नूरुद्दीन मुहम्मद सलीम (जहाँगीर) (1605–1627 ई.) : युद्ध, विद्रोह एवं प्रमुख घटनाएँ

भारतीय इतिहास मध्यकालीन भारत नूरुद्दीन मुहम्मद सलीम (जहाँगीर) (1605–1627 ई.)
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जहाँगीर : परिचय

➣ जहाँगीर का जन्म फ़तेहपुर सीकरी में स्थित शेख़ सलीम चिश्ती की कुटिया में राजा भारमल की बेटी मरियम ज़मानी के गर्भ से 30 अगस्त, 1569 ई. को हुआ था।

➣ अकबर की मृत्यु के आठवें दिन 3 नवम्बर, 1605 ई. को सलीम का राज्याभिषेक नुरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर बादशाह ग़ाज़ी की उपाधि से आगरा के क़िले में सम्पन्न हुआ। उस समय उसकी आयु 36 वर्ष की थी।

➣ जहाँगीर का राज्यारोहण विवादास्पद ढंग से हुआ था। अकबर के दरबार के कुछ सामंत जहाँगीर की जगह पर उसके बड़े बेटे राजकुमार खुसरो को सम्राट बनाने के पक्ष में थे। उनमें राजा मानसिंह और मिर्जा अजीज कोका प्रमुख थे।

➣ मानसिंह और मिर्जा अजीज कोका के दल की संख्या कम होने के कारण शहजादा सलीम उत्तराधिकारी चुन लिया गया।

➣ अकबर सलीम को शेख़ू बाबा कहा करता था। सलीम का मुख्य शिक्षक अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना था।

➣ सर्वप्रथम 1581 ई. में सलीम को एक सैनिक टुकड़ी का नेतृत्व देकर काबुल पर आक्रमण के लिए भेजा गया। 1585 ई. में अकबर ने जहाँगीर को 12 हज़ार मनसबदार बनाया।

➣ अपने आरंभिक जीवन में जहाँगीर शराबी और आवारा शाहज़ादे के रूप में बदनाम था। गद्दी पर बैठते ही उसने अपनी अनेक बुरी आदतों को बंद कर दिया। किंतु मदिरा−पान को वह अंत समय तक भी नहीं छोड़ सका।

➣ सलीम का पहला विवाह 1585 ई. में आमेर के राजा भगवानदास की पुत्री और मानसिंह की बहन मानबाई से हुआ था। मानबाई से ही खुसरो का जन्म हुआ था।

➣ मानबाई को जहाँगीर ने शाह बेगम की उपाधि प्रदान की। कहा जाता है कि मानबाई ने जहाँगीर की शराब की आदतों से दुखी होकर आत्महत्या कर ली।

➣ 1586 ई. में सलीम का दूसरा विवाह मारवाड़ शासक उदयसिंह की पुत्री जगतगोसाई (जोधाबाई ) से हुआ। शाहजादा खुर्रम (शाहजहाँ ) इसी का पुत्र था।

प्रारंभिक कार्य

➣ अकबर की परंपरा को स्थापित रखते हुए जहांगीर ने अपना शासन उदारता से आरंभ किया और गद्दी पर बैठते ही उसने विभिन्न लोकहितकारी आदेश दिए।

➣ जहांगीर द्वारा रक्षाबंधन का त्योहार मनाना, दीवाली पर जुआ खेलने, ब्राह्मणों और मंदिरों को दान देना एंव गो-हत्या निषेध की परम्परा को भी जारी रखा।

➣ किसी की भी फ़रियाद सुनने के लिए आगरे के किले की शाहबुर्जी और यमुना के किनारे खड़े पत्थर के एक खम्भे के बीच न्याय की प्रसिद्ध जंजीर लगवायी, जिसमें 60 घंटिया थी।

➣ शासक बनते ही जहाँगीर ने बारह घोषणाएँ प्रकाशित कराईं। ये प्रशासन सम्बन्धी अध्यादेश थे, जिन्हें आइने-जहाँगीरी कहा जाता है।

# घोषणा / अध्यादेश
1. करों (जकात, तमगा आदि) का निषेध।
2. आम रास्तों पर डकैती तथा चोरी के संबंध में नियम बनाए गए।
3. मृत व्यक्तियों की संपत्ति, यदि उसका कोई उत्तराधिकारी न हो, तो उसे भवनों, कुओं, तालाबों आदि जैसे सार्वजनिक निर्माण कार्यों पर व्यय किया जाए।
4. मदिरा तथा सभी प्रकार के मादक द्रव्यों की बिक्री पर प्रतिबंध।
5. अपराधियों के घरों की कुर्की तथा उनके नाक और कान काटने की प्रथा पर प्रतिबंध।
6. संपत्ति पर बलपूर्वक अधिकार करने का निषेध।
7. अस्पतालों का निर्माण तथा रोगियों की देखभाल के लिए वैद्यों की नियुक्ति।
8. सप्ताह में दो दिन—गुरुवार (जहाँगीर के राज्याभिषेक का दिन) तथा रविवार (अकबर का जन्मदिन)—पशुहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध।
9. सड़कों के किनारे सराय, मस्जिद एवं कुओं का निर्माण।
10. मनसबों तथा जागीरों का सामान्य प्रमाणीकरण।
11. आइमा (मदद-ए-माश) भूमि का प्रमाणीकरण।
12. दुर्गों तथा प्रत्येक प्रकार के बंदीगृहों के सभी बंदियों को क्षमादान

➣ जहांगीर ने फरीद बुखारी को मीर बख्शी का पद एवं साहिब उस सेफ वा लकलाम (कलम एवं तलवार काधनी) की उपाधि तथा शरीफ खां को वजीर का पद एवं अमीर उल उमरा की उपाधि और वीरसिंह बुन्देला को 3000 का मनसब प्रदान किया।

➣ इस प्रकार जहाँगीर ने अपनी आरंभिक समस्याओं (राज्याभिषेक के समय) को हल करते हुए शुरुआती कार्यकाल में ही प्रशासनिक सुधार किये, जिससे प्रजा का उसके प्रति स्नेह बना रहे।

सैन्य अभियान

मेवाड़ से संधि (1615 ई.)

