क्रिप्स मिशन (1942) : परिचय
➣ क्रिप्स मिशन ब्रिटिश सरकार द्वारा मार्च 1942 में भारत भेजा गया एक उच्चस्तरीय संवैधानिक मिशन था। इसका नेतृत्व ब्रिटिश युद्ध मंत्रिमंडल के सदस्य सर स्टैफर्ड क्रिप्स ने किया।
➣ उस समय क्रिप्स लॉर्ड प्रिवी सील तथा हाउस ऑफ कॉमन्स के नेता थे। वे लेबर पार्टी के वामपंथी नेता थे और कांग्रेस, विशेषकर जवाहरलाल नेहरू, के प्रति सहानुभूति रखने वाले माने जाते थे।
➣ इस मिशन का उद्देश्य द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय नेताओं का सहयोग प्राप्त करना तथा भारत की भावी संवैधानिक व्यवस्था के संबंध में एक स्वीकार्य समाधान प्रस्तुत करना था।
➣ क्रिप्स मिशन के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने प्रस्ताव रखा कि युद्ध समाप्त होने के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस प्रदान किया जाएगा तथा भारतीय प्रतिनिधियों द्वारा एक संविधान सभा (संविधान-निर्मात्री निकाय) का गठन कर नया संविधान तैयार किया जाएगा।
➣ ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने मिशन की घोषणा 11 मार्च 1942 को हाउस ऑफ कॉमन्स में की। उन्होंने कहा कि प्रस्तावों की शर्तें ठीक उसी समय सार्वजनिक करने से लाभ की बजाय हानि हो सकती है, इसलिए एक कैबिनेट सदस्य को भारत भेजकर भारतीय नेताओं से सीधी बातचीत कराई जाएगी।
➣ ब्रिटिश सरकार ने अपने निष्कर्षों को भारत की समस्या का न्यायोचित एवं अंतिम समाधान बताया था। इन प्रस्तावों का औपचारिक नाम प्रारूप घोषणा (Draft Declaration) था, जो 30 मार्च 1942 को प्रकाशित हुई।
➣ यद्यपि क्रिप्स मिशन ने भारतीयों को पहले की अपेक्षा अधिक संवैधानिक आश्वासन दिए, फिर भी अगस्त प्रस्ताव (1940) की भांति इसके प्रस्तावों को भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग-दोनों ने अस्वीकार कर दिया। परिणामस्वरूप मिशन असफल रहा और इसके कुछ ही महीनों बाद भारत छोड़ो आंदोलन (1942) का आरम्भ हुआ।
ध्यान दें: 1942 तक भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन दो प्रमुख धाराओं में विकसित हो चुका था। एक ओर महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसक एवं संवैधानिक जनआंदोलन चल रहा था, वहीं दूसरी ओर विदेशों में भारतीय क्रांतिकारी जापान के सहयोग से सशस्त्र संघर्ष की दिशा में प्रयास कर रहे थे। बाद में 1943 में सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में आज़ाद हिन्द फ़ौज इस सशस्त्र संघर्ष का प्रमुख केंद्र बनी।
क्रिप्स मिशन की पृष्ठभूमि
➣ अगस्त प्रस्ताव (1940) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग-दोनों का समर्थन प्राप्त करने में असफल रहा। इसके परिणामस्वरूप भारत की संवैधानिक समस्या का समाधान नहीं हो सका तथा ब्रिटिश सरकार और भारतीय नेताओं के बीच राजनीतिक गतिरोध बना रहा।
➣ इसी बीच महात्मा गांधी के नेतृत्व में व्यक्तिगत सत्याग्रह (अक्टूबर 1940 से) प्रारम्भ हुआ, यह बड़े जनआंदोलन से बचते हुए युद्ध-नीति के प्रति असहमति दर्ज कराने का प्रतीकात्मक तरीका था, फिर भी इसने ब्रिटिश सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ाया।
➣ 7 दिसम्बर, 1941 ई. को जापान ने पर्ल हार्बर पर आक्रमण कर द्वितीय विश्वयुद्ध में प्रवेश किया। इसके बाद युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल गया और जापानी सेनाओं ने दक्षिण-पूर्व एशिया में तीव्र गति से सैन्य विस्तार आरम्भ कर दिया।
➣ इसी दौरान ब्रिटिश सरकार ने दिसम्बर 1941 ई. में व्यक्तिगत सत्याग्रह के बंदी नेताओं को जेल से रिहा कर उनसे सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया।
➣ महात्मा गांधी ने जापान के “एशिया एशियाइयों के लिए” नारे की तीखी आलोचना की तथा भारतीय जनता से जापानी वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान किया।
➣ दूसरी ओर, कांग्रेस कार्यसमिति ने यह स्पष्ट किया कि यदि ब्रिटिश सरकार भारत को पूर्ण स्वतंत्रता का आश्वासन दे तथा तत्काल एक उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार के गठन पर सहमत हो, तो कांग्रेस युद्ध-प्रयासों में सहयोग देने पर विचार कर सकती है।
➣ चीन के नेता च्यांग काई-शेक ने पत्नी मादाम च्यांग सहित 5 से 21 फ़रवरी 1942 तक भारत की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने नेहरू से भेंट की (वायसराय भवन में) और ब्रिटेन से खुला आग्रह किया कि भारतीयों को वास्तविक राजनीतिक अधिकार शीघ्र दिए जाएँ।
➣ लौटने के बाद उन्होंने रूज़वेल्ट के माध्यम से चर्चिल तक भी यही संदेश पहुँचाया कि यदि भारतीय राजनीतिक प्रश्न तत्काल हल नहीं हुआ तो खतरा बढ़ता जाएगा (अमेरिकी विदेश विभाग के FRUS अभिलेखों में उपलब्ध)।
➣ 15 फरवरी, 1942 ई. को जापान ने सिंगापुर पर अधिकार कर लिया, जो ब्रिटिश साम्राज्य के लिए एक गंभीर सैन्य आघात था। इसके बाद मार्च 1942 में जापानी सेनाओं ने रंगून (बर्मा) पर भी अधिकार कर लिया। इससे भारत की पूर्वी सीमाओं पर प्रत्यक्ष खतरा उत्पन्न हो गया और ब्रिटिश सरकार की चिंताएँ बढ़ गईं।
▪ मार्च 1942 में रंगून (बर्मा) पर यह अधिकार जापानी सेना ने किया था, न कि आज़ाद हिन्द फ़ौज (INA) ने। उस समय INA का गठन प्रारम्भिक अवस्था में था।
▪ 1944 में आज़ाद हिन्द फ़ौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत की सीमा में प्रवेश किया था। इसलिए 1942 में रंगून पर जापानी अधिकार और 1944 में आज़ाद हिन्द फ़ौज का भारत अभियान दो अलग-अलग घटनाएँ हैं।
➣ इसी समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ब्रिटेन पर भारत को राजनीतिक रियायतें देने का दबाव बढ़ने लगा। अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट, चीन के नेता च्यांग काई-शेक तथा ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री डॉ. एच. वी. इवाट ने ब्रिटिश सरकार से आग्रह किया कि यदि वह युद्ध में भारत का पूर्ण सहयोग चाहती है, तो भारतीयों को वास्तविक राजनीतिक अधिकार प्रदान किए जाने चाहिए। ब्रिटेन के भीतर भी लेबर पार्टी की ओर से दबाव था।
➣ इन सभी परिस्थितियों-अगस्त प्रस्ताव की असफलता, व्यक्तिगत सत्याग्रह, जापान की तीव्र सैन्य सफलताओं, भारत की सुरक्षा पर बढ़ते खतरे तथा मित्र राष्ट्रों के दबाव-के परिणामस्वरूप ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने युद्ध मंत्रिमंडल के सदस्य सर स्टैफर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में एक विशेष मिशन भारत भेजने का निर्णय लिया।
➣ प्रारूप घोषणा को युद्ध मंत्रिमंडल और उसकी समिति ने 28 फ़रवरी से 9 मार्च 1942 के बीच अंतिम रूप दिया था। इसी पृष्ठभूमि में 22 मार्च, 1942 ई. को क्रिप्स मिशन नई दिल्ली पहुँचा, जिसका उद्देश्य भारतीय राजनीतिक दलों को ब्रिटिश युद्ध-प्रयासों में सहयोग हेतु राज़ी करना तथा युद्धोपरांत संवैधानिक सुधारों का प्रस्ताव प्रस्तुत करना था।
क्रिप्स मिशन (1942) की प्रमुख सिफारिशें
➣ प्रारूप घोषणा की प्रस्तावना में ब्रिटिश सरकार का घोषित लक्ष्य था-एक नए भारतीय संघ की रचना, जो एक डोमिनियन होगा, ब्रिटेन एवं अन्य डोमिनियनों से ताज के प्रति समान निष्ठा द्वारा जुड़ा होगा, किन्तु उनके समकक्ष होगा और अपने आंतरिक या बाह्य किसी भी मामले में किसी प्रकार अधीनस्थ नहीं होगा।
➣ मूल पाठ के अनुसार प्रस्ताव दो भागों में थे-युद्धोपरांत की योजना तथा युद्धकाल की तात्कालिक व्यवस्था-
