अगस्त प्रस्ताव (1940) : परिचय
➣ अगस्त प्रस्ताव ब्रिटिश सरकार द्वारा 8 अगस्त 1940 को भारत की संवैधानिक समस्या के समाधान के उद्देश्य से घोषित एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रस्ताव था। यह प्रस्ताव तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा प्रस्तुत किया गया।
➣ इसका उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय नेताओं का सहयोग प्राप्त करना तथा भारत में उत्पन्न राजनीतिक गतिरोध को समाप्त करना था। यह समय द्वितीय विश्व युद्ध (1939–45) का था और ब्रिटेन को युद्ध में भारत के राजनीतिक एवं आर्थिक सहयोग की आवश्यकता थी।
➣ दूसरी ओर, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत को बिना किसी परामर्श के युद्ध में शामिल किए जाने का विरोध करते हुए अपने प्रांतीय मंत्रिमंडलों से इस्तीफा दे दिया था। ऐसी परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं को आश्वस्त करने के लिए अगस्त प्रस्ताव की घोषणा की।
➣ मानक स्रोतों के अनुसार अगस्त प्रस्ताव में पहली बार ब्रिटिश सरकार ने सिद्धांततः स्वीकार किया कि युद्ध समाप्त होने के बाद भारतीयों पर अपना संविधान बनाने की प्रमुख जिम्मेदारी होगी (कॉमनवेल्थ के भीतर और ब्रिटिश दायित्वों के अधीन)।
➣ साथ ही यह भी आश्वासन दिया गया कि संवैधानिक समीक्षा में अल्पसंख्यकों के विचारों को पूरा महत्व दिया जाएगा तथा प्रमुख समुदाय द्वारा अस्वीकृत व्यवस्था को सत्ता नहीं सौंपी जाएगी।
➣ यद्यपि अगस्त प्रस्ताव तत्कालीन राजनीतिक संकट का समाधान नहीं कर सका और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसे अस्वीकार कर दिया तथा मुस्लिम लीग ने अल्पसंख्यक-संबंधी आश्वासन का स्वागत करते हुए भी इसे अंतिम समाधान के रूप में स्वीकार नहीं किया।
➣ फिर भी भारतीय संवैधानिक विकास के इतिहास में इसका विशेष महत्व है। आगे चलकर क्रिप्स मिशन (1942) जैसी भावी संवैधानिक योजनाओं में इसी गतिरोध के समाधान के प्रयास दिखाई देते हैं।
अगस्त प्रस्ताव की पृष्ठभूमि
द्वितीय विश्वयुद्ध और कांग्रेस की प्रतिक्रिया
➣ भारत सरकार अधिनियम, 1935 के प्रांतीय स्वायत्तता संबंधी भाग के अंतर्गत 1937 में हुए चुनावों के बाद कांग्रेस ने अनेक प्रांतों में मंत्रिमंडल बनाए, जो लगभग 28 माह चले।
➣ इसी अवधि में मुस्लिम लीग ने कांग्रेस शासन पर अल्पसंख्यक-विरोधी होने के आरोप लगाए (जैसे पीरपुर रिपोर्ट, शरीफ रिपोर्ट), जिससे कांग्रेस-लीग संबंध पहले से ही तनावपूर्ण थे।
➣ कांग्रेस के भीतर भी मतभेद उभरे। 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन के संकट के बाद सुभाषचंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ दिया और मई 1939 में फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की।
➣ 3 सितम्बर, 1939 ई. को द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारम्भ होते ही तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने भारतीय नेताओं अथवा केन्द्रीय विधानमंडल से कोई परामर्श किए बिना भारत को स्वतः ही युद्धरत राष्ट्र घोषित कर दिया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस एकपक्षीय निर्णय का कड़ा विरोध किया।
