1. शिवाजी की राजधानी कहां पर थी?
U.P.P.C.S. (Pre) 1990
उत्तर-(a)
1674 ई. में शिवाजी ने रायगढ़ दुर्ग में अपना राज्याभिषेक करवाया और ‘छत्रपति’ की उपाधि ग्रहण की। इसके पश्चात रायगढ़ को उन्होंने अपनी राजधानी बनाया। काशी के प्रकांड विद्वान गंगाभट्ट ने वेदोक्त विधि से उन्हें क्षत्रिय घोषित कर राज्याभिषेक संपन्न कराया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रायगढ़ का किला सह्याद्री पर्वत श्रृंखला में 2,700 फीट की ऊँचाई पर स्थित है और इसे ‘पूर्व का जिब्राल्टर’ भी कहा गया है। 1680 ई. में शिवाजी की मृत्यु के पश्चात उन्हें रायगढ़ में ही दफनाया गया था।
2. शिवाजी के गुरु का नाम क्या था?
M.P.P.C.S (Pre) 2016
उत्तर-(a)
शिवाजी के आध्यात्मिक गुरु समर्थ रामदास थे, जिन्होंने लगभग 12 वर्षों तक संपूर्ण भारत का भ्रमण किया। उनकी प्रमुख रचना ‘दासबोध’ है, जो मराठी साहित्य की अमूल्य निधि मानी जाती है और जिसमें समन्वयवादी आध्यात्मिक जीवन-दर्शन का विवेचन किया गया है। मराठा साम्राज्य के उत्थान में महाराष्ट्र के संत-कवियों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: समर्थ रामदास ने महाराष्ट्र में 1,100 से अधिक मठ (हनुमान मंदिर) स्थापित किए थे, जो मराठा स्वराज्य के लिए सांस्कृतिक केंद्रों का काम करते थे। उनका प्रसिद्ध मठ सज्जनगढ़ (सातारा) में स्थित है।
3. वह कौन सेनानायक था, जिसे बीजापुर के सुल्तान ने 1659 ई. में शिवाजी को दबाने के लिए भेजा था?
U.P. P.C.S. (Pre) 1999
उत्तर-(b)
बीजापुर के आदिलशाही सुल्तान ने 1659 ई. में अपने सबसे अनुभवी और विश्वासपात्र सेनापति अफजल खां को शिवाजी की बढ़ती शक्ति को कुचलने के लिए भेजा। प्रतापगढ़ के निकट एक मुलाकात के दौरान कूटनीतिज्ञ शिवाजी ने बाघनख (tiger claws) का प्रयोग कर अफजल खां का वध कर दिया। यह घटना मराठा इतिहास में शिवाजी की बुद्धिमत्ता और साहस की प्रतीक बन गई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अफजल खां एक विशालकाय और अत्यंत शक्तिशाली योद्धा था। मुलाकात से पहले शिवाजी ने सुरक्षा के लिए अपने वस्त्रों के नीचे कवच पहना था और बाघनख तथा एक छुरी छिपाई थी। अफजल खां की कब्र आज भी प्रतापगढ़ किले के पास स्थित है।
4. मराठों के उत्कर्ष का निम्न में कौन-सा कारण सही है?
U.P.P.C.S. (Pre) 1992
उत्तर-(e)
मराठा शक्ति का उत्कर्ष किसी एक कारण का परिणाम नहीं था, बल्कि यह धार्मिक चेतना, भौगोलिक सुरक्षा, राजनैतिक जागृति और उत्कृष्ट नेतृत्व सभी के सम्मिलित प्रभाव का फल था। महाराष्ट्र के निवासियों ने भाषा, धर्म, साहित्य और निवास स्थान की एकता के आधार पर एक सुदृढ़ राष्ट्रीयता का निर्माण किया। सह्याद्री पर्वत श्रृंखला और कठिन भूभाग ने उनकी सैन्य रणनीति को और प्रभावी बनाया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: संत एकनाथ, तुकाराम और रामदास जैसे महाराष्ट्रीय संतों ने ‘भक्ति आंदोलन’ के माध्यम से जनमानस में एकता और स्वाभिमान की भावना जागृत की, जो मराठा उत्कर्ष की सांस्कृतिक नींव बनी। मराठों की ‘गनिमी कावा’ (छापामार युद्ध शैली) पहाड़ी भूगोल के कारण अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध हुई।
5. शिवाजी का छत्रपति के रूप में औपचारिक राज्याभिषेक कहां पर हुआ था?
U.P.P.C.S (Mains) 2016
उत्तर-(c)
शिवाजी का राज्याभिषेक 6 जून 1674 ई. को रायगढ़ दुर्ग में अत्यंत धूमधाम से संपन्न हुआ। इस अवसर पर उन्होंने ‘छत्रपति’, ‘शककर्ता’ और ‘क्षत्रिय कुलावतंस’ जैसी उपाधियाँ ग्रहण कीं। काशी के पंडित गंगाभट्ट ने वैदिक रीति से यह राज्याभिषेक संपन्न कराया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: राज्याभिषेक के अवसर पर शिवाजी ने अपना स्वतंत्र कैलेंडर ‘राज्याभिषेक शक’ भी प्रारंभ किया था। इस समारोह में लगभग 50,000 से अधिक लोग उपस्थित थे और उत्सव पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए थे।
6. नीचे दिए गए मानचित्र में छायांकित क्षेत्र किस राज्य को दर्शाता है?
