मुग़ल वंश : एक परिचय
➣ मुग़ल वंश मध्यकालीन भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली साम्राज्य था। साथ ही यह भारत का अंतिम राजवंश भी जिसने भारत के इतने बड़े भू-भाग पर शासन किया।
➣ प्रो. कादरी ने मुग़ल साम्राज्य को एक कथन में समझाया है, उनके अनुसार
बाबर ने मुग़ल राज्य के भवन के लिए मैदान साफ़ किया,
हुमायूँ ने उसकी नीव डाली,
अकबर ने उस पर सुंदर भवन खड़ा किया,
जहाँगीर ने उसे सजाया−सँवारा,
शाहजहाँ ने उसमें निवास कर आंनद किया,
औरंगज़ेब ने उसे विध्वंस कर दिया।’
➣ मुग़ल शासकों में अकबर तथा औरंगजेब दोनों का कार्यकाल सबसे अधिक लगभग 49-50 वर्ष का था। अकबर ने जहाँ भारत में मुग़ल वंश की नींव मजबूत की, वहीँ औरंगजेब मुग़लों के पतन के लिए उत्तरदायी रहा।
➣ 11वीं सदी में मुस्लिम शासकों ने भारत में पाँव ज़माने शुरू कर दिए थे। जिसमे सबसे पहला वंश, ग़ुलाम वंश स्थापित हुआ तत्पश्चात आगे क्रमानुसार खिलजी वंश , तुगलक वंश, सैयद वंश एंव लोदी वंश का शासन हुआ। सम्मलित रूप से इनके शासनकाल को इतिहास में सल्तनत काल की संज्ञा दी गयी है।
➣ भारत के इतिहास में अब एक नया इतिहास आरम्भ होने को था जिसका सूत्रधार बाबर था।
| शासक (शासनकाल) | मुख्य पहचान | |||
|---|---|---|---|---|
| बाबर (1526–1530 ई.) | भारत में मुग़ल वंश का संस्थापक | |||
| हुमायूँ (1530–1540 एवं 1555–1556 ई.) | संघर्ष, निर्वासन एवं पुनर्स्थापना | |||
| अकबर (1556–1605 ई.) | मुग़ल साम्राज्य का सुदृढ़ीकरण एवं जज़िया समाप्ति | |||
| जहाँगीर (1605–1627 ई.) | चित्रकला का स्वर्ण युग एवं न्याय की जंजीर | |||
| शाहजहाँ (1628–1658 ई.) | मयूर सिंहासन एवं स्थापत्य कला का स्वर्ण युग | |||
| औरंगज़ेब (1658–1707 ई.) | साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार एवं जज़िया पुनः लागू | |||
| उत्तर मुग़ल शासक | ||||
| बहादुर शाह प्रथम (1707–1712 ई.) | उत्तराधिकार संघर्ष का विजेता | |||
| जहाँदार शाह (1712–1713 ई.) | लाल कुंवर का प्रभाव | |||
| फ़र्रुख़सियर (1713–1719 ई.) | सैयद बंधुओं का प्रभाव एवं 1717 का फ़रमान | |||
| रफ़ी-उद-दराजात (1719 ई.) | सैयद बंधुओं का कठपुतली सम्राट | |||
| रफ़ी-उद-दौला (शाहजहाँ द्वितीय) (1719 ई.) | अल्पकालीन कठपुतली सम्राट | |||
| मुहम्मद शाह (1719–1748 ई.) | नादिरशाह का आक्रमण एवं मुग़ल पतन | |||
| अहमद शाह बहादुर (1748–1754 ई.) | अयोग्य शासन एवं साम्राज्य का पतन | |||
| आलमगीर द्वितीय (1754–1759 ई.) | राजनीतिक अराजकता का दौर | |||
| शाह आलम द्वितीय (1759–1806 ई.) | बक्सर युद्ध एवं इलाहाबाद की संधि | |||
| अकबर द्वितीय (1806–1837 ई.) | राजा राममोहन राय का समकालीन | |||
| बहादुर शाह द्वितीय (ज़फ़र) (1837–1857 ई.) | 1857 की क्रांति एवं अंतिम मुग़ल सम्राट | |||
➣ मुगल शासक वास्तव में तुर्कों की चगताई नामक शाखा के थे। इस शाखा का नाम प्रसिद्ध मंगोल नेता चंगेज खां के द्वितीय पुत्र के नाम पर पड़ा था, जिसके अधिकार में मध्य एशिया तथा तुर्कों का देश तुर्किस्तान थे।
➣ कुषाण साम्राज्य के पतन के बाद पहली बार उत्तर भारत के साम्राज्य में काबुल और कन्धार सम्मिलित हुए थे। क्योंकि इन्हीं स्थानों से भारत पर आक्रमण होते रहे थे। उन पर अधिकार करके बाबर और उसके उत्तराधिकारियों ने भारत को लगभग 250 वर्षों के लिए विदेशी-आक्रमणों से मुक्त कर दिया।
➣ मुग़ल वंश ऐसा पहले व अंतिम विदेशी आक्रमणकारी थे जिन्होंने भारत में करीबन 331 वर्षो तक शासन किया।
➣ उत्तर मुग़ल शासकों के समय 1739 में फारस शासक नादिरशाह तथा अहमद शाह अब्दाली का विदेशी हमला हुआ। लेकिन इनका उद्देश्य केवल लूट था।
➣ आगे चलकर आलमगीर द्वितीय (दिल्ली) तथा शाहजहाँ तृतीय (बिहार) दो स्वतंत्र मुग़ल शासकों ने अलग-अलग स्थानों से एक साथ शासन किया था। इस दौरान मुग़ल दो शाखा में विभक्त हो गया था।
बाबर: भारत में मुग़ल वंश का संस्थापक
➣ बाबर का जन्म 14 फरवरी, 1483 को फरगना के शासक उमर शेख मिर्जा के घर हुआ था। उसकी माता का नाम कुतलुग निगारखानम था।
