परिचय
UPSC MCQ → One Liner → Q&A →➣ औरंगज़ेब के शासनकाल में छत्रपति शिवाजी महाराज ने मराठा राज्य की नींव रखी। शुरुआत में यह दक्कन का एक छोटा-सा राज्य था, लेकिन आने वाले वर्षों में इसका लगातार विस्तार होता गया। धीरे-धीरे यही राज्य एक विशाल और शक्तिशाली मराठा साम्राज्य बन गया।
➣ 18वीं शताब्दी तक आते-आते मराठा भारत की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति बन चुके थे। उनका प्रभाव केवल दक्कन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मालवा, गुजरात, बुंदेलखंड, राजस्थान, दिल्ली और उत्तर भारत के बड़े हिस्सों तक फैल गया।
➣ उनकी शक्ति का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पेशवा बाजीराव प्रथम के समय मराठा सेना दिल्ली के निकट पहुँच गई थी। उस समय ऐसी स्थिति बन गई थी कि मुगल बादशाह मुहम्मदशाह कुछ समय के लिए दिल्ली छोड़ने तक के लिए तैयार हो गया था।
➣ इससे साफ़ पता चलता है कि उस समय मुगलों की तुलना में मराठों का प्रभाव कहीं अधिक बढ़ चुका था। मराठा साम्राज्य को इस ऊँचाई तक पहुँचाने का सबसे बड़ा श्रेय पेशवाओं को जाता है।
➣ शिवाजी के समय में सत्ता का केंद्र छत्रपति हुआ करते थे, लेकिन बाद के वर्षों में पेशवाओं की शक्ति लगातार बढ़ती गई और वे मराठा साम्राज्य के वास्तविक शासक बन गए।
➣ इसलिए इतिहास में 18वीं शताब्दी का बड़ा हिस्सा पेशवा काल के नाम से जाना जाता है। इसी काल में मराठा साम्राज्य अपने चरम पर भी पहुँचा और इसके पतन की शुरुआत भी हुई।
➣ दूसरी ओर ईस्ट इंडिया कंपनी भी भारत में अपना राजनीतिक प्रभाव तेजी से बढ़ा रही थी। शुरू में अंग्रेज मराठों का सामना करने की स्थिति में नहीं थे, इसलिए वे कूटनीति, संधियों और भारतीय शासकों के आपसी मतभेदों का लाभ उठाते रहे।
➣ यद्यपि भारत में अंग्रेजों का सबसे मजबूत और सबसे लंबे समय तक विरोध मराठों ने ही किया, लेकिन आपसी झगड़ों, सत्ता संघर्ष और अविश्वास के कारण कई बार मराठा सरदारों ने अंग्रेजों का साथ भी दिया। टीपू सुल्तान के विरुद्ध अंग्रेजों की सहायता करना इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
➣ अंततः मराठों की यही आंतरिक कमजोरियाँ अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ा अवसर बन गईं। तीन आंग्ल-मराठा युद्धों के बाद मराठा साम्राज्य की शक्ति धीरे-धीरे समाप्त हो गई और भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी।
➣ इस अध्याय में हम पेशवा काल, अंग्रेजों के साथ उनके संबंध, तीनों आंग्ल-मराठा युद्धों तथा मराठा साम्राज्य के पतन का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
पेशवाओं का उदय
➣ पेशवा का पद मूल रूप से छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित अष्टप्रधान परिषद के आठ प्रमुख पदों में से एक था। पेशवा मराठा साम्राज्य का प्रधानमंत्री होता था।
➣ उसका मुख्य कार्य राज्य के प्रशासन का संचालन करना, विभिन्न विभागों की देखरेख करना तथा राजा की अनुपस्थिति में शासन संबंधी कार्यों का संचालन करना था।
➣ प्रारंभ में पेशवा केवल छत्रपति का एक अधिकारी था, लेकिन समय के साथ इस पद का महत्व लगातार बढ़ता गया। विशेष रूप से शाहू के शासनकाल में पेशवाओं का प्रभाव इतना बढ़ गया कि मराठा साम्राज्य की वास्तविक सत्ता उनके हाथों में आ गई।
➣ बालाजी विश्वनाथ इस परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण आधार बने। उन्होंने बिखरी हुई मराठा शक्ति को संगठित किया और पेशवा पद को मराठा साम्राज्य में सर्वोच्च राजनीतिक स्थान दिलाया। इसी कारण उन्हें मराठा साम्राज्य का दूसरा संस्थापक भी कहा जाता है। पहले संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज थे।
बालाजी विश्वनाथ के बाद पेशवा का पद लगभग व्याहारिक रूप से वंशानुगत हो गया और आगे चलकर मराठा साम्राज्य का वास्तविक शासन पेशवा परिवार के हाथों में ही आ गया।
➣ पेशवा बाजीराव प्रथम के समय मराठा साम्राज्य का सबसे अधिक विस्तार हुआ। इसके बाद भी पेशवाओं ने मराठा शक्ति को बनाए रखा, लेकिन समय के साथ आंतरिक मतभेद और उत्तराधिकार के संघर्ष बढ़ने लगे।
➣ इन्हीं परिस्थितियों में पहली बार रघुनाथ राव (राघोबा) ने अपने राजनीतिक हितों के लिए अंग्रेजों से सूरत की संधि (1775) की। यही संधि आगे चलकर प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का प्रमुख कारण बनी।
➣ मराठा साम्राज्य के अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय थे, जो रघुनाथ राव के पुत्र थे। वे बसीन की संधि (1802) के बाद लॉर्ड वेलेजली की सहायता से दोबारा पेशवा बने, लेकिन इस संधि ने मराठा साम्राज्य की स्वतंत्रता को काफी कमजोर कर दिया।
➣ बाद में बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया, जिससे तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-18) प्रारंभ हुआ। इस युद्ध में मराठों की पराजय हुई और 1818 में अंग्रेजों ने पेशवा का पद समाप्त कर दिया।
➣ इसके बाद गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स ने बाजीराव द्वितीय से शासन छीन लिया। उन्हें आजीवन पेंशन देकर बिठूर (कानपुर) भेज दिया गया, जहाँ उन्होंने अपने जीवन के शेष वर्ष अंग्रेजों के पेंशनर के रूप में बिताए।
➣ पंत प्रतिनिधि मराठा साम्राज्य का एक अत्यंत उच्च पद था। इसका सृजन छत्रपति राजाराम ने उस समय किया था, जब वे मुगलों के आक्रमण से बचने के लिए जिंजी दुर्ग में रह रहे थे।
➣ प्रारंभ में यह पद पेशवा से भी अधिक प्रभावशाली माना जाता था, लेकिन शाहू के शासनकाल में इसका महत्व धीरे-धीरे कम होता गया और पेशवा मराठा साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली पद बन गया।
बालाजी विश्वनाथ (1713-1720 ई.)
➣ बालाजी विश्वनाथ कोंकण क्षेत्र के चित्तपावन ब्राह्मण थे। अपनी योग्यता, प्रशासनिक क्षमता तथा कूटनीतिक कौशल के कारण वे आगे चलकर मराठा साम्राज्य के सबसे प्रभावशाली पेशवाओं में गिने गए।
➣ उन्होंने न केवल मराठा राज्य को आन्तरिक संकटों से उबारा, बल्कि उसे एक संगठित एवं शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ प्रारम्भ में बालाजी विश्वनाथ ने मराठा सेनापति धनाजी जाधव के अधीन कार्य किया। लगभग 1708 ई. में धनाजी जाधव ने उन्हें कारकून (राजस्व अधिकारी/लेखाधिकारी) नियुक्त किया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने प्रशासन एवं वित्त सम्बन्धी कार्यों में अपनी असाधारण दक्षता का परिचय दिया।
➣ 1708 ई. में धनाजी जाधव की मृत्यु के बाद उनका पुत्र चन्द्रसेन जाधव मराठा सेना का सेनापति नियुक्त हुआ। बालाजी विश्वनाथ ने कुछ समय तक चन्द्रसेन जाधव के अधीन भी कार्य किया।
➣ यद्यपि चन्द्रसेन जाधव को छत्रपति शाहू का सेनापति बनाया गया था, किन्तु शीघ्र ही उसका झुकाव ताराबाई की ओर हो गया। परिणामस्वरूप शाहू और चन्द्रसेन के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए तथा अंततः शाहू ने उसे सेनापति के पद से हटा दिया।
सेनाकर्ते की नियुक्ति
➣ चन्द्रसेन जाधव के हटने के बाद शाहू ने बालाजी विश्वनाथ की योग्यता से प्रभावित होकर उन्हें 1708 ई. में सेनाकर्ते (सेना के व्यवस्थापक) की उपाधि प्रदान की। उन्हें नई सेना के संगठन, सैनिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने तथा राज्य में शान्ति एवं सुव्यवस्था स्थापित करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया।
➣ सेनाकर्ते के रूप में बालाजी विश्वनाथ ने मराठा सरदारों के बीच व्याप्त मतभेदों को कम करने, प्रशासन को संगठित करने तथा शाहू की स्थिति को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यही उनकी बढ़ती प्रतिष्ठा का आधार बना।
कान्होजी आंग्रे एवं बहिरोपंत पिंगले का प्रकरण
➣ इसी समय मराठा साम्राज्य में आन्तरिक संघर्ष जारी था। ताराबाई के समर्थक शक्तिशाली नौसैनिक सरदार कान्होजी आंग्रे ने शाहू के तत्कालीन पेशवा बहिरोपंत पिंगले को बंदी बना लिया। इससे शाहू की स्थिति और अधिक कठिन हो गई।
➣ शाहू ने इस संकट के समाधान का दायित्व बालाजी विश्वनाथ को सौंपा। बालाजी ने युद्ध का मार्ग अपनाने के बजाय अपनी उत्कृष्ट कूटनीति का परिचय दिया और कान्होजी आंग्रे से समझौता करने में सफलता प्राप्त की। इससे मराठा राज्य में बालाजी विश्वनाथ की प्रतिष्ठा अत्यधिक बढ़ गई।
पेशवा पद पर नियुक्ति (1713 ई.)
➣ बालाजी विश्वनाथ की प्रशासनिक क्षमता, संगठन कौशल तथा सफल कूटनीति से प्रभावित होकर 17 नवम्बर 1713 ई. को छत्रपति शाहू ने उन्हें मराठा साम्राज्य का पेशवा नियुक्त किया। इस नियुक्ति के साथ ही मराठा प्रशासन में पेशवा पद का महत्व तेजी से बढ़ने लगा।
➣ बालाजी विश्वनाथ के पेशवा बनने के बाद मराठा साम्राज्य को एक सक्षम एवं दूरदर्शी नेतृत्व प्राप्त हुआ। उन्होंने आन्तरिक विद्रोहों को नियंत्रित किया, विभिन्न मराठा सरदारों को शाहू के नेतृत्व में संगठित किया तथा भविष्य में मराठा शक्ति के विस्तार की मजबूत आधारशिला रखी।
बालाजी विश्वनाथ की प्रमुख उपलब्धियाँ
➣ बालाजी विश्वनाथ की सबसे बड़ी उपलब्धि मराठा राज्य संघ का संगठन माना जाता है। उन्होंने विभिन्न शक्तिशाली मराठा सरदारों को छत्रपति शाहू के नेतृत्व में संगठित किया तथा उन्हें साम्राज्य के विस्तार में सहभागी बनाया।
➣ बालाजी विश्वनाथ ने अपनी कूटनीतिक क्षमता के बल पर अनेक प्रभावशाली मराठा सरदारों को शाहू के पक्ष में कर लिया था। इससे गृहयुद्ध की स्थिति काफी हद तक समाप्त हुई और शाहू की स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक मजबूत हो गई।
➣ उन्होंने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित करते हुए मराठा सरदारों में सामूहिक नेतृत्व की भावना विकसित की। यही नीति आगे चलकर बाजीराव प्रथम के समय मराठा साम्राज्य के तीव्र विस्तार का आधार बनी।
➣ मराठा राज्य संघ के अंतर्गत प्रमुख मराठा सरदारों को विभिन्न क्षेत्रों की जिम्मेदारी सौंपी गई, जबकि वे छत्रपति एवं पेशवा की सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार करते रहे। आगे चलकर यही व्यवस्था मराठा साम्राज्य के तीव्र विस्तार का आधार बनी।
➣ जिस प्रकार छत्रपति शिवाजी ने मराठा राज्य की स्थापना की थी, उसी प्रकार बालाजी विश्वनाथ ने उसे पुनः संगठित कर एक सशक्त राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया।
इसलिए अनेक इतिहासकार बालाजी विश्वनाथ को मराठा साम्राज्य का द्वितीय संस्थापक भी कहते हैं।
कान्होजी आंग्रे से संधि (1714 ई.)
➣ कान्होजी आंग्रे मराठा साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली नौसैनिक सरदार थे। प्रारम्भ में वे ताराबाई के समर्थक थे, जिसके कारण शाहू के लिए वे एक बड़ी चुनौती बने हुए थे।
➣ 1714 ई. में बालाजी विश्वनाथ ने युद्ध के स्थान पर कूटनीति का सहारा लेते हुए कान्होजी आंग्रे से समझौता किया। इस संधि के परिणामस्वरूप कान्होजी ने छत्रपति शाहू की सत्ता को स्वीकार कर लिया और मराठा साम्राज्य में राजनीतिक स्थिरता स्थापित हुई।
➣ इस समझौते के बाद शाहू ने कान्होजी आंग्रे को मराठा नौसेना का प्रमुख सरखेल नियुक्त किया। इस प्रकार मराठा नौसैनिक शक्ति भी शाहू के नियंत्रण में आ गई, जिससे पश्चिमी तट पर मराठों की स्थिति और अधिक सुदृढ़ हुई।
सैय्यद बंधुओं से समझौता (1719 ई.)
➣ औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) के बाद मुगल साम्राज्य में उत्तराधिकार संघर्ष तथा दरबारी षड्यंत्रों के कारण केन्द्रीय सत्ता निरन्तर कमजोर होती गई। इस समय मुगल दरबार में सैय्यद बंधुओं (सैय्यद अब्दुल्ला खाँ एवं सैय्यद हुसैन अली खाँ) का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया था।
➣ दूसरी ओर छत्रपति शाहू मराठा साम्राज्य को वैधानिक मान्यता दिलाना चाहते थे। बालाजी विश्वनाथ ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए मुगल दरबार की आन्तरिक राजनीति में हस्तक्षेप किया और सैय्यद बंधुओं से मैत्री स्थापित की।
➣ उस समय मुगल सम्राट फर्रुखसियर और सैय्यद बंधुओं के बीच गंभीर मतभेद उत्पन्न हो चुके थे। दोनों पक्ष एक-दूसरे को सत्ता से हटाने का प्रयास कर रहे थे। ऐसी परिस्थिति में सैय्यद बंधुओं को मराठों के सैन्य सहयोग की आवश्यकता थी।
सर्वप्रथम बालाजी विश्वनाथ ने ही उत्तर भारत की राजनीति में हस्तक्षेप करने की नीति का सूत्रपात किया था। बाद में इसी नीति को बाजीराव प्रथम ने व्यापक रूप से अपनाया और मराठा साम्राज्य का विस्तार नर्मदा के उत्तर तक कर दिया।
1719 ई. की दिल्ली संधि
➣ 1719 ई. में बालाजी विश्वनाथ ने सैय्यद बंधुओं के साथ एक महत्वपूर्ण समझौता किया। इसके अनुसार मराठे सैय्यद बंधुओं को फर्रुखसियर को गद्दी से हटाने में सैन्य सहायता देंगे।
➣ इसके बदले में सैय्यद बंधुओं ने छत्रपति शाहू को मराठों का वैध शासक स्वीकार करने तथा मराठों के अनेक अधिकारों को मान्यता देने का आश्वासन दिया।
संधि की प्रमुख शर्तें➣ शाहू को शिवाजी के स्वराज्य पर अधिकार की आधिकारिक मान्यता प्रदान की गई।
➣ हैदराबाद, गोंडवाना, बरार, खानदेश तथा कर्नाटक में स्थित वे प्रदेश, जो पहले मराठा प्रभाव क्षेत्र का भाग रहे थे, उन पर मराठों के दावों को स्वीकार किया गया।
➣ मराठों को दक्कन के छह मुगल सूबों से चौथ तथा सरदेशमुखी वसूल करने का अधिकार प्रदान किया गया। यह मराठों की सबसे बड़ी राजनीतिक एवं आर्थिक उपलब्धियों में से एक थी।
➣ इसके बदले मराठों ने मुगल सम्राट की सहायता के लिए लगभग 15,000 सैनिकों की एक टुकड़ी उपलब्ध कराने का वचन दिया।
➣ इसके अतिरिक्त छत्रपति शाहू ने मुगल सम्राट को प्रतिवर्ष लगभग 10 लाख रुपये का कर (खिराज) देने की स्वीकृति दी।
➣ इतिहास में यह समझौता दिल्ली की संधि (1719 ई.) के नाम से प्रसिद्ध है।
दिल्ली अभियान
➣ संधि के बाद बालाजी विश्वनाथ मराठा सेना के साथ दिल्ली पहुँचे और सैय्यद बंधुओं को सैन्य सहायता प्रदान की। मराठों की सहायता से फर्रुखसियर को सत्ता से हटाकर बंदी बना लिया गया तथा बाद में उसकी हत्या कर दी गई।
➣ फर्रुखसियर के पदच्युत होने के बाद रफ़ीउद्दराजात को मुगल सम्राट बनाया गया। नए सम्राट ने मराठों को दिए गए अधिकारों एवं संधि की शर्तों को औपचारिक स्वीकृति प्रदान की।
इतिहासकार रिचर्ड टेम्पल ने 1719 ई. की इस मराठा-मुगल संधि को मराठा साम्राज्य का मैग्नाकार्टा कहा है, क्योंकि इसी संधि के माध्यम से मराठों को पहली बार उनके राजनीतिक एवं वित्तीय अधिकारों की औपचारिक वैधानिक मान्यता प्राप्त हुई।
दिल्ली अभियान का महत्व
➣ दिल्ली अभियान के दौरान मराठा सेना का पहली बार संगठित रूप से मुगल राजधानी पहुंचना मराठा इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी, क्योंकि इससे मराठों का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप उत्तर भारत की राजनीति में प्रारम्भ हुआ।
➣ दिल्ली पहुँचकर मराठों ने मुगल साम्राज्य की वास्तविक कमजोरी को निकट से देखा। इससे उन्हें यह विश्वास हुआ कि भविष्य में उत्तर भारत में भी अपना प्रभाव स्थापित किया जा सकता है।
➣ अनेक इतिहासकारों के अनुसार यही वह घटना थी, जिसने मराठों के उत्तर भारतीय विस्तार की आधारशिला रखी।
➣ अनेक इतिहासकारों का मत है कि उत्तर भारत में मराठा विस्तार की नीति का वास्तविक आधार बालाजी विश्वनाथ ने ही तैयार किया था, जिसे आगे चलकर बाजीराव प्रथम ने सफलतापूर्वक मूर्त रूप दिया।
औरंगजेब के मकबरे की यात्रा
➣ 1719 ई. के दिल्ली अभियान से लौटते समय बालाजी विश्वनाथ ने खुल्दाबाद (महाराष्ट्र) स्थित औरंगजेब के मकबरे का भी दर्शन किया। परम्परागत विवरणों के अनुसार उन्होंने वहाँ पैदल पहुँचकर औरंगजेब की समाधि पर सम्मान व्यक्त किया।
➣ यह घटना विशेष रूप से उल्लेखनीय मानी जाती है, क्योंकि औरंगजेब वही मुगल सम्राट था जिसने लगभग पाँच दशकों तक मराठों के विरुद्ध युद्ध किए थे। इसके बावजूद बालाजी विश्वनाथ ने व्यक्तिगत वैमनस्य के स्थान पर राजनीतिक शिष्टाचार और व्यवहारिकता का परिचय दिया।
➣ अनेक इतिहासकार इस घटना को बालाजी विश्वनाथ की व्यावहारिक कूटनीति का उदाहरण मानते हैं। उनका उद्देश्य अतीत की शत्रुता को आगे न बढ़ाकर मराठों की राजनीतिक स्थिति को सुदृढ़ करना तथा मुगल दरबार के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना था।
➣ इस प्रसंग से स्पष्ट होता है कि बालाजी विश्वनाथ केवल एक कुशल प्रशासक और राजनीतिज्ञ ही नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने वाले दूरदर्शी कूटनीतिज्ञ भी थे। यही नीति आगे चलकर मराठों के उत्तर भारतीय विस्तार के लिए भी सहायक सिद्ध हुई।
औरंगजेब के मकबरे की यात्रा को इतिहासकार बालाजी विश्वनाथ की व्यावहारिक, संतुलित एवं दूरदर्शी कूटनीति का प्रतीक मानते हैं।
मृत्यु
➣ 1719 ई. की दिल्ली यात्रा तथा लगातार प्रशासनिक एवं सैन्य गतिविधियों के कारण बालाजी विश्वनाथ का स्वास्थ्य धीरे-धीरे कमजोर होने लगा। दिल्ली से लौटने के बाद भी वे मराठा साम्राज्य के प्रशासन को सुदृढ़ बनाने में निरन्तर लगे रहे।
➣ अंततः अस्वस्थता के कारण 2 अप्रैल 1720 ई. को सासवड़ (वर्तमान पुणे, महाराष्ट्र) में उनका निधन हो गया। उस समय उनकी आयु लगभग 60 वर्ष मानी जाती है।
➣ बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के समय तक मराठा साम्राज्य की राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति पहले की अपेक्षा काफी सुदृढ़ हो चुकी थी। उनके द्वारा रखी गई मजबूत नींव पर आगे चलकर बाजीराव प्रथम ने मराठा साम्राज्य का अभूतपूर्व विस्तार किया।
बाजीराव प्रथम (1720-1740 ई.)
➣ 2 अप्रैल 1720 ई. को बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र बाजीराव प्रथम को मराठा साम्राज्य का नया पेशवा नियुक्त किया गया। उस समय उसकी आयु लगभग 20 वर्ष थी।
➣ युवा अवस्था होने के करना अनेक मराठा सरदारों ने उसकी नियुक्ति का विरोध किया। किन्तु छत्रपति शाहू को बाजीराव की योग्यता, साहस तथा नेतृत्व क्षमता पर पूर्ण विश्वास था। अंतत: 17 अप्रैल 1720 ई. को बाजीराव को मराठा साम्राज्य का पेशवा नियुक्त कर दिया गया।
➣ बाजीराव प्रथम की नियुक्ति के साथ पेशवा पद व्यवहार में वंशानुगत होने लगा। यद्यपि इसे औपचारिक रूप से वंशानुगत घोषित नहीं किया गया था, फिर भी आगे चलकर यह पद मुख्यतः बालाजी विश्वनाथ के परिवार में ही बना रहा।
युवा बाजीराव एवं शाहू का विश्वास
➣ बाजीराव प्रथम अत्यन्त साहसी, महत्वाकांक्षी तथा दूरदर्शी सेनानायक था। उसने अपने पिता बालाजी विश्वनाथ के साथ रहते हुए प्रशासन, कूटनीति एवं युद्धकला का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया था।
➣ यद्यपि उसकी आयु कम थी, फिर भी उसकी असाधारण सैन्य प्रतिभा और तीव्र निर्णय क्षमता से प्रभावित होकर छत्रपति शाहू ने उसे मराठा साम्राज्य के नेतृत्व का दायित्व सौंपा। बाद की घटनाओं ने सिद्ध कर दिया कि शाहू का यह निर्णय अत्यन्त दूरदर्शी था।
उत्तर भारत में विस्तार की नीति
➣ बाजीराव प्रथम का विश्वास था कि मराठा साम्राज्य का भविष्य केवल दक्कन तक सीमित रहने में नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत में अपना प्रभाव स्थापित करने में है। इसलिए उसने मराठा शक्ति के उत्तर भारत में विस्तार की नीति अपनाई।
➣ इसी नीति के अंतर्गत उसके नाम से प्रसिद्ध नारा कृष्णा से अटक” प्रचलित हुआ, जिसका आशय था कि मराठा साम्राज्य का प्रभाव दक्षिण में कृष्णा नदी से लेकर उत्तर-पश्चिम में अटक (वर्तमान पाकिस्तान) तक स्थापित किया जाए।
➣ बाजीराव का मत था कि मुगल साम्राज्य अब अपनी शक्ति खो चुका है और यही समय है जब मराठा शक्ति सम्पूर्ण भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित कर सकती है।
➣ मुगल साम्राज्य की दुर्बल होती स्थिति का उल्लेख करते हुए बाजीराव प्रथम ने कहा था-हमें इस जर्जर वृक्ष के तने पर प्रहार करना चाहिए, शाखाएँ तो स्वयं ही गिर जाएँगी।”
➣ इस कथन का आशय यह था कि यदि मुगल साम्राज्य की केन्द्रीय सत्ता को पराजित कर दिया जाए, तो उसके अधीनस्थ प्रान्त स्वतः ही मराठों के प्रभाव में आ जाएँगे। यही नीति आगे चलकर मराठा साम्राज्य के तीव्र विस्तार का आधार बनी।
➣ बाजीराव की उत्तर भारत नीति का विरोध मराठा दरबार के प्रतिनिधि श्रीपतराव ने किया। उसका मत था कि मराठों को अपनी शक्ति केवल दक्षिण भारत तक सीमित रखनी चाहिए और उत्तर भारत के अभियानों में अपने संसाधन व्यय नहीं करने चाहिए।
➣ इसके विपरीत बाजीराव का विश्वास था कि मुगल साम्राज्य की कमजोरी का लाभ उठाकर मराठा शक्ति को सम्पूर्ण भारत में विस्तारित किया जा सकता है।
➣ बाजीराव के विचारों से प्रभावित होकर छत्रपति शाहू ने उससे कहा-
निश्चित रूप से तुम मराठा ध्वज को हिमालय के पार तक पहुँचाओगे। निःसन्देह तुम योग्य पिता के योग्य पुत्र हो।”
हिन्दू पद पादशाही
➣ बाजीराव प्रथम ने विभिन्न हिन्दू शासकों एवं सरदारों का समर्थन प्राप्त करने के उद्देश्य से हिन्दू पद पादशाही’ की नीति का प्रचार किया। इसका उद्देश्य सम्पूर्ण भारत में हिन्दू शक्तियों को संगठित कर विदेशी प्रभुत्व से मुक्त एक सशक्त राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना था।
➣ अनेक इतिहासकारों का मत है कि यह नीति धार्मिक की अपेक्षा अधिक राजनीतिक थी, क्योंकि इसके माध्यम से बाजीराव विभिन्न हिन्दू राज्यों का सहयोग प्राप्त कर मराठा साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था।
➣ आगे चलकर उसके पुत्र बालाजी बाजीराव (नाना साहेब) के समय इस नीति का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो गया और मराठा विस्तार में राजनीतिक एवं आर्थिक हितों को अधिक महत्व दिया जाने लगा।
निजाम से प्रथम संघर्ष एवं पालखेड़ा का युद्ध (1724-1728 ई.)
