होमरूल लीग आंदोलन (1916 ई.)
➣ होमरूल लीग आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक चरण था, जिसने उदारवादी और उग्रवादी नेताओं के बीच लंबे समय से चली आ रही दूरी को कम करने तथा देश में स्वशासन की माँग को संगठित रूप से जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया।
➣ यह आंदोलन 1916 ई. में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक तथा श्रीमती एनी बेसेंट द्वारा प्रारम्भ किया गया। यद्यपि दोनों नेताओं ने अलग-अलग संगठन स्थापित किए, फिर भी उनका उद्देश्य समान था-भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत रहते हुए आंतरिक स्वशासन प्राप्त कराना।
➣ होमरूल लीग आंदोलन का उदय ऐसे समय में हुआ जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राजनीतिक गतिविधियाँ अपेक्षाकृत धीमी पड़ चुकी थीं। 1907 ई. के सूरत विभाजन के बाद कांग्रेस नरम दल और गरम दल में विभाजित हो गई थी, जिसके कारण राष्ट्रीय आंदोलन की गति कमजोर हो गई।
➣ दूसरी ओर, प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के कारण ब्रिटिश सरकार भारत से सैनिकों, धन और संसाधनों की भारी सहायता प्राप्त कर रही थी, परन्तु भारतीयों को राजनीतिक अधिकार देने के विषय में कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया जा रहा था।
➣ ऐसी परिस्थिति में राष्ट्रवादी नेताओं ने अनुभव किया कि यदि देशभर में एक संगठित और निरंतर आंदोलन चलाया जाए, तो ब्रिटिश सरकार पर स्वशासन देने के लिए प्रभावी दबाव बनाया जा सकता है।
➣ होमरूल लीग आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा प्रदान की। इसने केवल राजनीतिक अधिकारों की माँग ही नहीं उठाई, बल्कि जनता के बीच राजनीतिक जागरूकता बढ़ाई, कांग्रेस की निष्क्रियता को समाप्त किया।
➣ आगे चलकर लखनऊ समझौते (1916), मॉण्टेग्यू घोषणा (1917) और अंततः महात्मा गांधी के नेतृत्व में होने वाले व्यापक जन-आंदोलनों की पृष्ठभूमि तैयार की। इस कारण इतिहासकार इसे उदारवादी युग और गांधी युग के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी भी मानते हैं।
पृष्ठभूमि
➣ होमरूल लीग आंदोलन अचानक प्रारम्भ नहीं हुआ था। इसके पीछे लगभग एक दशक तक चले राजनीतिक घटनाक्रम, राष्ट्रीय आंदोलनों तथा कांग्रेस के भीतर हुए परिवर्तन महत्वपूर्ण थे। इन्हीं परिस्थितियों ने भारत में स्वशासन की माँग को एक संगठित आंदोलन का रूप देने की पृष्ठभूमि तैयार की।
बंग-भंग आंदोलन का प्रभाव
➣ 1905 ई. में लॉर्ड कर्जन द्वारा किए गए बंगाल विभाजन (बंग-भंग) ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा प्रदान की। ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रशासनिक सुविधा का निर्णय बताया, किन्तु अधिकांश भारतीयों ने इसे फूट डालो और शासन करो की नीति का हिस्सा माना।
➣ बंग-भंग के विरोध में पूरे देश में स्वदेशी आंदोलन तथा विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का व्यापक अभियान प्रारम्भ हुआ। विद्यार्थियों, शिक्षकों, वकीलों, व्यापारियों तथा सामान्य जनता ने पहली बार बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेना शुरू किया।
➣ इसी आंदोलन के दौरान कांग्रेस के भीतर नरम दल और गरम दल के बीच मतभेद भी धीरे-धीरे बढ़ने लगे। यही मतभेद आगे चलकर 1907 ई. के सूरत विभाजन का प्रमुख कारण बने।
1907 के सूरत विभाजन के बाद की राजनीतिक स्थिति
➣ 1907 ई. के सूरत अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दो प्रमुख गुटों-नरम दल और गरम दल-में विभाजित हो गई। नरम दल संवैधानिक सुधारों, प्रार्थना-पत्रों तथा क्रमिक परिवर्तन की नीति में विश्वास करता था, जबकि गरम दल अधिक सक्रिय राजनीतिक संघर्ष, स्वदेशी, बहिष्कार तथा जन-जागरण को आवश्यक मानता था।
➣ इस विभाजन का सबसे अधिक लाभ ब्रिटिश सरकार को मिला। कांग्रेस की एकता समाप्त हो गई, राष्ट्रीय आंदोलन की गति धीमी पड़ गई और सरकार ने उग्र राष्ट्रवादी नेताओं पर कठोर दमन आरम्भ कर दिया।
➣ लोकमान्य तिलक को 1908 ई. में राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर मांडले (बर्मा) भेज दिया गया, जहाँ उन्हें छह वर्ष का कारावास भुगतना पड़ा। उधर कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन तो होते रहे, किन्तु पूरे वर्ष जनता के बीच राजनीतिक कार्य लगभग ठप हो गया।
➣ अनेक राष्ट्रवादी नेताओं को यह अनुभव होने लगा कि केवल वर्ष में एक बार अधिवेशन आयोजित करने से राष्ट्रीय आंदोलन को गति नहीं मिल सकती। आवश्यकता ऐसे संगठन की थी, जो पूरे वर्ष गाँव-गाँव और नगर-नगर जाकर लोगों को स्वशासन के लिए संगठित करे।
महत्वपूर्ण:-
▪ यह वह समय था जब मार्ले-मिंटो सुधार (1909) लागू होने वाले थे, इस समय लोकमान्य तिलक मांडले जेल में थे। इसलिए वे सार्वजनिक रूप से इन सुधारों का विरोध नहीं कर सके। 1914 ई. में रिहा होने के बाद उन्होंने भी इन सुधारों के प्रति अपना विरोध प्रकट किया।
▪ इसके विपरीत मार्ले-मिंटो सुधारों पर एनी बेसेंट की कोई प्रमुख सार्वजनिक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं मिलती, क्योंकि उस समय वे अभी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की सक्रिय नेता नहीं बनी थीं।
▪ 1914 के बाद, जब उन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया, तब उन्होंने ब्रिटिश शासन की सीमित सुधार नीति की आलोचना की और कहा कि भारत को केवल छोटे-छोटे संवैधानिक सुधार नहीं, बल्कि होमरूल (स्वशासन) मिलना चाहिए।
मांडले जेल से तिलक की वापसी (1914)
