सूर साम्राज्य : द्वितीय अफगान साम्राज्य
➣ सूर साम्राज्य भारतीय इतिहास में मुगल शासन के दो चरणों के मध्य का संक्रमणकाल माना जाता है। इस काल में 1540 से 1555 ई. तक उत्तर भारत में मुगल सत्ता का अंत हो गया और उसके स्थान पर अफगान शासकों का प्रभुत्व स्थापित हुआ।
➣ इस अवधि में मुगल सम्राट हुमायूँ को भारत छोड़कर निर्वासन का जीवन व्यतीत करना पड़ा, जबकि उसका भाई कामरान मिर्ज़ा काबुल एवं कंधार पर अपना अधिकार बनाए हुए था।
➣ 17 मई, 1540 ई. को बिलग्राम (कन्नौज) के युद्ध में द्वितीय मुगल सम्राट हुमायूँ को पराजित कर शेरशाह सूरी ने सूर वंश की स्थापना की तथा भारत में पुनः अफगान सत्ता स्थापित की।
➣ बहलोल लोदी द्वारा स्थापित प्रथम अफगान साम्राज्य के पतन के बाद शेरशाह सूरी को द्वितीय अफगान साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है।
➣ उसका शासनकाल केवल पाँच वर्ष (1540–1545 ई.) का था, फिर भी उसने प्रशासन, राजस्व व्यवस्था, सड़क निर्माण, डाक व्यवस्था एवं मुद्रा प्रणाली में ऐसे महत्वपूर्ण सुधार किए, जिन्हें बाद में मुगल सम्राट अकबर ने भी अपनाया।
प्रारंभिक जीवन
➣ शेरशाह सूरी के जन्म को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। एक मत के अनुसार उसका जन्म 1472 ई. में बजवाड़ा (होशियारपुर, पंजाब) में हुआ था जबकि इतिहासकार डॉ. कालिका रंजन कानूनगो के अनुसार शेरशाह का जन्म 1486 ई. में हिसार फ़िरोजा (हरियाणा) में हुआ।
➣ दोनों तिथियाँ आज भी विद्वानों के बीच बहस का विषय हैं, पर अधिकांश आधुनिक इतिहासकार 1486 ई. को अधिक प्रामाणिक मानते हैं।
➣ उसका वास्तविक नाम फ़रीद खाँ था। उसके पिता हसन खाँ सूरी मूलतः अफगान थे और आरंभ में नारनौल (हरियाणा) के एक छोटे जागीरदार थे। जौनपुर के गवर्नर जमाल खाँ की सिफारिश पर दिल्ली सल्तनत के सुल्तान सिकंदर लोदी ने हसन खाँ को सहसराम, खवासपुर तथा टांडा (दक्षिण बिहार) की जागीर प्रदान की।
➣ फ़रीद का बचपन सौतेली माँ के दुर्व्यवहार के कारण कठिनाइयों में बीता। फलस्वरूप उसने घर छोड़कर जौनपुर में शिक्षा प्राप्त की, जहाँ उसने अरबी एवं फ़ारसी भाषाओं का गहन अध्ययन किया। शिक्षा पूर्ण करने के बाद उसने अपने प्रशासनिक कौशल से पिता को प्रभावित किया और पैतृक जागीर का सफल प्रबंधन संभाला, किंतु सौतेली माँ की ईर्ष्या के कारण उसे जागीर से बेदखल कर दिया गया।
➣ 1522 ई. में फ़रीद दक्षिण बिहार के सूबेदार बहार खाँ लोहानी (जिसने बाद में स्वतंत्रता की घोषणा कर सुल्तान मुहम्मद शाह की उपाधि धारण की) की सेवा में आया, जहाँ उसने अपनी योग्यता से शीघ्र ही अपना प्रभाव स्थापित कर लिया।
➣ एक शिकार अभियान के दौरान फ़रीद ने अकेले तलवार के एक ही वार से एक शेर को मार डाला। इस साहस से प्रभावित होकर बहार खाँ लोहानी ने उसे शेरखाँ की उपाधि दी तथा अपने नाबालिग पुत्र जलाल खाँ का संरक्षक (शिक्षक) नियुक्त किया।
➣ 1528 ई. में बहार खाँ लोहानी की मृत्यु के बाद उसकी विधवा दूदू बेगम ने शेरखाँ को जलाल खाँ का संरक्षक बनाए रखा। परिणामस्वरूप शेरखाँ धीरे-धीरे दक्षिण बिहार का वास्तविक शासक बन गया।
➣ 1527-28 ई. में शेरखाँ कुछ समय के लिए मुगल बादशाह बाबर की सेवा में रहा। जनवरी 1528 में उसने चंदेरी के युद्ध में बाबर की ओर से भाग लिया।
➣ मई 1529 में घाघरा के युद्ध में भी उसने बाबर की सेना का साथ देते हुए महमूद लोदी एवं बंगाल के शासक नुसरत शाह की संयुक्त सेना के विरुद्ध युद्ध किया।
➣ कुछ इतिहासकारों का मत है कि घाघरा के युद्ध के समय शेरखाँ महमूद लोदी के पक्ष में चला गया था। इसी आधार पर वे बाबर द्वारा हुमायूँ को शेरखाँ से सतर्क रहने की सलाह का उल्लेख करते हैं। हालांकि अधिकांश आधुनिक इतिहासकार इस मत को स्वीकार नहीं करते और शेरखाँ को घाघरा के युद्ध में बाबर का सहयोगी मानते हैं।
➣ 1529 ई. में ही शेरखाँ ने दक्षिण बिहार पर आक्रमण करने आए बंगाल के शासक नुसरत शाह को पराजित किया। इस विजय के बाद उसने कोई शाही उपाधि धारण करने के बजाय “हजरते-आला” की उपाधि धारण की और दक्षिण बिहार का शासन अपने हाथों में ले लिया।
➣ बाबर की मृत्यु (1530 ई.) के बाद शेरखाँ ने बिहार में अपनी स्थिति और अधिक सुदृढ़ की तथा हुमायूँ के शासनकाल में मुगलों के विरुद्ध एक शक्तिशाली अफगान नेता के रूप में उभरा।
हुमायुँ से संघर्ष (1532 ई.)
