलनाडु क्षेत्र पर अधिकार करना तथा अपने सौतेले भाई एकोजी (व्यंकोजी) के तंजौर स्थित क्षेत्रों में अपने अधिकार का दावा स्थापित करना था।
➣ इस अभियान के लिए शिवाजी ने गोलकुण्डा के सुल्तान अबुल हसन क़ुतुबशाह से गुप्त संधि की। इस संधि को संपन्न कराने में गोलकुण्डा के प्रभावशाली मंत्रियों मदन्ना एवं अखन्ना की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
➣ संधि के अनुसार क़ुतुबशाह ने शिवाजी को प्रतिवर्ष एक लाख हूण देने, अपने दरबार में मराठा राजदूत रखने तथा अभियान के लिए सेना एवं धन उपलब्ध कराने पर सहमति दी। बदले में कर्नाटक विजय से प्राप्त सम्पत्ति का आधा भाग गोलकुण्डा को दिया जाना तय हुआ।
➣ गोलकुण्डा की राजधानी में शिवाजी का भव्य स्वागत किया गया। यह उस समय की दक्षिण भारतीय राजनीति की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी, क्योंकि मदन्ना एवं अखन्ना ने गोलकुण्डा, बीजापुर तथा मराठों के बीच सहयोग स्थापित कर मुग़लों के विरुद्ध शक्ति-संतुलन बनाने का प्रयास किया था।
➣ कर्नाटक अभियान के दौरान शिवाजी ने जिंजी, वेल्लोर तथा कर्नाटक-तमिलनाडु क्षेत्र के लगभग 100 दुर्गों पर अधिकार कर लिया।
➣ उन्होंने अपने सौतेले भाई एकोजी के कुछ क्षेत्रों पर भी अधिकार स्थापित किया तथा जिंजी दुर्ग को अपने दक्षिणी प्रशासन का प्रमुख केन्द्र बनाया।
➣ अभियान से लौटने पर शिवाजी ने क़ुतुबशाह के साथ हुई संधि के अनुसार विजय से प्राप्त सम्पत्ति का बँटवारा नहीं किया, जिससे दोनों पक्षों के संबंधों में तनाव उत्पन्न हो गया। हालांकि, यह विवाद किसी खुले युद्ध में परिवर्तित नहीं हुआ।
मृत्यु (1680 ई.)
➣ कर्नाटक अभियान से लौटने के बाद कुछ समय तक अस्वस्थ रहने के पश्चात् 3 अप्रैल, 1680 ई. को अपनी राजधानी रायगढ़ दुर्ग में शिवाजी का निधन हो गया।
➣ अपनी मृत्यु से पूर्व ही शिवाजी ने मुग़लों, बीजापुर के आदिलशाही शासकों, गोवा के पुर्तगालियों तथा जंजीरा के सिद्दियों (हब्शी/अबीसीनियाई) के प्रबल विरोध के बावजूद दक्षिण में एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य (हिन्दवी स्वराज्य) की स्थापना कर दी थी।
➣ उनके राज्य का विस्तार उत्तर में बेलगाँव से लेकर दक्षिण में तुंगभद्रा नदी तक तथा पश्चिम में कोंकण से पूर्व में देश (महाराष्ट्र का पठारी क्षेत्र) एवं पश्चिमी कर्नाटक के बड़े भाग तक था। इस प्रकार शिवाजी एक साधारण जागीरदार के उपेक्षित पुत्र से अपने पराक्रम, संगठन-क्षमता तथा दूरदर्शी नीति के बल पर एक स्वतंत्र राज्य के संस्थापक और शासक बने।