➣ उसी दिन भारत रक्षा अध्यादेश लागू कर नागरिक स्वतंत्रताओं को सीमित किया गया और 1935 के अधिनियम में संशोधन कर केंद्र को यह शक्ति दी गई कि वह प्रांतीय स्वायत्तता को निष्प्रभावी कर सके। इसी दौरान 1935 के अधिनियम के संघीय योजना वाले भाग को भी स्थगित कर दिया गया।
➣ कांग्रेस कार्यसमिति ने 7 सितम्बर को वर्धा में बैठक की और 14 सितम्बर, 1939 को एक विस्तृत वक्तव्य जारी कर ब्रिटेन से अपने युद्ध-उद्देश्य स्पष्ट करने तथा यह बताने की माँग की कि वे भारत पर कैसे लागू होंगे। कांग्रेस का स्पष्ट मत था कि बिना राजनीतिक अधिकार दिए भारत से युद्ध में सहयोग की अपेक्षा उचित नहीं है।
➣ इस समय कांग्रेस नेतृत्व के दृष्टिकोण भिन्न थे। प्रचलित मत के अनुसार गांधीजी की सहानुभूति मित्र-राष्ट्रों के साथ थी, नेहरू फासीवाद के विरोधी होते हुए भी स्वतंत्रता के बिना सहयोग के पक्ष में नहीं थे, जबकि बोस युद्ध को ब्रिटिश-विरोधी संघर्ष के अवसर के रूप में देख रहे थे। वायसराय ने इस बीच गांधीजी तथा जिन्ना जैसे नेताओं से भेंट की।
वायसराय का अक्टूबर प्रस्ताव और कांग्रेस मंत्रिमंडलों का त्यागपत्र
➣ कांग्रेस की माँगों के उत्तर में 17 अक्टूबर, 1939 ई. को वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने एक वक्तव्य जारी किया। इसमें तत्काल सत्ता हस्तांतरण अथवा उत्तरदायी सरकार की माँग स्वीकार नहीं की गई।
➣ आज़ाद के शब्दों में इस वक्तव्य में स्वतंत्रता और लोकतंत्र जैसे शब्द तक नहीं थे और वह केवल 1919/1935 के अधिनियमों की पुरानी नीति को दोहराता था।
➣ केवल इतना आश्वासन दिया गया कि युद्ध समाप्त होने के बाद भारत सरकार अधिनियम, 1935 में आवश्यक संशोधनों पर विचार किया जाएगा तथा विभिन्न दलों के प्रतिनिधियों को सम्मिलित कर एक परामर्शदात्री समिति गठित की जाएगी।
➣ 22 अक्टूबर, 1939 को वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति ने इस वक्तव्य को पूर्णतः असंतोषजनक बताते हुए अस्वीकार कर दिया और घोषणा की कि वह ब्रिटेन को समर्थन नहीं दे सकती, क्योंकि यह उस साम्राज्यवादी नीति का समर्थन होगा जिसे कांग्रेस समाप्त करना चाहती है।
➣ इसके पहले कदम के रूप में आठ प्रांतों के कांग्रेस मंत्रिमंडलों से त्यागपत्र देने का आह्वान किया गया। 23 नवम्बर, 1939 को इलाहाबाद में कार्यसमिति ने भारत की स्वतंत्रता की मान्यता की माँग पुनः दोहराई। इसके परिणामस्वरूप अक्टूबर-नवंबर 1939 ई. में कांग्रेस के प्रांतीय मंत्रिमंडलों ने विरोधस्वरूप सामूहिक रूप से त्यागपत्र दे दिया।
➣ कांग्रेस मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र से मुस्लिम लीग को अपनी राजनीतिक स्थिति सुदृढ़ करने का अवसर मिला और उसने कांग्रेस शासन के अंत का स्वागत किया। इससे कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक मतभेद और अधिक गहरे हो गए।
