भारत सरकार अधिनियम, 1919 (मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) : परिचय
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 ब्रिटिश शासन द्वारा पारित एक महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिनियम था, जिसने भारत की प्रशासनिक एवं शासन-व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। इसे मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार के नाम से भी जाना जाता है।
➣ यह अधिनियम 23 दिसंबर 1919 को ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया तथा इसके अधिकांश प्रावधान 1921 ई. से लागू किए गए। यह अधिनियम 20 अगस्त 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा तथा मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) की सिफारिशों के आधार पर बनाया गया था।
➣ इसका मुख्य उद्देश्य भारतीयों को प्रशासन में अधिक भागीदारी देना तथा भारत में उत्तरदायी शासन की दिशा में क्रमिक रूप से आगे बढ़ना था।
➣ ध्यान देने योग्य है कि मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) ने प्रांतों में द्वैध शासन लागू करने की केवल सिफारिश की थी, जबकि भारत सरकार अधिनियम, 1919 ने इस सिफारिश को वास्तव में कानूनी एवं संवैधानिक रूप देकर व्यवहार में लागू किया। अर्थात् रिपोर्ट “सुझाव” थी, जबकि अधिनियम उस सुझाव का “क्रियान्वयन” था।
➣ इसके अतिरिक्त केंद्रीय विधानमंडल का पुनर्गठन, मताधिकार का सीमित विस्तार, पृथक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार तथा लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान जैसे महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए।
➣ यद्यपि इस अधिनियम ने भारतीयों की प्रशासनिक भागीदारी पहले की अपेक्षा बढ़ाई, फिर भी वास्तविक सत्ता ब्रिटिश सरकार, वायसराय तथा गवर्नरों के हाथों में ही बनी रही। इसी कारण भारतीय नेताओं ने इसे अधूरा एवं अपर्याप्त सुधार माना।
➣ भारतीय संवैधानिक इतिहास में भारत सरकार अधिनियम, 1919 को एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है, क्योंकि इसी के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने पहली बार भारत में सीमित स्तर पर उत्तरदायी शासन लागू करने का प्रयास किया।
➣ आगे चलकर इस अधिनियम की कमियों के कारण व्यापक राजनीतिक असंतोष उत्पन्न हुआ। यद्यपि साइमन आयोग (1927) की नियुक्ति अधिनियम में निहित 10 वर्ष की समीक्षा-व्यवस्था के अंतर्गत ही हुई थी (जिसे निर्धारित समय से पहले गठित किया गया), किन्तु इसी असंतोष और द्वैध शासन की असफलता ने आयोग तथा भारत सरकार अधिनियम, 1935 जैसे संवैधानिक सुधारों की पृष्ठभूमि तैयार की।
पृष्ठभूमि
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 अचानक लागू नहीं किया गया था। यह ब्रिटिश सरकार की उस नीति का परिणाम था, जिसके अंतर्गत भारत में सीमित संवैधानिक सुधार लागू कर भारतीयों की प्रशासन में भागीदारी बढ़ाने का प्रयास किया गया। प्रथम विश्व युद्ध, बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन तथा भारतीय नेताओं की स्वशासन की मांग के कारण ब्रिटिश सरकार पर राजनीतिक सुधार लागू करने का दबाव लगातार बढ़ रहा था।
➣ मॉन्टेग्यू घोषणा (1917), मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) तथा भारत सरकार अधिनियम, 1919 एक ही संवैधानिक प्रक्रिया के क्रमिक चरण थे। पहले सुधारों की नीति घोषित की गई, फिर उन सुधारों की सिफारिशें की गईं और अंततः उन्हें कानून के रूप में लागू किया गया।
मॉन्टेग्यू घोषणा, 1917
(सुधारों की नीति घोषित की गई)
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मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट, 1918
(सुधारों की विस्तृत सिफारिशें प्रस्तुत की गईं)
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भारत सरकार अधिनियम, 1919
(सिफारिशों को कानून का रूप देकर लागू किया गया)
भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 और भारत सरकार अधिनियम, 1919 में अंतर
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 को सही ढंग से समझने के लिए इसकी तुलना 1909 के अधिनियम से करना उपयोगी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि संवैधानिक सुधारों में दस वर्षों में कितना और किस प्रकार का परिवर्तन आया-
| आधार | भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 | भारत सरकार अधिनियम, 1919 |
|---|---|---|
| शासन का सिद्धांत | केवल परामर्शी भागीदारी | प्रांतों में सीमित उत्तरदायी शासन (द्वैध शासन) |
| प्रांतीय कार्यपालिका | पूर्णतः गवर्नर व उसकी कार्यकारिणी के अधीन | आरक्षित व हस्तांतरित विषयों में विभाजित; भारतीय मंत्री भी शामिल |
| केंद्रीय विधानमंडल | एकसदनीय (इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल, 60 सदस्य) | द्विसदनीय (केंद्रीय विधान सभा + राज्य परिषद) |
| निर्वाचन पद्धति | अप्रत्यक्ष एवं बहुस्तरीय | प्रत्यक्ष निर्वाचन की शुरुआत (लगभग 70% सदस्य निर्वाचित) |
| पृथक निर्वाचन | केवल मुसलमानों के लिए शुरुआत | सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों, यूरोपीय समुदाय तक विस्तार |
| मताधिकार | अत्यंत सीमित, कोई निश्चित आंकड़ा नहीं | विस्तारित किन्तु सीमित (~50 लाख/~2–3% जनसंख्या) |
| लोक सेवा आयोग | कोई प्रावधान नहीं | स्थापना का प्रावधान (वास्तविक गठन 1926) |
मॉन्टेग्यू घोषणा (1917)
➣ 20 अगस्त 1917 को भारत सचिव एडविन सैमुअल मॉन्टेग्यू ने घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य भारत में उत्तरदायी शासन की दिशा में क्रमिक रूप से आगे बढ़ना है।
➣ यद्यपि इस घोषणा में तत्काल स्वशासन का कोई वचन नहीं दिया गया था, फिर भी इसने भारत में संवैधानिक सुधारों के लिए आधार तैयार किया।
मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918)
➣ मॉन्टेग्यू घोषणा के बाद भारत सचिव एडविन मॉन्टेग्यू तथा वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने भारत की प्रशासनिक व्यवस्था का अध्ययन कर जुलाई 1918 में मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट प्रकाशित की।
➣ इस रिपोर्ट में प्रांतों में द्वैध शासन, विधान परिषदों का विस्तार, मताधिकार का सीमित विस्तार तथा भारतीयों की प्रशासन में अधिक भागीदारी जैसी महत्वपूर्ण सिफारिशें की गईं।
➣ इन्हीं सिफारिशों के आधार पर ब्रिटिश संसद ने भारत सरकार अधिनियम, 1919 पारित किया, जिसने भारत की शासन-व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण संवैधानिक परिवर्तन किए।
भारत सरकार अधिनियम, 1919 की प्रमुख विशेषताएँ
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 ने भारत की केंद्रीय एवं प्रांतीय शासन-व्यवस्था में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। इस अधिनियम का उद्देश्य भारतीयों की प्रशासन में भागीदारी बढ़ाना था, किन्तु वास्तविक सत्ता अभी भी ब्रिटिश सरकार के हाथों में ही बनी रही। इस अधिनियम के अंतर्गत केंद्रीय तथा प्रांतीय प्रशासन, विधानमंडलों, निर्वाचन व्यवस्था और लोक सेवा आयोग से संबंधित अनेक नए प्रावधान किए गए।
प्रस्तावना