➣ बाबर पितृ पक्ष की ओर से तैमूर (तुर्क) का पांचवा वंशज था तथा मां की ओर से वह चंगेज खाँ (मंगोल) का 14वाँ वशंज था। अतः बाबर में तुर्कों और मंगोलों दोनों के रक्त का मिश्रण था।
➣ पिता की मृत्यु के बाद लगभग ग्यारह वर्ष की अल्पायु में जून, 1494 में वह फरगना के सिंहासन पर बैठा। फरगना की राजधानी अन्दीजान थी।
प्रारम्भिक संघर्ष
➣ उज़बेक खतरे से बेखबर होकर तैमूर राजकुमार आपस में लड़ रहे थे। बाबर ने भी अपने चाचा से समरकन्द छीनना चाहा। समरकन्द तैमूर की राजधानी थी अतः बाबर अपने पैतृक क्षेत्र को जीतना चाहता था।
➣ 1496 ई. में बाबर ने समरकन्द को जीतने का असफल प्रयास किया। 1501 ई. में बाबर ने समरकन्द को जीता लेकिन शीघ्र ही समरकन्द व फरगना दोनों बाबर के हाथ से निकल गये।
➣ दूसरी बार उज़बेक शासक शैबानी खान को समरकंद से बाबर को खड़ेदने के लिए आमंत्रित किया गया था। शैबानी खां ने 1501 ई. में सर-ए-पुल के युद्ध में बाबर को पराजित कर मध्य एशिया से खदेड़ दिया।
इस युद्ध में उजबेगों की युद्ध नीति तुलुगमा’ पद्धति का प्रयोग शैबानी खां ने बाबर के विरुद्ध किया था। आगे चलकर बाबर इन इस नीति का प्रयोग पानीपत के युद्ध में किया।
➣ उसने अपने पैतृक सिंहासन को प्राप्त करने के विचार को छोड़कर दक्षिण पूर्व (अर्थात् भारत) में अपना भाग्य आजमाने के लिए विवश कर दिया।
➣ विवश होकर बाबर को काबुल की ओर बढ़ना पड़ा और उसने 1504 में उस पर अधिकार कर लिया। इस समय वहां का शासक मोहम्मद मुकिम था। कुछ समय बाद बाबर ने गजनी को भी जीत लिया।
➣ काबुल विजय के उपलक्ष में 1506-1507 ई. में बाबर ने अपने पूर्वजों द्वारा धारण की गई उपाधि मिर्जा का त्याग कर नई उपाधि पादशाह धारण की, जिसे अब तक किसी तैमूर शासक ने धारण नहीं की थी ।
➣ 1507 ई. में बाबर ने कन्धार को जीत लिया, लेकिन शीघ्र ही उसके हाथ से निकल गया।
➣ उसके बाद 14 वर्ष तक वह इस अवसर की तलाश में रहा कि फिर उजवेकों को हरा कर वह अपनी मातृभूमि पर पुनः अधिकार कर सके और उसे एकबार फिर अवसर मिला।
➣ 1510 ई. की लड़ाई में ईरान के शाह इस्माइल ने शैबानी खां को हरा कर मार डाला। इसी समय वावर ने समरकंद जीतने का एक प्रयत्न और किया। इस बार उसने ईरानी सेना की सहायता ली।
➣ बाबर ने 1511 में समरकन्द के साथ बुखारा व खुरासान को जीता, किन्तु मई, 1512 ई. में कुल-ए-मलिक के युद्ध में उबेदुल्ला खाँ से पराजित होने पर समरकन्द बाबर के हाथों से पुनः निकल गया।
➣ तीसरी बार समरकन्द खोने के बाद बाबर ने समरकन्द जीतने का विचार अन्तिम रूप से छोड़ दिया और उसे काबुल लौटना पड़ा।
भारत की राजनितिक स्थिति
➣ बाबर के भारत आक्रमण (1526 ई.) के समय भारत राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत विखंडित एवं अव्यवस्थित था। कोई एक केंद्रीय शक्ति न होने के कारण विभिन्न क्षेत्रीय राज्य परस्पर संघर्षरत थे, जिसका लाभ बाबर ने कुशलतापूर्वक उठाया।
बाबर के आक्रमण के समय भारत की स्थिति काफी अस्थिर और कमजोर थी। 1517 में सिकन्दर लोदी की मृत्यु के बाद उसका पुत्र इब्राहीम लोदी दिल्ली की गद्दी पर बैठा।
इब्राहिम ने अमीरों को कठोरता से नियंत्रित करने की कोशिश की, जिससे अमीर नाराज़ हो गए। कई शक्तिशाली अमीरों (जैसे दौलत खाँ लोदी, आलम खाँ) ने इब्राहिम के विरुद्ध विद्रोह किया और बाबर को भारत आने का निमंत्रण दिया।
मेवाड़ में राणा सांगा (1508-1527) शासन कर रहे थे और उन्होंने मेवाड़ को अत्यंत शक्तिशाली बनाया था। वे कई राजपूत सरदारों को एकजुट करके एक बड़ी राजपूत संघ का नेतृत्व कर रहे थे।
बाबरनामा के अनुसार राणा सांगा ने भी बाबर को इब्राहीम लोदी के विरुद्ध संयुक्त कार्रवाई के लिए दूत भेजा था, हालांकि यह दावा विवादास्पद है और कई इतिहासकार इसे अस्वीकार करते हैं।
इस समग्र राजनीतिक विखंडन, सामंती कलह और उत्तरी भारत में केंद्रीय सत्ता की कमजोरी ने बाबर के लिए 1526 में पानीपत की लड़ाई में आसानी से विजय प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त किया।
