साम्राज्य विस्तार
➣ शिवाजी महाराज ने अनेक युद्धों एवं अपनी कुशल प्रशासनिक नीति के माध्यम से एक सुदृढ़ मराठा राज्य (स्वराज्य) की स्थापना की। उनकी मृत्यु 1680 ई. में हुई, उस समय उनका राज्य पुर्तग़ालियों के अधिकार वाले क्षेत्रों को छोड़कर लगभग सम्पूर्ण मराठा प्रदेश में विस्तृत था।
➣ पश्चिमी तट पर पुर्तग़ालियों का अधिकार रामनगर से लेकर करवार तक के कुछ समुद्री क्षेत्रों पर था, जबकि शेष अधिकांश क्षेत्र शिवाजी के प्रभाव में आ चुके थे।
➣ शिवाजी के राज्य की उत्तरी सीमा बागलना तक पहुँचती थी तथा दक्षिण में सतारा, कोल्हापुर एवं कोंकण के अधिकांश भाग उनके अधिकार में थे। पूर्व की ओर उनका प्रभाव नासिक एवं पूना क्षेत्र तक विस्तृत था।
मराठी अभिलेखों में शिवाजी के प्रत्यक्ष शासनाधीन प्रदेश को स्वराज्य कहा गया है।
मराठा राज्य के प्रमुख क्षेत्र
➣ शिवाजी के शासनकाल में मराठा राज्य को प्रशासनिक दृष्टि से दो प्रमुख भागों में विभाजित किया गया था।
| क्षेत्र | विशेषता |
|---|---|
| स्वराज्य | प्रत्यक्ष रूप से शिवाजी के प्रशासन एवं नियंत्रण में रहने वाला क्षेत्र। इसमें मुख्यतः मराठवाड़ा, कोंकण तथा कर्नाटक का एक बड़ा भाग सम्मिलित था। |
| मुगलई (मुल्क-ए-कदीम) | वे क्षेत्र जो शिवाजी के प्रत्यक्ष शासन में नहीं थे, किन्तु वहाँ से चौथ एवं सरदेशमुखी वसूली जाती थी। |
प्रशासनिक ढाँचा
➣ मराठा शासन व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी छत्रपति (राजा) होता था। वह राज्य का सर्वोच्च कार्यपालिका प्रमुख, न्यायाधीश, सेनापति तथा अंतिम कानून निर्माता था।
➣ शिवाजी के शासन में संपूर्ण प्रशासन का नियंत्रण स्वयं छत्रपति के हाथों में रहता था। वे प्रशासन के प्रत्येक महत्वपूर्ण निर्णय पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देते थे।
➣ शासन संचालन में सहायता के लिए शिवाजी ने अष्टप्रधान परिषद की स्थापना की।
अष्टप्रधान परिषद
➣ अष्टप्रधान परिषद का मुख्य उद्देश्य विभिन्न प्रशासनिक विभागों का संचालन करना तथा राजा को आवश्यक परामर्श देना था।
➣ यद्यपि अष्टप्रधान परिषद शासन संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी, फिर भी यह आधुनिक अर्थों में मंत्रिपरिषद (Cabinet) नहीं थी, क्योंकि इसके सदस्य राजा के प्रति पूर्णतः उत्तरदायी थे तथा स्वतंत्र रूप से कोई नीति निर्धारित नहीं कर सकते थे।
➣ शिवाजी प्रशासन की वास्तविक शक्ति अपने हाथों में रखते थे। अष्टप्रधान परिषद मुख्यतः सलाहकार एवं कार्यान्वयन संस्था के रूप में कार्य करती थी।
➣ बाद के काल में विशेषकर शाहू के शासनकाल में पेशवा का पद अत्यधिक शक्तिशाली हो गया तथा मराठा शासन का वास्तविक नियंत्रण धीरे-धीरे पेशवाओं के हाथों में चला गया।
➣ शिवाजी द्वारा स्थापित अष्टप्रधान परिषद में आठ प्रमुख अधिकारी सम्मिलित थे, जिनके अलग-अलग विभाग एवं दायित्व निर्धारित थे।
| पद | अन्य नाम | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| पेशवा | प्रधानमंत्री | समस्त प्रशासन का संचालन तथा राजा का प्रमुख सलाहकार |
| अमात्य | मजमूदार | वित्त एवं राजस्व विभाग का प्रमुख |
| मंत्री | वाकिया-नवीस | दरबार की दैनिक गतिविधियों एवं राजकीय घटनाओं का अभिलेख रखना |
| सचिव | शुरूनवीस | राजकीय पत्र-व्यवहार एवं शाही दस्तावेजों का संचालन |
| सुमंत | दबीर | विदेश विभाग एवं अन्य राज्यों से संबंध |
| सेनापति | सर-ए-नौबत | सेना की भर्ती, संगठन एवं सैन्य संचालन |
| पंडितराव | — | धार्मिक कार्य, दान एवं विद्वानों को अनुदान देना |
| न्यायाधीश | न्यायाधीश (न्यायाध्यक्ष) | राज्य का सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी |
अष्टप्रधान परिषद की प्रमुख विशेषताएँ
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| संख्या | 8 मंत्री |
| अध्यक्ष | छत्रपति |
| मुख्य कार्य | राजा को प्रशासनिक सहायता एवं परामर्श देना |
| नीति निर्माण | स्वतंत्र अधिकार नहीं था |
| उत्तरदायित्व | प्रत्यक्ष रूप से छत्रपति के प्रति उत्तरदायी |