भाग-1: दीर्घकालिक (युद्धोपरांत) प्रस्ताव
➣ युद्धोपरांत भारत को डोमिनियन स्टेटस प्रदान करना:- क्रिप्स मिशन ने प्रस्ताव रखा कि द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस प्रदान किया जाएगा। इसके अंतर्गत भारत को अपने आंतरिक प्रशासन में व्यापक स्वायत्तता प्राप्त होगी।
➣ साथ ही प्रस्तावित संधि में यह भी स्पष्ट था कि भारतीय संघ भविष्य में ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के साथ अपने संबंध का निर्णय स्वयं कर सकेगा, अर्थात उस पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाएगा।
➣ संविधान सभा के गठन का प्रस्ताव:- युद्ध समाप्त होने के तुरंत बाद भारत के लिए एक निर्वाचित संविधान-निर्मात्री निकाय गठित करने का प्रस्ताव रखा गया। प्रस्तावित संरचना इस प्रकार थी-
➣ ▪ युद्ध के बाद प्रांतीय चुनाव होते। उनके परिणाम आते ही प्रांतीय विधानमंडलों के निचले सदनों के समस्त सदस्य एकल निर्वाचक मंडल के रूप में समानुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति से इस निकाय का चुनाव करते।
▪ निकाय की सदस्य संख्या निर्वाचक मंडल की लगभग दसवाँ भाग होती।
▪ देशी रियासतों को अपनी कुल जनसंख्या के अनुपात में (ब्रिटिश भारत के अनुपात के समान) प्रतिनिधि नियुक्त करने के लिए आमंत्रित किया जाना था, जिन्हें ब्रिटिश भारतीय सदस्यों के समान अधिकार मिलते।
▪ यह व्यवस्था तभी बदलती जब युद्ध की समाप्ति से पूर्व प्रमुख समुदायों के नेता कोई अन्य स्वरूप आपस में तय कर लेते।
➣ प्रांतों को संघ से अलग रहने का अधिकार:- क्रिप्स मिशन का सबसे विवादास्पद प्रस्ताव यह था कि यदि कोई ब्रिटिश भारतीय प्रांत नए संविधान को स्वीकार करने को तैयार नहीं है, तो वह अपनी वर्तमान संवैधानिक स्थिति बनाए रख सकेगा तथा बाद में चाहे तो संघ में शामिल भी हो सकेगा।
➣ ऐसे गैर-अधिमिलित प्रांतों के साथ, यदि वे चाहें, ब्रिटिश सरकार भारतीय संघ के समान पूर्ण दर्जे वाला अलग संविधान बनाने पर सहमत होने को तैयार थी। इस प्रावधान ने आगे चलकर भारत के विभाजन की संभावना को बल दिया।
➣ देशी रियासतों की स्वैच्छिक भागीदारी:- प्रस्ताव के अनुसार देशी रियासतों को भारतीय संघ में सम्मिलित होना अनिवार्य नहीं था। संघ में शामिल हों या नहीं, रियासतों के साथ उनकी संधियों में नई परिस्थिति के अनुसार संशोधन आवश्यक माना गया।
➣ ब्रिटेन एवं भारत के बीच संधि का प्रस्ताव:- नए संविधान के निर्माण के बाद ब्रिटिश सरकार और संविधान-निर्मात्री निकाय के बीच एक संधि पर वार्ता होनी थी, जिसमें सत्ता के पूर्ण हस्तांतरण से जुड़े सभी आवश्यक विषयों तथा जातीय एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का प्रावधान होता।
➣ ब्रिटेन ने इस तरह निर्मित संविधान को तत्काल स्वीकार एवं लागू करने का वचन दिया, किन्तु दो शर्तों के साथ:- (i) गैर-अधिमिलित प्रांतों का अधिकार, तथा (ii) उपर्युक्त संधि पर हस्ताक्षर।
भाग-2: तात्कालिक (युद्धकालीन) प्रस्ताव
➣ युद्धकाल में रक्षा विभाग ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण में रहना:- क्रिप्स मिशन ने स्पष्ट किया कि जब तक नया संविधान नहीं बन जाता, तब तक ब्रिटिश सरकार भारत की रक्षा का उत्तरदायित्व एवं उसका नियंत्रण व निर्देशन अपने पास रखेगी, क्योंकि यह उसके विश्व-युद्ध प्रयास का हिस्सा है।
➣ वहीं भारत के सैन्य, नैतिक एवं भौतिक संसाधनों को संगठित करने का कार्य भारत सरकार को भारतीय जनता के सहयोग से करना था। यही प्रस्ताव कांग्रेस की प्रमुख आपत्तियों में से एक बना।
➣ कार्यकारिणी परिषद् में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाना:- घोषणा में भारतीय जनता के प्रमुख वर्गों के नेताओं को अपने देश, राष्ट्रमंडल तथा संयुक्त राष्ट्र की परिषदों में तत्काल एवं प्रभावी भागीदारी के लिए आमंत्रित किया गया।
➣ व्यवहार में इसका अर्थ वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् का पुनर्गठन था। किन्तु यह स्पष्ट नहीं था कि यह व्यवस्था राष्ट्रीय सरकार जैसी होगी या केवल विस्तारित परिषद् – यही अस्पष्टता वार्ताओं की सबसे बड़ी उलझन बनी।
▪ ध्यान रहे-प्रारूप घोषणा के मूल पाठ में पाकिस्तान शब्द कहीं नहीं आता। प्रावधान केवल गैर-अधिमिलित प्रांतों के बारे में था। इसे परोक्ष रूप से पाकिस्तान की माँग की स्वीकृति के रूप में पढ़ा गया।
▪ साथ ही क्रिप्स ने साफ़ कहा था कि योजना को पूरी तरह स्वीकार या अस्वीकार किया जा सकता है और अस्वीकृति का अर्थ संवैधानिक प्रश्न का युद्ध-समाप्ति तक टल जाना होगा।
अगस्त प्रस्ताव (1940) एवं क्रिप्स मिशन (1942) में अंतर
➣ अगस्त प्रस्ताव (1940) केवल भविष्य के संवैधानिक आश्वासनों की घोषणा था, जबकि क्रिप्स मिशन (1942) भारत के लिए युद्धोपरांत संवैधानिक व्यवस्था का विस्तृत प्रारूप लेकर आया था।
| आधार | अगस्त प्रस्ताव (1940) | क्रिप्स मिशन (1942) |
|---|---|---|
| स्वरूप | वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा जारी एक संवैधानिक घोषणा। | सर स्टैफर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में भारत भेजा गया एक उच्चस्तरीय संवैधानिक मिशन। |
| घोषणा / आगमन | 8 अगस्त, 1940 | 22 मार्च, 1942 को भारत आगमन; 30 मार्च, 1942 को प्रस्ताव प्रकाशित। |
| मुख्य उद्देश्य | युद्धकाल में भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने हेतु भविष्य के संवैधानिक सुधारों का आश्वासन देना। | युद्धोपरांत भारत की संवैधानिक व्यवस्था का विस्तृत प्रारूप प्रस्तुत कर भारतीय नेताओं का सहयोग प्राप्त करना। |
| संविधान निर्माण | युद्धोपरांत एक प्रतिनिधिक भारतीय निकाय द्वारा संविधान निर्माण का सिद्धांत पहली बार स्वीकार किया गया; स्वरूप अनिर्धारित। | संविधान सभा के गठन का स्पष्ट प्रस्ताव—एकल निर्वाचक मंडल, समानुपातिक प्रतिनिधित्व, रियासतों का जनसंख्या-अनुपात में प्रतिनिधित्व। |
| डोमिनियन स्टेटस | भविष्य में डोमिनियन स्टेटस देने का सामान्य आश्वासन। | युद्ध समाप्त होने के बाद डोमिनियन स्टेटस का स्पष्ट प्रस्ताव; अन्य डोमिनियनों के समकक्ष एवं किसी दृष्टि से अधीनस्थ नहीं; राष्ट्रमंडल से भविष्य का संबंध तय करने की स्वतंत्रता। |
| अल्पसंख्यक | अल्पसंख्यकों को आश्वासन कि उनकी सहमति के बिना कोई व्यवस्था लागू नहीं होगी (व्यवहार में वीटो की धारणा)। | अल्पसंख्यक-सुरक्षा संधि द्वारा; असहमत प्रांतों के लिए संघ से बाहर रहने का विकल्प। |
| प्रांतों की स्थिति | इस संबंध में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था। | प्रांतों को भारतीय संघ से बाहर रहने (Opt Out) का अधिकार दिया गया। |
| देशी रियासतें | कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं। | देशी रियासतों को स्वेच्छा से संघ में शामिल होने तथा संविधान सभा में प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दिया गया। |
| अंतरिम व्यवस्था | वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् का विस्तार तथा युद्ध सलाहकार परिषद् (जुलाई 1941 में परिषद् के 12 में से 8 सदस्य भारतीय)। | प्रमुख भारतीय नेताओं को “तत्काल एवं प्रभावी भागीदारी” हेतु आमंत्रण; स्वरूप अस्पष्ट। |
| रक्षा विभाग | इस विषय पर स्पष्ट प्रावधान नहीं था; रक्षा ब्रिटिश नियंत्रण में रही। | युद्ध समाप्त होने तक रक्षा विभाग ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण में रखने का स्पष्ट प्रस्ताव। |
