लोदी वंश (1451–1526 ई.) : सम्पूर्ण अध्ययन | सभी शासक एवं पानीपत का युद्ध

भारतीय इतिहास मध्यकालीन भारत लोदी वंश (1451–1526 ई.)
📚 विषय सूची

लोदी वंश :दिल्ली सल्तनत का पहला अफगान राज्य

➣ सैय्यद वंश के अंतिम सुल्तान अलाउद्दीन आलमशाह द्वारा राज्य त्यागने के पश्चात दिल्ली में पुन: एक बार राजसत्ता एवं राजवंश का परिवर्तन हुआ। सैय्यदों का स्थान अब लोदियों ने ले लिया।

बहलोल लोदी द्वारा प्रथम अफगान राज्य की स्थापना हुई। द्वितीय अफगान राज्य का संस्थापक शेरशाह सूरी था।

➣ सैय्यदों के समान लोदियों को भी विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा परंतु सैय्यदों की अपेक्षा लोदियों ने अधिक दृढ़तापूर्वक परिस्थिति का सामना किया।

➣ लोदियों के उदय के साथ ही दिल्ली सल्तनत के विघटन की प्रक्रिया पूरी हो गयी। पानीपत के प्रथम युद्ध के पश्चात लोदियों का स्थान मुगल ले लेते हैं।

➣ लोदी वंश के कुल तीन शासक हुए-

शासक संक्षिप्त परिचय
बहलोल लोदी (1451–1489 ई.) लोदी वंश का संस्थापक। सैयद वंश का अंत कर दिल्ली सल्तनत पर अधिकार किया तथा जौनपुर को अपने राज्य में मिला लिया।
सिकंदर लोदी (1489–1517 ई.) लोदी वंश का सबसे योग्य शासक। 1504 ई. में आगरा नगर की स्थापना की तथा प्रशासन, कृषि और व्यापार को प्रोत्साहन दिया।
इब्राहीम लोदी (1517–1526 ई.) लोदी वंश का अंतिम शासक। 1526 ई. के प्रथम पानीपत युद्ध में बाबर से पराजित हुआ, जिससे दिल्ली सल्तनत का अंत और मुगल साम्राज्य की स्थापना हुई।

बहलोल लोदी (1451-1489 ई.)

➣ इस वंश की स्थापना बहलोल लोदी ने की थी। बहलोल लोदी दिल्ली में प्रथम अफ़ग़ान राज्य का संस्थापक था। वह अफ़ग़ानिस्तान के गिलजाई कबीले की महत्त्वपूर्ण शाखा शाहूखेल में पैदा हुआ था।

➣ बहलोल का बचपन का नाम बल्लू था एंव पितामह मलिक बहराम था। उसके पिता का नाम मलिक काला था। वह दौराला का प्रशासक था।

➣ बहलोल जब गर्भ में था उसके पिता की मृत्यु हो गई थी। अतः उसका पालन-पोषण उसके चाचा मलिक सुल्तानशाह (इलम खा) ने किया।

राज्याभिषेक

19 अप्रैल, 1451 को बहलोल बहलोल शाह गाजी की उपाधि से दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। चूंकि वह लोदी कबीले का अग्रगामी था, इसलिए उसके द्वारा स्थापित वंश को लोदी वंश कहा जाता है।

1451 ई. में जब सैयद वंश के अलाउद्दीन आलमशाह ने दिल्ली का तख़्त छोड़ा, उस समय बहलोल लाहौर और सरहिन्द का सूबेदार था। उसने अपने वज़ीर हमीद ख़ाँ की मदद से दिल्ली के तख़्त पर क़ब्ज़ा कर लिया।

सैन्य अभियान

➣ वह दूरदर्शी, बुद्धिमान और कूटनीतिज्ञ था। सुल्तान बनने के बाद अफगान साथियों से बंधुत्व का व्यवहार कर सर्वप्रथम उसने अपने तंत्र में ही चले आ रहे षड्यंत्रों की परंपराओं को कम करने की कोशिश की।

➣ बहलोल लोदी की सबसे बड़ी सफलता जौनपुर के शक शासक हुसैनशाह को हराकर जौनपुर राज्य को अपने साम्राज्य में फिर से अपने अधीन कर लिया, जो बहुत वर्षों से उसकी सत्ता का विरोध कर रहा था।