| बाद का विकास | पेशवा का पद सर्वाधिक प्रभावशाली बन गया |
पेशवा का महत्व
➣ शिवाजी के समय पेशवा राजा का प्रधान मंत्री एवं प्रमुख सलाहकार था।
➣ कालांतर में विशेषकर शाहू के शासनकाल से पेशवा मराठा शासन का सबसे प्रभावशाली अधिकारी बन गया और प्रशासन की वास्तविक शक्ति उसके हाथों में केंद्रित हो गई।
प्रमुख प्रशासनिक प्रान्त
➣ प्रशासनिक सुविधा के लिए शिवाजी ने अपने राज्य को अनेक प्रान्तों में विभाजित किया तथा प्रत्येक प्रान्त की देखरेख योग्य अधिकारियों को सौंपी।
| प्रान्त | प्रमुख अधिकारी |
|---|---|
| उत्तरी प्रान्त | मोरो त्र्यंबक पिंगले |
| दक्षिण-पश्चिमी प्रान्त | अन्नाजी दत्तो |
| दक्षिण-पूर्वी प्रान्त | दत्ताजी पंत |
| दक्षिणी प्रान्त | रघुनाथ पंत हनुमंते |
प्रान्तीय प्रशासन
➣ मराठा राज्य को प्रशासनिक सुविधा के लिए प्रान्त, परगना, तरफ, मौजा (ग्राम) आदि इकाइयों में विभाजित किया गया था।
➣ प्रत्येक प्रान्त का सर्वोच्च अधिकारी सर-सूबेदार कहलाता था, जबकि परगने का प्रमुख अधिकारी मामलातदार होता था।
➣ परगनों के अंतर्गत तरफ़ तथा उनके अंतर्गत मौजे (गाँव) आते थे।
➣ दो या तीन गाँवों के प्रशासन की देखरेख कमाविसदार (कमविसदार) करता था।
मराठा प्रशासनिक इकाइयाँ
| प्रशासनिक इकाई | प्रमुख अधिकारी |
|---|---|
| प्रान्त | सर-सूबेदार |
| परगना | मामलातदार |
| तरफ़ | स्थानीय अधिकारी |
| मौजा (ग्राम) | पटेल / पाटिल |
| दो-तीन गाँवों का समूह | कमाविसदार |
✓ मराठा शासन का सर्वोच्च अधिकारी: छत्रपति
✓ अष्टप्रधान परिषद में कुल कितने सदस्य थे? आठ
✓ प्रधानमंत्री को क्या कहा जाता था? पेशवा
✓ वित्त मंत्री: अमात्य (मजमूदार)
✓ विदेश मंत्री: सुमंत (दबीर)
✓ राजकीय पत्र-व्यवहार का अधिकारी: सचिव (शुरूनवीस)
✓ धार्मिक कार्यों का प्रमुख: पंडितराव
✓ सेना का प्रमुख अधिकारी: सेनापति (सर-ए-नौबत)
✓ अष्टप्रधान परिषद आधुनिक मंत्रिमंडल क्यों नहीं थी? क्योंकि उसके सदस्य स्वतंत्र नीति-निर्माता नहीं थे तथा छत्रपति के प्रति उत्तरदायी थे।
✓ बाद के काल में सबसे शक्तिशाली पद कौन-सा बन गया? पेशवा
ग्राम प्रशासन
➣ ग्राम मराठा प्रशासन की सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई थी। गाँव का मुख्य अधिकारी पटेल (पाटिल) होता था।
➣ पटेल गाँव में भू-राजस्व संग्रह, कानून-व्यवस्था, न्यायिक कार्य तथा सामान्य प्रशासन का संचालन करता था।
➣ पटेल के अधीन कुलकर्णी कार्य करता था, जिसका मुख्य कार्य भूमि, किसानों एवं राजस्व का लेखा-जोखा रखना था।
➣ गाँवों में परंपरागत रूप से बारह बलूते (Balutedar) होते थे, जो विभिन्न वंशानुगत व्यवसायों एवं सेवाओं के माध्यम से ग्राम समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे।
➣ कुछ गाँवों में बारह अलूते भी होते थे, जो सहायक सेवाओं एवं अन्य स्थानीय कार्यों का निर्वहन करते थे।
ग्राम प्रशासन के प्रमुख अधिकारी
| अधिकारी / वर्ग | मुख्य कार्य |
|---|---|
| पटेल (पाटिल) | ग्राम प्रशासन, राजस्व, न्याय एवं कानून-व्यवस्था |
| कुलकर्णी | भूमि एवं राजस्व अभिलेखों का संधारण |
| बारह बलूते | वंशानुगत कारीगर एवं सेवा प्रदाता |
| बारह अलूते | ग्राम स्तर की सहायक सेवाएँ |
✓ मराठी अभिलेखों में शिवाजी के प्रत्यक्ष राज्य को क्या कहा गया? स्वराज्य
✓ स्वराज्य से बाहर के क्षेत्रों से कौन-से कर वसूले जाते थे? चौथ एवं सरदेशमुखी
✓ प्रान्त का प्रमुख अधिकारी: सर-सूबेदार
✓ परगने का प्रमुख अधिकारी: मामलातदार
✓ ग्राम का मुख्य अधिकारी: पटेल (पाटिल)
✓ भूमि अभिलेख कौन रखता था? कुलकर्णी
✓ बारह बलूते कौन थे? वंशानुगत कारीगर एवं सेवा प्रदाता
✓ दो-तीन गाँवों का प्रशासन कौन देखता था? कमाविसदार
मराठा राजस्व व्यवस्था
➣ शिवाजी की राजस्व व्यवस्था मुख्यतः अहमदनगर के मलिक अम्बर की रैयतवाड़ी व्यवस्था से प्रभावित थी। इस व्यवस्था में राज्य का प्रत्यक्ष संपर्क किसानों (रैयत) से स्थापित किया जाता था तथा मध्यस्थों की भूमिका को सीमित रखा गया।