➣ बाबर ने हुमायूँ को शेरशाह के बारे में पहले ही उसे चालाक अफगान कहकर सावधान रहने की सलाह दी थी। बाबर की मृत्यु 1530 ई. में हो चुकी थी और दिल्ली के सिंहासन पर अब हुमायूँ बैठा था।
➣ हुमायूँ और शेरखाँ के बीच पहला बड़ा टकराव चुनार के किले को लेकर हुआ, जो उस समय शेरखाँ के अधिकार में था।
➣ उल्लेखनीय है कि इससे पहले अगस्त 1532 ई. में हुमायूँ ने दौहरिया (देवरा) नामक स्थान पर महमूद लोदी के नेतृत्व वाली अफगान सेना को पराजित किया था। इसी विजय के बाद हुमायूँ ने चुनार की ओर रुख किया।
➣ चुनार का किला गंगा घाटी तथा पूर्वी भारत की दृष्टि से अत्यंत सामरिक महत्त्व रखता था, इसीलिए इसे पूर्वी भारत का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है।
➣ लगभग चार महीने तक किले की घेराबंदी के बाद हुमायूँ और शेरखाँ के बीच समझौता हुआ, जिसके तहत शेरखाँ ने हुमायूँ की औपचारिक अधीनता स्वीकार कर ली।
➣ समझौते के तहत उसने अपने पुत्र कुतुब खाँ को एक अफगान सैनिक टुकड़ी के साथ हुमायूँ की सेवा में भी भेजा।
➣ बदले में हुमायूँ ने चुनार का किला शेरखाँ के ही अधिकार में रहने दिया और स्वयं गुजरात के शासक बहादुरशाह के विरुद्ध अभियान में व्यस्त हो गया।
बंगाल व बिहार पर अधिकार
➣ हुमायूँ के गुजरात अभियान में उलझे रहने और आगरा से दूर रहने का पूरा लाभ उठाते हुए 1533–1537 ई. के बीच शेरखाँ ने अपनी स्थिति और अधिक सुदृढ़ कर ली तथा बिहार का निर्विवाद शासक बन गया।
➣ सूरजगढ़ के युद्ध (1534 ई.) में शेर ख़ाँ ने बंगाल के शासक गयासुद्दीन महमूद शाह को पराजित किया और उसे 13 लाख स्वर्ण दीनार देने के लिए विवश कर दिया। इस विजय के बाद बिहार पर शेर ख़ाँ की स्थिति और अधिक मजबूत हो गई।
➣ 1537 ई. में हुमायूँ ने शेरखाँ की बढ़ती शक्ति को देखते हुए दूसरी बार चुनार के किले पर घेरा डाला। इस बार शेरखाँ के पुत्र कुतुब खाँ ने लगभग छह महीने तक हुमायूँ की सेना को किले में उलझाए रखा।
➣ अंततः हुमायूँ ने कूटनीति तथा गुजरात के पूर्व तोपची और अब उसकी सेवा में आ चुके प्रसिद्ध सैन्य इंजीनियर रूमी खाँ की सहायता से चुनार के किले पर अधिकार कर लिया।
➣ इन्हीं छह महीनों के दौरान शेरखाँ ने बंगाल अभियान में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की और राजधानी गौड़ के अधिकांश खजाने को सुरक्षित रूप से रोहतासगढ़ के किले में पहुँचवा दिया।
➣ वर्तमान झारखंड के साहिबगंज ज़िले के निकट स्थित तेलियागढ़ी दर्रा उस समय “बंगाल का प्रवेश द्वार” अथवा “बंगाल की कुंजी” कहलाता था, क्योंकि उत्तर भारत से बंगाल जाने का मुख्य मार्ग यहीं से होकर गुजरता था।
➣ 1538 ई. में हुमायूँ ने बंगाल पर आक्रमण कर राजधानी गौड़ पर अधिकार कर लिया (जिसका नामकरण उसने जन्नताबाद कर दिया)।