➣ बहलोल लोदी ने जौनपुर के शासक के रूप में अपने बेटे बारवक लोदी को नियुक्त किया।

➣ साथ ही सम्भल तथा रेवाड़ी पर अपनी सत्ता फिर से स्थापित की और दोआब के सरदारों का दमन किया।

➣ जौनपुर विजय के पश्चात् बहलोल की कीर्ति में वृद्धि हुई तथा धौलपुर, कालपी, बाड़ी के सरदारों में भय उत्पन्न हुआ; उन्होंने अधीनता स्वीकार करने के साथ-साथ नज़राना भी दिया।

1486-87 ई. में उसने ग्वालियर के शासक राय कर्ण (कीर्तिदेव) को पराजित कर 80 लाख टंका नज़राना प्राप्त किया, ग्वालियर अभियान ही उसका अंतिम अभियान था।

➣ ग्वालियर से वापस लौटते समय वह बीमार हो गया और जुलाई 1489 में दिल्ली आते समय रास्ते में ही उसकी मृत्यु हो गई।

मंगोल आक्रमण

➣ बहलोल लोदी के शासनकाल (1451-1489 ई.) में पश्चिमोत्तर सीमा (विशेषकर पंजाब और मुल्तान क्षेत्र) पर मंगोलों (या मध्य एशियाई घुड़सवारों) से निरंतर खतरा बना रहा।

➣ इन आक्रमणों को रोकने के लिए बहलोल ने अपने बड़े पुत्र मुहम्मद ख़ाँ को मुल्तान का हाकिम (गवर्नर) नियुक्त किया।

➣ मंगोलों ने लगभग 1478 ई. में भारत पर आक्रमण करने का प्रयास किया, किन्तु शाहज़ादा मुहम्मद ख़ाँ ने अपनी कुशल नेतृत्व क्षमता और सेना के बल पर उन्हें पीछे खदेड़ दिया।

➣ इस सफलता से मुल्तान क्षेत्र में सुरक्षा मजबूत हुई। किन्तु 1485 ई. में मंगोलों ने पुनः आक्रमण किया, मुल्तान तक बढ़ आये, और शाहज़ादे मुहम्मद ख़ाँ पर अचानक हमला करके उन्हें मार डाला।

➣ इस घटना से बहलोल लोदी को गहरा आघात पहुँचा, परंतु सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था को और सुदृढ़ किया गया।

राजत्व सिद्धान्त

अब्दुल्ला खाँ की पुस्तक तारीखे दाउदी में लोदी वंश तथा अफगानों के राजत्व सिद्धान्त की जानकारी मिलती है।

➣ बहलोल लोदी ने बहलोली सिक्के का प्रचलन करवाया, जो अकबर के समय तक उत्तर भारत में विनिमय का प्रमुख साधन बना रहा। एक टंके में 40 बहलोली होते थे।

तारीख-ए-दाऊदी के लेखक अब्दुल्लाह के अनुसार बहलोल लोदी कभी सिहासन पर नही बैठता था। वह अपने दरबारियों के बीच बैठता था।

➣ वह अपने सरदारों के खड़े रहने पर खुद भी खड़ा रहता था। वह अपने सरदारों को मसनद-ए-अली कहकर पुकारता था।

➣ बहलोल ने अफगानों को बड़ी जागीरें दी और उनकी जागीरों के हिसाब- किताब की कभी जाँच नहीं की।

➣ बहलोल लोदी धार्मिक रूप से सहिष्णु था। उसके सरदारों में कई प्रतिष्ठित सरदार हिन्दू थे। इनमें रायप्रताप सिंह, रायकरन सिंह, रायनर सिंह, राय त्रिलोकचकचन्द्र और राय दांदू प्रमुख हैं।

➣ बहलोल लोदी ने अपनी मृत्यु के पहले ही अपने तीसरे पुत्र निजाम खां को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था, किंतु कुछ सरदारों ने इसका विरोध जिसका मुख्य कारण यह था कि निजाम खां की मां जैबंद एक सुनार की पुत्री थी।

➣ कुछ शक्तिशाली सरदारों ने निजाम खां का साथ दिया और 17 जुलाई, 1489 ई. को निजाम खां सुल्तान सिकंदर शाह के नाम से सिंहासन पर बैठा।

सिकन्दर लोदी (1489-1517ई.)