➣ शिवाजी ने भूमि-राजस्व व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित एवं न्यायसंगत बनाने के लिए भूमि की पैमाइश, उत्पादन का आकलन तथा प्रत्यक्ष कर निर्धारण पर विशेष बल दिया।
➣ मराठा शासन में सैनिक एवं प्रशासनिक सेवाओं के बदले भूमि अथवा आय के अधिकार देने की व्यवस्था सरंजाम (मोकासा) कहलाती थी। यह सामान्य भू-राजस्व व्यवस्था से भिन्न थी।
राज्य की आय के प्रमुख स्रोत
➣ मराठा राज्य की आय अनेक स्रोतों से प्राप्त होती थी, जिनमें भूमि-राजस्व, व्यापारिक कर तथा चौथ एवं सरदेशमुखी सबसे महत्वपूर्ण थे।
| आय का स्रोत | विवरण |
|---|---|
| भूमि कर | राज्य की स्थायी आय का प्रमुख स्रोत |
| व्यापारिक कर | व्यापार एवं वाणिज्य से प्राप्त आय |
| चौथ | मराठा प्रभाव वाले क्षेत्रों से लिया जाने वाला 25% सैन्य संरक्षण कर |
| सरदेशमुखी | कुल आय का 10% वंशानुगत अधिकार कर |
| मोकासा (सरंजाम) | आय का स्रोत नहीं, बल्कि अधिकारियों को दिया जाने वाला भूमि/राजस्व अनुदान |
राजस्व व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| आधार | मलिक अम्बर की रैयतवाड़ी व्यवस्था |
| भूमि मापन | काठी द्वारा पैमाइश |
| राजस्व निर्धारण | भूमि की पैमाइश एवं उत्पादन के आधार पर |
| कृषक हित | ऋण, अनुदान एवं लगान में राहत |
| अतिरिक्त आय | चौथ एवं सरदेशमुखी |
| प्रशासनिक नीति | नकद वेतन को प्राथमिकता |
राजस्व प्रशासन
➣ प्रशासनिक सुविधा के लिए राज्य को अनेक प्रान्तों में विभाजित किया गया था। प्रत्येक प्रान्त के अंतर्गत तरफ़ तथा उनके अंतर्गत मौजे (ग्राम) होते थे।
➣ तरफ़ का प्रमुख अधिकारी कारकून कहलाता था, जो राजस्व एवं प्रशासनिक कार्यों का संचालन करता था।
मोकासा (सरंजाम) व्यवस्था
➣ मराठा शासन में मोकासा अथवा सरंजाम ऐसी भूमि अथवा राजस्व-अधिकार था, जिसे राज्य की ओर से प्रमुख सैनिक एवं प्रशासनिक अधिकारियों को उनकी सेवाओं के बदले प्रदान किया जाता था।
➣ सरंजाम का उद्देश्य योग्य सरदारों एवं अधिकारियों को राज्य के प्रति निष्ठावान बनाए रखना तथा आवश्यकता पड़ने पर उनसे सैन्य सेवा प्राप्त करना था।
➣ शिवाजी ने जहाँ तक संभव हुआ, उच्च अधिकारियों एवं सैनिकों को नकद वेतन देने की नीति अपनाई, जिससे जागीरदारी प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखा जा सके।
➣ किन्तु कुछ प्रमुख मराठा सरदारों को उनकी सेवाओं एवं सैन्य दायित्वों के बदले मोकासा (सरंजाम) भी प्रदान किया जाता था।
मोकासा (सरंजाम) की प्रमुख विशेषताएँ
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| स्वरूप | भूमि अथवा राजस्व-अधिकार का अनुदान |
| किसे दिया जाता था? | प्रमुख सैनिक एवं प्रशासनिक अधिकारियों को |
| उद्देश्य | सैन्य सेवा एवं प्रशासनिक दायित्वों के बदले पुरस्कार |
| शिवाजी की नीति | यथासंभव नकद वेतन, सीमित सरंजाम |
भूमि मापन एवं लगान निर्धारण
➣ शिवाजी ने भूमि की पैमाइश के आधार पर लगान निर्धारित करने की व्यवस्था अपनाई तथा भूमि को ठेके पर देने की प्रथा को समाप्त करने का प्रयास किया।
➣ भूमि की माप की प्रमुख इकाई काठी थी।
➣ प्रारम्भ में भूमि से प्राप्त उपज का लगभग 33 प्रतिशत भाग भू-राजस्व के रूप में लिया जाता था।
➣ बाद में अनेक स्थानीय करों एवं चुंगियों को समाप्त करने के उपरांत भू-राजस्व की दर बढ़ाकर लगभग 40 प्रतिशत कर दी गई।
भूमि-राजस्व व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| आधार | मलिक अम्बर की रैयतवाड़ी व्यवस्था |
| राजस्व निर्धारण | भूमि की पैमाइश एवं उत्पादन के आधार पर |
| भूमि मापन की इकाई | काठी |
| प्रारम्भिक लगान | उपज का लगभग 33% |
| बाद की दर | लगभग 40% |
कृषकों के लिए कल्याणकारी उपाय
➣ शिवाजी किसानों के हितों के प्रति संवेदनशील थे। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए राज्य द्वारा किसानों को विभिन्न प्रकार की सहायता उपलब्ध कराई जाती थी।
➣ कृषकों को बीज, बैल एवं अन्य कृषि साधन खरीदने के लिए ऋण दिया जाता था, जिसे सामान्यतः दो अथवा चार वार्षिक किश्तों में वसूल किया जाता था।