उत्तर भारत की इस राजनीतिक विखंडन और कमजोरी के विपरीत दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य अपनी चरम शक्ति पर था।
कृष्ण देवराय (1509-1529) के नेतृत्व में दक्षिण भारत अपेक्षाकृत स्थिर और शक्तिशाली था, जो उत्तर की तुलना में केंद्रीय सत्ता और सैन्य संगठन में कहीं अधिक मजबूत स्थिति में था।
बाबर के आक्रमण के समय भारतीय राज्य
| राज्य | शासक | विशेष विवरण |
|---|---|---|
| विजयनगर | कृष्णदेवराय | दक्षिण भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक, जिनके काल को विजयनगर साम्राज्य का स्वर्णकाल माना जाता है। |
| दिल्ली | इब्राहीम लोदी | लोदी वंश का अंतिम सुल्तान, जो पानीपत के प्रथम युद्ध (1526 ई.) में बाबर से पराजित होकर मारा गया। |
| कश्मीर | मुहम्मद शाह | कश्मीर का स्वतंत्र शासक, जो बाबर के आक्रमण से अप्रभावित रहा क्योंकि कश्मीर भौगोलिक दृष्टि से दुर्गम था। |
| मालवा | महमूद शाह द्वितीय | मालवा का दुर्बल सुल्तान, जिसकी सत्ता पर वास्तविक नियंत्रण शक्तिशाली सरदार मेदिनी राय के हाथों में था। |
| गुजरात | बहादुर शाह | गुजरात का महत्वाकांक्षी एवं शक्तिशाली सुल्तान, जिसने बाद में हुमायूँ से संघर्ष किया। |
| बंगाल | नुसरत शाह | इब्राहीम लोदी का दामाद, जिसने घाघरा युद्ध (1529 ई.) में अफगानों का साथ दिया, किंतु बाबर से संधि कर ली। |
| मेवाड़ | राणा सांगा | उस समय के सर्वाधिक प्रतापी राजपूत शासक, जो खानवा के युद्ध (1527 ई.) में बाबर से पराजित हुए। |
| सिंध | शाहबेग अरगून | सिंध का स्वतंत्र अफगान शासक, जो उत्तर-पश्चिम में बाबर के साम्राज्य विस्तार से प्रभावित हुआ। |
बाबर का भारत आक्रमण
➣ बाबर ने भारत पर पाँच बार आक्रमण किया था। भारत पर आक्रमण के समय बाबर काबुल का शासक था।
| प्रथम आक्रमण (1519 ई.) | बाजौर एंव भेरा का किला (युसूफजाई जाति के विरुद्ध ) |
| दूसरा आक्रमण (1519-20 ई.) | पेशावर, |
| तीसरा आक्रमण (1520 ई. ) | स्यालकोट |
| चौथे आक्रमण (1524 ई. ) | लाहौर व दीपालपुर |
| पांचवा आक्रमण (1526 ई. ) | पानीपत का युद्ध। |
➣ बाबर का भारत के विरुद्व किया गया प्रथम अभियान 1519 ई. में युसूफजाई जाति के विरुद्ध था। इस अभियान में बाबर ने बाजौर और भीरा के शक्तिशाली क़िले को अपने अधिकार में किया।
➣ इस प्रथम भारतीय अभियान में (भेरा के किले को जीतने के लिए) बाबर ने पहली बार तोपखाने का प्रयोग किया था।
➣ कालांतर में दौलत खाँ ने भीरा से उसके प्रतिनिधियों को निकाल बाहर किया। लेकिन 1520-21 में बाबर ने एक बार फिर सिंधु नदी पार की और आसानी से भीरा पर कब्ज़ा कर लिया।
➣ साथ ही स्यालकोट एवं सैय्यदपुर को भी अपने अधिकार में कर लिया।
➣ आगे चलकर अपने चौथे अभियान 1524 ई. में बाबर ने लाहौर एवं दीपालपुर पर भी अधिकार कर लिया।
➣ बाबर के चौथी बार भारत अभियान के दौरान दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी तथा पंजाब गवर्नर दौलत खां के मध्य कटु संबंध हो गए थे।
➣ दौलत खां ने अपने पुत्र दिलावर खां को बाबर के पास इस संदेश के साथ भेजा कि वह सुल्तान इब्राहिम लोदी को दिल्ली के सिंहासन से अपदस्थ कर उसके स्थान पर उसके चाचा आलम खां को पदस्थ करने में सहायता करे।
➣ बाबर की आत्मकथा में राणा सांगा का जिक्र मिलता है जिसमे कहा गया है कि सांगा ने बाबर के पास दूत भेजा था तथा इब्राहीम लोदी के विरुद्ध आक्रमण करने का निमत्रण दिया था।
➣ इस प्रकार बाबर के लिए यह स्वर्णिम अवसर था, क्योंकि उसे मेवाड़ के राजा राणा सांगा का भी निमंत्रण प्राप्त हो चुका था। अतः बाबर को यह विश्वास हो गया कि भारत विजय का अवसर आ गया है।
➣ भारतीय शासकों को विश्वास था कि दिल्ली को रौंद कर लोदियों की शक्ति को क्षीण करके बाबर भी तैमूर की भाँति लौट जायेगा। लेकिन बाबर के भारत में ही रुकने के निर्णय ने परिस्थितियों को पूरी तरह बदल दिया।