➣ औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) के बाद मुगल साम्राज्य की केन्द्रीय सत्ता लगातार कमजोर होती चली गई। इसका लाभ उठाकर दक्कन के शक्तिशाली मुगल सूबेदार निजामुल-मुल्क (आसफजाह प्रथम) ने अपनी स्वतंत्र शक्ति स्थापित करने का प्रयास आरम्भ कर दिया।
➣ 23 जून, 1724 ई. को शकरखेड़ा (साखरखेड़ा) के युद्ध में निजामुल-मुल्क ने मुगल सम्राट के समर्थक दक्कन के सूबेदार मुबारिज खाँ को पराजित कर दिया। इस विजय के बाद उसने दक्कन में लगभग स्वतंत्र शासन स्थापित किया और आगे चलकर हैदराबाद राज्य (आसफजाही वंश) की नींव रखी।
➣ इस संघर्ष के दौरान मराठों ने परिस्थितियों के अनुसार निजामुल-मुल्क का समर्थन किया था, क्योंकि वे चाहते थे कि दक्कन में मुगल शक्ति कमजोर हो।
➣ किन्तु स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने के बाद निजाम ने अपनी नीति बदल दी। उसने मराठों के बढ़ते प्रभाव को अपने राज्य के लिए चुनौती माना और उनके अधिकारों का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया।
➣ विशेष रूप से उसने दक्कन से चौथ एवं सरदेशमुखी वसूल करने के मराठों के अधिकार को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। साथ ही वह छत्रपति शाहू के स्थान पर कोल्हापुर के शम्भाजी द्वितीय का समर्थन करने लगा। उसका उद्देश्य मराठों में गृहकलह बनाए रखना तथा शाहू की शक्ति को कमजोर करना था।
➣ दूसरी ओर बाजीराव प्रथम मराठा साम्राज्य की एकता बनाए रखना तथा चौथ एवं सरदेशमुखी के अधिकारों की रक्षा करना चाहता था। इन परिस्थितियों में दोनों पक्षों के बीच युद्ध अनिवार्य हो गया।
पालखेड़ा का युद्ध (1728 ई.)
➣ 7 मार्च 1728 ई. को पालखेड़ा (वर्तमान महाराष्ट्र) के निकट बाजीराव प्रथम और निजामुल-मुल्क के बीच निर्णायक युद्ध हुआ।
➣ इस युद्ध में बाजीराव ने अपनी प्रसिद्ध द्रुतगामी घुड़सवार सेना तथा गुरिल्ला युद्धनीति का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। उसने सीधे मोर्चे पर लड़ने के बजाय निजाम की सेना की रसद एवं जल आपूर्ति के मार्गों को घेर लिया, जिससे उसकी सेना धीरे-धीरे संकट में फँस गई।
➣ बाजीराव की तीव्र गति, कुशल घेराबंदी तथा रणनीतिक युद्धकौशल के सामने निजाम की विशाल सेना असहाय हो गई और अंततः उसे संधि के लिए विवश होना पड़ा।
प्रसिद्ध सैन्य इतिहासकार सर रिचर्ड टेम्पल तथा आधुनिक इतिहासकारों ने पालखेड़ा के युद्ध को बाजीराव प्रथम की महानतम सैन्य उपलब्धियों में से एक माना है। आधुनिक सैन्य इतिहास में इसे गतिशील युद्धनीति का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
मुंगी-शेवगाँव की संधि (1728 ई.)
➣ पालखेड़ा में पराजय के बाद 6 मार्च 1728 ई. (कुछ स्रोतों में 7 मार्च 1728 ई.) को मुंगी-शेवगाँव में बाजीराव प्रथम और निजामुल-मुल्क के बीच संधि हुई।
➣ इस संधि के अनुसार निजाम ने छत्रपति शाहू को मराठों का वैध एवं एकमात्र शासक स्वीकार किया।
➣ उसने मराठों को दक्कन से चौथ एवं सरदेशमुखी वसूल करने के अधिकार को भी स्वीकार कर लिया।
➣ इसके अतिरिक्त निजाम ने मराठा साम्राज्य के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने तथा शम्भाजी द्वितीय को दिया जा रहा समर्थन समाप्त करने का आश्वासन दिया।
➣ यद्यपि व्यवहार में शम्भाजी द्वितीय का प्रश्न पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, फिर भी इस संधि से छत्रपति शाहू की राजनीतिक स्थिति पहले की अपेक्षा कहीं अधिक मजबूत हो गई।
पालखेड़ा युद्ध का महत्व
➣ पालखेड़ा की विजय ने दक्कन में मराठों की सर्वोच्चता स्थापित कर दी तथा बाजीराव प्रथम की सैन्य प्रतिभा को सम्पूर्ण भारत में प्रसिद्ध कर दिया।
➣ इस युद्ध के बाद निजाम को यह स्वीकार करना पड़ा कि दक्कन की राजनीति में मराठों की उपेक्षा करना संभव नहीं है।
➣ यह बाजीराव प्रथम की पहली महान विजय थी, जिसने मराठा साम्राज्य के उत्तर भारतीय विस्तार का मार्ग और अधिक प्रशस्त किया।
अमझेरा का युद्ध (1728 ई.)
➣ पालखेड़ा के युद्ध (1728 ई.) में निजाम को पराजित करने के बाद बाजीराव प्रथम ने अपना ध्यान मालवा की ओर केन्द्रित किया। उस समय मालवा मुगल साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण प्रान्त था तथा उत्तर भारत में मराठा विस्तार के लिए इसका विशेष सामरिक महत्व था।
➣ दिसम्बर 1728 ई. में धार के निकट अमझेरा नामक स्थान पर मराठों और मुगल सेना के बीच युद्ध हुआ। इस अभियान का नेतृत्व बाजीराव प्रथम के छोटे भाई चिमाजी अप्पा ने किया।
➣ इस युद्ध में चिमाजी अप्पा ने मालवा के मुगल सूबेदार गिरधर बहादुर तथा उसके भाई दयाबहादुर को पराजित कर मार डाला। इसके परिणामस्वरूप मालवा में मुगल सत्ता को गहरा आघात पहुँचा और मराठों का प्रभाव तेजी से बढ़ने लगा।
➣ अमझेरा की विजय के बाद बाजीराव प्रथम ने मालवा में मराठा प्रशासन को संगठित करना प्रारम्भ किया। उन्होंने स्थानीय अधिकारियों एवं मराठा सरदारों की सहायता से वहाँ अपना प्रभाव सुदृढ़ किया।
➣ आगे चलकर मुगल सम्राट को भी मालवा में मराठों की बढ़ती शक्ति को स्वीकार करना पड़ा। यही क्षेत्र बाद में मराठों के उत्तर भारतीय अभियानों का प्रमुख आधार बना।
उत्तर भारत में मराठों ने सर्वप्रथम मालवा में ही अपना स्थायी राजनीतिक प्रभाव स्थापित किया। यही कारण था कि आगे चलकर दिल्ली तथा राजस्थान की ओर होने वाले अधिकांश मराठा अभियान मालवा से संचालित किए गए।
गुजरात अभियान (1732 ई.)
➣ मालवा में सफलता प्राप्त करने के बाद बाजीराव प्रथम ने अपना ध्यान गुजरात की ओर लगाया। उस समय गुजरात आर्थिक दृष्टि से मुगल साम्राज्य का अत्यन्त समृद्ध प्रान्त था।
➣ 1732 ई. में मराठा सेना ने गुजरात में प्रवेश किया। उस समय वहाँ का मुगल गवर्नर जोधपुर का महाराजा अभयसिंह था। मराठों की बढ़ती शक्ति के सामने उसने निर्णायक युद्ध करने के स्थान पर पीछे हटना ही उचित समझा और जोधपुर लौट गया।
➣ इसके बाद गुजरात के अधिकांश भाग में मराठों का प्रभाव स्थापित हो गया तथा वहाँ से चौथ एवं अन्य राजस्व प्राप्त होने लगा। इससे मराठा साम्राज्य की आर्थिक स्थिति और अधिक सुदृढ़ हुई।
बुन्देलखण्ड में हस्तक्षेप (1729 ई.)
➣ मालवा विजय के बाद बाजीराव प्रथम का प्रभाव उत्तर भारत में निरन्तर बढ़ने लगा। इसी समय बुन्देलखण्ड के प्रसिद्ध बुन्देला शासक महाराजा छत्रसाल पर मुगल सेनापति मुहम्मद खाँ बंगश ने आक्रमण कर दिया।
➣ वृद्धावस्था में पहुँच चुके छत्रसाल बंगश का सामना करने में असमर्थ थे। उन्होंने बाजीराव प्रथम से सहायता की प्रार्थना की। प्रसिद्ध परम्परा के अनुसार उन्होंने एक संदेश भेजकर अपनी स्थिति की तुलना महाभारत के गजेन्द्र से करते हुए बाजीराव से रक्षा की गुहार लगाई।
➣ 1729 ई. में बाजीराव प्रथम अपनी सेना के साथ बुन्देलखण्ड पहुँचे और मुहम्मद खाँ बंगश को घेर लिया। अपनी तीव्र गति तथा प्रभावी युद्धनीति के कारण उन्होंने बंगश को निर्णायक रूप से पराजित कर बुन्देलखण्ड से पीछे हटने के लिए विवश कर दिया।
➣ इस विजय के साथ ही महाराजा छत्रसाल पुनः स्वतंत्र हो गए और बुन्देलखण्ड के साथ उत्तर भारत में मराठों की प्रतिष्ठा को अत्यधिक बढ़ा दिया। इस अभियान के बाद अनेक स्थानीय हिन्दू शासकों का विश्वास मराठों के प्रति और अधिक मजबूत हुआ।
➣ अपनी सहायता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए महाराजा छत्रसाल ने बाजीराव प्रथम को अपने राज्य का लगभग एक-तिहाई भाग प्रदान किया। इस क्षेत्र में कालपी, झाँसी, सागर तथा बाँदा जैसे महत्वपूर्ण प्रदेश सम्मिलित थे।
➣ इस विजय से मराठों को पर्याप्त आर्थिक संसाधन तथा उत्तर भारत में आगे के अभियानों के लिए एक सुदृढ़ आधार प्राप्त हुआ। इसलिए इतिहासकार बुन्देलखण्ड अभियान को बाजीराव प्रथम की सबसे महत्वपूर्ण विजयों में से एक मानते हैं।
मस्तानी
➣ परम्परागत विवरणों के अनुसार महाराजा छत्रसाल ने अपनी पुत्री (या उपपत्नी से उत्पन्न पुत्री) मस्तानी का विवाह बाजीराव प्रथम से कराया। इसी कारण मस्तानी का नाम बाजीराव प्रथम के जीवन से स्थायी रूप से जुड़ गया।
➣ मस्तानी अपनी सुंदरता, घुड़सवारी, युद्धकौशल तथा संगीत-कला के लिए प्रसिद्ध थीं। किन्तु उनके साथ बाजीराव के संबंधों का मराठा दरबार तथा उनके परिवार के कुछ सदस्यों ने विरोध किया, जिसके कारण यह विषय तत्कालीन मराठा राजनीति में भी चर्चा का कारण बना।
मस्तानी के साथ बाजीराव प्रथम के संबंध भारतीय इतिहास की सर्वाधिक चर्चित घटनाओं में गिने जाते हैं। इस प्रसंग का उल्लेख अनेक ऐतिहासिक ग्रंथों, लोककथाओं तथा साहित्यिक कृतियों में मिलता है।
डभोई का युद्ध (1731 ई.)
➣ बाजीराव प्रथम के समय मराठा साम्राज्य के कुछ परम्परागत सरदार पेशवा की बढ़ती शक्ति से असन्तुष्ट थे। इनमें मराठा सेनापति त्र्यंबकराव दाभाड़े सबसे प्रमुख था।
➣ दाभाड़े परिवार का गुजरात में चौथ एवं राजस्व वसूली पर विशेष अधिकार था। बाजीराव द्वारा केन्द्रीय सत्ता को मजबूत करने की नीति के कारण दोनों पक्षों के बीच मतभेद बढ़ने लगे।
➣ 1 अप्रैल 1731 ई. को डभोई (गुजरात) के निकट बाजीराव प्रथम और त्र्यंबकराव दाभाड़े के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में त्र्यंबकराव मारा गया तथा बाजीराव प्रथम को निर्णायक विजय प्राप्त हुई।
➣ डभोई की विजय के बाद मराठा साम्राज्य में पेशवा की केन्द्रीय सत्ता और अधिक सुदृढ़ हो गई तथा शक्तिशाली सामन्तों का प्रभाव काफी हद तक कम हो गया।
वार्ना की संधि (1731 ई.)
➣ डभोई के युद्ध के कुछ समय बाद वार्ना की संधि (1731 ई.) के माध्यम से छत्रपति शाहू और शम्भाजी द्वितीय के बीच लंबे समय से चला आ रहा संघर्ष समाप्त हुआ।
➣ इस संधि के अनुसार वार्ना नदी को दोनों राज्यों की सीमा स्वीकार किया गया तथा कोल्हापुर शाखा के शासक शम्भाजी द्वितीय ने शाहू की सर्वोच्चता को स्वीकार कर लिया। इससे मराठा साम्राज्य में राजनीतिक स्थिरता स्थापित हुई।
➣ डभोई के युद्ध से मराठा साम्राज्य में पेशवा की सर्वोच्चता सुदृढ़ हुई, जबकि वार्ना की संधि ने मराठों के आन्तरिक संघर्ष को काफी हद तक समाप्त कर दिया।
जंजीरा के सिद्दियों के विरुद्ध अभियान (1733 ई.)
➣ सिद्दी मूलतः अफ्रीकी (अबीसीनियाई/हब्शी) मूल के सैनिक एवं अधिकारी थे। प्रारम्भ में वे अहमदनगर के निजामशाही तथा बाद में बीजापुर के आदिलशाही राज्य की सेवा में रहे।
➣ 1670 ई. के बाद वे मुगलों के सहयोगी बन गए और पश्चिमी समुद्री तट पर स्थित जंजीरा को अपना प्रमुख केन्द्र बनाकर समुद्री व्यापार एवं तटीय क्षेत्रों पर प्रभाव स्थापित करने लगे।
➣ समय-समय पर वे मराठा क्षेत्रों पर आक्रमण भी करते थे, जिससे वे मराठों के लिए एक बड़ी चुनौती बने हुए थे। 1733 ई. में बाजीराव प्रथम ने सिद्दियों के विरुद्ध एक व्यापक अभियान प्रारम्भ किया।
➣ इस अभियान का उद्देश्य कोंकण तट पर मराठा प्रभुत्व स्थापित करना तथा सिद्दियों की शक्ति को सीमित करना था। इस अभियान में मराठों ने सिद्दियों के अधिकांश स्थलीय क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।
➣ यद्यपि जंजीरा का दुर्ग उनके नियंत्रण में नहीं आ सका, फिर भी सिद्दियों की राजनीतिक एवं सैन्य शक्ति को गंभीर आघात पहुँचा तथा पश्चिमी तट पर मराठों का प्रभाव पहले की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ हो गया।
1731 ई. का डभोई का युद्ध और वार्ना की संधि मराठा साम्राज्य की आन्तरिक एकता को सुदृढ़ करने वाली घटनाएँ थीं, जबकि 1733 ई. का जंजीरा अभियान पश्चिमी तट पर मराठा प्रभुत्व स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।
दिल्ली अभियान (1737 ई.)
➣ मालवा एवं बुन्देलखण्ड में सफलता प्राप्त करने के बाद बाजीराव प्रथम ने मुगल साम्राज्य की केन्द्रीय सत्ता को चुनौती देने का निश्चय किया। उसका उद्देश्य यह सिद्ध करना था कि अब उत्तर भारत में भी मराठा शक्ति को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
➣ 29 मार्च 1737 ई. को बाजीराव प्रथम ने अपनी चुनी हुई घुड़सवार सेना के साथ अत्यन्त तीव्र गति से दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। उसकी सेना ने इतनी तेज़ी से यात्रा की कि मुगल सेना उसके मार्ग और गति का सही अनुमान ही नहीं लगा सकी।
➣ बाजीराव प्रथम दिल्ली के निकट पहुँच गया और मुगल सेना को पराजित करते हुए राजधानी के बाहरी क्षेत्रों तक अपना प्रभाव स्थापित कर दिया। इस आकस्मिक अभियान से मुगल सम्राट मुहम्मदशाह तथा मुगल दरबार में भारी घबराहट फैल गई।
➣ समकालीन विवरणों के अनुसार बाजीराव की सेना ने अत्यन्त कम समय में लंबी दूरी तय कर मुगल प्रशासन को पूरी तरह आश्चर्यचकित कर दिया। यही उसकी द्रुतगामी युद्धनीति की सबसे बड़ी सफलता मानी जाती है।
➣ दिल्ली पर तीव्र गति से किया गया यह अभियान इस बात का प्रतीक था कि मराठा शक्ति अब केवल दक्कन तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह मुगल साम्राज्य की राजधानी तक पहुँचने में भी सक्षम हो चुकी थी।
➣ दिल्ली पर तीव्र गति से अभियान चलाने वाला पहला मराठा पेशवा बाजीराव प्रथम था।
भोपाल का युद्ध (1737-1738 ई.)
➣ दिल्ली अभियान से चिंतित होकर मुगल सम्राट मुहम्मदशाह ने निजामुल-मुल्क को मराठों के विरुद्ध अभियान चलाने का आदेश दिया। इसके बाद दोनों पक्षों की सेनाएँ भोपाल के निकट आमने-सामने आ गईं।
➣ दिसम्बर 1737 ई. में बाजीराव प्रथम और निजामुल-मुल्क के बीच भोपाल का युद्ध हुआ। इस युद्ध में भी बाजीराव ने प्रत्यक्ष आक्रमण करने के बजाय अपनी प्रसिद्ध घेराबंदी एवं रसद काटने की नीति अपनाई।
➣ मराठा सेना ने निजाम की सेना को चारों ओर से घेर लिया तथा उसके भोजन, पानी और रसद के मार्गों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। परिणामस्वरूप निजाम की सेना कठिन संकट में फँस गई और उसे संधि के लिए विवश होना पड़ा।
➣ भोपाल की विजय के परिणामस्वरूप मराठों का मालवा पर अधिकार और अधिक मजबूत हुआ तथा उत्तर भारत में उनके विस्तार का मार्ग लगभग निर्विघ्न हो गया।
दुरई-सराय की संधि (1738 ई.)
➣ 7 जनवरी 1738 ई. (कुछ स्रोतों में 17 जनवरी 1738 ई.) को दुरई-सराय (दोराहा सराय) में बाजीराव प्रथम और निजामुल-मुल्क के बीच संधि हुई।
➣ इस संधि के अनुसार मुगल सम्राट की ओर से मालवा पर मराठों के अधिकार को स्वीकार कर लिया गया।
➣ इसके अतिरिक्त नर्मदा और चम्बल नदियों के मध्य स्थित प्रदेशों पर भी मराठों के अधिकार को मान्यता प्रदान की गई तथा मराठों की राजनीतिक स्थिति पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सुदृढ़ हो गई।
➣ इस संधि के बाद उत्तर भारत में मराठा प्रभाव तेजी से बढ़ा और मुगल साम्राज्य की कमजोरी सम्पूर्ण भारत के सामने स्पष्ट हो गई।
पुर्तगालियों से संघर्ष (1739 ई.)
➣ पश्चिमी तट पर पुर्तगालियों का प्रभाव लंबे समय से मराठों के लिए चुनौती बना हुआ था। उनकी धार्मिक कट्टरता, बलपूर्वक धर्म परिवर्तन, व्यापारिक एकाधिकार तथा स्थानीय जनता पर अत्याचारों के कारण मराठों और पुर्तगालियों के संबंध लगातार तनावपूर्ण बने रहे।
➣ पुर्तगाली भारतीय जहाजों से समुद्री व्यापार के लिए कार्ताज़ नामक परमिट लेने तथा अपने बंदरगाहों पर कर चुकाने की अनिवार्यता रखते थे। इससे पश्चिमी तट के व्यापारियों तथा मराठों में उनके प्रति असंतोष बढ़ता गया।
➣ 1739 ई. में बाजीराव प्रथम के निर्देशन में उनके भाई चिमाजी अप्पा ने पुर्तगालियों के विरुद्ध सफल अभियान चलाया। इस अभियान में मराठों ने सालसेट तथा बसीन (वसई) पर अधिकार कर लिया।
➣ बसीन की विजय (1739 ई.) मराठों की यूरोपीय शक्ति के विरुद्ध सबसे महत्वपूर्ण विजयों में से एक मानी जाती है। इससे पश्चिमी तट पर पुर्तगालियों का प्रभाव काफी कमजोर हो गया और मराठा साम्राज्य की प्रतिष्ठा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
अन्तिम समय एवं मृत्यु (1740 ई.)
➣ 1739 ई. में फारस के शासक नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण कर दिल्ली को लूट लिया। इस घटना ने मुगल साम्राज्य की दुर्बलता को पूरी तरह उजागर कर दिया।
➣ इन परिस्थितियों में बाजीराव प्रथम ने उत्तर भारत में मराठा प्रभाव को और अधिक सुदृढ़ करने तथा नई सैन्य कार्यवाही की योजना बनाई।
➣ उत्तर भारत की ओर अभियान की तैयारियों के दौरान बाजीराव प्रथम निरन्तर यात्रा एवं सैन्य गतिविधियों में व्यस्त रहे। अत्यधिक परिश्रम के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा।
➣ अभियान के दौरान वे नर्मदा नदी के तट पर स्थित रावेरखेड़ी (वर्तमान मध्य प्रदेश) पहुँचे, जहाँ उनकी अवस्था गंभीर हो गई।
➣ अभियान का पूर्ण रूप से आरम्भ होने से पूर्व ही 28 अप्रैल 1740 ई. को रावेरखेड़ी में उनका निधन हो गया। उस समय उनकी आयु लगभग 40 वर्ष थी।
इतिहासकारों के अनुसार बाजीराव प्रथम की मृत्यु मराठा साम्राज्य के लिए एक बड़ी क्षति थी। उनका मत है कि यदि उनकी असामयिक मृत्यु न हुई होती, तो उत्तर भारत में मराठा शक्ति का विस्तार और अधिक सुदृढ़ होता तथा भारतीय राजनीति में मराठों का प्रभुत्व अपेक्षाकृत पहले स्थापित हो सकता था।
सैन्य नीति एवं उपलब्धियाँ
➣ बाजीराव प्रथम मराठा इतिहास के सबसे महान सेनानायकों में गिने जाते हैं। लगभग 20 वर्षों के अपने कार्यकाल में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण सैन्य अभियान संचालित किए और परम्परागत मान्यता के अनुसार अपने जीवन में कोई भी प्रमुख युद्ध नहीं हारा।
➣ बाजीराव प्रथम को छत्रपति शिवाजी के बाद गुरिल्ला युद्ध प्रणाली का सबसे सफल प्रतिपादक माना जाता है। उसकी सेना तीव्र गति, अचानक आक्रमण तथा शत्रु की रसद व्यवस्था को नष्ट करने की रणनीति के लिए प्रसिद्ध थी। इसी कारण वह अपने अधिकांश अभियानों में विजयी रहा।
➣ उन्होंने अपने विश्वसनीय मराठा सरदारों, जैसे मल्हारराव होल्कर, राणोजी सिंधिया, पिलाजी गायकवाड़ तथा रघुजी भोंसले को विभिन्न क्षेत्रों की जिम्मेदारियाँ देकर मराठा प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाया। आगे चलकर इन्हीं परिवारों ने मराठा साम्राज्य की प्रमुख रियासतों के रूप में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया।
➣ बाजीराव प्रथम के नेतृत्व में मराठा साम्राज्य का अभूतपूर्व विस्तार हुआ। उसने मराठा शक्ति को दक्कन से निकालकर उत्तर एवं मध्य भारत तक पहुँचाया। इसी कारण उसे वृहद् महाराष्ट्र की अवधारणा को साकार करने का श्रेय दिया जाता है।
बाजीराव प्रथम (1720-1740 ई.) : Quick Revision
| विषय | तथ्य |
|---|---|
| कार्यकाल | 1720-1740 ई. |
| पिता | बालाजी विश्वनाथ |
| पेशवा नियुक्ति | 17 अप्रैल 1720 ई. (छत्रपति शाहू द्वारा) |
| पेशवा पद | व्यवहारतः वंशानुगत हुआ |
| मुख्य नीति | मराठा साम्राज्य का उत्तर भारत की ओर विस्तार |
| प्रसिद्ध कथन | हमें इस जर्जर वृक्ष के तने पर प्रहार करना चाहिए, शाखाएँ तो स्वयं ही गिर जाएँगी।” |
| प्रमुख आदर्श | हिन्दू पद पादशाही |
| प्रमुख युद्ध | पालखेड़ा (1728), अमझेरा (1728), भोपाल (1737) |
| प्रमुख विजय | मालवा, बुन्देलखण्ड, गुजरात एवं बसीन (चिमाजी अप्पा के नेतृत्व में) |
| प्रमुख संधियाँ | मुंगी-शेवगाँव (1728), वार्ना (1731), दुरई-सराय (1738) |
| दिल्ली अभियान | 1737 ई. |
| प्रमुख सहयोगी | चिमाजी अप्पा, मल्हारराव होल्कर, राणोजी सिंधिया, पिलाजी गायकवाड़, रघुजी भोंसले |
| प्रमुख विरोधी | निजामुल-मुल्क, मुहम्मद खाँ बंगश, मुगल साम्राज्य, पुर्तगाली |
| युद्धनीति | गुरिल्ला युद्ध, द्रुतगामी घुड़सवार सेना एवं रसद काटने की रणनीति |
| उपलब्धि | मराठा साम्राज्य को भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनाया |
| मृत्यु | 28 अप्रैल 1740 ई., रावेरखेड़ी (नर्मदा तट) |
| इतिहास में स्थान | शिवाजी के बाद मराठों का सर्वश्रेष्ठ सेनानायक एवं महान पेशवा |
बालाजी बाजीराव (1740-1761 ई.)