➣ जैसे कि 1908 ई. में राजद्रोहके आरोप में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा देकर मांडले जेल (बर्मा, वर्तमान म्यांमार) भेज दिया गया था।
➣ ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन के सबसे प्रभावशाली नेता को सक्रिय राजनीति से दूर करना था। तिलक की अनुपस्थिति में गरम दल का प्रभाव काफी कम हो गया और कांग्रेस में नरम दल का वर्चस्व बढ़ गया।
➣ मांडले जेल में रहते हुए तिलक ने भारतीय दर्शन, वेदांत तथा भगवद्गीता का गहन अध्ययन किया। इसी दौरान उन्होंने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ गीता रहस्य लिखा, जिसमें उन्होंने कर्मयोग को जीवन का सर्वोच्च आदर्श बताया। इस ग्रंथ ने उनके राजनीतिक विचारों को भी नई दिशा दी।
➣ जून 1914 ई. में अपनी सजा पूरी करने के बाद तिलक भारत लौटे। उस समय अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही थीं और कुछ ही महीनों बाद प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ हो गया।
➣ भारत लौटने पर तिलक ने देखा कि राष्ट्रीय आंदोलन की गति पहले जैसी नहीं रही। कांग्रेस केवल वार्षिक अधिवेशनों तक सीमित हो चुकी थी और जनता में राजनीतिक उत्साह भी कम हो गया था।
➣ तिलक ने परिस्थितियों का यथार्थ मूल्यांकन करते हुए अपनी रणनीति में कुछ परिवर्तन किया। अब उनका उद्देश्य केवल उग्र भाषण देना नहीं, बल्कि पूरे देश में एक वैधानिक एवं संगठित आंदोलन खड़ा करना था।
➣ उन्होंने नरम दल के नेताओं से मतभेद कम करने का प्रयास किया तथा कांग्रेस की एकता को पुनः स्थापित करने पर बल दिया। इसी सोच ने आगे चलकर होमरूल लीग आंदोलन को जन्म दिया।
एनी बेसेंट का राजनीतिक प्रवेश
➣ एनी बेसेंट का जन्म 1 अक्तूबर 1847 ई. को लंदन में हुआ था। वे एक प्रसिद्ध समाज सुधारक, लेखिका, वक्ता तथा थियोसॉफिकल सोसायटी की प्रमुख नेता थीं।
➣ 1893 ई. में भारत आने के बाद उन्होंने अपना अधिकांश समय शिक्षा, सामाजिक सुधार तथा भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में लगाया।
➣ मद्रास (वर्तमान चेन्नई) के अड्यार स्थित थियोसॉफिकल सोसायटी का मुख्यालय उनके कार्यों का प्रमुख केंद्र था। 1907 ई. में वे थियोसॉफिकल सोसायटी की अध्यक्ष चुनी गईं, जिसके बाद वे मद्रास स्थानांतरित हो गईं और वहीं से पुनः राजनीति में सक्रिय रुचि लेने लगीं।
➣ प्रारम्भिक वर्षों में एनी बेसेंट का ध्यान मुख्यतः शिक्षा और सामाजिक सुधार पर केंद्रित रहा। 1898 ई. में उन्होंने बनारस में सेंट्रल हिन्दू कॉलेज की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका उद्देश्य आधुनिक पाश्चात्य शिक्षा के साथ-साथ हिन्दू संस्कृति एवं परंपराओं का संरक्षण भी करना था।
➣ यही संस्थान आगे चलकर 1916 ई. में पंडित मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में स्थापित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) का आधार बना, जिसके लिए एनी बेसेंट ने कॉलेज की सम्पत्ति एवं परिसर भी दान कर दिया।
➣ धीरे-धीरे एनी बेसेंट इस निष्कर्ष पर पहुँचीं कि जब तक भारत को राजनीतिक अधिकार नहीं मिलेंगे, तब तक शिक्षा और सामाजिक सुधार भी अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सकेंगे। इसलिए उन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश करने का निर्णय लिया।
1913 ई. में वे औपचारिक रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्य बनीं और ब्रिटिश शासन की आर्थिक तथा नस्लीय नीतियों की खुलकर आलोचना करने लगीं।➣ अपने विचारों के प्रचार के लिए उन्होंने 1913 ई. में साप्ताहिक पत्र कॉमनविल का प्रकाशन आरम्भ किया, तथा उसी वर्ष एक पूर्व-प्रचलित समाचार-पत्र का अधिग्रहण कर उसे न्यू इंडिया के नाम से पुनः प्रकाशित करना शुरू किया। 1914 ई. से, विशेषतः प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ने के पश्चात, उन्होंने इन दोनों समाचार-पत्रों के माध्यम से भारत के लिए स्वशासन की माँग को व्यापक रूप से प्रचारित करना प्रारम्भ किया।
➣ उन्होंने देशभर की यात्राएँ कीं, सार्वजनिक सभाएँ आयोजित कीं और शिक्षित भारतीयों से संगठित राजनीतिक आंदोलन खड़ा करने का आह्वान किया। शीघ्र ही वे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हो गईं।
प्रथम विश्व युद्ध और भारतीय राजनीति
➣ 1914 ई. में प्रथम विश्व युद्ध आरम्भ होने पर ब्रिटिश सरकार ने भारत से सैनिकों, धन, खाद्यान्न तथा अन्य संसाधनों की व्यापक सहायता प्राप्त की। लाखों भारतीय सैनिक यूरोप, पश्चिम एशिया और अफ्रीका के विभिन्न मोर्चों पर
➣ ब्रिटिश सेना के साथ लड़े।
➣ युद्ध के आरम्भिक दौर में भारत के प्रमुख राजनीतिक नेताओं, चाहे वे नरम दल के हों या गरम दल के, ने ब्रिटेन के प्रति असाधारण समर्थन प्रदर्शित किया, जो ब्रिटिश सरकार की आशंकाओं के विपरीत था।
➣ भारतीय नेताओं ने यह आशा व्यक्त की कि युद्ध समाप्त होने पर ब्रिटिश सरकार भारत की निष्ठा और सहयोग के बदले राजनीतिक सुधार प्रदान करेगी।
➣ किन्तु युद्ध के प्रारम्भिक वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को कोई स्पष्ट संवैधानिक आश्वासन नहीं दिया। इसके विपरीत, प्रशासन ने 1915 ई. में भारत रक्षा अधिनियम लागू किया, जिसके अंतर्गत सरकार को असाधारण अधिकार प्राप्त हो गए- संदेह मात्र के आधार पर बिना मुकदमे के नजरबंदी, विशेष न्यायाधिकरणों द्वारा त्वरित सुनवाई, तथा प्रेस पर कठोर नियंत्रण जैसे प्रावधान इसमें सम्मिलित थे।
➣ यद्यपि यह अधिनियम मूलतः गदर आंदोलन तथा बंगाल की क्रांतिकारी गतिविधियों (जैसे अनुशीलन समिति) को नियंत्रित करने के उद्देश्य से लाया गया था, किन्तु इसका प्रयोग सामान्य राष्ट्रवादी गतिविधियों तथा नरमपंथी नेताओं तक पर किया जाने लगा, जिससे आम जनमानस में भी असंतोष फैलने लगा।