➣ मेवाड़ से 1615 ई. की संधि जहाँगीर की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जाती है। इस संधि में न तो राणा अमरसिंह को दरबार में उपस्थित होने के लिए बाध्य किया गया और न ही मेवाड़ के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करने की शर्त रखी गई, जिससे राजपूत सम्मान सुरक्षित रहा।

➣ अकबर के जीवनकाल में मेवाड़ पूर्णतः मुगलों के अधीन नहीं आ सका था। महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी युद्ध (1576 ई.) के बाद भी संघर्ष जारी रखा और अपनी मृत्यु (1597 ई.) से पूर्व अधिकांश मेवाड़ पर पुनः अधिकार स्थापित कर लिया था।

➣ जहाँगीर के सिंहासन पर बैठने (1605 ई.) के समय मेवाड़ का शासक राणा अमरसिंह था, जो महाराणा प्रताप का ज्येष्ठ पुत्र एवं उत्तराधिकारी था। जहाँगीर अपने पिता अकबर की अधूरी योजना को पूरा कर मेवाड़ को मुगल अधीनता में लाना चाहता था।

➣ मेवाड़ को जीतने के लिए जहाँगीर ने लगातार कई सैन्य अभियान भेजे—

वर्ष सेनापति / नेतृत्व
1605 ई. शहज़ादा परवेज
1608 ई. महावत ख़ाँ
1609 ई. अब्दुल्ला ख़ाँ
1613–1615 ई. शहज़ादा खुर्रम (भावी शाहजहाँ)

➣ प्रारम्भिक अभियानों में मुगलों को निर्णायक सफलता नहीं मिली। अंततः शहज़ादा खुर्रम ने सैन्य दबाव और कूटनीति दोनों का प्रयोग किया, जिसके परिणामस्वरूप दोनों पक्षों ने संधि करना उचित समझा।

1615 ई. में मुगल बादशाह जहाँगीर तथा राणा अमरसिंह के मध्य चित्तौड़गढ़ की संधि (मेवाड़ संधि) हुई। इस संधि के साथ लगभग एक शताब्दी से चला आ रहा मुगल–मेवाड़ संघर्ष समाप्त हो गया।

संधि की प्रमुख शर्तें

# शर्त
1. राणा अमरसिंह ने मुगल बादशाह की अधीनता स्वीकार की।
2. जहाँगीर ने चित्तौड़ दुर्ग सहित मेवाड़ का अधिकांश क्षेत्र राणा को लौटा दिया, किन्तु चित्तौड़ दुर्ग की पुनः किलाबंदी नहीं करने की शर्त रखी।
3. राणा अमरसिंह को स्वयं मुगल दरबार में उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया गया।
4. राणा के पुत्र करणसिंह को मुगल दरबार में भेजा गया, जहाँ उसे 5000 जात एवं 5000 सवार का मनसब प्रदान किया गया।
5. मेवाड़ के राजवंश पर किसी प्रकार का वैवाहिक संबंध स्थापित करने का दबाव नहीं डाला गया।

➣ लगभग सौ वर्षों से चला आ रहा मुगल–मेवाड़ संघर्ष समाप्त हो गया और राजस्थान में मुगल सत्ता की स्थिति अधिक सुदृढ़ हुई।

➣ मेवाड़ की प्रतिष्ठा भी बनी रही, क्योंकि राणा अमरसिंह को व्यक्तिगत रूप से मुगल दरबार में उपस्थित नहीं होना पड़ा तथा राजपूत सम्मान की रक्षा की गई।

➣ इस अभियान की सफलता से शहज़ादा खुर्रम की प्रतिष्ठा में अत्यधिक वृद्धि हुई, जिससे वह भविष्य के उत्तराधिकार संघर्ष में सबसे सशक्त दावेदार बन गया।

➣ परंपरा के अनुसार, इस संधि से राणा अमरसिंह इतने व्यथित हुए कि उन्होंने राज्य का शासन अपने पुत्र करणसिंह को सौंप दिया और नौ-चौकी नामक स्थान पर शेष जीवन व्यतीत किया।

➣ जहाँगीर ने राणा अमरसिंह और करणसिंह के सम्मान में संगमरमर की दो मूर्तियाँ बनवाकर आगरा स्थित अपने महल के बगीचे में स्थापित करवाईं।

दक्षिण विजय

➣ मुग़ल सेना ने अहमदनगर पर सैन्य अभियान प्रारम्भ किया, किन्तु मलिक अम्बर ने छापामार युद्ध पद्धति का प्रयोग कर सभी प्रयास असफल कर दिए।

1608 ई. में अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना को, 1610 ई. में आसफ़ ख़ाँ के संरक्षण में शहज़ादा परवेज़ को, इसके बाद ख़ान-ए-जहाँ लोदी एवं अब्दुल्ला ख़ाँ को भेजा, परन्तु सभी असफल रहे।

➣ अहमदनगर का वज़ीर मलिक अंबर था। उसने अहमदनगर के राज्य को सुसंगठित किया और दक्षिण में मुगल सेनापतियों के आपसी मतभेदों का लाभ उठाकर अहमदनगर के पूर्वी क्षेत्रों पर पुनः अधिकार करं लिया।

➣ अन्त में नूरजहाँ की सलाह पर 1617 ई. में जहाँगीर ने खुर्रम को भेजा। खुर्रम ने इस अभियान में माण्डू में पड़ाव डाला लेकिन बीजापुर की मध्यस्थता से अहमदनगर व मुगलों में सन्धि (1617ई.) हो गई।

➣ अहमदनगर विजय के बाद जहांगीर ने खुर्रम को शाहजहां की उपाधि एवं 30 हजार का मनसब और गुजरात की सुबेदारी दी व बीजापुर के शासक इब्राहीम आदिलशाह द्वितीय को फर्जन्द (पुत्र) की उपाधि दी।

1617 में हुई संधि का मलिक अंबर ज्यादा दिन तक पालन नहीं कर पाया। 1620 ई. में उसने पुनः मुगलों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया, जिसे शहजादा खुर्रम (शाहजहाँ) के द्वारा दबा दिया गया।

1622 ई. में शहजादा खुर्रम के विद्रोह के कारण अहमदनगर पुनः मुगलों के नियंत्रण से बाहर हो गया।

अहमदनगर का मुग़ल साम्राज्य में पूर्णत: विलय मालिक अम्बर की मृत्यु (1626) के बाद शाहजहाँ के समय 1633 ई. में हुआ था।

➣ कालांतर में खुर्रम तथा महावत खाँ के विद्रोहों के कारण (क्रमश: 1621-26 व् 1626 ई. में) जहांगीर का दक्षिण विजय करने का अभियान बन्द हो गया।

कांगड़ा विजय (1620 ई.)

