1. गांधी-इर्विन समझौता हुआ था-
53rd to 55th B.P.S.C. (Pre) 2011
उत्तर-(b)
गांधी-इर्विन समझौता 5 मार्च, 1931 को संपन्न हुआ। दिल्ली में गांधीजी और वायसराय लॉर्ड इर्विन के बीच लगभग दो सप्ताह तक चली वार्ताओं के बाद यह समझौता हुआ, जिसे ‘दिल्ली पैक्ट’ भी कहा जाता है। इसके तहत कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित किया और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर सहमति दी।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसी समझौते की औपचारिक पुष्टि मार्च 1931 में हुए कराची अधिवेशन में हुई, जिसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की और जहाँ गांधीजी ने मौलिक अधिकारों व राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम संबंधी प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इसके अतिरिक्त, समझौते के मात्र 18 दिन बाद ही 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई, जिससे जनमानस में इस समझौते के प्रति गहरा असंतोष उत्पन्न हुआ।
2.गांधी-इर्विन समझौते के हस्ताक्षरित होने में किसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?
R.A.S./R.T.S. (Pre) 2018
उत्तर-(c)
बढ़ते सविनय अवज्ञा आंदोलन के मध्य देश में सौहार्द्रपूर्ण वातावरण बनाने के उद्देश्य से वायसराय लॉर्ड इर्विन ने 26 जनवरी, 1931 को गांधीजी को जेल से रिहा किया। उदारवादी नेता तेज बहादुर सप्रू तथा एम.आर. जयकर ने मध्यस्थता करते हुए गांधी और इर्विन के बीच फरवरी 1931 में वार्ता आरंभ कराई, जो 5 मार्च, 1931 को समझौते के रूप में परिणत हुई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस घटनाक्रम पर सरोजिनी नायडू ने गांधी और इर्विन को “दो महात्मा” (The Two Mahatmas) की संज्ञा दी थी, जबकि ब्रिटेन में विंस्टन चर्चिल ने वायसराय भवन की सीढ़ियाँ चढ़ते गांधीजी को देखकर इस पर तीखी आपत्ति जताई थी।
3.गांधी-इर्विन समझौता हुआ मुख्य रूप से-
U.P. Lower Sub.(Pre) 1998
उत्तर-(a)
प्रथम गोलमेज सम्मेलन (नवंबर 1930-जनवरी 1931) में कांग्रेस की अनुपस्थिति के कारण उसकी प्रामाणिकता संदिग्ध बनी रही। इसी कमी को दूर करने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने गांधीजी को वार्ता हेतु आमंत्रित किया, और 5 मार्च, 1931 को संपन्न इस समझौते का मुख्य लक्ष्य कांग्रेस को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में सहभागी बनाना था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: द्वितीय गोलमेज सम्मेलन सितंबर-दिसंबर 1931 में लंदन में आयोजित हुआ, जिसमें गांधीजी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए, परंतु सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व (कम्युनल अवॉर्ड) के मुद्दे पर सहमति न बन पाने के कारण यह सम्मेलन भी विफल रहा।
4. गांधी-इर्विन समझौते में किसने मध्यस्थ की भूमिका अदा की?
47th B.P.S.C. (Pre) 2005
उत्तर-(b)
गांधी-इर्विन समझौते से पूर्व सरकार और कांग्रेस के बीच सीधा संवाद स्थापित कराने में कई उदारवादी नेताओं की भूमिका रही। तेज बहादुर सप्रू व एम.आर. जयकर के साथ-साथ मदन मोहन मालवीय जैसे वरिष्ठ नेताओं ने भी सेतु का कार्य किया, जिसके फलस्वरूप 5 मार्च, 1931 को दिल्ली में समझौता संपन्न हुआ।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: मदन मोहन मालवीय हिंदू महासभा के भी प्रमुख नेता थे और इन्होंने 1916 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) की स्थापना में केंद्रीय भूमिका निभाई थी, साथ ही इन्हें “महामना” की उपाधि से सम्मानित किया गया था।
5.गांधी-इर्विन समझौते पर हस्ताक्षर हुए-
44th B.P.S.C. (Pre) 2000
उत्तर-(a)
गांधी-इर्विन समझौते पर 5 मार्च, 1931 को हस्ताक्षर हुए। इसके तहत कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित करने, सरकार ने आंदोलन से संबंधित अध्यादेश वापस लेने, हिंसा के आरोप से मुक्त राजनीतिक बंदियों को रिहा करने तथा तटीय क्षेत्रों में बिना कर दिए नमक बनाने की अनुमति देने जैसी रियायतें दीं; बदले में कांग्रेस द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने को तैयार हुई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसे “दिल्ली पैक्ट” के नाम से भी जाना जाता है, और इसे मार्च 1931 के कराची अधिवेशन में औपचारिक स्वीकृति मिली, जहाँ सरदार वल्लभभाई पटेल अध्यक्ष थे।
6.5 मार्च, 1931 को निम्न में से कौन समझौता हुआ?