➣ अधिनियम की प्रस्तावना में मॉन्टेग्यू घोषणा (1917) की भावना दोहराई गई – प्रशासन की प्रत्येक शाखा में भारतीयों का बढ़ता हुआ सहयोग तथा स्वशासी संस्थाओं का क्रमिक विकास, ताकि ब्रिटिश साम्राज्य के अभिन्न अंग के रूप में ब्रिटिश भारत में उत्तरदायी शासन की प्रगतिशील प्राप्ति हो सके।
➣ किन्तु प्रस्तावना में यह भी स्पष्ट किया गया कि इस दिशा में प्रत्येक कदम का समय और स्वरूप ब्रिटिश संसद ही तय करेगी, भारतीय नहीं।
➣ प्रस्तावना में यह भी कहा गया कि प्रांतीय विषयों में प्रांतों को केंद्र सरकार से यथासंभव अधिकतम स्वतंत्रता दी जानी चाहिए, बशर्ते केंद्र के अपने दायित्वों का निर्वहन बाधित न हो। अर्थात् प्रांतों को क्रमशः अधिक स्वायत्तता देने का लक्ष्य रखा गया, जबकि केंद्रीय शासन की संरचना में मूल परिवर्तन नहीं किया गया।
केंद्र एवं प्रांतों के बीच विषयों का विभाजन
➣ अधिनियम के अंतर्गत बनाए गए नियमों (Devolution Rules, 1920) द्वारा शासन के विषयों को केंद्रीय सूची तथा प्रांतीय सूची में पृथक-पृथक निर्धारित किया गया, जिससे प्रांतों पर केंद्र का नियंत्रण कुछ शिथिल हुआ।
➣ केंद्रीय सूची में राष्ट्रीय महत्व अथवा एक से अधिक प्रांतों से संबंधित विषय रखे गए, जैसे रक्षा, विदेश मामले, रेल, डाक-तार, मुद्रा, सार्वजनिक ऋण तथा सीमा-शुल्क।
➣ प्रांतीय सूची में स्थानीय स्वशासन, शिक्षा, जनस्वास्थ्य, कृषि, भूमि राजस्व तथा पुलिस जैसे विषय रखे गए। प्रांतीय विषयों को आगे आरक्षित तथा हस्तांतरित विषयों में बाँटा गया।
➣ इसी के साथ पहली बार प्रांतीय बजट को केंद्रीय बजट से अलग किया गया और प्रांतीय विधानमंडलों को अपना बजट पारित करने का अधिकार दिया गया।
➣ इस विभाजन का आधार फीथम समिति (1918–19) की सिफारिशें थीं, जिसने केंद्र तथा प्रांतों के बीच, और प्रांतों में कार्यकारिणी परिषद तथा मंत्रियों के बीच कार्यों के बँटवारे पर अपनी रिपोर्ट दी थी।
➣ अधिनियम की धारा 1(3) के अनुसार हस्तांतरित विषयों पर गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल का अधीक्षण, निर्देशन एवं नियंत्रण केवल नियमों में निर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए ही प्रयोग किया जा सकता था। किन्तु कोई प्रयोजन उन निर्दिष्ट प्रयोजनों के भीतर आता है या नहीं, इसका एकमात्र निर्णायक स्वयं गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल था।
➣ प्रांतीय विधानमंडल भी कुछ विषयों पर गवर्नर-जनरल की पूर्व-अनुमति के बिना कानून नहीं बना सकते थे (धारा 10(3)) – जैसे नया कर लगाना (छूट-प्राप्त करों को छोड़कर), सार्वजनिक ऋण, सीमा-शुल्क या केंद्र द्वारा आरोपित करों को प्रभावित करना, केंद्रीय विषयों का विनियमन, सेनाओं के अनुशासन तथा रियासतों से संबंधों से जुड़े मामले। इसी कुछ स्रोतों में कहा जाता है कि केंद्र-प्रांत संबंधों में शिथिलता के बावजूद शासन का ढाँचा केंद्रीकृत एवं एकात्मक ही बना रहा।
केंद्रीय शासन व्यवस्था
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत केंद्र में उत्तरदायी शासन की व्यवस्था लागू नहीं की गई। केंद्रीय कार्यपालिका पहले की भाँति ब्रिटिश सम्राट, भारत सचिव तथा वायसराय के नियंत्रण में ही रही।
➣ वायसराय केंद्रीय प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी था। उसकी सहायता के लिए कार्यकारिणी परिषद कार्य करती थी, जिसमें (सेनाध्यक्ष के अतिरिक्त) 6 सदस्य होते थे (कुछ पुस्तकों में वायसराय एवं सेनाध्यक्ष को जोड़कर कुल 8 गिना जाता है), जिनमें से 3 सदस्य भारतीय रखे जाने की व्यवस्था थी (पाठ्य-पुस्तकों में इसे अधिनियम का प्रावधान बताया जाता है, जबकि अधिनियम की धारा 29 का मूल पाठ केवल परिषद के सदस्यों की संख्या की सीमा हटाता तथा योग्यताओं का दायरा बढ़ाता है)। परिषद के सदस्य ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते थे और वे भारतीय केंद्रीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं थे।
➣ अधिनियम द्वारा केंद्रीय विधानमंडल का विस्तार अवश्य किया गया, किन्तु वायसराय (गवर्नर-जनरल) को विधेयकों पर वीटो, विधानमंडल द्वारा अस्वीकृत विधेयक को प्रमाणित कर कानून बनाने, अध्यादेश जारी करने, विधानमंडल द्वारा अस्वीकृत या घटाई गई अनुदान माँगों को बहाल करने, किसी विधेयक पर विचार को रोकने तथा प्रश्न या स्थगन प्रस्ताव को अस्वीकार करने जैसी व्यापक शक्तियाँ प्राप्त थीं।
➣ रक्षा, विदेश नीति, संचार तथा अन्य अखिल भारतीय महत्व के विषय केंद्रीय सरकार के अधीन रहे। इन विषयों पर भारतीय प्रतिनिधियों का प्रभाव अत्यंत सीमित था।
इस प्रकार भारत सरकार अधिनियम, 1919 ने प्रांतों में सीमित उत्तरदायी शासन लागू किया, किन्तु केंद्र में वास्तविक सत्ता वायसराय और ब्रिटिश सरकार के हाथों में ही बनी रही।
प्रांतीय शासन व्यवस्था
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत प्रांतीय शासन-व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। पहली बार प्रांतों में द्वैध शासन की व्यवस्था लागू की गई, जो 1921 से प्रभावी हुई (अधिनियम की धारा 47(2) के अनुसार इसके विभिन्न भाग गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल द्वारा भारत सचिव की स्वीकृति से घोषित अलग-अलग तिथियों पर लागू किए जा सकते थे)।
➣ इसका उद्देश्य भारतीयों को सीमित प्रशासनिक उत्तरदायित्व देकर उन्हें शासन का व्यावहारिक अनुभव प्रदान करना था।
➣ इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रांतीय प्रशासन को दो भागों-आरक्षित तथा हस्तांतरित विषयों-में विभाजित किया गया-
| आरक्षित विषय (Reserved Subjects) | हस्तांतरित विषय (Transferred Subjects) |
|---|---|
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|
➣ आरक्षित विषयों का प्रशासन गवर्नर तथा उसकी कार्यकारिणी परिषद द्वारा संचालित किया जाता था। परिषद के सदस्य ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते थे और वे प्रांतीय विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी नहीं थे।
➣ हस्तांतरित विषयों का संचालन भारतीय मंत्रियों द्वारा किया जाता था। इनकी नियुक्ति गवर्नर करता था और वे गवर्नर के प्रसादपर्यंत पद धारण करते थे।
➣ किन्तु उनका निर्वाचित सदस्य होना आवश्यक था (अन्यथा वे 6 माह से अधिक पद पर नहीं रह सकते थे) और व्यवहार में वे प्रांतीय विधान परिषद के विश्वास पर निर्भर तथा उसके प्रति उत्तरदायी माने जाते थे।
➣ इस प्रकार प्रांतों में पहली बार भारतीय मंत्रियों को प्रशासन में प्रत्यक्ष भूमिका मिली, किन्तु महत्वपूर्ण विभागों पर नियंत्रण अभी भी ब्रिटिश अधिकारियों के हाथों में बना रहा।
➣ अधिनियम की धारा 3 के अनुसार द्वैध शासन 8 गवर्नर-प्रांतों – बंगाल, मद्रास, बंबई, संयुक्त प्रांत, पंजाब, बिहार व उड़ीसा, मध्य प्रांत तथा असम – के लिए निर्धारित किया गया। आरक्षित विषयों के लिए ये प्रांत गवर्नर-इन-काउंसिल द्वारा तथा हस्तांतरित विषयों के लिए गवर्नर तथा मंत्रियों द्वारा शासित थे।
➣ मंत्रियों की नियुक्ति गवर्नर अधिसूचना द्वारा करता था। वे कार्यकारिणी परिषद के सदस्य या सरकारी अधिकारी नहीं हो सकते थे। उनका वेतन कार्यकारिणी परिषद के सदस्य के बराबर होता था, जब तक कि विधान परिषद मत द्वारा कम वेतन तय न कर दे।
➣ हस्तांतरित विषयों में गवर्नर सामान्यतः मंत्रियों की सलाह से चलता था, किन्तु पर्याप्त कारण होने पर वह सलाह से असहमत होकर अन्यथा कार्रवाई करवा सकता था (धारा 4(3))। गवर्नर गैर-सरकारी परिषद-सदस्यों में से परिषद-सचिव भी नियुक्त कर सकता था।