➣ 28 अप्रैल 1740 ई. को बाजीराव प्रथम की मृत्यु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र बालाजी बाजीराव को मराठा साम्राज्य का पेशवा नियुक्त किया गया। उस समय उसकी आयु लगभग 18 वर्ष थी। इतिहास में वह नाना साहेब के नाम से भी प्रसिद्ध है।
➣ छत्रपति शाहू ने उसकी योग्यता तथा पेशवा परिवार की सेवाओं को ध्यान में रखते हुए 25 जून 1740 ई. को बालाजी बाजीराव को मराठा साम्राज्य का नया पेशवा नियुक्त किया। इसके साथ ही बालाजी विश्वनाथ के परिवार का पेशवा पद पर प्रभाव और अधिक सुदृढ़ हो गया।
➣ बालाजी बाजीराव एक कुशल प्रशासक, दूरदर्शी राजनीतिज्ञ तथा योग्य संगठनकर्ता था। उसने मराठा साम्राज्य के प्रशासन, वित्त एवं राजस्व व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ बनाया तथा साम्राज्य के विस्तार की नीति को आगे बढ़ाया।
➣ यद्यपि वह अपने पिता बाजीराव प्रथम की भाँति महान सेनानायक नहीं था, फिर भी उसने योग्य मराठा सरदारों के सहयोग से साम्राज्य का विस्तार जारी रखा। उसके शासनकाल में मराठा साम्राज्य अपनी भौगोलिक सीमा और राजनीतिक प्रभाव की दृष्टि से चरमोत्कर्ष पर पहुँचा।
➣ उसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि वह विभिन्न शक्तिशाली मराठा सरदारों के बीच दीर्घकाल तक एकता एवं पारस्परिक सहयोग बनाए रखने में पूर्णतः सफल नहीं हो सका। यही कमजोरी आगे चलकर मराठा साम्राज्य के लिए गंभीर समस्या सिद्ध हुई।
हिन्दू पद पादशाही का त्याग
➣ बाजीराव प्रथम ने मराठा विस्तार के लिए ‘हिन्दू पद पादशाही’ की नीति को एक राजनीतिक आदर्श के रूप में अपनाया था। इसका उद्देश्य विभिन्न हिन्दू शासकों एवं सरदारों को मराठा नेतृत्व के अंतर्गत संगठित करना था।
➣ किन्तु बालाजी बाजीराव ने इस नीति को पूर्ववत् महत्व नहीं दिया। उसने धार्मिक आदर्शों की अपेक्षा साम्राज्य के राजनीतिक, प्रशासनिक एवं आर्थिक हितों को अधिक प्राथमिकता दी। परिणामस्वरूप मराठा नीति अधिक व्यावहारिक तथा साम्राज्यवादी स्वरूप ग्रहण करने लगी।
प्रारम्भिक चुनौतियाँ
➣ बालाजी बाजीराव के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पिता द्वारा स्थापित विशाल मराठा साम्राज्य को संगठित बनाए रखना था। इसके साथ ही उसे मराठा सरदारों के पारस्परिक मतभेदों, निजाम, बंगाल, उत्तर भारत तथा मुगल राजनीति से जुड़े जटिल प्रश्नों का भी सामना करना पड़ा।
➣ इन चुनौतियों के बावजूद उसके शासन के प्रारम्भिक वर्षों में मराठा साम्राज्य की शक्ति निरन्तर बढ़ती रही और कुछ ही वर्षों में वह भारत की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति बन गया।
बालाजी बाजीराव (नाना साहेब) के शासनकाल में मराठा साम्राज्य अपनी शक्ति एवं क्षेत्रीय विस्तार के सर्वोच्च स्तर पर पहुँचा, किन्तु इसी काल के अन्त में 1761 ई. के पानीपत के तृतीय युद्ध ने मराठा शक्ति को गहरा आघात पहुँचाया।
मालवा पर अधिकार की वैधानिक मान्यता (1741 ई.)
➣ बाजीराव प्रथम ने अपने शासनकाल में अमझेरा के युद्ध (1728 ई.) सहित अनेक सफल अभियानों के माध्यम से मालवा पर मराठा प्रभुत्व स्थापित कर दिया था।
➣ यद्यपि उस समय मालवा पर मराठों का वास्तविक नियंत्रण था, किन्तु मुगल सम्राट ने उसे औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया था।
➣ 1741 ई. में बालाजी बाजीराव के शासनकाल में मुगल सम्राट ने मराठों के मालवा पर अधिकार को वैधानिक मान्यता प्रदान कर दी। इससे मराठों का अधिकार केवल वास्तविक ही नहीं, बल्कि वैधानिक रूप से भी स्थापित हो गया।
➣ मालवा पर वैधानिक अधिकार प्राप्त होना बालाजी बाजीराव की एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि थी। इससे उत्तर भारत में मराठा साम्राज्य की राजनीतिक प्रतिष्ठा और अधिक बढ़ी तथा मुगल दरबार ने भी मराठों की बढ़ती शक्ति को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया।
बंगाल की राजनीति में हस्तक्षेप
➣ मालवा पर अधिकार को वैधानिक मान्यता मिलने के बाद मराठों का ध्यान पूर्वी भारत की ओर केन्द्रित हुआ। उस समय बंगाल की राजनीतिक स्थिति अत्यन्त अस्थिर थी।
➣ मराठा साम्राज्य के भीतर भी बंगाल में प्रभाव स्थापित करने को लेकर पेशवा बालाजी बाजीराव तथा रघुजी भोंसले के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए। दोनों ही बंगाल से प्राप्त होने वाले राजस्व एवं चौथ पर अपना अधिकार स्थापित करना चाहते थे।
➣ 1743 ई. में बालाजी बाजीराव बंगाल की ओर बढ़ा और दोनों पक्षों के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई। अंततः समझौते के माध्यम से विवाद समाप्त हुआ तथा मराठा प्रभाव क्षेत्रों का निर्धारण किया गया।
अलीवर्दी ख़ाँ से समझौता
➣ रघुजी भोंसले के निरन्तर आक्रमणों से परेशान अलीवर्दी ख़ाँ ने अंततः मराठों के साथ समझौता करना ही उचित समझा।
➣ इस समझौते के अनुसार नवाब ने मराठों को प्रतिवर्ष निश्चित धनराशि देने तथा उड़ीसा पर मराठों के अधिकार को स्वीकार कर लिया। इसके परिणामस्वरूप बंगाल में मराठों का प्रभाव और अधिक सुदृढ़ हुआ।
➣ बंगाल एवं उड़ीसा से प्राप्त होने वाले राजस्व ने मराठा साम्राज्य की आर्थिक स्थिति को और अधिक मजबूत बनाया तथा पूर्वी भारत में उनके प्रभाव का विस्तार हुआ।
बालाजी बाजीराव के शासनकाल में मराठा साम्राज्य का प्रभाव पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में उड़ीसा तथा उत्तर में मालवा तक दृढ़ता से स्थापित हो चुका था। यही विस्तार आगे चलकर मराठा साम्राज्य के चरमोत्कर्ष का आधार बना।
शाहू की मृत्यु एवं उत्तराधिकार का प्रश्न
➣ 15 दिसम्बर 1749 ई. को छत्रपति शाहू का निधन हो गया। उनकी कोई संतान नहीं थी, इसलिए उनकी मृत्यु के साथ ही मराठा साम्राज्य में उत्तराधिकार का प्रश्न उत्पन्न हो गया।
➣ अपने जीवन के अंतिम दिनों में शाहू ने राजाराम द्वितीय को अपना उत्तराधिकारी स्वीकार किया। राजाराम द्वितीय को ताराबाई ने अपना पौत्र बताकर प्रस्तुत किया था।
➣ जनवरी 1750 ई. में राजाराम द्वितीय का मराठा साम्राज्य के छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक किया गया।
ताराबाई एवं राजाराम द्वितीय का विवाद
➣ राज्याभिषेक के कुछ समय बाद ही ताराबाई और राजाराम द्वितीय के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए। ताराबाई ने घोषणा की कि राजाराम द्वितीय उसका वास्तविक पौत्र नहीं है, बल्कि उसे राजनीतिक कारणों से प्रस्तुत किया गया था।
➣ इसके बाद ताराबाई ने पुनः मराठा राजनीति पर अपना प्रभाव स्थापित करने का प्रयास किया, जबकि दूसरी ओर पेशवा बालाजी बाजीराव ने प्रशासनिक व्यवस्था को अपने नियंत्रण में बनाए रखा।
➣ इस राजनीतिक संघर्ष के कारण मराठा दरबार में अस्थिरता उत्पन्न हो गई, किन्तु अंततः पेशवा की स्थिति अधिक सुदृढ़ होकर उभरी।
संगोला की संधि (1750 ई.)
➣ 1750 ई. में संगोला नामक स्थान पर राजाराम द्वितीय और पेशवा बालाजी बाजीराव के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ, जिसे इतिहास में संगोला की संधि के नाम से जाना जाता है।
➣ इस संधि के अंतर्गत मराठा शासन के अधिकांश प्रशासनिक एवं राजनीतिक अधिकार पेशवा को सौंप दिए गए। इसके बाद छत्रपति केवल नाममात्र का संवैधानिक शासक रह गया, जबकि शासन की वास्तविक बागडोर पेशवा के हाथों में आ गई।
➣ संगोला की संधि के बाद मराठा साम्राज्य में पेशवा पद सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो गया और छत्रपति की भूमिका औपचारिक रह गई।
➣ इस संधि के बाद ही मराठा राजनीति का वास्तविक केन्द्र सतारा के स्थान पर पुणे बन गया। आगे चलकर पुणे ही मराठा साम्राज्य की प्रशासनिक, राजनीतिक एवं कूटनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र बना।
संगोला की संधि (1750 ई.) के बाद मराठा साम्राज्य में वास्तविक सत्ता छत्रपति से निकलकर पेशवा के हाथों में आ गई। साथ ही मराठा राजनीति का वास्तविक केन्द्र सतारा के स्थान पर पुणे बन गया।
1752 ई. की मुगल-मराठा संधि
➣ संगोला की संधि (1750 ई.) के बाद मराठा साम्राज्य की शक्ति अपने चरम की ओर बढ़ने लगी। दूसरी ओर मुगल साम्राज्य निरन्तर आन्तरिक संघर्षों तथा बाहरी आक्रमणों के कारण कमजोर होता जा रहा था। ऐसी स्थिति में मुगल सम्राट ने मराठों की सहायता प्राप्त करने का निर्णय लिया।
➣ 1752 ई. में मुगल सम्राट अहमदशाह तथा पेशवा बालाजी बाजीराव के मध्य एक महत्वपूर्ण संधि सम्पन्न हुई। इस संधि के अनुसार मराठों ने मुगल साम्राज्य की बाहरी एवं आन्तरिक शत्रुओं से रक्षा करने का दायित्व स्वीकार किया।
➣ इसके बदले मुगल सम्राट ने मराठों को मालवा, पंजाब तथा उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में चौथ एवं अन्य राजस्व संबंधी अधिकारों को स्वीकार किया। साथ ही मराठों के प्रभाव को भी औपचारिक मान्यता मिली।
➣ इस संधि के परिणामस्वरूप मराठे प्रत्यक्ष रूप से दिल्ली की राजनीति में हस्तक्षेप करने लगे और मुगल सम्राट के प्रमुख संरक्षक के रूप में उभरे। इससे उत्तर भारत में उनका राजनीतिक प्रभाव अभूतपूर्व रूप से बढ़ गया।
भलकी की संधि (1752 ई.)
➣ पालखेड़ा (1728 ई.) तथा भोपाल (1737-38 ई.) की पराजयों के बाद भी हैदराबाद के निजाम ने मराठों के बढ़ते प्रभाव को स्वीकार नहीं किया। वह अवसर मिलने पर मराठा शक्ति को कमजोर करने तथा दक्कन में अपना प्रभुत्व पुनः स्थापित करने का प्रयास करता रहा।
➣ दूसरी ओर पेशवा बालाजी बाजीराव दक्कन में मराठों की सर्वोच्चता को स्थायी रूप से स्थापित करना चाहता था। इसी उद्देश्य से 1752 ई. में मराठों और निजाम के बीच पुनः संघर्ष हुआ, जिसमें मराठा सेना ने निजाम को पराजित कर दिया।
➣ युद्ध में पराजित होने के बाद निजाम संधि करने के लिए विवश हो गया। परिणामस्वरूप दोनों पक्षों के बीच भलकी की संधि (1752 ई.) सम्पन्न हुई।
➣ इस संधि के अंतर्गत निजाम ने बरार के कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर मराठों के अधिकार को स्वीकार किया तथा मराठों की राजनीतिक श्रेष्ठता को मान्यता दी। साथ ही उसने भविष्य में मराठा अधिकारों में अनावश्यक हस्तक्षेप न करने का आश्वासन भी दिया।
➣ भलकी की संधि के बाद दक्कन में मराठों की स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ हो गई और निजाम की राजनीतिक शक्ति को एक बार फिर गहरा आघात पहुँचा। इससे दक्षिण भारत में मराठा साम्राज्य का प्रभाव और अधिक बढ़ गया।
मराठा साम्राज्य का चरमोत्कर्ष
➣ 1752 ई. की दोनों महत्वपूर्ण संधियों के बाद मराठा साम्राज्य उत्तर तथा दक्षिण-दोनों दिशाओं में अपनी शक्ति के शिखर पर पहुँच गया। एक ओर मराठे दिल्ली की राजनीति के निर्णायक शक्ति बन गए, तो दूसरी ओर दक्कन में भी उनका प्रभुत्व निर्विवाद हो गया।
➣ इसी काल में मराठा साम्राज्य का प्रभाव गुजरात, मालवा, बुन्देलखण्ड, उड़ीसा तथा दक्कन के विशाल क्षेत्रों तक फैल गया। इस कारण बालाजी बाजीराव का शासनकाल मराठा साम्राज्य के चरमोत्कर्ष का काल माना जाता है।
1752 ई. की मुगल-मराठा संधि ने मराठों को उत्तर भारत की राजनीति का संरक्षक बना दिया, जबकि भलकी की संधि ने दक्कन में उनकी सर्वोच्चता को और अधिक मजबूत किया।
उत्तर भारत की राजनीति में मराठों का हस्तक्षेप (1754-1758 ई.)
दिल्ली की राजनीति में मराठों का प्रभाव
➣ 1752 ई. की मुगल-मराठा संधि के बाद मराठे मुगल साम्राज्य के संरक्षक के रूप में उभरकर सामने आए। इसके परिणामस्वरूप उनका हस्तक्षेप दिल्ली की राजनीति में लगातार बढ़ता गया।
➣ 1754 ई. में पेशवा बालाजी बाजीराव ने अपने भाई रघुनाथ राव (राघोबा) को उत्तर भारत भेजा।
➣ रघुनाथ राव ने मुगल वज़ीर गाज़ीउद्दीन इमाद-उल-मुल्क का समर्थन किया और उसकी सहायता से मुगल सम्राट अहमदशाह को पदच्युत कर आलमगीर द्वितीय को दिल्ली के सिंहासन पर बैठाया।
➣ इस घटना के बाद दिल्ली दरबार में मराठों का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया और मुगल सम्राट भी काफी हद तक मराठों पर निर्भर हो गया।
अब्दाली के प्रभाव को समाप्त करने का प्रयास
➣ 1757 ई. में अहमदशाह अब्दाली के भारत से लौटने के बाद मराठों ने पुनः उत्तर भारत की ओर अभियान चलाया। इस अभियान का नेतृत्व भी रघुनाथ राव ने किया।
➣ मराठों ने दिल्ली पर पुनः अधिकार स्थापित किया तथा अब्दाली के समर्थक नजीबुद्दौला को मीर बख्शी के पद से हटाकर अहमदशाह बंगश को उस पद पर नियुक्त कराया। इससे दिल्ली में अब्दाली का प्रभाव अस्थायी रूप से समाप्त हो गया।
पंजाब अभियान (1758 ई.)
➣ 1758 ई. में मराठा सेना ने रघुनाथ राव के नेतृत्व में उत्तर-पश्चिम की ओर अभियान जारी रखा। इस अभियान में मराठों ने सरहिन्द तथा लाहौर पर अधिकार कर लिया।
➣ मराठों ने अहमदशाह अब्दाली द्वारा नियुक्त पंजाब के सूबेदार तैमूर शाह (तैमूर दुर्रानी) को पंजाब से बाहर निकाल दिया। इसके परिणामस्वरूप मराठा साम्राज्य का प्रभाव पहली बार सिंधु नदी के निकट तक पहुँच गया।
➣ पंजाब विजय मराठा साम्राज्य के उत्तर-पश्चिमी विस्तार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक मानी जाती है। इस समय मराठा शक्ति अपने सर्वोच्च विस्तार पर थी।
यद्दपि 1758 ई. में लाहौर एवं सरहिन्द पर मराठों का अधिकार उनके साम्राज्य के उत्तर-पश्चिमी विस्तार की चरम सीमा का प्रतीक था। किन्तु यही सफलता आगे चलकर अहमदशाह अब्दाली के साथ निर्णायक संघर्ष का कारण भी बनी।
पानीपत के तृतीय युद्ध की पृष्ठभूमि
➣ 1758 ई. में मराठों द्वारा लाहौर, सरहिन्द तथा पंजाब पर अधिकार कर लेने और तैमूर शाह को वहाँ से निकाल देने के बाद अहमदशाह अब्दाली ने इसे अपनी प्रतिष्ठा पर सीधा आघात माना।
➣ दूसरी ओर नजीबुद्दौला सहित उत्तर भारत के अनेक अफगान एवं रोहिला सरदार भी मराठों के बढ़ते प्रभाव से असन्तुष्ट थे। उन्होंने अब्दाली से पुनः भारत आकर मराठों का सामना करने का आग्रह किया।
➣ इन घटनाओं के परिणामस्वरूप अहमदशाह अब्दाली ने एक बार फिर भारत पर आक्रमण करने का निश्चय किया। यही घटनाएँ आगे चलकर पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई.) की प्रमुख पृष्ठभूमि बनीं।
दत्ताजी सिंधिया का बलिदान
➣ अब्दाली के आक्रमण का सामना करने के लिए मराठों ने दत्ताजी सिंधिया को उत्तर भारत भेजा। दत्ताजी ने दिल्ली तथा यमुना क्षेत्र में मराठा प्रभुत्व बनाए रखने का प्रयास किया, किन्तु अब्दाली की विशाल सेना के सामने उसकी स्थिति कठिन होती गई।
➣ 10 जनवरी 1760 ई. को लोनी (दिल्ली के निकट) के पास मराठों और अब्दाली की सेना के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में दत्ताजी सिंधिया वीरतापूर्वक लड़ते हुए मारे गए।
➣ दत्ताजी की मृत्यु के बाद दिल्ली तथा उत्तर भारत में मराठों की स्थिति कमजोर पड़ गई और अब्दाली ने पुनः दिल्ली पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया।
दत्ताजी सिंधिया की मृत्यु तथा पंजाब से तैमूर शाह के निष्कासन को पानीपत के तृतीय युद्ध की तत्कालीन पृष्ठभूमि की सबसे महत्वपूर्ण घटनाएँ माना जाता है।
➣ दत्ताजी सिंधिया की मृत्यु का समाचार मिलने पर पेशवा बालाजी बाजीराव ने उत्तर भारत में निर्णायक अभियान चलाने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने चचेरे भाई सदाशिवराव भाऊ को मराठा सेना का प्रधान सेनापति नियुक्त किया।
➣ इस अभियान में पेशवा के ज्येष्ठ पुत्र विश्वासराव, इब्राहीम ख़ाँ गर्दी, जनकोजी सिंधिया, मल्हारराव होल्कर, तुकोजीराव होल्कर सहित अनेक प्रमुख मराठा सरदार सम्मिलित हुए।
➣ मराठों का उद्देश्य पंजाब एवं दिल्ली पर अपने अधिकार को बनाए रखना था, जबकि अहमदशाह अब्दाली उत्तर भारत से मराठा प्रभाव समाप्त कर पुनः अफगान प्रभुत्व स्थापित करना चाहता था। दोनों पक्ष किसी भी प्रकार का समझौता करने को तैयार नहीं थे।
➣ मराठा सेना दक्षिण से उत्तर भारत की ओर बढ़ी और दिल्ली होते हुए पानीपत पहुँची। दूसरी ओर अहमदशाह अब्दाली ने भी अपनी सेना के साथ उत्तर भारत में मोर्चा संभाल लिया।
पानीपत का तृतीय युद्ध (14 जनवरी 1761 ई.)