➣ 1525 में जब बाबर पेशावर में था, उसे खबर मिली कि दौलत खाँ लोदी ने फिर से अपना पलड़ा बदल लिया है। वह बाबर की सेनाओं को स्यालकोट से खदेड़ने के बाद लाहौर की ओर बढ़ रहा था।
➣ बाबर से सामना होने पर दौलतखाँ लोदी की सेना बिखर गई। दौलतखाँ ने आत्मसमर्पण कर दिया और बाबर ने उसे माफ़ी दे दी। इस प्रकार पंजाब पर भी बाबर का अधिकार हो गया।
पानीपत की पहली लड़ाई (1526)
➣ 21 अप्रैल 1526 में पानीपत , हरियाणा में बाबर और इब्राहीम लोदी का आमना सामना हुआ। युद्ध में इब्राहीम लोदी बुरी तरह से परास्त हुआ और मारा गया।
➣ इब्राहीम लोदी ने एक लाख सैनिकों और एक हजार हाथियों को लेकर बाबर का सामना किया जबकि बाबरनामा में उल्लेख किया गया है कि बाबर के साथ 12000 हज़ार सैनिक थे।
➣ इस युद्ध में बाबर ने पहली बार प्रसिद्ध तुलगमा युद्ध नीति का प्रयोग किया। बाबर ने तुलगमा युद्ध पद्धति उजबेकों से ग्रहण की थी।
➣ इसी युद्ध में बाबर ने तोपों को सजाने में उस्मानी विधि (रूमी विधि) का भी प्रयोग किया था। इस पद्धति में दो गाड़ियों के बीच व्यवस्थित जगह छोड़कर तोप को रखकर चलाया जाता था।
➣ बाबर कहता है कि इसका प्रयोग सबसे पहले उसने भीरा के किले पर आक्रमण के समय किया था। ऐसा अनुमान है कि बारूद से भारतीयों का परिचय तो था, लेकिन प्रयोग बाबर के आक्रमण के साथ ही आरम्भ हुआ।
➣ पानीपत के युद्ध में ग्वालियर का शासक विक्रमजीत भी इब्राहीम लोदी के पक्ष में युद्ध करता हुआ मारा गया।
➣ पानीपत के ही युद्ध में बाबर ने अपने प्रसिद्ध निशानेबाज़ उस्ताद अली और मुस्तफा की सहायता ली।
➣ भारतीय इतिहास में इस युद्ध की निर्णायक युद्धों में गिना जाता है। जिसने भारत में सल्तनत युग को समाप्त कर नए वंश, मुग़ल वंश की नींव स्थापित की।
➣ युद्ध के पश्चात् बाबर का दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार हो गया। तत्पश्चात धीरे-धीरे लोदी साम्राज्य के समस्त भागों पर भी बाबर ने अधिकार कर लिया।
➣ इसी समय आगरा में हुमायूँ ने विक्रमजीत के परिवार से प्राप्त कोहिनूर हीरा बाबर को दिया, जिसे बाबर ने वापस हुमायूँ को दे दिया।
➣ इब्राहीम लोदी द्वारा आगरा में एकत्र खजाने से बाबर की आर्थिक कठिनाईयाँ भी दूर हो गईं। पानीपत विजय के बाद बाबर ने कहा था- काबुल की ग़रीबी अब फिर हमारे लिए नहीं और भारत में रहने की अपनी इच्छा जाहिर कर दी।
➣ जौनपुर तक का समृद्ध क्षेत्र भी बावर के सामने खुला था। लेकिन इससे पहले कि बाबर इस क्षेत्र पर अपना अधिकार सुदृढ़ कर सके उसे दो कड़ी लड़ाईयाँ लड़नी पड़ी-एक मेवाड़ के विरुद्ध और दूसरी पूर्वी अफग्रानों के विरुद्ध।
भारत विजय के उपलक्ष्य में बाबर ने प्रत्येक क़ाबुल निवासी को एक-एक चाँदी का सिक्का उपहार स्वरूप प्रदान किया था। अपनी इसी उदारता के कारण उसे कलन्दर की उपाधि दी गई थी।
खानवा का युद्ध (1527 ई.)
➣ खानवा का युद्ध 17 मार्च, 1527 ई. को आगरा से लगभग 40 किमी दूर खानवा (भरतपुर के निकट रूपवास) में बाबर और राणा सांगा के बीच लड़ा गया।
➣ उत्तरी भारत में दिल्ली के सुल्तान के बाद सबसे शक्तिशाली शासक चित्तौड़ के राजपूत नरेश राणा साँगा (संग्राम सिंह) थे।
➣ बाबरनामा के अनुसार, प्रथम पानीपत युद्ध से पूर्व बाबर और राणा सांगा के बीच हुए समझौते के तहत इब्राहिम लोदी के विरुद्ध राणा सांगा को बाबर के अभियान में सहयोग करना था, किन्तु बाद में उन्होंने ऐसा नहीं किया।
➣ अन्य स्रोतों के अनुसार, खानवा के युद्ध का मुख्य कारण प्रथम पानीपत युद्ध की विजय के बाद बाबर का भारत में स्थायी रूप से रहने का निर्णय था, जिसके कारण राणा सांगा से संघर्ष अपरिहार्य हो गया।
➣ इस युद्ध में राणा सांगा का साथ मारवाड़ (राव गंगा), आमेर, ग्वालियर, अजमेर, हसन खाँ मेवाती, मेदिनी राय (चंदेरी) तथा इब्राहिम लोदी के भाई महमूद लोदी ने दिया। लगभग सभी प्रमुख राजपूत रियासतों ने राणा की सहायता के लिए अपनी-अपनी सेनाएँ भेजीं।
➣ इससे चिंतित होकर बाबर ने मंगोल सरदार तेयी बेग को संधि-प्रस्ताव लेकर राणा सांगा के पास भेजा। राणा ने केवल एक शर्त पर संधि की बात स्वीकार की कि बाबर काबुल लौट जाए, जिसे बाबर ने अस्वीकार कर दिया।