46th B.P.S.C. (Pre) 2004
उत्तर-(c)
5 मार्च, 1931 को वायसराय लॉर्ड इर्विन और महात्मा गांधी के बीच हुए समझौते को इर्विन-गांधी अथवा गांधी-इर्विन समझौता कहा जाता है। दिल्ली में लगभग दो सप्ताह तक चली इस वार्ता के परिणामस्वरूप कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित करने तथा द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर सहमत हुई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस समझौते के कुछ ही समय बाद, अप्रैल 1931 में लॉर्ड इर्विन के स्थान पर लॉर्ड विलिंग्डन नए वायसराय बने, जिनके कार्यकाल में सरकार और कांग्रेस के संबंध पुनः तनावपूर्ण हो गए और जनवरी 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन फिर से शुरू करना पड़ा।
7. गांधी-इर्विन समझौते में निम्नलिखित में से क्या सम्मिलित था/ थे?
1. राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में भाग लेने के लिए कांग्रेस को आमंत्रित करना।
2. असहयोग आंदोलन के संबंध में जारी किए गए अध्यादेशों को वापस लेना
3.पुलिस की ज्यादतियों की जांच करने हेतु गांधीजी के सुझाव की स्वीकृति
4.केवल उन्हीं कैदियों की रिहाई जिन पर हिंसा का अभियोगन हीं था
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-
1. राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में भाग लेने के लिए कांग्रेस को आमंत्रित करना।
2. असहयोग आंदोलन के संबंध में जारी किए गए अध्यादेशों को वापस लेना
3.पुलिस की ज्यादतियों की जांच करने हेतु गांधीजी के सुझाव की स्वीकृति
4.केवल उन्हीं कैदियों की रिहाई जिन पर हिंसा का अभियोगन हीं था
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-
I.A.S. (Pre) 2020
उत्तर-(b)
गांधी-इर्विन समझौता, जिसे ‘दिल्ली समझौता’ भी कहा जाता है, 5 मार्च, 1931 को संपन्न हुआ। इसमें कांग्रेस को गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने हेतु आमंत्रित करना, सविनय अवज्ञा आंदोलन से संबंधित अध्यादेशों को वापस लेना, तथा हिंसा के आरोप से मुक्त राजनीतिक बंदियों की रिहाई जैसे प्रावधान शामिल थे। परंतु पुलिस ज्यादतियों की जांच हेतु गांधीजी के सुझाव को सरकार ने स्वीकार नहीं किया, अतः कथन 3 असत्य है जबकि कथन 1, 2 और 4 सत्य हैं; इस प्रकार सही उत्तर विकल्प (b) है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस समझौते की आलोचना सुभाष चंद्र बोस सहित कांग्रेस के युवा व वामपंथी धड़े ने भी की थी, क्योंकि उन्हें यह क्रांतिकारियों से संबंधित मुद्दों पर अपर्याप्त प्रतीत हुआ था।
8.निम्नलिखित में से किसका स्थगन गांधी-इर्विन समझौते में किया जाना प्रस्तावित था?
U.P.P.C.S. (Pre) 1993
उत्तर-(d)
गांधी-इर्विन समझौते के अंतर्गत कांग्रेस द्वारा वर्ष 1930 में आरंभ किए गए सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित किए जाने का प्रावधान रखा गया था, न कि असहयोग आंदोलन (1920-22) अथवा खिलाफत आंदोलन (1919-22) का, जो इस समझौते से पूर्व ही समाप्त हो चुके थे।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत 12 मार्च, 1930 को गांधीजी की प्रसिद्ध दांडी यात्रा (साबरमती आश्रम से दांडी तक, लगभग 240 मील) के साथ हुई थी, और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन की विफलता के बाद जनवरी 1932 में यह आंदोलन पुनः प्रारंभ हुआ।
9. निम्नलिखित में से किसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कराची अधिवेशन (1931) को ‘महात्मा गांधी की लोकप्रियता और सम्मान की पराकाष्ठा’ माना है?