➣ ठीक इसी दौरान आगरा में हुमायूँ के भाई हिंदाल ने स्वयं को स्वतंत्र बादशाह घोषित कर विद्रोह कर दिया। इस संकट के कारण हुमायूँ को बंगाल में अपनी स्थिति मजबूत किए बिना ही आगरा की ओर वापस लौटना पड़ा।
चौसा का युद्ध (1539)
➣ बंगाल से लौटते समय 26 जून, 1539 ई. को बक्सर (वर्तमान बिहार) के निकट चौसा नामक स्थान पर हुमायूँ एवं शेर ख़ाँ की सेनाओं के बीच निर्णायक युद्ध हुआ, जिसमें शेर ख़ाँ विजयी रहा।
➣ युद्ध में पराजित होने के बाद हुमायूँ किसी प्रकार गंगा नदी पार कर अपनी जान बचाने में सफल हुआ। कहा जाता है कि निजाम भिश्ती (एक भिश्ती/पानी ढोने वाला) ने मशक के सहारे उसकी जान बचाई थी।
➣ इस विजय के बाद शेर ख़ाँ ने शेरशाह की उपाधि धारण की, अपने नाम का खुतबा पढ़वाया तथा सिक्के ढलवाने का आदेश दिया। इसके साथ ही उसने स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया।
बिलग्राम या कन्नौज का युद्ध (1540)
➣ 17 मई, 1540 ई. को बिलग्राम (कन्नौज) के युद्ध में हुमायूँ और शेरशाह का पुनः आमना-सामना हुआ। इस युद्ध में भी हुमायूँ को करारी पराजय का सामना करना पड़ा।
➣ कन्नौज की विजय ने उत्तर भारत में शेरशाह की सर्वोच्चता स्थापित कर दी। इस विजय के बाद उसने आगरा और दिल्ली पर अधिकार कर लिया तथा उत्तर भारत में पुनः अफ़ग़ान सत्ता की स्थापना हुई।
➣ इस पराजय के बाद हुमायूँ भारत छोड़ने के लिए विवश हो गया। वह पहले सिंध और बाद में ईरान चला गया। लगभग 15 वर्षों (1540–1555 ई.) तक मुगलों का शासन भारत से समाप्त रहा।
राज्याभिषेक
➣ कन्नौज के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद 1540 ई. में शेरशाह दिल्ली की गद्दी पर बैठा और उत्तर भारत में सूर वंश अथवा द्वितीय अफगान साम्राज्य की स्थापना की।
➣ शेरशाह के राज्याभिषेक के समय उसकी आयु को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। कुछ इतिहासकार इसे लगभग 67 वर्ष मानते हैं, जबकि अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार उसकी आयु लगभग 54 वर्ष थी।
➣ उत्तर भारत का प्रथम अफगान साम्राज्य लोदी वंश था, जिसकी स्थापना बहलोल लोदी ने की थी। शेरशाह द्वारा स्थापित सूर वंश को उत्तर भारत का द्वितीय अफगान साम्राज्य माना जाता है।
शेरशाह का सैन्य अभियान
पंजाब पर आक्रमण
➣ कन्नौज (बिलग्राम) के युद्ध (1540 ई.) में हुमायूँ को निर्णायक रूप से पराजित करने के पश्चात शेरशाह सूरी ने अपनी विजय अभियान को और आगे बढ़ाया। शेरशाह ने सर्वप्रथम 1540 ई. में ही पंजाब पर आक्रमण कर मुगलों के इस महत्वपूर्ण गढ़ लाहौर को जीत लिया, जिससे पंजाब क्षेत्र पर मुगल प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो गया तथा हुमायूँ को भारत छोड़कर ईरान की ओर पलायन करने पर विवश होना पड़ा।
गक्खरों से युद्ध (1541 ई.)