➣ 22 दिसम्बर, 1939 को मोहम्मद अली जिन्ना के आह्वान पर मुस्लिम लीग ने कांग्रेस मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र की खुशी में मुक्ति दिवस मनाया। इसे डॉ. भीमराव अम्बेडकर तथा पेरियार (ई.वी. रामास्वामी) जैसे नेताओं का भी समर्थन मिला।
रामगढ़ अधिवेशन, लाहौर प्रस्ताव और ब्रिटेन की बदलती स्थिति
➣ जनवरी 1940 में बम्बई के ओरिएंट क्लब में लिनलिथगो ने घोषणा की कि युद्ध के बाद “वेस्टमिंस्टर प्रकार” का डोमिनियन स्टेटस ब्रिटिश नीति का लक्ष्य है। यह रामगढ़ अधिवेशन से ठीक पहले की ब्रिटिश स्थिति थी।
➣ मार्च 1940 ई. (19-20 मार्च) में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की अध्यक्षता में हुए रामगढ़ अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य दोहराया, भारत को उसकी सहमति के बिना युद्ध में झोंके जाने का विरोध किया और स्वतंत्र भारत का संविधान बनाने के लिए संविधान सभा की माँग को औपचारिक रूप से अपनाया। साथ ही यह भी कहा गया कि संगठन के तैयार होने पर अथवा संकट की स्थिति में सविनय अवज्ञा आरंभ की जाएगी।
➣ रामगढ़ में ही सुभाषचंद्र बोस ने (फॉरवर्ड ब्लॉक के माध्यम से) समझौता-विरोधी सम्मेलन आयोजित किया। बोस को जुलाई 1940 में गिरफ्तार कर लिया गया।
➣ लगभग इसी समय मुस्लिम लीग ने अपने लाहौर अधिवेशन (22-24 मार्च, 1940) में 24 मार्च को लाहौर प्रस्ताव (प्रस्तावक: फजलुल हक) पारित कर पृथक मुस्लिम राष्ट्र की माँग को औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया। अधिवेशन में जिन्ना ने अपने अध्यक्षीय भाषण में द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को स्पष्ट किया। इससे भारत की राजनीतिक समस्या और अधिक जटिल हो गई।
➣ इसी बीच यूरोप में नाज़ी जर्मनी की लगातार सैन्य सफलताओं, विशेषकर बेल्जियम, हॉलैंड एवं फ्रांस के पतन के कारण ब्रिटेन की स्थिति अत्यंत संकटपूर्ण हो गई। ऐसी परिस्थिति में युद्ध जारी रखने के लिए ब्रिटेन को भारत के राजनीतिक, आर्थिक एवं सैन्य सहयोग की तत्काल आवश्यकता थी।
पूना-दिल्ली प्रस्ताव
➣ मई 1940 में विंस्टन चर्चिल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने और एल.एस. एमरी भारत सचिव नियुक्त हुए।
➣ फ्रांस के पतन के बाद जून-जुलाई 1940 में कांग्रेस ने पूना तथा दिल्ली (3-7 जुलाई) की कार्यसमिति बैठकों में प्रस्ताव पारित किया कि यदि ब्रिटेन भारत की स्वतंत्रता की घोषणा करे और केंद्र में राष्ट्रीय सरकार बनाए, तो कांग्रेस युद्ध-प्रयास में सहयोग देगी। इसे पूना प्रस्ताव भी कहा जाता है। अहिंसा के आधार पर गांधीजी इस नीति से असहमत थे और उन्होंने स्वयं को नेतृत्व से अलग कर लिया था।
➣ इन सभी परिस्थितियों—द्वितीय विश्वयुद्ध, कांग्रेस मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र, मुस्लिम लीग की बढ़ती राजनीतिक दावेदारी तथा यूरोप में ब्रिटेन की बिगड़ती सैन्य स्थिति—के दबाव में वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने 8 अगस्त, 1940 ई. को शिमला से एक नई संवैधानिक घोषणा की, जिसे इतिहास में अगस्त प्रस्ताव के नाम से जाना जाता है। इसे वस्तुतः कांग्रेस के पूना-दिल्ली प्रस्तावों पर ब्रिटिश सरकार का उत्तर माना जाता है।