U.P.P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(a)
सुभाष चंद्र बोस ने अपनी पुस्तक “द इंडियन स्ट्रगल” में 1931 के कराची अधिवेशन को महात्मा गांधी की लोकप्रियता और सम्मान की पराकाष्ठा निरूपित किया है, क्योंकि गांधी-इर्विन समझौते की आलोचना और भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु की फांसी के मात्र तीन दिन बाद हुए इस अधिवेशन में भी जनता ने गांधीजी का अभूतपूर्व स्वागत किया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: यह अधिवेशन 26-31 मार्च, 1931 को सरदार वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में हुआ था, जिसमें कांग्रेस ने पहली बार मौलिक अधिकारों एवं राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम संबंधी ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किए, जिसे पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्रारूपित किया था।
10.निम्नलिखित व्यक्तियों में किसने इर्विन तथा गांधी को ‘दो”महात्मा’ कहा था ?
U.P.P.C.S. (Pre) 2001
उत्तर-(b)
कवयित्री और स्वतंत्रता सेनानी सरोजिनी नायडू ने 5 मार्च, 1931 को संपन्न गांधी-इर्विन समझौते के संदर्भ में महात्मा गांधी और वायसराय लॉर्ड इर्विन दोनों को “दो महात्मा” (The Two Mahatmas) कहकर संबोधित किया था, क्योंकि दोनों ने वार्ता के माध्यम से एक गंभीर राजनीतिक गतिरोध को सुलझाया था।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: सरोजिनी नायडू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षता करने वाली प्रथम भारतीय महिला थीं (1925 का कानपुर अधिवेशन), और स्वतंत्रता के पश्चात वे संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) की प्रथम राज्यपाल भी बनीं।
11. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से संबंधित निम्नलिखित घटनाओं को पढ़ें-
1. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का कराची अधिवेशन
2. राजगुरु को फांसी
3. गांधी-इर्विन समझौता
घटनाओं का सही कालानुक्रम नीचे दिए गए कूट से पता करें-
1. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का कराची अधिवेशन
2. राजगुरु को फांसी
3. गांधी-इर्विन समझौता
घटनाओं का सही कालानुक्रम नीचे दिए गए कूट से पता करें-
U.P.P.C.S. (Mains) 2009
उत्तर-(a)
तीनों घटनाओं का सही कालानुक्रम इस प्रकार है- सर्वप्रथम 5 मार्च, 1931 को गांधी-इर्विन समझौता हुआ; इसके पश्चात 23 मार्च, 1931 को लाहौर षड्यंत्र कांड में भगत सिंह और सुखदेव के साथ राजगुरु को फांसी दी गई; और अंत में 26 से 31 मार्च, 1931 के मध्य कराची में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, जिसमें गांधी-इर्विन समझौते की पुष्टि की गई। अतः सही क्रम 3, 2, 1 है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु का अंतिम संस्कार लाहौर के निकट सतलुज नदी के तट पर गुप्त रूप से किया गया था, और इस फांसी के विरुद्ध व्यापक जनाक्रोश के बावजूद कराची अधिवेशन में गांधीजी ने अपनी अहिंसा-नीति से समझौता करने से इनकार किया।
12.निम्नलिखित में से किसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कराची अधिवेशन का सभापतित्व किया था?
U.P. P.C.S. (Pre) 2005
उत्तर-(d)
गांधी-इर्विन समझौते (दिल्ली समझौते) पर कांग्रेस की मुहर लगाने हेतु 26-31 मार्च, 1931 को कराची में आयोजित कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन की अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की थी। इसी अधिवेशन में पहली बार ‘पूर्ण स्वराज्य’ को परिभाषित करते हुए मौलिक अधिकारों और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम से संबंधित ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुए।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसी अधिवेशन में कुछ युवा कांग्रेसजनों द्वारा विरोध प्रदर्शन किए जाने पर गांधीजी ने कहा था कि गांधी मर सकता है, परंतु गांधीवाद अमर रहेगा।
13. भारतीय स्वाधीनता संग्राम से संबंधित निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए-
(1) गांधी-इर्विन समझौता
(2) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का कराची अधिवेशन
(3) भगत सिंह की फांसी
(4) पूना समझौता
नीचे दिए गए कूट से घटनाओं का सही कालानुक्रम पता करें-
(1) गांधी-इर्विन समझौता
(2) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का कराची अधिवेशन
(3) भगत सिंह की फांसी
(4) पूना समझौता
नीचे दिए गए कूट से घटनाओं का सही कालानुक्रम पता करें-
U.P. P.C.S. (Spl.) (Mains) 2004
उत्तर-(d)
प्रश्नगत घटनाओं का सही कालानुक्रम इस प्रकार है- सर्वप्रथम 5 मार्च, 1931 को गांधी-इर्विन समझौता हुआ; इसके पश्चात 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह को फांसी दी गई; फिर 26 से 31 मार्च, 1931 के मध्य कांग्रेस का कराची अधिवेशन संपन्न हुआ; और अंत में 24 सितंबर, 1932 को पूना समझौता हुआ। अतः सही क्रम 1, 3, 2, 4 है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: पूना समझौता महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर के मध्य हुआ था, जब रैम्जे मैकडोनाल्ड द्वारा घोषित साम्प्रदायिक पंचाट (कम्युनल अवॉर्ड) के विरोध में गांधीजी येरवदा जेल में आमरण अनशन पर थे; इस समझौते के तहत दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल के स्थान पर संयुक्त निर्वाचक मंडल में आरक्षित सीटों की व्यवस्था स्वीकार की गई।
14. निम्नलिखित में से किसने गांधी-इर्विन समझौते में महात्मा गांधी के लाभ को ‘सांत्वना पुरस्कार’ कहा था?