➣ बहलोल लोदी का पुत्र निजाम खाँ 17 जुलाई, 1489 ई, में सुल्तान सिकन्दर शाह की उपाधि से दिल्ली के सिंहासन पर बैठा।

➣ यह लोदी वंश का सबसे महान शासक था। सिकन्दर लोदी का मूल नाम निजामशाह/निजाम खाँ था। सिकन्दर की माँ का नाम जैबन्द था, जो हिन्दू (सुनार) थी।

➣ सिकन्दर लोदी ने अफ़ग़ान सरदारों से समानता की नीति का परित्याग करके श्रेष्ठता की नीति का अनुसरण किया। उसने जनता की भलाई के अनेक कार्य करके प्रजा को राजभक्त और राज्य को शक्तिशाली बनाने का प्रयत्न किया।

➣ सिकन्दर ने तांबे का टंका चलाया। कृषि को विकसित करने के लिए महसूल (विक्रीकर) वापस लिया।

➣ उसने राज्य का हिसाब किताब रखने की लेखा परीक्षण प्रणाली की शुरुआत की।

सैन्य अभियान

➣ सिंहासनारूढ़ होने के समय सिकंदर लोदी की शक्ति बहुत सुदृढ़ नहीं थी, क्योंकि सरदारों व जागीरदारों की एक बहुत बड़ी संख्या अपने-अपने क्षेत्रों में शक्ति संगठित किये हुए थी।

➣ सिंहासन पर बैठने के उपरान्त सुल्तान ने सर्वप्रथम अपने विरोधियों में चाचा आलम ख़ाँ, ईसा ख़ाँ, आजम हुमायूं (सुल्तान का भतीजा) तथा जालरा के सरदार तातार ख़ाँ को परास्त किया।

➣ बहलोल लोदी के समय जौनपुर विजय के बाद बारवक शाह (बहलोल का पुत्र) को वहाँ नियुक्त किया गया था। किन्तु बारबक शाह एक अयोग्य सेनानायक और विलासी व्यक्ति था।

➣ जब जौनपुर में पूर्ववर्ती विस्थापित शक शासक हुसैन शाह के समर्थकों ने विद्रोह कर दिया तो बारबक शाह उसे दबाने में विफल रहा। अन्तत: 1492 ई. में सिकंदर लोदी ने बारबक शाह को अपदस्थ कर जौनपुर को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया।

➣ जौनपुर के बाद सुल्तान सिकन्दर लोदी ने 1494 ई. में बनारस के समीप हुए एक युद्ध में हुसैनशाह शर्की को परास्त कर बिहार को भी दिल्ली में मिला लिया। इस अभियान में उसने बंगाल से बिहार तक का क्षेत्र विजित कर लिया।

➣ इसके बाद उसने तिरहुत के शासक को अपने अधीन किया। राजपूत राज्यों में सिकन्दर लोदी ने धौलपुर, मन्दरेल, उतागिरि, नरवर एवं नागौर को जीता, परन्तु ग्वालियर पर अधिकार नहीं कर सका।

➣ राजस्थान के शासकों पर प्रभावी नियंत्रण रखने के लिए 1504 ई. में आगरा शहर की नींव डाली और 1506 ई. में इसे अपनी राजधानी बनाया। आगरा (उत्तर प्रदेश) में बादलगढ़ के किले का पुनर्निर्माण करवाया।

सिकन्दर लोदी प्रथम सुल्तान था, जिसने आगरा को अपनी राजधानी बनाया।

➣ अन्तिम समय में सुल्तान सिकन्दर शाह के गले की बीमारी होने से 21 नवम्बर, 1517 को उसकी मृत्यु हो गई। सिकन्दर लोदी का मकबरा खैरपुर (दिल्ली) में है।

राजत्व सिद्धान्त

➣ सिकंदर ने बहलोल के अपनाए अफगानी राजत्व सिद्धांत को त्यागकर स्वयं को सुल्तान घोषित किया। उसने अफगान सरदारों की शक्ति और प्रभाव को नियंत्रण में कर सुल्तान की प्रतिष्ठा को बढ़ाया।

➣ उसने अफगान सरदारों को भी अपना अधीनस्थ माना। उसने बहलोल लोदी के विपरीत दरबार में सिंहासन पर बैठना प्रारम्भ किया।