I.A.S. (Pre) 1994
उत्तर-(d)
मानचित्र में दर्शाया गया छायांकित क्षेत्र मराठा साम्राज्य एवं उनके प्रभाव क्षेत्र को इंगित करता है। अपने चरमोत्कर्ष पर मराठा साम्राज्य दक्षिण में तंजौर से लेकर उत्तर में अटक (वर्तमान पाकिस्तान) तक और पूर्व में बंगाल तक फैला हुआ था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: 18वीं सदी के मध्य में पेशवाओं के नेतृत्व में मराठा साम्राज्य भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बन गया था। पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई.) में अहमदशाह अब्दाली से पराजय तक मराठों का राजनीतिक वर्चस्व लगभग संपूर्ण भारत पर था।
7. शिवाजी का जन्म कब हुआ तथा कब उन्होंने छत्रपति की उपाधि धारण की?
U.P.P.C.S. (Mains) 2015
उत्तर-(d)
शिवाजी का जन्म 19 फरवरी 1627 ई. (कुछ इतिहासकार 1630 ई. भी मानते हैं) को शिवनेर दुर्ग में हुआ था। उनकी माता जीजाबाई ने उन्हें भगवान शिव की भक्ति और वीरता के संस्कार दिए। 1674 ई. में रायगढ़ में राज्याभिषेक के बाद उन्होंने ‘छत्रपति’ की उपाधि धारण की और 1680 ई. में उनका निधन हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शिवाजी के पिता शाहजी भोंसले बीजापुर सल्तनत के एक प्रमुख सरदार थे। शिवाजी ने महज 16 वर्ष की आयु में 1643 ई. में तोरणा किले पर अधिकार करके अपने स्वतंत्र राज्य की नींव रखी थी।
8. शिवाजी ने मुगलों को किस युद्ध में हराया था?
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
उत्तर-(c)
1672 ई. में सलहार के युद्ध में शिवाजी की सेनाओं ने मुगल सेना को करारी शिकस्त दी। यह उन चुनिंदा युद्धों में से एक था जिसमें मराठों ने खुले मैदान में मुगल सेना को पराजित किया। इस विजय ने मराठा शक्ति की प्रतिष्ठा को और बढ़ा दिया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सलहार युद्ध में मराठा सेनापति मोरोपंत पिंगले और प्रतापराव गुजर ने मुख्य भूमिका निभाई थी। इस युद्ध में मराठों ने मुगल सेना के लगभग 6,000 सैनिकों को बंदी बनाया और बड़ी मात्रा में युद्धसामग्री पर अधिकार किया।
9. शिवाजी मुगलों की कैद से भागने के समय कौन से नगर में कैद थे?
M.P.P.C.S. (Pre) 2005
उत्तर-(b)
औरंगजेब ने 1666 ई. में शिवाजी को आगरा बुलाकर जयपुर भवन में नजरबंद कर दिया। शिवाजी अपनी सूझबूझ से मिठाई की टोकरियों में छिपकर वहाँ से फरार हो गए और दक्कन वापस लौट आए। यह घटना इतिहास में उनकी असाधारण चतुराई का प्रतीक मानी जाती है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: आगरा से भागने के बाद शिवाजी ने मृत होने का नाटक किया और संन्यासी के वेश में यात्रा करते हुए महाराष्ट्र वापस पहुँचे। 1668 ई. में औरंगजेब ने मजबूरन उनसे संधि कर उन्हें ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की।
10. शिवाजी की राजधानी कहां थी?
56th to 59th B.P.S.C. (Pre) 2015
उत्तर-(a)
शिवाजी की राजधानी रायगढ़ थी, जिसे उन्होंने 1674 ई. में राज्याभिषेक के बाद अपनी राजधानी घोषित किया। यह दुर्ग सह्याद्री पर्वतों में एक अभेद्य स्थान पर स्थित था और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: रायगढ़ किले को ‘जलदुर्ग’ की विशेषताएँ भी प्राप्त थीं क्योंकि वर्षा ऋतु में यह चारों ओर से बादलों से घिर जाता था। 1689 ई. में औरंगजेब के सेनापति जुल्फिकार खान ने इस किले पर अधिकार कर लिया था, किंतु बाद में मराठों ने इसे पुनः जीत लिया।
11. कथन (A) : राज्य के मामले में शिवाजी एक मंत्रिपरिषद से परामर्श लेते थे।
कारण (R) : प्रत्येक मंत्री अपने विभाग का स्वतंत्र प्रभार रखता था।
कूट :
कारण (R) : प्रत्येक मंत्री अपने विभाग का स्वतंत्र प्रभार रखता था।
कूट :
U.P. P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(c)
शिवाजी के शासन में आठ उच्च अधिकारी (अष्ट प्रधान) थे, परंतु ये एक सामूहिक मंत्रिपरिषद की भाँति नहीं, बल्कि स्वतंत्र रूप से कार्य करते थे। शिवाजी अपनी इच्छानुसार उनसे अलग-अलग या एक साथ परामर्श लेते थे, किंतु उनकी सलाह मानने के लिए वे बाध्य नहीं थे। अतः कथन (A) सही है जबकि कारण (R) भ्रामक है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अष्ट प्रधान की विशेषता यह थी कि इसमें पेशवा को छोड़कर अन्य सभी पद वंशानुगत नहीं थे – नियुक्ति योग्यता के आधार पर होती थी। इसके अलावा, पंडितराव और न्यायाधीश को छोड़कर अन्य छह मंत्री सैन्य अभियानों में भी भाग लेते थे, जो इस व्यवस्था की एक अनूठी विशेषता थी।