परीक्षा तथ्य: कांगड़ा अभियान जहाँगीर के सबसे कठिन सैन्य अभियानों में से एक माना जाता है। विजय के बाद कांगड़ा दुर्ग को लाहौर सूबे में मिला दिया गया।

➣ कांगड़ा दुर्ग हिमालय की शिवालिक पर्वतमाला में स्थित एक अत्यंत सुदृढ़ एवं प्राचीन दुर्ग था। इसकी सामरिक स्थिति और प्राकृतिक सुरक्षा के कारण इसे उत्तर भारत के सबसे दुर्गम किलों में गिना जाता था।

➣ मुगल सम्राट अकबर ने भी कांगड़ा दुर्ग पर अधिकार करने का प्रयास किया था, किन्तु वह इसमें पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर सका। इसलिए जहाँगीर के लिए कांगड़ा पर विजय प्रतिष्ठा का विषय बन गई।

➣ जहाँगीर ने 1620 ई. में कांगड़ा पर अभियान चलाया। इस अभियान का नेतृत्व शहज़ादा खुर्रम तथा राजा विक्रमाजीत बघेल ने किया।

➣ लंबे घेराव के बाद मुगल सेना ने कांगड़ा दुर्ग पर अधिकार कर लिया और उसे लाहौर सूबे में मिला दिया। इस प्रकार पहली बार कांगड़ा दुर्ग पर मुगलों का स्थायी अधिकार स्थापित हुआ।

➣ कुछ इतिहासकारों के अनुसार विजय के बाद कांगड़ा दुर्ग में स्थित प्राचीन मंदिर में पशु-वध एवं इस्लामी रीति से विजय-समारोह मनाया गया, जिसके कारण इस विजय को जहाँगीर के जीवन का एक कलंक भी कहा जाता है।

कंधार का खोना (1622 ई.)

➣ कंधार 1622 ई. में जहाँगीर के शासनकाल में शाह अब्बास प्रथम द्वारा मुगलों से छीन लिया गया। इसका प्रमुख कारण शहज़ादा खुर्रम का विद्रोह तथा मुगल साम्राज्य की आंतरिक राजनीतिक कमजोरी थी।

कंधार अपने सामरिक एवं व्यापारिक महत्त्व के कारण भारत, मध्य एशिया और फ़ारस के मध्य स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण सीमा-प्रदेश था। इसे भारत का प्रवेश द्वार तथा मध्य एशिया से होने वाले आक्रमणों के विरुद्ध प्राकृतिक सुरक्षा-कवच माना जाता था।

1622 ई. में जहाँगीर के शासनकाल के दौरान कंधार मुगलों के हाथ से निकलकर पुनः फ़ारस (ईरान) के अधिकार में चला गया। इसका प्रमुख कारण शहज़ादा खुर्रम (भावी शाहजहाँ) का विद्रोह तथा मुगल दरबार की आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियाँ थीं।

कंधार

वर्ष घटना
1507 ई. बाबर ने पहली बार कंधार पर अधिकार किया।
1522 ई. कंधार पूर्णतः बाबर के नियंत्रण में आ गया।
हुमायूँ काल हुमायूँ ने कंधार अपने भाई कामरान को सौंप दिया।
1545 ई. हुमायूँ ने ईरानी सहायता से कामरान से कंधार पुनः प्राप्त कर लिया।
1595 ई. अकबर ने कंधार को पुनः मुगल साम्राज्य में मिला लिया।
1622 ई. शाह अब्बास प्रथम ने कंधार पर अधिकार कर लिया।
1638 ई. शाहजहाँ ने कंधार को पुनः प्राप्त किया।
1649 ई. ईरान ने कंधार पर पुनः अधिकार कर लिया और इसके बाद मुगल उसे कभी वापस नहीं ले सके।

कंधार खोने के कारण

➣ ईरान का शासक शाह अब्बास प्रथम (1588–1629 ई.) प्रारम्भ में जहाँगीर से मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखना चाहता था। उसने 1611, 1615 तथा 1620 ई. में अनेक उपहार एवं मैत्रीपूर्ण पत्र जहाँगीर के दरबार में भेजे।

➣ जहाँगीर ने भी अपने दूत खान आलम के साथ प्रसिद्ध चित्रकार बिसनदास को शाह अब्बास के दरबार में भेजा, जिसने वहाँ के दरबार एवं शाह के चित्र बनाए।

1620 ई. में शाह अब्बास ने कंधार को अपने हवाले करने का अनुरोध किया, किन्तु साथ ही उसने कंधार पर आक्रमण की तैयारी भी प्रारम्भ कर दी।

➣ स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जहाँगीर ने शहज़ादा खुर्रम को कंधार की रक्षा के लिए भेजना चाहा, लेकिन खुर्रम ने अपनी राजनीतिक माँगें रखीं। जहाँगीर द्वारा उन्हें अस्वीकार कर दिए जाने पर उसने अभियान में सहयोग नहीं दिया।

➣ मुगल साम्राज्य के आंतरिक संकट एवं शहज़ादा खुर्रम के विद्रोह का लाभ उठाकर 1622 ई. में शाह अब्बास प्रथम ने कंधार पर अधिकार कर लिया।

➣ यद्दपि शाहजहाँ के काल में कंधार पुन: कुछ समय तक मुग़लों के अधिकार में रहा किन्तु वह उस पर नियंत्रण बनाए नहीं रख सके फलत: 1649ई. में कंधार मुग़लों से हमेशा के लिए कट गया।

जहाँगीर के समय हुए प्रमुख विद्रोह

खुसरो का विद्रोह (1606 ई.)

➣ 1605 ई. में जहाँगीर के सिंहासन पर बैठने के कुछ ही समय बाद उसे अपने ज्येष्ठ पुत्र शहज़ादा खुसरो के विद्रोह का सामना करना पड़ा। यह जहाँगीर के शासनकाल का पहला और सबसे महत्वपूर्ण विद्रोह था।

अप्रैल 1606 ई. में खुसरो आगरा से भागकर पंजाब की ओर चला गया। उसे मार्ग में अनेक असंतुष्ट अमीरों तथा राजपूत सरदारों का समर्थन प्राप्त हुआ।

➣ खुसरो को सिखों के पाँचवें गुरु गुरु अर्जुन देव का आशीर्वाद प्राप्त था। इसके अतिरिक्त राजा मानसिंह तथा ख़ाने-आज़म (अज़ीज़ कोका) का भी उसे परोक्ष समर्थन प्राप्त था।

➣ गुरु अर्जुन देव द्वारा खुसरो को आशीर्वाद एवं आर्थिक सहायता देने के आरोप में जहाँगीर ने उन्हें राजद्रोह का दोषी ठहराया और 1606 ई. में मृत्यु-दण्ड दिया। सिख इतिहास में उन्हें प्रथम सिख शहीद माना जाता है।

गुरु अर्जुन देव की समाधि (गुरुद्वारा डेरा साहिब) लाहौर किले के निकट स्थित है।

➣ जहाँगीर और खुसरो की सेनाओं के बीच भैरोवाल (भेरावल) नामक स्थान (जालंधर के निकट) पर युद्ध हुआ, जिसमें शहज़ादा खुसरो पराजित होकर बंदी बना लिया गया।