द्वैध शासनकी अवधारणा का श्रेय लियोनेल कर्टिस को दिया जाता है, जिन्होंने इसे ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी शासन लाने के उपाय के रूप में प्रस्तुत किया था।
प्रांतीय विधान परिषदें
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत प्रत्येक प्रांत में एकसदनीय विधान परिषद की व्यवस्था रखी गई और उनका आकार बढ़ाया गया। अधिनियम के अनुसार परिषद के कम से कम 70% सदस्य निर्वाचित तथा अधिकतम 20% सरकारी अधिकारी होते थे। शेष सदस्य मनोनीत गैर-सरकारी होते थे।
➣ परिषद में कार्यकारिणी परिषद के सदस्य भी सम्मिलित होते थे, किन्तु गवर्नर स्वयं परिषद का सदस्य नहीं था। सामान्य कार्यकाल 3 वर्ष था, जिसे गवर्नर विशेष परिस्थितियों में 1 वर्ष तक बढ़ा सकता था या परिषद को पहले भंग कर सकता था।
➣ प्रांतीय विधान परिषदों को प्रांतीय विषयों पर कानून बनाने तथा प्रांतीय बजट पारित करने का अधिकार मिला। किन्तु गवर्नर को विधेयकों पर वीटो का अधिकार था और वह आरक्षित विषयों से संबंधित विधेयकों को प्रमाणित कर कानून का रूप दे सकता था। इसलिए प्रांतीय विधानमंडल भी पूर्णतः स्वतंत्र नहीं थे।
➣ अधिनियम की प्रथम अनुसूची में परिषदों की सदस्य संख्या इस प्रकार निर्धारित थी (उपर्युक्त अनुपात बनाए रखते हुए नियमों द्वारा इसे बढ़ाया जा सकता था)-
| प्रांत | सदस्य संख्या | प्रांत | सदस्य संख्या |
|---|---|---|---|
| मद्रास | 118 | पंजाब | 83 |
| बंबई | 111 | बिहार व उड़ीसा | 98 |
| बंगाल | 125 | मध्य प्रांत | 70 |
| संयुक्त प्रांत | 118 | असम | 53 |
➣ परिषद का अध्यक्ष आरंभिक 4 वर्ष तक गवर्नर द्वारा नियुक्त होता था, उसके बाद सदस्यों द्वारा निर्वाचित (गवर्नर की स्वीकृति से)। गवर्नर किसी विधेयक के लिए विषय-विशेषज्ञ (अधिकतम 2, असम में 1) मनोनीत भी कर सकता था।
➣ वित्तीय व्यवस्था: प्रांतीय बजट अनुदान माँगों के रूप में परिषद के मतदान के लिए रखा जाता था और परिषद माँग को अस्वीकार या कम कर सकती थी। किन्तु आरक्षित विषय से संबंधित माँग को गवर्नर यह प्रमाणित करके लागू कर सकता था कि वह उसके उत्तरदायित्व के निर्वहन के लिए आवश्यक है।
➣ कुछ मदें (जैसे केंद्र को देय अंशदान, ऋणों का ब्याज, विधि द्वारा निर्धारित व्यय, सम्राट/भारत सचिव द्वारा नियुक्त व्यक्तियों के वेतन-पेंशन तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन) मतदान के लिए रखी ही नहीं जाती थीं।
➣ विधायी व्यवस्था: आरक्षित विषय से संबंधित कोई विधेयक परिषद द्वारा पारित न होने पर गवर्नर उसे आवश्यक प्रमाणित कर कानून बना सकता था (धारा 13)।
➣ वह प्रांत की सुरक्षा या शांति को प्रभावित करने वाले विधेयक पर कार्यवाही रोक सकता था (धारा 11(4)) तथा विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकता था या गवर्नर-जनरल के विचारार्थ आरक्षित कर सकता था (धारा 12)।
केंद्रीय विधानमंडल
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत पहली बार केंद्र में द्विसदनीय विधानमंडल की व्यवस्था लागू की गई। इससे पहले केंद्रीय स्तर पर केवल एक ही विधान परिषद थी।
➣ इस अधिनियम के अनुसार केंद्रीय विधानमंडल के दो सदन बनाए गए-
| सदन | सदस्य संख्या | विवरण |
|---|---|---|
| राज्य परिषद (Council of State) | 60 सदस्य (34 निर्वाचित + 26 मनोनीत) | उच्च सदन (Upper House), जिसका कार्यकाल 5 वर्ष था। |
| केंद्रीय विधानसभा (Legislative Assembly) | 145 सदस्य (104 निर्वाचित + 41 मनोनीत) | निम्न सदन (Lower House), जिसका कार्यकाल 3 वर्ष था। |
➣ दोनों सदनों में निर्वाचित तथा मनोनीत सदस्यों का प्रावधान किया गया। इससे पहली बार केंद्रीय स्तर पर भारतीय प्रतिनिधियों की संख्या पहले की अपेक्षा बढ़ी।
➣ ध्यातव्य है कि केंद्रीय विधानमंडल में देशी रियासतों को राज्य के रूप में औपचारिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला, क्योंकि वे ब्रिटिश भारत का औपचारिक हिस्सा नहीं मानी जाती थीं। हालाँकि धारा 23(2) के अनुसार किसी रियासत के शासक या प्रजाजन को व्यक्तिगत रूप से मनोनीत किया जा सकता था।
➣ इस अधिनियम एवं इसके अंतर्गत बने नियमों से पहली बार प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था शुरू हुई। दोनों सदनों के अधिकांश सदस्य निर्वाचित थे और इनके प्रथम चुनाव 1920 में हुए।
➣ अधिनियम की धारा 18 के अनुसार राज्य परिषद में अधिकतम 60 सदस्य (जिनमें अधिकतम 20 सरकारी) तथा धारा 19 के अनुसार विधान सभा में 140 सदस्य (100 निर्वाचित + 40 अन-निर्वाचित, जिनमें 26 सरकारी) निर्धारित थे। नियमों द्वारा संख्या बढ़ाई जा सकती थी। व्यवहार में विधान सभा की संख्या 145 (104 निर्वाचित) रही।
➣ राज्य परिषद का अध्यक्ष गवर्नर-जनरल द्वारा नियुक्त किया जाता था (अधिनियम में उसके निर्वाचन की व्यवस्था नहीं थी)। विधान सभा का अध्यक्ष आरंभिक 4 वर्ष तक गवर्नर-जनरल द्वारा नियुक्त होता था, उसके बाद सदस्यों द्वारा निर्वाचित (गवर्नर-जनरल की स्वीकृति से)। उपाध्यक्ष आरंभ से निर्वाचित होता था।
इसी के अंतर्गत 1925 में विट्ठलभाई पटेल विधान सभा के पहले निर्वाचित भारतीय अध्यक्ष बने थे।
➣ गवर्नर-जनरल की कार्यकारिणी परिषद का प्रत्येक सदस्य किसी एक सदन का सदस्य बनाया जाता था और दूसरे सदन में उपस्थित होकर बोल सकता था (धारा 22(4)), किन्तु परिषद विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं थी।
➣ दोनों सदनों की शक्तियाँ: कोई विधेयक तभी पारित माना जाता था जब उस पर दोनों सदनों की सहमति हो। वित्त के मामले में अंतर था – अनुदान माँगों पर मतदान केवल विधान सभा में होता था।
➣ गतिरोध की स्थिति में, यदि एक सदन द्वारा पारित विधेयक 6 माह में दूसरे सदन से पारित न हो, तो गवर्नर-जनरल अपने विवेक से उसे संयुक्त बैठक में निर्णय के लिए भेज सकता था। साथ ही दोनों सदनों के सदस्यों की बैठकें आयोजित कर मतभेद पर विचार करने की व्यवस्था स्थायी आदेशों द्वारा की जा सकती थी (धारा 25(3))।
➣ केंद्रीय विधानमंडल को विधेयकों पर चर्चा, प्रश्न पूछने, बजट पर विचार करने तथा सरकारी नीतियों की समीक्षा करने का अधिकार दिया गया। किन्तु इन अधिकारों पर अनेक प्रतिबंध भी थे।
➣ वायसराय को किसी भी विधेयक पर वीटो लगाने, अस्वीकृत विधेयक को प्रमाणित कर कानून बनाने, अध्यादेश जारी करने, अस्वीकृत या घटाई गई अनुदान माँगों को बहाल करने तथा सुरक्षा-संबंधी विधेयकों पर कार्यवाही रोकने का अधिकार प्राप्त था। इसलिए केंद्रीय विधानमंडल पूर्णतः स्वतंत्र नहीं था।
केंद्रीय बजट एवं गवर्नर-जनरल की शक्तियाँ
➣ गैर-मतदेय मदें: केंद्रीय बजट की कुछ मदें – जैसे ऋणों का ब्याज एवं ऋण-शोधन कोष, विधि द्वारा निर्धारित व्यय, सम्राट/भारत सचिव द्वारा नियुक्त व्यक्तियों के वेतन-पेंशन, मुख्य आयुक्तों एवं न्यायिक आयुक्तों के वेतन तथा धार्मिक, राजनीतिक और रक्षा संबंधी व्यय – विधान सभा के मतदान के लिए प्रस्तुत ही नहीं की जाती थीं, और गवर्नर-जनरल की अनुमति के बिना किसी सदन में उन पर चर्चा भी नहीं हो सकती थी (धारा 26(3))। शेष मदों की अनुदान माँगों को विधान सभा अस्वीकार या कम कर सकती थी।