U.P.P.C.S. (Pre) 2014
उत्तर-(b)
वायसराय लॉर्ड इर्विन (बाद में लॉर्ड हैलिफैक्स) के जीवनीकार एलन कैम्पबेल-जॉनसन ने गांधी-इर्विन समझौते में महात्मा गांधी को प्राप्त लाभों को मात्र एक ‘सांत्वना पुरस्कार’ (Consolation Prize) निरूपित किया था, और इर्विन की वार्ता हेतु सहमति को ही उनका एकमात्र वास्तविक समर्पण बताया।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने इस प्रश्न के लिए प्रारंभिक उत्तर-कुंजी में विकल्प (a) एस.सी. बोस को सही माना था, किंतु बाद में संशोधित उत्तर-कुंजी में सही उत्तर विकल्प (b) घोषित किया गया।
15.भारतीय स्वाधीनता संघर्ष से संबंधित निम्नलिखित घटनाओं को उनके सही क्रम में रखकर सही कूट चुनिए-
1. द्वितीय गोलमेज सम्मेलन
2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का कराची अधिवेशन
3.भगत सिंह को फांसी
4. गांधी-इर्विन समझौता
कूट :
1. द्वितीय गोलमेज सम्मेलन
2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का कराची अधिवेशन
3.भगत सिंह को फांसी
4. गांधी-इर्विन समझौता
कूट :
U.P. P.C.S. (Mains) 2006
U.P.P.C.S. (Pre) 2009
U.P.P.C.S. (Mains) 2013
U.P.P.C.S. (Pre) 2009
U.P.P.C.S. (Mains) 2013
उत्तर-(c)
उपर्युक्त चारों घटनाओं का सही ऐतिहासिक क्रम है- सर्वप्रथम 5 मार्च, 1931 को गांधी-इर्विन समझौता हुआ; तत्पश्चात 23 मार्च, 1931 को लाहौर षड्यंत्र कांड में भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को फांसी दी गई; इसके बाद 26-31 मार्च, 1931 के मध्य कांग्रेस का कराची अधिवेशन हुआ, जिसमें समझौते की पुष्टि की गई; और अंततः 7 सितंबर, 1931 को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन लंदन में आरंभ हुआ, जिसमें गांधीजी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित हुए। अतः सही क्रम 4, 3, 2, 1 है।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: द्वितीय गोलमेज सम्मेलन 1 दिसंबर, 1931 तक चला, परंतु सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर सहमति न बन पाने के कारण यह पूर्णतः असफल रहा, जिसके फलस्वरूप गांधीजी को रिक्त हाथ भारत लौटना पड़ा।
16.1931 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कराची अधिवेशन के लिए, जिसकी अध्यक्षता सरदार पटेल कर रहे थे, किसने मूल अधिकारों तथा आर्थिक कार्यक्रम पर संकल्प प्रारूपित किया था?
I.A.S. (Pre) 2010
I.A.S. (Pre) 2005
I.A.S. (Pre) 2005
उत्तर-(b)
1931 के कराची अधिवेशन में, जिसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की थी, मौलिक अधिकारों तथा राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम से संबंधित ऐतिहासिक संकल्प पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्रारूपित किया था, जिसमें एम.एन. रॉय ने भी सहयोगी की भूमिका निभाई।
📌 अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इस प्रस्ताव में वाक् व प्रेस की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता तथा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार जैसे मौलिक अधिकारों के साथ-साथ प्रमुख उद्योगों के राष्ट्रीयकरण, भू-राजस्व में कमी और न्यूनतम मजदूरी जैसे आर्थिक प्रावधान भी सम्मिलित थे, जिन्होंने आगे चलकर स्वतंत्र भारत के संविधान-निर्माण को भी दिशा प्रदान की।
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