➣ इसके साथ ही युद्धकाल में अनाज की कीमतों में वृद्धि, आर्थिक कठिनाइयाँ तथा बढ़ते कर के बोझ ने आम जनता को भी प्रभावित किया, जिससे असंतोष केवल राजनीतिक वर्ग तक सीमित न रहकर व्यापक होता गया।
➣ लोकमान्य तिलक और एनी बेसेंट का मत था कि युद्ध के समय ब्रिटेन भारत की सहायता पर अत्यधिक निर्भर है, इसलिए यही उचित अवसर है जब भारत को संगठित होकर स्वशासन की माँग करनी चाहिए।
➣ इसके अतिरिक्त, 1909 ई. के मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने भी भारतीयों की आकांक्षाओं को संतुष्ट नहीं किया था, जिससे संवैधानिक सुधार की माँग पहले से ही जीवित थी।
➣ यदि इस समय व्यापक जनमत तैयार किया जाए, तो ब्रिटिश सरकार पर राजनीतिक सुधार लागू करने का दबाव बढ़ाया जा सकता है। इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध, इससे उत्पन्न आर्थिक कठिनाइयों तथा भारत रक्षा अधिनियम जैसे दमनकारी उपायों ने भी होमरूल आंदोलन के उदय के लिए अनुकूल राजनीतिक वातावरण तैयार किया।
होमरूल (Home Rule) का अर्थ
➣ Home Rule का शाब्दिक अर्थ है-अपने घर का शासन अथवा स्वशासन। राजनीतिक दृष्टि से इसका तात्पर्य किसी देश को अपने आंतरिक प्रशासन का अधिकार प्राप्त होना है, जबकि वह औपचारिक रूप से किसी बड़े साम्राज्य का भाग बना रहे।
➣ अर्थात रक्षा, विदेश नीति तथा सम्राट के प्रति निष्ठा जैसी कुछ शक्तियाँ ब्रिटिश सरकार के पास रहतीं, जबकि शिक्षा, कृषि, पुलिस, स्थानीय प्रशासन, वित्त तथा अन्य आंतरिक विषयों का संचालन भारतीय प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता।
➣ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि होमरूल का अर्थ पूर्ण स्वतंत्रता नहीं था। उस समय अधिकांश राष्ट्रवादी नेता भारत के लिए वही संवैधानिक स्थिति चाहते थे, जो ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड तथा बाद में दक्षिण अफ्रीका जैसे डोमिनियन देशों को प्राप्त थी।
➣ इसलिए होमरूल आंदोलन का तत्कालीन उद्देश्य ब्रिटिश शासन को समाप्त करना नहीं, बल्कि भारतीयों को उत्तरदायी एवं स्वशासी सरकार प्रदान कराना था।
➣ लोकमान्य तिलक और एनी बेसेंट दोनों का विश्वास था कि यदि भारत को स्वशासन प्राप्त हो जाएगा, तो भारतीय जनता स्वयं अपने आर्थिक, सामाजिक तथा प्रशासनिक प्रश्नों का अधिक प्रभावी ढंग से समाधान कर सकेगी। इसी विचार को लोकप्रिय बनाने के लिए दोनों नेताओं ने देशव्यापी प्रचार अभियान प्रारम्भ किया।
आयरलैंड के होमरूल आंदोलन से प्रेरणा
➣ भारतीय होमरूल आंदोलन की प्रेरणा आयरलैंड के प्रसिद्ध होमरूल आंदोलन से प्राप्त हुई। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आयरलैंड भी ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन था और वहाँ के राष्ट्रवादी नेता ब्रिटेन से अलग हुए बिना अपने देश के लिए स्वतंत्र विधानमंडल तथा उत्तरदायी सरकार की माँग कर रहे थे। इस आंदोलन का नेतृत्व विशेष रूप से चार्ल्स स्टीवर्ट पार्नेल जैसे नेताओं ने किया।
➣ यद्यपि ब्रिटिश संसद में आयरलैंड के लिए होमरूल विधेयकों को अनेक बार प्रस्तुत किया गया और लंबे समय तक इस विषय पर राजनीतिक संघर्ष चलता रहा, फिर भी इस आंदोलन ने पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में स्वशासन की अवधारणा को लोकप्रिय बना दिया।
➣ भारत के शिक्षित नेताओं ने भी इस मॉडल का अध्ययन किया और यह निष्कर्ष निकाला कि यदि आयरलैंड स्वशासन की माँग कर सकता है, तो भारत को भी समान अधिकार मिलने चाहिए।
➣ विशेष रूप से एनी बेसेंट, जो मूलतः आयरलैंड से संबंधित थीं और ब्रिटिश राजनीति से भली-भाँति परिचित थीं, उन्होंने भारत में भी Home Rule शब्द का प्रयोग जानबूझकर किया ताकि ब्रिटिश जनता और संसद के सामने भारतीय माँग को संवैधानिक तथा वैध रूप में प्रस्तुत किया जा सके।
दो अलग-अलग लीग बनाने का निर्णय क्यों लिया गया?
➣ यद्यपि बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट दोनों का उद्देश्य भारत के लिए स्वशासन प्राप्त करना था, फिर भी उन्होंने एक संयुक्त संगठन बनाने के स्थान पर दो अलग-अलग होमरूल लीग स्थापित करने का निर्णय लिया।
➣ ऐसा नहीं था कि दोनों नेताओं के बीच विचारों का कोई बड़ा मतभेद था। वास्तव में दोनों का लक्ष्य एक ही था, लेकिन उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए अलग-अलग संगठन बनाकर कार्य करना अधिक उपयुक्त माना गया।
➣ वास्तव में प्रारम्भ में दोनों नेताओं का प्रयास एक ही संगठन के माध्यम से होमरूल आंदोलन चलाने का था। 1914 ई. के कांग्रेस अधिवेशन में नरम दल और गरम दल के बीच समझौता कराने का प्रयास किया गया, लेकिन यह सफल नहीं हो सका। इसके बाद दोनों नेताओं ने अपने-अपने स्तर पर राजनीतिक गतिविधियाँ पुनः आरम्भ करने का निर्णय लिया।
➣ इसके बाद 1915 ई. के कांग्रेस अधिवेशन में एनी बेसेंट ने कांग्रेस से होमरूल लीग की स्थापना का प्रस्ताव स्वीकार करने का आग्रह किया, किन्तु कांग्रेस ने इसे पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया।
➣ कांग्रेस ने केवल इतना आश्वासन दिया कि वह जनशिक्षा संबंधी प्रचार कार्य करेगी तथा स्थानीय समितियों को पुनः सक्रिय बनाएगी।
➣ इस पर एनी बेसेंट ने स्पष्ट किया कि यदि सितंबर 1916 ई. तक कांग्रेस अपनी इन प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं करती, तो वे स्वयं अपनी होमरूल लीग स्थापित करने के लिए स्वतंत्र होंगी।