➣ अनुदान बहाली: यदि गवर्नर-जनरल यह घोषित कर दे कि विधान सभा द्वारा अस्वीकृत माँग उसके उत्तरदायित्वों के निर्वहन के लिए आवश्यक है, तो वह उसे स्वीकृत मानकर व्यय कर सकता था। आपातकाल में वह ब्रिटिश भारत की सुरक्षा या शांति के लिए आवश्यक व्यय अधिकृत कर सकता था। किसी भी धन-संबंधी प्रस्ताव के लिए उसकी सिफारिश आवश्यक थी।
➣ प्रमाणीकरण: यदि कोई सदन किसी विधेयक को प्रस्तुत करने की अनुमति न दे या उसे गवर्नर-जनरल द्वारा सुझाए रूप में पारित न करे, तो गवर्नर-जनरल यह प्रमाणित कर सकता था कि वह ब्रिटिश भारत की सुरक्षा, शांति या हितों के लिए अनिवार्य है। तब वह विधेयक बिना विधानमंडल की सहमति के कानून बन जाता था (इसके लिए सम्राट की स्वीकृति आवश्यक थी। आपात स्थिति में वह तत्काल लागू हो सकता था) – धारा 27।
➣ अन्य शक्तियाँ: सुरक्षा या शांति को प्रभावित करने वाले विधेयक/संशोधन पर कार्यवाही रोकना (धारा 28(2)), दोनों सदनों से पारित विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटाना (धारा 25(4)), कुछ विधेयकों के प्रस्तुत करने के लिए पूर्व-अनुमति की शर्त रखना (धारा 28(1)), तथा सदनों को आहूत करना, सत्रावसान, भंग करना और उनकी अवधि बढ़ाना (धारा 21)।
मताधिकार
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत मताधिकार का विस्तार किया गया, जिससे पहले की अपेक्षा अधिक भारतीयों को मतदान का अधिकार प्राप्त हुआ। किन्तु यह अधिकार सार्वभौमिक नहीं था, बल्कि केवल निर्धारित योग्यताओं को पूरा करने वाले व्यक्तियों तक ही सीमित था।
➣ मतदान का अधिकार प्राप्त करने के लिए संपत्ति, भूमि स्वामित्व, आय, कर-भुगतान, शैक्षिक योग्यता अथवा अन्य निर्धारित मानदंडों में से किसी एक को पूरा करना आवश्यक था। इन योग्यताओं का निर्धारण विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग किया जाता था।
➣ अधिनियम ने स्वयं मताधिकार की योग्यताएँ तय नहीं कीं। धारा 7 व 23 के अंतर्गत मतदाता-योग्यता, निर्वाचन क्षेत्रों की रचना तथा चुनाव-पद्धति नियमों पर छोड़ी गई। इन नियमों की रूपरेखा साउथबरो (मताधिकार) समिति (1918–19) की सिफारिशों पर आधारित थी, और सभी प्रांतों तथा क्षेत्रों के लिए एक समान संपत्ति-योग्यता तय नहीं की गई।
➣ परिणामस्वरूप भारत की अधिकांश जनता, विशेषकर किसान, मजदूर तथा निम्न आय वर्ग के लोग मतदान के अधिकार से वंचित रहे। अनुमानतः देश की कुल जनसंख्या का केवल लगभग 2–3% ही मतदाता बन सका।
➣ महिलाओं को भी अधिनियम द्वारा स्वतः मताधिकार नहीं दिया गया। केवल यह व्यवस्था की गई कि यदि कोई प्रांतीय विधान परिषद चाहे, तो निर्धारित संपत्ति एवं शैक्षणिक योग्यताओं को पूरा करने वाली महिलाओं को मताधिकार दे सकती है।
इसी प्रावधान के आधार पर मद्रास प्रेसीडेंसी 1921 में महिलाओं को मताधिकार देने वाला पहला प्रांत बना।
➣ ध्यान दें कि इस व्यवस्था का उद्देश्य पूर्ण लोकतांत्रिक शासन स्थापित करना नहीं था, बल्कि सीमित स्तर पर भारतीयों को निर्वाचन प्रक्रिया में सम्मिलित कर प्रशासन में उनकी भागीदारी बढ़ाना था।
इस प्रकार भारत सरकार अधिनियम, 1919 ने केवल मताधिकार का सीमित विस्तार किया था। जबकि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार भारत में स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान (1950) लागू होने पर प्राप्त हुआ।
पृथक निर्वाचन प्रणाली
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 ने 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों द्वारा प्रारम्भ की गई पृथक निर्वाचन प्रणाली को समाप्त करने के बजाय उसका और अधिक विस्तार किया।
➣ इस अधिनियम के अंतर्गत केवल मुसलमानों ही नहीं, बल्कि सिखों, यूरोपियनों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों तथा कुछ विशेष हित समूहों को भी पृथक प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया।
➣ अधिनियम में समुदायों के नाम नहीं गिनाए गए थे। धारा 7(4)(c) एवं 23(1)(c) के अनुसार साम्प्रदायिक एवं अन्य निर्वाचक-मंडलों द्वारा चुने जाने वाले सदस्यों की संख्या नियमों द्वारा तय की जानी थी।
➣ ब्रिटिश सरकार का तर्क था कि इससे विभिन्न समुदायों और अल्पसंख्यक वर्गों को उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलेगा। दूसरी ओर भारतीय नेताओं का मानना था कि इससे सांप्रदायिक आधार पर राजनीति को बढ़ावा मिलेगा और राष्ट्रीय एकता प्रभावित होगी।
➣ आगे चलकर यही व्यवस्था भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण विवाद का विषय बनी रही। बाद के संवैधानिक सुधारों में भी पृथक निर्वाचन प्रणाली को जारी रखा गया, जिससे सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न और अधिक जटिल होता गया।
इस प्रकार 1909 के अधिनियम ने पृथक निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत की थी, जबकि भारत सरकार अधिनियम, 1919 ने इसका विस्तार कर अधिक समुदायों और विशेष हित समूहों तक पहुँचा दिया।
लोक सेवा आयोग
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 ने भारत में सिविल सेवाओं की भर्ती को अधिक व्यवस्थित एवं निष्पक्ष बनाने के उद्देश्य से लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान किया।
➣ इस अधिनियम के अनुसार एक लोक सेवा आयोग गठित किया जाना था, जो सरकारी सेवाओं में नियुक्ति, भर्ती तथा अन्य सेवा-संबंधी मामलों में सरकार को सलाह दे सके।
➣ आरंभ में यह आयोग केवल परामर्शदात्री प्रकृति का था। इसे वैधानिक स्वरूप भारत सरकार अधिनियम, 1935 (संघीय लोक सेवा आयोग) से तथा संवैधानिक दर्जा 1950 में अनुच्छेद 315 के अंतर्गत प्राप्त हुआ।
➣ अधिनियम की धारा 38 के अनुसार आयोग में अधिकतम 5 सदस्य (जिनमें एक अध्यक्ष) होने थे, जिनकी नियुक्ति भारत सचिव (इन काउंसिल) करता था। कार्यकाल 5 वर्ष था और आयोग के कार्य नियमों द्वारा निर्धारित किए जाने थे।
➣ इसी प्रावधान के आधार पर 1 अक्टूबर 1926 को ली आयोग की सिफारिशों के अनुसार भारत का पहला लोक सेवा आयोग स्थापित किया गया। इसके प्रथम अध्यक्ष सर रॉस बार्कर बने।
➣ यद्यपि आयोग की स्थापना एक महत्वपूर्ण सुधार थी, फिर भी उच्च प्रशासनिक सेवाओं पर ब्रिटिश अधिकारियों का प्रभुत्व लंबे समय तक बना रहा और भारतीयों की नियुक्ति सीमित संख्या में ही हो सकी।
इस प्रकार भारत सरकार अधिनियम, 1919 ने लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान किया था, जबकि इसका वास्तविक गठन 1 अक्टूबर 1926 को हुआ।
अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत भारत के लिए उच्चायुक्त के पद का प्रावधान किया गया (धारा 35: सम्राट Order in Council द्वारा इसकी नियुक्ति की व्यवस्था कर सकता था)।
➣ उच्चायुक्त का कार्यालय लंदन (यूनाइटेड किंगडम) में था। भारत सचिव द्वारा पहले प्रयोग किए जाने वाले कुछ अधिकार, विशेषतः अनुबंध करने संबंधी अधिकार, उसे सौंपे जा सकते थे और वह गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल या किसी प्रांतीय सरकार की ओर से कार्य कर सकता था।
➣ इस अधिनियम द्वारा भारत सचिव के कुछ प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकारों में कमी की गई तथा भारत सरकार को कुछ मामलों में पहले की अपेक्षा अधिक प्रशासनिक स्वतंत्रता प्रदान की गई।
➣ इसी क्रम में भारत सचिव का वेतन अब तक भारतीय राजस्व से दिया जाता था, जिसे अब ब्रिटिश राजकोष से दिए जाने की व्यवस्था की गई।