➣ विद्रोह के दण्डस्वरूप जहाँगीर के आदेश से खुसरो को आंशिक रूप से अन्धा करा दिया गया तथा उसे कैद में रखा गया।

1622 ई. में शहज़ादा खुर्रम (भावी शाहजहाँ) ने उत्तराधिकार के संघर्ष के दौरान बुरहानपुर में खुसरो की हत्या करवा दी।

➣ इतिहासकारों ने खुसरो को हुतात्मा संत की संज्ञा दी है। इसी विद्रोह के समय जहाँगीर ने प्रसिद्ध कथन कहा था— “राजा का कोई सम्बन्धी नहीं होता।”

खुसरो बाग, प्रयागराज (इलाहाबाद) में शहज़ादा खुसरो तथा उसकी माता मानबाई (शाह बेगम) के मकबरे स्थित हैं।

ग्वालियर का किला मुगलकाल में विद्रोही शहज़ादों का प्रमुख कारागार था। इसी कारण इसे “मुगल विद्रोहियों की कब्रगाह” भी कहा जाता है, क्योंकि अनेक विद्रोही राजकुमारों को यहाँ बंदी बनाकर रखा गया था।

रायसिंह का विद्रोह

➣ जहाँगीर के शासनकाल के प्रारम्भ में बीकानेर के शासक राजा रायसिंह ने विद्रोह का प्रयास किया।

➣ कहा जाता है कि एक ज्योतिषी ने जहाँगीर के शासन के शीघ्र समाप्त होने की भविष्यवाणी की थी, जिससे प्रभावित होकर रायसिंह ने विद्रोह का मार्ग अपनाया।

➣ जहाँगीर ने तत्काल सैन्य कार्रवाई कर इस विद्रोह को शीघ्र ही दबा दिया, जिससे राजपूताना में मुगल सत्ता पुनः सुदृढ़ हो गई।

रायसिंह का विद्रोह जहाँगीर के शासनकाल के प्रारम्भिक एवं अल्पकालिक विद्रोहों में गिना जाता है।

बंगाल के विद्रोह

➣ जहाँगीर के शासनकाल में बंगाल के अफगान सरदारों ने मुगल सत्ता के विरुद्ध दो प्रमुख विद्रोह किए।

# विद्रोही विवरण
1. उस्मान ख़ाँ अफगान सरदार उस्मान ख़ाँ ने मुगल शासन के विरुद्ध विद्रोह किया, जिसे मुगल सेना ने दबा दिया।
2. मूसा ख़ाँ मूसा ख़ाँ ने बारह भुइयाँ (Baro Bhuiyan) संघ के नेतृत्व में मुगलों का विरोध किया, किन्तु अंततः यह विद्रोह भी असफल रहा।

बंगाल में बारह भुइयाँ (Baro Bhuiyan) विद्रोह का नेतृत्व मूसा ख़ाँ ने किया था।

शाहजहाँ का विद्रोह (1622–1625 ई.)

शाहजहाँ के विद्रोह का मुख्य कारण कंधार अभियान से इंकार तथा नूरजहाँ द्वारा शहरयार को उत्तराधिकारी बनाने के प्रयास थे। इस विद्रोह के परिणामस्वरूप मुगल साम्राज्य 1622 ई. में कंधार खो बैठा।

➣ जहाँगीर के शासनकाल का सबसे महत्वपूर्ण राजकुमार विद्रोह शहज़ादा खुर्रम (भावी शाहजहाँ) द्वारा किया गया। यह विद्रोह 1622–1625 ई. तक चला।

➣ विद्रोह का तात्कालिक कारण कंधार अभियान था। 1622 ई. में ईरान के शासक शाह अब्बास प्रथम ने कंधार पर आक्रमण कर दिया। जहाँगीर ने शहज़ादा खुर्रम को कंधार की रक्षा के लिए भेजने का आदेश दिया, किन्तु उसने जाने से इंकार कर दिया।

➣ खुर्रम को आशंका थी कि उसकी अनुपस्थिति में नूरजहाँ अपने दामाद शहरयार को उत्तराधिकारी घोषित करा सकती है। इसलिए उसने कंधार जाने से पहले कुछ शर्तें रखीं।

# शाहजहाँ की प्रमुख माँगें
1. संपूर्ण पंजाब का अधिकार।
2. रोहतासगढ़ के किले का नियंत्रण।

➣ जहाँगीर ने इन माँगों को अस्वीकार कर दिया। इसी बीच नूरजहाँ ने शहरयार के मनसब में वृद्धि कर उसे विशेष महत्व देना प्रारम्भ कर दिया, जिससे खुर्रम और अधिक असंतुष्ट हो गया।

➣ परिणामस्वरूप 1622–23 ई. में शहज़ादा खुर्रम ने अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना के सहयोग से विद्रोह कर दिया। उस समय उसका मुख्यालय मांडू में था तथा उसे दक्कन की सेना का भी समर्थन प्राप्त था।

➣ खुर्रम के पक्ष में गुजरात, मालवा, मेवाड़ के करणसिंह तथा उसके ससुर आसफ ख़ाँ जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों का भी समर्थन था।

➣ आगरा के शाही खजाने पर अधिकार करने के उद्देश्य से वह आगरा की ओर बढ़ा, किन्तु बिलोचपुर के निकट महावत ख़ाँ ने उसे पराजित कर दिया।

➣ पराजय के बाद खुर्रम पूर्वी भारत की ओर चला गया और कुछ समय के लिए बंगाल तथा बिहार पर अधिकार कर लिया। उसने दक्कन के शक्तिशाली सरदार मलिक अंबर से भी समझौता किया, किन्तु अंततः उसे सफलता नहीं मिली।

➣ महावत ख़ाँ के लगातार अभियानों के कारण खुर्रम की स्थिति कमजोर होती गई और अंततः उसने जहाँगीर से क्षमा माँग ली।

1625–26 ई. में जहाँगीर ने उसे क्षमा कर दिया, किन्तु उसके दोनों पुत्रों दारा शिकोह तथा औरंगज़ेब को जमानत (बंधक) के रूप में अपने पास रखा।

➣ इसके बाद शाहजहाँ को दक्षिण में रहने के लिए बालाघाट की जागीर प्रदान की गई।

शाहजहाँ के विद्रोह का महत्व

क्र. सं. महत्व
1. यह जहाँगीर के शासनकाल का सबसे बड़ा राजकुमार विद्रोह था।
2. इस विद्रोह के कारण मुगल साम्राज्य कंधार की रक्षा नहीं कर सका और 1622 ई. में कंधार ईरान के अधिकार में चला गया।
3. इस विद्रोह ने नूरजहाँ गुट और शाहजहाँ गुट के बीच उत्तराधिकार संघर्ष को और तीव्र कर दिया।
4. अंततः शाहजहाँ ने आत्मसमर्पण कर जहाँगीर से क्षमा प्राप्त की।

महावत ख़ाँ का विद्रोह (1626 ई.)