➣ अकाल, सूखा अथवा फसल नष्ट होने की स्थिति में किसानों को आर्थिक सहायता एवं अनुदान प्रदान किया जाता था।
➣ नए क्षेत्रों में कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए किसानों को प्रारम्भिक अवधि में लगान-मुक्त भूमि भी प्रदान की जाती थी।
किसानों के लिए प्रमुख सुविधाएँ
| सुविधा | उद्देश्य |
|---|---|
| कृषि ऋण | बीज एवं पशु खरीदने में सहायता |
| किश्तों में वसूली | किसानों पर आर्थिक बोझ कम करना |
| अकाल सहायता | फसल नष्ट होने पर राहत प्रदान करना |
| लगान-मुक्त भूमि | नए क्षेत्रों में कृषि विस्तार को प्रोत्साहन |
आय के अन्य प्रमुख स्रोत
➣ शिवाजी की आय के प्रमुख स्थायी स्रोत भूमि कर एवं व्यापारिक कर थे।
➣ मराठा साम्राज्य के विस्तार तथा विशाल सेना के व्यय की पूर्ति के लिए बाद में चौथ एवं सरदेशमुखी को भी महत्वपूर्ण आय स्रोत बनाया गया।
✓ शिवाजी की राजस्व व्यवस्था किस पर आधारित थी? मलिक अम्बर की रैयतवाड़ी व्यवस्था
✓ भूमि मापन की इकाई: काठी
✓ प्रारम्भिक भू-राजस्व: लगभग 33%
✓ बाद में भू-राजस्व: लगभग 40%
✓ तरफ़ का प्रमुख अधिकारी: कारकून
✓ किसानों को किस उद्देश्य से ऋण दिया जाता था? बीज एवं पशु खरीदने के लिए
✓ स्थायी आय के प्रमुख स्रोत: भूमि कर एवं व्यापारिक कर
चौथ
➣ मराठा शासन की आय का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत चौथ था। इतिहासकारों के बीच इसकी उत्पत्ति एवं स्वरूप को लेकर मतभेद हैं, किन्तु सामान्यतः इसे सैन्य संरक्षण कर (Military Tribute) माना जाता है।
➣ चौथ उन क्षेत्रों से वसूला जाता था जो मराठा राज्य के प्रत्यक्ष प्रशासन के अधीन नहीं थे। इसके बदले मराठा शासक उन क्षेत्रों को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करते थे तथा उन पर आक्रमण न करने का आश्वासन देते थे।
➣ चौथ किसी प्रदेश की कुल वार्षिक आय (विशेषतः भू-राजस्व) का एक-चौथाई (25%) होता था।
➣ मराठा साम्राज्य के विस्तार के साथ चौथ मराठा राज्य की आय का प्रमुख स्रोत बन गया और सेना के व्यय की पूर्ति में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
चौथ की प्रमुख विशेषताएँ
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| स्वरूप | सैन्य संरक्षण कर |
| दर | कुल आय का 25% |
| किससे लिया जाता था? | मराठा राज्य के बाहर अथवा आश्रित क्षेत्रों से |
| उद्देश्य | सुरक्षा प्रदान करना एवं सैन्य व्यय की पूर्ति |
सरदेशमुखी
➣ सरदेशमुखी मराठा शासकों द्वारा लिया जाने वाला एक अतिरिक्त कर था। इसे मराठा राजा अपने आपको प्रदेश का वंशानुगत सरदेशमुख (प्रधान मुखिया) मानते हुए वसूल करता था।
➣ यह कर सामान्यतः संबंधित प्रदेश की कुल आय का 10 प्रतिशत (1/10 भाग) होता था।
➣ सरदेशमुखी मुख्यतः उन क्षेत्रों पर लगाई जाती थी जो मराठा प्रभाव क्षेत्र में थे अथवा विजय के बाद मराठा अधिकार स्वीकार कर चुके थे।
सरदेशमुखी की प्रमुख विशेषताएँ
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| स्वरूप | वंशानुगत अधिकार के आधार पर लिया जाने वाला कर |
| दर | कुल आय का 10% |
| आधार | सरदेशमुख (प्रधान मुखिया) होने का दावा |
| उद्देश्य | राजकीय आय में वृद्धि |
चौथ एवं सरदेशमुखी में अंतर
| आधार | चौथ | सरदेशमुखी |
|---|---|---|
| स्वरूप | सैन्य संरक्षण कर | वंशानुगत अधिकार का कर |
| दर | 25% | 10% |
| आधार | सुरक्षा एवं संरक्षण | सरदेशमुख होने का दावा |
| वसूली | आश्रित अथवा मराठा प्रभाव वाले क्षेत्रों से | मराठा अधिकार स्वीकार करने वाले क्षेत्रों से |
➣ चौथ एवं सरदेशमुखी से प्राप्त आय ने मराठा साम्राज्य के विस्तार, प्रशासनिक व्यय तथा विशाल सेना के रख-रखाव में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
➣ इन करों के कारण मराठा राज्य की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई तथा विभिन्न क्षेत्रों पर उसका राजनीतिक प्रभाव भी बढ़ा।
✓ मोकासा का दूसरा नाम क्या था? सरंजाम