| परिणाम | कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता की माँग के आधार पर अस्वीकार किया; व्यक्तिगत सत्याग्रह प्रारम्भ हुआ। | कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग दोनों ने अस्वीकार किया; मिशन विफल रहा और इसके बाद भारत छोड़ो आंदोलन (1942) की पृष्ठभूमि बनी। |
➣ क्रिप्स मिशन (1942) ने केवल संविधान सभा के गठन का प्रस्ताव रखा था। भारतीयों द्वारा संविधान बनाने के सिद्धांत को ब्रिटिश सरकार ने पहली बार अगस्त प्रस्ताव (1940) में माना था।
➣ वास्तविक संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना (1946) के आधार पर किया गया। इसलिए 1940 को सिद्धांत की स्वीकृति, 1942 को संविधान सभा का प्रस्ताव और 1946 को उसका गठन याद रखना चाहिए।
वार्ता का घटनाक्रम (Timeline)
| तिथि (1942) | घटना |
|---|---|
| 11 मार्च | चर्चिल ने हाउस ऑफ कॉमन्स में क्रिप्स के मिशन की घोषणा की। |
| 22 मार्च | क्रिप्स दिल्ली पहुँचे; विभिन्न नेताओं से अलग-अलग भेंट-वार्ताएँ आरम्भ हुईं। |
| 27 मार्च | गांधी दिल्ली आए; क्रिप्स से दो घंटे से अधिक भेंट हुई। गांधी को योजना निराशाजनक लगी। |
| 28 मार्च | क्रिप्स की राजगोपालाचारी से अनौपचारिक भेंट। |
| 30 मार्च | प्रारूप घोषणा सार्वजनिक रूप से प्रकाशित। |
| 2 अप्रैल | कांग्रेस कार्यसमिति का प्रस्ताव (नेहरू द्वारा प्रारूपित) क्रिप्स को सौंपा गया। इसके बाद रक्षा-विभाग के प्रश्न पर वार्ता चली। |
| अप्रैल के आरम्भ | कर्नल लुई जॉनसन की मध्यस्थता तथा राजाजी के सुझाव (रक्षा-मंत्री की बजाय कमांडर-इन-चीफ़ की शक्तियाँ परिभाषित करना) पर आधारित “क्रिप्स-जॉनसन फ़ॉर्मूला” चर्चा में आया, पर सहमति नहीं बनी। |
| 7 अप्रैल | कांग्रेस कार्यसमिति ने रक्षा-सूत्र पर हुई वार्ता के बाद संशोधित प्रस्तावों को भी सर्वसम्मति से अस्वीकार करने का निर्णय लिया (जॉनसन का 9 अप्रैल का तार, FRUS)। |
| 9 अप्रैल | क्रिप्स का अंतिम प्रयास; कांग्रेस ने फिर इनकार किया। |
| 10 अप्रैल | कांग्रेस अध्यक्ष आज़ाद का क्रिप्स को पत्र; क्रिप्स ने इसे कांग्रेस द्वारा प्रस्तावों की स्पष्ट अस्वीकृति माना। |
| 11 अप्रैल | आज़ाद का दूसरा पत्र; कांग्रेस कार्यसमिति का प्रस्ताव जनता के लिए जारी; मुस्लिम लीग कार्यसमिति का प्रस्ताव भी इसी तिथि का है। |
| 12 अप्रैल | क्रिप्स बिना समझौते के इंग्लैंड लौट गए। |
| 8-9 अगस्त | AICC (बम्बई) में भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित; 9 अगस्त को नेतृत्व की गिरफ़्तारी के साथ आंदोलन आरम्भ। |
| 10 सितम्बर | ब्रिटिश सरकार ने कहा कि प्रारूप घोषणा के मूल सिद्धांत ब्रिटिश ताज एवं संसद की “स्थापित नीति” हैं (बाद में 1947 की संसदीय बहस में उद्धृत)। |
▪ तिथि-भ्रम से बचें: कांग्रेस की अस्वीकृति की कई तिथियाँ मिलती हैं, और वे अलग-अलग घटनाओं की हैं-2 अप्रैल: कार्यसमिति का प्रस्ताव (नेहरू द्वारा प्रारूपित) क्रिप्स को सौंपा गया।
▪ 7 अप्रैल: रक्षा-सूत्र वार्ता के बाद कार्यसमिति का सर्वसम्मत अस्वीकृति-निर्णय। 10 अप्रैल: आज़ाद का पत्र, जिसे क्रिप्स ने स्पष्ट अस्वीकृति माना। 11 अप्रैल: प्रस्ताव प्रेस को जारी।
▪ कोचिंग सामग्री में 7 अप्रैल या 11 अप्रैल में से कोई एक अक्सर “अस्वीकृति की तिथि” के रूप में दी जाती है। परीक्षा में विकल्पों में इनमें से एक ही आए तो प्रश्न के शब्द (निर्णय / पत्र / सार्वजनिक घोषणा) देखकर चुनें; सार्वजनिक घोषणा के लिए 11 अप्रैल 1942 सबसे सुरक्षित है।
भारतीय नेताओं एवं राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
➣ कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने क्रिप्स मिशन को अस्वीकार किया, किन्तु कांग्रेस की मुख्य चिंता तत्काल सत्ता हस्तांतरण एवं राष्ट्रीय एकता थी, जबकि मुस्लिम लीग की प्रमुख माँग पाकिस्तान की स्पष्ट स्वीकृति थी। यही दोनों दलों की प्रतिक्रियाओं का सबसे बड़ा अंतर था।
➣ ब्रिटिश सरकार ने स्वयं हाउस ऑफ लॉर्ड्स (29 अप्रैल 1942) में कहा कि लीग की अस्वीकृति के कारण कांग्रेस के कारणों से ठीक विपरीत थे-कांग्रेस प्रांतों के अलग होने के अधिकार से असंतुष्ट थी, तो लीग एकल भारतीय संघ के उद्देश्य से।
➣ ब्रिटिश सरकार के अपने विवरण के अनुसार क्रिप्स को एक साथ कई परस्पर विरोधी दावों का सामना करना पड़ा-कांग्रेस स्वतंत्रता, संविधान सभा और पूरे भारत (ब्रिटिश भारत एवं रियासतों) के लिए एक सरकार चाहती थी। लीग विभाजन (पाकिस्तान) चाहती थी, अनुसूचित वर्ग जाति-हिंदू शासन से सुरक्षा माँग रहे थे, सिख किसी अन्य समुदाय के शासन से सुरक्षा चाहते थे और रियासतें अपने संधि-अधिकारों की रक्षा।
➣ सरकार का यह भी कहना था कि पूरी वार्ता के दौरान किसी भी दल का नेता दूसरे दल के नेता से नहीं मिला। सभी अलग-अलग क्रिप्स के पास आए।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रतिक्रिया
➣ कांग्रेस का मत था कि इन प्रस्तावों में भारत को तत्काल पूर्ण उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार अथवा वास्तविक सत्ता हस्तांतरण का कोई प्रावधान नहीं था।
➣ 2 अप्रैल, 1942 ई. को नई दिल्ली में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक, जिसकी अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने की, में क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों पर विस्तार से विचार किया गया।
➣ रक्षा-सूत्र पर हुई आगे की वार्ता के बाद कार्यसमिति ने 7 अप्रैल को संशोधित प्रस्तावों को भी सर्वसम्मति से अस्वीकार करने का निर्णय लिया (अमेरिकी दूत कर्नल जॉनसन के 9 अप्रैल के तार के अनुसार)।
➣ कांग्रेस की सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि रक्षा विभाग का नियंत्रण युद्ध समाप्त होने तक ब्रिटिश सरकार एवं वायसराय के हाथों में ही रखा गया था।
➣ कांग्रेस का तर्क था कि यदि भारतीयों से युद्ध में सहयोग अपेक्षित है, तो उन्हें रक्षा सहित शासन के सभी महत्वपूर्ण विषयों पर अधिकार मिलना चाहिए। प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि जब रक्षा की वास्तविक ज़िम्मेदारी ब्रिटिश सरकार के पास ही रहनी है, तो किसी भारतीय रक्षा-सदस्य को उसके लिए उत्तरदायी बताना ईमानदारी नहीं होगी।
➣ कांग्रेस ने प्रांतों को भारतीय संघ से अलग रहने के अधिकार का भी कड़ा विरोध किया। उसका मानना था कि यह प्रावधान भारत की राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के लिए गंभीर खतरा है तथा भविष्य में देश के विभाजन का आधार बन सकता है।
➣ कांग्रेस ने यह भी आपत्ति जताई कि देशी रियासतों के प्रतिनिधियों का चयन जनता द्वारा न होकर उनके शासकों द्वारा किया जाना था। उसके अनुसार ऐसी संविधान सभा को पूर्णतः लोकतांत्रिक नहीं माना जा सकता था।
➣ ब्रिटिश सरकार ने स्वीकार किया कि कांग्रेस की आपत्ति रियासतों के प्रतिनिधित्व पर नहीं, बल्कि इस पर थी कि प्रतिनिधि शासक होंगे, जनता के चुने हुए नहीं। कांग्रेस वर्षों से रियासतों की जनता के लिए अलग आवाज़ की वकालत कर रही थी। जबकि सरकार का तर्क था कि अधिकांश रियासतों में तब प्रतिनिधि संस्थाएँ ही विकसित नहीं थीं।
➣ जवाहरलाल नेहरू सहित अनेक कांग्रेस नेताओं ने प्रस्तावों की आलोचना करते हुए कहा कि इनमें भारत को वास्तविक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि भविष्य में सीमित संवैधानिक परिवर्तन का आश्वासन दिया गया है।