➣ शिवाजी की मृत्यु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र संभाजी ने मराठा राज्य की बागडोर संभाली। इसके साथ ही मुग़लों और मराठों के बीच संघर्ष का एक नया चरण आरम्भ हुआ, जो आगे चलकर मुग़ल-मराठा युद्ध (1680-1707 ई.) के रूप में विकसित हुआ और औरंगज़ेब की मृत्यु तक चलता रहा।
शिवाजी : प्रमुख घटनाएँ एवं तिथियाँ
| घटना | वर्ष |
|---|---|
| सिंहगढ़ (कोंडाना) पर अधिकार | 1643 ई. |
| तोरण दुर्ग विजय | 1646 ई. |
| मुरुंबदेव (राजगढ़) पर अधिकार | 1646 ई. |
| चाकन दुर्ग विजय | 1647 ई. |
| पुरन्दर दुर्ग विजय | 1654 ई. |
| जावली विजय | 1656 ई. |
| मुग़लों से प्रथम संघर्ष | 1657 ई. |
| कोंकण विजय | 1657–1659 ई. |
| अफ़ज़ल ख़ाँ वध | 1659 ई. |
| शाइस्ता ख़ाँ पर आक्रमण | 1663 ई. |
| सूरत की प्रथम लूट | 1664 ई. |
| पुरन्दर की संधि | 1665 ई. |
| राजा जयसिंह से संधि / पराजय | 1665 ई. |
| मुग़लों से पुनः संधि | 1667 ई. |
| सूरत की द्वितीय लूट | 1670 ई. |
| सल्हेर का युद्ध | 1672 ई. |
| पुरन्दर संधि में दिए गए किलों पर पुनः अधिकार | 1670–1674 ई. |
| रायगढ़ में राज्याभिषेक | 1674 ई. |
| कर्नाटक अभियान (अंतिम अभियान) | 1677–1678 ई. |
| मृत्यु | 1680 ई. |
शिवाजी के उत्तराधिकारी
शंभाजी (1680-89 ई.)
➣ शिवाजी की मृत्यु के पश्चात् उनका ज्येष्ठ पुत्र शंभाजी (जन्म: 14 मई, 1657 ई.; माता साईबाई) मराठा साम्राज्य का उत्तराधिकारी बना, यद्यपि उत्तराधिकार का प्रश्न प्रारम्भ से ही विवादास्पद रहा।
➣ शंभाजी ने उस समय शिवाजी के विरुद्ध विद्रोह कर दिया, जब उन्हें लगा कि शिवाजी अपनी दूसरी पत्नी सोयराबाई के प्रभाव में अपने छोटे (सौतेले) पुत्र राजाराम को अधिक महत्त्व दे रहे हैं।
➣ इसी असंतोष के कारण दिसम्बर, 1678 ई. में वे सतारा छोड़कर मुग़ल सूबेदार दिलेर ख़ाँ के पास चले गए।
➣ शिवाजी अपने पुत्र के इस व्यवहार से अत्यंत दुःखी हुए और उन्हें अनुशासित करने के लिए 1678 ई. में पन्हाला दुर्ग में नज़रबंद कर दिया। इसके बावजूद शंभाजी वहाँ से निकलकर मुग़लों से जा मिले।
➣ लगभग एक वर्ष (दिसम्बर, 1678 – नवम्बर, 1679 ई.) तक उनके साथ रहे। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि दिलेर ख़ाँ उन्हें बंदी बनाकर दिल्ली भेजना चाहता है, तब वे नवम्बर, 1679 ई. में पुनः स्वराज्य लौट आए, जिसके बाद उन्हें फिर से पन्हाला में रखा गया।
➣ शिवाजी की मृत्यु (3 अप्रैल, 1680 ई.) के समय भी शंभाजी पन्हाला में ही थे तथा किसी आधिकारिक उत्तराधिकारी की घोषणा नहीं की गई थी। इसका लाभ उठाकर उनकी सौतेली माता सोयराबाई ने अपने पुत्र राजाराम का राज्याभिषेक करवा दिया।
➣ यह समाचार मिलते ही शंभाजी ने अपने समर्थकों की सहायता से पन्हाला के किलेदार को परास्त कर दुर्ग पर अधिकार कर लिया और रायगढ़ की ओर कूच किया। मराठा सेनापति हम्बीरराव मोहिते के समर्थन से वे शासक बने तथा राजाराम, उनकी पत्नी जानकीबाई और सोयराबाई को बंदी बना लिया गया।