➣ प्रारम्भ में राणा सांगा की प्रतिष्ठा तथा बयाना जैसी बाहरी मुगल छावनियों पर उनकी प्रारम्भिक सफलताओं से बाबर की सेना का मनोबल गिर गया। सैनिकों में उत्साह भरने के लिए बाबर ने राणा सांगा के विरुद्ध जिहाद का नारा दिया।
➣ युद्ध से पूर्व बाबर ने स्वयं को कट्टर मुसलमान सिद्ध करने के लिए शराब के पात्र उलट दिए तथा सुराहियाँ तुड़वा दीं।
➣ उसने अपने राज्य में शराब के क्रय-विक्रय पर प्रतिबंध लगा दिया तथा मुसलमानों से तमगा कर (व्यापारिक कर) न लेने की घोषणा की।
➣ बाबर के अनुसार, राणा सांगा की सेना में दो लाख से अधिक सैनिक थे, जबकि बाबर की सेना अपेक्षाकृत छोटी थी। फिर भी उसकी युद्ध-नीति ने उसे निर्णायक बढ़त दिलाई।
➣ युद्ध के दौरान सिलहदी तंवर अपने लगभग 35,000 घुड़सवारों सहित बाबर की ओर जा मिला, जिससे राणा सांगा की स्थिति कमजोर हो गई।
➣ युद्ध के दौरान राणा सांगा गंभीर रूप से घायल हो गए। हसन खाँ मेवाती तथा अन्य राजपूत सरदार उन्हें सुरक्षित शिविर में ले गए।
➣ राणा अज्जाजी ने महाराणा साँगा की पहचान छिपाने के लिए उनका मुकुट धारण कर लिया और युद्ध का नेतृत्व जारी रखा।
➣ इस युद्ध में राणा सांगा को पीछे हटना पड़ा। यद्यपि वे जीवित बच निकले और पुनः संघर्ष की तैयारी करने लगे, किन्तु यह युद्ध बाबर की निर्णायक विजय सिद्ध हुआ।
➣ इसी बीच सूचना मिली कि बाबर की सेना 20 जनवरी, 1528 ई. को चंदेरी पहुँच गई। राणा सांगा ने वहाँ की ओर प्रस्थान किया।
➣ राणा की सेना ने पहला पड़ाव इरिच में डाला। कहा जाता है कि वहीं रात्रि-भोज के दौरान किसी ने राणा सांगा को विष दे दिया, जिससे 30 जनवरी, 1528 ई. को लगभग 46 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
➣ राणा सांगा की मृत्यु के साथ ही आगरा तक विस्तृत संयुक्त राजस्थान का स्वप्न लगभग समाप्त हो गया। खानवा की विजय से दिल्ली-आगरा क्षेत्र में बाबर की स्थिति अत्यंत सुदृढ़ हो गई।
➣ खानवा के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद बाबर ने ग़ाज़ी की उपाधि धारण की।
➣ खानवा के युद्ध में बाबर की विजय के प्रमुख कारण तुलुगमा पद्धति, सशक्त तोपखाना तथा सिलहदी तंवर का पक्ष परिवर्तन थे।
बाबर ने राजपूतों के बारे में लिखा है— वे मरना-मारना तो जानते हैं, किंतु युद्ध करना नहीं जानते।
चंदेरी का युद्ध (1528 ई.)
➣ खानवा के युद्ध (1527 ई.) में राजपूत शक्ति को निर्णायक रूप से पराजित करने के पश्चात बाबर ने मध्य भारत की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया।
➣29 जनवरी, 1528 ई. को बाबर ने मध्य भारत के महत्वपूर्ण दुर्ग चंदेरी के शासक राजा मेदिनी राय को एक निर्णायक युद्ध में परास्त किया।
➣ चंदेरी युद्ध में भी बाबर ने अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाने तथा युद्ध को धार्मिक स्वरूप प्रदान करने के उद्देश्य से जिहाद (धर्मयुद्ध) का नारा दिया, जैसा कि उसने इससे पूर्व खानवा के युद्ध में भी किया था।
➣ युद्ध में पराजित होने के पश्चात राजा मेदिनी राय ने परिस्थितियों को देखते हुए बाबर से संधि कर उसकी अधीनता स्वीकार कर ली, जिससे चंदेरी क्षेत्र पर मुगल प्रभुत्व स्थापित हो गया।
➣ राजा मेदिनी राय मध्य भारत की राजनीति में अत्यंत प्रभावशाली एवं निर्णायक व्यक्तित्व थे। मालवा की राजनीति में उनका इतना गहरा एवं व्यापक हस्तक्षेप था कि उन्हें मालवा के “राजाओं का निर्माता” कहा जाता था, अर्थात वे ही मालवा में शासकों के उत्थान एवं पतन में निर्णायक भूमिका निभाते थे।
➣ खानवा के युद्ध (1527 ई.) तथा चंदेरी के युद्ध (1528 ई.) के पश्चात उत्तर एवं मध्य भारत में राजपूत शक्ति पूरी तरह से क्षीण हो गई।
➣ अब बाबर ने उत्तर-भारत के एक बड़े भाग पर अपना अधिकार सुदृढ़ कर लिया था। इस प्रकार बाबर के समक्ष अब केवल अफगान शक्ति ही एकमात्र प्रमुख चुनौती शेष बची थी, जिससे निपटने के लिए आगे चलकर घाघरा का युद्ध (1529 ई.) हुआ।
घाघरा का युद्ध (1529 ई.)