➣ भारत परिषद के सदस्यों की संख्या 10–14 से घटाकर 8–12 तथा कार्यकाल 7 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष कर दिया गया। साथ ही अब कम से कम आधे सदस्यों का भारत (न कि केवल ब्रिटिश भारत) में लोक सेवा में 10 वर्ष का अनुभव रखना आवश्यक ठहराया गया; वेतन भी £1000 से बढ़ाकर £1200 कर दिया गया (धारा 31)।
➣ सिविल सेवाओं के वर्गीकरण, भर्ती-पद्धति और सेवा-शर्तों के नियम बनाने का अधिकार भारत सचिव (इन काउंसिल) को दिया गया, जो यह शक्ति गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल या प्रांतीय सरकारों को सौंप सकता था अथवा विधानमंडलों को सेवाओं संबंधी कानून बनाने के लिए अधिकृत कर सकता था (धारा 36)। भारत में अधिवासित व्यक्तियों को ICS में नियुक्त करने के लिए नियम बनाने की भी व्यवस्था की गई (धारा 37)।
➣ महालेखा परीक्षक (Auditor-General) की नियुक्ति भारत सचिव (इन काउंसिल) द्वारा सम्राट के प्रसादपर्यंत की जाती थी; उसका वेतन, शक्तियाँ एवं कर्तव्य नियमों द्वारा तय होने थे (धारा 39)।
➣ अधिनियम में केंद्र और प्रांतों के बीच वित्तीय शक्तियों का सीमित विभाजन किया गया, जिससे प्रांतीय सरकारों को अपने हस्तांतरित विषयों पर व्यय करने के लिए कुछ वित्तीय अधिकार प्राप्त हुए।
➣ इसके अतिरिक्त अधिनियम में यह भी प्रावधान किया गया कि 10 वर्ष बाद इस व्यवस्था की समीक्षा के लिए एक वैधानिक आयोग नियुक्त किया जाएगा, जो शासन-प्रणाली के कार्यकरण, शिक्षा की प्रगति तथा प्रतिनिधि संस्थाओं के विकास की जाँच कर यह रिपोर्ट देगा कि उत्तरदायी शासन का सिद्धांत किस सीमा तक बढ़ाया, संशोधित या सीमित किया जाए (प्रांतीय विधानमंडलों में द्वितीय सदन की वांछनीयता सहित) – धारा 41। इसी प्रावधान के अंतर्गत बाद में 1927 में साइमन आयोग की नियुक्ति की गई।
भारत सरकार अधिनियम, 1919 केवल तत्कालीन सुधारों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें भविष्य में संवैधानिक व्यवस्था की समीक्षा का भी प्रावधान किया गया था।
अधिनियम से जुड़ी अन्य व्यवस्थाएँ (जो अधिनियम के प्रावधान नहीं थे)
➣ राजकोषीय स्वायत्तता: 1919 के विधेयक पर विचार करने वाली संयुक्त प्रवर समिति की सिफारिश पर ब्रिटिश सरकार ने भारत की राजकोषीय स्वायत्तता का सिद्धांत स्वीकार किया, जिसके अनुसार शुल्क एवं कर संबंधी प्रश्नों पर सामान्यतः ब्रिटिश सरकार हस्तक्षेप नहीं करती थी। यह अधिनियम का प्रावधान नहीं, बल्कि एक परिपाटी थी। बाद में 1921–22 में भारतीय राजकोषीय आयोग गठित हुआ।
➣ नरेंद्र मंडल (Chamber of Princes): मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट की सिफारिश पर रियासतों के शासकों के लिए एक परामर्शदात्री संस्था के रूप में इसकी स्थापना की गई। इसकी घोषणा दिसंबर 1919 की राजकीय उद्घोषणा द्वारा हुई और 8 फरवरी 1921 को ड्यूक ऑफ कनॉट ने दिल्ली के दीवान-ए-आम में इसका उद्घाटन किया।
➣ इसमें 108 शासक अपने अधिकार से सदस्य थे, वायसराय इसका अध्यक्ष होता था और सदस्यों में से एक चांसलर चुना जाता था (प्रथम चांसलर: बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह)। यह केंद्रीय विधानमंडल का अंग नहीं था।
भारत सरकार अधिनियम, 1919 की प्रमुख कमियाँ एवं आलोचना
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 को ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को प्रशासन में अधिक भागीदारी देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया था। किन्तु व्यवहार में यह अधिनियम भारतीयों की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सका।
➣ इसमें उत्तरदायी शासन की सीमित व्यवस्था, ब्रिटिश अधिकारियों की व्यापक शक्तियाँ तथा सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व जैसी कई कमियाँ थीं। परिणामस्वरूप कांग्रेस सहित अधिकांश राष्ट्रवादी नेताओं ने इसकी आलोचना की।
द्वैध शासन की विफलता
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 की सबसे अधिक आलोचना द्वैध शासन की व्यवस्था को लेकर हुई। प्रांतीय प्रशासन को आरक्षित और हस्तांतरित विषयों में बाँट देने से यह स्पष्ट नहीं रह गया कि वास्तविक उत्तरदायित्व किसका है।
➣ आरक्षित विषयों का प्रशासन गवर्नर अपनी कार्यकारिणी परिषद के माध्यम से चलाता था। परिषद के सदस्य ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त होते थे और वे विधानसभा के प्रति उत्तरदायी नहीं थे।
➣ दूसरी ओर हस्तांतरित विषयों का संचालन भारतीय मंत्रियों द्वारा किया जाता था, जो विधानसभा के प्रति उत्तरदायी थे और अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर उन्हें पद छोड़ना पड़ता था।
➣ इस प्रकार एक ही प्रांत में दो प्रकार की कार्यपालिका-एक उत्तरदायी और दूसरी गैर-उत्तरदायी-एक साथ काम करती थी। इससे प्रशासन में अक्सर भ्रम और समन्वय की समस्या उत्पन्न होती थी।
➣ आलोचकों का मत था कि यह विभाजन कृत्रिम था। सबसे महत्वपूर्ण विषय, जैसे वित्त और कानून-व्यवस्था, आरक्षित श्रेणी में रखे गए थे। इसलिए वास्तविक शक्ति ब्रिटिश अधिकारियों के हाथों में ही बनी रही।
➣ भारतीय मंत्रियों को अपने विभागों में काम करने के लिए धन की आवश्यकता होती थी, लेकिन वित्त स्वयं आरक्षित विषय था और उस पर गवर्नर तथा उसकी कार्यकारिणी का नियंत्रण था। ऐसे में मंत्री अपने ही विभागों से जुड़े कई निर्णय स्वतंत्र रूप से नहीं ले पाते थे।
➣ हस्तांतरित विषयों के लिए बजट और संसाधनों को लेकर मंत्रियों तथा कार्यकारिणी परिषद के बीच अक्सर मतभेद पैदा हो जाते थे। इससे प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होता था और निर्णय लेने में अनावश्यक विलंब होता था।
➣ आलोचकों का कहना था कि एक ही प्रांत में दो अलग-अलग कार्यपालिकाओं का होना प्रशासन को सरल बनाने के बजाय और अधिक जटिल बना देता था। दोनों एक-दूसरे पर निर्भर थीं, लेकिन उनके अधिकार समान नहीं थे।
➣ इसके अलावा गवर्नर को आवश्यकता पड़ने पर हस्तांतरित विषयों में भी हस्तक्षेप करने तथा मंत्रियों की सलाह को अस्वीकार करने का अधिकार प्राप्त था। इससे भारतीय मंत्रियों की स्वायत्तता और प्रभाव दोनों सीमित हो जाते थे।
➣ इन सभी कारणों से द्वैध शासन व्यवहार में सफल नहीं हो सका। अंततः इसकी कमियों को देखते हुए भारत सरकार अधिनियम, 1935 द्वारा इसे समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता की व्यवस्था लागू की गई।
केंद्र में उत्तरदायी शासन का अभाव
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत यद्यपि प्रांतों में सीमित स्तर पर उत्तरदायी शासन (द्वैध शासन के रूप में) लागू किया गया, किन्तु केंद्र में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई।
➣ केंद्रीय कार्यपालिका पहले की तरह वायसराय, भारत सचिव तथा ब्रिटिश सरकार के प्रति उत्तरदायी रही, न कि भारतीय केंद्रीय विधानमंडल के प्रति। इसलिए केंद्र में वास्तविक सत्ता ब्रिटिश सरकार के हाथों में ही बनी रही।
➣ वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में सेनाध्यक्ष के अतिरिक्त छह सदस्य होते थे (वायसराय एवं सेनाध्यक्ष सहित कुल आठ), जिनमें से केवल तीन भारतीय होते थे। उन्हें भी प्रायः कम महत्वपूर्ण विभाग दिए जाते थे, जबकि रक्षा, विदेश नीति और संचार जैसे महत्वपूर्ण विभाग वायसराय के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रहते थे।