➣ कांग्रेस के भीतर विविध स्वर: कांग्रेस एकरूप नहीं थी। गांधी अहिंसा के कारण युद्ध में सक्रिय सहयोग के पक्षधर नहीं थे और क्रिप्स से पहली ही भेंट में उन्होंने अगले विमान से लौट जाने की सलाह दे दी।
नेहरू एवं आज़ाद वास्तविक सत्ता मिलने पर रक्षा में पूरे सहयोग को उत्सुक थे। नेहरू ने 12 अप्रैल 1942 को रूज़वेल्ट को पत्र लिखकर मिशन की विफलता पर खेद जताते हुए कहा कि कांग्रेस भारत की रक्षा के लिए हरसंभव प्रयास को तैयार थी। राजाजी पाकिस्तान के सिद्धांत को मानकर समझौते के पक्ष में थे (नीचे देखें)।➣
➣ अंतरिम सरकार: वार्ता टूटने का औपचारिक बिंदु। ब्रिटिश सरकार के अनुसार असली टूटन इस पर हुई कि नए संविधान के लागू होने तक अस्थायी सरकार का स्वरूप क्या हो। सरकार का कहना था कि क्रिप्स ने कांग्रेस से कहा कि नई सरकार में ब्रिटिश प्रतिनिधित्व केवल वायसराय और कमांडर-इन-चीफ़ तक सीमित किया जा सकता है, किन्तु कांग्रेस ने पूर्ण सत्ता की माँग रखी, जो निर्वाचित विधायिका के अभाव में किसी के प्रति उत्तरदायी न सरकार बनती।
➣ दूसरी ओर आज़ाद के पत्रों के अनुसार क्रिप्स ने पहली भेंट में ऐसी राष्ट्रीय सरकार का आश्वासन दिया था जो मंत्रिमंडल की तरह काम करे और जिसमें वायसराय की स्थिति इंग्लैंड में सम्राट जैसी संवैधानिक हो; कांग्रेस का कहना था कि वह कानूनी परिवर्तन नहीं, बल्कि ऐसे ठोस आश्वासन और परिपाटियाँ चाहती थी जिनसे जनता को लगे कि राष्ट्रीय सरकार आ गई है। (ये दोनों वृत्तांत ब्रिटिश संसद में उद्धृत White Paper पर आधारित हैं और आपस में भिन्न हैं।)
➣ रक्षा-प्रश्न पर दो विवरण। ब्रिटिश सरकार के अनुसार क्रिप्स ने रक्षा की कठिनाई का हल भारतीय प्रतिनिधि को युद्ध कैबिनेट एवं प्रशांत परिषद् में स्थान देने के प्रस्ताव से निकाला, और सरकार ने माना कि वार्ता रक्षा पर नहीं टूटी।
➣ मुख्य गाँठ यह थी कि भारत में कमांडर-इन-चीफ़ ही वायसराय की परिषद् का रक्षा-सदस्य भी था; भारतीय पक्ष उसके राजनीतिक कार्य भारतीय हाथों में चाहता था। कर्नल जॉनसन के 9 अप्रैल के तार के अनुसार उन्होंने इस गतिरोध को तोड़ने का प्रयास किया, पर वायसराय और वेवेल की आपत्तियाँ आड़े आईं। इस मामले में भी अमेरिकी दूत का आकलन ब्रिटिश सरकार के दावे से भिन्न है।
➣ महात्मा गांधी कांग्रेस कार्यसमिति के औपचारिक वार्ताकार नहीं थे, किन्तु क्रिप्स के आग्रह पर 27 मार्च को दिल्ली आकर उनसे मिले। गांधी की स्मृति के अनुसार (लुई फ़िशर, A Week with Gandhi) उन्होंने क्रिप्स से कहा कि यदि यही पूरा प्रस्ताव है तो वे अगले विमान से लौट जाएँ। बाद में उन्होंने प्रस्तावों की तीखी आलोचना करते हुए इन्हें डूबते हुए बैंक का उत्तर-तिथि (Post-dated Cheque) कहा।
➣ उनका आशय था कि ब्रिटिश सरकार तत्काल सत्ता हस्तांतरण के बजाय भविष्य के अनिश्चित वादों के माध्यम से भारतीयों का सहयोग प्राप्त करना चाहती है। (द्वितीयक साहित्य में यह कथन failing तथा crashing bank दोनों रूपों में मिलता है; भाव एक ही है।)
➣ वार्ता के अंतिम चरण में रक्षा-विभाग पर समझौते के प्रयास हुए। अमेरिकी राष्ट्रपति के निजी प्रतिनिधि कर्नल लुई जॉनसन ने मध्यस्थता की; राजाजी के सुझाव पर यह रास्ता निकाला गया कि भारतीय रक्षा-सदस्य के कार्यों की जगह कमांडर-इन-चीफ़ के अधिकारों को परिभाषित किया जाए।
➣ ऐसा माना जाता है कि यह क्रिप्स-जॉनसन फ़ॉर्मूला सफल हो सकता था, किन्तु क्रिप्स के पास वार्ता की सीमा से आगे जाने का अधिकार नहीं था। नेहरू ने क्रिप्स से कहा कि इतने लोगों की सहमति जुटाना उनके सामर्थ्य से बाहर है, और इसे उन्होंने सबके लिए एक त्रासदी बताया।
➣ 11 अप्रैल, 1942 ई. को कांग्रेस ने अपने निर्णय को सार्वजनिक करते हुए स्पष्ट कर दिया कि जब तक भारत को तत्काल वास्तविक सत्ता हस्तांतरण नहीं किया जाता, तब तक वह क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों को स्वीकार नहीं करेगी।
➣ इस प्रकार कांग्रेस ने क्रिप्स मिशन को भारत की स्वतंत्रता की आकांक्षाओं के अनुरूप न मानते हुए अस्वीकार कर दिया। मिशन की असफलता के बाद कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के संबंध और अधिक तनावपूर्ण हो गए, जिसके परिणामस्वरूप कुछ ही महीनों बाद भारत छोड़ो आंदोलन (1942) प्रारम्भ हुआ।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने क्रिप्स मिशन को मुख्यतः तीन कारणों से अस्वीकार किया था-तत्काल सत्ता हस्तांतरण का अभाव, रक्षा विभाग पर ब्रिटिश नियंत्रण तथा प्रांतों को संघ से अलग होने का अधिकार। (साथ ही रियासतों के नामित प्रतिनिधियों का विरोध)
मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया
➣ मुस्लिम लीग ने भी क्रिप्स मिशन (1942) के प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया। यद्यपि मिशन में प्रांतों को भारतीय संघ से अलग रहने का अधिकार दिया गया था, फिर भी लीग का मत था कि उसके राजनीतिक उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया गया है। लीग कार्यसमिति का प्रस्ताव 11 अप्रैल 1942 का है।
➣ मुस्लिम लीग की मुख्य आपत्ति यह थी कि क्रिप्स मिशन ने पाकिस्तान अथवा पृथक मुस्लिम राष्ट्र की माँग को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया।
➣ लीग ने माना कि पाकिस्तान की संभावना को परोक्ष रूप से मान्यता मिली है, किन्तु उसका कहना था कि भारतीय उपमहाद्वीप की समस्या का एकमात्र समाधान उसका स्वतंत्र क्षेत्रों में विभाजन है, इसलिए मुसलमानों को एक ऐसे संविधान-निर्मात्री निकाय में शामिल होने को बाध्य करना अनुचित है जिसका मुख्य उद्देश्य एक नया भारतीय संघ बनाना है। लीग का निष्कर्ष था कि जब भविष्य के प्रस्ताव ही अस्वीकार्य हैं, तो तात्कालिक व्यवस्थाओं पर चर्चा निरर्थक है।
➣ लीग ने प्रस्तावित संविधान सभा की संरचना पर भी आपत्ति व्यक्त की। उसका तर्क था कि यदि संविधान सभा का गठन प्रांतीय विधानसभाओं के आधार पर किया जाएगा, तो उसमें कांग्रेस का प्रभाव अधिक होगा और मुस्लिम लीग को मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि होने के अनुरूप स्थान नहीं मिल पाएगा।
➣ मोहम्मद अली जिन्ना का मत था कि क्रिप्स मिशन ने दो-राष्ट्र सिद्धांत को प्रत्यक्ष रूप से स्वीकार नहीं किया है। इसलिए उन्होंने इन प्रस्तावों को मुस्लिम लीग की राजनीतिक आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं माना।
➣ रियासतों के प्रतिनिधियों ने क्रिप्स को दिए ज्ञापन में माँग की, कि जो रियासत या रियासतों का समूह प्रस्तावित भारतीय संघ से सहमत न हो, उसे भी अलग होकर पूर्ण-संप्रभु अपना संघ बनाने का अधिकार मिले।
➣ लीग ने इस माँग का तत्काल समर्थन किया (White Paper का यह संदर्भ ब्रिटिश संसद में लॉर्ड सैमुअल ने उद्धृत किया)। इससे स्पष्ट है कि अलग होने के अधिकार का तर्क ब्रिटिश भारत के प्रांतों तक सीमित रहना कठिन था।
➣ इस प्रकार, यद्यपि क्रिप्स मिशन के कुछ प्रावधान-विशेषकर प्रांतों को संघ से अलग रहने का अधिकार-मुस्लिम लीग की भविष्य की माँगों के अनुकूल प्रतीत होते थे, फिर भी पाकिस्तान की स्पष्ट स्वीकृति के अभाव में लीग ने इन प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया।