➣ पंजाब विजय के पश्चात शेरशाह का ध्यान पश्चिमोत्तर सीमा की ओर गया। 1541 ई. में शेरशाह का पश्चिमोत्तर क्षेत्र में निवास करने वाली गक्खर जाति से संघर्ष हुआ।
➣ इस युद्ध का मूल कारण यह था कि गक्खर लोग सदैव मुगलों की सहायता करते थे तथा मुगल हितों के पोषक बने रहते थे, जो शेरशाह के लिए एक गंभीर सुरक्षा खतरा था।
➣ इसके अतिरिक्त गक्खर लोग अपनी वीरता, साहस एवं लूटपाट की प्रवृत्ति के लिए भी कुख्यात थे।
➣ हालाँकि शेरशाह गक्खर जाति को पूर्णतः समाप्त करने के अपने मूल लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल नहीं हो सका, परंतु फिर भी उसने इस अभियान में गक्खरों की सैन्य शक्ति को पर्याप्त रूप से कमजोर करने में सफलता अवश्य प्राप्त की।
➣ भविष्य में गक्खरों एवं मुगलों के संभावित खतरे से अपनी उत्तरी-पश्चिमी सीमा को सुरक्षित रखने हेतु शेरशाह ने पंजाब में झेलम नदी के किनारे एक अत्यंत शक्तिशाली एवं सुदृढ़ रोहतासगढ़ नामक किले का निर्माण करवाया, जो सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।
➣ इस किले की सुरक्षा एवं क्षेत्र पर नियंत्रण हेतु शेरशाह ने हैबत खाँ एवं खवास खाँ के प्रतिनिधित्व में वहाँ एक सुगठित अफगान सैनिक टुकड़ी को स्थायी रूप से तैनात कर दिया, ताकि सीमा की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
बंगाल का विद्रोह (1541 ई.)
➣ गक्खरों से निपटने के पश्चात शेरशाह को बंगाल में उत्पन्न हुई एक गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ा। बंगाल का सूबेदार खिज्र खाँ केंद्रीय सत्ता की अवहेलना करते हुए एक स्वतंत्र शासक की भाँति व्यवहार कर रहा था, जो शेरशाह की सर्वोच्चता के लिए एक खुली चुनौती थी।
➣ इस विद्रोह को कुचलने हेतु शेरशाह स्वयं बंगाल आया और खिज्र खाँ को बंदी बनाकर विद्रोह का पूर्णतः दमन किया।
➣ भविष्य में बंगाल में इस प्रकार के विद्रोहों की पुनरावृत्ति रोकने के उद्देश्य से शेरशाह ने वहाँ एक नवीन एवं सुव्यवस्थित प्रशासनिक व्यवस्था लागू की।
➣ इसके अंतर्गत संपूर्ण बंगाल को अनेक सरकारों (जिलों) में विभाजित किया गया, जिससे प्रशासनिक नियंत्रण अधिक सुदृढ़ एवं प्रभावी बन सके।
➣ इसके साथ ही प्रत्येक सरकार में एक छोटी सैनिक टुकड़ी के साथ शिकदार (किसी क्षेत्र-विशेष का सैनिक अधिकारी) की नियुक्ति की गई, जो अपने-अपने क्षेत्र में कानून-व्यवस्था एवं शांति बनाए रखने के लिए उत्तरदायी था।
➣ इन शिकदारों की शक्ति एवं गतिविधियों पर नियंत्रण रखने हेतु एक उच्च असैनिक (गैर-सैनिक) अधिकारी के पद “अमीन-ए-बंगला” की भी नियुक्ति की गई।
➣ यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद था तथा इस पद पर सर्वप्रथम नियुक्ति काजी फजीलात नामक व्यक्ति को दी गई। इस प्रकार शेरशाह ने बंगाल में सैनिक एवं असैनिक प्रशासन के मध्य एक कुशल संतुलन स्थापित करने का सफल प्रयास किया।
मालवा का अभियान (1542 ई.)
➣ गुजरात के शक्तिशाली शासक बहादुर शाह की मृत्यु के पश्चात उत्पन्न हुई राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाते हुए मालवा के सूबेदार मल्लू खाँ ने स्वयं को कादिर शाह के नाम से मालवा का स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया, जो शेरशाह की केंद्रीय सत्ता के लिए एक प्रत्यक्ष चुनौती थी।
➣ शेरशाह ने इस विद्रोह को तत्काल कुचलने का निर्णय लिया तथा मालवा को पुनः अपने अधीन करने हेतु कादिर शाह के विरुद्ध सैन्य अभियान प्रारंभ किया।
➣ इसी अभियान के दौरान मार्ग में अप्रैल, 1542 ई. में शेरशाह ने मध्य भारत के सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण ग्वालियर के किले पर भी अधिकार कर लिया तथा वहाँ के शासक पूरनमल को अपनी अधीनता स्वीकार करने पर विवश किया।
➣ शेरशाह की शक्तिशाली सेना को अपनी ओर बढ़ते देख कादिर शाह का साहस टूट गया और उसने युद्ध करने के बजाय सारंगपुर में शेरशाह के समक्ष बिना किसी प्रतिरोध के आत्मसमर्पण कर दिया। इस आत्मसमर्पण के पश्चात मालवा के महत्वपूर्ण नगरों- मांडू, उज्जैन एवं सारंगपुर पर शेरशाह का अधिकार स्थापित हो गया।
➣ शेरशाह ने पराजित कादिर शाह के साथ उदारता का व्यवहार करते हुए उसे लखनौती एवं कालपी का गवर्नर नियुक्त किया, परंतु कादिर शाह ने इस नियुक्ति को स्वीकार करने के बजाय अपने परिवार सहित गुजरात के शासक महमूद तृतीय की शरण में जाना उचित समझा।
➣ मालवा को पूर्णतः व्यवस्थित करने के पश्चात शेरशाह ने वहाँ का प्रशासन सुजात खाँ को सौंपते हुए उन्हें मालवा का गवर्नर नियुक्त किया। वापसी के मार्ग में शेरशाह ने राजपूताना के अत्यंत सुदृढ़ एवं सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रणथंभौर के किले को भी अपने अधीन कर लिया।
रणथंभौर के किले पर अधिकार (1542 ई.)