➣ इस अधिनियम द्वारा केंद्र में पहली बार द्विसदनीय विधानमंडल की स्थापना की गई, जिसमें राज्य परिषद और केंद्रीय विधान सभा शामिल थे। किन्तु इन दोनों सदनों की शक्तियाँ बहुत सीमित थीं। वे न तो सरकार को पद से हटा सकते थे और न ही केंद्रीय कार्यपालिका को अपने प्रति उत्तरदायी बना सकते थे।
➣ सदस्यों को प्रश्न पूछने, स्थगन प्रस्ताव लाने तथा बजट के कुछ भाग पर चर्चा और मतदान करने का अधिकार अवश्य मिला, लेकिन बजट का लगभग दो-तिहाई से तीन-चौथाई भाग गैर-मतदेय था (विभिन्न स्रोतों में यह अनुपात अलग-अलग मिलता है)। अर्थात् उस पर विधानमंडल मतदान नहीं कर सकता था।
➣ इसके अतिरिक्त वायसराय को विधेयकों पर वीटो लगाने, विधानमंडल द्वारा अस्वीकार किए गए विधेयकों को प्रमाणित कर कानून बनाने, आपातकालीन परिस्थितियों में अध्यादेश जारी करने तथा बजट में की गई कटौती को पुनः बहाल करने जैसी व्यापक शक्तियाँ प्राप्त थीं। अर्थात् विधानमंडल द्वारा अस्वीकृत या संशोधित कोई भी विधेयक वायसराय के प्रमाणीकरण मात्र से कानून बन सकता था, चाहे निर्वाचित प्रतिनिधियों की सहमति हो या न हो।
➣ इसकी एक प्रमुख मिसाल 1923 का वित्त विधेयक है। केंद्रीय विधान सभा ने नमक कर बढ़ाने के प्रावधान को अस्वीकार कर दिया, किन्तु वायसराय लॉर्ड रीडिंग ने अपनी प्रमाणीकरण की शक्ति का प्रयोग कर उसे कानून का रूप दे दिया।
➣ इस घटना ने स्पष्ट कर दिया कि केंद्र में अंतिम निर्णय का अधिकार ब्रिटिश सरकार के पास ही था। इससे पूर्व 1919 में रॉलेट एक्ट भी भारतीय सदस्यों के विरोध के बावजूद पारित किया गया था (जिसके विरोध में जिन्ना सहित कुछ सदस्यों ने त्यागपत्र दे दिया), किन्तु वह इस अधिनियम के लागू होने से पहले की पुरानी इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में हुआ था।
➣ भारतीय नेताओं का मानना था कि जब तक केंद्रीय कार्यपालिका विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं होगी, तब तक वास्तविक उत्तरदायी शासन स्थापित नहीं हो सकता। इसलिए उन्होंने इस व्यवस्था को अधूरा सुधार माना, जिसने प्रांतों में सीमित रियायतें तो दीं, लेकिन केंद्र में ब्रिटिश नियंत्रण को पहले की तरह बनाए रखा।
इस प्रकार भारत सरकार अधिनियम, 1919 में उत्तरदायी शासन का सिद्धांत केवल प्रांतों तक सीमित रहा। केंद्र में वास्तविक कार्यपालिका पर ब्रिटिश सरकार का ही नियंत्रण बना रहा।
गवर्नर एवं वायसराय की व्यापक शक्तियाँ
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत भारतीयों की प्रशासन में भागीदारी बढ़ाई गई, किन्तु गवर्नर और वायसराय की शक्तियों में कोई मूलभूत कमी नहीं की गई। परिणामस्वरूप प्रशासन पर अंतिम नियंत्रण ब्रिटिश अधिकारियों के हाथों में ही बना रहा।
➣ वायसराय को विधानमंडल द्वारा पारित या अस्वीकृत विधेयकों पर वीटो लगाने, अस्वीकृत विधेयकों को प्रमाणित कर कानून बनाने, अध्यादेश जारी करने तथा अस्वीकृत या घटाई गई अनुदान माँगों को बहाल करने जैसी व्यापक शक्तियाँ प्राप्त थीं।
➣ इसी प्रकार प्रांतीय गवर्नर को भी आरक्षित विषयों पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त था। वह आवश्यकता पड़ने पर हस्तांतरित विषयों में भी हस्तक्षेप कर सकता था तथा भारतीय मंत्रियों की सलाह को स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार रखता था।
➣ गवर्नर और वायसराय दोनों ही ब्रिटिश सरकार के प्रति उत्तरदायी थे, भारतीय विधानमंडलों के प्रति नहीं। इसलिए निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका सीमित रही और वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति ब्रिटिश अधिकारियों के हाथों में केंद्रित रही।
➣ भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं का मत था कि जब तक गवर्नर और वायसराय को इतने व्यापक विशेषाधिकार प्राप्त रहेंगे, तब तक भारतीय मंत्रियों और विधानमंडलों की शक्तियाँ केवल औपचारिक बनकर रह जाएँगी।
सीमित मताधिकार
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत मताधिकार का विस्तार अवश्य किया गया, किन्तु यह अधिकार सार्वभौमिक नहीं था। मतदान का अधिकार केवल उन्हीं व्यक्तियों को दिया गया जो संपत्ति, आय, भूमि स्वामित्व, कर-भुगतान, शिक्षा अथवा अन्य निर्धारित योग्यताओं को पूरा करते थे।
➣ परिणामस्वरूप भारत की अधिकांश जनता, विशेषकर किसान, मजदूर तथा निम्न आय वर्ग के लोग निर्वाचन प्रक्रिया से बाहर रहे। इस अधिनियम के तहत लगभग 50 लाख (5 मिलियन) भारतीयों को ही मताधिकार मिला, जो उस समय की कुल जनसंख्या का अनुमानतः केवल लगभग 2–3 प्रतिशत था।
➣ महिलाओं को भी इस अधिनियम द्वारा स्वतः मताधिकार नहीं दिया गया। केवल इतना प्रावधान किया गया कि यदि कोई प्रांतीय विधान परिषद चाहे, तो निर्धारित संपत्ति एवं शैक्षणिक योग्यताओं को पूरा करने वाली महिलाओं को मताधिकार दे सकती है।
➣ भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं का मत था कि इतनी सीमित मतदाता-व्यवस्था जनता की वास्तविक इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती। इससे विधानमंडलों में चुने गए प्रतिनिधि समाज के केवल एक छोटे, संपन्न और शिक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे, जबकि किसान, मजदूर और सामान्य जनता की भागीदारी लगभग नहीं के बराबर थी।
➣ आलोचकों का यह भी मानना था कि ब्रिटिश सरकार ने मताधिकार का दायरा जानबूझकर बहुत सीमित रखा, ताकि प्रशासन पर उसका प्रभाव बना रहे और व्यापक जनमत शासन-व्यवस्था को अधिक प्रभावित न कर सके।
➣ यही सीमित मताधिकार आगे चलकर साइमन आयोग (1927) के समक्ष उठाए गए प्रमुख मुद्दों में से एक बना और अंततः भारत सरकार अधिनियम, 1935 में मताधिकार के और विस्तार का आधार बना।
पृथक निर्वाचन प्रणाली की आलोचना
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 ने पृथक निर्वाचन प्रणाली को समाप्त करने के बजाय उसका और अधिक विस्तार किया। भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं का मत था कि इससे राष्ट्रीय एकता के स्थान पर सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा मिला।
➣ इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक समुदाय के मतदाता केवल अपने ही समुदाय के उम्मीदवारों को मतदान करते थे। परिणामस्वरूप चुनावों में राष्ट्रीय मुद्दों की अपेक्षा धार्मिक एवं सामुदायिक हितों को अधिक महत्व मिलने लगा।
➣ आलोचकों का मानना था कि ब्रिटिश सरकार ने फूट डालो और शासन करो की नीति के अंतर्गत इस व्यवस्था को बनाए रखा, ताकि भारतीय समाज विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक वर्गों में बँटा रहे और एक संयुक्त राष्ट्रीय आंदोलन विकसित न हो सके।
➣ कांग्रेस के अधिकांश नेताओं ने इस व्यवस्था का विरोध किया। उनका मत था कि पृथक निर्वाचन भारतीय राष्ट्रवाद की भावना को कमजोर करता है तथा विभिन्न समुदायों के बीच राजनीतिक दूरी बढ़ाता है।
➣ आगे चलकर इसी व्यवस्था के कारण सांप्रदायिक राजनीति को और बल मिला। पृथक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग समय के साथ और व्यापक होती गई, जिसने अंततः द्विराष्ट्र सिद्धांत तथा भारत के विभाजन (1947) की पृष्ठभूमि तैयार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पृथक निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों से हुई थी, 1919 के अधिनियम ने इसका विस्तार किया और 1932 के सांप्रदायिक पुरस्कार ने इसे और व्यापक बना दिया।