➣ मुसलमानों की आवाज़ केवल लीग नहीं: उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष स्वयं एक मुस्लिम नेता (आज़ाद) थे, और उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत (NWFP) का बड़ा हिस्सा कांग्रेस के साथ था; ब्रिटिश संसद में भी यह तर्क उठा कि केवल सांप्रदायिक कठिनाई को असफलता का कारण बताना सरलीकरण है। क्रिप्स ने पंजाब के यूनियनिस्ट प्रधानमंत्री सर सिकंदर हयात ख़ान से भी पंजाब के संदर्भ में परामर्श किया, क्योंकि पंजाब जैसे मिश्रित प्रांत में अलग होने का निर्णय कैसे होगा, यह बड़ा प्रश्न था।
कांग्रेस बनाम मुस्लिम लीग: तुलनात्मक सारणी
| आधार | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | मुस्लिम लीग |
|---|---|---|
| मुख्य आपत्ति | तत्काल सत्ता हस्तांतरण नहीं किया गया तथा रक्षा विभाग ब्रिटिश नियंत्रण में रखा गया। | पाकिस्तान की स्पष्ट स्वीकृति नहीं दी गई तथा प्रस्ताव उसकी राजनीतिक माँगों के अनुरूप नहीं थे। |
| संविधान सभा पर दृष्टिकोण | देशी रियासतों के नामित प्रतिनिधियों तथा प्रांतों के पृथक होने के अधिकार का विरोध किया। | संविधान सभा की संरचना पर आपत्ति जताई और कांग्रेस के प्रभाव की आशंका व्यक्त की। |
| भारत की एकता | प्रांतों को संघ से अलग होने (Opt Out) के अधिकार का विरोध किया। | इस प्रावधान को पर्याप्त नहीं माना, एकल संघ के उद्देश्य वाले निकाय में मुसलमानों को शामिल होने को बाध्य करना अनुचित बताया और पृथक राष्ट्र की स्पष्ट मान्यता चाही। |
| प्रमुख नेता | महात्मा गांधी को प्रस्ताव को “डूबते हुए बैंक का उत्तर-तिथि चेक” कहने का श्रेय दिया जाता है। | मोहम्मद अली जिन्ना ने प्रस्ताव को मुस्लिम लीग की मूल राजनीतिक माँगों के अनुरूप नहीं माना; इलाहाबाद अधिवेशन में पाकिस्तान को केवल “दूर की संभावना” की तरह देखे जाने पर निराशा जताई। |
| समानता | दोनों दलों ने क्रिप्स मिशन (1942) के प्रस्तावों को अस्वीकार किया, जिसके परिणामस्वरूप मिशन विफल हो गया और आगे चलकर भारत छोड़ो आंदोलन (1942) की पृष्ठभूमि तैयार हुई। | |
| अंतिम निर्णय | क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया। | क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया। |
अन्य नेताओं, समूहों एवं ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया
➣ ब्रिटिश सरकार ने क्रिप्स मिशन को भारत की संवैधानिक समस्या के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया। उसका उद्देश्य भारतीय नेताओं का सहयोग प्राप्त कर द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटेन की स्थिति को सुदृढ़ बनाना था।
➣ संसद (29 अप्रैल 1942) में सरकार ने यह भी कहा कि अस्वीकृति के बावजूद घोषणा ने भारत की स्वतंत्रता के प्रति ब्रिटेन के इरादों पर संदेह दूर करने का काम किया, और यह भी कि प्रस्तावों में ऐसे प्रावधान थे जिनसे बड़े अल्पसंख्यक समूह के असहयोग से बहुमत की स्वशासन की माँग रुकती न रहे।
➣ सर स्टैफर्ड क्रिप्स ने कांग्रेस, मुस्लिम लीग, डॉ. भीमराव आंबेडकर, वीर सावरकर, तेज बहादुर सप्रू तथा अन्य प्रमुख नेताओं से अलग-अलग वार्ताएँ कीं। किंतु विभिन्न राजनीतिक दलों की परस्पर विरोधी माँगों के कारण वे किसी सर्वमान्य समझौते तक नहीं पहुँच सके और 12 अप्रैल, 1942 ई. को बिना किसी समझौते के इंग्लैंड लौट गए।
➣ ब्रिटिश सरकार ने स्वयं माना कि अनुसूचित वर्गों ने जाति-हिंदू शासन के प्रतिकूल प्रभाव से सुरक्षा की विशिष्ट माँग रखी थी। डॉ. भीमराव आंबेडकर और एम.सी. राजा ने प्रस्तावों में अनुसूचित वर्गों की उपेक्षा पर असंतोष व्यक्त किया (द्वितीयक स्रोतों में 1 अप्रैल 1942 का उनका संयुक्त ज्ञापन/वक्तव्य बताया गया है), और उनकी चिंता थी कि नई व्यवस्था में उनके लिए ठोस संवैधानिक सुरक्षा नहीं है।
➣ ध्यान रहे, आंबेडकर वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् में जुलाई 1942 में, यानी मिशन के बाद, श्रम सदस्य के रूप में शामिल हुए। जुलाई 1941 के विस्तार में उन्हें शामिल नहीं किया गया था।
➣ हिंदू महासभा के नेता वीर सावरकर ने विशेष रूप से उस प्रावधान का विरोध किया, जिसमें प्रांतों को भारतीय संघ से अलग रहने का अधिकार दिया गया था। उनका मत था कि इससे भारत की राष्ट्रीय एकता कमजोर होगी और विभाजन की संभावना बढ़ेगी।
➣ सिख जनसंख्या पंजाब में लगभग 13-14 प्रतिशत थी। ब्रिटिश संसद में लॉर्ड हेली ने इसे लगभग असाध्य समस्या कहा, क्योंकि पाकिस्तान की योजना में सिख मुख्यतः मुस्लिम सरकार के अधीन आ जाते। मास्टर तारा सिंह सहित सिख नेताओं ने क्रिप्स से भेंट की, और 31 मार्च 1942 को सिख सर्वदलीय समिति ने ज्ञापन देकर पंजाब की सीमाओं के पुनर्निर्धारण (आज़ाद पंजाब) की माँग रखी। इसलिए सिखों का विरोध सांप्रदायिक निर्णय के भय से उपजा था।
➣ रियासतों के प्रतिनिधियों ने संधि-संबंधों की सुरक्षा पर ज़ोर दिया और ज्ञापन में माँग रखी कि असहमत रियासतों को भी पृथक संघ बनाने का अधिकार मिले। ब्रिटिश संसद में यह प्रश्न भी उठा कि क्या शासक अपनी रियासतों में अपनी संवैधानिक स्थिति छोड़ने को तैयार थे अर्थात रियासतों का रुख अनिश्चित था।
➣ उदारवादी नेताओं, जैसे सर तेज बहादुर सप्रू और एम.आर. जयकर, ने मिशन के आगमन का स्वागत किया था और इसे समझौते की दिशा में सकारात्मक प्रयास माना। उनका विचार था कि यदि प्रमुख राजनीतिक दल कुछ समझौता करते, तो संवैधानिक गतिरोध को समाप्त किया जा सकता था।
➣ किन्तु प्रस्तावों के ब्योरे पर, विशेषकर प्रांतों को संघ से बाहर रहने के अधिकार पर, उदारवादी नेताओं ने आपत्ति जताई और इसे भारत की एकता एवं सुरक्षा के लिए हानिकारक बताया।
➣ सुभाष चन्द्र बोस (आज़ाद हिन्द रेडियो, बर्लिन) ने 31 मार्च 1942 को क्रिप्स के नाम खुला पत्र प्रसारित किया, जिसमें कहा कि पेशकश स्वतंत्रता की नहीं, बल्कि साम्राज्य के भीतर डोमिनियन स्टेटस की है और वह भी युद्ध के बाद। उन्होंने ब्रिटिश वादों का इतिहास टूटे हुए वचनों का बताया।
➣ 10 अप्रैल 1942 के प्रसारण में उन्होंने क्रिप्स से वार्ता में लगे नेताओं पर खेद जताया, ब्रिटिश साम्राज्य के पतन की भविष्यवाणी की और भारत से इस युद्ध में सहयोग न करने का आह्वान किया। यह कांग्रेस की वार्ता-नीति के विपरीत सशस्त्र/बाह्य संघर्ष की धारा का स्वर था।
➣ अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया: अमेरिकी राष्ट्रपति रूज़वेल्ट के निजी प्रतिनिधि कर्नल जॉनसन वार्ता में सक्रिय मध्यस्थ रहे। वार्ता टूटने के बाद 11-12 अप्रैल को रूज़वेल्ट ने हैरी हॉपकिन्स के माध्यम से चर्चिल को संदेश भेजकर अनुरोध किया कि क्रिप्स का प्रस्थान टाला जाए, वार्ता फिर आरम्भ हो, और भारत में राष्ट्रवादी सरकार के गठन पर विचार हो (चर्चिल अभिलेख, कैम्ब्रिज)। नेहरू ने भी 12 अप्रैल को रूज़वेल्ट को पत्र लिखा। इससे स्पष्ट है कि मिशन की विफलता का प्रभाव मित्र राष्ट्रों तक पहुँचा।
➣ कांग्रेस के भीतर चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का दृष्टिकोण अलग था। अप्रैल 1942 में उनके प्रस्ताव पर मद्रास प्रांत के कांग्रेस विधायक दल ने सिफारिश की कि मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की माँग स्वीकार कर ली जाए।
➣ 29 अप्रैल 1942 की ब्रिटिश संसदीय बहस में इस प्रस्ताव से कांग्रेस के भीतर पड़ी दरार का उल्लेख भी हुआ। अखिल भारतीय कांग्रेस ने इसे नहीं माना और राजाजी ने कांग्रेस से दूरी बना ली तथा भारत छोड़ो आंदोलन में भाग नहीं लिया। इसी विचार का परिष्कृत रूप आगे सी.आर. फ़ॉर्मूला (1944) कहलाया।