➣ रणथंभौर का किला अरावली एवं विंध्य पर्वत श्रृंखलाओं के संगम क्षेत्र में स्थित था। इसे राजपूताना के सबसे सुदृढ़, अभेद्य एवं सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दुर्गों में गिना जाता था।
➣ शेरशाह के समय रणथंभौर पर स्थानीय राजपूत शासक का अधिकार था, जिसने सूर साम्राज्य की बढ़ती शक्ति के सामने अधिक समय तक प्रतिरोध नहीं किया। समकालीन स्रोत उस शासक का स्पष्ट नाम नहीं बताते हैं।
➣ इस दुर्ग का सामरिक महत्व इसलिए अत्यधिक था, क्योंकि यह उत्तर भारत एवं मालवा–गुजरात मार्ग पर नियंत्रण रखने वाला प्रमुख किला था। इस पर अधिकार स्थापित करने वाली शक्ति राजपूताना के बड़े भू-भाग तथा मध्य भारत की गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण रख सकती थी।
➣ मालवा विजय के बाद शेरशाह ने रणथंभौर की रणनीतिक महत्ता को ध्यान में रखते हुए 1542 ई. में इस दुर्ग की ओर अभियान किया। शेरशाह की विशाल एवं संगठित सेना के सामने दुर्ग अधिक समय तक टिक नहीं सका और अंततः रणथंभौर सूर साम्राज्य के अधीन आ गया।
➣ रणथंभौर पर अधिकार प्राप्त करने के पश्चात शेरशाह ने इस महत्वपूर्ण दुर्ग की सुरक्षा एवं प्रशासन का दायित्व अपने पुत्र आदिल खाँ को सौंप दिया।
➣ इससे राजपूताना में सूर साम्राज्य की स्थिति और अधिक सुदृढ़ हो गई तथा मालवा और उत्तर भारत के बीच संपर्क मार्ग सुरक्षित हो गया।
रायसीन दुर्ग (1543 ई.)
➣ रायसीन के शासक पूरनमल ने 1542 ई. में शेरशाह की अधीनता स्वीकार कर ली थी। किंतु चंदेरी के मुस्लिम परिवारों के साथ कथित दुर्व्यवहार एवं उनकी स्त्रियों को बंदी बनाए जाने के आरोपों को आधार बनाकर शेरशाह ने 1543 ई. में रायसीन पर सैन्य अभियान चलाने का निर्णय लिया।
➣ 1543 ई. में शेरशाह ने रायसीन के किले की घेराबंदी कर दी। पूरनमल के नेतृत्व में राजपूत वीरों ने अत्यंत साहसपूर्वक प्रतिरोध किया तथा कई महीनों तक घेरा जारी रहने पर भी शेरशाह को कोई निर्णायक सफलता प्राप्त नहीं हो सकी।
➣ अंततः शेरशाह ने सैन्य बल से सफलता न मिलने पर कूटनीतिक उपाय अपनाते हुए पूरनमल को उसके प्राण एवं सम्मान की रक्षा का वचन देकर आत्मसमर्पण के लिए राजी कर लिया। इस संधि के समय कुतुब खाँ एवं आदिल खाँ साक्षी के रूप में उपस्थित रहे।
➣ परंतु आत्मसमर्पण के पश्चात कुछ अफगान सरदारों एवं मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में आकर शेरशाह अपने वचन से मुकर गया। उसने एक रात अचानक राजपूतों के शिविरों को चारों ओर से घेर लिया और उन पर आक्रमण कर दिया।
➣ इस विकट परिस्थितियों में राजपूत महिलाओं ने जौहर किया, जबकि पूरनमल एवं उनके वीर सैनिकों ने साका करते हुए अंतिम श्वास तक शत्रु का डटकर सामना किया और वीरगति प्राप्त की।
➣ कहा जाता है कि शेरशाह के इस विश्वासघात से कुतुब खाँ इतना अधिक आहत हुआ कि उसने अपनी साक्षी में हुए इस वचन-भंग को सहन न कर पाने के कारण स्वयं अपने जीवन का अंत कर लिया।
अनेक इतिहासकारों ने रायसीन में शेरशाह द्वारा किए गए इस विश्वासघात को उसके संपूर्ण जीवन एवं शासन पर लगा काला धब्बा माना है।
सिन्ध एवं मुल्तान (1543 ई.)