➣ दूसरी ओर लोकमान्य तिलक कांग्रेस के इस निर्णय की प्रतीक्षा करने के पक्ष में नहीं थे। यही कारण था कि दोनों लीगों की स्थापना की तिथियाँ भी अलग-अलग रहीं – तिलक की लीग अप्रैल 1916 में तथा बेसेंट की लीग सितंबर 1916 में अस्तित्व में आई।
➣ इसके अतिरिक्त कांग्रेस के भीतर नरम दल और गरम दल के मतभेद भी अलग-अलग लीग बनाने के निर्णय का एक महत्वपूर्ण कारण थे। लोकमान्य तिलक गरम दल के सबसे प्रभावशाली नेता थे, जबकि एनी बेसेंट के नरम दल के अनेक नेताओं से भी अच्छे संबंध थे।
➣ ऐसी स्थिति में यदि दोनों एक ही संगठन का गठन करते, तो नेतृत्व, संगठन तथा कार्यप्रणाली जैसे विषयों पर अनावश्यक मतभेद उत्पन्न हो सकते थे। इसी कारण दोनों नेताओं ने आपसी सहमति से अलग-अलग लीग स्थापित करने का निर्णय लिया। इससे प्रत्येक नेता अपनी कार्यशैली के अनुसार संगठन का संचालन कर सका, जबकि दोनों का उद्देश्य और आंदोलन की दिशा समान बनी रही।
➣ यद्यपि दोनों लीग प्रशासनिक दृष्टि से अलग थीं, फिर भी उनके बीच किसी प्रकार की प्रतिस्पर्धा नहीं थी। दोनों एक-दूसरे के प्रयासों का समर्थन करते रहे और स्वशासन की माँग को पूरे देश में लोकप्रिय बनाने के लिए मिलकर कार्य करते रहे।
➣ यही कारण है कि इतिहास में दोनों लीगों को सामूहिक रूप से होमरूल लीग आंदोलन के नाम से जाना जाता है।
तिलक की इंडियन होमरूल लीग
➣ लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 28 अप्रैल 1916 ई. को बेलगाँव (वर्तमान कर्नाटक) में इंडियन होमरूल लीग की स्थापना की। इसका औपचारिक शुभारंभ बॉम्बे प्रांतीय सम्मेलन के अवसर पर हुआ तथा इसका मुख्यालय पूना (वर्तमान पुणे) में स्थापित किया गया।
➣ लीग के प्रथम अध्यक्ष जोसेफ बैप्टिस्टा थे। इसका कार्यक्षेत्र मुख्यतः महाराष्ट्र (बॉम्बे शहर को छोड़कर), कर्नाटक, मध्य प्रांत तथा बरार तक सीमित था। संगठनात्मक दृष्टि से इसकी 6 प्रमुख शाखाएँ स्थापित की गईं, जिनके माध्यम से स्थानीय स्तर पर सभाएँ, राजनीतिक प्रशिक्षण, सदस्यता अभियान तथा प्रचार कार्य संचालित किए जाते थे।
➣ तिलक का विश्वास था कि स्वशासन केवल नेताओं के प्रयासों से नहीं, बल्कि जनता की सक्रिय भागीदारी से प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने गाँवों और कस्बों तक पहुँचकर लोगों को राजनीतिक अधिकारों के प्रति जागरूक करने पर विशेष बल दिया।
➣ उनका प्रसिद्ध उद्घोष- स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूँगा होमरूल आंदोलन का सबसे लोकप्रिय संदेश बन गया और इसने देशभर के राष्ट्रवादियों में नया उत्साह उत्पन्न किया।
संगठन एवं कार्यप्रणाली
➣ तिलक संगठन निर्माण के महत्व को भली-भाँति समझते थे। उनका मानना था कि केवल बड़े नेताओं के भाषणों से स्वराज्य प्राप्त नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए गाँव-गाँव तक संगठित राजनीतिक नेटवर्क बनाना आवश्यक है। इसी सोच के आधार पर उन्होंने इंडियन होमरूल लीग को अत्यंत अनुशासित और सुव्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया।
➣ लीग का संचालन एक केंद्रीय समिति के माध्यम से होता था, जो विभिन्न शाखाओं की गतिविधियों का समन्वय करती थी। प्रत्येक शाखा में स्थानीय कार्यकर्ताओं की नियुक्ति की जाती थी, जो सदस्यता अभियान चलाने, सभाएँ आयोजित करने तथा जनता के बीच राजनीतिक प्रचार करने का कार्य करते थे।
➣ तिलक ने विशेष रूप से शिक्षित युवाओं, वकीलों, अध्यापकों, विद्यार्थियों तथा स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं को लीग से जोड़ने पर बल दिया। वे मानते थे कि यही वर्ग जनता और नेतृत्व के बीच सेतु का कार्य कर सकता है। इसलिए प्रत्येक शाखा में ऐसे स्वयंसेवकों का समूह तैयार किया गया, जो विभिन्न नगरों एवं गाँवों में जाकर स्वशासन के विचार का प्रचार करे।
➣ तिलक की लीग की एक अन्य विशेषता उसका अनुशासन था। प्रत्येक शाखा को नियमित रिपोर्ट केंद्रीय नेतृत्व को भेजनी होती थी, जिससे संगठन की गतिविधियों पर निरंतर निगरानी बनी रहती थी। इसी सुव्यवस्थित ढाँचे के कारण इतिहासकार तिलक की लीग को अधिक संगठित और अनुशासित मानते हैं।
प्रमुख नेता एवं सहयोगी
| नेता | योगदान |
|---|---|
| जोसेफ बैप्टिस्टा | इंडियन होमरूल लीग के प्रथम अध्यक्ष। संगठन के प्रशासनिक संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। |
| एन. सी. केलकर | लेखन, पत्रकारिता तथा राजनीतिक प्रचार के माध्यम से आंदोलन को सुदृढ़ बनाया। |
| जी. एस. खापर्डे | मध्य भारत तथा बरार क्षेत्र में लीग के विस्तार में उल्लेखनीय योगदान दिया। |
प्रचार के साधन
➣ तिलक का मानना था कि जब तक जनता को स्वशासन का वास्तविक अर्थ और उसकी आवश्यकता नहीं समझाई जाएगी, तब तक आंदोलन सफल नहीं हो सकता। इसलिए उन्होंने राजनीतिक शिक्षा को आंदोलन का प्रमुख आधार बनाया।
➣ उन्होंने अपने प्रसिद्ध समाचार-पत्र केसरी (मराठी) तथा द मराठा के माध्यम से राष्ट्रवादी विचारों का व्यापक प्रचार किया। इन पत्रों में प्रकाशित लेखों द्वारा स्वराज्य, राजनीतिक अधिकारों तथा ब्रिटिश नीतियों की आलोचना जनता तक पहुँचती थी।
➣ इसके अतिरिक्त तिलक ने देश के अनेक नगरों और कस्बों की यात्राएँ कर विशाल जनसभाओं को संबोधित किया। उनके भाषणों में स्वराज्य, राष्ट्रीय एकता, राजनीतिक अधिकार तथा जनता की जिम्मेदारी जैसे विषय प्रमुख रहते थे। इन सभाओं और भाषणों ने विशेष रूप से युवाओं और विद्यार्थियों में राष्ट्रीय चेतना का संचार किया।
एनी बेसेंट की ऑल इंडिया होमरूल लीग
➣ एनी बेसेंट ने सितंबर 1916 ई. में ऑल इंडिया होमरूल लीग की स्थापना की। इसका मुख्यालय अड्यार (मद्रास/चेन्नई) स्थित थियोसॉफिकल सोसायटी के परिसर में बनाया गया।