➣ चंदेरी विजय के पश्चात बाबर के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती अफगान शक्ति थी। अफगान सरदारों को बंगाल के शक्तिशाली सुल्तान नुसरत शाह (जो इब्राहीम लोदी का दामाद था) का समर्थन प्राप्त था।
➣ अफगानों के आमंत्रण पर नुसरत शाह बिहार पहुँचा, जहाँ अफगान सरदारों ने उसे अपना सुल्तान स्वीकार कर उसके नेतृत्व में एकजुट हो गए, जिससे बाबर के विरुद्ध एक शक्तिशाली संयुक्त मोर्चा बन गया।
➣ 6 मई, 1529 ई. को बाबर ने वाराणसी के निकट गंगा नदी पार करके घाघरा नदी के तट पर बंगाल (नुसरत शाह) एवं बिहार (इब्राहीम लोदी के भाई महमूद लोदी) की संयुक्त सेना के विरुद्ध युद्ध किया।
➣ बाबर की कुशल सैन्य रणनीति के समक्ष संयुक्त सेना टिक न सकी उसने अफगान एवं बंगाली सेनाओं को पीछे हटने पर विवश कर दिया, परंतु वह इस युद्ध में कोई पूर्णतः निर्णायक एवं अंतिम विजय प्राप्त नहीं कर सका, क्योंकि अफगान शक्ति पूरी तरह नष्ट नहीं हुई थी।
➣ बाबर ने कूटनीतिक दूरदर्शिता का परिचय देते हुए बंगाल के शासक नुसरत शाह से संधि कर ली तथा उसके साम्राज्य की स्वायत्तता एवं संप्रभुता को मान्यता दे दी। इसके पश्चात बाबर आगरा वापस लौट गया।
➣ इस महत्वपूर्ण युद्ध के पश्चात बाबर का भारत पर स्थायी एवं सुदृढ़ अधिकार स्थापित हो गया। उसके विशाल साम्राज्य की सीमाएँ पश्चिम में सिन्धु नदी से लेकर पूर्व में बिहार तक तथा उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में ग्वालियर तक फैल गईं, जो मुगल साम्राज्य की नींव के रूप में ऐतिहासिक महत्व रखती हैं।
➣ घाघरा का युद्ध मध्यकालीन भारतीय इतिहास में इसलिए भी विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह मध्यकाल का प्रथम युद्ध था जो एक साथ जल (नदी में नौका-युद्ध) एवं थल दोनों मोर्चों पर एक साथ लड़ा गया।
➣ इस युद्ध की एक अन्य ऐतिहासिक विशेषता यह भी है कि इसमें भविष्य के महान शासक एवं सूर साम्राज्य के संस्थापक शेरशाह सूरी ने भी अफगान पक्ष की ओर से भाग लिया था, जो उस समय अभी तक एक उभरता हुआ सरदार मात्र था।
मृत्यु
➣ भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखने वाले महान योद्धा एवं शासक बाबर की मात्र 48 वर्ष की अल्पायु में 26 दिसम्बर, 1530 ई. को आगरा में मृत्यु हो गई।
➣ प्रारंभ में बाबर के पार्थिव शव को आगरा के “नूर अफगान” (जिसे आधुनिक काल में आरामबाग कहा जाता है) में दफनाया गया।
➣ किंतु बाबर की अंतिम इच्छा के अनुसार, कालांतर में उनके शव को काबुल में उनके द्वारा स्वयं चुने गए स्थान पर उनकी पत्नी बीबी मुबारक युसुफजई ने पूर्ण सम्मान के साथ दफनाया, जहाँ आज भी बाबर का मकबरा स्थित है।
➣ बाबर की मृत्यु के संदर्भ में एक रोचक एवं विवादास्पद विवरण बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “हुमायूँनामा” में दिया है।
➣ उनके अनुसार बाबर की मृत्यु एक गहरे षड्यंत्र का परिणाम थी, जिसमें पराजित शासक इब्राहीम लोदी की माँ ने प्रतिशोधवश बाबर को विष देकर मारा था, हालाँकि यह विवरण ऐतिहासिक रूप से पूर्णतः प्रमाणित नहीं है।
➣ बाबर ने अपने सैन्य अभियानों के दौरान भारत में राजपूत शक्ति को खानवा (1527 ई.) तथा चंदेरी (1528 ई.) के युद्धों में निर्णायक रूप से पराजित कर समाप्त कर दिया था।
➣ किंतु अफगान शत्रुओं को वह पूर्णतः समाप्त नहीं कर सका, और इससे पहले कि वह इस कार्य को पूर्ण करता, उसकी असामयिक मृत्यु हो गई।
➣ बाबर की मृत्यु के पश्चात उसके पुत्र हुमायूँ के दुर्बल शासनकाल में अफगान शक्ति ने पुनः सिर उठाया।
➣ कालांतर में महत्वाकांक्षी अफगान सरदार शेरशाह सूरी ने अपनी असाधारण सैन्य एवं कूटनीतिक प्रतिभा का परिचय देते हुए हुमायूँ को पराजित कर दिल्ली का सिंहासन छीन लिया तथा द्वितीय अफगान साम्राज्य (सूर साम्राज्य) की स्थापना की।
➣ उल्लेखनीय है कि भारत में प्रथम अफगान साम्राज्य की नींव बहलोल लोदी ने रखी थी, जिसने लोदी वंश की स्थापना की थी।
साहित्यिक रचनाएँ
➣ बाबर केवल एक महान योद्धा एवं कुशल शासक ही नहीं था, अपितु वह तुर्की भाषा का उच्चकोटि का विद्वान् एवं साहित्यकार भी था।
➣ उसने तुर्की भाषा में अपनी विश्वप्रसिद्ध आत्मकथा बाबरनामा (तुजुके बाबरी) की रचना की, जो मध्यकालीन भारतीय इतिहास का एक अमूल्य स्रोत मानी जाती है।