✓ मोकासा किसे दिया जाता था? प्रमुख सैनिक एवं प्रशासनिक अधिकारियों को
✓ शिवाजी किस प्रकार का वेतन अधिक पसंद करते थे? नकद वेतन
✓ मराठा राज्य की स्थायी आय का प्रमुख स्रोत: भूमि कर
✓ अतिरिक्त आय के दो प्रमुख स्रोत: चौथ एवं सरदेशमुखी
✓ मोकासा क्या आय का स्रोत था? नहीं, यह अधिकारियों को दिया जाने वाला भूमि/राजस्व अनुदान था।
मराठा सैन्य व्यवस्था
➣ छत्रपति शिवाजी महाराज ने मराठा साम्राज्य की सुरक्षा एवं विस्तार के लिए एक सुदृढ़, अनुशासित तथा गतिशील सेना का संगठन किया। उनकी सैन्य व्यवस्था का आधार तेज़ गति, अनुशासन, गुप्तचर तंत्र तथा छापामार (गनिमी कावा) युद्धनीति थी।
➣ मराठा सेना वर्षा ऋतु के लगभग चार महीनों तक छावनियों में विश्राम करती थी तथा दशहरा उत्सव के पश्चात पुनः सैन्य अभियानों पर निकलती थी।
➣ मराठी में पाइक शब्द का प्रयोग सामान्यतः पैदल सैनिक के लिए किया जाता था।
मराठा सेना के प्रमुख अंग
सर-ए-नौबत
➣ मराठा सेना का सर्वोच्च सैन्य अधिकारी सर-ए-नौबत कहलाता था।
➣ उसके अधीन अश्वसेना एवं पैदल सेना दोनों का संचालन होता था तथा सैन्य अनुशासन एवं संगठन की जिम्मेदारी उसी पर होती थी।
➣ शिवाजी की सेना के प्रमुख अंग निम्नलिखित थे-
| सेना | विशेषता |
|---|---|
| पागा सेना | राज्य द्वारा संगठित नियमित घुड़सवार सेना |
| सिलेदार सेना | अपने घोड़े एवं अस्त्र स्वयं रखने वाली अनियमित घुड़सवार सेना |
| पैदल सेना | स्थलीय युद्ध एवं दुर्ग रक्षा का प्रमुख आधार |
| नौसेना | समुद्री तटों की सुरक्षा, समुद्री व्यापार की रक्षा तथा विदेशी शक्तियों पर नियंत्रण के लिए संगठित नौसैनिक सेना |
बरगीर (पागा)
➣ बरगीर अथवा पागा वे नियमित सैनिक थे जिन्हें राज्य की ओर से घोड़े, हथियार एवं अन्य सैन्य सामग्री उपलब्ध कराई जाती थी।
➣ ये मराठा राज्य की स्थायी (Regular) सेना का भाग थे तथा पूर्णतः राज्य के नियंत्रण में रहते थे।
सिलेदार
➣ सिलेदार वे सैनिक थे जो अपने घोड़े, हथियार एवं सैन्य सामग्री की व्यवस्था स्वयं करते थे।
➣ इन्हें सामान्यतः बरगीरों की तुलना में अधिक वेतन दिया जाता था, क्योंकि इनके सैन्य उपकरणों का व्यय स्वयं सैनिक वहन करते थे।
बरगीर एवं सिलेदार में अंतर
| आधार | बरगीर (पागा) | सिलेदार |
|---|---|---|
| सेना का प्रकार | नियमित | अनियमित |
| घोड़े | राज्य उपलब्ध कराता था | स्वयं सैनिक लाता था |
| अस्त्र-शस्त्र | राज्य द्वारा | स्वयं सैनिक द्वारा |
| वेतन | तुलनात्मक रूप से कम | तुलनात्मक रूप से अधिक |
अश्वसेना (घुड़सवार सेना)
➣ शिवाजी की सेना का सबसे शक्तिशाली एवं प्रभावशाली अंग घुड़सवार सेना थी। तेज गति एवं आकस्मिक आक्रमण मराठा सेना की सबसे बड़ी विशेषता थे।
➣ घुड़सवार सेना मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित थी।
घुड़सवार सेना का संगठन
➣ मराठा घुड़सवार सेना सुव्यवस्थित संगठन पर आधारित थी। सैनिकों को छोटी-छोटी टुकड़ियों में विभाजित किया गया था ताकि युद्ध के समय उनका संचालन सरल हो सके।
| सैन्य इकाई | अधिकारी |
|---|---|
| 25 घुड़सवार | एक हवलदार |
| 5 हवलदार | एक जुमलादार |
| 10 जुमले | एक हज़ारी |
| 5 हज़ारी | एक पंचहज़ारी |
| पंचहज़ारी | सर-ए-नौबत के अधीन |
मराठा घुड़सवार की विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| मुख्य शक्ति | तेज गति एवं आकस्मिक आक्रमण |
| नियमित सेना | बरगीर (पागा) |
| अनियमित सेना | सिलेदार |
| प्रधान अधिकारी | सर-ए-नौबत |
| संगठन | छोटी-छोटी सैन्य टुकड़ियों में विभाजित |
पैदल सेना
➣ मराठा सेना में पैदल सेना का महत्वपूर्ण स्थान था। दुर्गों की रक्षा, पहाड़ी क्षेत्रों में युद्ध तथा आकस्मिक आक्रमणों में इसकी विशेष भूमिका रहती थी।
➣ मराठी में पैदल सैनिकों को सामान्यतः पाइक कहा जाता था।
➣ पैदल सेना का संगठन सुव्यवस्थित सैन्य इकाइयों में किया गया था, जिससे युद्ध के समय सैनिकों का संचालन सरल हो सके।
पैदल सेना का संगठन
| सैन्य इकाई | अधिकारी |
|---|---|