➣ सिकंदर लोदी का कथन था कि- यदि मैं अपने गुलाम को भी पालकी पर बैठा दूँ तो मेरे एक आदेश पर ये सरदार उसे कंधों पर उठा लेंगे।

➣ सिकन्दर के राजत्व का प्रमुख उद्देश्य सुल्तान की शक्ति में वृद्धि करना और अमीर वर्ग की शक्ति को नियन्त्रित करना था।

धार्मिक नीति

➣ धार्मिक दृष्टि से सिकन्दर लोदी असहिष्णु था। उसने हिन्दू मंदिरों को तोड़ कर वहाँ पर मस्जिद का निर्माण करवाना प्रारम्भ कर दिया।

➣ सिकन्दर लोदी ने जब हिन्दू मन्दिरों को तोड़ने और तीर्थ यात्रियों को नुकसान पहुंचाने का निश्चय किया, तो उलेमा मलिक उल उलमा मौलाना अब्दुल अजोधनी ने उसे हिन्दुओं की धार्मिक परम्परा में हस्तक्षेप से रोका।

➣ एक इतिहासकार के अनुसार, ‘सिकन्दर ने नगरकोट के ज्वालामुखी मंदिर की मूर्ति को तोड़कर उसके टुकड़ों को कसाइयों को माँस तोलने के लिए दे दिया था।’

➣ सिकन्दर लोदी ने हिन्दुओं पर जज़िया कर पुनः लगा दिया। उसने एक ब्राह्मण को इसलिए फाँसी दे दी, क्योंकि ब्राह्मण का कहना था कि, हिन्दू और मुस्लिम समान रूप से पवित्र हैं।

➣ मुसलमानों को ताजिया निकालने एवं मुसलमान स्त्रियों को पीरों एवं सन्तों के मजार पर जाने पर सुल्तान ने प्रतिबंध लगाया।

➣ उसने हिन्दुओं के यमुना के घाट पर स्नान करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

➣ उसने शर्की शासकों द्वारा जौनपुर में बनवायी गयी एक मस्जिद तोड़ने का आदेश दिया, यद्यपि उलेमाओं की सलाह पर आदेश वापस ले लिया गया।

सुधार कार्य

➣ सिकन्दर शाह ने भूमि के लिए एक प्रमाणिक पैमाना गज-ए-सिकन्दरी का प्रचलन करवाया, जो 30 इंच का था। जो मुगल काल में 1586 ई. तक जारी रही।

➣ उसने अनाज पर से चुंगी हटा दी और अन्य व्यापारिक कर हटा दिये, जिससे अनाज, कपड़ा एवं आवश्यकता की अन्य वस्तुएँ सस्ती हो गयीं।

➣ सिकन्दर लोदी ने खाद्यान्न पर से जकात कर हटा लिया तथा भूमि में गढ़े हुए खज़ाने से कोई हिस्सा नहीं लिया।

➣ सिकन्दर लोदी सल्तनत काल का एक मात्र सुल्तान हुआ, जिसमें खुम्स से कोई हिस्सा नहीं लिया।

➣ उसने निर्धनों के लिए मुफ़्त भोजन की व्यवस्था करायी। उसने आन्तरिक व्यापार कर को समाप्त कर दिया तथा गुप्तचर विभाग का पुनर्गठन किया।

➣ ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली सल्तनत में सिकन्दर की गुप्तचर व्यवस्था सबसे अच्छी थी। कहा जाता था कि उसके गुप्तचर भूतप्रेत थे।

➣ सिकन्दर लोदी द्वारा बदले जाने वाले वस्त्रों और बिस्तरों को बेचकर उससे प्राप्त धन से अनाथ लड़कियों को दहेज दिया जाता था।

साहित्य एंव विद्वान

➣ सिकन्दर शाह लोदी स्वयं भी शिक्षित और विद्वान था। उसके दरबार में अरब और ईरान सहित विभिन्न देशों के सुसंस्कृत विद्वान थे। विद्वानों को संरक्षण देने के कारण उसका दरबार विद्वानों का केन्द्र स्थल बन गया था।