➣ इसके बाद शंभाजी ने हम्बीरराव मोहिते को अपना सेनापति नियुक्त किया। उल्लेखनीय है कि आगे चलकर प्रसिद्ध मराठा महारानी ताराबाई इन्हीं हम्बीरराव मोहिते की पुत्री थीं।
➣ शंभाजी ने निलोपंत को अपना पेशवा नियुक्त किया तथा उज्जैन/कन्नौज के हिन्दी एवं संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान कवि कलश को अपना मुख्य सलाहकार बनाया, जो उनके अत्यंत विश्वासपात्र सिद्ध हुए।
➣ मुग़लों के साथ रहने के दौरान (1678-79 ई.) शंभाजी को दिलेर ख़ाँ के माध्यम से मुग़ल सेवा में 7,000 का मनसब प्रदान किया गया था, किन्तु स्वराज्य लौटते ही उनका यह संबंध समाप्त हो गया।
➣ शिवाजी की मृत्यु का समाचार मिलने पर औरंगज़ेब ने सम्पूर्ण भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के उद्देश्य से विशाल मुग़ल सेना के साथ 1681-82 ई. में स्वयं दक्षिण भारत का अभियान प्रारम्भ किया।
➣ दक्षिण पहुँचने के बाद औरंगज़ेब ने क्रमशः बीजापुर की आदिलशाही (1686 ई.) तथा गोलकुण्डा की क़ुतुबशाही (1687 ई.) को समाप्त कर मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया।
➣ इसके बावजूद शंभाजी के नेतृत्व में मराठाओं ने लगभग नौ वर्षों (1680-1689 ई.) तक मुग़लों का दृढ़तापूर्वक सामना किया और मराठा स्वाधीनता को बनाए रखा।
➣ 1681 ई. में औरंगज़ेब के पुत्र शहज़ादा अकबर ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। शंभाजी ने उसे अपने राज्य में शरण दी, किन्तु दोनों के बीच समुचित समन्वय न होने के कारण औरंगज़ेब के विरुद्ध कोई प्रभावी संयुक्त अभियान नहीं चल सका।
➣ अन्ततः फ़रवरी, 1689 ई. में शंभाजी की पत्नी येसूबाई के भाई गणोजी शिर्के की मुखबिरी के कारण शंभाजी को संगमेश्वर में मुग़ल सेनापति मुक़र्रब ख़ाँ ने बंदी बना लिया।
➣ शंभाजी तथा कवि कलश को औरंगज़ेब के समक्ष प्रस्तुत किया गया। इस्लाम स्वीकार करने से इनकार करने पर 11 मार्च, 1689 ई. को दोनों को अत्यंत क्रूरतापूर्वक मृत्युदण्ड दे दिया गया।
➣ इसके बाद औरंगज़ेब ने सेनापति ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ को मराठा राजधानी रायगढ़ पर आक्रमण का आदेश दिया। इस अवसर पर रायगढ़ की रक्षा की व्यवस्था में येसूबाई ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ दीर्घ घेराबंदी के बाद मुग़लों ने रायगढ़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया तथा येसूबाई और उनके पुत्र शाहू को बंदी बना लिया। इसके बावजूद मराठा सरदारों ने राजाराम के नेतृत्व में संघर्ष जारी रखा, जिससे मराठा राज्य का अस्तित्व बना रहा।
राजाराम (1689-1700 ई.)