| 9 पाइक (पैदल सैनिक) | एक नायक |
| 5 नायक | एक हवलदार |
| 2–3 हवलदार | एक जुमलादार |
| 10 जुमलादार | एक हज़ारी |
| 5 हज़ारी | एक पंचहज़ारी |
| 7 हज़ारी | एक सप्तहज़ारी |
मराठा नौसेना
➣ छत्रपति शिवाजी महाराज ने भारत के पश्चिमी समुद्री तट की सुरक्षा तथा विदेशी शक्तियों एवं जंजीरा के सिद्दियों का सामना करने के लिए एक सुदृढ़ नौसेना का विकास किया।
➣ कोंकण तट पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से शिवाजी ने संगठित नौसैनिक शक्ति के निर्माण पर विशेष बल दिया।
➣ 1658 ई. में कल्याण विजय के पश्चात् नौसैनिक अड्डे की स्थापना की गई। बाद में कोलाबा मराठा नौसेना का प्रमुख केंद्र बन गया।
➣ मराठा नौसेना का सर्वोच्च अधिकारी सरखेल कहलाता था।
➣ कोलाबा स्थित नौसैनिक बेड़ा दो प्रमुख अधिकारियों के अधीन कार्य करता था— एक दरिया सारंग (प्रायः मुस्लिम अधिकारी) तथा दूसरा नायक (प्रायः हिन्दू अधिकारी)।
➣ उस समय पश्चिमी तट पर जंजीरा के सिद्दी सबसे शक्तिशाली नौसैनिक शक्ति थे, जिनसे शिवाजी का निरंतर संघर्ष चलता रहा।
मराठा नौसेना की प्रमुख विशेषताएँ
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| उद्देश्य | कोंकण तट की सुरक्षा एवं समुद्री शक्ति का विकास |
| प्रमुख केंद्र | कोलाबा |
| सर्वोच्च अधिकारी | सरखेल |
| प्रमुख प्रतिद्वंद्वी | जंजीरा के सिद्दी |
| नौसैनिक अड्डा | 1658 ई. में कल्याण विजय के बाद स्थापित |
महत्वपूर्ण तथ्य
|
❑ छत्रपति शिवाजी महाराज को भारतीय नौसेना का जनक कहा जाता है। ❑ विजयदुर्ग (जिसे घेरिया किला तथा अंग्रेज़ी स्रोतों में Victor Fort भी कहा गया है) मराठा नौसेना का एक प्रमुख समुद्री दुर्ग एवं नौसैनिक अड्डा था। ❑ यह दुर्ग वर्तमान महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले में स्थित है तथा शिवाजी ने इसे अपनी समुद्री सुरक्षा नीति का महत्वपूर्ण केंद्र बनाया। ❑ तीन ओर समुद्र तथा चौथी ओर सह्याद्रि पर्वतमाला होने के कारण यह दुर्ग सामरिक दृष्टि से अत्यंत सुरक्षित माना जाता था। |
शिवाजी की सैन्य नीति एवं युद्ध प्रणाली
➣ शिवाजी ने सेना में योग्यता, अनुशासन एवं गतिशीलता को विशेष महत्व दिया। उनकी सेना तीव्र गति से संचालित होती थी तथा अवसर मिलने पर अचानक आक्रमण कर शत्रु को पराजित करती थी।
➣ शिवाजी ने अपनी सेना में मुस्लिम सैनिकों एवं अधिकारियों को भी नियुक्त किया, जिससे उनकी सेना धार्मिक आधार पर नहीं बल्कि योग्यता के आधार पर संगठित रही।
➣ इतिहासकार ऑर्म (Orme) के अनुसार शिवाजी ने सूरत में फ्रांसीसियों से लगभग 80 तोपें तथा अन्य युद्ध सामग्री प्राप्त की थी।
➣ इतिहासकार रॉबिन्सन के अनुसार शिवाजी युद्ध समाप्त होने पर बंदी बनाए गए अनेक सैनिक अधिकारियों के साथ उदार व्यवहार करते थे तथा उन्हें मुक्त भी कर देते थे।
गनिमी कावा (छापामार युद्ध)
➣ शिवाजी की सबसे बड़ी सैन्य विशेषता गनिमी कावा (छापामार युद्ध) थी। इस युद्ध-पद्धति में शत्रु पर अचानक आक्रमण कर शीघ्रता से सुरक्षित स्थान पर लौट जाना प्रमुख रणनीति थी।
➣ पहाड़ी क्षेत्रों, दुर्गों एवं संकरे मार्गों का कुशल उपयोग कर मराठा सेना शत्रु को भारी क्षति पहुँचाती थी तथा प्रत्यक्ष निर्णायक युद्ध से यथासंभव बचती थी।
➣ गनिमी कावा मराठा सैन्य नीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक था और इसी के कारण शिवाजी ने अपेक्षाकृत कम संसाधनों के बावजूद अनेक शक्तिशाली शत्रुओं का सफलतापूर्वक सामना किया।
गुप्तचर व्यवस्था
➣ शिवाजी ने एक अत्यंत प्रभावी गुप्तचर तंत्र विकसित किया था, जो शत्रु की गतिविधियों पर निरंतर निगरानी रखता था।
➣ फ्रांसीसी यात्री अब्बे कैरे (Abbé Carré) के अनुसार शिवाजी अपने गुप्तचरों को पर्याप्त पारिश्रमिक देते थे, जिसके कारण उन्हें समय पर एवं विश्वसनीय सूचनाएँ प्राप्त होती थीं।
मराठा सैन्य व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| युद्ध नीति | गनिमी कावा (छापामार युद्ध) |
| मुख्य आधार | गति, अनुशासन एवं आकस्मिक आक्रमण |