नेताओं एवं राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इन सुधारों को अपर्याप्त माना। दिसंबर 1919 के अमृतसर अधिवेशन में कांग्रेस ने इन्हें अपर्याप्त, असंतोषजनक तथा निराशाजनक (inadequate, unsatisfactory and disappointing) बताया तथा प्रांतों में पूर्ण उत्तरदायी शासन की माँग की।
➣ सितंबर 1920 के कलकत्ता विशेष अधिवेशन (अध्यक्ष: लाला लाजपत राय) में कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन का कार्यक्रम अपनाया, जिसके अंतर्गत विधान परिषदों के बहिष्कार का निर्णय भी लिया गया। इसी कारण कांग्रेस ने 1920 के चुनावों का बहिष्कार किया।
➣ दूसरी ओर नरमपंथी (उदारवादी) नेताओं – जैसे सुरेंद्रनाथ बनर्जी तथा तेज बहादुर सप्रू – ने इन सुधारों का स्वागत किया और इन्हें कार्यान्वित करने के पक्ष में रहे। कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने 1919 में नेशनल लिबरल फेडरेशन ऑफ इंडिया का गठन किया।
कांग्रेस ने सुधारों को अपर्याप्त मानकर परिषदों का बहिष्कार किया, जबकि नरमपंथियों ने इन्हें स्वीकार कर लिबरल फेडरेशन का गठन किया।
भारत सरकार अधिनियम, 1919 का महत्व
➣ यद्यपि भारत सरकार अधिनियम, 1919 भारतीय नेताओं की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरा नहीं उतरा, फिर भी भारतीय संवैधानिक इतिहास में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। इस अधिनियम ने ब्रिटिश शासन व्यवस्था में कुछ ऐसे परिवर्तन किए, जिन्होंने आगे के संवैधानिक विकास की दिशा निर्धारित की।
उत्तरदायी शासन की दिशा में पहला व्यावहारिक कदम
➣ यद्यपि 20 अगस्त 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा में उत्तरदायी शासन की केवल नीति घोषित की गई थी, किंतु भारत सरकार अधिनियम, 1919 ने पहली बार उसे व्यवहार में लागू करने का प्रयास किया। प्रांतों में सीमित रूप से भारतीय मंत्रियों को प्रशासनिक उत्तरदायित्व सौंपा गया।
भारतीयों की प्रशासन में भागीदारी बढ़ी
➣ इस अधिनियम के माध्यम से भारतीयों को पहली बार प्रांतीय शासन, विधानमंडलों तथा प्रशासन में पहले की अपेक्षा अधिक भागीदारी मिली। यद्यपि उनके अधिकार सीमित थे, फिर भी उन्हें शासन संचालन का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हुआ।
संवैधानिक विकास की नई दिशा
➣ इस अधिनियम ने भारत में प्रतिनिधिक संस्थाओं के विकास को आगे बढ़ाया। केंद्रीय स्तर पर द्विसदनीय विधानमंडल तथा प्रांतों में द्वैध शासन जैसी व्यवस्थाओं ने भारतीय संवैधानिक विकास को नई दिशा दी।
आगे के संवैधानिक सुधारों का आधार
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 आगे होने वाले संवैधानिक सुधारों का आधार बना। इसमें निहित 10 वर्ष की समीक्षा के प्रावधान के अंतर्गत बाद में साइमन आयोग (1927) नियुक्त किया गया, तथा द्वैध शासन के क्रियान्वयन से प्राप्त अनुभवों के आधार पर अंततः भारत सरकार अधिनियम, 1935 के माध्यम से अधिक व्यापक सुधार लागू किए गए।
इतिहासकारों का मूल्यांकन: भारत सरकार अधिनियम, 1919 भारतीयों को पूर्ण उत्तरदायी शासन देने में सफल नहीं हुआ, किन्तु इसने भारत में संवैधानिक विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया और ब्रिटिश शासन को भविष्य में अधिक व्यापक सुधार करने के लिए बाध्य किया।
भारत सरकार अधिनियम, 1919 के परिणाम
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 के लागू होने के बाद भारत की प्रशासनिक एवं राजनीतिक व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। यद्यपि यह अधिनियम भारतीयों की अपेक्षाओं को पूरी तरह पूरा नहीं कर सका, फिर भी इसके दूरगामी प्रभाव भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन तथा संवैधानिक विकास दोनों पर पड़े।
द्वैध शासन का क्रियान्वयन
➣ 1921 से प्रांतों में द्वैध शासन लागू किया गया। भारतीय मंत्रियों को हस्तांतरित विषयों का दायित्व सौंपा गया, जबकि महत्वपूर्ण विभाग ब्रिटिश अधिकारियों के नियंत्रण में ही रहे।
➣ कुछ ही वर्षों में यह व्यवस्था व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण असफल सिद्ध होने लगी। भारतीय मंत्रियों के सीमित अधिकारों तथा गवर्नर के व्यापक हस्तक्षेप के कारण प्रशासन में निरंतर मतभेद उत्पन्न होते रहे।
➣ 1923 में गठित स्वराज पार्टी (चित्तरंजन दास तथा मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में) ने परिषद-प्रवेश की नीति अपनाकर विधान परिषदों के भीतर ही सरकार के विरुद्ध गतिरोध उत्पन्न करने की रणनीति अपनाई।
➣ विशेष रूप से बंगाल तथा मध्य प्रांत की परिषदों में मंत्रियों के वेतन व अनुदान प्रस्तावों को बार-बार अस्वीकार किए जाने के कारण वहाँ के गवर्नरों को द्वैध शासन को व्यावहारिक रूप से निलंबित कर हस्तांतरित विषय भी सीधे अपने नियंत्रण में लेने पड़े। इससे यह स्पष्ट हो गया कि द्वैध शासन केवल सैद्धांतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि व्यवहार में भी एक अस्थिर व्यवस्था थी।
➣ द्वैध शासन की इन कठिनाइयों तथा विधानमंडलों में बढ़ते गतिरोध को देखते हुए 1924 में सर अलेक्जेंडर मड्डीमन की अध्यक्षता में सुधार जाँच समिति (मड्डीमन समिति) गठित की गई।
➣ 1925 में प्रस्तुत इसकी रिपोर्ट में बहुमत ने अधिनियम के ढाँचे के भीतर ही कुछ सुधार सुझाए, जबकि अल्पमत सदस्यों ने द्वैध शासन को असफल बताते हुए अधिक व्यापक सुधारों की माँग की।
1920 के प्रथम आम चुनाव
➣ इस अधिनियम के अंतर्गत 1920 में केंद्रीय एवं प्रांतीय विधानमंडलों के लिए प्रथम चुनाव आयोजित किए गए। पहली बार सीमित मताधिकार के आधार पर भारतीयों ने अपेक्षाकृत बड़े स्तर पर निर्वाचन प्रक्रिया में भाग लिया।
➣ हालांकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन के कारण इन चुनावों का बहिष्कार किया, फिर भी इन चुनावों के माध्यम से नई संवैधानिक व्यवस्था लागू हुई।
साइमन आयोग की नियुक्ति
➣ अधिनियम में यह प्रावधान किया गया था कि 10 वर्ष बाद (अर्थात् 1929 में) इसकी कार्यप्रणाली की समीक्षा के लिए एक वैधानिक आयोग नियुक्त किया जाएगा। किन्तु ब्रिटिश सरकार ने निर्धारित समय से दो वर्ष पूर्व ही, 1927 में साइमन आयोग की नियुक्ति कर दी- इसका एक प्रमुख कारण यह आशंका थी कि यदि यह निर्णय अगले (संभावित लेबर पार्टी बहुमत वाले) संसद-सत्र तक टाला गया, तो आयोग की संरचना तथा सिफारिशें कम अनुकूल हो सकती हैं।
➣ साइमन आयोग के सभी सदस्य ब्रिटिश संसद-सदस्य थे और इसमें कोई भारतीय सदस्य सम्मिलित नहीं किया गया। इसे भारतीयों के आत्मसम्मान पर सीधा आघात माना गया, जिसके फलस्वरूप 1928 में साइमन आयोग का देशव्यापी बहिष्कार हुआ तथा “साइमन कमीशन, वापस जाओ” (Simon, Go Back) का नारा व्यापक जन-आंदोलन का प्रतीक बन गया।
➣ साइमन आयोग ने 1919 की व्यवस्थाओं, विशेषकर द्वैध शासन, की समीक्षा की और आगे के संवैधानिक सुधारों के लिए सुझाव प्रस्तुत किए।
भारत सरकार अधिनियम, 1935 का आधार