➣ राजाराम का शासनकाल मराठा इतिहास के सबसे कठिन दौर में आता है – रायगढ़ पतन, शाहू की बंदी तथा जिंजी की दीर्घ घेराबंदी के बावजूद उन्होंने हिन्दवी स्वराज्य को समाप्त नहीं होने दिया।
➣ शंभाजी की मृत्यु (11 मार्च, 1689 ई.) के पश्चात् उनके सौतेले भाई राजाराम (शिवाजी के द्वितीय पुत्र, माता सोयराबाई) को मराठा सरदारों एवं मंत्रिपरिषद की सहमति से नया छत्रपति बनाया गया।
➣ शंभाजी का पुत्र शाहू भी 1689 ई. में अपनी माता येसूबाई के साथ मुग़लों का बंदी बन गया था। यद्यपि उत्तराधिकार की दृष्टि से शाहू का दावा अधिक मजबूत था, फिर भी तत्कालीन परिस्थितियों में राजाराम को शासन की बागडोर संभालनी पड़ी।
➣ राजाराम ने हिन्दवी स्वराज्य की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए मराठा राज्य का नेतृत्व संभाला तथा मुग़लों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा।
➣ मुग़लों के निरंतर दबाव के बीच राजाराम ने मराठा सरदारों को स्वतंत्र रूप से सेना रखने तथा अपने-अपने क्षेत्रों में अपेक्षाकृत स्वायत्त रूप से कार्य करने की छूट दी। उन्होंने संताजी घोरपड़े तथा धनाजी जाधव जैसे प्रमुख सरदारों को जागीरें भी प्रदान कीं।
➣ परिणामस्वरूप केंद्रीकृत मराठा राज्य धीरे-धीरे एक विकेंद्रीकृत मराठा परिसंघ (मराठा कन्फेडरेसी) के रूप में विकसित होने लगा, जिसने आगे चलकर 18वीं शताब्दी के मराठा साम्राज्य की नींव रखी।
➣ 1689 ई. में जिंजी पहुँचने के बाद राजाराम ने प्रशासन को सुदृढ़ बनाने के लिए पंत प्रतिनिधि नामक नया पद सृजित किया, जो राजा के प्रतिनिधि के रूप में अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता था। इससे अष्टप्रधान व्यवस्था का विस्तार हुआ।
➣ बाद में उन्होंने हुकुमत पन्हा नामक एक अन्य महत्त्वपूर्ण पद भी सृजित किया, जिससे प्रशासनिक संरचना और अधिक सुदृढ़ हुई।
➣ रायगढ़ पर मुग़ल आक्रमण की आशंका के कारण राजाराम प्रतापगढ़, सज्जनगढ़, सतारा एवं पन्हाळगढ़ होते हुए दक्षिण की ओर चले गए। पन्हाळगढ़ पर भी मुग़लों ने घेरा डाल दिया, किन्तु 26 सितम्बर, 1689 ई. को वे गुप्त रूप से निकलकर अंततः जिंजी दुर्ग पहुँच गए।
➣ राजाराम ने पहले जिंजी तथा बाद में सतारा को अपनी राजधानी बनाया। लगभग 1698 ई. तक जिंजी मराठा प्रतिरोध का प्रमुख केन्द्र बना रहा, जहाँ से उन्होंने औरंगज़ेब के विरुद्ध संघर्ष का संचालन किया।
➣ मुग़ल सेनापति ज़ुल्फ़िकार ख़ाँ ने जिंजी पर दीर्घकाल तक अभियान चलाया और अंततः 1698 ई. में मुग़लों ने जिंजी दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इससे पहले ही राजाराम सुरक्षित रूप से महाराष्ट्र लौट चुके थे।
➣ 1699 ई. से सतारा मराठों की नई राजधानी बनी।
➣ राजाराम ने अपने कुशल सेनापतियों संताजी घोरपड़े एवं धनाजी जाधव के सहयोग से मुग़लों के विरुद्ध छापामार युद्ध जारी रखा। 2 मार्च, 1700 ई. को सिंहगढ़ दुर्ग में बीमारी के कारण उनका निधन हो गया।
➣ राजाराम की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ताराबाई ने अपने चार वर्षीय पुत्र शिवाजी द्वितीय को गद्दी पर बैठाया और स्वयं संरक्षिका बनकर मुग़लों के विरुद्ध संघर्ष का सफल नेतृत्व किया।
शिवाजी द्वितीय (1700-1707 ई.)