12. शिवाजी के अष्ट प्रधान का जो सदस्य विदेशी मामलों की देख-रेख करता था, वह था-
I.A.S. (Pre) 1998
उत्तर-(d)
अष्ट प्रधान में ‘सुमंत’ (जिसे ‘दबीर’ भी कहा जाता था) विदेश मंत्री का पद संभालता था। यह अधिकारी विदेशी राज्यों के साथ कूटनीतिक संबंध, संधियाँ और पत्राचार का प्रबंधन करता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शिवाजी की कूटनीतिक दक्षता इतनी प्रभावशाली थी कि उन्होंने मुगल साम्राज्य के साथ-साथ बीजापुर और पुर्तगालियों जैसी शक्तियों के विरुद्ध भी सुनियोजित विदेश नीति अपनाई। ‘सुमंत’ पद का उल्लेख सबरीपटन शिलालेख (1679 ई.) में भी मिलता है, जो इस पद की ऐतिहासिक प्रामाणिकता को सिद्ध करता है।
13. शिवाजी के शासनकाल में विदेश मंत्री को कहा जाता था-
M.P.P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(a)
शिवाजी के शासन में विदेश मंत्री को ‘सुमंत’ या ‘दबीर’ कहा जाता था। यह पद अष्ट प्रधान के आठ मंत्रियों में से एक था और इसका मुख्य दायित्व अन्य राज्यों के साथ राजनयिक संबंध निभाना और राजदूतों का स्वागत करना था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ‘दबीर’ शब्द फ़ारसी मूल का है और मुगल प्रशासन में भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता था। शिवाजी ने अपने प्रशासनिक ढाँचे में कई फ़ारसी शब्दों के स्थान पर संस्कृत-आधारित शब्द प्रचलित करने का प्रयास किया – उदाहरण के लिए ‘दबीर’ के स्थान पर ‘सुमंत’ प्रयोग में लाया गया।
14. शिवाजी के समय ‘सरनोबात’ का पद संबद्ध था-
U.P.P.S.C. (R.I.) 2014
उत्तर-(d)
‘सरनोबात’ (जिसे ‘सर-ए-नौबत’ भी कहा जाता था) अष्ट प्रधान में सेनापति का पद था, जो सैन्य प्रशासन से संबद्ध था। इसके कर्तव्यों में सेना की भर्ती, प्रशिक्षण, संगठन और रसद व्यवस्था का प्रबंधन शामिल था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शिवाजी की सेना में मुख्यतः तीन अंग थे – पैदल सेना (पायदल), अश्वारोही सेना (घुड़सवार) और नौसेना। उन्होंने भारतीय इतिहास में पहली बार एक संगठित मराठा नौसेना की स्थापना की, जिसे ‘जलदुर्ग’ के रूप में भी जाना जाता है। सिंधुदुर्ग और विजयदुर्ग जैसे समुद्री किले इसी नौसैनिक रणनीति के प्रमाण हैं।
15. अष्ट प्रधान नाम की मंत्रिपरिषद थी-
I.A.S. (Pre) 1996
U.P.P.C.S. (Mains) 2013
U.P.P.C.S. (Mains) 2013
उत्तर-(d)
‘अष्ट प्रधान’ मराठा शासक छत्रपति शिवाजी द्वारा स्थापित केंद्रीय मंत्रिमंडल था जिसमें आठ प्रमुख मंत्री होते थे। इनके नाम थे – पेशवा (प्रधानमंत्री), अमात्य (वित्त मंत्री), मंत्री/वाकनवीस (दैनिक कार्य विवरण), सचिव/शुरुनवीस (राजकीय पत्राचार), सुमंत/दबीर (विदेश मंत्री), सेनापति/सर-ए-नौबत (सैन्य प्रमुख), पंडितराव (धार्मिक अनुदान), और न्यायाधीश (मुख्य न्यायाधीश)।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शिवाजी ने 1674 ई. में रायगढ़ में अपना राज्याभिषेक करवाया था, जिसके बाद अष्ट प्रधान व्यवस्था को औपचारिक रूप से मान्यता मिली। उल्लेखनीय है कि अष्ट प्रधान में पेशवा का पद कालांतर में इतना शक्तिशाली हो गया कि 18वीं सदी में पेशवा ही मराठा साम्राज्य के वास्तविक शासक बन गए।
16. अष्टप्रधान का गठन किसने किया था?
65th B.P.S.C. (Pre) 2019
उत्तर-(d)
अष्ट प्रधान का गठन मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज ने किया था। यह एक कुशल और सुनियोजित प्रशासनिक व्यवस्था थी जिसमें आठ विशेष विभागों के लिए आठ मंत्री नियुक्त किए गए थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शिवाजी ने प्रशासन में फ़ारसी भाषा के स्थान पर मराठी और संस्कृत भाषा को प्रोत्साहित किया। उन्होंने ‘राज्यव्यवहारकोश’ नामक संस्कृत-मराठी शब्दकोश तैयार करवाया था, जिसमें फ़ारसी प्रशासनिक शब्दों के मराठी/संस्कृत विकल्प दिए गए थे – यह उनकी स्वदेशी प्रशासनिक सोच का प्रमाण है।
17. ‘अष्ट प्रधान’ मंत्रिपरिषद् किसके राज्य प्रबंध में सहायता करती थी?