➣ तिलक की लीग की तुलना में इसका कार्यक्षेत्र अधिक व्यापक था। इसने तिलक के कार्यक्षेत्र को छोड़कर भारत के लगभग सभी प्रांतों में अपनी गतिविधियाँ संचालित कीं। थियोसॉफिकल सोसायटी की पहले से स्थापित शाखाओं, शिक्षण संस्थानों तथा स्थानीय समर्थकों के सहयोग से अल्प समय में इसका व्यापक विस्तार हुआ और इसकी लगभग 200 शाखाएँ स्थापित की गईं।
संगठन एवं कार्यप्रणाली
➣ ऑल इंडिया होमरूल लीग का संगठन व्यापक नेटवर्क पर आधारित था। जॉर्ज अरुंडेल इसके संगठन सचिव थे, जिन्होंने विभिन्न प्रांतों में शाखाओं की स्थापना, सदस्यता विस्तार तथा प्रचार कार्यक्रमों के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ इसकी प्रत्येक शाखा को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कार्य करने की पर्याप्त स्वतंत्रता प्राप्त थी। शाखाएँ नियमित रूप से सभाएँ आयोजित करती थीं, सदस्यता अभियान चलाती थीं तथा स्वशासन के पक्ष में जनमत तैयार करती थीं। इसी कारण इसका प्रचार अपेक्षाकृत तेजी से पूरे देश में फैल सका।
➣ यद्यपि व्यापक विस्तार के कारण इसका संगठनात्मक अनुशासन तिलक की लीग जितना सुदृढ़ नहीं था, फिर भी जनसंपर्क, प्रचार तथा राजनीतिक जागरूकता फैलाने में इस लीग ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और होमरूल आंदोलन को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया।
प्रमुख नेता एवं सहयोगी
| नेता | योगदान |
|---|---|
| जॉर्ज अरुंडेल | संगठन सचिव के रूप में विभिन्न प्रांतों में शाखाओं के समन्वय, सदस्यता विस्तार तथा प्रचार कार्यक्रमों का संचालन किया। |
| बी. डब्ल्यू. वाडिया | दक्षिण भारत में होमरूल आंदोलन के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। |
| सी. पी. रामास्वामी अय्यर | दक्षिण भारत में लीग के संगठन एवं प्रचार कार्य को सुदृढ़ बनाया। |
| जमनादास द्वारकादास | पश्चिमी भारत में होमरूल आंदोलन के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। |
| शंकरलाल बैंकर | पश्चिमी भारत में लीग की गतिविधियों के विस्तार में सक्रिय भूमिका निभाई। |
| जवाहरलाल नेहरू | इलाहाबाद में होमरूल आंदोलन के प्रचार में सक्रिय भाग लिया। बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि इस आंदोलन ने उनके राजनीतिक जीवन को नई दिशा दी। |
प्रचार के साधन
➣ एनी बेसेंट का मानना था कि स्वशासन की अवधारणा को जनता तक पहुँचाने के लिए व्यापक राजनीतिक शिक्षा आवश्यक है। इसलिए उन्होंने प्रचार को आंदोलन का प्रमुख आधार बनाया।
➣ उन्होंने अपने प्रसिद्ध समाचार-पत्र New India तथा Commonweal के माध्यम से होमरूल की आवश्यकता पर विस्तार से लेख लिखे। इन समाचार-पत्रों ने शिक्षित भारतीयों के बीच स्वशासन की माँग को वैचारिक आधार प्रदान किया तथा ब्रिटिश सरकार की नीतियों की आलोचना भी की।
➣ इसके अतिरिक्त उन्होंने विभिन्न नगरों में सार्वजनिक सभाओं एवं भाषणों के माध्यम से स्वशासन का प्रचार किया। उनके प्रयासों से देशभर में राजनीतिक चेतना का विस्तार हुआ और होमरूल आंदोलन को अखिल भारतीय पहचान प्राप्त हुई।
दोनों होमरूल लीग : एक झलक में
➣ यद्यपि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट दोनों का अंतिम उद्देश्य भारत के लिए स्वशासन प्राप्त करना था, फिर भी उनकी लीगों की स्थापना, संगठन, कार्यक्षेत्र, कार्यशैली तथा प्रचार के तरीकों में अनेक महत्वपूर्ण अंतर थे।
➣ दोनों नेताओं ने परस्पर सहयोग बनाए रखा, परंतु आंदोलन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतंत्र संगठन विकसित किए।
| आधार | तिलक की इंडियन होमरूल लीग | एनी बेसेंट की ऑल इंडिया होमरूल लीग |
|---|---|---|
| संस्थापक | लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक | एनी बेसेंट |
| स्थापना | 28 अप्रैल 1916 ई. | सितंबर 1916 ई. |
| स्थापना-स्थान | बेलगाँव (वर्तमान कर्नाटक) | अड्यार (मद्रास/चेन्नई) |
| मुख्यालय | पूना (वर्तमान पुणे) | अड्यार (मद्रास/चेन्नई) |
| प्रमुख पदाधिकारी | जोसेफ बैप्टिस्टा (प्रथम अध्यक्ष) | जॉर्ज अरुंडेल (संगठन सचिव) |
| कार्यक्षेत्र | महाराष्ट्र (बॉम्बे शहर को छोड़कर), कर्नाटक, मध्य प्रांत तथा बरार | तिलक के कार्यक्षेत्र को छोड़कर भारत के लगभग सभी प्रांत |
| संगठन | केंद्रीय समिति के माध्यम से संचालित, अधिक अनुशासित एवं सुव्यवस्थित। | थियोसॉफिकल सोसायटी के नेटवर्क पर आधारित, व्यापक एवं अपेक्षाकृत विकेंद्रीकृत। |
| शाखाएँ | 6 प्रमुख शाखाएँ | लगभग 200 शाखाएँ |
| प्रमुख सहयोगी | एन. सी. केलकर, जी. एस. खापर्डे | बी. डब्ल्यू. वाडिया, सी. पी. रामास्वामी अय्यर, जमनादास द्वारकादास, शंकरलाल बैंकर, जवाहरलाल नेहरू |
| प्रचार के प्रमुख साधन | केसरी, द मराठा, सार्वजनिक सभाएँ एवं भाषण | New India, Commonweal, सार्वजनिक सभाएँ एवं भाषण |
| प्रमुख विशेषता | सीमित कार्यक्षेत्र के बावजूद सुदृढ़ संगठन, अनुशासन एवं प्रभावी राजनीतिक प्रशिक्षण। | व्यापक कार्यक्षेत्र, अखिल भारतीय विस्तार, जनसंपर्क एवं राजनीतिक जागरूकता पर विशेष बल। |
सरकार की प्रतिक्रिया
➣ ब्रिटिश सरकार ने प्रारम्भ में होमरूल लीग आंदोलन को एक सीमित राजनीतिक अभियान मानकर अधिक गंभीरता से नहीं लिया। किंतु जब कुछ ही महीनों में इसकी शाखाएँ तेजी से बढ़ने लगीं, सभाओं में बड़ी संख्या में लोग भाग लेने लगे और स्वशासन की माँग पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई, तब सरकार चिंतित हो उठी।