➣ 14 जनवरी 1761 ई. को पानीपत के मैदान में मराठा सेना और अहमदशाह अब्दाली के नेतृत्व वाली अफगान सेना के बीच भारतीय इतिहास का एक अत्यन्त निर्णायक युद्ध लड़ा गया। मराठा सेना का नेतृत्व सदाशिवराव भाऊ कर रहे थे, जबकि अफगान सेना का नेतृत्व स्वयं अहमदशाह अब्दाली ने किया।
➣ उस समय दिल्ली के नाममात्र के मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय थे, किन्तु मुगल साम्राज्य इतना दुर्बल हो चुका था कि वह इस संघर्ष में कोई प्रभावी भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं था।
➣ इस युद्ध में मराठों को अपेक्षित रूप से उत्तर भारत की अन्य शक्तियों का व्यापक सहयोग प्राप्त नहीं हुआ। राजपूत, जाट तथा सिख इस युद्ध में मराठों के साथ सक्रिय रूप से सम्मिलित नहीं हुए।
➣ दूसरी ओर रूहेला सरदार नजीबुद्दौला, अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा अनेक अफगान सरदारों ने अहमदशाह अब्दाली का साथ दिया, जिससे उसकी सैन्य शक्ति और अधिक बढ़ गई।
➣ युद्ध के प्रारम्भिक चरण में इब्राहीम ख़ाँ गर्दी के नेतृत्व में मराठा तोपखाने एवं पैदल सेना ने अफगान सेना को भारी क्षति पहुँचाई। कुछ समय तक ऐसा प्रतीत हुआ कि विजय मराठों के पक्ष में जा सकती है।
➣ किन्तु युद्ध के मध्य में परिस्थितियाँ तेजी से बदल गईं। भीषण संघर्ष के दौरान विश्वासराव गंभीर रूप से घायल होकर वीरगति को प्राप्त हुए। उनके निधन से मराठा सेना का मनोबल बुरी तरह प्रभावित हुआ।
➣ विश्वासराव की मृत्यु का समाचार मिलते ही सदाशिवराव भाऊ स्वयं अग्रिम मोर्चे पर पहुँच गए और अत्यन्त साहस के साथ युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इसके बाद मराठा सेना का संगठन तेजी से बिखरने लगा।
➣ युद्ध के अंतिम चरण में अफगान सेना ने चारों ओर से मराठों को घेर लिया। लम्बे और भीषण संघर्ष के बाद मराठा सेना को निर्णायक पराजय का सामना करना पड़ा।
युद्ध में प्रमुख वीरों का बलिदान➣ इस युद्ध में विश्वासराव, सदाशिवराव भाऊ, इब्राहीम ख़ाँ गर्दी, जनकोजी सिंधिया तथा अनेक प्रमुख मराठा सरदार वीरगति को प्राप्त हुए। हजारों मराठा सैनिक भी युद्धभूमि में मारे गए।
➣ मल्हारराव होल्कर युद्ध के अंतिम चरण में अपनी शेष सेना के साथ युद्धभूमि से निकलने में सफल रहे, जबकि महादजी सिंधिया गंभीर रूप से घायल हुए, परन्तु जीवित बच गए। आगे चलकर उन्होंने पुनः उत्तर भारत में मराठा शक्ति के पुनर्गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
14 जनवरी 1761 ई. को लड़ा गया पानीपत का तृतीय युद्ध भारतीय इतिहास के सबसे भीषण युद्धों में से एक माना जाता है। इस युद्ध में मराठा सेना की पराजय के साथ ही उत्तर भारत में उनके तीव्र विस्तार पर अस्थायी विराम लग गया।
युद्ध में मराठों की पराजय के कारण
➣ पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठों की पराजय किसी एक कारण का परिणाम नहीं थी, बल्कि राजनीतिक, सामरिक, कूटनीतिक तथा प्रशासनिक कमियों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम थी।
पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठों की हार के प्रमुख कारण थे- सहयोगियों का अभाव, महाराजा सूरजमल की सलाह की उपेक्षा, रसद संकट, गुरिल्ला युद्धनीति का त्याग, नेतृत्व का विघटन तथा अहमदशाह अब्दाली की प्रभावी रणनीति।
1. उत्तर भारतीय शक्तियों का सहयोग न मिलना➣ मराठों को राजपूतों, जाटों तथा सिखों का अपेक्षित सहयोग प्राप्त नहीं हुआ। इसके विपरीत रूहेला सरदार नजीबुद्दौला तथा अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अहमदशाह अब्दाली का साथ दिया, जिससे अफगान पक्ष अधिक संगठित हो गया।
2. महाराजा सूरजमल की सलाह की उपेक्षा➣ भरतपुर के जाट शासक महाराजा सूरजमल ने मराठों को सलाह दी थी कि वे महिलाओं, बच्चों तथा भारी सामान को युद्धक्षेत्र में साथ न ले जाएँ और छापामार युद्धनीति अपनाएँ।
➣ किन्तु सदाशिवराव भाऊ ने यह सलाह स्वीकार नहीं की। परिणामस्वरूप मराठा सेना की गति धीमी हो गई तथा रसद और सैन्य संचालन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। बाद में सूरजमल ने भी मराठों से अपना सहयोग वापस ले लिया।
3. रसद एवं आपूर्ति की समस्या➣ युद्ध से पूर्व अब्दाली ने मराठों की रसद, खाद्यान्न एवं आपूर्ति के मार्गों को अवरुद्ध कर दिया। लंबे समय तक घिरे रहने के कारण मराठा सेना को भोजन, चारे तथा आवश्यक सामग्री का गंभीर अभाव झेलना पड़ा।
➣ इसके विपरीत अब्दाली को अपने सहयोगियों से निरन्तर रसद एवं सहायता मिलती रही, जिससे उसकी सेना की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत बनी रही।
4. युद्धनीति में परिवर्तन➣ बाजीराव प्रथम की सफलता का आधार तीव्र गति वाली घुड़सवार सेना एवं गुरिल्ला युद्धनीति थी। किन्तु पानीपत के युद्ध में सदाशिवराव भाऊ ने पारम्परिक आमने-सामने की निर्णायक लड़ाई का मार्ग अपनाया।
➣ इससे मराठों की सबसे बड़ी सामरिक शक्ति का पूरा लाभ नहीं मिल सका, जबकि अब्दाली की सेना इस प्रकार के युद्ध में अधिक अनुभवी थी।
5. नेतृत्व एवं समन्वय की कमी➣ मराठा सेना में अनेक प्रमुख सरदार उपस्थित थे, किन्तु उनके बीच पूर्ण समन्वय नहीं था। युद्ध के दौरान विश्वासराव और सदाशिवराव भाऊ की मृत्यु के बाद सेना का नेतृत्व बिखर गया और सैनिकों का मनोबल तेजी से गिर गया।
➣ इसके विपरीत अहमदशाह अब्दाली एक अनुभवी सेनानायक था। उसने युद्ध से पहले मराठों को रसद से काटने, सहयोगियों को अपने पक्ष में करने तथा उपयुक्त समय पर निर्णायक आक्रमण करने जैसी प्रभावी रणनीतियाँ अपनाईं, जिनसे उसे सफलता मिली।
➣ इस प्रकार पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठों की पराजय का मुख्य कारण केवल युद्धभूमि में हुई लड़ाई नहीं थी, बल्कि कूटनीतिक असफलता, रसद की कमी, सहयोगियों का अभाव, युद्धनीति में परिवर्तन तथा नेतृत्व संबंधी कठिनाइयाँ थीं। इन सभी कारणों ने मिलकर मराठा शक्ति को निर्णायक रूप से कमजोर कर दिया।
पानीपत के तृतीय युद्ध के परिणाम
➣ 14 जनवरी 1761 ई. को हुए पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठों की पराजय ने भारतीय राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। इस युद्ध ने यह निश्चित नहीं किया कि भारत पर कौन शासन करेगा, बल्कि यह निश्चित किया कि भारत पर कौन शासन नहीं करेगा।
➣ युद्ध में मराठा साम्राज्य को भारी जन-धन की हानि हुई। अनेक प्रमुख सेनानायक एवं हजारों सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए, जिससे मराठों की सैन्य शक्ति को गंभीर आघात पहुँचा।
➣ यद्यपि इस पराजय से मराठा साम्राज्य का तत्काल अंत नहीं हुआ, फिर भी उत्तर भारत में उसका तीव्र विस्तार कुछ समय के लिए रुक गया। बाद में महादजी सिंधिया तथा माधवराव प्रथम के नेतृत्व में मराठों ने पुनः अपनी शक्ति का पुनर्गठन किया।
➣ पानीपत के तृतीय युद्ध का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को मिला। मराठों की पराजय से उत्पन्न शक्ति-शून्यता का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने भारत में अपनी स्थिति मजबूत कर ली।
➣ इसके परिणामस्वरूप बंगाल तथा बाद में दक्षिण भारत में अंग्रेजी प्रभुत्व के विस्तार का मार्ग प्रशस्त हुआ।
➣ इसी अवधि में दक्षिण भारत में हैदर अली के नेतृत्व में मैसूर राज्य का प्रभाव बढ़ा, जबकि उत्तर भारत में मराठों का विस्तार कुछ समय के लिए रुक गया।
➣ इस प्रकार पानीपत के तृतीय युद्ध के बाद भारतीय राजनीति में शक्ति-संतुलन बदल गया और अंग्रेजों के उत्थान के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गईं।
➣ प्रसिद्ध इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार ने लिखा है कि महाराष्ट्र में सम्भवतः ही कोई ऐसा परिवार रहा होगा, जिसने इस युद्ध में अपना कोई सम्बन्धी न खोया हो।” यह कथन युद्ध की भीषणता को दर्शाता है।
➣ काशीराज पंडित, जो इस युद्ध के समकालीन विवरणों के प्रमुख स्रोतों में से एक माने जाते हैं, ने पानीपत के तृतीय युद्ध को मराठों के लिए अत्यन्त विनाशकारी बताया है।
➣ पानीपत के युद्ध में हुई पराजय का समाचार पेशवा बालाजी बाजीराव को एक व्यापारी द्वारा सांकेतिक (कूट) संदेश के रूप में भेजा गया। उस संदेश में कहा गया था-
दो मोती विलीन हो गए, बाईस सोने की मुहरें खो गईं और चाँदी तथा ताँबे के सिक्कों की तो गणना ही नहीं की जा सकती।”
➣ इस संदेश में दो मोती से आशय विश्वासराव और सदाशिवराव भाऊ से था, जबकि सोने की मुहरें प्रमुख मराठा सरदारों तथा चाँदी-ताँबे के सिक्के सामान्य सैनिकों का प्रतीक थे।
मृत्यु (1761 ई.)
➣ पानीपत की भीषण पराजय और अपने पुत्र विश्वासराव सहित अनेक प्रमुख सरदारों की मृत्यु का समाचार सुनकर बालाजी बाजीराव गहरे मानसिक आघात में आ गए। उनका स्वास्थ्य निरन्तर गिरता गया।
➣ 23 जून 1761 ई. को पर्वती (पुणे) में उनका निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही मराठा साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हुआ।
बालाजी बाजीराव (नाना साहेब) के शासनकाल में मराठा साम्राज्य ने अपनी शक्ति का सर्वोच्च शिखर भी देखा और पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई.) के रूप में सबसे बड़ी त्रासदी का भी सामना किया। इसलिए उनका शासनकाल मराठा इतिहास का चरमोत्कर्ष और निर्णायक मोड़ दोनों माना जाता है।
बालाजी बाजीराव (1740-1761 ई.) : Quick Revision
| विषय | तथ्य |
|---|---|
| अन्य नाम | नाना साहेब |
| कार्यकाल | 1740-1761 ई. |
| पिता | पेशवा बाजीराव प्रथम |
| पेशवा नियुक्ति | 1740 ई. (लगभग 18 वर्ष की आयु में) |
| मुख्य विशेषता | मराठा साम्राज्य का चरमोत्कर्ष एवं पानीपत की त्रासदी |
| प्रमुख नीति | उत्तर भारत में मराठा प्रभाव का विस्तार एवं मुगल राजनीति में हस्तक्षेप |
| शाहू की मृत्यु | 15 दिसम्बर 1749 ई. |
| संगोला की संधि | 1750 ई. – वास्तविक सत्ता पेशवा के हाथों में आई, राजनीति का केन्द्र सतारा से पुणे स्थानांतरित हुआ। |
| 1752 की मुगल-मराठा संधि | मराठे मुगल सम्राट के संरक्षक बने तथा दिल्ली की राजनीति में उनका प्रभाव बढ़ा। |
| भलकी की संधि | 1752 ई. – निजाम ने मराठों के अधिकारों को स्वीकार किया। |
| उत्तर भारत का विस्तार | दिल्ली, सरहिन्द, लाहौर एवं पंजाब तक मराठा प्रभाव स्थापित हुआ। |
| प्रमुख सेनापति | रघुनाथ राव, सदाशिवराव भाऊ, मल्हारराव होल्कर, दत्ताजी सिंधिया, जनकोजी सिंधिया, इब्राहीम ख़ाँ गर्दी |
| पानीपत का तृतीय युद्ध | 14 जनवरी 1761 ई. |
| मराठा सेना का नेतृत्व | सदाशिवराव भाऊ |
| अफगान सेना का नेतृत्व | अहमदशाह अब्दाली |
| प्रमुख सहयोगी (अब्दाली) | नजीबुद्दौला एवं शुजाउद्दौला |
| प्रमुख कारण (पराजय) | सहयोगियों का अभाव, रसद संकट, गुरिल्ला युद्धनीति का त्याग, नेतृत्व का विघटन |
| युद्ध का परिणाम | मराठों की पराजय, उत्तर भारत में विस्तार पर विराम तथा अंग्रेजों को अप्रत्यक्ष लाभ |
| मृत्यु | 23 जून 1761 ई., पर्वती (पुणे) |
| इतिहास में स्थान | मराठा साम्राज्य के चरमोत्कर्ष एवं पानीपत की त्रासदी का साक्षी पेशवा |
माधवराव प्रथम (1761-1772 ई.)
➣ माधवराव प्रथम, पेशवा बालाजी बाजीराव का द्वितीय पुत्र था। पिता की मृत्यु के बाद 1761 ई. में मात्र 17 वर्ष की आयु में उसे मराठा साम्राज्य का नया पेशवा नियुक्त किया गया।
➣ माधवराव की अल्पायु के कारण प्रारम्भिक वर्षों में उसके चाचा रघुनाथराव (राघोबा) ने संरक्षक एवं मार्गदर्शक के रूप में शासन-कार्य में उसकी सहायता की।
➣ माधवराव प्रथम दूरदर्शी, परिश्रमी तथा कुशल प्रशासक था। उसने अल्पायु में ही असाधारण नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया और पानीपत की पराजय से टूट चुके मराठा साम्राज्य को पुनः संगठित करने का कठिन कार्य अपने हाथ में लिया।
➣ उसके शासनकाल में मराठों ने न केवल दक्कन में अपनी शक्ति को पुनः स्थापित किया, बल्कि उत्तर भारत में भी अपना प्रभाव पुनः बढ़ाने में सफलता प्राप्त की। इसी कारण इतिहासकार उसे पेशवाओं में सबसे सफल पुनर्गठनकर्ता के रूप में भी स्मरण करते हैं।
माधवराव प्रथम का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उसने पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई.) के बाद बिखर चुकी मराठा शक्ति का सफलतापूर्वक पुनर्गठन किया और कुछ ही वर्षों में मराठा साम्राज्य की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित कर दिया।
रघुनाथराव से संघर्ष
➣ पेशवा बनने के बाद प्रारम्भ में माधवराव प्रथम और रघुनाथराव के बीच संबंध सामान्य रहे, किन्तु समय के साथ दोनों के बीच प्रशासन, सैन्य नीति तथा राज्य के नियंत्रण को लेकर मतभेद उत्पन्न होने लगे।
➣ रघुनाथराव स्वयं मराठा साम्राज्य की वास्तविक सत्ता अपने हाथों में रखना चाहता था, जबकि माधवराव प्रथम स्वतंत्र रूप से शासन करना चाहता था। परिणामस्वरूप दोनों के बीच राजनीतिक संघर्ष प्रारम्भ हो गया, जिससे मराठा साम्राज्य की आन्तरिक एकता प्रभावित हुई।
➣ मराठा साम्राज्य के इस आन्तरिक विवाद का लाभ उठाने का प्रयास उसके शत्रुओं, विशेषकर हैदराबाद के निजाम अली, ने किया।
➣ मराठों की इस आन्तरिक दुर्बलता को अवसर मानकर निजाम अली ने मराठा प्रदेशों पर आक्रमण कर दिया। उसका उद्देश्य पानीपत के युद्ध के बाद कमजोर पड़े मराठों की शक्ति को और अधिक क्षति पहुँचाना तथा दक्कन में अपना प्रभाव बढ़ाना था।
➣ इस संकट की घड़ी में माधवराव प्रथम और रघुनाथराव ने अपने मतभेदों को कुछ समय के लिए भुलाकर संयुक्त रूप से निजाम का सामना करने का निर्णय लिया।
राक्षसभुवन का युद्ध (1763 ई.)
➣ 10 अगस्त 1763 ई. को राक्षसभुवन (वर्तमान महाराष्ट्र) के निकट मराठों और निजाम की सेनाओं के बीच निर्णायक युद्ध हुआ। इस युद्ध में मराठा सेना का नेतृत्व माधवराव प्रथम ने किया।
➣ युद्ध में मराठों ने असाधारण वीरता का परिचय देते हुए निजाम की सेना को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। इस विजय ने पानीपत के तृतीय युद्ध के बाद मराठा साम्राज्य की पुनः उभरती हुई शक्ति का स्पष्ट संकेत दिया।
➣ इस विजय से माधवराव प्रथम की प्रतिष्ठा में अत्यधिक वृद्धि हुई तथा मराठा सरदारों का विश्वास भी उसके नेतृत्व में दृढ़ हुआ। आगे चलकर इसी सफलता के आधार पर उसने दक्षिण तथा उत्तर भारत में मराठा प्रभाव का पुनः विस्तार किया।
राक्षसभुवन की संधि
➣ पराजय के बाद निजाम अली मराठों से संधि करने के लिए विवश हो गया। राक्षसभुवन की संधि के अंतर्गत उसने मराठों के अधिकारों को पुनः स्वीकार किया तथा उनसे छीने गए अनेक प्रदेश वापस कर दिए।
➣ इस संधि के बाद मराठों और निजाम के संबंधों में कुछ समय के लिए स्थिरता आई तथा दक्कन में मराठा प्रभुत्व पुनः स्थापित हो गया।
राक्षसभुवन का युद्ध (1763 ई.) पानीपत के तृतीय युद्ध के बाद मराठों की पहली निर्णायक विजय थी। इसने दक्कन में मराठा शक्ति को पुनः स्थापित किया।
मैसूर अभियान एवं हैदर अली से संघर्ष
➣ पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई.) में मराठों की पराजय के बाद दक्षिण भारत में उनका प्रभाव कुछ समय के लिए कमजोर पड़ गया था। इस अवसर का लाभ उठाकर मैसूर के शासक हैदर अली ने अपनी शक्ति का विस्तार किया।
➣ हैदर अली ने मराठों के प्रभाव वाले सिरा, होसकोटे, बालापुर तथा कोलार जैसे अनेक क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया तथा दक्षिण भारत में अपनी स्थिति को अत्यन्त सुदृढ़ बना लिया।
➣ इस प्रकार हैदर अली की बढ़ती शक्ति मराठों के लिए चुनौती बनती जा रही थी। इसलिए माधवराव प्रथम ने दक्षिण भारत में मराठा प्रभुत्व को पुनः सुदृढ़ करने का निश्चय किया।
➣ राक्षसभुवन के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद माधवराव प्रथम ने अपना ध्यान दक्षिण भारत की ओर केन्द्रित किया। उसका उद्देश्य हैदर अली की बढ़ती शक्ति पर अंकुश लगाना तथा दक्षिण भारत में मराठा प्रभुत्व को पुनः स्थापित करना था।
➣ 1764 ई. से माधवराव प्रथम ने हैदर अली के विरुद्ध अनेक सैन्य अभियान चलाए। इन अभियानों में मराठा सेना ने मैसूर के कई क्षेत्रों में सफलता प्राप्त की और हैदर अली पर लगातार दबाव बनाए रखा।
➣ निरन्तर संघर्षों के परिणामस्वरूप 1771 ई. तक हैदर अली मराठों से समझौता करने तथा नजराना (क्षतिपूर्ति) देने के लिए विवश हो गया। इस प्रकार दक्षिण भारत में मराठों का प्रभाव पुनः स्थापित हो गया।
➣ हैदर अली पर विजय के बाद मराठों का प्रभाव पुनः कर्नाटक तथा दक्षिण भारत के अन्य क्षेत्रों में सुदृढ़ हो गया। इससे पानीपत के तृतीय युद्ध के बाद कमजोर हुई मराठा प्रतिष्ठा को पुनः बल मिला।
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-1769 ई.) के बाद हुई मद्रास की संधि (1769 ई.) के अनुसार अंग्रेज़ों और हैदर अली ने एक-दूसरे को बाहरी आक्रमण की स्थिति में सैन्य सहायता देने का वचन दिया था। किन्तु 1771 ई. में जब माधवराव प्रथम के नेतृत्व में मराठों ने हैदर अली पर आक्रमण किया, तब अंग्रेज़ों ने कोई सहायता नहीं दी। यही घटना आगे चलकर द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-1784 ई.) के प्रमुख कारणों में से एक बनी।
➣ माधवराव प्रथम ने अपनी सफल सैन्य नीति के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया कि मराठा साम्राज्य अभी भी दक्कन और दक्षिण भारत की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति बना हुआ है।
➣ दक्षिण भारत में स्थिति सुदृढ़ होने के बाद माधवराव प्रथम ने पुनः उत्तर भारत की राजनीति की ओर ध्यान दिया, जहाँ मराठों ने महादजी सिंधिया के नेतृत्व में अपना प्रभाव फिर से स्थापित किया।
उत्तर भारत में मराठा शक्ति का पुनरुत्थान
➣ पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई.) के बाद उत्तर भारत में मराठों का राजनीतिक प्रभाव लगभग समाप्त हो गया था। दिल्ली, दोआब तथा पंजाब के क्षेत्रों में मराठों का प्रभुत्व कमजोर पड़ गया और अनेक स्थानीय शक्तियाँ पुनः सक्रिय हो गईं।
➣ ऐसी परिस्थिति में माधवराव प्रथम ने उत्तर भारत में मराठा शक्ति को पुनः स्थापित करने का निश्चय किया। इसके लिए उन्होंने अपने विश्वसनीय सेनापति महादजी सिंधिया को उत्तर भारत का नेतृत्व सौंपा।
दिल्ली में मराठा प्रभाव की पुनर्स्थापना (1771 ई.)
➣ पानीपत के तृतीय युद्ध के बाद उत्तर भारत में उत्पन्न राजनीतिक शून्यता का लाभ उठाकर नजीबुद्दौला तथा अन्य अफगान सरदारों ने दिल्ली की राजनीति पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। परिणामस्वरूप मुगल सम्राट की स्थिति अत्यन्त कमजोर हो गई।
➣ मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय दिल्ली की अस्थिर राजनीतिक परिस्थितियों तथा नजीबुद्दौला के बढ़ते प्रभाव के कारण राजधानी छोड़ने को विवश हो गया। वह 1759 ई. से इलाहाबाद में रह रहा था और वहीं से मुगल सम्राट के रूप में अपना अधिकार बनाए हुए था।
➣ 1771 ई. में महादजी सिंधिया ने शाह आलम द्वितीय को पुनः दिल्ली लाकर मुगल सिंहासन पर बैठाया। इस घटना के साथ ही दिल्ली में मराठों का प्रभाव पुनः स्थापित हो गया और मुगल सम्राट एक बार फिर मराठों के संरक्षण में शासन करने लगा।
➣ शाह आलम द्वितीय ने मराठों की सहायता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए पेशवा माधवराव प्रथम को मुगल सम्राट का प्रमुख संरक्षक एवं सहयोगी स्वीकार किया। इससे मराठा साम्राज्य की राजनीतिक प्रतिष्ठा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
रूहेलों, राजपूतों एवं जाटों पर मराठा प्रभाव
➣ दिल्ली में अपना प्रभाव स्थापित करने के बाद मराठों ने उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी शक्ति को पुनः संगठित करना प्रारम्भ किया। इस अभियान का नेतृत्व मुख्यतः महादजी सिंधिया ने किया।
➣ मराठा सेना ने रूहेलों को पराजित कर दोआब क्षेत्र में अपना प्रभाव पुनः स्थापित किया। इसके साथ ही राजपूत राज्यों तथा जाटों ने भी मराठा शक्ति को स्वीकार किया और उत्तर भारत में मराठों का राजनीतिक प्रभाव पुनः बढ़ने लगा।
➣ पानीपत की पराजय के केवल एक दशक के भीतर मराठों द्वारा दिल्ली सहित उत्तर भारत में पुनः अपना प्रभाव स्थापित कर लेना उनकी संगठन क्षमता, सैन्य शक्ति तथा दूरदर्शी नेतृत्व का प्रमाण था। इस पुनरुत्थान का सर्वाधिक श्रेय माधवराव प्रथम की नीति तथा महादजी सिंधिया की सैन्य एवं कूटनीतिक योग्यता को दिया जाता है।
ऐतिहासिक महत्व
➣ शाह आलम द्वितीय की पुनः दिल्ली वापसी मराठा साम्राज्य की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धियों में से एक मानी जाती है। इससे यह सिद्ध हो गया कि पानीपत की पराजय के बावजूद मराठा साम्राज्य की शक्ति समाप्त नहीं हुई थी।
➣ इस सफलता का सबसे अधिक श्रेय माधवराव प्रथम की दूरदर्शी नीति तथा महादजी सिंधिया की सैन्य एवं कूटनीतिक प्रतिभा को दिया जाता है। आगे चलकर महादजी सिंधिया ही उत्तर भारत में मराठा प्रभाव के सबसे प्रमुख आधार बने।
1771 ई. में महादजी सिंधिया द्वारा शाह आलम द्वितीय को पुनः दिल्ली के सिंहासन पर बैठाना पानीपत के बाद मराठा शक्ति के पुनरुत्थान का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।
मृत्यु (1772 ई.)
➣ निरन्तर युद्धों, प्रशासनिक दायित्वों तथा अत्यधिक परिश्रम के कारण माधवराव प्रथम का स्वास्थ्य धीरे-धीरे गिरने लगा। वे क्षयरोग (टीबी) से पीड़ित हो गए थे।
➣ उपचार के अनेक प्रयासों के बावजूद उनका स्वास्थ्य निरन्तर बिगड़ता गया और अंततः 18 नवम्बर 1772 ई. को मात्र 27 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनके असामयिक निधन से मराठा साम्राज्य को अपूरणीय क्षति पहुँची।
➣ उनकी असामयिक मृत्यु के बाद मराठा सरदारों के बीच पुनः सत्ता संघर्ष प्रारम्भ हो गया। परिणामस्वरूप मराठा साम्राज्य की एकता धीरे-धीरे कमजोर पड़ती गई और भविष्य में अंग्रेजों के लिए भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने का मार्ग अपेक्षाकृत सरल हो गया।
माधवराव प्रथम का शासनकाल मराठा इतिहास में पुनरुत्थान का युग” माना जाता है। उन्होंने पानीपत की पराजय से निराश मराठा साम्राज्य को पुनः संगठित कर भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया।
योगदान
➣ माधवराव प्रथम ने ऐसे समय मराठा साम्राज्य का नेतृत्व संभाला, जब पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई.) की पराजय से मराठा शक्ति बिखर चुकी थी। अपनी दूरदर्शिता, प्रशासनिक क्षमता तथा सैन्य नेतृत्व के बल पर उन्होंने कुछ ही वर्षों में मराठा साम्राज्य को पुनः संगठित कर उसकी प्रतिष्ठा स्थापित कर दी।
➣ उनके शासनकाल में मराठों ने निजाम को पराजित कर दक्कन में अपनी शक्ति पुनः स्थापित की, हैदर अली को नजराना देने के लिए बाध्य किया तथा महादजी सिंधिया के नेतृत्व में शाह आलम द्वितीय को पुनः दिल्ली के सिंहासन पर बैठाकर उत्तर भारत में मराठा प्रभाव को पुनर्जीवित किया।
➣ प्रसिद्ध इतिहासकार ग्राण्ट डफ ने माधवराव प्रथम के महत्व का वर्णन करते हुए लिखा है-
मराठा साम्राज्य के लिए पानीपत का मैदान उतना घातक सिद्ध नहीं हुआ, जितना इस श्रेष्ठ शासक (माधवराव प्रथम) का असामयिक निधन।”
➣ इतिहासकार गोविन्द सखाराम सरदेसाई के अनुसार, माधवराव पेशवाओं में सबसे महान था।” उनके अनुसार माधवराव ने अपने अल्प शासनकाल में जिस प्रकार मराठा साम्राज्य का पुनरुत्थान किया, वह अद्वितीय था।
➣ इतिहासकार सामान्यतः माधवराव प्रथम को अंतिम महान एवं सफल पेशवा मानते हैं। उनके नेतृत्व में मराठा साम्राज्य ने पानीपत की पराजय से उबरकर पुनः अपनी राजनीतिक एवं सैन्य प्रतिष्ठा स्थापित की।
नारायणराव (1772-1773 ई.)