66th B.P.S.C. Re-Exam 2020
उत्तर-(d)
अष्ट प्रधान व्यवस्था छत्रपति शिवाजी के राज्य प्रबंध में सहायता करती थी। मुगल सम्राट अकबर के पास ‘नवरत्न’ नामक सलाहकार थे, परंतु शिवाजी की अष्ट प्रधान व्यवस्था उनसे भिन्न थी – इसमें प्रत्येक पद का स्पष्ट दायित्व निर्धारित था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शिवाजी के राज्य में भू-राजस्व व्यवस्था मलिक अंबर की व्यवस्था पर आधारित थी, जिसे ‘काठी’ पद्धति कहा जाता था। इसके अंतर्गत भूमि की वास्तविक माप के आधार पर राजस्व निर्धारित होता था, न कि ठेके पर – यह किसानों के हित में एक प्रगतिशील कदम था।
18. शिवाजी के ‘अष्टप्रधान’ में निम्नलिखित अधिकारी थे-
1. मजूमदार 2. दबीर 3. वाकनीस 4. सुरनीस
सही उत्तर चुनिए-
1. मजूमदार 2. दबीर 3. वाकनीस 4. सुरनीस
सही उत्तर चुनिए-
Chhattisgarh P.S.C. (Pre) 2017
उत्तर-(e)
शिवाजी के अष्ट प्रधान में उपर्युक्त सभी चार अधिकारी सम्मिलित थे – मजूमदार (अमात्य – वित्त मंत्री), दबीर (सुमंत – विदेश मंत्री), वाकनीस (मंत्री – दैनिक कार्य विवरण रखने वाला), और सुरनीस (सचिव – राजकीय पत्राचार का प्रभारी)। ये सभी अष्ट प्रधान के आठ मंत्रियों में शामिल थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अष्ट प्रधान की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसमें न्यायाधीश और पंडितराव को छोड़कर बाकी सभी मंत्री युद्धकाल में सैन्य अभियानों में शिवाजी के साथ रहते थे। इसके अलावा, प्रत्येक मंत्री का वेतन नकद रूप में दिया जाता था, भूमि अनुदान (जागीर) के रूप में नहीं – यह मुगल व्यवस्था से एक महत्त्वपूर्ण अंतर था।
19. ‘अष्ट प्रधान’ मंत्रिपरिषद किसके राज्य प्रबंध में सहायता करती थी?
U.P.P.C.S. (Pre) 1991
U.P. P.C.S. (Pre) 1995
U.P. P.C.S. (Pre) 1995
उत्तर-(c)
अष्ट प्रधान व्यवस्था शिवाजी के राज्य प्रबंध की केंद्रीय धुरी थी। हर्षवर्धन, समुद्रगुप्त और यशोवर्मन ने अपनी-अपनी अलग प्रशासनिक प्रणालियाँ अपनाई थीं, जो अष्ट प्रधान से भिन्न थीं।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शिवाजी ने प्रशासन के लिए केंद्रीय (अष्ट प्रधान), प्रांतीय और स्थानीय – तीन स्तरीय व्यवस्था स्थापित की थी। प्रांतीय स्तर पर ‘सूबे’ होते थे जिनके प्रमुख ‘सूबेदार’ कहलाते थे, और गाँव स्तर पर ‘पाटील’ नामक अधिकारी प्रशासन देखते थे – यह व्यवस्था बाद के मराठा शासकों ने भी अपनाई।
20. छत्रपति शिवाजी से संबंधित निम्नलिखित घटनाओं को कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर का चयन कीजिए।
I. चाकन के किले पर विजय
II. अफजल खां का प्रकरण
III. मुगलों से मतभेद का प्रारंभ
IV. सूरत पर आक्रमण तथा लूटना
कूट :
I. चाकन के किले पर विजय
II. अफजल खां का प्रकरण
III. मुगलों से मतभेद का प्रारंभ
IV. सूरत पर आक्रमण तथा लूटना
कूट :
U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2016
उत्तर-(a)
शिवाजी से संबंधित इन चार घटनाओं का सही कालक्रम इस प्रकार है – चाकन किले पर विजय (1648 ई.), मुगलों से मतभेद का प्रारंभ (1657 ई.), अफजल खाँ का प्रकरण (1659 ई.), और सूरत पर आक्रमण व लूट (1664 ई.)। अतः सही क्रम I, III, II, IV है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अफजल खाँ बीजापुर का एक शक्तिशाली सेनापति था जिसे शिवाजी को पकड़ने या मारने के लिए भेजा गया था। 10 नवंबर 1659 को प्रतापगढ़ के निकट हुई मुलाकात में शिवाजी ने ‘बघनखा’ (tiger claws) नामक हथियार से अफजल खाँ का वध किया – यह घटना मराठा इतिहास में एक निर्णायक मोड़ मानी जाती है। सूरत पर 1664 ई. के आक्रमण के बाद शिवाजी ने 1670 ई. में दूसरी बार भी सूरत पर आक्रमण किया था।
21. सरंजामी प्रथा किससे संबंधित थी?