| सैनिक भर्ती | योग्यता के आधार पर, मुस्लिम सैनिकों को भी स्थान |
| तोपखाना | ऑर्म के अनुसार फ्रांसीसियों से लगभग 80 तोपें प्राप्त |
| कैदियों के प्रति नीति | रॉबिन्सन के अनुसार उदार व्यवहार |
| गुप्तचर व्यवस्था | अत्यंत संगठित एवं प्रभावी |
✓ पैदल सैनिक को क्या कहा जाता था? पाइक
✓ 9 पाइक का प्रमुख: नायक
✓ मराठा युद्ध नीति का प्रमुख आधार: गनिमी कावा (छापामार युद्ध)
✓ फ्रांसीसियों से तोपें खरीदने का उल्लेख किसने किया? ऑर्म (Orme)
✓ युद्धबंदियों के प्रति उदार व्यवहार का उल्लेख किसने किया? रॉबिन्सन
✓ गुप्तचर व्यवस्था का उल्लेख किस यात्री ने किया? अब्बे कैरे (Abbé Carré)
✓ गनिमी कावा का अर्थ: छापामार युद्ध
किलों की व्यवस्था
➣ मराठा सैन्य व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में सुदृढ़ दुर्ग व्यवस्था का प्रमुख स्थान था। शिवाजी ने किलों को अपने राज्य की सुरक्षा एवं प्रशासन का आधार बनाया।
➣ समकालीन विवरणों के अनुसार शिवाजी के अधिकार में लगभग 250 किले थे, जिनके निर्माण, रख-रखाव एवं मरम्मत पर विशेष ध्यान दिया जाता था।
➣ किसी एक अधिकारी के हाथ में सम्पूर्ण नियंत्रण न रहे, इसके लिए प्रत्येक किले का प्रशासन तीन समान अधिकार वाले अधिकारियों के हाथों में सौंपा जाता था।
➣ ये तीनों अधिकारी परस्पर स्वतंत्र होते थे तथा सीधे छत्रपति शिवाजी के प्रति उत्तरदायी रहते थे।
किले के प्रमुख अधिकारी
| अधिकारी | मुख्य कार्य |
|---|---|
| हवलदार | किले के आंतरिक प्रशासन एवं सुरक्षा की देखरेख |
| सर-ए-नौबत | किले में तैनात सेना का नेतृत्व एवं सैन्य संचालन |
| सबनीस | पत्र-व्यवहार, लेखा-जोखा एवं असैनिक प्रशासन का संचालन |
➣ सामान्यतः हवलदार एवं सर-ए-नौबत मराठा समुदाय से तथा सबनीस ब्राह्मण वर्ग से नियुक्त किए जाते थे।
मराठा दुर्ग व्यवस्था की विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| कुल किले | लगभग 250 |
| नियंत्रण व्यवस्था | तीन अधिकारियों के संयुक्त नियंत्रण में |
| उत्तरदायित्व | प्रत्यक्ष रूप से छत्रपति के प्रति उत्तरदायी |
| उद्देश्य | राज्य की सुरक्षा, प्रशासन एवं सैन्य नियंत्रण |
✓ मराठा नौसेना का सर्वोच्च अधिकारी: सरखेल
✓ मराठा नौसेना का प्रमुख केंद्र: कोलाबा
✓ सबसे शक्तिशाली समुद्री प्रतिद्वंद्वी: जंजीरा के सिद्दी
✓ भारतीय नौसेना का जनक किसे कहा जाता है? छत्रपति शिवाजी महाराज
✓ शिवाजी के पास लगभग कितने किले थे? लगभग 250
✓ किले का सैन्य अधिकारी: सर-ए-नौबत
✓ किले का असैनिक अधिकारी: सबनीस
✓ किले के आंतरिक प्रशासन का अधिकारी: हवलदार
शिवाजी की धर्म नीति
➣ छत्रपति शिवाजी महाराज व्यक्तिगत रूप से एक आस्थावान हिन्दू थे, किन्तु शासन संचालन में उन्होंने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई। वे सभी धर्मों के अनुयायियों का सम्मान करते थे।
➣ शिवाजी की आराध्य देवी तुलजा भवानी थीं। वे अपने राज्य को हिन्दवी स्वराज्य के आदर्श पर संगठित करना चाहते थे।
➣ शिवाजी इस्लाम अथवा मुसलमानों के विरोधी नहीं थे। उन्होंने केलोशी के प्रसिद्ध सूफी संत बाबा याकूत का सम्मान किया तथा उनके आश्रम (खानकाह) को संरक्षण प्रदान किया। इसके अतिरिक्त मस्जिदों में दीप प्रज्ज्वलित रखने हेतु कर-मुक्त भूमिदान भी प्रदान किया।
➣ शिवाजी ने अपने शासन में धार्मिक स्थलों, संतों तथा विद्वानों को संरक्षण दिया तथा सभी धर्मों के लोगों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार किया।
हिन्दवी स्वराज्य एवं सांस्कृतिक संरक्षण
➣ शिवाजी ने हिन्दवी स्वराज्य की अवधारणा को अपनाया तथा स्वयं को हिन्दू समाज एवं संस्कृति का संरक्षक माना। उन्होंने गाय एवं ब्राह्मणों की रक्षा का संकल्प लिया तथा अनेक अभिलेखों में उन्हें हिन्दू धर्मोद्धारक की उपाधि से भी संबोधित किया गया है।
➣ पंडित रघुनाथ हनुमंते के निर्देशन में राज्य व्यवहार कोश का संकलन कराया गया, जिसका उद्देश्य प्रशासन में फ़ारसी शब्दों के स्थान पर संस्कृत एवं मराठी शब्दों के प्रयोग को प्रोत्साहित करना था।