महावत ख़ाँ का मूल नाम ज़मान बेग था। वह जहाँगीर का एक योग्य एवं विश्वसनीय सेनापति था तथा उसे अमीर-उल-उमरा (अमीरों का प्रधान) की उपाधि प्राप्त थी।

➣ शाहजहाँ के विद्रोह को दबाने में महावत ख़ाँ की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। उसकी बढ़ती प्रतिष्ठा से नूरजहाँ स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगी और उसके विरुद्ध कार्रवाई प्रारम्भ कर दी।

➣ नूरजहाँ के अपमानजनक व्यवहार तथा उसके प्रभाव को कम करने के प्रयासों से असंतुष्ट होकर 1626 ई. में महावत ख़ाँ ने विद्रोह कर दिया।

➣ जब जहाँगीर कश्मीर से लौट रहा था, तब झेलम नदी के तट पर महावत ख़ाँ ने अचानक आक्रमण कर जहाँगीर को बंदी बना लिया और कुछ समय तक सम्राट पर अपना नियंत्रण बनाए रखा।

➣ नूरजहाँ ने साहस और कूटनीति का परिचय देते हुए स्वयं महावत ख़ाँ के शिविर में पहुँचकर परिस्थिति को अपने पक्ष में कर लिया। अंततः उसने जहाँगीर को मुक्त करा लिया और महावत ख़ाँ को पीछे हटना पड़ा।

➣ महावत ख़ाँ का यह विद्रोह असफल रहा और इसे नूरजहाँ की सबसे बड़ी राजनीतिक विजय माना जाता है।

महावत ख़ाँ के विद्रोह का महत्व

क्र. सं.महत्व
1. इस घटना से स्पष्ट हुआ कि जहाँगीर के अंतिम वर्षों में वास्तविक राजनीतिक शक्ति नूरजहाँ के हाथों में थी।
2. महावत ख़ाँ का विद्रोह जहाँगीर के शासनकाल का अंतिम प्रमुख विद्रोह था।
3. इस घटना के बाद नूरजहाँ का प्रभाव कुछ समय तक बना रहा, किन्तु जहाँगीर की मृत्यु के बाद उसका राजनीतिक प्रभाव समाप्त हो गया।

जहाँगीर की मृत्यु (1627 ई.)

➣ महावत ख़ाँ के विद्रोह के लगभग एक वर्ष बाद 28 अक्टूबर 1627 ई. को लाहौर लौटते समय भिम्बर (कश्मीर मार्ग) के निकट जहाँगीर की मृत्यु हो गई।

➣ जहाँगीर का शव लाहौर ले जाकर शाहदरा में रावी नदी के तट पर दफनाया गया, जहाँ उसका भव्य मकबरा स्थित है।

जहाँगीर का मकबरा शाहदरा (लाहौर) में रावी नदी के किनारे स्थित है। उसकी मृत्यु 28 अक्टूबर 1627 ई. को हुई थी।

जहाँगीर की धार्मिक नीति

➣ जहाँगीर ने सामान्यतः अकबर की उदार धार्मिक नीति का अनुसरण किया। उसने दीन-ए-इलाही को आगे नहीं बढ़ाया, किन्तु सुलह-ए-कुल (सार्वभौमिक सहिष्णुता) की नीति को प्रायः जारी रखा।

➣ सिंहासनारोहण के सातवें वर्ष अर्थात् 1612 ई. में जहाँगीर ने रक्षाबंधन का त्योहार मनाया तथा अपनी कलाई पर राखी भी बंधवाई।

➣ जहाँगीर उज्जैन के प्रसिद्ध वेदान्ती संत जदरूप गोसाईं से अत्यधिक प्रभावित था। वह कई बार उनसे मिलने गया और धार्मिक एवं दार्शनिक विषयों पर चर्चा करता था।

➣ इससे पूर्व अकबर तथा बाद में मिर्ज़ा अज़ीज़ कोका भी जदरूप गोसाईं से मिल चुके थे।

➣ जहाँगीर ने रविवार (अकबर के जन्मदिन के सम्मान में) तथा बृहस्पतिवार (अपने राज्यारोहण के दिन) पूरे साम्राज्य में पशुवध पर प्रतिबन्ध लगाने का आदेश दिया।

➣ जहाँगीर को ईसाई धर्म एवं यूरोपीय संस्कृति में विशेष रुचि थी। उसने ईसाई मिशनरियों से धार्मिक विषयों पर विचार-विमर्श किया तथा उन्हें अपने दरबार में सम्मान दिया।

➣ जहाँगीर ने प्रसिद्ध जेसुइट पादरी फादर जेरोम जेवियर (Jerome Xavier) से ईसाई धर्म के सिद्धांतों का अध्ययन किया।

1610 ई. में दानियाल के एक पुत्र को ईसाई धर्म स्वीकार कराने पर भी जहाँगीर ने कोई कठोर प्रतिक्रिया नहीं दी।

➣ किन्तु जब पुर्तगालियों के साथ संघर्ष हुआ, तब उसने आगरा एवं लाहौर के गिरजाघरों को अस्थायी रूप से बन्द करवा दिया।

➣ समग्र रूप से जहाँगीर की धार्मिक नीति उदार एवं व्यावहारिक थी। यद्यपि वह अकबर जितना उदार नहीं था, फिर भी सामान्यतः उसने विभिन्न धर्मों के प्रति सहिष्णु दृष्टिकोण अपनाया।

धार्मिक नीति के अपवाद

➣ यद्यपि जहाँगीर ने सामान्यतः सुलह-ए-कुल की नीति का पालन किया, फिर भी कुछ अवसरों पर उसने राजनीतिक अथवा धार्मिक कारणों से कठोर कदम भी उठाए।

➣ जहाँगीर ने राजौरी (कश्मीर) के कुछ ब्राह्मणों को दण्डित किया। उसके अनुसार वे मुस्लिम महिलाओं को अपने धर्म में सम्मिलित कर उनसे विवाह कर रहे थे।

➣ उसने अजमेर स्थित वराह मंदिर को ध्वस्त कराने का आदेश दिया।

➣ गुजरात में कुछ जैन साधुओं को भी दण्डित किया गया, क्योंकि जहाँगीर को संदेह था कि वे उसके विरुद्ध राजनीतिक गतिविधियों में संलग्न हैं।