9th B.P.S.C. (Pre) 1994
उत्तर-(a)
मराठा शासन काल में ‘सरंजामी प्रथा’ भू-राजस्व व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग थी। इस प्रथा के अंतर्गत मराठा सरदारों एवं जागीरदारों को उनकी सैनिक सेवाओं के बदले में भूमि (सरंजाम) आवंटित की जाती थी, जिससे वे अपनी सेना का व्यय वहन कर सकें। यह व्यवस्था मुगल जागीरदारी प्रथा से मिलती-जुलती थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मराठा प्रशासन में भू-राजस्व की दो अन्य प्रमुख प्रथाएं भी थीं – ‘चौथ’ (पड़ोसी राज्यों से वसूला जाने वाला 1/4 भाग कर) और ‘सरदेशमुखी’ (अतिरिक्त 1/10 भाग कर), जो छत्रपति शिवाजी ने प्रारंभ की थीं। सरंजामी जागीरें वंशानुगत न होकर सेवा-आधारित थीं, हालांकि बाद में इनका स्वरूप बदलता गया।
22. निम्नलिखित में से कौन-सी मुद्रा छत्रपति शिवाजी के राज्य में प्रचलित रजत मुद्रा नहीं थी?
U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2016
उत्तर-(d)
छत्रपति शिवाजी के राज्य में तीन प्रमुख रजत (चाँदी) मुद्राएँ प्रचलित थीं – रुपया, लारी और टका। इनके विपरीत ‘रुका’ ताँबे की मुद्रा थी, इसलिए यह रजत मुद्राओं की श्रेणी में नहीं आती।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शिवाजी के शासन में स्वर्ण मुद्रा को ‘होन’ या ‘शिवराई’ कहा जाता था। शिवराई सोने की मुद्रा थी जो स्वराज्य की प्रतीक मानी जाती थी और इस पर देवनागरी लिपि में अंकन होता था – यह मराठा स्वाभिमान का प्रतीक थी।
23. औरंगजेब की मृत्यु के समय मराठा नेतृत्व किसके हाथों में था?
U.P.P.C.S. (Pre) 2012
U.P. R.O./A.R.O. (Mains) 2013
U.P. R.O./A.R.O. (Mains) 2013
उत्तर-(d)
राजाराम की मृत्यु (1700 ई.) के उपरांत उनकी विधवा रानी ताराबाई ने अपने अल्पवयस्क पुत्र को शिवाजी द्वितीय के नाम से सिंहासन पर बैठाया और स्वयं संरक्षिका बनकर मुगलों के विरुद्ध संघर्ष का नेतृत्व किया। 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के समय यही स्थिति थी – मराठा नेतृत्व ताराबाई के हाथों में था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ताराबाई ने अपनी कूटनीतिक दक्षता से रायगढ़, सतारा और सिंहगढ़ जैसे महत्वपूर्ण किले मुगलों से पुनः जीते। बाद में जब शाहू (शम्भाजी के पुत्र) मुगल कैद से 1707 में रिहा होकर आए, तो उनसे ताराबाई का लंबा उत्तराधिकार-संघर्ष चला।
24. किसके समय से मराठा राजा नाचीज हो गया और पेशवा वास्तविक शासक?
U.P.P.C.S. (Mains) 2007
उत्तर-(c)
बालाजी बाजीराव (नाना साहब) के पेशवा काल (1740–1761 ई.) में 1750 ई. की ‘संगोला की संधि’ के माध्यम से सत्ता का पूर्ण हस्तांतरण पेशवा के हाथों में हो गया। इसके पश्चात मराठा छत्रपति केवल नाममात्र के प्रमुख बनकर रह गए और समस्त वास्तविक प्रशासनिक एवं सैन्य शक्ति पेशवा के अधीन आ गई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पेशवा पद को वंशानुगत बनाने की प्रक्रिया बालाजी विश्वनाथ के समय से प्रारंभ हुई थी, परंतु इसे संवैधानिक मान्यता संगोला की संधि से मिली। बालाजी बाजीराव के काल में ही 1761 में पानीपत का तीसरा युद्ध हुआ जिसमें मराठों की भारी पराजय हुई – इसे मराठा शक्ति का सबसे बड़ा आघात माना जाता है।
25. निम्नलिखित को उनके शासनकाल के क्रम में व्यवस्थित कीजिए-
(1) बाजीराव (2) बालाजी बाजीराव
(3) बालाजी विश्वनाथ (4) माधव राव
कूट :
(1) बाजीराव (2) बालाजी बाजीराव
(3) बालाजी विश्वनाथ (4) माधव राव
कूट :
U.P.P.C.S. (Mains) 2005
उत्तर-(c)
पेशवाओं के शासनकाल का सही कालक्रम इस प्रकार है: बालाजी विश्वनाथ (1713–1720 ई.) → बाजीराव प्रथम (1720–1740 ई.) → बालाजी बाजीराव (1740–1761 ई.) → माधवराव प्रथम (1761–1772 ई.)। अतः सही क्रम 3, 1, 2, 4 है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बाजीराव प्रथम को ‘हिंदू सूर्य’ की उपाधि दी गई थी और वे अपने जीवनकाल में एक भी युद्ध नहीं हारे। माधवराव प्रथम को ‘मराठा शक्ति का पुनरुद्धारक’ माना जाता है क्योंकि पानीपत (1761) की पराजय के बाद उन्होंने मराठा साम्राज्य को पुनः संगठित किया।
26. निम्नलिखित को सही कालानुक्रम में रखें-
(1) छत्रपति शाहूजी (2) राजाराम
(3) शम्भाजी (4) शिवाजी II
कूट :
(1) छत्रपति शाहूजी (2) राजाराम
(3) शम्भाजी (4) शिवाजी II
कूट :
U.P. P.C.S. (Spl.) (Mains) 2004
उत्तर-(b)
मराठा छत्रपतियों का सही कालक्रम है: शम्भाजी (1680–1689 ई.) – शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र; राजाराम (1689–1700 ई.) – शिवाजी के द्वितीय पुत्र; शिवाजी II (1700–1708 ई.) – राजाराम के पुत्र; छत्रपति शाहूजी (1708–1749 ई.) – शम्भाजी के पुत्र। अतः विकल्प (b) सही है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: शम्भाजी को 1689 में मुगल सम्राट औरंगजेब ने बंदी बनाकर इस्लाम स्वीकार करने से मना करने पर क्रूरतापूर्वक मृत्युदंड दिया था। उनकी शहादत ने मराठों में मुगल-विरोध की भावना को और तीव्र कर दिया।
27. शंभाजी के बाद मराठा शासन को निम्नलिखित में से किसने सरल और कारगर बनाया?