➣ सरकार को भय था कि यदि यह आंदोलन इसी प्रकार फैलता रहा, तो यह ब्रिटिश शासन के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। इसलिए प्रशासन ने आंदोलन की गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखनी प्रारम्भ कर दी।
➣ विभिन्न प्रांतों के अधिकारियों को नेताओं की सभाओं, भाषणों तथा प्रकाशनों पर रिपोर्ट भेजने के निर्देश दिए गए।
➣ राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों पर नियंत्रण बढ़ाया गया तथा अनेक स्थानों पर सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध लगाने या उन्हें सीमित करने का प्रयास किया गया। कुछ नेताओं की यात्राओं पर भी प्रतिबंध लगाए गए और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को प्रशासनिक दबाव का सामना करना पड़ा।
➣ इन दमनात्मक उपायों के बावजूद होमरूल आंदोलन की लोकप्रियता कम नहीं हुई। इसके विपरीत, सरकारी प्रतिबंधों ने जनता की सहानुभूति आंदोलन के पक्ष में और अधिक बढ़ा दी। लोगों में यह भावना मजबूत हुई कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों की वैध राजनीतिक माँगों को भी दबाना चाहती है।
एनी बेसेंट की गिरफ्तारी एवं देशव्यापी विरोध
➣ होमरूल आंदोलन की बढ़ती लोकप्रियता से चिंतित ब्रिटिश सरकार ने उसके नेतृत्व को कमजोर करने का निर्णय लिया। इसी क्रम में जून 1917 ई. में एनी बेसेंट, बी. पी. वाडिया तथा जॉर्ज अरुंडेल को उटकमंड, वर्तमान ऊटी, तमिलनाडु) में नज़रबंद कर दिया गया।
➣ सरकार का उद्देश्य आंदोलन के सबसे प्रभावशाली नेतृत्व को जनता से अलग करना था, जिससे उसकी गति धीमी पड़ जाए। नज़रबंदी के दौरान उनके सार्वजनिक भाषण देने, लेख प्रकाशित करने तथा राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया।
➣ एनी बेसेंट की नज़रबंदी का समाचार पूरे देश में तेजी से फैल गया। यह कदम सरकार के लिए उल्टा पड़ गया, क्योंकि जिन लोगों ने पहले आंदोलन में सक्रिय भाग नहीं लिया था, वे भी अब इसके समर्थन में सामने आने लगे।
➣ लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने भी इस कार्रवाई का कड़ा विरोध किया और इसे भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों का दमन बताया। कांग्रेस के नरम एवं गरम दल के अनेक नेता भी इस मुद्दे पर एकजुट हो गए, जिससे होमरूल आंदोलन को पहले की अपेक्षा अधिक राष्ट्रीय समर्थन प्राप्त हुआ।
➣ एनी बेसेंट की नज़रबंदी के विरोध में भारत के विभिन्न भागों में व्यापक प्रदर्शन हुए। अनेक नगरों में सार्वजनिक सभाएँ आयोजित की गईं, विरोध प्रस्ताव पारित किए गए तथा सरकार से उन्हें तत्काल रिहा करने की माँग की गई।
➣ इस विरोध में केवल होमरूल लीग के सदस्य ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के नेता, विद्यार्थी, शिक्षित वर्ग और विभिन्न सार्वजनिक संस्थाएँ भी शामिल हुईं। देशभर के समाचार-पत्रों ने भी सरकार की इस कार्रवाई की तीखी आलोचना की तथा कई प्रांतीय राजनीतिक संगठनों ने ब्रिटिश सरकार को ज्ञापन भेजकर उनकी रिहाई की माँग की।
➣ ➣ इस गिरफ्तारी के विरोध में सर एस. सुब्रह्मण्य अय्यर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदत्त अपनी नाइटहुड की उपाधि लौटा दी। वे नाइटहुड की उपाधि प्राप्त करने वाले प्रथम भारतीय थे। उनका यह कदम ब्रिटिश शासन के विरुद्ध नैतिक प्रतिरोध का एक महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।
➣ बढ़ते जनदबाव और आंदोलन की लोकप्रियता को देखते हुए ब्रिटिश सरकार को अपनी नीति में कुछ नरमी दिखानी पड़ी। 20 अगस्त 1917 ई. को भारत सचिव एडविन मॉण्टेग्यू ने प्रसिद्ध मॉण्टेग्यू घोषणा जारी की, जिसमें भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी शासन स्थापित करने का लक्ष्य स्वीकार किया गया।
यहाँ क्रमिक रूप से उत्तरदायी शासन का अर्थ था कि भारत को एक साथ पूर्ण स्वशासन नहीं दिया जाएगा, बल्कि धीरे-धीरे भारतीयों को शासन में अधिक अधिकार और जिम्मेदारियाँ दी जाएँगी। इसी क्रम में आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1919 तथा भारत सरकार अधिनियम, 1935 जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिनियम पारित किए गए।
➣ यद्यपि यह घोषणा भारतीयों की सभी अपेक्षाओं को पूरा नहीं करती थी, फिर भी इसे होमरूल आंदोलन द्वारा उत्पन्न राजनीतिक दबाव का एक महत्वपूर्ण परिणाम माना जाता है।
➣ जनदबाव के कारण अंततः ब्रिटिश सरकार को एनी बेसेंट को रिहा करना पड़ा। उनकी रिहाई के बाद उनकी लोकप्रियता और भी बढ़ गई तथा वे 1917 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष निर्वाचित हुईं।
➣ इस प्रकार एनी बेसेंट की नज़रबंदी और उसके विरुद्ध हुए देशव्यापी विरोध ने होमरूल आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की तथा भारतीय राजनीति में स्वशासन की माँग को और अधिक सशक्त बना दिया।
होम रूल लीग का पतन
➣ यद्यपि एनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक की होम रूल लीगें समान उद्देश्य के लिए कार्य करती थीं, फिर भी दोनों संगठनों का आपस में औपचारिक विलय कभी नहीं हुआ। नेतृत्व एवं संगठनात्मक स्वतंत्रता बनाए रखने के कारण दोनों लीगें अलग-अलग रहीं, जिससे आंदोलन की एकीकृत शक्ति कुछ हद तक प्रभावित हुई।
➣ 1917 ई. तक तिलक और बेसेंट दोनों की लीगों का प्रभाव मुख्यतः शिक्षित एवं शहरी मध्यम वर्ग, वकीलों, शिक्षकों, पत्रकारों तथा कॉलेज छात्रों तक ही सीमित रहा। ग्रामीण जनता और किसानों की भागीदारी अपेक्षाकृत कम थी, इसलिए यह आंदोलन व्यापक जनआंदोलन का स्वरूप नहीं ले सका।