धार्मिक प्रशासन

➣ जहाँगीर ने हिन्दू प्रजा की सुविधा के लिए श्रीकान्त नामक एक हिन्दू को हिन्दुओं के धार्मिक एवं सामाजिक मामलों का न्यायाधीश (काज़ी के समकक्ष) नियुक्त किया।

➣ इससे हिन्दुओं को अपने धार्मिक एवं सामाजिक विवादों के निपटारे के लिए मुस्लिम न्यायाधीशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था।

धार्मिक नीति का मूल्यांकन

➣ जहाँगीर की धार्मिक नीति को सामान्यतः उदार, व्यावहारिक एवं संतुलित माना जाता है। उसने अधिकांश मामलों में अकबर की सुलह-ए-कुल की नीति का अनुसरण किया, किन्तु वह अकबर जितना उदार नहीं था।

➣ कुछ अवसरों पर उसके द्वारा मंदिर ध्वंस, ब्राह्मणों एवं जैनों के विरुद्ध की गई कार्रवाई धार्मिक कारणों से अधिक राजनीतिक एवं प्रशासनिक परिस्थितियों से भी प्रभावित थी।

➣ जहाँगीर की धार्मिक नीति में उदारता और कठोरता—दोनों के उदाहरण मिलते हैं। इसलिए इतिहासकार उसे न तो अकबर जितना उदार मानते हैं और न ही औरंगज़ेब जितना कट्टर।

सामाजिक जीवन एवं अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

➣ जहाँगीर ने अपने शासनकाल में पुरुषों द्वारा कान छिदवाकर बहुमूल्य रत्न धारण करने की प्रथा को प्रोत्साहन दिया, जो उस समय दरबार एवं उच्च वर्ग में एक फैशन बन गया।

➣ जहाँगीर ने हिजड़ों (खोजों) के व्यापार पर रोक लगाने का प्रयास किया तथा समाज में कुछ कुप्रथाओं को समाप्त करने के लिए कदम उठाए।

➣ उसने प्रजा को राहत देने के उद्देश्य से कुछ कष्टप्रद चुंगियों एवं करों को समाप्त कर दिया।

➣ जहाँगीर के शासनकाल में तम्बाकू का प्रचलन तेजी से बढ़ा। तम्बाकू पुर्तगालियों के माध्यम से भारत पहुँची तथा बाद में 1617 ई. में जहाँगीर ने इसके सेवन पर प्रतिबन्ध लगाने का आदेश जारी किया।

➣ जहाँगीर की सबसे बड़ी विशेषता उसकी न्यायप्रियता मानी जाती है। न्याय प्राप्ति के लिए उसने आगरा किले में प्रसिद्ध न्याय की जंजीर (Chain of Justice) लगवाई थी, ताकि कोई भी व्यक्ति सीधे सम्राट तक अपनी शिकायत पहुँचा सके।

➣ इतिहासकारों के अनुसार जहाँगीर का सबसे बड़ा व्यक्तिगत अवगुण मद्यपान की अत्यधिक प्रवृत्ति था, जिसका उल्लेख उसने अपनी आत्मकथा तुज़ुक-ए-जहाँगीरी में भी किया है।

जहाँगीर : चित्रकला का स्वर्ण युग

➣ मुगल चित्रकला जहाँगीर (1605–1627 ई.) के शासनकाल में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची। कला के प्रति उसकी गहरी रुचि एवं संरक्षण के कारण इस काल को मुगल चित्रकला का स्वर्ण युग कहा जाता है।

➣ अकबर के समय चित्रकला का प्रमुख उद्देश्य हस्तलिखित ग्रंथों का चित्रांकन था, जबकि जहाँगीर के काल में स्वतंत्र चित्रकला (Independent Painting) का विकास हुआ।

➣ जहाँगीर के समय छवि-चित्र (Portrait Painting), प्राकृतिक दृश्यों, पशु-पक्षियों, फूल-पौधों तथा दैनिक जीवन से संबंधित चित्रों का विशेष विकास हुआ।

➣ जहाँगीर स्वयं चित्रकला का उत्कृष्ट पारखी था। वह किसी चित्र को देखकर उसके चित्रकार की पहचान कर सकता था तथा एक ही चित्र में विभिन्न चित्रकारों द्वारा बनाए गए भागों को भी अलग-अलग पहचानने की क्षमता रखता था।

➣ जहाँगीर के शासनकाल में चित्रकला में यथार्थवाद (Realism), सूक्ष्मता, प्राकृतिकता तथा जीवंत अभिव्यक्ति पर विशेष बल दिया गया।

➣ इस काल में विशेष रूप से व्यक्ति-चित्र (Portrait), पशु-पक्षियों के चित्र, शिकार के दृश्य तथा प्राकृतिक सौन्दर्य का अत्यंत सूक्ष्म एवं कलात्मक चित्रण किया गया।

➣ जहाँगीर के संरक्षण में मुगल चित्रकला ने तकनीकी परिपक्वता प्राप्त की और भारतीय, फ़ारसी तथा यूरोपीय चित्रकला शैलियों का सुंदर समन्वय दिखाई देने लगा।

➣ अधिकांश इतिहासकार जहाँगीर के शासनकाल को मुगल चित्रकला का स्वर्ण युग मानते हैं, जबकि शाहजहाँ के काल में चित्रकला की अपेक्षा स्थापत्य कला को अधिक संरक्षण प्राप्त हुआ।

जहाँगीर काल के प्रमुख चित्रकार

चित्रकार विशेष योगदान / उपलब्धि उपाधि / विशेष तथ्य
उस्ताद मंसूर पशु-पक्षियों, वनस्पतियों एवं प्राकृतिक चित्रों का सर्वश्रेष्ठ चित्रकार। साइबेरियन सारस, कस्तूरी मृग, टर्की आदि के यथार्थ चित्र बनाए। नादिर-उल-अस्र (युग का अद्भुत कलाकार)
अबुल हसन व्यक्ति-चित्र (Portrait Painting) एवं दरबारी चित्रों में विशेष दक्षता। नादिर-उज्-जमाँ (युग का अद्भुत चित्रकार)
बिसनदास व्यक्ति-चित्र (Portrait) बनाने में अत्यन्त प्रसिद्ध। जहाँगीर ने इसे फ़ारस के शाह एवं उसके अमीरों के चित्र बनाने के लिए भेजा। जहाँगीर का विश्वसनीय चित्रकार
फ़ारुख़ बेग अकबर के समय मुगल चित्रशाला में आया। जहाँगीर के काल में बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह का प्रसिद्ध चित्र बनाया। फ़ारसी शैली का प्रमुख चित्रकार
दौलत दरबारी व्यक्तियों एवं चित्रकारों के समूह-चित्र बनाने में दक्ष। सूक्ष्म चित्रांकन के लिए प्रसिद्ध
मनोहर व्यक्ति-चित्र एवं राजदरबार के चित्रों में विशेष निपुण। अकबर एवं जहाँगीर—दोनों के समय सक्रिय
➣ जहाँगीर के समय उस्ताद मंसूर तथा अबुल हसन को मुगल चित्रकला का सर्वश्रेष्ठ चित्रकार माना जाता है। जहाँगीर ने इन्हें क्रमशः ‘नादिर-उल-अस्र’ तथा ‘नादिर-उज्-जमाँ’ की उपाधियाँ प्रदान की थीं।