I.A.S. (Pre) 2000
उत्तर-(b)
पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने मराठा प्रशासन को पुनर्गठित करके सुव्यवस्थित और प्रभावी बनाया। छत्रपति शाहू ने 1713 ई. में उन्हें पेशवा नियुक्त किया। बालाजी की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि 1719 ई. में मुगलों के साथ एक स्थायी समझौता करवाना था, जिसके तहत मराठों को दक्कन की चौथ और सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार मिला।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: बालाजी विश्वनाथ ने ही मुगल दरबार की आंतरिक कमजोरियों का लाभ उठाते हुए सैयद बंधुओं (अब्दुल्लाह खाँ और हुसैन अली खाँ) से मिलकर मराठा प्रभाव को उत्तर भारत तक विस्तारित किया। उन्हें मराठा साम्राज्य का ‘द्वितीय संस्थापक’ भी कहा जाता है।
28. कथन (A) : 1750 ई. तक मराठा साम्राज्य पेशवा की अध्यक्षता में एक परिसंघ बन गया।
कारण (R) : शाहू के उत्तराधिकारी पेशवा की इच्छा पर निर्भर थे।
कूट :
कारण (R) : शाहू के उत्तराधिकारी पेशवा की इच्छा पर निर्भर थे।
कूट :
U.P. P.C.S. (Pre) 1997
उत्तर-(a)
1750 ई. में संगोला की संधि के माध्यम से मराठा साम्राज्य औपचारिक रूप से पेशवा की अध्यक्षता में एक परिसंघ (Confederacy) में परिवर्तित हो गया। छत्रपति शाहू के बाद उनके उत्तराधिकारी वास्तविक शक्ति से वंचित हो गए और पेशवा की स्वीकृति के बिना कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लिया जा सकता था। अतः कथन और कारण दोनों सही हैं और कारण, कथन की उचित व्याख्या करता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस परिसंघ में मराठा राज्य के पाँच प्रमुख सरदार परिवार थे – पेशवा (पुणे), सिंधिया (ग्वालियर), होल्कर (इंदौर), भोंसले (नागपुर) और गायकवाड़ (बड़ौदा) – जिनमें बाद में आपसी संघर्ष ही मराठा पतन का एक कारण बना।
29. निम्नांकित मराठा देवियों में जिसने 1700 ई. से आगे मुगल साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष का नेतृत्व किया, वह कौन थीं?
U.P.P.C.S. (Spl.) (Pre) 2008
उत्तर-(c)
राजाराम की मृत्यु के बाद उनकी रानी ताराबाई ने अपने अल्पवयस्क पुत्र शिवाजी द्वितीय को गद्दी पर बैठाकर स्वयं संरक्षिका के रूप में शासन सँभाला और 1700 ई. के बाद मुगलों के विरुद्ध संघर्ष की कमान थामे रखी। उन्होंने रायगढ़, सतारा और सिंहगढ़ के दुर्ग मुगलों से जीते।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: ताराबाई एक असाधारण सैन्य रणनीतिकार थीं – उन्होंने छापामार युद्ध पद्धति को और परिष्कृत किया। उनके संघर्ष के कारण ही औरंगजेब दक्कन में उलझा रहा और उत्तर भारत पर ध्यान नहीं दे सका, जिसने मुगल साम्राज्य के पतन को त्वरित किया।
30. नीचे दो कथन दिए गए हैं, एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A) : मुगल साम्राज्य के पतन के बाद मराठा सबसे शक्तिशाली देशज शक्ति के रूप में उभरे।
कारण (R) : मराठा पहले शासक थे, जिनके पास एकीकृत भारतीय राष्ट्र की संकल्पना थी।
कूट :
अभिकथन (A) : मुगल साम्राज्य के पतन के बाद मराठा सबसे शक्तिशाली देशज शक्ति के रूप में उभरे।
कारण (R) : मराठा पहले शासक थे, जिनके पास एकीकृत भारतीय राष्ट्र की संकल्पना थी।
कूट :
U.P.R.O./A.R.O. (Mains) 2016
उत्तर-(c)
मुगल साम्राज्य के पतन के बाद मराठा निःसंदेह भारत की सबसे सशक्त देशज शक्ति बनकर उभरे। उनकी शक्ति का आधार महाराष्ट्र के समस्त वर्गों की भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक एकता थी। किंतु मराठों में ‘अखंड भारतीय राष्ट्र’ की सुस्पष्ट अवधारणा का अभाव था – उनका विस्तार चौथ-सरदेशमुखी की आर्थिक महत्वाकांक्षा से अधिक प्रेरित था। इसलिए कथन (A) सही है, परंतु कारण (R) गलत है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मराठा साम्राज्य का विस्तार अपने चरमोत्कर्ष पर अटक से कटक तक और पंजाब से दक्षिण तक फैला था। परंतु विभिन्न सरदारों के बीच आपसी कलह और केंद्रीय नेतृत्व की कमजोरी के कारण वे ब्रिटिश शक्ति का एकजुट होकर मुकाबला नहीं कर सके।
31. मोडी लिपि का प्रयोग किसके विलेखों में किया जाता था?