➣ तुजुके बाबरी का कालांतर में कुल चार बार फारसी भाषा में अनुवाद किया गया। प्रथम दो अनुवाद हुमायूँ के शासनकाल में क्रमशः पायन्दा खाँ एवं जैन खाँ द्वारा किए गए। तीसरा अनुवाद अकबर के काल में प्रसिद्ध विद्वान अब्दुल रहीम खानखाना ने फारसी में किया।
➣ मुगलकाल में तुजुके बाबरी का चौथा एवं अंतिम फारसी अनुवाद शाहजहाँ के शासनकाल में मीर अबु तालिब तुरबाती द्वारा किया गया।
➣ प्रसिद्ध इतिहासकार एलफिन्स्टन ने तुजुके बाबरी की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा है कि तुजुके बाबरी एशिया में पाए जाने वाले वास्तविक इतिहास का एकमात्र ग्रंथ है, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है।
➣ बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में भारत के तीन अभिशापों का विशेष उल्लेख किया है — गर्मी, धूल और लू, जो उसे भारतीय जलवायु में सबसे अधिक कष्टकारी प्रतीत हुए।
➣ इसी ग्रंथ में बाबर ने भारत की तीन प्रकार की जलवायु का भी विवरण दिया है। भारतीय उपज एवं जीव-जंतुओं का वर्णन करते हुए उसने फलों में आम को सर्वोत्तम तथा पशुओं में हाथी को सर्वश्रेष्ठ बताया है।
➣ बाबर ने भारत में दो मनोरंजक खेलों को प्रचलित किया — गनजिफा (ताश का खेल) एवं ईश्कवाजी (कबूतरों का खेल), जो कालांतर में मुगल दरबार में अत्यंत लोकप्रिय हो गए।
➣ बाबर ने एक नवीन एवं अभिनव शैली में रिसाल-ए-उसज नामक ग्रंथ की रचना की, जिसे उनकी अपनी विशिष्ट लिपि के कारण खत-ए-बाबरी भी कहा जाता है। यह उनकी साहित्यिक मौलिकता का प्रमाण है।
➣ फारसी साहित्य में बाबर को मुबाइयान नामक विशेष पद्य-शैली का जन्मदाता माना जाता है। उल्लेखनीय है कि मुबाइयान मूलतः मुस्लिम कानून की एक पुस्तक है। इसके अतिरिक्त बाबर ने फारसी में भी उत्कृष्ट कविताओं की रचना की, जो उनकी बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाती हैं।
➣ बाबर आध्यात्मिक दृष्टि से नक्शबन्दी सिलसिले के महान सूफी संत ख्वाजा उबैदुल्ला अहरार का शिष्य था। गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हुए बाबर ने ख्वाजा उबैदुल्ला द्वारा रचित पुस्तक रिसाला-ए-वालिदिया का तुर्की पद्य में रूपांतरण किया, जो उनकी साहित्यिक सेवा का एक और उदाहरण है।
संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य
➣ पानीपत के प्रथम युद्ध के प्रत्यक्षदर्शी प्रसिद्ध सिख गुरु गुरुनानक देव जी थे, जिन्होंने इस युद्ध की विभीषिका एवं उससे उत्पन्न पीड़ा का मार्मिक वर्णन अपनी वाणी में किया है।
➣ बाबर ने सड़कों एवं दूरियों की माप को सुनिश्चित एवं मानकीकृत करने के उद्देश्य से गज़-ए-बाबरी नामक मापक इकाई का प्रयोग प्रारंभ किया, जो मुगलकालीन निर्माण एवं प्रशासनिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।
➣ बाबर ने भूमि-व्यवस्था में वजहदारी नामक एक नई एवं महत्वपूर्ण प्रथा की शुरुआत की। इस व्यवस्था में वजह उस जागीर को कहा जाता था जो मुगल सरदारों को उनके नकद वेतन के बदले में प्रदान की जाती थी, जो आगे चलकर मुगल जागीरदारी व्यवस्था का आधार बनी।
➣ बाबर को बाग-बगीचे लगाने का अत्यधिक शौक था। उसने आगरा में ज्यामितीय विधि (चारबाग शैली) से एक भव्य बाग लगवाया, जिसे “नूर-ए-अफगान” कहा जाता था। यही बाग आधुनिक काल में “आरामबाग” के नाम से जाना जाता है।
बाबर ने भारत में चारबाग शैली के बागों की परंपरा का सूत्रपात किया।
➣ बाबर ने भारत में शासन-परंपरा में एक क्रांतिकारी परिवर्तन करते हुए सुल्तान की परंपरागत उपाधि को त्यागकर स्वयं को बादशाह घोषित किया।
इससे पूर्व दिल्ली के सभी सुल्तान अपनी उपाधि सुल्तान ही रखते थे।
इसके साथ ही बाबर ने खलीफा की सर्वोच्चता एवं आधिपत्य को भी स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जो उसकी स्वतंत्र एवं निर्भीक राजनीतिक सोच का प्रमाण था।➣ बाबर के भारत आगमन के पश्चात प्राचीन कुषाण साम्राज्य के पतन के बाद पहली बार काबुल एवं कंधार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र पुनः उत्तरी भारत के साम्राज्य में सम्मिलित हुए, जिससे मुगल साम्राज्य की उत्तर-पश्चिमी सीमाएँ अत्यंत सुदृढ़ हो गईं।