➣ 18 नवम्बर 1772 ई. को माधवराव प्रथम की मृत्यु के बाद उनके छोटे भाई नारायणराव को मराठा साम्राज्य का नया पेशवा नियुक्त किया गया। उस समय उसकी आयु लगभग 17 वर्ष थी।
➣ नारायणराव को ऐसे समय पेशवा पद संभालना पड़ा, जब मराठा साम्राज्य पानीपत की पराजय से उबर चुका था, किन्तु आन्तरिक राजनीतिक संघर्ष पुनः उभरने लगे थे।
➣ नारायणराव के चाचा रघुनाथराव (राघोबा), जो बाजीराव प्रथम के पुत्र तथा माधवराव प्रथम के भाई थे, स्वयं पेशवा बनना चाहते थे। प्रारम्भ में वे राज्य-कार्य में प्रभाव बनाए हुए थे, किन्तु नारायणराव के पेशवा बनने के बाद दोनों के बीच सत्ता को लेकर मतभेद बढ़ने लगे।
➣ रघुनाथराव का उद्देश्य मराठा साम्राज्य की वास्तविक सत्ता अपने हाथों में लेना था, जबकि नारायणराव स्वतंत्र रूप से शासन करना चाहता था। परिणामस्वरूप दोनों के बीच राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ता गया।
नाना फड़नवीस का समर्थन
➣ मराठा दरबार के प्रमुख राजनीतिज्ञ नाना फड़नवीस नारायणराव के समर्थक थे। वे रघुनाथराव की महत्वाकांक्षी नीति के विरोधी थे और चाहते थे कि पेशवा की वैध सत्ता सुरक्षित रहे।
➣ नाना फड़नवीस ने नारायणराव को प्रशासनिक एवं राजनीतिक मामलों में सहयोग दिया। आगे चलकर नारायणराव की हत्या के बाद मराठा राजनीति में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई।
नारायणराव की हत्या (1773 ई.)
➣ रघुनाथराव (राघोबा) और नारायणराव के बीच बढ़ते राजनीतिक संघर्ष ने अंततः गंभीर रूप धारण कर लिया। 30 अगस्त 1773 ई. को शनिवारवाड़ा (पुणे) में महल के सैनिकों द्वारा नारायणराव की हत्या कर दी गई। उस समय उनकी आयु लगभग 18 वर्ष थी।
➣ परम्परागत विवरणों के अनुसार, रघुनाथराव ने सैनिकों को नारायणराव को धरा” (पकड़ो) का आदेश भेजा था, जिसे उनकी पत्नी आनंदीबाई ने कथित रूप से बदलकर मारा” कर दिया। परिणामस्वरूप सैनिकों ने नारायणराव की हत्या कर दी।
➣ यद्यपि यह कथा अत्यन्त प्रसिद्ध है, किन्तु आधुनिक इतिहासकार इसे पूर्णतः प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं मानते। इसलिए इसे एक लोकप्रचलित परम्परा के रूप में देखा जाता है।
रघुनाथराव का पेशवा बनना
➣ नारायणराव की मृत्यु के बाद रघुनाथराव (राघोबा) ने स्वयं को मराठा साम्राज्य का पेशवा घोषित कर दिया। किन्तु मराठा दरबार के अनेक प्रमुख सरदारों एवं मंत्रियों ने उनकी वैधता को स्वीकार नहीं किया।
➣ विशेष रूप से नाना फड़नवीस तथा अन्य प्रभावशाली मराठा सरदार रघुनाथराव के कट्टर विरोधी बन गए और उन्होंने उनके विरुद्ध संगठित होने का निर्णय लिया।
सवाई माधवराव का जन्म एवं बाराभाई परिषद् की भूमिका
➣ नारायणराव की मृत्यु के समय उनकी पत्नी गंगाबाई गर्भवती थीं। उनकी मृत्यु के कुछ समय बाद उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम सवाई माधवराव (माधवराव द्वितीय) रखा गया।
➣ मराठा सरदारों ने शिशु सवाई माधवराव को वैध उत्तराधिकारी घोषित किया तथा उसके संरक्षण और शासन संचालन के लिए बाराभाई परिषद् का गठन किया। इस परिषद् का नेतृत्व नाना फड़नवीस ने किया।
➣ बाराभाई परिषद् ने रघुनाथराव के दावे का विरोध किया और मराठा साम्राज्य की वैध सत्ता की रक्षा का दायित्व अपने हाथों में लिया।
माधवराव द्वितीय (1774-1795 ई.)
➣ 30 अगस्त 1773 ई. को पेशवा नारायणराव की हत्या के समय उनकी पत्नी गंगाबाई गर्भवती थीं। कुछ महीनों बाद 18 अप्रैल 1774 ई. को उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम माधवराव नारायण रखा गया। इतिहास में वह माधवराव द्वितीय अथवा सवाई माधवराव के नाम से प्रसिद्ध है।
➣ माधवराव द्वितीय का जन्म ऐसे समय हुआ, जब मराठा साम्राज्य उत्तराधिकार के गंभीर संकट से गुजर रहा था। उसके पिता नारायणराव की हत्या हो चुकी थी और उसके चाचा रघुनाथराव (राघोबा) स्वयं पेशवा बनने का प्रयास कर रहे थे।
➣ मराठा सरदारों ने रघुनाथराव के दावे को अस्वीकार करते हुए 28 मई 1774 ई. को शिशु माधवराव नारायण को मराठा साम्राज्य का वैध पेशवा घोषित किया। इस प्रकार वह अत्यन्त कम आयु में ही मराठा साम्राज्य का शासक बन गया।
➣ चूँकि माधवराव द्वितीय उस समय शिशु था, इसलिए शासन का वास्तविक दायित्व मराठा सरदारों और मंत्रियों के हाथों में रहा। इसी कारण उसके शासनकाल के प्रारम्भिक वर्षों में प्रशासन का संचालन एक विशेष परिषद् द्वारा किया गया।
➣ इस समय अंग्रेज भी मराठा साम्राज्य के आन्तरिक विवादों का लाभ उठाकर भारत में अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे। परिणामस्वरूप माधवराव द्वितीय का सम्पूर्ण शासनकाल आन्तरिक सत्ता संघर्ष तथा अंग्रेजों के साथ संघर्ष से प्रभावित रहा।
बाराभाई परिषद्
➣ माधवराव द्वितीय (माधवराव नारायण) के शिशु होने के कारण वह स्वयं शासन का संचालन करने में सक्षम नहीं था। इसलिए मराठा साम्राज्य के प्रमुख सरदारों एवं मंत्रियों ने राज्य के प्रशासन के लिए एक संरक्षक परिषद् का गठन किया, जिसे बाराभाई परिषद् कहा जाता है।
➣ इस परिषद् का उद्देश्य शिशु पेशवा के अधिकारों की रक्षा करना, मराठा साम्राज्य की एकता बनाए रखना तथा रघुनाथराव (राघोबा) के सत्ता पर अधिकार करने के प्रयासों को विफल करना था।
➣ रघुनाथराव (राघोबा) स्वयं को मराठा साम्राज्य का वैध पेशवा मानता था। इसलिए उसने बाराभाई परिषद् और नाना फड़नवीस के नेतृत्व को स्वीकार नहीं किया तथा अपने अधिकार की पुनः स्थापना के लिए प्रयास प्रारम्भ कर दिए।
➣ रघुनाथराव और बाराभाई परिषद् के बीच सत्ता संघर्ष आगे चलकर प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.) का प्रमुख कारण बना।
प्रमुख सदस्य➣ बाराभाई परिषद् में मराठा साम्राज्य के अनेक प्रभावशाली सरदार एवं मंत्री सम्मिलित थे। इनमें नाना फड़नवीस, सखाराम बापू, महादजी सिंधिया, हरिपंत फड़के, मोरोबा फड़नीस तथा अन्य प्रमुख मराठा सरदारों का महत्वपूर्ण स्थान था।
➣ यद्यपि परिषद् में अनेक सदस्य थे, किन्तु समय के साथ नाना फड़नवीस इसके सबसे प्रभावशाली नेता बनकर उभरे और मराठा राजनीति का वास्तविक संचालन उनके हाथों में आ गया।
नाना फड़नवीस का नेतृत्व
➣ नाना फड़नवीस का वास्तविक नाम बालाजी जनार्दन भानु था। वे अपनी असाधारण कूटनीतिक क्षमता, प्रशासनिक दक्षता तथा दूरदर्शिता के कारण मराठा साम्राज्य के सबसे प्रभावशाली राजनीतिज्ञों में गिने जाते थे।
➣ उन्होंने रघुनाथराव (राघोबा) की महत्वाकांक्षाओं को विफल कर वैध पेशवा के अधिकारों की रक्षा की तथा मराठा साम्राज्य को तत्काल विघटन से बचाया। साथ ही महादजी सिंधिया, होल्कर, भोंसले तथा गायकवाड़ जैसे प्रमुख मराठा सरदारों के बीच संतुलन बनाए रखा। उनकी कुशल कूटनीति के कारण मराठा संघ अनेक वर्षों तक संगठित बना रहा।
➣ अपनी उत्कृष्ट कूटनीतिक योग्यता, संतुलित विदेश नीति तथा मराठा साम्राज्य की एकता बनाए रखने के प्रयासों के कारण नाना फड़नवीस को इतिहास में मराठा मैकियावेली कहा जाता है।
टीपू सुल्तान के विरुद्ध अभियान
➣ 1790 ई. में टीपू सुल्तान ने अंग्रेज़ों के मित्र राज्य त्रावणकोर पर आक्रमण कर दिया। इसे अंग्रेज़ों ने अपनी संधियों का उल्लंघन माना और टीपू के विरुद्ध युद्ध की तैयारी प्रारम्भ कर दी।
➣ दूसरी ओर मराठों और टीपू सुल्तान के संबंध भी पहले से तनावपूर्ण थे। तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-1792 ई.) से पूर्व टीपू द्वारा मराठों के कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लेने तथा मराठा हितों को चुनौती देने के कारण नाना फड़नवीस ने अंग्रेज़ों और हैदराबाद के निज़ाम के साथ एक त्रिपक्षीय गठबंधन बनाया।
➣ इस संयुक्त मोर्चे ने टीपू सुल्तान को पराजित कर श्रीरंगपट्टनम की संधि (1792 ई.) करने के लिए विवश कर दिया। इस संधि से मराठों को अपने कुछ खोए हुए क्षेत्र तथा आर्थिक दावे पुनः प्राप्त हुए और दक्षिण भारत में उनका प्रभाव भी सुदृढ़ हुआ।
यह पहला और अंतिम अवसर था जब मराठों ने मैसूर राज्य के विरुद्ध अंग्रेज़ों के साथ मिलकर इतने बड़े स्तर पर संयुक्त सैन्य अभियान चलाया। इसके बाद मराठों और अंग्रेज़ों के संबंध लगातार बिगड़ते गए और कुछ ही वर्षों में दोनों एक-दूसरे के सबसे बड़े प्रतिद्वन्द्वी बन गए।
माधवराव द्वितीय से मतभेद
➣ समय के साथ माधवराव द्वितीय वयस्क हो गए और वे स्वयं शासन की वास्तविक बागडोर अपने हाथों में लेना चाहते थे। दूसरी ओर नाना फड़नवीस, जो कई वर्षों से मराठा प्रशासन का संचालन कर रहे थे, प्रशासन तथा विदेश नीति पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहते थे।
➣ परिणामस्वरूप दोनों के बीच अधिकारों को लेकर मतभेद बढ़ने लगे। दरबार में विभिन्न सरदार भी अलग-अलग गुटों में बँट गए, जिससे राजनीतिक तनाव और बढ़ गया।
➣ इन निरन्तर मतभेदों और दरबारी षड्यंत्रों का गहरा प्रभाव माधवराव द्वितीय पर पड़ा। शासन के अंतिम वर्षों में वे मानसिक रूप से अत्यधिक तनावग्रस्त रहने लगे और अंततः उनका जीवन दुखद परिस्थितियों में समाप्त हुआ। इसके बाद मराठा राजनीति में अस्थिरता और बढ़ गई।
सूरत की संधि (1775 ई.)
➣ बाराभाई परिषद् द्वारा माधवराव द्वितीय को वैध पेशवा घोषित किए जाने के बाद रघुनाथराव (राघोबा) की पेशवा बनने की आशाएँ समाप्त हो गईं। मराठा सरदारों के विरोध के कारण वह अपनी स्थिति मजबूत नहीं कर सका।
➣ अन्ततः रघुनाथराव ने मराठा साम्राज्य के आन्तरिक विवाद का लाभ उठाने के लिए अंग्रेजों से सहायता लेने का निर्णय किया। वह बम्बई पहुँचा और ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधिकारियों से सैन्य सहायता की मांग की।
➣ इस उद्देश्य से 6 मार्च 1775 ई. को रघुनाथराव और बम्बई सरकार के बीच सूरत की संधि सम्पन्न हुई। कम्पनी की ओर से इस संधि का प्रतिनिधित्व कर्नल कीटिंग ने किया।
➣ इस संधि के अनुसार अंग्रेजों ने रघुनाथराव को सैनिक सहायता देकर उसे मराठा साम्राज्य का पेशवा बनाने का वचन दिया। बदले में रघुनाथराव ने अंग्रेजों को अनेक राजनीतिक एवं आर्थिक रियायतें देने का आश्वासन दिया।
संधि की प्रमुख शर्तें
➣ रघुनाथराव ने अंग्रेजों को सालसेट, बसई तथा थाना जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अधिकार देने का वचन दिया।
➣ इसके अतिरिक्त उसने सूरत एवं भड़ौच से प्राप्त होने वाले राजस्व का एक भाग अंग्रेजों को देने का भी आश्वासन दिया।
➣ बदले में अंग्रेजों ने रघुनाथराव को सैन्य सहायता प्रदान करने तथा उसे मराठा साम्राज्य का पेशवा बनाने का वचन दिया।
संधि का महत्व
➣ सूरत की संधि मराठा साम्राज्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुई। पहली बार मराठों के आन्तरिक उत्तराधिकार विवाद में अंग्रेजों ने प्रत्यक्ष हस्तक्षेप किया।
➣ इस संधि के कारण मराठा सरदारों और अंग्रेजों के बीच संघर्ष प्रारम्भ हो गया, जिसने आगे चलकर प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.) का रूप धारण कर लिया।
यहाँ स्थिति कुछ हद तक बंगाल के नवाबों जैसी थी, जहाँ मीर जाफर ने नवाब बनने के लिए अंग्रेजों का समर्थन लिया था और वह सफल भी हुआ था। किन्तु मराठों के मामले में ऐसा नहीं हो सका।
रेगुलेटिंग एक्ट (1773) लागू हो जाने के कारण बंगाल सरकार ने सूरत की संधि को स्वीकार नहीं किया और अंततः यह संधि प्रभावहीन सिद्ध हुई।
प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का प्रारम्भ (1775 ई.)
➣ इस युद्ध का मूल कारण मराठा साम्राज्य का उत्तराधिकार विवाद था। एक ओर बाराभाई परिषद् शिशु माधवराव द्वितीय के अधिकारों की रक्षा कर रही थी, जबकि दूसरी ओर रघुनाथराव (राघोबा) अंग्रेजों की सहायता से स्वयं पेशवा बनना चाहता था।
अरास (आडास) का युद्ध (18 मई 1775 ई.)
➣ 18 मई 1775 ई. को गुजरात के अरास (आडास) के निकट अंग्रेजी सेना और पूना दरबार की मराठा सेना के बीच युद्ध हुआ। अंग्रेजी सेना का नेतृत्व कर्नल कीटिंग कर रहा था।
➣ इस युद्ध में अंग्रेजों को सफलता मिली। पराजय के बाद फतेहसिंह गायकवाड़ अंग्रेजों के प्रभाव में आ गया। फिर भी इस विजय से रघुनाथराव को अपेक्षित राजनीतिक लाभ प्राप्त नहीं हुआ, क्योंकि अधिकांश मराठा सरदार उसके विरोध में ही बने रहे।
रेगुलेटिंग एक्ट (1773) का प्रभाव
➣ इस समय रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 लागू हो चुका था। इसके अनुसार बंगाल के गवर्नर-जनरल को बम्बई तथा मद्रास की विदेश नीति पर नियंत्रण प्राप्त हो गया था।
➣ जब बंगाल सरकार (गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स) को सूरत की संधि की जानकारी मिली, तब उसने इसे उचित नहीं माना। उसका विचार था कि बम्बई सरकार ने बिना अनुमति के मराठों के आन्तरिक विवाद में हस्तक्षेप किया है।
➣ बम्बई सरकार रघुनाथराव का समर्थन जारी रखना चाहती थी, जबकि बंगाल सरकार मराठों के साथ समझौते के पक्ष में थी। परिणामस्वरूप कम्पनी के भीतर ही नीति को लेकर मतभेद उत्पन्न हो गए।
➣ इन्हीं परिस्थितियों में मराठों और बंगाल सरकार के बीच वार्ता प्रारम्भ हुई, जिसका परिणाम आगे चलकर पुरन्दर की संधि (1776 ई.) के रूप में सामने आया।
प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का तात्कालिक कारण सूरत की संधि (1775 ई.) थी, जबकि अरास (आडास) का युद्ध इस संघर्ष का पहला महत्वपूर्ण सैन्य अभियान माना जाता है।
पुरन्दर की संधि (1776 ई.)
➣ सूरत की संधि (1775 ई.) के बाद प्रारम्भ हुए संघर्ष से स्पष्ट हो गया कि मराठों के साथ युद्ध कम्पनी के लिए सरल नहीं होगा। इसलिए गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने मराठों के साथ समझौते का मार्ग अपनाने का निर्णय लिया और अपने प्रतिनिधि कर्नल जॉन अप्टन को पूना दरबार भेजा।
➣ 1 मार्च 1776 ई. को नाना फड़नवीस और कर्नल अप्टन के बीच पुरन्दर की संधि सम्पन्न हुई। इस संधि का उद्देश्य मराठों और अंग्रेजों के बीच चल रहे संघर्ष को समाप्त करना तथा दोनों पक्षों के बीच समझौता स्थापित करना था।
संधि की प्रमुख शर्तें
➣ सूरत की संधि को निरस्त (रद्द) कर दिया गया।
➣ अंग्रेजों को युद्ध-व्यय के बदले 12 लाख रुपये देने का निर्णय लिया गया।
➣ अंग्रेजों को केवल सालसेट द्वीप पर अधिकार रखने की अनुमति दी गई।
➣ रघुनाथराव (राघोबा) को मराठा सरकार की ओर से वार्षिक 25,000 रुपये की पेंशन देने तथा उसे सक्रिय राजनीति से दूर रहने पर सहमति बनी।
➣ कम्पनी ने रघुनाथराव के दावे का समर्थन न करने तथा माधवराव द्वितीय को वैध पेशवा के रूप में स्वीकार करने का आश्वासन दिया।
सन्धि पर प्रतिक्रियाएँ➣ वारेन हेस्टिंग्स इस संधि से पूर्णतः संतुष्ट नहीं था। उसने इसे परिस्थितियों से उत्पन्न एक अस्थायी समझौता माना और बाद में इसके प्रति कठोर रुख अपनाया।
➣ दूसरी ओर बम्बई सरकार ने भी इस संधि को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया तथा रघुनाथराव का समर्थन जारी रखने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप अंग्रेजों की नीति में एकरूपता नहीं रह सकी।
➣ उधर ईस्ट इंडिया कम्पनी के लंदन स्थित निदेशक मंडल ने भी इस विषय पर अलग दृष्टिकोण अपनाया, जिससे कम्पनी की नीतियों में और अधिक भ्रम उत्पन्न हो गया।
संधि का महत्व
➣ पुरन्दर की संधि ने अस्थायी रूप से मराठों और अंग्रेजों के बीच तनाव कम किया, किन्तु यह स्थायी समाधान सिद्ध नहीं हुई। बम्बई सरकार द्वारा इसका पूर्ण पालन न किए जाने के कारण दोनों पक्षों के बीच संघर्ष पुनः प्रारम्भ हो गया।
➣ इस प्रकार पुरन्दर की संधि प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का केवल एक अस्थायी विराम सिद्ध हुई, जबकि युद्ध का अंतिम समाधान सालबाई की संधि (1782 ई.) द्वारा हुआ।
पुरन्दर की संधि (1 मार्च 1776 ई.) द्वारा सूरत की संधि को रद्द कर दिया गया तथा माधवराव द्वितीय को वैध पेशवा के रूप में स्वीकार किया गया।
तलगाँव का युद्ध (1779 ई.)
➣ पुरन्दर की संधि के बाद भी अंग्रेजों और मराठों के बीच मतभेद समाप्त नहीं हुए। बम्बई सरकार ने पुनः रघुनाथराव (राघोबा) का समर्थन करना प्रारम्भ कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप दोनों पक्षों के बीच युद्ध फिर छिड़ गया।
➣ 9 जनवरी 1779 ई. को तलगाँव के निकट मराठा सेना और अंग्रेजी सेना के बीच एक निर्णायक युद्ध हुआ। इस युद्ध में मराठा सेना ने अंग्रेजों को चारों ओर से घेर लिया और उन्हें पीछे हटने के लिए विवश कर दिया।
➣ मराठों की इस विजय में महादजी सिंधिया, हरिपंत फड़के तथा अन्य मराठा सेनानायकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अंग्रेजी सेना को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और उसकी स्थिति अत्यन्त दयनीय हो गई।
बड़गाँव की संधि (29 जनवरी 1779 ई.)
➣ तलगाँव में पराजय के बाद अंग्रेजों को मराठों से 29 जनवरी 1779 ई. को बड़गाँव की संधि करने के लिए विवश होना पड़ा। यह संधि अंग्रेजों के लिए अत्यन्त अपमानजनक मानी जाती है।
संधि की प्रमुख शर्तें
➣ अंग्रेजों ने 1773 ई. के बाद मराठों से प्राप्त अधिकांश क्षेत्रों को वापस करने पर सहमति व्यक्त की।
➣ रघुनाथराव को मराठा सरकार के हवाले करने का निर्णय लिया गया।
➣ अंग्रेजों के दो अधिकारियों को मराठों के पास बंधक के रूप में रखा गया, जिससे संधि के पालन की गारंटी सुनिश्चित की जा सके।
संधि का महत्व
➣ बड़गाँव की संधि अंग्रेजों की प्रतिष्ठा के लिए एक गंभीर आघात थी। वारेन हेस्टिंग्स ने इस संधि के विषय में कहा था- इस संधि की शर्तों को देखकर मेरा सिर शर्म से झुक जाता है।”
➣ यद्यपि बाद में वारेन हेस्टिंग्स ने इस संधि को स्वीकार नहीं किया और युद्ध पुनः प्रारम्भ हो गया, फिर भी तलगाँव की विजय ने यह सिद्ध कर दिया कि मराठा सेना अभी भी अंग्रेजों का सफलतापूर्वक सामना करने में सक्षम थी।
तलगाँव का युद्ध (1779 ई.) प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध में मराठों की सबसे महत्वपूर्ण सैन्य विजय थी, जबकि बड़गाँव की संधि अंग्रेजों के लिए अत्यन्त अपमानजनक सिद्ध हुई।
सालबाई की संधि (1782 ई.)