I.A.S. (Pre) 1995
उत्तर-(d)
मोडी लिपि मराठी भाषा लिखने की एक प्राचीन और विशेष शैली थी, जिसका व्यापक उपयोग मराठा साम्राज्य के सरकारी दस्तावेजों, पत्रों और लेखा-जोखा में किया जाता था। इस लिपि को पेशवाओं के शासनकाल में विशेष रूप से प्रशासनिक कार्यों में अपनाया गया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मोडी लिपि की उत्पत्ति ब्राह्मी लिपि से मानी जाती है और इसे हेमाडपंत (हेमाद्री) ने यादव राजाओं के शासनकाल में लोकप्रिय बनाया था। महाराष्ट्र सरकार ने इस लिपि को डिजिटल रूप से संरक्षित करने के लिए विशेष परियोजनाएँ चलाई हैं क्योंकि अनेक ऐतिहासिक मराठा दस्तावेज़ आज भी केवल इसी लिपि में उपलब्ध हैं।
32. पानीपत का तीसरा युद्ध लड़ा गया था वर्ष-
Uttarakhand U.D.A./ L.D.A. (Mains) 2007
उत्तर-(b)
पानीपत का तीसरा युद्ध 14 जनवरी, 1761 को मराठा सेना और अहमद शाह अब्दाली की अफगान सेना के मध्य हुआ। इस युद्ध में मराठों की निर्णायक पराजय हुई और यह भारतीय इतिहास के सबसे रक्तरंजित युद्धों में से एक माना जाता है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पानीपत के मैदान पर तीन निर्णायक युद्ध हुए – 1526 (बाबर बनाम इब्राहिम लोदी), 1556 (अकबर बनाम हेमू) और 1761 (मराठा बनाम अब्दाली)। तीसरे युद्ध में अनुमानतः 40,000 से अधिक मराठा सैनिक मारे गए थे, जिसमें पेशवा के पुत्र विश्वासराव भी शामिल थे। इस पराजय की खबर सुनकर पेशवा बालाजी बाजीराव का भी शीघ्र ही निधन हो गया।
33. सुरक्षा के लिए मराठों के राजस्व के दावों को किस नाम से जाना जाता है?
U.P.P.C.S. (Pre) 2018
उत्तर-(b)
‘चौथ’ मराठों द्वारा उन क्षेत्रों से वसूला जाने वाला कर था जिन्हें ‘मुगलई’ कहा जाता था। यह किसी भी राज्य की कुल राजस्व आय का एक-चौथाई (1/4) भाग होता था, जिसके बदले में उस राज्य को मराठा आक्रमणों और लूटमार से सुरक्षा का आश्वासन दिया जाता था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मराठों की दूसरी प्रमुख कर-प्रणाली ‘सरदेशमुखी’ थी, जो किसी क्षेत्र की कुल आय का 1/10 भाग होती थी। यह कर मराठों के पारंपरिक सरदेशमुख (प्रधान जमींदार) के अधिकार के आधार पर लिया जाता था। शिवाजी महाराज ने इन दोनों कर-व्यवस्थाओं को औपचारिक और संगठित रूप दिया था।
34. निम्नलिखित में से कौन रूहेला सरदार अहमद शाह अब्दाली का विश्वासपात्र था?
U.P.P.C.S. (Mains) 2006
उत्तर-(b)
1757 में दिल्ली पर कब्ज़ा करने के बाद जब अहमद शाह अब्दाली वापस अफगानिस्तान लौटा, तो उसने रूहेला सरदार नजीबुद्दौला (नजीब खान) को साम्राज्य का मीर बख्शी और भारत में अपना प्रमुख प्रतिनिधि नियुक्त किया। नजीब खान ने अब्दाली और मुगल दरबार के बीच महत्वपूर्ण कड़ी का काम किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: नजीब खान का पोता गुलाम कादिर रूहेला बाद में अत्यंत क्रूर शासक बना जिसने 1788 में मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय को अंधा करवा दिया था। नजीब खान की मृत्यु के बाद मराठों ने उसकी कब्र को खोदकर अपमानित किया था, जो दोनों पक्षों की शत्रुता की गहराई को दर्शाता है।
35. पानीपत का तीसरा युद्ध कब लड़ा गया?