➣ आंदोलन ने आरंभ से ही संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों – जैसे सभाएँ, व्याख्यान, पर्चे तथा समाचार-पत्रों के माध्यम से प्रचार को अपनाया। परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार पर तत्काल और निर्णायक दबाव नहीं बन पाया।
➣ 20 अगस्त 1917 ई. की मॉन्टेग्यू घोषणा (अगस्त घोषणा) के बाद भारतीय नेताओं के एक वर्ग को राजनीतिक सुधारों एवं उत्तरदायी शासन की आशा बंधी। इसके पश्चात आंदोलन की तीव्रता धीरे-धीरे कम होने लगी और एनी बेसेंट ने भी अपेक्षाकृत नरम एवं संवैधानिक नीति अपनाई।
➣ दिसंबर 1917 ई. के कलकत्ता अधिवेशन में एनी बेसेंट भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गईं। इसके बाद उनका ध्यान कांग्रेस की गतिविधियों की ओर अधिक केंद्रित हो गया, जिससे होम रूल आंदोलन की गति प्रभावित हुई।
➣ 1918 ई. में बाल गंगाधर तिलक मानहानि मुकदमे (प्रिवी काउंसिल) के सिलसिले में इंग्लैंड चले गए। उनकी अनुपस्थिति तथा एनी बेसेंट की घटती सक्रियता के कारण आंदोलन का प्रभावी नेतृत्व कमजोर पड़ गया।
➣ आंदोलन के भीतर संगठनात्मक समन्वय का अभाव, कांग्रेस पर स्वतंत्र दबाव-समूह के रूप में सीमित प्रभाव तथा बदलती राजनीतिक परिस्थितियों ने भी इसकी गति को कमजोर किया।
➣ 1919 ई. के बाद रॉलेट एक्ट, जलियाँवाला बाग हत्याकांड तथा महात्मा गांधी के नेतृत्व में सत्याग्रह एवं असहयोग जैसे जनआंदोलनों ने राष्ट्रीय राजनीति को नई दिशा दी। जनता का ध्यान धीरे-धीरे गांधीजी के नेतृत्व वाले आंदोलनों की ओर केंद्रित होने लगा, जिससे होम रूल आंदोलन का महत्व लगातार घटता गया।
➣ अंततः 1920 ई. में होम रूल लीग का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय कर दिया गया। इस प्रकार सीमित जनाधार, दोनों लीगों के बीच औपचारिक एकीकरण का अभाव, नेतृत्व की बदलती परिस्थितियाँ तथा गांधी युग के उदय के कारण होम रूल लीग का प्रभाव समाप्त हो गया।
होमरूल लीग आंदोलन की समयरेखा (Timeline)
| वर्ष / तिथि | घटना |
|---|---|
| 1907 ई. | सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का नरम दल एवं गरम दल में विभाजन। |
| 1908 ई. | लोकमान्य तिलक को राजद्रोह के आरोप में मांडले (बर्मा) भेजा गया। |
| जून 1914 ई. | मांडले जेल से तिलक की रिहाई। |
| अगस्त 1914 ई. | प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ; भारत से ब्रिटेन को व्यापक सहयोग। |
| 1914–1915 ई. | एनी बेसेंट द्वारा New India एवं Commonweal के माध्यम से होमरूल का प्रचार। |
| 28 अप्रैल 1916 ई. | बाल गंगाधर तिलक ने बेलगाँव में इंडियन होमरूल लीग की स्थापना की। |
| सितंबर 1916 ई. | एनी बेसेंट ने मद्रास में ऑल इंडिया होमरूल लीग की स्थापना की। |
| दिसंबर 1916 ई. | लखनऊ अधिवेशन में कांग्रेस का पुनर्मिलन तथा कांग्रेस–मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौता। |
| जून 1917 ई. | एनी बेसेंट, बी. डब्ल्यू. वाडिया एवं जॉर्ज अरुंडेल को नज़रबंद किया गया। |
| 20 अगस्त 1917 ई. | मॉण्टेग्यू घोषणा जारी; भारत में क्रमिक उत्तरदायी शासन स्थापित करने का लक्ष्य स्वीकार। |
| सितंबर 1917 ई. | जनदबाव के कारण एनी बेसेंट को रिहा किया गया। |
| दिसंबर 1917 ई. | एनी बेसेंट भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष निर्वाचित हुईं। |
| 1918–1919 ई. | होमरूल आंदोलन की गति धीरे-धीरे कम होने लगी। |
| 1920 ई. | महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन प्रारम्भ; होमरूल लीग की गतिविधियाँ कांग्रेस में समाहित होने लगीं। |
होमरूल लीग आंदोलन से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्व
| व्यक्तित्व | योगदान |
|---|---|
| लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक | इंडियन होमरूल लीग के संस्थापक; पश्चिम एवं मध्य भारत में आंदोलन का नेतृत्व किया। |
| एनी बेसेंट | ऑल इंडिया होमरूल लीग की संस्थापक; आंदोलन को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया। |
| जोसेफ बैप्टिस्टा | तिलक की लीग के प्रथम अध्यक्ष तथा प्रमुख संगठनकर्ता। |
| जॉर्ज अरुंडेल | ऑल इंडिया होमरूल लीग के संगठन सचिव; शाखाओं के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका। |
| बी. डब्ल्यू. वाडिया | एनी बेसेंट के निकट सहयोगी; दक्षिण भारत में आंदोलन के प्रमुख प्रचारक। |
| एन. सी. केलकर | तिलक के प्रमुख सहयोगी; लेखन एवं राजनीतिक प्रचार के माध्यम से आंदोलन को सशक्त बनाया। |
| जी. एस. खापर्डे | मध्य प्रांत एवं बरार में होमरूल आंदोलन के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान। |
| सी. पी. रामास्वामी अय्यर | दक्षिण भारत में एनी बेसेंट की लीग के प्रमुख कार्यकर्ता। |
| जमनादास द्वारकादास | पश्चिमी भारत में होमरूल आंदोलन के सक्रिय प्रचारक। |
| शंकरलाल बैंकर | एनी बेसेंट की लीग के प्रमुख सहयोगी; गुजरात क्षेत्र में संगठन को मजबूत किया। |
| जवाहरलाल नेहरू | युवा अवस्था में एनी बेसेंट की लीग से जुड़े; इसी आंदोलन से उनके राजनीतिक जीवन को नई दिशा मिली। |
महत्वपूर्ण तथ्य
- होमरूल लीग आंदोलन की शुरुआत 1916 ई. में हुई।
- होमरूल का अर्थ है-ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत रहते हुए स्वशासन (Self-Government)।
- होमरूल लीग वास्तव में दो अलग-अलग संगठनों का संयुक्त आंदोलन था।
- लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 28 अप्रैल 1916 ई. को बेलगाँव में इंडियन होमरूल लीग की स्थापना की।
- एनी बेसेंट ने सितंबर 1916 ई. में मद्रास में ऑल इंडिया होमरूल लीग की स्थापना की।