सर स्टैफर्ड क्रिप्स ने विभिन्न भारतीय नेताओं से व्यापक वार्ताएँ कीं, किंतु कांग्रेस और मुस्लिम लीग के परस्पर विरोधी दृष्टिकोण के कारण मिशन असफल रहा। अंतत: 12 अप्रैल, 1942 ई. को वे बिना किसी समझौते के इंग्लैंड लौट गए।
प्रतिक्रियाओं का सार
➣ सभी ने एक जैसे कारणों से अस्वीकार किया” कहना सरलीकरण है। कांग्रेस और लीग के कारण विपरीत थे। लीग ने पाकिस्तान की संभावना को परोक्ष रूप से स्वीकृत माना। सिखों और अनुसूचित वर्गों का विरोध बहुसंख्यक शासन की आशंका से उपजा था और मुस्लिम प्रतिनिधित्व अकेले लीग तक सीमित नहीं था।
| पक्ष | रुख | प्रमुख आधार / माँग |
|---|---|---|
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | अस्वीकृत | तत्काल राष्ट्रीय सरकार/सत्ता हस्तांतरण का अभाव; रक्षा पर ब्रिटिश नियंत्रण; प्रांतों को अलग होने का अधिकार; रियासतों के नामित प्रतिनिधि; अंतरिम सरकार के स्वरूप पर असहमति। |
| मुस्लिम लीग | अस्वीकृत, पर आंशिक संतोष सहित | “पाकिस्तान” की स्पष्ट स्वीकृति नहीं; निकाय का उद्देश्य एक भारतीय संघ; किन्तु संभावना की “परोक्ष मान्यता” को लीग ने नोट किया। |
| हिंदू महासभा (सावरकर) | विरोध | प्रांतों के अलग होने का अधिकार भारत की एकता के लिए खतरा। |
| सिख | असंतोष / विरोध | पंजाब में मुस्लिम-बहुल शासन के अधीन जाने की आशंका; सिख सर्वदलीय समिति ने 31 मार्च 1942 को ज्ञापन देकर पंजाब की सीमाओं के पुनर्निर्धारण (“आज़ाद पंजाब”) की माँग रखी। |
| अनुसूचित वर्ग (आंबेडकर, एम.सी. राजा) | असंतोष | जाति-हिंदू शासन से ठोस सुरक्षा की माँग; योजना में उनके हितों की उपेक्षा का आरोप। |
| रियासतों के प्रतिनिधि | अपनी शर्तों के साथ | संधि-अधिकारों की रक्षा; असहमत रियासतों/रियासत-समूहों को भी पृथक संघ बनाने का अधिकार देने की माँग (ज्ञापन)। |
| उदारवादी (सप्रू, जयकर) | मिशन का स्वागत; प्रस्तावों पर आपत्ति | प्रांतों के अलग होने का प्रावधान एकता एवं सुरक्षा के लिए हानिकारक। |
| सुभाष चन्द्र बोस (बर्लिन से) | पूर्ण विरोध | डोमिनियन स्टेटस भी युद्धोपरांत; ब्रिटिश वादों पर अविश्वास; भारत को इस युद्ध से अलग रखने का आह्वान। |
क्रिप्स मिशन की असफलता के कारण
➣ तत्काल सत्ता हस्तांतरण का अभाव:- क्रिप्स मिशन ने भारत को युद्धोपरांत डोमिनियन स्टेटस देने का प्रस्ताव रखा, किन्तु तत्काल उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार अथवा वास्तविक सत्ता हस्तांतरण का कोई प्रावधान नहीं किया। इससे भारतीय नेताओं में निराशा उत्पन्न हुई। डोमिनियन स्टेटस भी 1942 तक कांग्रेस की पूर्ण स्वतंत्रता की माँग के सामने अपर्याप्त मान लिया गया था।
➣ रक्षा विभाग पर ब्रिटिश नियंत्रण:- मिशन के प्रस्तावों के अनुसार द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति तक रक्षा विभाग ब्रिटिश सरकार एवं वायसराय के नियंत्रण में ही रहना था। कांग्रेस ने इसे अस्वीकार्य माना, क्योंकि बिना रक्षा विभाग के नियंत्रण के उत्तरदायी शासन की कल्पना अधूरी थी।
➣ प्रांतों को संघ से अलग होने का अधिकार:- क्रिप्स मिशन ने ब्रिटिश भारतीय प्रांतों को भविष्य में भारतीय संघ से बाहर रहने का अधिकार दिया। कांग्रेस ने इसे भारत की राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के लिए गंभीर खतरा माना, जबकि मुस्लिम लीग भी इसे पाकिस्तान की स्पष्ट स्वीकृति नहीं मानती थी।
➣ देशी रियासतों के प्रतिनिधित्व की अलोकतांत्रिक व्यवस्था:- प्रस्तावित संविधान सभा में देशी रियासतों के प्रतिनिधियों का चयन जनता द्वारा न होकर उनके शासकों द्वारा किया जाना था। इससे संविधान सभा के पूर्णतः लोकतांत्रिक स्वरूप पर प्रश्नचिह्न लग गया।
➣ कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के परस्पर विरोधी दृष्टिकोण:- कांग्रेस तत्काल राष्ट्रीय सरकार एवं अखंड भारत की पक्षधर थी, जबकि मुस्लिम लीग पृथक मुस्लिम राष्ट्र की माँग पर अडिग थी। इन दोनों दलों की परस्पर विरोधी राजनीतिक माँगों के कारण किसी सर्वमान्य समझौते तक पहुँचना संभव नहीं हो सका।
➣ अंतरिम व्यवस्था की अस्पष्टता एवं ब्रिटिश सरकार में मतभेद:- वार्ताओं में क्रिप्स ने कांग्रेस नेताओं के सामने पूर्णतः भारतीय कार्यकारिणी परिषद् की संभावना का संकेत दिया, जबकि प्रारूप घोषणा में केवल “प्रभावी भागीदारी” जैसे अस्पष्ट शब्द थे और चर्चिल तथा भारत सचिव एमरी की सोच इससे भिन्न थी। इतिहासकार पीटर क्लार्क (The Cripps Version, 2002) के अनुसार क्रिप्स की बातें उस योजना के अनुरूप तो थीं, पर लंदन की कल्पना से आगे थीं। बाद में जब क्रिप्स ने कहा कि उनका आशय केवल कार्यकारिणी परिषद् के विस्तार से था, तो भारतीय नेताओं का विश्वास डगमगा गया।
➣ “लेना है तो पूरा लो” वाला दृष्टिकोण:- क्रिप्स ने स्पष्ट कर दिया था कि योजना को पूर्ण रूप से स्वीकार या अस्वीकार किया जाए और अस्वीकृति का अर्थ युद्ध-समाप्ति तक इंतज़ार होगा। इस कठोर रुख से संशोधन की गुंजाइश कम हो गई, जबकि रक्षा-सूत्र जैसे विषयों पर थोड़ा लचीलापन संभवतः सहमति की राह खोल सकता था।
➣ ब्रिटिश सरकार की सीमित राजनीतिक इच्छा:- इतिहासकारों के अनुसार ब्रिटिश सरकार का प्रमुख उद्देश्य भारत को तत्काल स्वतंत्रता देना नहीं, बल्कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारतीयों का सहयोग प्राप्त करना था।
➣ इसलिए मिशन के प्रस्तावों में वास्तविक सत्ता हस्तांतरण के स्थान पर भविष्य के आश्वासनों पर अधिक बल दिया गया। अमेरिका और चीन के दबाव ने मिशन की भूमिका तैयार की, किन्तु मिशन की वार्ता-सीमाएँ अंततः लंदन और वायसराय के रुख से तय होती रहीं।
➣ समय एवं परिस्थितियों का आकलन:- सिंगापुर और रंगून के पतन के बाद कांग्रेस के भीतर एक वर्ग को लगा कि ब्रिटिश सत्ता कमज़ोर हो रही है और भविष्य के वादों के बदले वर्तमान में शक्ति पाने का यही समय है। ब्रिटिश दृष्टि से जापानी खतरे के बीच सैन्य नियंत्रण छोड़ना असंभव था। इस भिन्न आकलन ने भी समझौते को कठिन बनाया।
इतिहासलेखन: विभिन्न दृष्टिकोण
➣ क्रिप्स मिशन पर लिखे विवरणों में तीन प्रश्न बार-बार उठते हैं: (1) ब्रिटेन की वास्तविक मंशा क्या थी, (2) असफलता का उत्तरदायित्व किस पर था, और (3) प्रांतों के अलग होने के प्रावधान का उद्देश्य क्या था।
➣ इन पर उत्तर देने वाले स्रोत अक्सर पक्षपाती हैं-ब्रिटिश सरकार का आधिकारिक विवरण (संसदीय बहस), भारतीय नेताओं के समकालीन वक्तव्य, और बाद के विद्वानों का लेखन-इसलिए उत्तर लिखते समय किसी एक धारा को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।
➣ समकालीन ब्रिटिश/आधिकारिक दृष्टि: ब्रिटिश सरकार ने संसद (29 अप्रैल 1942) में कहा कि मिशन अंतिम क्षण का पश्चाताप नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही नीति का क्रम था; वार्ता अंतरिम सरकार के स्वरूप पर टूटी; कांग्रेस का दावा “निरपेक्ष” था कि सत्ता केवल उसे मिले, जबकि लीग, सिख, अनुसूचित वर्ग और रियासतें अलग सुरक्षा माँग रही थीं।
➣ पूर्व प्रशासक लॉर्ड हेली ने दो गहरे कारण बताए: जापानी प्रगति के कारण युद्धोपरांत की योजना का आकर्षण समाप्त हो जाना, और यह भाव कि प्रस्तावित ढाँचा कांग्रेस को वह नेतृत्व नहीं देगा जो वह चाहती थी।
➣ आलोचना: यह पक्षकार का विवरण है। उसी बहस में लेबर सदस्य लॉर्ड स्ट्रैबोल्गी ने सांप्रदायिक कठिनाई को कारण बताना सरलीकरण कहा और समझौते को अधिक निकट माना; नेहरू ने भी कहा था कि वार्ता के किसी चरण में सांप्रदायिक बाधा नहीं आई थी।