जहाँगीर का चित्रकला संरक्षण

➣ जहाँगीर स्वयं चित्रकला का अत्यंत पारखी एवं कला-प्रेमी शासक था। उसने मुगल चित्रकला को संरक्षण देकर उसे नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

➣ जहाँगीर ने प्रसिद्ध चित्रकार बिसनदास को अपने राजदूत खान आलम के साथ फ़ारस के शाह अब्बास प्रथम के दरबार में भेजा था, ताकि वह शाह, उसके अमीरों एवं राजपरिवार के सदस्यों के छवि-चित्र (Portraits) बनाकर ला सके।

➣ प्रसिद्ध चित्रकार फ़ारुख़ बेग ने जहाँगीर के शासनकाल में बीजापुर के सुल्तान इब्राहीम आदिलशाह द्वितीय का प्रसिद्ध चित्र बनाया, जिसे मुगल चित्रकला की उत्कृष्ट कृतियों में गिना जाता है।

➣ जहाँगीर ने अपने दो सर्वश्रेष्ठ चित्रकारों उस्ताद मंसूर एवं अबुल हसन को उनकी असाधारण कला के लिए क्रमशः ‘नादिर-उल-अस्र’ तथा ‘नादिर-उज्-जमाँ’ की उपाधियाँ प्रदान कीं।

➣ जहाँगीर चित्रों का इतना कुशल पारखी था कि वह किसी चित्र को देखकर उसके चित्रकार की पहचान कर लेता था। यदि किसी चित्र के विभिन्न भाग अलग-अलग चित्रकारों ने बनाए हों, तो वह प्रत्येक भाग के चित्रकार को भी पहचान सकता था।

➣ जहाँगीर के संरक्षण में मुगल चित्रकला में छवि-चित्र (Portrait Painting), प्राकृतिक दृश्य, पशु-पक्षियों के चित्र तथा यथार्थवादी चित्रण का अभूतपूर्व विकास हुआ।

➣ जहाँगीर का चित्रकला के प्रति प्रेम इतना अधिक था कि इतिहासकार उसे मुगल सम्राटों में सर्वश्रेष्ठ कला-पारखी मानते हैं। उसके संरक्षण में मुगल चित्रकला अपनी पराकाष्ठा पर पहुँची।

जहाँगीर का साहित्यिक योगदान

➣ जहाँगीर एक योग्य शासक होने के साथ-साथ उच्चकोटि का लेखक भी था। उसे फ़ारसी भाषा एवं साहित्य का अच्छा ज्ञान था।

➣ उसने अपनी आत्मकथा फ़ारसी भाषा में लिखी, जिसका नाम तुज़ुक-ए-जहाँगीरी (जहाँगीरनामा) है। यह मुगलकाल के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोतों में से एक है।

तुज़ुक-ए-जहाँगीरी में जहाँगीर ने अपने शासनकाल की प्रमुख घटनाओं, प्रशासन, न्याय व्यवस्था, प्राकृतिक रुचियों तथा कला एवं चित्रकला के प्रति अपने प्रेम का विस्तृत वर्णन किया है।

➣ जहाँगीर ने इस ग्रन्थ की रचना स्वयं अपने शासनकाल के लगभग 17वें वर्ष तक की। उसके बाद अस्वस्थ होने के कारण शेष भाग का लेखन मुतामिद ख़ाँ ने पूरा किया।

अबुल हसन ने तुज़ुक-ए-जहाँगीरी के मुखपृष्ठ के लिए चित्र बनाया, जिसे मुगल चित्रकला की उत्कृष्ट कृतियों में गिना जाता है।

➣ यह ग्रन्थ जहाँगीर के व्यक्तित्व, उसकी कलाप्रियता, प्रकृति-प्रेम तथा प्रशासनिक दृष्टिकोण को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

तुज़ुक-ए-जहाँगीरी (जहाँगीरनामा) जहाँगीर की आत्मकथा है। इसकी भाषा फ़ारसी है तथा इसे मुगलकाल का एक प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोत माना जाता है।

समकालीन विदेशी यात्री

विलियम हॉकिंस (1608-1611 ई.) जहांगीर के दरबार में भेजा जाने वाला ईस्ट इंडिया कंपनी का राजदूत तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रतिनिधि के रूप में मुगल दरबार में उपस्थित होने वाला पहला अंग्रेज था।

➣ जहांगीर ने हॉकिंस को 400 का मनसब दिया एंव इंग्लिश खां की उपाधि देकर आर्मीनिया की एक स्त्री से उसका विवाह कर दिया। हाकिन्स हैक्टर नामक जहाज से भारत आया था।

➣ 1608 ई. में सूरत में स्थापित ब्रिटिश कम्पनी को सूरत में फैक्ट्री स्थापित करने की आज्ञा जहांगीर ने 1613 ई. में दी।

➣ जहांगीर के दरबार में आने वाले दूसरे शिष्टमंडल का नेतृत्वकर्ता सर थॉमस रो थे।

सर थॉमस रो (1615-1619 ई.) ब्रिटेन के राजा जेम्स प्रथम के दूत के रूप में 18 सितंबर, 1615 को सूरत पहुंचा। जनवरी, 1616 में वह अजमेर में जहांगीर के दरबार में उपस्थित हुआ।

➣ उसे बादशाह के साथ मांडू,अहमदाबाद तथा अजमेर जैसे अनेक स्थानों पर जाने का अवसर मिला। वह बादशाह के साथ शिकार खेलने भी गया। वह आगरा में एक वर्ष तक रहा था।

फ्रांसिस्को पेलसर्ट डच पर्यटक था, जो जहांगीर के समय भारत आया, इसने अपनी पुस्तक रिमान्स्ट्रैटी में जहांगीर के समय का अद्भुत विवरण लिखा है।

नूरजहाँ गुट

➣ इस गुट के प्रमुख सदस्य थे — एत्मादुद्दौला या मिर्ज़ा ग़ियास बेग (नूरजहाँ के पिता), अस्मत बेगम (नूरजहाँ की माँ), आसफ़ ख़ाँ (नूरजहाँ के भाई) तथा शाहज़ादा ख़ुर्रम (शाहजहाँ)

➣ नूरजहाँ के प्रभाव में रहे जहाँगीर के शासनकाल को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है — 1611-1622 ई. तथा 1622-1627 ई.