➣ 1543 ई. में शेरशाह ने पंजाब के सूबेदार हैबत खाँ नियाज़ी के नेतृत्व में एक सुसंगठित सैन्य अभियान भेजा।
इस अभियान में बख्शू लंगाह तथा फतेह खाँ जाट जैसे स्थानीय विरोधी सरदारों को पराजित कर मुल्तान एवं सिंध पर सूर साम्राज्य का अधिकार स्थापित किया गया।➣ इस सफल अभियान में उत्कृष्ट सैन्य नेतृत्व एवं वीरता का परिचय देने के पुरस्कारस्वरूप शेरशाह ने हैबत खाँ नियाज़ी को प्रतिष्ठित “मसनद-ए-आला” की उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया।
➣ विजय के पश्चात शेरशाह ने सिंध एवं मुल्तान के प्रशासन का दायित्व हैबत खाँ नियाज़ी को सौंपा। उसके नेतृत्व में स्थानीय प्रशासन का पुनर्गठन कर सीमांत प्रदेशों पर सूर साम्राज्य का नियंत्रण और अधिक सुदृढ़ कर दिया।
मारवाड़ का अभियान (1544 ई.)
➣ मारवाड़ (राजस्थान) के शक्तिशाली शासक राव मालदेव की राजधानी जोधपुर थी। मालदेव उस समय के सबसे शक्तिशाली राजपूत शासकों में गिने जाते थे। बीकानेर एवं मेड़ता के शासकों के आमंत्रण पर शेरशाह ने 1544 ई. में मालदेव के विरुद्ध सैन्य अभियान चलाने का निर्णय लिया।
➣ दोनों सेनाएँ सुमेल (या सम्मेल) / गिरी-सुमेल नामक स्थान पर आमने-सामने आ डटीं। किंतु युद्ध आरंभ होने से पूर्व शेरशाह ने एक कूटनीतिक चाल चलते हुए मालदेव के सरदारों के नाम से जाली पत्र भिजवा दिए।
➣ इन पत्रों से मालदेव को यह संदेह हो गया कि उसके कुछ प्रमुख सरदार विश्वासघात करने वाले हैं। इस भ्रम के कारण उसने अपनी मुख्य सेना को पीछे हटाने का निर्णय लिया।
➣ किंतु मालदेव के दो वीर सरदार जयता एवं कुम्पा ने अपने ऊपर लगे विश्वासघात के कलंक को मिटाने के लिए अपने स्वामी की आज्ञा की परवाह किए बिना शेरशाह की विशाल सेना पर धावा बोल दिया।
➣ दोनों वीर सरदारों ने अत्यंत साहस एवं स्वामिभक्ति का परिचय देते हुए अंतिम श्वास तक युद्ध किया और वीरगति प्राप्त की। राजपूत इतिहास में उनका बलिदान स्वामिभक्ति एवं वीरता का अनुपम उदाहरण माना जाता है।
इस युद्ध की भीषणता से प्रभावित होकर शेरशाह ने कहा था— “मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान का साम्राज्य लगभग खो बैठा था।” यह उक्ति मालदेव की शक्ति तथा राजपूतों के अदम्य साहस का प्रतीक मानी जाती है।
➣ युद्ध के पश्चात शेरशाह ने अजमेर, जोधपुर, नागौर, मेड़ता तथा आबू सहित मारवाड़ के अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर लिया।
➣ यद्यपि यह विजय स्थायी सिद्ध नहीं हुई। 1545 ई. में शेरशाह की मृत्यु के बाद सूर साम्राज्य की शक्ति कमजोर पड़ते ही राव मालदेव ने अपने अधिकांश खोए हुए प्रदेश पुनः प्राप्त कर लिए।
मेवाड़ और आमेर की अधीनता (1544 ई.)
➣ मारवाड़ अभियान से लौटते समय 1544 ई. में शेरशाह ने मेवाड़ की ओर प्रस्थान किया।
➣ उस समय मेवाड़ के शासक राणा उदयसिंह अल्पवयस्क थे तथा राज्य का शासन उनके संरक्षकों के माध्यम से संचालित हो रहा था।
➣ मेवाड़ के शासकों ने शेरशाह की विशाल एवं युद्ध-अनुभवी सैन्य शक्ति का प्रत्यक्ष सामना करने के स्थान पर कूटनीतिक दूरदर्शिता का परिचय देते हुए उसकी अधीनता स्वीकार कर ली।
➣ फलस्वरूप बिना किसी बड़े युद्ध एवं रक्तपात के ही मेवाड़ सूर साम्राज्य के प्रभाव क्षेत्र में सम्मिलित हो गया।
➣ इसी अभियान के दौरान आमेर (कछवाहा) के शासकों ने भी परिस्थितियों को भाँपते हुए बिना विशेष प्रतिरोध के शेरशाह की अधीनता स्वीकार कर ली, जिससे राजपूताना के इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में भी सूर साम्राज्य का प्रभाव और अधिक सुदृढ़ एवं व्यापक हो गया।
➣ इन क्रमिक विजयों के पश्चात शेरशाह का साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया। उसका प्रभुत्व पूर्व में सिंधु नदी से बंगाल तक तथा पश्चिम एवं दक्षिण में मालवा एवं राजस्थान के अधिकांश भाग तक स्थापित हो चुका था, जो उसकी असाधारण सैन्य कुशलता, कूटनीतिक दक्षता एवं प्रशासनिक प्रतिभा का सबसे बड़ा परिचायक था।
कालिंजर का अभियान (1545 ई.)