सितम्बर 1939 से अगस्त 1940 तक : घटनाक्रम
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 3 सितम्बर 1939 | भारत युद्धरत घोषित; भारत रक्षा अध्यादेश; 1935 के अधिनियम में संशोधन |
| 14 सितम्बर 1939 | कांग्रेस कार्यसमिति का वक्तव्य : युद्ध-उद्देश्य स्पष्ट करने की माँग |
| 17 अक्टूबर 1939 | लिनलिथगो का वक्तव्य : डोमिनियन स्टेटस का लक्ष्य; युद्धोपरांत 1935 के अधिनियम पर विचार |
| 22 अक्टूबर 1939 | कार्यसमिति (वर्धा) द्वारा अस्वीकृति; मंत्रिमंडलों को त्यागपत्र का आह्वान |
| अक्टूबर-नवंबर 1939 | कांग्रेस मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र |
| 22 दिसम्बर 1939 | मुस्लिम लीग द्वारा मुक्ति दिवस |
| जनवरी 1940 | लिनलिथगो : वेस्टमिंस्टर प्रकार के डोमिनियन स्टेटस का लक्ष्य |
| 19-20 मार्च 1940 | कांग्रेस का रामगढ़ अधिवेशन (अध्यक्ष : आज़ाद); संविधान सभा की औपचारिक माँग |
| 22-24 मार्च 1940 | मुस्लिम लीग का लाहौर अधिवेशन; 24 मार्च को लाहौर प्रस्ताव |
| मई-जून 1940 | चर्चिल प्रधानमंत्री; बेल्जियम, हॉलैंड, फ्रांस का पतन |
| जून-जुलाई 1940 | कांग्रेस के पूना-दिल्ली (3-7 जुलाई) प्रस्ताव |
| 8 अगस्त 1940 | शिमला से अगस्त प्रस्ताव की घोषणा |
महत्वपूर्ण तथ्य: अगस्त प्रस्ताव कोई अकेली घोषणा नहीं थी। यह युद्ध में भारत को बिना परामर्श शामिल करने, 17 अक्टूबर 1939 के असंतोषजनक वक्तव्य, कांग्रेस मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र, लाहौर प्रस्ताव तथा कांग्रेस के पूना-दिल्ली प्रस्तावों की शृंखला की परिणति थी।
लिनलिथगो का वक्तव्य (1939) एवं अगस्त प्रस्ताव (1940) में अंतर
➣ 17 अक्टूबर, 1939 को वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा जारी वक्तव्य और 8 अगस्त, 1940 को घोषित अगस्त प्रस्ताव दोनों वायसराय के वक्तव्य थे, परंतु दूसरा पहले की घोषणा का स्पष्टीकरण एवं विस्तार था।
➣ अगस्त 1940 के वक्तव्य में स्वयं कहा गया कि दो मुख्य संदेह शेष हैं:- भारत के संवैधानिक भविष्य के प्रति ब्रिटिश सरकार की मंशा तथा अल्पसंख्यकों की सुरक्षा। साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि अक्टूबर 1939 की घोषणा 1935 के अधिनियम के किसी भी भाग की समीक्षा को नहीं रोकती।
| आधार | लिनलिथगो का वक्तव्य (17 अक्टूबर 1939) | अगस्त प्रस्ताव (8 अगस्त 1940) |
|---|---|---|
| स्वरूप | वायसराय का वक्तव्य; कांग्रेस की युद्ध-उद्देश्य संबंधी माँग का उत्तर। | वायसराय का वक्तव्य, जो ब्रिटिश सरकार (HMG) के अधिकार से दिया गया; अक्टूबर 1939 की घोषणा का स्पष्टीकरण एवं विस्तार। |
| घोषणा का कारण | द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रारम्भ के बाद कांग्रेस की आपत्तियों का उत्तर देना। | कांग्रेस के पूना-दिल्ली प्रस्तावों का उत्तर, फ्रांस के पतन के बाद ब्रिटेन पर बढ़ता दबाव तथा दलों के आपसी समझौते की प्रतीक्षा छोड़कर आगे बढ़ना। |
| डोमिनियन स्टेटस | ब्रिटिश नीति का लक्ष्य दोहराया गया (इरविन घोषणा, 1929 से चला आ रहा)। | लक्ष्य के रूप में पुनः दोहराया गया; नई व्यवस्था कॉमनवेल्थ के भीतर। |