➣ शिवाजी का प्रारम्भिक कार्यक्षेत्र मावल (मावल) क्षेत्र था, जहाँ के वीर मावलों ने उनके स्वराज्य आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
संतों एवं परम्पराओं का प्रभाव
➣ शिवाजी समकालीन भक्ति संत संत तुकाराम से प्रभावित थे। कहा जाता है कि संत तुकाराम ने शिवाजी द्वारा भेजे गए उपहारों को स्वीकार करने से विनम्रतापूर्वक मना कर दिया था।
➣ कुछ परम्पराओं के अनुसार भोंसले वंश को मेवाड़ के सिसोदिया वंश से संबंधित माना जाता है, जबकि इस विषय में इतिहासकारों के बीच मतभेद पाया जाता है।
➣ शिवाजी की माता जीजाबाई, लाखोजी जाधव की पुत्री थीं, जिनका संबंध देवगिरि के यादव वंश से माना जाता है।
अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
➣ मराठा शासन में प्रचलित ताँबे के सिक्के को रूक्का कहा जाता था।
महत्वपूर्ण तथ्य
| विषय | तथ्य |
|---|---|
| धर्म नीति | धार्मिक सहिष्णुता |
| आराध्य देवी | तुलजा भवानी |
| सूफी संत | बाबा याकूत (केलोशी) |
| प्रमुख सांस्कृतिक ग्रंथ | राज्य व्यवहार कोश |
| निर्देशन | पंडित रघुनाथ हनुमंते |
| समकालीन संत | संत तुकाराम |
| प्रारम्भिक कार्यक्षेत्र | मावल (मावल) |
| ताँबे का सिक्का | रूक्का |
✓ शिवाजी की आराध्य देवी: तुलजा भवानी
✓ धर्म नीति: धार्मिक सहिष्णुता
✓ राज्य व्यवहार कोश का निर्देशन: पंडित रघुनाथ हनुमंते
✓ शिवाजी के समकालीन प्रमुख संत: संत तुकाराम
✓ प्रारम्भिक कार्यक्षेत्र: मावल (मावल)
✓ मराठों का ताँबे का सिक्का: रूक्का
✓ सूफी संत जिनका शिवाजी सम्मान करते थे: बाबा याकूत
छत्रपति शिवाजी महाराज स्मारक
➣ महाराष्ट्र सरकार द्वारा मुंबई के अरब सागर में छत्रपति शिवाजी महाराज स्मारक का निर्माण प्रस्तावित किया गया है। इस स्मारक में कांस्य की विशाल प्रतिमा स्थापित की जानी है।
➣ इसकी ऊँचाई 212 मीटर (लगभग 695 फुट) (आधार सहित) होगी। इसमें अकेले प्रतिमा की ऊँचाई 395 फुट, घोड़े की ऊँचाई 300 फुट तथा शिवाजी के हाथ में तलवार की लम्बाई 64 फुट होगी। घोड़ा दो पैरों पर खड़ा होगा।
➣ इस “शिव स्मारक” परियोजना पर लगभग 3,600 करोड़ रुपये व्यय होने का अनुमान है। इस परिसर में प्रतिमा के साथ-साथ एक संग्रहालय, प्रेक्षागृह (एम्फीथिएटर), सभागार, हेलीपैड तथा
➣ तुलजाभवानी मन्दिर भी बनाए जाएँगे। यह परिसर 15.96 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला होगा।
➣ प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने 24 दिसम्बर 2016 को इस स्मारक का विधिवत शिलान्यास एवं जल-पूजन किया था। मार्च 2017 से निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ।
➣ इस प्रतिमा को बनाने का दायित्व नोएडा के प्रसिद्ध एवं पद्म विभूषण से सम्मानित मूर्तिकार राम वी. सुतार को सौंपा गया है। यही वे मूर्तिकार हैं जिन्होंने स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का भी निर्माण किया था।
➣ इस परियोजना का डिज़ाइन महाराष्ट्र सरकार द्वारा स्वीकृत किया जा चुका है तथा मुम्बई महानगर प्रदेश विकास प्राधिकरण (MMRDA) इसके निर्माण की देखरेख कर रहा है।
➣ किन्तु सुप्रीम कोर्ट द्वारा पर्यावरणीय याचिका पर सुनवाई के दौरान कार्य रोकने का आदेश दिए जाने के कारण यह परियोजना विवादों में रही और इसका निर्माण कार्य अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सका।
➣ वर्तमान में छत्रपति शिवाजी की सबसे ऊँची प्रतिमा औरंगाबाद के क्रान्ति चौक में स्थापित है, जिसकी ऊँचाई 52 फुट है।
➣ मुम्बई में प्रस्तावित स्मारक पूर्ण होने के पश्चात यह न केवल शिवाजी की बल्कि सम्पूर्ण विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा बन जाएगी।
महत्वपूर्ण: वर्तमान में विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा स्टैच्यू ऑफ यूनिटी (182 मीटर) है, जो गुजरात के केवड़िया में सरदार वल्लभभाई पटेल की स्मृति में स्थापित की गई है।
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