➣ राजाराम के बड़े भाई शंभाजी के पुत्र तथा वैध उत्तराधिकारी शाहू को 1689 ई. से ही मुग़लों ने बंदी बना रखा था। इसलिए मराठा राज्य की गद्दी उन तक नहीं पहुँच सकी।
➣ इसी कारण राजाराम की मृत्यु (2 मार्च, 1700 ई.) के बाद उनके अल्पवयस्क पुत्र शिवाजी द्वितीय (लगभग चार वर्ष की आयु में) को सतारा की गद्दी पर बैठाया गया तथा उनकी माता ताराबाई ने संरक्षिका (रीजेंट) के रूप में शासन की वास्तविक बागडोर संभाली।
➣ ताराबाई एक अत्यंत कुशल एवं दृढ़-निश्चयी शासिका सिद्ध हुईं। उन्होंने धनाजी जाधव जैसे योग्य सेनापतियों के सहयोग से मुग़लों के विरुद्ध छापामार युद्ध-नीति (गनीमी कावा) को प्रभावी ढंग से जारी रखा।
➣ साथ ही मुग़ल क्षेत्रों से चौथ एवं सरदेशमुखी की वसूली को भी सुदृढ़ किया, जिससे मराठा शक्ति निरंतर बढ़ती गई।
➣ 3 मार्च, 1707 ई. को दक्षिण के अहमदनगर के निकट औरंगज़ेब की मृत्यु हो गई। इसके बाद उसके पुत्रों-मुअज्जम, आज़म शाह तथा कामबख्श-के बीच उत्तराधिकार का युद्ध छिड़ गया।
➣ 18 जून, 1707 ई. को जाजऊ के युद्ध में मुअज्जम ने आज़म शाह को पराजित कर मुग़ल सिंहासन प्राप्त किया और बहादुर शाह प्रथम (शाह आलम प्रथम) की उपाधि धारण की।
➣ बहादुर शाह प्रथम ने अपेक्षाकृत उदार नीति अपनाते हुए लंबे समय से बंदी शाहू को मुग़ल कैद से मुक्त कर महाराष्ट्र लौटने की अनुमति दी। यह घटना मराठा इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई, क्योंकि इसके बाद ताराबाई और शाहू के बीच उत्तराधिकार का संघर्ष प्रारम्भ हुआ।
औरंगज़ेब की मृत्यु के समय मराठा नेतृत्व का वास्तविक संचालन ताराबाई के हाथों में था।
शाहूजी (1707-1749 ई.)
➣ यह शंभाजी के पुत्र तथा मराठा राजगद्दी के वैध उत्तराधिकारी थे। इनका जन्म 1682 ई. में माता येसूबाई से हुआ था।
➣ कुछ परम्पराओं के अनुसार औरंगज़ेब ने इनके सरल एवं सौम्य स्वभाव से प्रभावित होकर इन्हें “शाहू” कहना प्रारम्भ किया, यद्यपि इस संबंध में समकालीन ऐतिहासिक प्रमाण स्पष्ट नहीं हैं।
➣ 1689 ई. में मुग़लों द्वारा रायगढ़ पर अधिकार करने के बाद बाल्यावस्था में ही शाहू को उनकी माता येसूबाई सहित बंदी बना लिया गया।
➣ मुग़ल कैद में रहते हुए उन्हें औपचारिक रूप से “राजा” की उपाधि तथा 7,000 का मनसब प्रदान किया गया। यह मुग़लों की राजनीतिक नीति का भाग था, जिससे भविष्य में मराठों के भीतर मतभेद उत्पन्न किए जा सकें।
➣ 3 मार्च, 1707 ई. को औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद बहादुर शाह प्रथम (मुअज्जम) ने मराठों में आंतरिक फूट डालने के उद्देश्य से अपने सरदार ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ की सलाह पर 8 मई, 1707 ई. को शाहू को मुक्त कर महाराष्ट्र लौटने की अनुमति दी।
➣ लगभग 18 वर्षों तक बंदी रहने के बाद जब शाहू महाराष्ट्र पहुँचे, तब तक उनकी चाची ताराबाई अपने पुत्र शिवाजी द्वितीय के नाम पर शासन चला रही थीं।
➣ शाहू ने अपने वैध उत्तराधिकार का दावा प्रस्तुत किया, जिसे ताराबाई ने स्वीकार नहीं किया। परिणामस्वरूप दोनों पक्षों के बीच संघर्ष आरम्भ हुआ, जो आगे चलकर खेड़ के युद्ध में परिणत हुआ।
खेड़ा का युद्ध (1707 ई.)