➣ पहले दौर में ख़ुर्रम नूरजहाँ गुट का हिस्सा था, परंतु दूसरे दौर में वह इस गुट से अलग हो गया।

➣ नूरजहाँ बेहद महत्वाकांक्षी स्वभाव की थी। कहा जाता है कि जहाँगीर ने स्वयं स्वीकार किया था कि उसे केवल एक सेर शराब और थोड़े-से कबाब के अलावा और किसी चीज़ की चाह नहीं रही, क्योंकि सत्ता की बागडोर अब नूरजहाँ के हाथों में आ चुकी थी।

➣ नूरजहाँ ने नूरमहली नामक वस्त्र-शैली को डिज़ाइन किया था। यात्री पीटर मुंडी के विवरण के अनुसार उसने आगरा में नूरमहल सराय का निर्माण भी करवाया।

➣ नूरजहाँ जहाँगीर के साथ झरोखा दर्शन दिया करती थी, और सिक्कों पर जहाँगीर के नाम के साथ-साथ उसका नाम भी बादशाह बेगम के रूप में अंकित होता था।

➣ नूरजहाँ ने आगरा में अपने पिता की स्मृति में एत्मादुद्दौला का मक़बरा बनवाया, जो अपनी बारीक पच्चीकारी और सफ़ेद संगमरमर के प्रयोग के लिये प्रसिद्ध है। मुगलकाल में संगमरमर का यह सबसे पहला उल्लेखनीय प्रयोग माना जाता है, और भारत में पित्रा दूरा शैली का प्रयोग भी सबसे पहले इसी मक़बरे में देखा गया।

➣ इसके काफी समय बाद ताजमहल में पित्रा दूरा कला का बहुत बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। यह मक़बरा नूरजहाँ की सूक्ष्म कलात्मक सोच और स्त्री-दृष्टिकोण की झलक भी देता है।

➣ नूरजहाँ के व्यक्तित्व और प्रभाव का विस्तृत वर्णन इतिहासकार बेनी प्रसाद ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ़ जहाँगीर में किया है।

➣ राजकीय आदेशों (फ़रमानों) पर जहाँगीर के साथ-साथ नूरजहाँ की मुहर भी लगती थी और उसके हस्ताक्षर भी होते थे, जो उस युग में किसी मुगल महिला के लिये असाधारण बात थी।

1621 ई. में नूरजहाँ ने अपने पहले पति शेर अफ़गान से जन्मी अपनी पुत्री लाड़ली बेगम का विवाह शाहज़ादा शहरयार से करवाया।

➣ इसी दौरान नूरजहाँ के भाई आसफ़ ख़ाँ ने अपनी पुत्री अर्जुमंद बानो बेगम (मुमताज़ महल) का विवाह शाहज़ादा ख़ुर्रम से करवा दिया। इस घटना से नूरजहाँ गुट में भीतरी दरार पड़ गई, क्योंकि बहन-भाई दोनों अब अपने-अपने दामाद को तख़्त पर बिठाने की राजनीति में जुट गये।

➣ नूरजहाँ की माँ अस्मत बेगम को गुलाब के इत्र बनाने की विधि खोजने का श्रेय दिया जाता है, जिसे रोगन-ए-जहाँगीरी नाम दिया गया।

➣ नूरजहाँ ने कपड़ों और गहनों के क्षेत्र में नये फैशन-चलन शुरू किये, और साथ ही वह फ़ारसी भाषा में कविताएँ भी लिखा करती थी।

➣ अपनी सूझबूझ और चतुराई से नूरजहाँ ने महावत ख़ाँ के विद्रोह को असफल करते हुए जहाँगीर को क़ैद से मुक्त करवाया था।

जहाँगीर की मृत्यु के पश्चात् नूरजहाँ को दो लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर लाहौर भेज दिया गया, जहाँ वह 1645 ई. में अपनी मृत्यु तक रही और उसे जहाँगीर की क़ब्र के पास ही दफ़नाया गया।

जहाँगीर के शासनकाल की प्रमुख घटनाएँ (1605–1627 ई.)

वर्ष प्रमुख घटना
1605 ई. 3 नवम्बर को जहाँगीर का राज्याभिषेक; 12 आदेश जारी किए तथा न्याय की जंजीर (जंजीर-ए-अदल) की स्थापना की।
1606 ई. शहज़ादा ख़ुसरो का विद्रोह; गुरु अर्जुन देव को मृत्युदण्ड दिया गया।
1607 ई. राणा अमर सिंह के विरुद्ध मेवाड़ अभियान पुनः प्रारम्भ किया गया।
1608 ई. कैप्टन विलियम हॉकिन्स सूरत के मार्ग से जहाँगीर के दरबार में पहुँचा।
1611 ई. नूरजहाँ से विवाह; नूरजहाँ गुट (Nur Jahan Junta) का प्रभाव प्रारम्भ हुआ।
1613 ई. सूरत में अंग्रेजों को पहली स्थायी व्यापारिक कोठी स्थापित करने की अनुमति मिली।
1615 ई. मेवाड़ की संधि; सर टॉमस रो जहाँगीर के दरबार में पहुँचा।
1617 ई. शहज़ादा खुर्रम ने दक्कन में सफलता प्राप्त की; जहाँगीर ने उसे ‘शाहजहाँ’ की उपाधि दी।
1619 ई. काँगड़ा दुर्ग पर मुगलों का अधिकार स्थापित हुआ।
1622 ई. फ़ारस के शाह अब्बास प्रथम ने कंधार पर अधिकार कर लिया।
1622–1625 ई. शाहजहाँ (खुर्रम) का विद्रोह।
1626 ई. महाबत ख़ाँ ने जहाँगीर को बंदी बनाया; बाद में नूरजहाँ ने उसे मुक्त कराया।
1627 ई. 28 अक्टूबर को जहाँगीर की मृत्यु; शाहदरा (लाहौर) में दफनाया गया।

➣ जहाँगीर की पहचान मुख्यतः न्यायप्रिय शासक एवं मुगल चित्रकला के महान संरक्षक के रूप में की जाती है।
➣ उसकी धार्मिक नीति सामान्यतः उदार थी, जबकि प्रशासनिक दृष्टि से वह न्याय एवं जनकल्याण पर विशेष बल देता था।

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