| संवैधानिक आश्वासन | युद्ध के बाद 1935 के अधिनियम में संशोधन पर विचार करने का सामान्य आश्वासन। | युद्ध के बाद यथासंभव शीघ्र भारत के प्रमुख तत्त्वों का प्रतिनिधि निकाय बनाने पर सहमति; ढाँचा बनाने की प्रमुख जिम्मेदारी भारतीयों की; किंतु कॉमनवेल्थ के भीतर तथा ब्रिटिश दायित्वों के अधीन। |
| निकाय की प्रकृति | केवल परामर्शदात्री समिति; कोई संविधान निर्माता निकाय नहीं। | युद्धोत्तर प्रतिनिधि निकाय (संविधान सभा शब्द का प्रयोग नहीं, वयस्क मताधिकार से चुनाव नहीं)। |
| तत्काल कदम | कार्यकारिणी परिषद् के विस्तार की बात कही गई, किंतु प्रांतों में प्रमुख दलों की सहमति को पूर्व-शर्त रखा गया। | प्रांतीय सहमति की शर्त छोड़कर कुछ प्रतिनिधि भारतीयों को कार्यकारिणी परिषद् में लेने तथा रियासतों व अन्य हितों सहित युद्ध सलाहकार परिषद् बनाने की घोषणा। |
| अल्पसंख्यकों का प्रश्न | विभिन्न समुदायों, दलों एवं हितों तथा रियासतों से परामर्श की बात कही गई। | अल्पसंख्यकों के विचारों को पूरा महत्व देने तथा किसी प्रमुख समुदाय द्वारा अस्वीकृत व्यवस्था को सत्ता न सौंपने (वीटो जैसी शर्त) का स्पष्ट आश्वासन। |
| तत्काल राष्ट्रीय सरकार की माँग | अस्वीकृत। | अस्वीकृत; पूना-दिल्ली प्रस्तावों की माँग का सीधा उत्तर नहीं दिया गया। |
| परिणाम | कांग्रेस ने अस्वीकार किया (22 अक्टूबर 1939, वर्धा) और मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दे दिया। | कांग्रेस ने अस्वीकार किया (कार्यसमिति, वर्धा; अखिल भारतीय कांग्रेस समिति, बम्बई, 15-16 सितम्बर 1940), मुस्लिम लीग ने भी इसे अंतिम समाधान नहीं माना; आगे व्यक्तिगत सत्याग्रह (17 अक्टूबर 1940) आरंभ हुआ। |
| समानता | दोनों में डोमिनियन स्टेटस को लक्ष्य बताया गया, तत्काल राष्ट्रीय सरकार की माँग अस्वीकार की गई, कांग्रेस ने दोनों को अस्वीकार किया और संवैधानिक गतिरोध बना रहा। | |
➣ अगस्त प्रस्ताव ने 17 अक्टूबर 1939 के वक्तव्य से चार बातों में आगे कदम बढ़ाया: (1) कार्यकारिणी परिषद् के विस्तार की प्रांतीय सहमति की शर्त हटाई गई, (2) युद्ध सलाहकार परिषद् की घोषणा हुई, (3) युद्ध के बाद भारतीयों द्वारा ढाँचा बनाने के लिए प्रतिनिधि निकाय पर सहमति जताई गई, (4) प्रमुख समुदाय द्वारा अस्वीकृत व्यवस्था को सत्ता न सौंपने की शर्त जोड़ी गई। दोनों में डोमिनियन स्टेटस लक्ष्य रहा और तत्काल राष्ट्रीय सरकार की माँग अस्वीकार हुई।
अगस्त प्रस्ताव (1940) की प्रमुख घोषणाएँ
तत्काल घोषणाएँ
➣ कार्यकारिणी परिषद् के विस्तार की घोषणा:- वायसराय को कुछ प्रतिनिधि भारतीयों को अपनी कार्यकारिणी परिषद् में आमंत्रित करने के लिए अधिकृत किया गया। अक्टूबर 1939 में इसके लिए प्रांतों में दलों की सहमति की शर्त रखी गई थी, किंतु अब ब्रिटिश सरकार ने दलों के मतभेदों के कारण इसे और टालना उचित नहीं समझा। इसका वास्तविक विस्तार जुलाई 1941 में हुआ।
➣ युद्ध सलाहकार परिषद् की स्थापना:- नियमित अंतराल पर बैठने वाली इस परिषद् में देशी रियासतों तथा भारत के राष्ट्रीय जीवन के अन्य हितों के प्रतिनिधि होने थे। उद्देश्य था युद्ध-संचालन में भारतीय जनमत को केंद्र सरकार से अधिक निकटता से जोड़ना।