➣ अक्टूबर, 1707 ई. (कुछ स्रोतों के अनुसार 12 अक्टूबर) में चाची ताराबाई तथा भतीजे शाहू के मध्य मराठा राजगद्दी की वैधता को लेकर खेड़ा का युद्ध हुआ। यह मराठा इतिहास का पहला प्रमुख उत्तराधिकार-संघर्ष माना जाता है।
➣ इस युद्ध से पूर्व बालाजी विश्वनाथ ने अपनी कूटनीति से मराठा सेनापति धनाजी जाधव को शाहू के पक्ष में कर लिया। धनाजी जाधव के समर्थन से शाहू की स्थिति अत्यंत सुदृढ़ हो गई और अंततः उन्हें निर्णायक विजय प्राप्त हुई।
➣ विजय के पश्चात् 22 जनवरी, 1708 ई. को सतारा में शाहू का विधिवत राज्याभिषेक सम्पन्न हुआ। पराजित ताराबाई अपने प्रमुख समर्थकों के साथ पन्हाला चली गईं, जहाँ से उन्होंने अपने पुत्र के नाम पर समानान्तर शासन जारी रखा।
➣ शाहू ने प्रशासनिक पुनर्गठन के क्रम में 1708 ई. में बालाजी विश्वनाथ को सेनाकर्ते नियुक्त किया। उनकी असाधारण योग्यता एवं निष्ठा से प्रभावित होकर 1713 ई. में उन्हें पेशवा (प्रधानमंत्री) बना दिया गया।
➣ खेड़ा युद्ध के परिणामस्वरूप मराठा राज्य व्यावहारिक रूप से सतारा एवं कोल्हापुर दो प्रतिद्वन्द्वी शाखाओं में विभाजित हो गया। आगे चलकर 1731 ई. की वारना की संधि द्वारा दोनों शाखाओं के बीच सीमा एवं अधिकारों का औपचारिक निर्धारण किया गया।
➣ वारना की संधि के अनुसार शम्भाजी द्वितीय को कोल्हापुर राज्य पर शासन करने का अधिकार मिला, जबकि शाहू का अधिकार सतारा राज्य पर यथावत बना रहा।
➣ शाहू के शासनकाल में मराठा साम्राज्य में पेशवाओं के युग का आरम्भ हुआ। बालाजी विश्वनाथ ने बिखरे हुए मराठा सरदारों को पुनः संगठित किया तथा मुग़लों से चौथ एवं सरदेशमुखी के अधिकार को मान्यता दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ आगे चलकर विशेषकर बाजीराव प्रथम के समय से पेशवा मराठा साम्राज्य के वास्तविक शासक बन गए, जबकि छत्रपति का पद धीरे-धीरे औपचारिकरह गया।
राजाराम द्वितीय (1749-1777 ई.)