➣ प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. एस. आर. शर्मा ने बाबर की तुलना इंग्लैण्ड के ट्यूडर वंश के शासक हेनरी सप्तम (Henry VII) से की है, क्योंकि दोनों ने ही अपने-अपने देश में एक नए राजवंश की नींव रखी तथा केंद्रीय सत्ता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣ मुगल बादशाह बाबर के प्रमुख सेनानायक मीर बाकी ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया था, जो आगे चलकर भारतीय इतिहास की एक अत्यंत विवादास्पद एवं संवेदनशील घटना का केंद्र बनी।
➣ बाबर के चार पुत्र थे — हुमायूँ, कामरान, असकरी एवं हिंदाल तथा एक पुत्री गुलबदन बेगम थी। इनमें हुमायूँ सबसे बड़ा पुत्र था, जो बाबर के पश्चात मुगल साम्राज्य का उत्तराधिकारी बना।
➣ बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम ने अपनी प्रसिद्ध रचना “हुमायूँनामा” में बाबर एवं हुमायूँ के शासनकाल का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किया। उल्लेखनीय है कि यह रचना उन्होंने अकबर के विशेष आदेश पर अपनी स्मृति के आधार पर लिखी थी। इस ग्रंथ में हुमायूँ एवं कामरान के मध्य हुए भ्रातृ-संघर्ष का भी मार्मिक वर्णन किया गया है।
➣ प्रसिद्ध इतिहासकार लेनपूल के अनुसार बाबर “भाग्यशाली सैनिक” था न कि एक दूरदर्शी साम्राज्य निर्माता, क्योंकि उसके जीवनकाल में ही मुगल सत्ता की नींव अत्यंत अस्थिर थी तथा साम्राज्य का वास्तविक सुदृढ़ीकरण उसके पौत्र अकबर के काल में हुआ।
बाबर से सम्बन्धित प्रमुख घटनाएँ
| वर्ष | प्रमुख घटना |
|---|---|
| 1494 ई. | पिता उमर शेख मिर्ज़ा की मृत्यु के बाद लगभग 11 वर्ष की आयु में बाबर फ़रगना के सिंहासन पर बैठा। फ़रगना की राजधानी अंदीजान थी। |
| 1496 ई. | बाबर ने पहली बार समरकन्द पर अधिकार करने का प्रयास किया, किन्तु असफल रहा। |
| 1497–1498 ई. | बाबर ने पहली बार समरकन्द पर अधिकार किया, किन्तु शीघ्र ही समरकन्द तथा फ़रगना दोनों उसके हाथ से निकल गए। |
| 1501 ई. | सर-ए-पुल के युद्ध में उज़बेक शासक मुहम्मद शैबानी ख़ाँ ने बाबर को पराजित किया, जिससे मध्य एशिया में उसकी स्थिति अत्यंत कमजोर हो गई। |
| 1504 ई. | बाबर ने काबुल पर अधिकार कर लिया। उस समय वहाँ का शासक मुहम्मद मुकीम अर्गून था। इसके बाद उसने गज़नी पर भी अधिकार स्थापित कर लिया। |
| 1511 ई. | ईरान के शाह इस्माइल सफ़वी की सहायता से बाबर ने पुनः समरकन्द, बुखारा तथा खुरासान पर अधिकार किया। |
| 1512 ई. | कुल-ए-मलिक के युद्ध में उबेदुल्ला ख़ाँ से पराजित होने के बाद बाबर ने समरकन्द सदा के लिए खो दिया और उसका ध्यान भारत की ओर केन्द्रित हो गया। |
| 1519 ई. | भारत पर बाबर का प्रथम आक्रमण। उसने बाजौर तथा भेरा पर अधिकार किया। |
| 1520–1524 ई. | बाबर ने भारत पर कई आक्रमण किए तथा पंजाब में अपनी स्थिति मजबूत की। |
| 1524 ई. | दौलत ख़ाँ लोदी तथा आलम ख़ाँ लोदी के निमंत्रण पर बाबर पुनः भारत आया और लाहौर पर अधिकार कर लिया। |
| 1525 ई. | 17 नवम्बर 1525 को बाबर ने भारत विजय के लिए काबुल से अंतिम अभियान प्रारम्भ किया। |
| 1526 ई. | 21 अप्रैल को प्रथम पानीपत का युद्ध हुआ, जिसमें बाबर ने इब्राहिम लोदी को पराजित कर भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना की। इसके बाद उसने दिल्ली एवं आगरा पर अधिकार कर लिया। |
| 1527 ई. | 17 मार्च को खानवा का युद्ध हुआ, जिसमें बाबर ने राणा सांगा को पराजित किया। इस विजय के बाद उसने ‘गाज़ी’ की उपाधि धारण की तथा भारत में अपनी स्थिति को सुदृढ़ किया। |
| 1528 ई. | 29 जनवरी को चंदेरी का युद्ध हुआ, जिसमें बाबर ने मेदिनी राय को पराजित कर चंदेरी पर अधिकार कर लिया। |
| 1528 ई. | अयोध्या में बाबर के सेनापति मीर बाकी द्वारा बाबरी मस्जिद के निर्माण का उल्लेख कुछ ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है। |
| 1529 ई. | 6 मई को घाघरा का युद्ध हुआ, जिसमें बाबर ने अफगानों तथा बंगाल के शासक नुसरत शाह की संयुक्त शक्ति को पराजित किया। इसके साथ ही उत्तर भारत में मुगल सत्ता और अधिक सुदृढ़ हो गई। |
| 1529 ई. | बाबर ने आगरा में आराम बाग (आरामबाग) का निर्माण कराया, जिसे भारत का प्रथम मुगल उद्यान माना जाता है। |
| 1530 ई. | 26 दिसम्बर को आगरा में बाबर की मृत्यु हो गई। प्रारम्भ में उसे आगरा के आराम बाग में दफनाया गया, बाद में उसकी इच्छा के अनुसार उसके पार्थिव शरीर को काबुल ले जाकर दफनाया गया। |
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