M.P.P.C.S. (Pre) 2013
उत्तर-(c)
पानीपत का तीसरा युद्ध 14 जनवरी, 1761 को मकर संक्रांति के दिन लड़ा गया था। इस युद्ध में मराठा सेना का नेतृत्व पेशवा का चचेरा भाई सदाशिव राव भाऊ कर रहा था, जबकि अहमद शाह अब्दाली की सेना में उज़्बेक और पठान सैनिक भी शामिल थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह युद्ध लगभग 6 घंटे तक चला था। मराठा सेना की पराजय के प्रमुख कारणों में अवध के नवाब शुजाउद्दौला और हैदराबाद के निज़ाम द्वारा मराठों का साथ न देना प्रमुख था। युद्ध के परिणामस्वरूप उत्तर भारत में मराठा विस्तार को स्थायी रूप से रोक दिया गया।
36. एक इतिहासकार ने पानीपत की तीसरी लड़ाई को स्वयं देखा, वह कौन था?
Chhattisgarh P.C.S. (Pre) 2003
उत्तर-(b)
काशीराज पंडित पानीपत के तीसरे युद्ध के प्रत्यक्षदर्शी इतिहासकार थे। उन्होंने इस युद्ध का जीवंत और विस्तृत विवरण अपनी रचना में दर्ज किया जो इस युद्ध के प्राथमिक स्रोतों में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। मराठों की इस पराजय की सूचना पेशवा बालाजी बाजीराव को एक व्यापारी द्वारा कूटसंदेश के रूप में भेजी गई थी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: काशीराज पंडित नागपुर के भोंसले राजवंश के दरबार से जुड़े थे और उनकी रचना ‘पानीपतची बखर’ मराठी इतिहास लेखन की दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान है। इसके अलावा अहमद शाह अब्दाली के कोषाध्यक्ष काज़ी नूर मुहम्मद ने भी इस युद्ध का विवरण अपनी फारसी रचना ‘जंगनामा’ में लिखा है।
37. अहमद शाह अब्दाली के भारत पर आक्रमण और पानीपत की तीसरी लड़ाई लड़ने का तात्कालिक कारण क्या था?
I.A.S. (Pre) 2010
उत्तर-(a)
पानीपत के तीसरे युद्ध का तात्कालिक कारण यह था कि मराठों ने अब्दाली के वायसराय तैमूर शाह को लाहौर से खदेड़ दिया था। इस अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए अहमद शाह अब्दाली ने पुनः भारत पर आक्रमण किया और मराठों से सीधा टकराव किया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: अब्दाली को इस अभियान में सुन्नी धर्म की रक्षा का नैतिक आधार भी प्राप्त था क्योंकि मराठों को हिंदू साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में देखा जाता था। अब्दाली ने इस युद्ध में शुजाउद्दौला (अवध) और रोहिला नेता नजीब खान का समर्थन प्राप्त किया था, जिससे उसकी सेना की शक्ति कई गुना बढ़ गई।
38. पानीपत के तीसरे युद्ध में निम्न में से किसने मराठों को हराया था?
U.P. P.C.S. (Pre) 1993
U.P.P.C.S. (Pre) 1994
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2009
U.P.P.C.S. (Mains) 2012
U.P.P.C.S. (Pre) 1994
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2009
U.P.P.C.S. (Mains) 2012
उत्तर-(a)
पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों को अहमद शाह अब्दाली के नेतृत्व में अफगान सेना ने पराजित किया था। इस युद्ध में मराठा सेना का नेतृत्व सदाशिव राव भाऊ ने किया और वे स्वयं भी युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस युद्ध में मराठा सेना को भारी कमज़ोरी का सामना करना पड़ा क्योंकि उनकी 3 लाख से अधिक की विशाल सेना के साथ तीर्थयात्री और परिवारजन भी थे, जिससे रसद और गतिशीलता में गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हुईं। इस युद्ध के बाद मराठा शक्ति को कुछ दशकों के लिए उत्तर भारत से पीछे हटना पड़ा, हालाँकि बाद में महादजी सिंधिया ने उत्तर भारत में मराठा प्रभाव को पुनः स्थापित किया।
39. पानीपत का तीसरा युद्ध लड़ा गया-
M.P.P.C.S. (Pre) 1998
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2002
U.P. Lower Sub. (Spl.) (Pre) 2004
Uttarakhand P.C.S. (Pre) 2002
U.P. Lower Sub. (Spl.) (Pre) 2004
उत्तर-(c)
पानीपत का तीसरा युद्ध मराठा साम्राज्य और अहमद शाह अब्दाली की अफगान सेना के बीच 1761 में हुआ था। यह युद्ध भारतीय इतिहास में तीनों पानीपत युद्धों में सबसे अधिक विनाशकारी था क्योंकि इसमें मराठा साम्राज्य की सर्वश्रेष्ठ सेना और कुशल सेनापति एक साथ नष्ट हो गए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पानीपत के तीनों युद्ध भारतीय इतिहास के निर्णायक मोड़ माने जाते हैं – पहले ने दिल्ली सल्तनत का अंत कर मुगल साम्राज्य की नींव रखी, दूसरे ने मुगल पुनर्स्थापना सुनिश्चित की और तीसरे ने मराठा साम्राज्य के उत्तर भारतीय वर्चस्व की आकांक्षा को चकनाचूर कर दिया। इस तरह हरियाणा का पानीपत नगर भारत के राजनीतिक इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण युद्धस्थल बन गया।
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