➣ कालिंजर का अभियान शेरशाह का अंतिम सैन्य अभियान था। उस समय कालिंजर के इस सुदृढ़ दुर्ग का शासक कीरत सिंह था।
➣ इस अभियान के कारणों के संबंध में इतिहासकारों में मतभेद है। एक मत के अनुसार कहा जाता है कि शेरशाह ने कीरत सिंह से एक नृत्यांगना (नाचने-गाने वाली दासी) की माँग की थी, जिसे कीरत सिंह ने देने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया।
➣ जबकि अन्य स्रोतों के अनुसार इस अभियान का वास्तविक कारण यह था कि कीरत सिंह ने शेरशाह के स्पष्ट आदेशों की अवहेलना करते हुए रीवा के महाराजा वीरभान सिंह बघेला को अपने यहाँ शरण दे रखी थी, जो शेरशाह की दृष्टि में एक खुली अवज्ञा थी।
➣ नवंबर, 1544 ई. में शेरशाह ने कालिंजर के अभेद्य किले की घेराबंदी कर दी। राजपूत रक्षकों ने अत्यंत दृढ़तापूर्वक प्रतिरोध किया तथा लगभग 6 महीने तक घेराबंदी जारी रहने के बावजूद सफलता के कोई आसार न देखकर शेरशाह ने किले पर गोला-बारूद के व्यापक प्रयोग का आदेश दिया।
➣ इसी दौरान किले की दीवार से टकराकर लौटे एक गोले में अचानक हुए भीषण विस्फोट की चपेट में स्वयं शेरशाह भी आ गया। इस विस्फोट के कारण 22 मई, 1545 ई. को शेरशाह की मृत्यु हो गई।
➣ मृत्यु के समय वह उक्का नामक एक विशेष अग्नेयास्त्र चला रहा था। यह भी उल्लेखनीय है कि अपनी मृत्यु से पूर्व ही शेरशाह कालिंजर के किले पर विजय प्राप्त कर चुका था।
➣ शेरशाह की इस आकस्मिक मृत्यु पर प्रसिद्ध इतिहासकार कानूनगो ने मार्मिक शब्दों में कहा — इस प्रकार एक महान राजनीतिज्ञ एवं सैनिक का अंत अपने जीवन की विजयों एवं लोकहितकारी कार्यों के मध्य में ही हो गया।
➣ शेरशाह का भव्य एवं ऐतिहासिक मकबरा उसके गृहनगर सासाराम, बिहार में स्थित है, जो एक कृत्रिम झील के मध्य निर्मित होने के कारण अपनी अद्वितीय स्थापत्य कला के लिए विख्यात है तथा मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
शेरशाह सूरी के उत्तराधिकारी
इस्लामशाह (1545–1553 ई.)
➣ शेरशाह की आकस्मिक मृत्यु के उपरांत उसका पुत्र जलाल खाँ, इस्लामशाह की उपाधि धारण कर सूर साम्राज्य का नया सुल्तान बना। इसे सलीमशाह के नाम से भी जाना जाता है।
➣ गद्दी पर बैठते ही इस्लामशाह को अपने भाई आदिल खाँ तथा अनेक शक्तिशाली अफगान सरदारों के विरोध का सामना करना पड़ा। उसने आदिल खाँ के विद्रोह को विफल कर अपनी स्थिति सुदृढ़ की तथा खवास खाँ, सुजात खाँ एवं आजम हुमायूँ जैसे विद्रोही सरदारों के विद्रोहों का सफलतापूर्वक दमन किया।
➣ यद्यपि इस्लामशाह एक योग्य एवं कुशल शासक था, फिर भी उसके शासनकाल का अधिकांश समय आंतरिक विद्रोहों एवं अफगान सरदारों पर नियंत्रण स्थापित करने में व्यतीत हुआ। परिणामस्वरूप वह शेरशाह की भाँति साम्राज्य का अधिक विस्तार नहीं कर सका।
➣ इस्लामशाह ने उत्तर-पश्चिम सीमा की सुरक्षा को विशेष महत्व देते हुए वहाँ शेरगढ़, इस्लामगढ़, रशीदगढ़, फिरोजगढ़ एवं मानकोट नामक पाँच सुदृढ़ दुर्गों का निर्माण कराया। इन दुर्गों ने उत्तर-पश्चिमी सीमा की सुरक्षा को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से इस्लामशाह ने आदेश दिया कि प्रत्येक जिले में प्रत्येक शुक्रवार विशेष दरबार आयोजित कर शाही आदेशों का सार्वजनिक रूप से वाचन किया जाए। अधिकारी इन आदेशों को अत्यंत सम्मान के साथ ग्रहण कर उनका पालन सुनिश्चित करते थे।