➣ राष्ट्रवादी दृष्टि: नेहरू का समकालीन वक्तव्य (Jawaharlal Nehru on the Cripps Mission, 1942) तथा आज़ाद के पत्र इस धारा के मूल स्रोत हैं। बाद के राष्ट्रवादी लेखन (जैसे भीम सेन सिंह, The Cripps Mission: A Handiwork of British Imperialism, 1979) में मिशन को साम्राज्यवादी चाल माना गया। युद्ध में भारत को बनाए रखना और मित्र राष्ट्रों को दिखाना, पर वास्तविक सत्ता न देना; फूट डालो और राज करो के प्रमाण के रूप में प्रांतों का अलग होने का अधिकार और रियासतों के नामित प्रतिनिधि गिनाए जाते हैं।
➣ कुछ राष्ट्रवादी विवरण वायसराय और भारत सचिव पर पर्दे के पीछे मिशन को विफल करने का आरोप भी लगाते हैं। आलोचना: यह पढ़त क्रिप्स के निजी प्रयासों, नेहरू से उनकी मित्रता और अमेरिकी दूत की भागीदारी की उपेक्षा करती है, और कांग्रेस के भीतर के मतभेदों (राजाजी) को कम करके आँकती है।
➣ क्रिप्स-केंद्रित/जीवनीपरक दृष्टि: पीटर क्लार्क (The Cripps Version, 2002) के अनुसार वार्ताओं में क्रिप्स ने कांग्रेस के सामने पूर्णतः भारतीयकृत कार्यकारिणी परिषद् की संभावना रखी। यह प्रारूप घोषणा के अनुरूप थी, पर चर्चिल और एमरी की कल्पना से आगे थी। इस दृष्टि से गलतफ़हमी और अधिकार-सीमा असफलता के केंद्र में हैं।
➣ समकालीन समीक्षकों का भी सार यही रहा है कि क्रिप्स की नीयत पर शायद ही किसी को संदेह था, किन्तु चर्चिल की कठोरता और कांग्रेस के अविश्वास (उत्तर-तिथि चेक) ने मिशन को शुरू से कठिन बना दिया था। आलोचना: यह क्रिप्स की व्यक्तिगत भूमिका पर अधिक बल देती है, जबकि प्रश्न ब्रिटिश कैबिनेट की नीति का था।
➣ मित्र-राष्ट्र/प्रचार-राजनय की दृष्टि: इस धारा में मिशन को केवल भारत-नीति नहीं, बल्कि युद्धकालीन प्रचार और गठबंधन-राजनय का अंग माना जाता है (जैसे ऑरियोल वीगोल्ड, Churchill, Roosevelt and India: Propaganda during World War II, 2008)। साक्ष्य: अमेरिका, चीन और ब्रिटेन में लेबर पार्टी का दबाव, रूज़वेल्ट के दूत कर्नल जॉनसन की मध्यस्थता और स्वयं ब्रिटिश संसद में यह कहा जाना कि मिशन ने ब्रिटेन की ईमानदारी को भारत और विशेषकर अमेरिकी जनमत में स्थापित किया।
➣ रूज़वेल्ट के अन्य दूतों (लुई फ़िशर, एडगर स्नो) ने असफलता का ऐसा वृत्तांत दिया जो ब्रिटिश आधिकारिक विवरण से भिन्न था। आलोचना: इससे यह निष्कर्ष निकालना कठिन है कि ब्रिटेन केवल प्रचार चाहता था। मिशन में वास्तविक संवैधानिक प्रस्ताव भी थे।
➣ लगभग समझौता बनाम असंभव समझौता: कुछ लेखक मानते हैं कि रक्षा-सूत्र (क्रिप्स-जॉनसन फ़ॉर्मूला) पर सहमति बहुत निकट थी और कांग्रेस स्वीकार करने के कगार पर थी। जॉनसन का स्वयं का आकलन था कि क्रिप्स को अधिक अधिकार मिले होते तो नेहरू के साथ मामला जल्दी सुलझ सकता था।
➣ दूसरी ओर ब्रिटिश पक्ष (जैसे लॉर्ड सैलिसबरी) का कहना था कि सब दलों का एक साथ मान जाना चमत्कार होता, और कांग्रेस ने अंतिम क्षण पर ऐसी माँग रखी जो स्वीकार्य नहीं हो सकती थी। यह प्रश्न इसलिए विवादित है कि निर्णायक बिंदु (अंतरिम सरकार का स्वरूप) पर दोनों पक्षों के वृत्तांत भिन्न हैं।
➣ विभाजन के प्रश्न पर व्याख्याएँ (इरादा बनाम परिणाम): प्रांतों को अलग होने का अधिकार तीन तरह से पढ़ा गया-(क) पाकिस्तान के सिद्धांत की परोक्ष स्वीकृति। लीग ने स्वयं इसे परोक्ष मान्यता कहा, और ब्रिटिश संसद में लॉर्ड कैटो ने भी इसे पाकिस्तान के सिद्धांत की स्वीकृति माना।
➣ (ख) बहुसंख्यक के स्वशासन के मार्ग में अल्पसंख्यक के वीटो को रोकने का उपाय: ब्रिटिश सरकार का यही तर्क था, और उसका कहना था कि उद्देश्य एक एकीकृत भारत था।
➣ (ग) लॉर्ड हेली का अनुमान कि इसका उद्देश्य पाकिस्तान बनाना नहीं, बल्कि उग्र हिंदू पक्ष पर लीग से समझौते का दबाव डालना हो सकता था। इरादा जो भी रहा हो, परिणाम स्पष्ट थे:- सिखों की चिंता बढ़ी, रियासतों ने भी अलग होने का दावा रखा, और लीग की माँग को राजनीतिक वैधता मिली।
क्रिप्स मिशन का महत्व
➣ संविधान सभा के सिद्धांत को पहली स्पष्ट स्वीकृति:- क्रिप्स मिशन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह था कि ब्रिटिश सरकार ने पहली बार स्पष्ट रूप से भारत के लिए संविधान सभा के गठन की ठोस रूपरेखा प्रस्तुत की।
➣ संविधान सभा की अवधारणा का विकास इस क्रम में हुआ: 1934 में एम.एन. रॉय ने विचार रखा, 1935 में कांग्रेस ने इसे आधिकारिक माँग बनाया, 1940 के अगस्त प्रस्ताव में ब्रिटेन ने सिद्धांत माना, 1942 में क्रिप्स ने रूपरेखा दी और 1946 में कैबिनेट मिशन योजना से वास्तविक गठन हुआ। यद्यपि क्रिप्स की योजना तत्काल लागू नहीं हो सकी, फिर भी इसी विचार ने आगे चलकर संविधान सभा (1946) के गठन का आधार तैयार किया।
➣ भारतीय संवैधानिक विकास में महत्वपूर्ण मील का पत्थर:- क्रिप्स मिशन भारतीय संवैधानिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण चरण था। इसने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की संवैधानिक समस्या का समाधान केवल ब्रिटिश संसद द्वारा नहीं, बल्कि भारतीय प्रतिनिधियों की भागीदारी से ही संभव होगा।
➣ ब्रिटिश नीति का स्थायी आधार:- सितम्बर 1942 में ब्रिटिश सरकार ने घोषित किया कि प्रारूप घोषणा के मूल सिद्धांत ब्रिटिश ताज एवं संसद की स्थापित नीति हैं। इसका अर्थ था कि बाद की सभी ब्रिटिश योजनाएँ इसी ढाँचे में बनेंगी।
➣ भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हुई:- क्रिप्स मिशन की असफलता से भारतीय नेताओं, विशेषकर महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, का ब्रिटिश सरकार से विश्वास लगभग समाप्त हो गया।
➣ परिणामस्वरूप कांग्रेस कार्यसमिति ने जुलाई 1942 में वर्धा में भारत छोड़ने का आह्वान किया और अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का आरम्भ हुआ, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को निर्णायक दिशा प्रदान की।
➣ भविष्य की संवैधानिक योजनाओं का आधार बना:- यद्यपि क्रिप्स मिशन असफल रहा, फिर भी इसके अनेक संवैधानिक विचार-विशेषकर संविधान सभा एवं भारतीयों द्वारा संविधान निर्माण-को आगे वेवल योजना (1945), कैबिनेट मिशन योजना (1946) तथा स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण की प्रक्रिया में अधिक विकसित रूप में अपनाया गया। रोचक तथ्य यह है कि क्रिप्स स्वयं 1946 के कैबिनेट मिशन (पेथिक-लॉरेंस, क्रिप्स, ए.वी. अलेक्जेंडर) के सदस्य थे।
➣ कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मतभेद और स्पष्ट हुए:- क्रिप्स मिशन की वार्ताओं से यह स्पष्ट हो गया कि भारत की स्वतंत्रता का प्रश्न केवल ब्रिटिश शासन से संबंधित नहीं था, बल्कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच संवैधानिक एवं राजनीतिक मतभेद भी समाधान की राह में बड़ी चुनौती बन चुके थे। प्रांतों के अलग होने के सिद्धांत की परोक्ष स्वीकृति ने पाकिस्तान की माँग को राजनीतिक वैधता की ओर एक कदम आगे बढ़ाया।
क्रिप्स मिशन (1942) का सबसे बड़ा ऐतिहासिक महत्व यह था कि इसमें पहली बार संविधान सभा के गठन का स्पष्ट प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया।
क्रिप्स मिशन: एक नज़र में
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| प्रस्तावों का नाम एवं स्वरूप | औपचारिक नाम प्रारूप घोषणा; लोकप्रिय नाम “क्रिप्स प्रस्ताव/क्रिप्स योजना”। इसे ब्रिटिश युद्ध मंत्रिमंडल एवं उसकी समिति ने 28 फ़रवरी-9 मार्च 1942 के बीच तय किया था। क्रिप्स ने स्पष्ट किया कि योजना पूरी तरह स्वीकार या अस्वीकार की जाए। |