➣ शाहू निःसंतान थे। अपने जीवन के अंतिम समय में उन्होंने रामराजा (राजाराम द्वितीय) को, जिन्हें ताराबाई ने अपना पौत्र बताया था, गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। फलस्वरूप 1749 ई. में शाहू की मृत्यु के बाद राजाराम द्वितीय सतारा की गद्दी पर बैठे।
➣ राजाराम द्वितीय का शासनकाल आरम्भ से ही नाममात्र का रहा, क्योंकि वास्तविक प्रशासनिक एवं सैन्य सत्ता पेशवा बालाजी बाजीराव तथा अन्य प्रभावशाली मराठा सरदारों के हाथों में केंद्रित हो चुकी थी।
➣ 14 जनवरी, 1750 ई. को राजाराम द्वितीय तथा पेशवा बालाजी बाजीराव के मध्य रघुजी भोंसले की मध्यस्थता से संगोला की संधि सम्पन्न हुई।
➣ इस संधि के परिणामस्वरूप मराठा छत्रपति की अधिकांश वास्तविक शक्तियाँ औपचारिक रूप से पेशवा को हस्तांतरित हो गईं और राजाराम द्वितीय केवल नाममात्र के शासक रह गए।
➣ संगोला की संधि के बाद मराठा साम्राज्य की वास्तविक राजनीतिक एवं सैन्य शक्ति का केंद्र सतारा से हटकर स्थायी रूप से पूना (पुणे) बन गया। आगे चलकर इसी व्यवस्था के आधार पर मराठा परिसंघ का विकास हुआ, जिसमें पेशवा सर्वोच्च कार्यकारी शक्ति के रूप में उभरे।
➣ संगोला की संधि के पीछे एक महत्त्वपूर्ण पारिवारिक विवाद भी था। प्रारम्भ में ताराबाई ने रामराजा (राजाराम द्वितीय) को अपने पुत्र शिवाजी द्वितीय का पुत्र बताकर शाहू का उत्तराधिकारी बनवाया था।
➣ किन्तु बाद में जब पेशवा बालाजी बाजीराव से उनके संबंध बिगड़ गए और राजाराम द्वितीय ने पेशवा का विरोध करने से इनकार कर दिया, तब 24 नवम्बर, 1750 ई. को ताराबाई ने उन्हें सतारा में बंदी बना लिया।
➣ इसके बाद उन्होंने यह दावा भी किया कि राजाराम द्वितीय वास्तव में उनके पौत्र नहीं, बल्कि एक गोंधळी परिवार का व्यक्ति था, जिसे उन्होंने राजनीतिक कारणों से अपना पौत्र बताया था।
➣ इस विवाद का लाभ उठाकर पेशवा बालाजी बाजीराव ने मराठा शासन की वास्तविक सत्ता को अपने हाथों में और अधिक सुदृढ़ कर लिया, जबकि राजाराम द्वितीय औपचारिक रूप से छत्रपति बने रहे।
अन्य उत्तराधिकारी
➣ राजाराम द्वितीय के पश्चात् शाहू द्वितीय (1777-1808 ई.) सतारा की नाममात्र की गद्दी पर बैठे। इस काल में वास्तविक सत्ता पेशवा-प्रशासन के हाथों में केंद्रित थी।
➣ प्रभावशाली प्रशासक नाना फड़नवीस ने अपने प्रशासनिक नियंत्रण को सुदृढ़ करने की नीति के अंतर्गत शाहू द्वितीय को मिलने वाले राजकीय भत्तों में कटौती कर दी, जिससे छत्रपति पद की वास्तविक शक्ति और भी क्षीण हो गई।
➣ शाहू द्वितीय के पश्चात् प्रतापसिंह (1808-1839 ई.) सतारा के शासक बने। यह वह काल था जब मराठा साम्राज्य का प्रभाव निरंतर घट रहा था।
1818 ई. में तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद पेशवा पद का अंत हो गया। इसके पश्चात् अंग्रेज़ों ने प्रतापसिंह को सतारा रियासत का शासक स्वीकार किया, यद्यपि यह राज्य ब्रिटिश संरक्षण के अधीन था।➣ प्रतापसिंह के पश्चात् उनके भाई शाहजी (अप्पा साहिब) (1839-1848 ई.) सतारा के शासक बने। 1848 ई. में उनकी निःसंतान मृत्यु हो गई।