➣ उसने मुस्लिम शिक्षा में सुधार के लिए ईरान के विद्वान शेख अब्दुल्लाशेख अजीजुल्ला को बुलाया। प्रसिद्ध ईरानी विद्वान रफीउद्दीन शीराजी भी सिकन्दर लोदी के दरबार में था।

➣ उसके आदेश पर वजीर मियां भुआ द्वारा संस्कृत के एक आयुर्वेद ग्रंथ का फ़ारसी में फरहंगे सिकन्दरी के नाम से अनुवाद हुआ। इसे तिब्बे सिकन्दरी भी कहा जाता है।

➣ फरहंगे सिकन्दरी का उपनाम गुलरुखी था। इसी उपनाम से वह कविताएँ लिखा करता था।

➣ सिकंदर लोदी, ललित कलाओं को अत्यधिक पसंद करता था, गायन व शहनाई में उसकी रुचि थी। उसके काल में संगीत से संबंधित एक ग्रंथ लज्जत-ए-सिकंदरशाही की रचना हुई थी।

➣ सिकन्दर ने 500 बंदियों को जैन हंस सुरी की प्रार्थना पर मुक्त किया एवं जैन मिक्षु जबुंजी को भूदान दिया था।

अन्य

❑ सिकन्दर शाह लोदी गुजरात के महमूद बेगड़ा और मेवाड़ के राणा सांगा का समकालीन था।
❑ सिकन्दर लोदी व्यक्तित्व की सुन्दरता बनाये रखने के लिए दाढ़ी नहीं रखता था।
मोठ के मस्जिद का निर्माण सिकन्दर लोदी के वजीर ने किया।
❑ स्थापत्य कला की दृष्टि से लोदी वंश के शासनकाल को मकबरों का युग माना जाता है ।
इनेगल’ पद्धति की शुरुआत लोदी वंश के शासनकाल में की गई थी ।

इब्राहिम लोदी (1517 ई.- 1526 ई.)

➣ सिकन्दर शाह लोदी की मृत्यु के पश्चात् अमीरों ने आपसी सहमति से उसके पुत्र इब्राहीम लोदी को 21 नवम्बर, 1517 को आगरा के सिंहासन पर बैठाया। यह लोदी वंश का वह अंतिम शासक था।

➣ कुछ अफगान सरदार ने गृहयुद्ध के खतरे से बचने के लिए उसके भाई जलाल ख़ाँ को जौनपुर का शासक नियुक्त किया। उसने कालपी में जलालुद्दीन की उपाधि के साथ अपना राज्याभिषेक करवाया था।

➣ इब्राहिम को यह बँटवारा उचित नहीं लगा और उसने खुद को एकमात्र सुल्तान घोषित किया और उत्तराधिकार के लिये संघर्ष में जलाल खाँ को कैदखाने में विष देकर हत्या करवा दी।

सैन्य अभियान

ग्वालियर अभियान (1518 ई.) विक्रमजीत/विक्रमादित्य
मेवाड़ अभियान (1517-18 )राणा सांगा
पानीपत का प्रथम युद्ध (1526 ई.)बाबर

सिंहासन पर बैठने के उपरान्त इब्राहीम लोदी ने अपने विश्वसनीय सेनापति आजम हुमायूं शेरवानी को ग्वालियर पर आक्रमण करने के लिए भेजा। उस समय ग्वालियर का शासक विक्रमजीत सिंह था।

आजम हुमायूं शेरवानी के आक्रमण के बाद विक्रमजीत सिंह ने इब्राहीम लोदी की अधीनता स्वीकार कर ली और उसकी सुजरेनी (प्रभुता) मान ली।

मेवाड़ के महान शासक राणा सांगा के विरुद्ध इब्राहीम लोदी का अभियान पूरी तरह असफल रहा। वर्ष 1517 ई. में खातोली के युद्ध में इब्राहीम लोदी और राणा सांगा की सेनाओं के बीच भयंकर संघर्ष हुआ। इस युद्ध में इब्राहीम लोदी बुरी तरह पराजित हुआ।

➣ पराजय का बदला लेने के उद्देश्य से एक वर्ष बाद (लगभग 1518 ई.) इब्राहीम लोदी ने एक विशाल और शक्तिशाली सेना तैयार की। वह पुनः राणा सांगा पर आक्रमण करने के लिए तैयार हुआ。