➣ प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.) लगभग सात वर्षों तक चला। इस दीर्घ संघर्ष में किसी भी पक्ष को निर्णायक सफलता प्राप्त नहीं हुई। परिणामस्वरूप दोनों पक्ष शान्ति स्थापित करने के इच्छुक हो गए।
➣ मराठा पक्ष की ओर से महादजी सिंधिया ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई, जबकि अंग्रेजों की ओर से डेविड एंडरसन को वार्ता के लिए नियुक्त किया गया।
➣ 17 मई 1782 ई. को महादजी सिंधिया की मध्यस्थता में माधवराव द्वितीय (माधवराव नारायण) और ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच सालबाई की संधि सम्पन्न हुई। इस संधि के साथ ही प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध समाप्त हो गया।
संधि की प्रमुख शर्तें
➣ अंग्रेजों ने माधवराव द्वितीय को मराठा साम्राज्य का वैध पेशवा स्वीकार कर लिया।
➣ रघुनाथराव (राघोबा) के दावे को समाप्त कर उसे पेंशन देने की व्यवस्था की गई।
➣ सालसेट (Salsette) द्वीप अंग्रेजों के अधिकार में रहा, जबकि युद्ध के दौरान जीते गए अधिकांश अन्य क्षेत्र दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को लौटा दिए।
➣ यमुना नदी के पश्चिम स्थित क्षेत्रों पर महादजी सिंधिया के प्रभाव को स्वीकार किया गया। इससे उत्तर भारत में मराठों की प्रतिष्ठा और अधिक बढ़ी।
➣ मराठों ने यह आश्वासन दिया कि वे अपने क्षेत्रों में फ्रांसीसियों को नया राजनीतिक या सैन्य आधार स्थापित नहीं करने देंगे।
संधि का महत्व
➣ सालबाई की संधि ने लगभग 20 वर्षों तक अंग्रेजों और मराठों के बीच शान्तिपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखे। इस अवधि में दोनों पक्षों के बीच कोई बड़ा युद्ध नहीं हुआ।
➣ इस संधि से अंग्रेजों को दक्षिण भारत में मैसूर के शासक हैदर अली तथा बाद में टीपू सुल्तान के विरुद्ध अपनी शक्ति केन्द्रित करने का अवसर मिला।
➣ दूसरी ओर महादजी सिंधिया ने उत्तर भारत में मराठा प्रभाव को और अधिक सुदृढ़ किया तथा दिल्ली की राजनीति में अपना प्रभुत्व स्थापित किया।
➣ इतिहासकारों के अनुसार, सालबाई की संधि ने मराठों और अंग्रेजों के बीच अस्थायी शक्ति-संतुलन स्थापित किया तथा दोनों पक्षों को अपने-अपने क्षेत्रों में स्थिति सुदृढ़ करने का समय प्रदान किया।
सालबाई की संधि (17 मई 1782 ई.) ने प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का समापन किया।
`महादजी सिंधिया का उदय एवं उत्तर भारत में प्रभाव
➣ सालबाई की संधि (1782 ई.) के बाद मराठा साम्राज्य में शांति स्थापित हुई। इस अवसर का लाभ उठाकर महादजी सिंधिया ने उत्तर भारत में मराठा शक्ति को पुनः संगठित करने का कार्य प्रारम्भ किया।
➣ महादजी सिंधिया अपनी सैन्य प्रतिभा, कूटनीति तथा प्रशासनिक क्षमता के कारण शीघ्र ही मराठा साम्राज्य के सबसे प्रभावशाली सरदार बन गए। उन्होंने दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में मराठा प्रभाव को दृढ़ता से स्थापित किया।
सैन्य एवं प्रशासनिक व्यवस्था
➣ महादजी सिंधिया ने उत्तर भारत में मराठा शक्ति को स्थायी रूप से स्थापित करने के लिए अपनी सेना तथा प्रशासन दोनों के संगठन पर विशेष ध्यान दिया। उनका विश्वास था कि केवल वीरता से नहीं, बल्कि अनुशासित सेना और सुदृढ़ प्रशासन से ही साम्राज्य को दीर्घकाल तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
➣ उन्होंने अपनी सेना का पुनर्गठन यूरोपीय सैन्य प्रणाली के आधार पर किया। इसके लिए उन्होंने फ्रांसीसी सैन्य अधिकारी बेनोइट डी बोएन की सेवाएँ प्राप्त कीं, जिसने मराठा सेना को आधुनिक युद्ध-कला, अनुशासन तथा नवीन सैन्य तकनीकों का प्रशिक्षण दिया।
➣ डी बोएन के नेतृत्व में सिंधिया की सेना में नियमित पैदल सेना, प्रशिक्षित तोपखाना तथा संगठित सैन्य टुकड़ियों का विकास हुआ। इससे मराठा सेना की युद्ध क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और वह उत्तर भारत की सबसे प्रभावशाली सेनाओं में गिनी जाने लगी।
➣ महादजी सिंधिया ने केवल सेना को ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था को भी सुदृढ़ किया। उन्होंने अपने अधीन क्षेत्रों में राजस्व व्यवस्था को व्यवस्थित किया, अधिकारियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया तथा स्थानीय शासकों और सामंतों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे।
➣ सुदृढ़ सैन्य संगठन, कुशल प्रशासन तथा प्रभावशाली कूटनीति के बल पर महादजी सिंधिया ने उत्तर भारत में मराठा प्रभुत्व को पुनः स्थापित किया और दिल्ली की राजनीति में स्वयं को सबसे प्रभावशाली मराठा नेता के रूप में प्रतिष्ठित किया।
उत्तर भारत में मराठा शक्ति का विस्तार
➣ सालबाई की संधि (1782 ई.) के बाद महादजी सिंधिया ने उत्तर भारत में मराठा शक्ति को पुनः संगठित करने का कार्य प्रारम्भ किया।
➣ उन्होंने यमुना नदी के पश्चिम स्थित क्षेत्रों पर अपना प्रभाव स्थापित किया तथा अनेक स्थानीय शक्तियों को परास्त कर मराठा प्रभुत्व को सुदृढ़ बनाया।
➣ उस समय मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय नाममात्र का शासक रह गया था। वास्तविक राजनीतिक एवं सैन्य संरक्षण महादजी सिंधिया के हाथों में था।
➣ उन्होंने मुगल सम्राट की रक्षा करते हुए दिल्ली दरबार में मराठों की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित किया और उत्तर भारत की राजनीति में मराठा साम्राज्य को पुनः निर्णायक शक्ति बना दिया।
➣ अपनी कुशल कूटनीति, आधुनिक सैन्य संगठन तथा प्रभावशाली नेतृत्व के बल पर महादजी सिंधिया ने उत्तर भारत में मराठा साम्राज्य की सर्वोच्चता स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसी कारण वे मराठा इतिहास के सबसे सफल सेनानायकों एवं कूटनीतिज्ञों में गिने जाते हैं।
मृत्यु
➣ 12 फरवरी 1794 ई. को महादजी सिंधिया का निधन हो गया। उनकी मृत्यु मराठा साम्राज्य के लिए बड़ी क्षति सिद्ध हुई, क्योंकि वे मराठा संघ के सबसे सक्षम एवं प्रभावशाली नेताओं में से एक थे।
➣ महादजी सिंधिया की मृत्यु के बाद उनके दत्तक उत्तराधिकारी दौलतराव सिंधिया ग्वालियर राज्य के शासक बने। यद्यपि उन्होंने सिंधिया वंश का शासन आगे बढ़ाया, किन्तु वे महादजी जैसी राजनीतिक एवं सैन्य सफलता प्राप्त नहीं कर सके।
नाना फड़नवीस के साथ संबंध
➣ यद्यपि माधवराव द्वितीय (सवाई माधवराव) मराठा साम्राज्य के वैध पेशवा थे, किन्तु उनके शासनकाल के अधिकांश समय तक वास्तविक प्रशासन नाना फड़नवीस तथा बाराभाई परिषद् के प्रभाव में रहा।
➣ जैसे-जैसे माधवराव द्वितीय युवावस्था में पहुँचे, वे स्वयं शासन की बागडोर अपने हाथों में लेना चाहते थे। दूसरी ओर नाना फड़नवीस भी प्रशासन पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहते थे। परिणामस्वरूप दोनों के बीच समय-समय पर मतभेद उत्पन्न होने लगे।
➣ यद्यपि इन मतभेदों के कारण दोनों के संबंधों में तनाव बना रहा, फिर भी मराठा साम्राज्य के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए प्रशासन चलता रहा। किन्तु शासन के अंतिम वर्षों में यह तनाव और अधिक बढ़ गया, जिससे माधवराव द्वितीय मानसिक रूप से भी प्रभावित हुए।
➣ इसी काल में नाना फड़नवीस, महादजी सिंधिया तथा अन्य प्रमुख मराठा सरदारों ने मराठा साम्राज्य की एकता बनाए रखने तथा अंग्रेजों के विस्तार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मृत्यु (1795 ई.)
➣ शासन के अंतिम वर्षों में माधवराव द्वितीय मानसिक तनाव एवं व्यक्तिगत कठिनाइयों से गुजर रहे थे। 27 अक्टूबर 1795 ई. को पुणे स्थित शनिवारवाड़ा में उनकी मृत्यु हो गई। उस समय उनकी आयु केवल 21 वर्ष थी।
➣ उनकी मृत्यु के संबंध में इतिहासकारों के बीच मतभेद हैं। अनेक समकालीन एवं पारम्परिक विवरणों में इसे आत्महत्या बताया गया है, जबकि कुछ आधुनिक इतिहासकार इसे संदिग्ध अथवा दुर्घटनाजन्य मृत्यु मानते हैं। इसलिए पूर्ण ऐतिहासिक सहमति नहीं है।
➣ माधवराव द्वितीय का शासनकाल मराठा साम्राज्य के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यद्यपि वे स्वयं अल्पायु में पेशवा बने और लंबे समय तक संरक्षकों के अधीन रहे, फिर भी उनके शासनकाल में मराठा साम्राज्य ने अंग्रेजों के विरुद्ध सफलतापूर्वक प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध लड़ा।
➣ इतिहासकारों के अनुसार, माधवराव द्वितीय का शासनकाल मराठा साम्राज्य के लिए एक संक्रमणकाल था। इस अवधि में एक ओर मराठा संघ ने अपनी राजनीतिक शक्ति बनाए रखी, वहीं दूसरी ओर अंग्रेज भारत की प्रमुख शक्ति बनने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहे थे।
➣ माधवराव द्वितीय की असामयिक मृत्यु के बाद मराठा साम्राज्य में पुनः उत्तराधिकार और सत्ता संघर्ष तेज हो गया, जिसने आगे चलकर मराठा संघ को कमजोर किया तथा अंग्रेजों के हस्तक्षेप का मार्ग और अधिक प्रशस्त कर दिया।
माधवराव द्वितीय (1774-1795 ई.) : Quick Revision
| विषय | तथ्य |
|---|---|
| अन्य नाम | माधवराव नारायण, सवाई माधवराव |
| कार्यकाल | 1774-1795 ई. |
| पिता | पेशवा नारायणराव |
| माता | गंगाबाई |
| जन्म | 18 अप्रैल 1774 ई. (नारायणराव की मृत्यु के बाद जन्म) |
| पेशवा नियुक्ति | 28 मई 1774 ई. |
| प्रारम्भिक शासन | बाराभाई परिषद् के संरक्षण में |
| बाराभाई परिषद् के प्रमुख सदस्य | नाना फड़नवीस, महादजी सिंधिया, सखाराम बापू, हरिपंत फड़के आदि |
| नाना फड़नवीस का वास्तविक नाम | बालाजी जनार्दन भानु |
| उपनाम | नाना फड़नवीस – मराठा मैकियावेली रघुनाथराव – मराठा खलनायक |
| प्रमुख घटना | रघुनाथराव द्वारा अंग्रेजों से सहायता प्राप्त करना |
| सूरत की संधि | 6 मार्च 1775 ई. |
| प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध | 1775-1782 ई. |
| पुरन्दर की संधि | 1 मार्च 1776 ई. |
| तलगाँव का युद्ध | 9 जनवरी 1779 ई. (मराठों की विजय) |
| बड़गाँव की संधि | 29 जनवरी 1779 ई. (अंग्रेजों के लिए अपमानजनक) |
| सालबाई की संधि | 17 मई 1782 ई. – प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का अंत |
| महादजी सिंधिया | उत्तर भारत में मराठा प्रभुत्व स्थापित किया तथा शाह आलम द्वितीय के संरक्षक बने। |
| महादजी सिंधिया की मृत्यु | 12 फरवरी 1794 ई. |
| उत्तराधिकारी (सिंधिया) | दौलतराव सिंधिया |
| मृत्यु | 27 अक्टूबर 1795 ई., शनिवारवाड़ा (पुणे) |
| ऐतिहासिक महत्व | बाराभाई परिषद् का शासन, नाना फड़नवीस का उत्कर्ष तथा प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का काल |
➣ माधवराव द्वितीय का जन्म उनके पिता नारायणराव की मृत्यु के बाद हुआ था, इसलिए उन्हें मरणोपरांत जन्मा पेशवा भी कहा जाता है।
बाजीराव द्वितीय (1796-1818 ई.)
➣ 27 अक्टूबर 1795 ई. को माधवराव द्वितीय (सवाई माधवराव) की मृत्यु के बाद रघुनाथराव (राघोबा) के पुत्र बाजीराव द्वितीय को 1796 ई. में मराठा साम्राज्य का पेशवा नियुक्त किया गया। वह मराठा साम्राज्य का अंतिम स्वतंत्र पेशवा था।
➣ बाजीराव द्वितीय ऐसे समय सत्ता में आया, जब मराठा संघ की एकता कमजोर हो चुकी थी। प्रमुख मराठा सरदार-सिंधिया, होल्कर, भोंसले तथा गायकवाड़-अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से शक्तिशाली हो चुके थे और उनके बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता लगातार बढ़ रही थी।
व्यक्तित्व
➣ बाजीराव द्वितीय को सामान्यतः एक दुर्बल एवं अनिर्णायक शासक माना जाता है। उसमें अपने पूर्ववर्ती पेशवाओं जैसी सैन्य प्रतिभा, राजनीतिक दूरदर्शिता तथा नेतृत्व क्षमता का अभाव था।
➣ अपनी स्थिति सुरक्षित रखने के लिए वह मराठा सरदारों के बीच पारस्परिक मतभेदों का लाभ उठाने का प्रयास करता था। उसकी इसी नीति ने मराठा संघ की एकता को और अधिक कमजोर कर दिया तथा अंग्रेजों को मराठा राजनीति में हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान किया।
नाना फड़नवीस की भूमिका
➣ बाजीराव द्वितीय के शासन के प्रारम्भिक वर्षों में मराठा राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेता नाना फड़नवीस ही थे। उनकी कूटनीति के कारण मराठा संघ किसी प्रकार संगठित बना हुआ था।
➣ किन्तु 13 मार्च 1800 ई. को नाना फड़नवीस की मृत्यु हो गई। उनके निधन के साथ ही मराठा राजनीति में संतुलन बनाए रखने वाली सबसे महत्वपूर्ण शक्ति समाप्त हो गई और विभिन्न मराठा सरदारों के बीच संघर्ष तीव्र हो गया।
सिंधिया और होल्कर के बीच प्रतिद्वंद्विता
➣ नाना फड़नवीस की मृत्यु के बाद दौलतराव सिंधिया तथा जसवंतराव होल्कर के बीच मराठा संघ में सर्वोच्च प्रभाव स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा प्रारम्भ हो गई।
➣ बाजीराव द्वितीय ने इस संघर्ष में दौलतराव सिंधिया का पक्ष लिया। इससे होल्कर और पेशवा के संबंध अत्यधिक तनावपूर्ण हो गए तथा मराठा संघ के भीतर गृहयुद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई।
बाजीराव द्वितीय के शासनकाल की सबसे बड़ी विशेषता मराठा संघ की आन्तरिक एकता का विघटन था। इसी आन्तरिक दुर्बलता का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने मराठा राजनीति में हस्तक्षेप किया और आगे चलकर सम्पूर्ण मराठा साम्राज्य को अपने अधीन कर लिया।
➣ 1801 ई. में बाजीराव द्वितीय के आदेश पर जसवंतराव होल्कर के भाई विठोजी होल्कर को पुणे में गिरफ्तार कर मृत्युदण्ड दे दिया गया। इस घटना से होल्कर अत्यंत क्रोधित हो गया और उसने पेशवा के विरुद्ध युद्ध की तैयारी प्रारम्भ कर दी।
➣ विठोजी की हत्या ने मराठा संघ के आन्तरिक संघर्ष को और अधिक तीव्र कर दिया तथा होल्कर और पेशवा के बीच समझौते की सभी संभावनाएँ समाप्त हो गईं।
हड़पसर का युद्ध (25 अक्टूबर 1802 ई.)
➣ 25 अक्टूबर 1802 ई. (दीपावली के दिन) हड़पसर के निकट जसवंतराव होल्कर की सेना और बाजीराव द्वितीय तथा दौलतराव सिंधिया की संयुक्त सेना के बीच युद्ध हुआ।
➣ इस युद्ध में जसवंतराव होल्कर ने निर्णायक विजय प्राप्त की। बाजीराव द्वितीय और सिंधिया की संयुक्त सेना पराजित हुई तथा होल्कर ने पूना (पुणे) पर अधिकार कर लिया।
➣ पूना पर अधिकार करने के बाद जसवंतराव होल्कर ने अमृतराव को शासन की जिम्मेदारी सौंपी तथा उसके पुत्र विनायकराव को पेशवा घोषित कराया। इससे बाजीराव द्वितीय की राजनीतिक स्थिति लगभग समाप्त हो गई।
➣ दूसरी ओर पराजित बाजीराव द्वितीय पहले रायगढ़ पहुँचा और वहाँ से अंग्रेजों की शरण लेने के लिए बसीन (वसई) चला गया। जहाँ उसने अग्रेंजो से उसने बसीन की संधि (1802 ई.) की।
बसीन की संधि (1802 ई.)
➣ 25 अक्टूबर 1802 ई. को हड़पसर के युद्ध में जसवंतराव होल्कर से पराजित होने के बाद बाजीराव द्वितीय पूना छोड़कर पहले रायगढ़ और बाद में बसीन (वसई) पहुँच गया।
➣ अपनी खोई हुई सत्ता पुनः प्राप्त करने के लिए बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेजों से सहायता माँगने का निर्णय लिया। अंग्रेजों ने भी इसे मराठा राजनीति में हस्तक्षेप करने का सुनहरा अवसर माना।
➣ उस समय भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड वेलेजली की नीति भारतीय राज्यों को सहायक सन्धि के माध्यम से अंग्रेजी प्रभाव में लाने की थी। इसलिए उसने बाजीराव द्वितीय की सहायता का प्रस्ताव तुरंत स्वीकार कर लिया।
➣ 31 दिसम्बर 1802 ई. को बाजीराव द्वितीय और लॉर्ड वेलेजली के बीच बसीन (बसई) की संधि सम्पन्न हुई। इस संधि के द्वारा पेशवा ने अंग्रेजों की सहायक सन्धि स्वीकार कर ली।
संधि की प्रमुख शर्तें
➣ अंग्रेजों ने बाजीराव द्वितीय को पुनः पूना की गद्दी पर बैठाने का वचन दिया।
➣ बदले में पेशवा ने अपने राज्य में अंग्रेजों की 6,000 सैनिकों की एक सहायक सेना रखने तथा उसके व्यय का भार स्वयं वहन करने की शर्त स्वीकार की।
➣ बाजीराव द्वितीय ने यह भी स्वीकार किया कि वह अंग्रेजों की अनुमति के बिना किसी अन्य भारतीय राज्य अथवा विदेशी शक्ति से कोई राजनीतिक सम्बन्ध या संधि नहीं करेगा।
➣ उसने अपनी सेवा से सभी यूरोपीय अधिकारियों को हटाने, सूरत तथा बड़ौदा पर अपने दावे छोड़ने तथा आवश्यकता पड़ने पर अंग्रेजों को क्षेत्रीय आय उपलब्ध कराने की शर्तें भी स्वीकार कर लीं।
सन्धि का महत्व
➣ बसीन की संधि मराठा इतिहास की सबसे विवादास्पद संधियों में से एक मानी जाती है। इस संधि के द्वारा पेशवा अंग्रेजों के संरक्षण में आ गया और मराठा संघ की स्वतंत्र विदेश नीति का अंत हो गया।
➣ सिंधिया, भोंसले तथा होल्कर जैसे प्रमुख मराठा सरदारों ने इस संधि का तीव्र विरोध किया। यही विरोध आगे चलकर द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805 ई.) का मुख्य कारण बना।
बाजीराव द्वितीय अंग्रेजों की सहायक सन्धि स्वीकार करने वाला प्रथम मराठा पेशवा था।
इतिहासकारों के मत
| इतिहासकार | मत |
|---|---|
| सिडनी ओवेन | इस संधि ने प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारत का साम्राज्य प्रदान कर दिया।” |
| बी. आर. सरदेसाई | बसीन की संधि ने शिवाजी द्वारा स्थापित मराठा स्वतंत्रता का अंत कर दिया।” |
| आर्थर वेलेजली | यह संधि एक ऐसे व्यक्ति के साथ की गई थी, जो अपनी शक्ति के बल पर अपना राज्य बचाने में असमर्थ था।” |
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध का प्रारम्भ (1803-1805 ई.)
➣ बसीन की संधि (31 दिसम्बर 1802 ई.) ने मराठा संघ की एकता को गम्भीर आघात पहुँचाया। दौलतराव सिंधिया, रघुजी भोंसले द्वितीय तथा जसवंतराव होल्कर जैसे प्रमुख मराठा सरदारों ने इस संधि को मराठा स्वतंत्रता के विरुद्ध माना और इसका तीव्र विरोध किया।
➣ दूसरी ओर लॉर्ड वेलेजली ने बसीन की संधि के आधार पर बाजीराव द्वितीय को पुनः पूना की गद्दी पर बैठा दिया। इससे मराठा संघ दो स्पष्ट गुटों में विभाजित हो गया और अंग्रेजों तथा मराठों के बीच युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई।
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के प्रमुख युद्ध एवं संधियाँ
➣ 1803 ई. में अंग्रेजों और मराठों के बीच द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध प्रारम्भ हुआ। इस युद्ध में अंग्रेजों का मुख्य उद्देश्य मराठा संघ की सैन्य शक्ति को कमजोर करना तथा भारत में अपनी राजनीतिक सर्वोच्चता स्थापित करना था।
➣ इस संघर्ष में मराठा पक्ष की प्रमुख शक्तियाँ दौलतराव सिंधिया (ग्वालियर) और रघुजी भोंसले द्वितीय (नागपुर) थीं। जसवंतराव होल्कर ने युद्ध के प्रारम्भिक चरण में इसमें भाग नहीं लिया और बाद में अंग्रेजों से अलग संघर्ष किया।
➣ इस युद्ध के दौरान क्रमशः लॉर्ड वेलेजली, लॉर्ड कॉर्नवालिस तथा सर जॉर्ज बार्लो भारत के गवर्नर-जनरल रहे। युद्ध के प्रमुख सैन्य अभियानों का नेतृत्व आर्थर वेलेजली (दक्षिण भारत) तथा लॉर्ड लेक (उत्तर भारत) ने किया।
➣ दक्षिण भारत में आर्थर वेलेजली तथा उत्तर भारत में लॉर्ड लेक के नेतृत्व में अंग्रेजों ने अलग-अलग सैन्य अभियान चलाए। मराठा सरदार संयुक्त रूप से अंग्रेजों का सामना नहीं कर सके, जिसके कारण अंग्रेजों को एक-एक करके उनकी प्रमुख शक्तियों को पराजित करने का अवसर मिल गया।
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध का प्रमुख कारण बसीन की संधि (1802 ई.) थी।
अरगाँव का युद्ध (1803 ई.)
➣ दक्षिण भारत में आर्थर वेलेजली के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने 29 नवम्बर 1803 ई. को अरगाँव के युद्ध में अंग्रेजों ने रघुजी भोंसले द्वितीय तथा दौलतराव सिंधिया की संयुक्त सेना को पराजित कर दिया।
➣ अरगाँव की पराजय ने नागपुर के भोंसले शासक की शक्ति को गम्भीर रूप से कमजोर कर दिया और उसे अंग्रेजों के साथ संधि करने के लिए विवश होना पड़ा।
देवगाँव की संधि (17 दिसम्बर 1803 ई.)
➣ अरगाँव के युद्ध में पराजित होने के बाद रघुजी भोंसले द्वितीय ने 17 दिसम्बर 1803 ई. को अंग्रेजों के साथ देवगाँव की संधि की।
➣ इस संधि के अनुसार भोंसले ने कटक, बालासोर तथा वर्धा नदी के पश्चिम के कुछ क्षेत्रों पर अपना अधिकार छोड़ दिया।
➣ इसके अतिरिक्त उसने अंग्रेजों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने तथा उनकी राजनीतिक सर्वोच्चता स्वीकार करने पर सहमति व्यक्त की।
लसवाड़ी का युद्ध (1 नवम्बर 1803 ई.)
➣ दूसरी तरफ उत्तर भारत में लॉर्ड लेक के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने 1 नवम्बर 1803 ई. को लसवाड़ी के युद्ध में दौलतराव सिंधिया की सेना को पराजित किया।
➣ यह युद्ध उत्तर भारत में अंग्रेजों की सबसे महत्वपूर्ण विजयों में से एक माना जाता है। इसके बाद सिंधिया की सैन्य शक्ति को भारी आघात पहुँचा और उत्तर भारत में अंग्रेजों का प्रभाव तेजी से बढ़ने लगा।
सुरजी-अर्जुनगाँव की संधि (30 दिसम्बर 1803 ई.)
➣ लसवाड़ी सहित लगातार हुई पराजयों के बाद दौलतराव सिंधिया ने 30 दिसम्बर 1803 ई. को अंग्रेजों के साथ सुरजी-अर्जुनगाँव की संधि की।
➣ इस संधि के अंतर्गत सिंधिया ने गंगा-यमुना दोआब, दिल्ली-आगरा क्षेत्र, बुन्देलखण्ड के कुछ भाग तथा गुजरात के कुछ क्षेत्रों पर अपना अधिकार छोड़ दिया। इसके साथ ही उसने अंग्रेजों की राजनीतिक सर्वोच्चता स्वीकार कर ली।
युद्ध का प्रभाव
➣ देवगाँव तथा सुरजी-अर्जुनगाँव की संधियों के बाद मराठा संघ की दो प्रमुख शक्तियाँ-भोंसले और सिंधिया-अंग्रेजों के सामने झुक गईं। अब केवल जसवंतराव होल्कर ही अंग्रेजों का डटकर विरोध कर रहे थे।
➣ परिणामस्वरूप द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध का अगला चरण मुख्यतः जसवंतराव होल्कर और अंग्रेजों के बीच संघर्ष के रूप में विकसित हुआ।
जसवंतराव होल्कर का संघर्ष एवं द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध का समापन
➣ दौलतराव सिंधिया और रघुजी भोंसले द्वितीय के अंग्रेजों से संधि कर लेने के बाद भी जसवंतराव होल्कर ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार नहीं की। उसने स्वतंत्र रूप से अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा।
➣ होल्कर का उद्देश्य मराठा स्वाधीनता की रक्षा करना तथा अंग्रेजों के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को रोकना था। इसलिए उसने अंग्रेजों की सेना का अनेक स्थानों पर डटकर सामना किया।
मुकन्द दर्रा का युद्ध (1804 ई.)