➣ उन्होंने मृत्यु से पूर्व एक पुत्र गोद लेने की अनुमति ब्रिटिश सरकार से माँगी थी, किन्तु तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौज़ी ने इस आग्रह को अस्वीकार कर हड़प नीति के प्रारम्भिक एवं प्रमुख प्रयोगों में से एक के रूप में सतारा रियासत को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया।
सतारा का विलय (1848 ई.) डलहौजी की हड़प नीति के अंतर्गत विलय की गई पहली रियासत थी, जिसने आगे चलकर झाँसी, नागपुर, संबलपुर जैसी अनेक रियासतों के विलय का मार्ग प्रशस्त किया।
अन्य बिंदु : एक नज़र में
➣ बालाजी विश्वनाथ भट्ट की मृत्यु के पश्चात् उनका पुत्र बाजीराव प्रथम (1720-1740 ई.) पेशवा नियुक्त हुआ। उसने हिन्दू पद-पादशाही की नीति का अनुसरण करते हुए मराठा शक्ति का व्यापक विस्तार किया तथा विभिन्न मराठा सरदारों को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया।
➣ 1737 ई. में बाजीराव प्रथम दिल्ली तक पहुँचने वाला पहला मराठा सेनानायक बना। उसने मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह (1719-1748 ई.) को पराजित कर मराठा शक्ति का प्रभाव दिल्ली तक स्थापित किया।
➣ बाजीराव प्रथम के पश्चात् उनके पुत्र बालाजी बाजीराव (नानासाहेब) (1740-1761 ई.) पेशवा बने। 14 जनवरी, 1750 ई. को मराठा छत्रपति राजाराम द्वितीय तथा पेशवा बालाजी बाजीराव के मध्य संगोला की संधि हुई।
➣ इस संधि के परिणामस्वरूप मराठा राज्य की वास्तविक सत्ता पेशवा के हाथों में केंद्रित हो गई। मराठा राजनीति का केंद्र सतारा से स्थायी रूप से पूना (पुणे) स्थानांतरित हो गया तथा छत्रपति का पद मुख्यतः औपचारिक रह गया।
➣ बालाजी बाजीराव (1740-1761 ई.) के शासनकाल में 1761 ई. का पानीपत का तृतीय युद्ध हुआ, जिसमें मराठों को अहमद शाह अब्दाली के विरुद्ध भारी पराजय का सामना करना पड़ा। मराठा सेना का नेतृत्व सदाशिवराव भाऊ ने किया था।
➣ उनके पश्चात् क्रमशः माधवराव प्रथम (1761-1772 ई.), नारायणराव (1772-1773 ई.), रघुनाथराव (अल्पकाल) तथा सवाई माधवराव (माधवराव द्वितीय) (1774-1795 ई.) पेशवा बने।
➣ रघुनाथराव अपने भतीजे सवाई माधवराव के पेशवा बनने के विरोधी थे। इसी उद्देश्य से उन्होंने 1775 ई. में अंग्रेज़ों के साथ सूरत की संधि की।
➣ उल्लेखनीय है कि सूरत की संधि (1775 ई.) मराठों और अंग्रेज़ों के बीच पहली महत्त्वपूर्ण राजनीतिक संधि थी। इसी के परिणामस्वरूप अंग्रेज़ों को मराठा राजनीति में हस्तक्षेप का अवसर मिला तथा प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का आरम्भ हुआ।
➣ महत्त्व: भारत में अंग्रेज़ों के विस्तार का सबसे लंबे समय तक और सबसे प्रभावी ढंग से प्रतिरोध मराठों ने ही किया।
नोट: पेशवाओं के विषय में विस्तृत अध्ययन आधुनिक भारत (पेशवा काल (1713–1818 ई.) : उदय, शासन, आंग्ल–मराठा युद्ध एवं संधियाँ) अध्याय में किया गया है।
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