➣ लेकिन धौलपुर (Dholpur) के निकट राजपूत सेना (मुख्यतः राणा सांगा के नेतृत्व में) से उसकी दूसरी बार भी करारी हार हुई।

मेवाड़ और इब्राहीम लोदी के बीच इन युद्धों का प्रमुख कारण मालवा प्रांत पर नियंत्रण और प्रभुत्व स्थापित करने की होड़ थी। मालवा उस समय सामरिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र था।

राणा सांगा मालवा पर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते थे, जबकि इब्राहीम लोदी दिल्ली सल्तनत के विस्तार के लिए इसे अपने अधीन लाना चाहता था। इसी क्षेत्रीय प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा ने दोनों शक्तियों के बीच संघर्ष को जन्म दिया।

मेवाड़ एवं इब्राहीम लोदी के बीच युद्ध का मुख्य कारण मालवा पर अधिकार को लेकर था।

सरदारों का दमन एंव बाबर का आगमन

➣ इब्राहीम लोदी ने लोहानी, फारमूली एवं लोदी जातियों के शक्तिशाली सरदारों के विरुद्ध, जो राज्य के अधिकारी वर्ग थे, दमन की नीति चलाई।

➣ उसने अपने पिता के समय के विश्वस्त सरदारों पर अविश्वास कर या तो उन्हें पदच्युत कर कारागार में डाल दिया या फिर उनकी हत्या करवा दी।

➣ ऐसा माना जाता है कि इब्राहिम के इसी उदंड व्यवहार के कारण भारत पर बाबर के आक्रमण के समय सरदारों ने इब्राहिम का साथ छोड़ दिया, जिस कारण इब्राहिम लोदी की पराजय हुई।

➣ इब्राहीम के असंतुष्ट सरदारों में पंजाब का राज्यपाल दौलत ख़ाँ लोदी एवं इब्राहीम लोदी के चाचा आलम ख़ाँ ने काबुल के तैमूर वंशी शासक बाबर को भारत पर आक्रमण के लिए निमंत्रण किया।

पानीपत का प्रथम युद्ध (1526 ई.)

➣ इब्राहिम लोदी के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना पानीपत का प्रथम युद्ध थी।

21 अप्रैल, 1526 को पानीपत के मैदान में इब्राहीम लोदी और बाबर के मध्य हुए भयानक संघर्ष में लोदी की बुरी तरह हार हुई और उसकी हत्या कर दी गई।

➣ बाबर ने पानीपत में इब्राहीम का ईंटों का मकबरा बनाया था। बाबर ने इब्राहीम को अनपरखा सूरमा एवं कंजूस कहा था।

➣ ग्वालियर के शासक विक्रमजीत/विक्रमादित्य (मानसिंह का पुत्र) भी पानीपत युद्ध में इब्राहीम के साथ मारा गया था।

तारीख ए जहानी के लेखक नियामतउल्ला के अनुसार युद्ध मैदान में मरने वाला वह दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था। तारीख-ए-जहानी अफगानों का इतिहास है।

नआमतउल्ला (नियामतउल्ला) के अनुसार, सुल्तान इब्राहिम के अतिरिक्त भारत का अन्य कोई सुल्तान युद्ध स्थल में नहीं मारा गया। फरिश्ता के अनुसार, वह मृत्युपर्यंत लड़ा और एक सैनिक की भांति मारा गया।

➣ इब्राहीम की मृत्यु के साथ ही दिल्ली सल्तनत का 300 वर्षों का शासन समाप्त हो गया।

अन्य

➣ इब्राहीम लोदी ने अपने वजीर मियाँ भुवा को कारागार में डाल दिया। मियाँ भुवा सिकन्दर लोदी के समय में भी वजीर थे। इब्राहिम लोदी कहा करता था कि राजा का कोई सगा-सम्बन्धी नहीं होता।

➣ इब्राहीम के समय भूराजस्व दर ½ थी। वह दावा करता था कि जीवनयापन के लिए आवश्यक वस्तुएं उसके राज्यकाल में सबसे सस्ती थी।

➣ अफगानों की शासन व्यवस्था राजतन्त्रीय न होकर कुलीन तन्त्रीय था। राजत्व सिद्धान्त सरदारों की समानता पर आधारित था। योग्यता के आधार पर सरदारों के द्वारा सुल्तानों को चुने जाने के अधिकार को मानते थे।

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