➣ 1804 ई. में जसवंतराव होल्कर और अंग्रेजों के बीच मुकन्द दर्रा (मुकुंदरा दर्रा) के क्षेत्र में संघर्ष हुआ। इस युद्ध में कर्नल मॉनसन के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना को होल्कर ने करारी पराजय दी।
➣ पराजय के बाद कर्नल मॉनसन को अपनी सेना सहित कठिन परिस्थितियों में पीछे हटना पड़ा। इस घटना को इतिहास में मॉनसन की वापसी के नाम से भी जाना जाता है। यह अंग्रेजों के लिए अत्यन्त अपमानजनक सैन्य पराजयों में से एक मानी जाती है।
➣ इस विजय से जसवंतराव होल्कर का मनोबल बहुत बढ़ गया। दूसरी ओर अंग्रेजों को यह अनुभव हुआ कि मराठा सेना अभी भी उनका प्रभावी ढंग से सामना करने में सक्षम है।
भरतपुर के जाटों का सहयोग
➣ मुकन्द दर्रा की विजय के बाद जसवंतराव होल्कर उत्तर भारत की ओर बढ़ा, जहाँ उसे भरतपुर के जाट शासक महाराजा रणजीत सिंह का समर्थन प्राप्त हुआ।
➣ होल्कर को भरतपुर में शरण मिलने से अंग्रेज चिंतित हो गए। फलस्वरूप 1805 ई. में लॉर्ड लेक ने भरतपुर के दुर्ग पर कई बार आक्रमण किया, किन्तु प्रत्येक प्रयास विफल रहा।
➣ भरतपुर का दुर्ग अंग्रेजों के लिए अभेद्य सिद्ध हुआ और उन्हें बिना सफलता के वापस लौटना पड़ा। भरतपुर अभियान की असफलता से अंग्रेजों की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचा, जबकि जसवंतराव होल्कर और भरतपुर के जाटों की वीरता की व्यापक प्रशंसा हुई।
राजपुर घाट की संधि (24 दिसम्बर 1805 ई.)
➣ भरतपुर अभियान की असफलता के बाद भी जसवंतराव होल्कर और अंग्रेजों के बीच संघर्ष कुछ समय तक जारी रहा। दोनों पक्षों को लगातार युद्ध के कारण जन-धन की भारी हानि उठानी पड़ रही थी, इसलिए अंततः समझौते का मार्ग अपनाया गया।
➣ 24 दिसम्बर 1805 ई. को जसवंतराव होल्कर और अंग्रेजों की ओर से सर जॉर्ज बार्लो के बीच राजपुर घाट की संधि सम्पन्न हुई। इस संधि के साथ ही द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805 ई.) का समापन हो गया।
➣ संधि के अनुसार जसवंतराव होल्कर ने चम्बल नदी के उत्तर के क्षेत्रों तथा टोंक, रामपुरा, बूँदी एवं बुन्देलखण्ड पर अपने दावे छोड़ दिए। बदले में अंग्रेजों ने होल्कर के शेष राज्य पर उसके अधिकार को मान्यता प्रदान की।
➣ यद्यपि इस संधि के बाद युद्ध समाप्त हो गया, फिर भी अंग्रेज मराठा संघ की आन्तरिक दुर्बलताओं का पूरा लाभ उठा चुके थे। अब मराठा राज्यों की राजनीतिक शक्ति पहले की अपेक्षा काफी कमजोर हो गई थी और भारत में अंग्रेजों का प्रभाव निरन्तर बढ़ता चला गया।
जसवंतराव होल्कर द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध में अंग्रेजों के विरुद्ध अन्त तक संघर्ष करने वाले प्रमुख मराठा नेता थे। राजपुर घाट की संधि (1805 ई.) के साथ द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध का समापन हुआ।
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के परिणाम एवं महत्व
अंग्रेजी शक्ति का विस्तार➣ द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805 ई.) में विजय के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी। मराठा संघ की एकता लगभग समाप्त हो गई और उसके प्रमुख सरदार अंग्रेजों के प्रभाव में आ गए।
➣ इस युद्ध के परिणामस्वरूप अंग्रेजों का प्रभाव दिल्ली, आगरा, बुन्देलखण्ड, कटक तथा भारत के अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक फैल गया। इससे कम्पनी का राजनीतिक और सामरिक प्रभुत्व अत्यधिक बढ़ गया।
➣ लॉर्ड लेक की सफल सैन्य कार्रवाइयों के परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने 1803 ई. में दिल्ली पर अधिकार स्थापित कर लिया। इसके साथ ही मुगल साम्राज्य की शेष राजनीतिक शक्ति भी लगभग समाप्त हो गई।
➣ मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय अंग्रेजों के संरक्षण में आ गया और जीवन के शेष समय तक ईस्ट इंडिया कम्पनी का पेंशनभोगी बनकर रहा। इससे मुगल साम्राज्य केवल नाममात्र का रह गया।
मराठा संघ पर प्रभाव➣ द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद सिंधिया, भोंसले तथा अन्य प्रमुख मराठा सरदारों की शक्ति में उल्लेखनीय कमी आ गई। यद्यपि वे अपने-अपने राज्यों के शासक बने रहे, किन्तु उनकी स्वतंत्र विदेश नीति और राजनीतिक प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा।
➣ मराठा सरदारों की पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता और अंग्रेजों की कूटनीति ने मराठा संघ को स्थायी रूप से कमजोर कर दिया। यही दुर्बलता आगे चलकर तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-1818 ई.) में मराठों की अंतिम पराजय का प्रमुख कारण बनी।
ऐतिहासिक महत्व➣ द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। इस युद्ध के बाद अंग्रेजों का प्रभुत्व उत्तर भारत और मध्य भारत तक स्थापित हो गया तथा भारत में उनकी सर्वोच्चता लगभग निर्विवाद हो गई।
➣ यद्यपि मराठा साम्राज्य का पूर्ण अंत अभी नहीं हुआ था, फिर भी इस युद्ध ने उसके राजनीतिक पतन की प्रक्रिया को अत्यधिक तेज कर दिया। इसके बाद अंग्रेजों के सामने मराठा शक्ति अंतिम बार तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध में चुनौती बनकर उभरी।
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद दिल्ली पर अंग्रेजों का अधिकार स्थापित हो गया, शाह आलम द्वितीय कम्पनी का पेंशनभोगी बन गया।
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध की पृष्ठभूमि (1817 ई.)
लॉर्ड हेस्टिंग्स की नीति
➣ 1813 ई. में लॉर्ड हेस्टिंग्स भारत का गवर्नर-जनरल बना। उसका उद्देश्य भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी की सर्वोच्चता को पूर्ण रूप से स्थापित करना तथा उन सभी भारतीय शक्तियों को समाप्त करना था, जो अंग्रेजी प्रभुत्व के लिए चुनौती बनी हुई थीं।
➣ इसी उद्देश्य से उसने अधीनस्थ पृथक्करण की नीति अपनाई। इस नीति के अंतर्गत मराठा सरदारों को एक-दूसरे से अलग-थलग कर उनकी संयुक्त शक्ति को समाप्त करने का प्रयास किया गया।
पिंडारियों के विरुद्ध अभियान
➣ उस समय मध्य भारत में पिंडारी नामक लुटेरे दल अत्यधिक सक्रिय थे। वे विभिन्न मराठा सरदारों के संरक्षण में रहकर लूटपाट करते थे तथा अंग्रेजी क्षेत्रों पर भी आक्रमण करते थे।
➣ लॉर्ड हेस्टिंग्स ने पिंडारियों के दमन के लिए व्यापक सैन्य अभियान प्रारम्भ किया। इस अभियान के दौरान अंग्रेजी सेना ने मराठा राज्यों को चारों ओर से घेर लिया, जिससे मराठा सरदारों पर अंग्रेजों का राजनीतिक दबाव बढ़ने लगा।
➣ अंग्रेजों का आरोप था कि कुछ मराठा सरदार प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से पिंडारियों को संरक्षण दे रहे हैं। इसी बहाने अंग्रेजों ने मराठा राज्यों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप बढ़ाया और विशेष रूप से बाजीराव द्वितीय पर नई संधि स्वीकार करने का दबाव बनाया।
पूना की संधि (13 जून 1817 ई.)
➣ बढ़ते अंग्रेजी दबाव तथा प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण 13 जून 1817 ई. को बाजीराव द्वितीय को अंग्रेजों के साथ पूना की संधि करने के लिए विवश होना पड़ा।
➣ इस संधि के अंतर्गत बाजीराव द्वितीय ने मराठा संघ के प्रधान (पेशवा) के रूप में अपने विशेष अधिकारों का परित्याग कर दिया।
➣ साथ ही उसने अनेक क्षेत्रों को अंग्रेजों को सौंप दिया तथा अंग्रेजों की अनुमति के बिना किसी अन्य भारतीय शक्ति से राजनीतिक संबंध न रखने की शर्त स्वीकार की।
➣ इस संधि ने पेशवा की राजनीतिक शक्ति को अत्यधिक सीमित कर दिया और मराठा संघ की एकता लगभग समाप्त हो गई।
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के प्रमुख युद्ध (1817-1818 ई.)
➣ पूना की संधि और पिंडारियों के विरुद्ध अंग्रेजी अभियान से बाजीराव द्वितीय तथा अन्य मराठा सरदार अत्यंत असंतुष्ट हो गए। उन्हें विश्वास हो गया कि अंग्रेज अब सम्पूर्ण मराठा साम्राज्य को समाप्त करना चाहते हैं।
➣ परिणामस्वरूप बाजीराव द्वितीय, भोंसले तथा होल्कर ने अंग्रेजों के विरुद्ध पुनः संघर्ष का निर्णय लिया। इसी संघर्ष ने आगे चलकर तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-1818 ई.) का रूप धारण किया।
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध का प्रमुख कारण लॉर्ड हेस्टिंग्स की विस्तारवादी नीति, पिंडारियों के विरुद्ध अभियान तथा पूना की संधि (13 जून 1817 ई.) थी।
किर्की का युद्ध (5 नवम्बर 1817 ई.)
➣ 5 नवम्बर 1817 ई. को पेशवा बाजीराव द्वितीय और अंग्रेजों के बीच किर्की (खड़की) का युद्ध हुआ। इस युद्ध में अंग्रेजी सेना ने मराठा सेना को पराजित कर पूना पर अधिकार स्थापित कर लिया।
➣ इस युद्ध में बाजीराव द्वितीय की ओर से बापू गोखले प्रमुख सेनानायक थे। किर्की की पराजय के बाद पेशवा को पूना छोड़कर भागना पड़ा और मराठा शक्ति को गहरा आघात पहुँचा।
ग्वालियर की संधि (5 नवम्बर 1817 ई.)
➣ लॉर्ड हेस्टिंग्स अच्छी तरह जानता था कि यदि दौलतराव सिंधिया, पेशवा, होल्कर तथा भोंसले एकजुट हो गए, तो अंग्रेजों के लिए मराठों को पराजित करना कठिन हो जाएगा। इसलिए उसने कूटनीति अपनाकर सबसे पहले सिंधिया को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया।
➣ इसी उद्देश्य से 5 नवम्बर 1817 ई. को दौलतराव सिंधिया और अंग्रेजों के बीच ग्वालियर की संधि सम्पन्न हुई।
➣ इस संधि के अनुसार सिंधिया ने पिंडारियों के विरुद्ध अंग्रेजों को सहयोग देने, अंग्रेजों की अनुमति के बिना अन्य मराठा सरदारों का साथ न देने तथा अंग्रेजों के विरोध में किसी भी प्रकार की सहायता न देने का वचन दिया।
➣ इस संधि के परिणामस्वरूप दौलतराव सिंधिया तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध से अलग हो गया।
➣ इससे मराठों की संयुक्त शक्ति कमजोर पड़ गई और अंग्रेजों को पेशवा, भोंसले तथा होल्कर को अलग-अलग पराजित करने का अवसर मिल गया।
सीताबर्डी का युद्ध (26-27 नवम्बर 1817 ई.)
➣ पूना में पेशवा के विद्रोह के बाद नागपुर के शासक अप्पा साहब भोंसले ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का निर्णय लिया। उसका उद्देश्य मराठा शक्ति को पुनः संगठित कर अंग्रेजों के बढ़ते प्रभुत्व का विरोध करना था।
➣ फलस्वरूप 26-27 नवम्बर 1817 ई. को नागपुर के निकट सीताबर्डी का युद्ध अप्पा साहब भोंसले और अंग्रेजों के बीच हुआ। इस युद्ध में अंग्रेज विजयी रहे तथा नागपुर पर उनका प्रभाव स्थापित हो गया।
➣ सीताबर्डी की पराजय के बाद भोंसले की सैन्य एवं राजनीतिक शक्ति लगभग समाप्त हो गई और उसे अंग्रेजों की शर्तें स्वीकार करने के लिए विवश होना पड़ा।
बड़ौदा की संधि (1817 ई.)
➣ सीताबर्डी के युद्ध के समय अंग्रेजों ने मराठा संघ की अन्य शाखाओं को भी अपने प्रभाव में लाने का प्रयास किया। इसी क्रम में बड़ौदा के शासक आनंदराव गायकवाड़ को अंग्रेजों के साथ संधि करने के लिए विवश किया गया।
➣ 1817 ई. में आनंदराव गायकवाड़ और अंग्रेजों के बीच बड़ौदा की संधि सम्पन्न हुई। इस संधि द्वारा गायकवाड़ ने अंग्रेजों की सर्वोच्चता स्वीकार कर ली तथा उनकी अधीनता में रहने पर सहमति व्यक्त की।
➣ इस संधि के बाद गायकवाड़ राज्य अंग्रेजों का सहयोगी बन गया। फलस्वरूप मराठा संघ की एक और प्रमुख शक्ति अंग्रेजों के प्रभाव में चली गई और मराठों की सामूहिक शक्ति और अधिक कमजोर हो गई।
महीदपुर का युद्ध (21 दिसम्बर 1817 ई.)
➣ पेशवा और भोंसले की पराजय के बाद भी होल्कर राज्य अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्षरत रहा। अंग्रेज मराठा संघ के अंतिम शक्तिशाली प्रतिरोध को भी समाप्त करना चाहते थे।
➣ इसी उद्देश्य से 21 दिसम्बर 1817 ई. को महीदपुर के निकट होल्कर की सेना और अंग्रेजों के बीच निर्णायक युद्ध हुआ। इस युद्ध में अंग्रेजों ने विजय प्राप्त की और होल्कर राज्य की सैन्य शक्ति को गम्भीर क्षति पहुँची।
➣ महीदपुर की पराजय के बाद होल्कर अंग्रेजों के साथ संधि करने के लिए विवश हो गया, जिससे मराठों का संगठित प्रतिरोध लगभग समाप्त हो गया।
मन्दसौर की संधि (6 जनवरी 1818 ई.)
➣ महीदपुर के युद्ध में पराजय के बाद 6 जनवरी 1818 ई. को होल्कर राज्य और अंग्रेजों के बीच मन्दसौर की संधि सम्पन्न हुई।
➣ इस संधि के अनुसार होल्कर ने अंग्रेजों की सहायक संधि स्वीकार कर ली तथा अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का परित्याग कर दिया।
➣ इसके अतिरिक्त होल्कर ने राजपूत राज्यों पर अपना दावा छोड़ दिया, नर्मदा नदी के दक्षिण के कुछ क्षेत्रों को अंग्रेजों को सौंप दिया तथा अंग्रेजों की अनुमति के बिना किसी अन्य राज्य से राजनीतिक सम्बन्ध न रखने की शर्त स्वीकार की।
➣ मन्दसौर की संधि के साथ ही होल्कर राज्य भी अंग्रेजों के प्रभाव में आ गया और मराठा संघ की एक अन्य प्रमुख शक्ति अंग्रेजों के अधीन हो गई।
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध में पेशवा, भोंसले तथा होल्कर ने अंग्रेजों का प्रत्यक्ष रूप से सामना किया, जबकि सिंधिया ने ग्वालियर की संधि कर युद्ध से स्वयं को अलग कर लिया।
किर्की, सीताबर्डी तथा महीदपुर तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के तीन प्रमुख युद्ध थे। इन युद्धों में अंग्रेजों की विजय ने मराठा संघ के अंतिम प्रतिरोध को भी समाप्त कर दिया।
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध का अंत
कोरेगाँव का युद्ध (1 जनवरी 1818 ई.)
➣ किर्की के युद्ध में पराजित होने के बाद भी बाजीराव द्वितीय ने संघर्ष जारी रखा। 1 जनवरी 1818 ई. को कोरेगाँव में मराठा सेना और अंग्रेजों के बीच एक भीषण युद्ध हुआ।
➣ यद्यपि मराठा सेना संख्या में अधिक थी, फिर भी अंग्रेजी सेना ने अपने मोर्चे को बनाए रखा। इस युद्ध के बाद बाजीराव द्वितीय की स्थिति और अधिक कमजोर हो गई तथा अंग्रेजों का मनोबल बढ़ गया।
अष्टी का युद्ध (20 फरवरी 1818 ई.)
➣ 20 फरवरी 1818 ई. को अष्टी (Ashti) के युद्ध में अंग्रेजों ने पुनः मराठा सेना को पराजित किया। इस युद्ध में पेशवा के प्रमुख सेनानायक बापू गोखले वीरगति को प्राप्त हुए।
➣ बापू गोखले की मृत्यु से बाजीराव द्वितीय की सैन्य शक्ति को गहरा आघात पहुँचा और उसके लिए युद्ध जारी रखना अत्यन्त कठिन हो गया।
बाजीराव द्वितीय का आत्मसमर्पण
➣ लगातार पराजयों के बाद 3 जून 1818 ई. को बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेज अधिकारी सर जॉन मैल्कम के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इसके साथ ही तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध का प्रभावी अंत हो गया।
➣ आत्मसमर्पण के पश्चात् अंग्रेजों ने बाजीराव द्वितीय को वार्षिक लगभग 8 लाख रुपये की पेंशन प्रदान की तथा उसे कानपुर के निकट बिठूर में रहने के लिए भेज दिया। वहीं 1853 ई. में उसकी मृत्यु हुई।
➣ बाजीराव द्वितीय के आत्मसमर्पण के बाद अंग्रेजों ने पेशवा का पद सदा के लिए समाप्त कर दिया। इसके साथ ही मराठा संघ की केंद्रीय सत्ता का भी अंत हो गया।
➣ अंग्रेजों ने शिवाजी के वंशज प्रताप सिंह को सतारा का शासक नियुक्त किया, किन्तु उसे अंग्रेजों के अधीन एक आश्रित शासक के रूप में शासन करना पड़ा।
मराठा साम्राज्य का पतन
➣ तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध की समाप्ति के साथ ही मराठा साम्राज्य का राजनीतिक प्रभुत्व समाप्त हो गया। अब भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी की सर्वोच्चता लगभग निर्विवाद हो चुकी थी।
➣ मराठों की पराजय का मुख्य कारण उनकी आन्तरिक फूट, विभिन्न सरदारों के बीच एकता का अभाव, अंग्रेजों की श्रेष्ठ कूटनीति, आधुनिक सैन्य संगठन तथा सहायक संधियों की नीति थी।
➣ मराठा साम्राज्य के पतन के बाद अंग्रेजों के मार्ग की सबसे बड़ी राजनीतिक बाधा समाप्त हो गई और सम्पूर्ण भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का मार्ग लगभग प्रशस्त हो गया।
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-1818 ई.) के परिणामस्वरूप पेशवा पद समाप्त कर दिया गया।
बाजीराव द्वितीय (1796-1818 ई.) : Quick Revision
| विषय | तथ्य |
|---|---|
| शासनकाल | 1796-1818 ई. |
| परिचय | मराठा साम्राज्य का अंतिम पेशवा, रघुनाथराव (राघोबा) का पुत्र। |
| पूर्ववर्ती पेशवा | माधवराव द्वितीय (सवाई माधवराव) |
| प्रमुख कमजोरी | मराठा सरदारों में एकता बनाए रखने में असफल रहा। |
| 1800 ई. | नाना फड़नवीस की मृत्यु; इसके बाद मराठा संघ में आंतरिक संघर्ष तेज हो गया। |
| 1801 ई. | विठोजी होल्कर की हत्या। |
| 25 अक्टूबर 1802 ई. | हड़पसर का युद्ध – जसवंतराव होल्कर ने पेशवा एवं सिंधिया की संयुक्त सेना को पराजित किया। |
| 31 दिसम्बर 1802 ई. | बसीन (बसई) की संधि; बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेजों की सहायक संधि स्वीकार की। |
| विशेष तथ्य | अंग्रेजों की सहायक संधि स्वीकार करने वाला प्रथम मराठा पेशवा था। |
| 1803-1805 ई. | द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध |
| प्रमुख युद्ध | अरगाँव, लसवाड़ी एवं मुकन्द दर्रा। |
| प्रमुख संधियाँ | देवगाँव, सुरजी-अर्जुनगाँव एवं राजपुर घाट। |
| द्वितीय युद्ध का परिणाम | दिल्ली पर अंग्रेजों का अधिकार स्थापित हुआ तथा शाह आलम द्वितीय अंग्रेजों का पेंशनभोगी बन गया। |
| 1817-1818 ई. | तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध |
| प्रमुख युद्ध | किर्की, सीताबर्डी, महीदपुर, कोरेगाँव एवं अष्टी। |
| प्रमुख संधियाँ | पूना, ग्वालियर, बड़ौदा एवं मन्दसौर। |
| 3 जून 1818 ई. | सर जॉन मैल्कम के समक्ष बाजीराव द्वितीय ने आत्मसमर्पण किया। |
| 1818 ई. | अंग्रेजों ने पेशवा पद समाप्त कर दिया। |
| निर्वासन | बाजीराव द्वितीय को बिठूर (कानपुर) में पेंशन पर रहने के लिए भेज दिया गया। |
| मृत्यु | 1853 ई., बिठूर में। |
| सतारा का शासक | शिवाजी के वंशज प्रताप सिंह को सतारा का शासक बनाया गया। |
| ऐतिहासिक महत्व | बाजीराव द्वितीय के शासनकाल में मराठा साम्राज्य का पतन हुआ तथा भारत में अंग्रेजों की सर्वोच्चता स्थापित हुई। |
नाना साहब (धोंडूपंत)
➣ नाना साहब का वास्तविक नाम धोंडूपंत था। उनके पिता का नाम माधव नारायण भट्ट था, जो मराठा पेशवा बाजीराव द्वितीय के सगोत्र संबंधी थे।
➣ 1818 ई. में तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद अंग्रेजों ने पेशवा का पद समाप्त कर दिया और बाजीराव द्वितीय को पेंशन देकर बिठूर (कानपुर) में रहने के लिए भेज दिया। इसी समय माधव नारायण भट्ट भी अपने परिवार सहित बिठूर में रहने लगे।
➣ बाजीराव द्वितीय की कोई संतान नहीं थी। इसलिए उन्होंने धोंडूपंत को गोद लेकर अपना दत्तक पुत्र बना लिया। गोद लिए जाने के बाद धोंडूपंत नाना साहब के नाम से प्रसिद्ध हुए।
➣ बिठूर में नाना साहब का पालन-पोषण मराठा राजपरिवार के अनुरूप हुआ। उन्होंने शस्त्र-विद्या, घुड़सवारी तथा प्रशासन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसी वातावरण में उनकी मित्रता तात्या टोपे से भी हुई, जो आगे चलकर 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानायकों में से एक बने।
पेंशन का विवाद
➣ 28 जनवरी 1851 ई. को बाजीराव द्वितीय की मृत्यु हो गई। अपने जीवनकाल में उन्हें अंग्रेजी सरकार द्वारा प्रतिवर्ष लगभग 8 लाख रुपये की पेंशन प्रदान की जाती थी।
➣ बाजीराव द्वितीय की मृत्यु के बाद नाना साहब ने स्वयं को उनका वैध उत्तराधिकारी मानते हुए इस पेंशन को जारी रखने की माँग की।
लॉर्ड डलहौजी की नीति
➣ उस समय भारत का गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी था, जो अपनी राज्य हड़प नीति (Doctrine of Lapse) तथा विस्तारवादी नीतियों के लिए प्रसिद्ध था।
➣ डलहौजी ने यह कहते हुए नाना साहब की माँग अस्वीकार कर दी कि दत्तक पुत्र को बाजीराव द्वितीय की व्यक्तिगत पेंशन प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। परिणामस्वरूप नाना साहब और अंग्रेजी सरकार के बीच गहरा विवाद उत्पन्न हो गया।
➣ अंग्रेजों के इस निर्णय से नाना साहब अत्यंत असंतुष्ट हो गए। यही पेंशन विवाद आगे चलकर अंग्रेजों के प्रति उनके गहरे असंतोष का प्रमुख कारण बना और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उनकी सक्रिय भागीदारी की पृष्ठभूमि तैयार हुई।
अजीमुल्ला ख़ाँ का लंदन मिशन
➣ लॉर्ड डलहौजी द्वारा पेंशन बंद किए जाने के बाद नाना साहब ने अपने विश्वस्त सहयोगी एवं सचिव अजीमुल्ला ख़ाँ को 1853 ई. में इंग्लैंड भेजा।
➣ उनका उद्देश्य अंग्रेजी सरकार से बाजीराव द्वितीय की पेंशन पुनः बहाल कराने का प्रयास करना था।
➣ अजीमुल्ला ख़ाँ ने लंदन में ईस्ट इंडिया कम्पनी तथा ब्रिटिश अधिकारियों के समक्ष नाना साहब का पक्ष रखा, किन्तु उनके सभी प्रयास असफल रहे। अंग्रेजों ने पेंशन बहाल करने से स्पष्ट इनकार कर दिया।
➣ इस असफलता के बाद नाना साहब का विश्वास अंग्रेजी सरकार से पूरी तरह उठ गया। उन्होंने यह समझ लिया कि अंग्रेज भारतीय शासकों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा करने के इच्छुक नहीं हैं।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका
➣ अजीमुल्ला ख़ाँ के लंदन मिशन की असफलता के बाद नाना साहब का अंग्रेजों के प्रति असंतोष और अधिक बढ़ गया।
➣ जब 1857 ई. में भारत के विभिन्न भागों में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह प्रारम्भ हुआ, तब नाना साहब ने भी इसमें सक्रिय रूप से भाग लेने का निर्णय लिया।
➣ नाना साहब ने अपने विश्वस्त सेनानायक तात्या टोपे तथा अन्य क्रांतिकारियों के सहयोग से कानपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया।
➣ जून 1857 ई. में क्रांतिकारियों ने कानपुर में अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी और कुछ समय के लिए कानपुर पर अधिकार स्थापित कर लिया। इसके बाद नाना साहब को वहाँ के विद्रोह का प्रमुख नेता माना जाने लगा।