- तिलक की लीग का मुख्यालय पूना (पुणे) तथा एनी बेसेंट की लीग का मुख्यालय अड्यार (चेन्नई) था।
- तिलक की लीग के प्रथम अध्यक्ष जोसेफ बैप्टिस्टा थे।
- एनी बेसेंट की लीग के संगठन सचिव जॉर्ज अरुंडेल थे।
- तिलक की लीग का कार्यक्षेत्र महाराष्ट्र (बॉम्बे शहर को छोड़कर), कर्नाटक, मध्य प्रांत एवं बरार था।
- एनी बेसेंट की लीग का कार्यक्षेत्र भारत का शेष भाग (बॉम्बे शहर सहित) था।
- तिलक की लीग की लगभग 6 शाखाएँ तथा एनी बेसेंट की लीग की लगभग 200 शाखाएँ थीं।
- तिलक का प्रसिद्ध नारा था-स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूँगा।
- एनी बेसेंट ने New India तथा Commonweal के माध्यम से होमरूल का प्रचार किया।
- तिलक ने केसरी एवं द मराठा के माध्यम से राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार किया।
- जून 1917 ई. में एनी बेसेंट, बी. डब्ल्यू. वाडिया तथा जॉर्ज अरुंडेल को नज़रबंद किया गया।
- 20 अगस्त 1917 ई. को मॉण्टेग्यू घोषणा जारी की गई।
- 1917 ई. में एनी बेसेंट भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष बनीं।
- होमरूल आंदोलन ने लखनऊ समझौते (1916) की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- इस आंदोलन ने आगे चलकर महात्मा गांधी के जन-आंदोलनों के लिए आधार तैयार किया।
- 1920 ई. में असहयोग आंदोलन के प्रारम्भ के साथ होमरूल लीग की गतिविधियाँ धीरे-धीरे कांग्रेस में समाहित हो गईं।
कुछ महत्वपूर्ण भ्रम-बिंदु
➣ होमरूल लीग कोई एक संगठन नहीं था, बल्कि यह लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट द्वारा स्थापित दो अलग-अलग लीगों का संयुक्त आंदोलन था।
➣ लोकमान्य तिलक और एनी बेसेंट ने अलग-अलग होमरूल लीगों की स्थापना अवश्य की थी, लेकिन दोनों के बीच किसी प्रकार का राजनीतिक विरोध नहीं था। दोनों समान उद्देश्य के लिए मिलकर कार्य कर रहे थे।
➣ लोकमान्य तिलक ने 1914 ई. में मांडले कारागार से रिहा होने के बाद ही होमरूल आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
➣ एनी बेसेंट ने भारतीय राजनीति में सक्रिय प्रवेश 1914 ई. में किया था। इससे पहले वे मुख्यतः थियोसॉफिकल सोसायटी तथा शिक्षा संबंधी कार्यों से जुड़ी थीं।
➣ तिलक की इंडियन होमरूल लीग की स्थापना बेलगाँव में हुई थी, जबकि एनी बेसेंट की ऑल इंडिया होमरूल लीग की स्थापना मद्रास (अड्यार) में हुई थी।
➣ दोनों लीगों के मुख्यालय भी अलग-अलग थे। तिलक की लीग का मुख्यालय पूना (पुणे) में था, जबकि एनी बेसेंट की लीग का मुख्यालय अड्यार (चेन्नई) में स्थित था।
➣ इंडियन होमरूल लीग और ऑल इंडिया होमरूल लीग का कार्यक्षेत्र भी अलग-अलग निर्धारित किया गया था, ताकि दोनों संगठन बिना प्रतिस्पर्धा के पूरे देश में स्वशासन का प्रचार कर सकें।
➣ जोसेफ बैप्टिस्टा एनी बेसेंट की लीग के नहीं, बल्कि तिलक की इंडियन होमरूल लीग के प्रथम अध्यक्ष थे।
➣ जॉर्ज अरुंडेल तिलक की लीग से नहीं, बल्कि एनी बेसेंट की ऑल इंडिया होमरूल लीग के संगठन सचिव थे।
➣ जवाहरलाल नेहरू तिलक की लीग से नहीं, बल्कि एनी बेसेंट की ऑल इंडिया होमरूल लीग से जुड़े थे।
➣ होमरूल आंदोलन का तत्कालीन उद्देश्य पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना नहीं था, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वशासन (Home Rule) प्राप्त करना था।
➣ होमरूल आंदोलन पहला ऐसा राष्ट्रीय आंदोलन था, जिसने कांग्रेस की गतिविधियों को केवल वार्षिक अधिवेशनों तक सीमित न रखकर पूरे वर्ष चलने वाले संगठित जन-अभियान का स्वरूप दिया।
➣ मॉण्टेग्यू घोषणा 1919 ई. में नहीं, बल्कि 20 अगस्त 1917 ई. को जारी की गई थी।
➣ एनी बेसेंट भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष (1917) थीं, जबकि सरोजिनी नायडू (1925) कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष थीं।
➣ होमरूल आंदोलन की शुरुआत महात्मा गांधी ने नहीं, बल्कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट ने की थी।
➣ होमरूल आंदोलन ने आगे चलकर महात्मा गांधी के नेतृत्व में प्रारम्भ हुए असहयोग आंदोलन के लिए अनुकूल राजनीतिक वातावरण तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
निष्कर्ष
➣ होमरूल लीग आंदोलन (1916–1918) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का एक महत्वपूर्ण चरण था, जिसने स्वशासन (होमरूल) की माँग को राष्ट्रीय स्तर पर संगठित स्वरूप प्रदान किया। इस आंदोलन ने कांग्रेस की गतिविधियों को केवल वार्षिक अधिवेशनों तक सीमित न रखकर पूरे वर्ष चलने वाले राजनीतिक अभियान में बदल दिया।
➣ इस आंदोलन के परिणामस्वरूप लखनऊ समझौता (1916) को अनुकूल वातावरण मिला तथा ब्रिटिश सरकार को मॉण्टेग्यू घोषणा (1917) करने के लिए प्रेरित होना पड़ा। आगे चलकर इसी घोषणा के आधार पर भारत सरकार अधिनियम, 1919 पारित किया गया।
➣ यद्यपि इस आंदोलन का उद्देश्य तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना नहीं था, फिर भी इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई गति प्रदान की।
➣ आगे चलकर महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुए असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा अन्य राष्ट्रीय आंदोलनों के लिए इसी आंदोलन ने संगठनात्मक एवं राजनीतिक आधार तैयार किया।
➣ इसी कारण होमरूल लीग आंदोलन को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उदारवादी राजनीति और गांधी युग के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है।
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