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1919 के क्रियान्वयन से प्राप्त अनुभवों ने स्पष्ट कर दिया कि तत्कालीन व्यवस्था में अनेक व्यावहारिक कमियाँ थीं। इन्हीं अनुभवों के आधार पर आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम, 1935 बनाया गया, जिसमें प्रांतीय स्वायत्तता लागू की गई तथा द्वैध शासन को प्रांतों से समाप्त कर दिया गया।
➣ यह भी उल्लेखनीय है कि विषयों को केंद्र तथा प्रांतों के मध्य बाँटने का जो सिद्धांत 1919 के अधिनियम में प्रारम्भ हुआ, वही आगे चलकर 1935 के अधिनियम में संघीय, प्रांतीय तथा समवर्ती सूचियों के रूप में और अधिक विकसित हुआ, तथा स्वतंत्र भारत के संविधान (1950) में आज भी संघ सूची, राज्य सूची तथा समवर्ती सूची के रूप में इसकी मूल भावना जीवित है- यद्यपि स्वतंत्र भारत में यह विभाजन उपनिवेशकालीन नियंत्रण के लिए नहीं, बल्कि संघीय सहयोग की भावना से किया गया है।
निष्कर्ष: भारत सरकार अधिनियम, 1919 भारतीयों की स्वशासन संबंधी आकांक्षाओं को पूरी तरह पूरा नहीं कर सका, किन्तु इसने भारत में संवैधानिक विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया तथा साइमन आयोग (1927) और भारत सरकार अधिनियम, 1935 जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक परिवर्तनों की पृष्ठभूमि तैयार की।
महत्वपूर्ण तथ्य
- भारत सरकार अधिनियम, 1919 को मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार भी कहा जाता है।
- यह अधिनियम 23 दिसंबर 1919 को ब्रिटिश संसद द्वारा पारित हुआ तथा इसके अधिकांश प्रावधान 1921 से लागू किए गए।
- यह अधिनियम 20 अगस्त 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा तथा मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) की सिफारिशों पर आधारित था।
- इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता प्रांतों में द्वैध शासन की व्यवस्था थी।
- द्वैध शासन केवल प्रांतीय सरकारों में लागू किया गया था, केंद्र में नहीं।
- इस अधिनियम के अंतर्गत पहली बार केंद्रीय स्तर पर द्विसदनीय विधानमंडल की स्थापना की गई- केंद्रीय विधान सभा (145 सदस्य: 104 निर्वाचित + 41 मनोनीत, कार्यकाल 3 वर्ष) तथा राज्य परिषद (60 सदस्य: 34 निर्वाचित + 26 मनोनीत, कार्यकाल 5 वर्ष)।
- वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में सेनाध्यक्ष के अतिरिक्त 6 सदस्य होते थे (वायसराय एवं सेनाध्यक्ष सहित कुल 8), जिनमें से 3 भारतीय रखे जाने की व्यवस्था थी।
- केंद्रीय विधानमंडल के बजट का लगभग दो-तिहाई से तीन-चौथाई (66–75%) भाग गैर-मतदेय (Non-votable) था; केवल शेष भाग पर ही मतदान संभव था।
- अधिनियम द्वारा मताधिकार का सीमित विस्तार किया गया (लगभग 50 लाख/~2–3% जनसंख्या), किन्तु सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की व्यवस्था नहीं की गई। मद्रास महिलाओं को मताधिकार देने वाला पहला प्रांत (1921) बना।
- 1909 में प्रारम्भ हुई पृथक निर्वाचन प्रणाली को इस अधिनियम द्वारा सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों तथा यूरोपीय समुदाय तक विस्तारित किया गया।
- इस अधिनियम में लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान किया गया, जिसके आधार पर 1 अक्टूबर 1926 को भारत का पहला लोक सेवा आयोग स्थापित हुआ।
- 1923 में गठित स्वराज पार्टी (चित्तरंजन दास व मोतीलाल नेहरू) ने परिषद-प्रवेश व गतिरोध नीति अपनाकर बंगाल तथा मध्य प्रांत में द्वैध शासन को व्यावहारिक रूप से विफल कर दिया।
- अधिनियम में यह प्रावधान किया गया था कि 10 वर्ष बाद (1929 में) इसकी समीक्षा के लिए एक वैधानिक आयोग नियुक्त किया जाएगा। किन्तु इसे निर्धारित समय से पूर्व ही 1927 में नियुक्त किया गया; इसमें कोई भारतीय सदस्य न होने से 1928 में इसका देशव्यापी बहिष्कार हुआ- “साइमन कमीशन, वापस जाओ” इसी विरोध का नारा था।
- 1920 में इसी अधिनियम के अंतर्गत केंद्रीय एवं प्रांतीय विधानमंडलों के प्रथम चुनाव आयोजित किए गए, जिनका कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन के कारण बहिष्कार किया।
- द्वैध शासन की व्यावहारिक असफलता के कारण इसे भारत सरकार अधिनियम, 1935 द्वारा समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता लागू की गई।
- अधिनियम की प्रस्तावना में उत्तरदायी शासन की क्रमिक प्राप्ति का उल्लेख था, किन्तु प्रगति का समय एवं स्वरूप तय करने का अधिकार ब्रिटिश संसद के पास रखा गया।
- Devolution Rules (1920) द्वारा विषय केंद्रीय तथा प्रांतीय सूची में बाँटे गए; पहली बार प्रांतीय बजट केंद्रीय बजट से अलग किया गया।
- प्रांतों में एकसदनीय विधान परिषदें थीं, जिनके कम से कम 70% सदस्य निर्वाचित तथा अधिकतम 20% सरकारी होते थे (कार्यकाल 3 वर्ष; गवर्नर द्वारा 1 वर्ष तक विस्तार संभव)।
- द्वैध शासन की अवधारणा का श्रेय लियोनेल कर्टिस को दिया जाता है।
- भारत सचिव का वेतन भारतीय राजस्व के स्थान पर ब्रिटिश राजकोष से दिया जाने लगा।
- कांग्रेस ने अमृतसर अधिवेशन (दिसंबर 1919) में सुधारों को अपर्याप्त बताया और कलकत्ता विशेष अधिवेशन (सितंबर 1920) में असहयोग अपनाया; नरमपंथियों ने सुधारों का स्वागत कर नेशनल लिबरल फेडरेशन (1919) बनाया।
- द्वैध शासन की जाँच हेतु 1924 में मड्डीमन समिति गठित हुई, जिसकी रिपोर्ट 1925 में आई।
- इस अधिनियम से पहली बार द्विसदनीयता तथा प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था शुरू हुई; अनुदान माँगों पर मतदान केवल विधान सभा में होता था, और दोनों सदनों में गतिरोध पर गवर्नर-जनरल 6 माह बाद संयुक्त बैठक बुला सकता था।
- गैर-मतदेय मदों में ऋण-ब्याज, विधि-निर्धारित व्यय, सम्राट/भारत सचिव द्वारा नियुक्त व्यक्तियों के वेतन तथा धार्मिक, राजनीतिक एवं रक्षा व्यय शामिल थे; गवर्नर-जनरल अस्वीकृत अनुदान बहाल कर सकता था और विधेयकों को प्रमाणित कर कानून बना सकता था।
- द्वैध शासन 8 गवर्नर-प्रांतों (बंगाल, मद्रास, बंबई, संयुक्त प्रांत, पंजाब, बिहार-उड़ीसा, मध्य प्रांत, असम) के लिए था; मंत्री गवर्नर के प्रसादपर्यंत पद धारण करते थे और गवर्नर पर्याप्त कारण होने पर मंत्रियों की सलाह से असहमत हो सकता था।
- प्रांतीय विधान परिषदों में आरक्षित विषयों के विधेयकों को गवर्नर प्रमाणित कर कानून बना सकता था; आरक्षित विषयों की अस्वीकृत माँगों को भी वह बहाल कर सकता था।
- उच्चायुक्त की नियुक्ति की व्यवस्था धारा 35 के अंतर्गत सम्राट Order in Council द्वारा कर सकता था; भारत परिषद की सदस्य संख्या 8–12 तथा कार्यकाल 5 वर्ष किया गया।
- लोक सेवा आयोग (धारा 38) में अधिकतम 5 सदस्य होते थे, जिन्हें भारत सचिव (इन काउंसिल) नियुक्त करता था; महालेखा परीक्षक (धारा 39) की नियुक्ति भी भारत सचिव द्वारा होती थी।
- 10 वर्ष बाद नियुक्त होने वाले वैधानिक आयोग (धारा 41) को शासन-प्रणाली, शिक्षा की प्रगति और प्रतिनिधि संस्थाओं की जाँच कर उत्तरदायी शासन के विस्तार पर रिपोर्ट देनी थी।
- राजकोषीय स्वायत्तता एक परिपाटी (Convention) थी, अधिनियम का प्रावधान नहीं; नरेंद्र मंडल (Chamber of Princes) का उद्घाटन 8 फरवरी 1921 को हुआ।
- मताधिकार की योग्यताएँ तथा साम्प्रदायिक निर्वाचन क्षेत्र अधिनियम में नहीं, बल्कि उसके अंतर्गत बने नियमों में तय हुए; इनकी रूपरेखा साउथबरो (मताधिकार) समिति की सिफारिशों पर आधारित थी, जबकि विषयों का बँटवारा फीथम समिति की सिफारिशों पर आधारित था।
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