➣ सैन्य संगठन के क्षेत्र में इस्लामशाह ने सेना को 50, 100, 200, 250 एवं 500 घुड़सवारों की संगठित टुकड़ियों में विभाजित किया। इस प्रकार की श्रेणीबद्ध व्यवस्था को आगे चलकर मुगलों की मनसबदारी व्यवस्था के पूर्ववर्ती स्वरूप के रूप में देखा जाता है।
➣ 1553 ई. में युवावस्था में ही इस्लामशाह की मृत्यु हो गई। उसके पश्चात उसका लगभग 12 वर्षीय पुत्र फिरोजशाह गद्दी पर बैठा।
किंतु कुछ ही दिनों बाद उसके मामा मुबारिज खाँ ने उसकी हत्या कर स्वयं मुहम्मद आदिलशाह की उपाधि धारण कर सिंहासन पर अधिकार कर लिया। इसके साथ ही सूर साम्राज्य में उत्तराधिकार संघर्ष तीव्र हो गया और उसके पतन की प्रक्रिया आरंभ हो गई।मुहम्मद आदिलशाह (1553–1555 ई.)
➣ फिरोजशाह की हत्या के पश्चात षड्यंत्रकारी मुबारिज खाँ ने मुहम्मद आदिलशाह की उपाधि धारण कर सूर वंश की गद्दी पर अधिकार कर लिया।
➣ अपने शासनकाल में उसने रेवाड़ी के एक साधारण बक्काल (नमक एवं खाद्यान्न व्यापारी) हेमू की योग्यता से प्रभावित होकर उसे पहले प्रशासनिक दायित्व सौंपे तथा बाद में अपना वजीर (प्रधानमंत्री) एवं प्रधान सेनापति नियुक्त किया।
➣ हेमू एक असाधारण सैन्य प्रतिभा का धनी था। उसने आदिलशाह की ओर से अनेक विद्रोहों का सफलतापूर्वक दमन किया तथा लगातार 22 युद्धों में विजय प्राप्त की।
➣ 1556 ई. में दिल्ली पर अधिकार करने के पश्चात उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। इतिहास में उसे प्रायः भारत का अंतिम हिन्दू सम्राट माना जाता है।
➣ व्यक्तिगत रुचियों की दृष्टि से आदिलशाह नृत्य एवं संगीत का प्रेमी था। उसने भक्त नामक एक प्रतिभाशाली संगीतज्ञ को विशेष सम्मान प्रदान करते हुए 10,000 रुपये का पुरस्कार एवं अन्य राजकीय अनुदान दिए।
➣ आदिलशाह का शासनकाल सूर साम्राज्य के पतन का काल सिद्ध हुआ। उसके शासनकाल में उत्तराधिकार संघर्ष एवं आंतरिक कलह के कारण सूर साम्राज्य चार भागों में विभाजित हो गया।
➣ आदिलशाह की राजधानी चुनार थी। इस समय सूर साम्राज्य के विभिन्न भागों पर अलग-अलग दावेदारों ने अपना अधिकार स्थापित कर लिया।
| क्षेत्र | शासक |
|---|---|
| पंजाब | सिकंदर शाह सूरी |
| दिल्ली एवं आगरा | इब्राहीम शाह सूरी |
| बिहार (राजधानी – चुनार) | मुहम्मद आदिलशाह |
| बंगाल | मुहम्मद शाह सूरी |
➣ सूर साम्राज्य के इस चार-भागीय विभाजन ने उसकी केंद्रीय शक्ति को कमजोर कर दिया, जिससे मुगल सम्राट हुमायूँ को भारत में पुनः अपना साम्राज्य स्थापित करने का अवसर मिल गया।
➣ 1555 ई. में हुमायूँ ने पहले सिकंदर शाह सूरी तथा बाद में इब्राहीम शाह सूरी को पराजित कर दिल्ली एवं आगरा पर पुनः अधिकार स्थापित कर लिया।
➣ हुमायूँ ने 1555 ई. में मच्छीवाड़ा का युद्ध (15 मई, 1555 ई.) तथा सरहिंद का युद्ध (22 जून, 1555 ई.) जीतकर अफगानों की शक्ति को निर्णायक रूप से परास्त कर दिया।
➣ इन दोनों युद्धों का विस्तृत विवरण हुमायूँ वाले अध्याय में दिया गया है। इन विजयों के साथ ही भारत में मुगल सत्ता की पुनर्स्थापना हुई और सूर वंश का शासन व्यावहारिक रूप से समाप्त हो गया।
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