| मिशन प्रमुख | सर स्टैफर्ड क्रिप्स-लॉर्ड प्रिवी सील एवं हाउस ऑफ कॉमन्स के नेता; इससे पहले सोवियत संघ में ब्रिटिश राजदूत; लेबर पार्टी के वामपंथी नेता और नेहरू के मित्र। मिशन लगभग तीन सप्ताह (22 मार्च-12 अप्रैल) चला। |
| ब्रिटिश पक्ष | प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल; भारत सचिव लियो एमरी; वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो; रक्षा-प्रश्न पर कमांडर-इन-चीफ़ (वेवेल) की भी भूमिका रही। |
| तात्कालिक कारण | जापान का युद्ध में प्रवेश (पर्ल हार्बर, 7 दिसम्बर 1941), सिंगापुर (15 फ़रवरी 1942) एवं रंगून (मार्च 1942) का पतन, अगस्त प्रस्ताव की विफलता, तथा अमेरिका एवं चीन का दबाव (च्यांग काई-शेक की भारत-यात्रा 5-21 फ़रवरी 1942)। |
| पूर्ववर्ती प्रस्ताव | अगस्त प्रस्ताव (8 अगस्त 1940): संविधान निर्माण के भारतीय अधिकार के सिद्धांत की पहली स्वीकृति; जुलाई 1941 में वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् में 12 में से 8 भारतीय, पर रक्षा, गृह व वित्त ब्रिटिश नियंत्रण में। |
| कांग्रेस की ओर से | अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आज़ाद तथा जवाहरलाल नेहरू मुख्य वार्ताकार थे (न कि सरदार पटेल)। महात्मा गांधी औपचारिक वार्ताकार नहीं थे; क्रिप्स से उनकी अलग भेंट 27 मार्च को हुई। |
| अन्य वार्ताकार | जिन्ना (मुस्लिम लीग), राजगोपालाचारी (अनौपचारिक), आंबेडकर एवं एम.सी. राजा (अनुसूचित वर्ग), सावरकर (हिंदू महासभा), तेज बहादुर सप्रू एवं जयकर (उदारवादी), सिख नेता (मास्टर तारा सिंह आदि), भारतीय ईसाई, एंग्लो-इंडियन व यूरोपीय प्रतिनिधि, रियासतों के प्रतिनिधि, पंजाब के प्रधानमंत्री सिकंदर हयात ख़ान, तथा अमेरिकी राष्ट्रपति रूज़वेल्ट के निजी प्रतिनिधि कर्नल लुई जॉनसन। |
| प्रमुख तिथियाँ | 11 मार्च (संसद में घोषणा) → 22 मार्च (दिल्ली आगमन; कुछ पुस्तकों में 23 मार्च भी मिलता है) → 30 मार्च (प्रारूप घोषणा प्रकाशित) → 2 अप्रैल (कांग्रेस कार्यसमिति का प्रस्ताव सौंपा गया) → 7 अप्रैल (कार्यसमिति का अस्वीकृति-निर्णय) → 10 अप्रैल (आज़ाद का पत्र) → 11 अप्रैल (अस्वीकृति सार्वजनिक; लीग का प्रस्ताव भी) → 12 अप्रैल (क्रिप्स की वापसी)। विस्तृत क्रम आगे “वार्ता का घटनाक्रम” में है। |
| प्रस्तावों के दो भाग | (1) दीर्घकालिक: युद्धोपरांत संविधान-निर्मात्री निकाय एवं डोमिनियन संघ। (2) तात्कालिक: युद्धकाल में रक्षा ब्रिटिश नियंत्रण में; भारतीय नेताओं की “प्रभावी भागीदारी” का आमंत्रण। |
| मुख्य प्रावधान (संक्षेप में) | निकाय का चुनाव प्रांतीय निचले सदनों के सदस्यों द्वारा एकल निर्वाचक मंडल के रूप में समानुपातिक प्रतिनिधित्व से; संख्या निर्वाचक मंडल की लगभग 1/10; रियासतों के प्रतिनिधि जनसंख्या-अनुपात में नियुक्त; असहमत प्रांतों को संघ से बाहर रहने का अधिकार (बाद में शामिल होने का विकल्प सहित); ब्रिटेन से संधि (अल्पसंख्यक-सुरक्षा सहित); राष्ट्रमंडल से संबंध तय करने की स्वतंत्रता। |
| मुख्य आपत्तियाँ | कांग्रेस: तत्काल सत्ता का अभाव, रक्षा पर ब्रिटिश नियंत्रण, प्रांतों का अलग होने का अधिकार (साथ में रियासती नामित प्रतिनिधि)। मुस्लिम लीग: पाकिस्तान की स्पष्ट स्वीकृति का अभाव। सूत्र: कांग्रेस की 3 + लीग की 1। |
| प्रसिद्ध कथन | गांधी को यह कथन दिया जाता है कि प्रस्ताव डूबते बैंक पर उत्तर-तिथि का चेक है। क्रिप्स से पहली भेंट में उन्होंने अगले विमान से लौट जाने की सलाह भी दी (लुई फ़िशर के अनुसार)। |
| परिणाम | कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग, दोनों द्वारा अस्वीकृत; मिशन असफल; अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन। |
| महत्व एवं आगे की कड़ी | संविधान सभा की पहली विस्तृत रूपरेखा; सितम्बर 1942 में ब्रिटिश सरकार ने घोषणा के सिद्धांतों को “स्थापित नीति” कहा; आगे वेवेल योजना (1945) → कैबिनेट मिशन (1946, क्रिप्स स्वयं सदस्य) → संविधान सभा की पहली बैठक (9 दिसम्बर 1946)। |
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ क्रिप्स मिशन 22 मार्च, 1942 ई. को सर स्टैफर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में भारत पहुँचा था।
➣ 30 मार्च, 1942 ई. को क्रिप्स मिशन ने अपने संवैधानिक प्रस्ताव सार्वजनिक किए।
➣ क्रिप्स मिशन भेजने के प्रमुख कारण थे-अगस्त प्रस्ताव (1940) की असफलता, जापान का द्वितीय विश्वयुद्ध में प्रवेश, सिंगापुर एवं बर्मा पर जापानी अधिकार तथा अमेरिका, चीन एवं अन्य मित्र राष्ट्रों का ब्रिटेन पर बढ़ता राजनीतिक दबाव।
➣ क्रिप्स मिशन ने प्रस्ताव रखा कि द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस प्रदान किया जाएगा।
➣ क्रिप्स मिशन ने पहली बार संविधान सभा के गठन का स्पष्ट प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जो भारत का नया संविधान तैयार करेगी।
➣ प्रस्तावित संविधान सभा का चुनाव प्रांतीय विधानमंडलों के निचले सदनों के सदस्यों को एकल निर्वाचक मंडल मानकर समानुपातिक प्रतिनिधित्व से होना था; उसकी संख्या निर्वाचक मंडल की लगभग एक-दसवीं होती। देशी रियासतों के प्रतिनिधियों को उनके शासकों द्वारा नियुक्त किया जाना था।
➣ क्रिप्स मिशन के अनुसार यदि कोई ब्रिटिश भारतीय प्रांत नए भारतीय संघ में सम्मिलित नहीं होना चाहता, तो उसे संघ से बाहर रहने का अधिकार होगा और बाद में शामिल होने का विकल्प भी। इस प्रावधान को आगे चलकर भारत के विभाजन की संभावना से भी जोड़ा गया।
➣ मिशन के प्रस्तावों में द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति तक रक्षा विभाग को ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण में रखने की व्यवस्था की गई थी, जिसे कांग्रेस ने प्रमुख आपत्तियों में से एक माना।
➣ महात्मा गांधी ने क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों को डूबते हुए बैंक का उत्तर-तिथि चेक कहा, क्योंकि इनमें तत्काल सत्ता हस्तांतरण के स्थान पर भविष्य के आश्वासन दिए गए थे।
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने क्रिप्स मिशन को तत्काल सत्ता हस्तांतरण, रक्षा विभाग पर ब्रिटिश नियंत्रण तथा प्रांतों को संघ से अलग होने के अधिकार के कारण अस्वीकार कर दिया।
➣ मुस्लिम लीग ने क्रिप्स मिशन को इसलिए अस्वीकार किया क्योंकि इसमें पाकिस्तान अथवा पृथक मुस्लिम राष्ट्र की माँग को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया गया था।
➣ क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन (अगस्त 1942) प्रारम्भ हुआ, जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को निर्णायक दिशा प्रदान की।
➣ यद्यपि क्रिप्स मिशन असफल रहा, फिर भी इसके द्वारा प्रस्तुत संविधान सभा एवं भारतीयों द्वारा संविधान निर्माण की अवधारणा को आगे कैबिनेट मिशन योजना (1946) में अधिक विकसित रूप में स्वीकार किया गया।
➣ क्रिप्स मिशन (1942) भारतीय संवैधानिक इतिहास की पहली ऐसी योजना थी, जिसमें संविधान सभा के गठन का स्पष्ट एवं विस्तृत प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया।
➣ भारतीय संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसम्बर 1946 को हुई, जो कैबिनेट मिशन योजना के आधार पर बनी थी, न कि क्रिप्स योजना के आधार पर।
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