➣ कानपुर में नाना साहब के नेतृत्व में हुआ विद्रोह 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक माना जाता है और इससे उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों में भी क्रांतिकारियों का उत्साह बढ़ा।
कानपुर पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार
➣ कानपुर में नाना साहब की सफलता अधिक समय तक नहीं टिक सकी। अंग्रेजों ने मेजर जनरल हेनरी हेवलॉक के नेतृत्व में कानपुर पर पुनः अधिकार करने के लिए सैन्य अभियान प्रारम्भ किया।
➣ दोनों पक्षों के बीच भीषण संघर्ष हुआ, किन्तु अंग्रेजों की संगठित सेना और बेहतर संसाधनों के सामने क्रांतिकारियों को पीछे हटना पड़ा। फलस्वरूप अंग्रेजों ने पुनः कानपुर पर अधिकार स्थापित कर लिया।
➣ कानपुर की पुनः विजय के बाद अंग्रेजों ने विद्रोहियों के विरुद्ध कठोर दमनात्मक कार्यवाही प्रारम्भ कर दी, जिससे नाना साहब और उनके सहयोगियों के लिए संघर्ष जारी रखना अत्यंत कठिन हो गया।
नेपाल की ओर प्रस्थान
➣ 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के असफल होने के बाद नाना साहब को अपने परिवार एवं निकट सहयोगियों के साथ नेपाल की ओर जाना पड़ा। इसके बाद वे अंग्रेजों की पकड़ में नहीं आए।
➣ नाना साहब के अंतिम जीवन के संबंध में इतिहासकारों के बीच मतभेद हैं। अधिकांश विवरणों के अनुसार उन्होंने नेपाल में शरण ली, किन्तु उनके जीवन के अंतिम वर्षों तथा मृत्यु के संबंध में कोई प्रमाणिक और सर्वमान्य ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
➣ नाना साहब 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेताओं में से एक थे। उन्होंने अंग्रेजों की अन्यायपूर्ण नीतियों का विरोध करते हुए कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व किया और भारतीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया।
➣ यद्यपि उनका प्रयास तत्काल सफल नहीं हो सका, फिर भी उनका योगदान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वे आज भी 1857 के महान क्रांतिकारी नेताओं में सम्मानपूर्वक स्मरण किए जाते हैं।
नाना साहब : Quick Revision
| विषय | तथ्य |
|---|---|
| वास्तविक नाम | धोंडूपंत |
| पिता | माधव नारायण भट्ट |
| दत्तक पिता | पेशवा बाजीराव द्वितीय |
| निवास | बिठूर (कानपुर) |
| पेंशन विवाद | लॉर्ड डलहौजी ने बाजीराव द्वितीय की पेंशन देने से इंकार किया |
| 1853 ई. | अजीमुल्ला ख़ाँ को पेंशन बहाली के लिए लंदन भेजा |
| 1857 ई. | तात्या टोपे के साथ कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व |
| अंग्रेजी सेनानायक | मेजर जनरल हेनरी हेवलॉक |
| विद्रोह के बाद | नेपाल की ओर प्रस्थान |
| ऐतिहासिक महत्व | 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारी नेता |
मराठों द्वारा की गई प्रमुख संधियाँ
| संधि | वर्ष | संधिकर्ता |
|---|---|---|
| पुरंदर की संधि | 1665 ई. | मिर्जा राजा जयसिंह एवं शिवाजी |
| ➣ पुरंदर की संधि (1665 ई.) शिवाजी और मुगलों के बीच हुई एक महत्वपूर्ण संधि थी, जिसके अंतर्गत शिवाजी ने 23 किले मुगलों को सौंपे तथा 12 किले अपने पास रखे। | ||
| मुगल-मराठा संधि (दिल्ली की संधि) | 1719 ई. | बालाजी विश्वनाथ एवं सैय्यद बंधु |
| ➣ 1719 ई. की इस संधि के माध्यम से मराठों ने पहली बार मुग़ल साम्राज्य के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप किया। इतिहासकार रिचर्ड टेम्पल ने इसे मराठा साम्राज्य का मैग्नाकार्टा कहा है। | ||
| मुंशी शिवगाँव (पालखेड़ा) की संधि | 1728 ई. | बाजीराव प्रथम एवं निजाम-उल-मुल्क |
| ➣ निजाम ने छत्रपति शाहू को मराठों का वैध एवं एकमात्र शासक स्वीकार किया। | ||
| दुरई-सराय (सिरोंज) की संधि | 1738 ई. | बाजीराव प्रथम एवं निजाम |
| ➣ मालवा सहित अनेक क्षेत्रों पर मराठों का अधिकार स्वीकार किया। | ||
| संगोला की संधि | 1750 ई. | बालाजी बाजीराव एवं राजाराम द्वितीय |
| ➣ संगोला की संधि के बाद मराठा साम्राज्य की वास्तविक सत्ता पेशवा के हाथों में आ गई तथा राजनीतिक केन्द्र सतारा से पुणे स्थानांतरित हो गया। | ||
| भलकी की संधि | 1752 ई. | बालाजी बाजीराव एवं हैदराबाद का निजाम |
| राक्षस-भुवन की संधि | 1763 ई. | माधवराव प्रथम एवं हैदराबाद का निजाम |
| कनकापुर की संधि | 1769 ई. | माधवराव प्रथम एवं जानोजी भोंसले |
| सूरत की संधि | 1775 ई. | रघुनाथराव एवं ईस्ट इंडिया कम्पनी |
| ➣ सूरत की संधि के परिणामस्वरूप प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.) प्रारम्भ हुआ। | ||
| पुरंदर की संधि | 1776 ई. | नाना फड़नवीस एवं अंग्रेज |
| बड़गाँव की संधि | 1779 ई. | मराठा संघ एवं अंग्रेज |
| सालबाई की संधि | 1782 ई. | माधवराव नारायण एवं अंग्रेज |
| ➣ सालबाई की संधि द्वारा प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध समाप्त हुआ तथा लगभग 20 वर्षों तक अंग्रेजों और मराठों के बीच शांति बनी रही। | ||
| बसीन (बसई) की संधि | 1802 ई. | बाजीराव द्वितीय एवं अंग्रेज |
| ➣ बसीन की संधि के परिणामस्वरूप द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805 ई.) प्रारम्भ हुआ। | ||
| देवगाँव की संधि | 1803 ई. | रघुजी भोंसले द्वितीय एवं अंग्रेज |
| सुरजी-अर्जुनगाँव की संधि | 1803 ई. | दौलतराव सिंधिया एवं अंग्रेज |
| राजपुर घाट की संधि | 1805 ई. | जसवंतराव होल्कर एवं अंग्रेज |
| नागपुर की संधि | 1816 ई. | अप्पा साहब भोंसले एवं अंग्रेज |
| पूना की संधि | 1817 ई. | बाजीराव द्वितीय एवं अंग्रेज |
| ➣ पूना की संधि के बाद तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-1818 ई.) प्रारम्भ हो गया। | ||
| ग्वालियर की संधि | 1817 ई. | दौलतराव सिंधिया एवं अंग्रेज |
| मन्दसौर की संधि | 1818 ई. | होल्कर एवं अंग्रेज |
| ➣ मन्दसौर की संधि (1818 ई.) के साथ होल्कर ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार कर ली। | ||
हिन्दू पद पादशाही
➣ हिन्दू पद पादशाही मराठा साम्राज्य की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं वैचारिक नीति थी, जिसका सर्वाधिक प्रचार-प्रसार पेशवा बाजीराव प्रथम (1720-1740 ई.) ने किया।
➣ इस नीति का उद्देश्य भारत में मराठा नेतृत्व के माध्यम से एक शक्तिशाली हिन्दू सत्ता की स्थापना करना था।
➣ ‘हिन्दू पद पादशाही’ का शाब्दिक अर्थ है- हिन्दू सत्ता या हिन्दू राज्य की सर्वोच्चता की स्थापना। इसके अंतर्गत यह विचार प्रस्तुत किया गया कि भारत में विदेशी प्रभुत्व को समाप्त कर सभी हिन्दू शक्तियों को एक मंच पर संगठित किया जाए।
➣ बाजीराव प्रथम का विश्वास था कि यदि राजपूत, जाट, बुन्देला तथा अन्य हिन्दू शासक मराठों के साथ मिलकर कार्य करें, तो सम्पूर्ण भारत में एक सशक्त हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की जा सकती है। इसी उद्देश्य से उन्होंने हिन्दू पद पादशाही के आदर्श का व्यापक प्रचार किया।
➣ इस नीति की सफलता के लिए आवश्यक था कि मराठे अन्य हिन्दू राज्यों के साथ मैत्री, समानता तथा सहयोग का व्यवहार करें, ताकि सभी शासक स्वयं को इस अभियान का सहभागी समझें।
➣ तीसरे पेशवा बालाजी बाजीराव (नाना साहब) ने अपने पिता की इस नीति को आगे नहीं बढ़ाया। उसने सम्पूर्ण हिन्दू समाज को संगठित करने के स्थान पर मराठा प्रभुत्व के विस्तार और आर्थिक लाभ पर अधिक ध्यान दिया।
➣ मराठा सेनाओं ने अनेक हिन्दू राज्यों से भी चौथ और अन्य कर वसूल किए तथा कई अवसरों पर उनके साथ कठोर व्यवहार किया। इससे अनेक हिन्दू शासकों में मराठों के प्रति असंतोष उत्पन्न हो गया।
परिणाम
➣ बालाजी बाजीराव की नीति के कारण हिन्दू पद पादशाही का मूल आदर्श धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया। मराठे अन्य हिन्दू राज्यों का स्थायी विश्वास और सहयोग प्राप्त नहीं कर सके।
➣ यही कारण था कि 1761 ई. के पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठों को राजपूतों, जाटों तथा सिखों का व्यापक सहयोग प्राप्त नहीं हुआ। इतिहासकार इसे मराठों की पराजय के महत्वपूर्ण कारणों में से एक मानते हैं।
➣ हिन्दू पद पादशाही का आदर्श पेशवा बाजीराव प्रथम ने लोकप्रिय बनाया था। किन्तु बालाजी बाजीराव द्वारा इस नीति का प्रभावी रूप से पालन न किए जाने के कारण यह आदर्श धीरे-धीरे समाप्त हो गया।
उत्तरकालीन विभिन्न मराठा समूह
मराठा संघ का उदय
➣ पेशवा बाजीराव प्रथम (1720-1740 ई.) ने मराठा साम्राज्य के तीव्र विस्तार के साथ प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए एक नई व्यवस्था अपनाई। उसने पारंपरिक मराठा सरदारों की शक्ति को सीमित करते हुए अपने विश्वसनीय सेनानायकों एवं समर्थकों को नव-विजित प्रदेशों का शासन सौंपना प्रारम्भ किया।
➣ इन सरदारों को अपने-अपने क्षेत्रों का प्रशासन, राजस्व संग्रह तथा सैन्य व्यवस्था संभालने का अधिकार दिया गया। यद्यपि वे अपने क्षेत्रों में पर्याप्त स्वायत्तता रखते थे, फिर भी वे नाममात्र के लिए छत्रपति तथा पेशवा की सर्वोच्चता स्वीकार करते थे।
➣ इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप मराठा साम्राज्य एक मराठा संघ के रूप में विकसित हुआ, जिसमें अनेक शक्तिशाली मराठा घराने सम्मिलित थे। इस संघ ने 18वीं शताब्दी में मराठा शक्ति के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
चार प्रमुख मराठा घराने
➣ मराठा संघ के अंतर्गत अनेक सरदार थे, किन्तु समय के साथ चार प्रमुख मराठा घराने सबसे अधिक प्रभावशाली बनकर उभरे। ये थे-
| मराठा घराना | मुख्य केन्द्र / राजधानी | संस्थापक |
|---|---|---|
| ग्वालियर के सिंधिया | ग्वालियर | रणोजी सिंधिया |
| बड़ौदा के गायकवाड़ | बड़ौदा (वडोदरा) | पिलाजी गायकवाड़ |
| इन्दौर के होल्कर | इन्दौर | मल्हारराव होल्कर |
| नागपुर के भोंसले | नागपुर | रघुजी भोंसले प्रथम |
मराठा संघ की विशेषताएँ
➣ मराठा संघ की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि प्रत्येक प्रमुख सरदार अपने राज्य का आंतरिक प्रशासन स्वतंत्र रूप से संचालित करता था, किन्तु आवश्यकता पड़ने पर वह पेशवा की सहायता के लिए सेना भी उपलब्ध कराता था।
➣ प्रारम्भिक वर्षों में इस व्यवस्था ने मराठा साम्राज्य के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। परन्तु बाद के समय में इन मराठा घरानों के बीच पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ने लगी, जिससे संघ की एकता कमजोर होती गई।
➣ विशेष रूप से पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई.) के बाद पेशवाओं की केंद्रीय शक्ति कमजोर पड़ गई। परिणामस्वरूप सिंधिया, होल्कर, भोंसले तथा गायकवाड़ जैसे प्रमुख मराठा घराने अधिक स्वतंत्र एवं प्रभावशाली होते गए और मराठा राजनीति में उनकी भूमिका बढ़ती चली गई।
मराठा संघ की स्थापना का श्रेय पेशवा बाजीराव प्रथम को दिया जाता है।
बड़ौदा के गायकवाड़
➣ गायकवाड़ वंश मराठा संघ के चार प्रमुख घरानों में से एक था। इस वंश का उदय पेशवा बाजीराव प्रथम के शासनकाल में हुआ और इसने मुख्यतः गुजरात क्षेत्र में अपनी सत्ता स्थापित की।
➣ सामान्यतः पिलाजी गायकवाड़ को गायकवाड़ वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। उन्होंने 1721 ई. के आसपास गुजरात में मराठा शक्ति का विस्तार प्रारम्भ किया तथा बड़ौदा को अपने प्रभाव का प्रमुख केन्द्र बनाया।
➣ पिलाजी गायकवाड़ की मृत्यु के बाद दामाजी गायकवाड़ ने इस वंश को संगठित एवं सुदृढ़ बनाया। उनके शासनकाल में गायकवाड़ों की शक्ति और प्रतिष्ठा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई तथा गुजरात में उनका प्रभाव और अधिक मजबूत हो गया।
➣ गायकवाड़ शासकों ने गुजरात में मराठा प्रभुत्व स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अनेक क्षेत्रों से चौथ एवं सरदेशमुखी की वसूली की तथा मराठा साम्राज्य की आय में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
➣ यद्यपि गायकवाड़ मराठा संघ का हिस्सा थे, फिर भी वे अपने राज्य का प्रशासन काफी हद तक स्वतंत्र रूप से संचालित करते थे और समय के साथ उनका प्रभाव निरंतर बढ़ता गया।
➣ उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में गायकवाड़ शासकों ने अंग्रेजों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए। उन्होंने संघर्ष के स्थान पर समझौते की नीति अपनाई और अंग्रेजों के संरक्षण को स्वीकार कर लिया।
➣ परिणामस्वरूप गायकवाड़ राज्य को अन्य मराठा घरानों की अपेक्षा कम सैन्य क्षति उठानी पड़ी। द्वितीय तथा तृतीय आंग्ल-मराठा युद्धों के दौरान भी उन्होंने अंग्रेजों के साथ अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण संबंध बनाए रखे।
ऐतिहासिक महत्व
➣ गायकवाड़ वंश ने लगभग दो शताब्दियों तक बड़ौदा पर शासन किया। अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने के बाद भी उनका राज्य एक देशी रियासत के रूप में बना रहा।
➣ 1947 ई. में भारत की स्वतंत्रता के बाद बड़ौदा रियासत का भारतीय संघ में विलय कर दिया गया और गायकवाड़ वंश का स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व समाप्त हो गया।
इन्दौर के होल्कर
➣ इस वंश की स्थापना मल्हारराव होल्कर ने की थी, जो पेशवा बाजीराव प्रथम के सर्वाधिक योग्य एवं विश्वसनीय सेनानायकों में गिने जाते थे।
➣ 1720 के दशक में बाजीराव प्रथम ने मल्हारराव होल्कर को मालवा क्षेत्र में मराठा शक्ति के विस्तार का दायित्व सौंपा। उन्होंने वहाँ मराठा प्रभुत्व स्थापित किया तथा आगे चलकर इन्दौर को अपने राज्य का प्रमुख केन्द्र बनाया।
➣ मल्हारराव होल्कर ने मराठा साम्राज्य के उत्तर भारत में विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने मालवा तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में मराठा प्रभाव को सुदृढ़ किया और अनेक युद्धों में पेशवा की ओर से उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त कीं।
➣ वे मराठा संघ के सबसे प्रभावशाली सरदारों में से एक बन गए। उनकी निष्ठा और सैन्य प्रतिभा के कारण होल्कर वंश शीघ्र ही उत्तर भारत की प्रमुख मराठा शक्ति के रूप में स्थापित हो गया।
अहिल्याबाई होल्कर का शासन
➣ 1766 ई. में मल्हारराव होल्कर की मृत्यु के बाद कुछ समय तक राजनीतिक अस्थिरता रही। अंततः उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई होल्कर ने राज्य की बागडोर संभाली और अपने कुशल प्रशासन से होल्कर राज्य को नई दिशा प्रदान की।
➣ अहिल्याबाई होल्कर भारतीय इतिहास की सर्वश्रेष्ठ महिला शासकों में गिनी जाती हैं। उन्होंने न्यायप्रिय शासन, जनकल्याण तथा धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई। उनके शासनकाल में राज्य में शांति, समृद्धि और सुशासन की स्थापना हुई।
➣ उन्होंने काशी, गया, सोमनाथ, उज्जैन, द्वारका तथा अन्य अनेक तीर्थस्थलों पर मंदिरों, घाटों, धर्मशालाओं और कुओं का निर्माण एवं जीर्णोद्धार कराया। इस कारण उन्हें एक आदर्श लोककल्याणकारी शासिका के रूप में स्मरण किया जाता है।
अंग्रेजों से संबंध
➣ अहिल्याबाई होल्कर के पश्चात होल्कर वंश मराठा राजनीति का एक महत्वपूर्ण अंग बना रहा। किन्तु तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-1818 ई.) में महीदपुर के युद्ध में पराजय के बाद होल्कर राज्य को 6 जनवरी 1818 ई. की मन्दसौर की संधि द्वारा अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।
➣ इसके बाद होल्कर राज्य एक देशी रियासत के रूप में बना रहा। 1947 ई. में भारत की स्वतंत्रता के पश्चात इन्दौर रियासत का भारतीय संघ में विलय कर दिया गया।
ग्वालियर के सिंधिया
➣ इस वंश की स्थापना रणोजी सिंधिया ने की थी, जो पेशवा बाजीराव प्रथम के विश्वसनीय सेनानायकों में गिने जाते थे।
➣ 1726 ई. में पेशवा बाजीराव प्रथम ने रणोजी सिंधिया को मालवा का प्रभारी नियुक्त किया। अपनी सैन्य प्रतिभा और प्रशासनिक क्षमता के बल पर उन्होंने वहाँ मराठा शक्ति को सुदृढ़ किया तथा सिंधिया वंश की नींव रखी।
➣ प्रारम्भ में रणोजी सिंधिया ने उज्जैन को अपनी राजधानी बनाया। आगे चलकर सिंधिया वंश की राजधानी ग्वालियर स्थानांतरित कर दी गई, जिससे यह राज्य उत्तर भारत की प्रमुख मराठा शक्ति बन गया।
➣ महादजी सिंधिया (1761-1794 ई.) के शासनकाल में सिंधिया वंश अपनी शक्ति और प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुँचा। पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई.) में घायल होने के बाद भी उन्होंने मराठा शक्ति का पुनर्गठन किया और उत्तर भारत में उसका प्रभाव पुनः स्थापित किया।
➣ 1771 ई. में महादजी सिंधिया ने निर्वासित मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय को पुनः दिल्ली के सिंहासन पर बैठाया। इसके बाद दिल्ली दरबार में सिंधिया का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया और वे मुगल राजनीति के सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में गिने जाने लगे।
➣ महादजी सिंधिया ने अपनी सेना का आधुनिकीकरण भी किया। उन्होंने यूरोपीय अधिकारियों की सहायता से सेना को आधुनिक प्रशिक्षण दिलाया, जिससे सिंधिया राज्य की सैन्य शक्ति और अधिक संगठित हुई।
अंग्रेजों से संबंध
➣ महादजी सिंधिया की मृत्यु के बाद दौलतराव सिंधिया शासक बने। उनके शासनकाल में अंग्रेजों और मराठों के बीच संघर्ष तीव्र हो गया।
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805 ई.) में सिंधिया को पराजय का सामना करना पड़ा और उन्हें सुरजी-अर्जुनगाँव की संधि (1803 ई.) करनी पड़ी।➣ तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-1818 ई.) के दौरान दौलतराव सिंधिया ने अंग्रेजों के साथ ग्वालियर की संधि (1817 ई.) की और पिंडारियों के विरुद्ध अंग्रेजों का सहयोग स्वीकार कर लिया। इसके बाद सिंधिया राज्य अंग्रेजों के प्रभाव में आ गया।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में ग्वालियर
➣ 1857 ई. के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय ग्वालियर पर जयाजीराव सिंधिया का शासन था। वे अंग्रेजों के सहयोगी थे और विद्रोह के दौरान उन्होंने ब्रिटिश सरकार का समर्थन किया।
➣ जून 1858 ई. में रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे तथा अन्य क्रांतिकारियों ने संयुक्त अभियान चलाकर ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। इस सफलता से कुछ समय के लिए ग्वालियर क्रांतिकारियों के नियंत्रण में आ गया।
➣ अंग्रेजों ने शीघ्र ही ग्वालियर पर पुनः अधिकार करने के लिए सैन्य अभियान चलाया। 18 जून 1858 ई. को कोटा-की-सराय के निकट हुए युद्ध में रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं।
➣ रानी लक्ष्मीबाई की स्मृति में ग्वालियर में स्थित उनकी समाधि आज भी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्मारक मानी जाती है।।
➣ ग्वालियर पर पुनः अधिकार करने के बाद अंग्रेजों ने जयाजीराव सिंधिया को फिर से गद्दी पर बैठा दिया। इसके बाद सिंधिया राज्य अंग्रेजों की अधीनस्थ रियासत के रूप में बना रहा।
➣ अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने के बाद भी ग्वालियर एक देशी रियासत के रूप में बना रहा। 1947 ई. में भारत की स्वतंत्रता के पश्चात ग्वालियर रियासत का भारतीय संघ में विलय कर दिया गया।
नागपुर के भोंसले
➣ यह वंश छत्रपति शिवाजी के कुल से संबंधित माना जाता है और मराठा इतिहास में इसका विशेष स्थान है।
➣ रघुजी भोंसले प्रथम ने 1730 ई. के आसपास नागपुर में भोंसले राज्य की स्थापना की। शीघ्र ही नागपुर मराठा शक्ति का एक प्रमुख केन्द्र बन गया।
➣ रघुजी भोंसले ने अपने सैन्य अभियानों के माध्यम से विदर्भ, बरार, छत्तीसगढ़, उड़ीसा तथा बंगाल के कुछ भागों तक अपना प्रभाव स्थापित किया। उन्होंने बंगाल और बिहार से चौथ वसूल कर नागपुर राज्य को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाया।
➣ भोंसले वंश ने पूर्वी भारत में मराठा प्रभाव के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और मराठा संघ की एक प्रमुख शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
➣ द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805 ई.) में रघुजी भोंसले द्वितीय अंग्रेजों से पराजित हुए और उन्हें 17 दिसम्बर 1803 ई. की देवगाँव की संधि करनी पड़ी। इस संधि के अंतर्गत भोंसले ने कटक, बालासोर तथा अन्य क्षेत्रों पर अपना अधिकार छोड़ दिया।
➣ तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-1818 ई.) के दौरान सीताबर्डी के युद्ध में भी नागपुर के भोंसले पराजित हुए। इसके बाद उनकी राजनीतिक शक्ति निरंतर कमजोर होती गई और वे अंग्रेजों के प्रभाव में आ गए।
भोंसले वंश का अंत
➣ 1853 ई. में नागपुर के शासक रघुजी भोंसले तृतीय की निःसंतान मृत्यु हो गई। इसके बाद गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी ने राज्य हड़प नीति के अंतर्गत नागपुर राज्य को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया।
➣ इस प्रकार नागपुर के भोंसले वंश का स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व समाप्त हो गया और उसका राज्य ब्रिटिश शासन का भाग बन गया।
चार प्रमुख मराठा घराने : Quick
| मराठा घराना | संस्थापक | मुख्य केन्द्र | विशेष तथ्य |
|---|---|---|---|
| गायकवाड़ | पिलाजी गायकवाड़ | बड़ौदा (गुजरात) | गुजरात में मराठा शक्ति का विस्तार, अंग्रेजों से मैत्रीपूर्ण संबंध |
| होल्कर | मल्हारराव होल्कर | इन्दौर | अहिल्याबाई होल्कर का आदर्श शासन, 1818 की मन्दसौर संधि |
| सिंधिया | रणोजी सिंधिया | ग्वालियर | महादजी सिंधिया ने 1771 में शाह आलम द्वितीय को पुनः दिल्ली के सिंहासन पर बैठाया |
| भोंसले | रघुजी भोंसले प्रथम | नागपुर | पूर्वी भारत में विस्तार, 1853 में नागपुर का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय |
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