युद्ध के बाद के लिए घोषणाएँ
➣ डोमिनियन स्टेटस का पुनः आश्वासन:- अक्टूबर 1939 की घोषणा के अनुरूप ब्रिटिश सरकार ने दोहराया कि भारत के लिए डोमिनियन स्टेटस ही उसका लक्ष्य है। यह लक्ष्य पहली बार इरविन घोषणा (1929) में स्पष्ट हुआ था, इसलिए यह नई बात नहीं थी। तत्काल स्वतंत्रता अथवा स्वशासन का कोई आश्वासन नहीं दिया गया।
➣ भारतीयों द्वारा संविधान निर्माण की सैद्धांतिक स्वीकृति:- वक्तव्य में कहा गया कि नई संवैधानिक योजना के निर्माण की प्रमुख जिम्मेदारी भारतीयों की ही होगी और वह भारतीय जीवन की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक संरचना की भारतीय अवधारणाओं से उपजनी चाहिए।
इसके लिए युद्ध की समाप्ति के बाद, यथासंभव शीघ्र, भारत के प्रमुख तत्त्वों के प्रतिनिधि निकाय की स्थापना पर सहमति जताई गई। मानक स्रोतों के अनुसार यह भारतीयों के संविधान निर्माण के अधिकार की पहली औपचारिक स्वीकृति थी।➣ अल्पसंख्यकों के विचारों को पूरा महत्व:- ब्रिटिश सरकार ने कहा कि 1935 के अधिनियम अथवा उसके आधारभूत सिद्धांतों की समीक्षा में अल्पसंख्यकों के विचारों को पूरा महत्व दिया जाएगा। ध्यान दें: पाठ्यपुस्तकों में इसे प्रायः अल्पसंख्यकों की सहमति कहा जाता है, जबकि मूल वक्तव्य में “पूरा महत्व” देने तथा प्रमुख तत्त्वों द्वारा अस्वीकृत व्यवस्था को सत्ता न सौंपने की बात है।
तत्काल एवं युद्धोपरांत घोषणाएँ
| समय | घोषणा |
|---|---|
| तत्काल | कार्यकारिणी परिषद् में कुछ प्रतिनिधि भारतीयों को शामिल करना; रियासतों एवं अन्य हितों के प्रतिनिधियों सहित युद्ध सलाहकार परिषद् का गठन। |
| युद्ध के दौरान | कोई मूलभूत संवैधानिक परिवर्तन नहीं। |
| युद्ध के बाद | यथासंभव शीघ्र भारत के प्रमुख तत्त्वों के प्रतिनिधि निकाय की स्थापना, जो नए संविधान का ढाँचा तैयार करे (कॉमनवेल्थ के भीतर, ब्रिटिश दायित्वों के अधीन)। |
| सतत शर्त | किसी प्रमुख समुदाय द्वारा सीधे अस्वीकृत व्यवस्था को सत्ता न सौंपना; निकाय के स्वरूप पर भारतीय दलों से आपसी सहमति की अपेक्षा। |
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य: अगस्त प्रस्ताव (1940) की सबसे महत्वपूर्ण घोषणा यह थी कि मानक ग्रंथों के अनुसार ब्रिटिश सरकार ने पहली बार सिद्धांततः स्वीकार किया कि भारतीय अपने संविधान के निर्माण की प्रमुख जिम्मेदारी स्वयं उठाएँगे (कॉमनवेल्थ के भीतर, ब्रिटिश दायित्वों के अधीन और युद्ध के बाद)। साथ ही किसी प्रमुख समुदाय द्वारा अस्वीकृत व्यवस्था को सत्ता न सौंपने की शर्त ने व्यवहार में मुस्लिम लीग को वीटो जैसी स्थिति दे दी।
शर्तें एवं सीमाएँ
➣ संविधान निर्माण की सशर्त स्वीकृति:- नई व्यवस्था ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के भीतर बननी थी, ब्रिटेन ने अपने दीर्घकालीन संबंधों से उपजे दायित्वों से मुक्त होने से इनकार किया, और प्रस्तावित निकाय वयस्क मताधिकार से चुनी गई संविधान सभा नहीं था।
➣ युद्ध के दौरान कोई मूलभूत संवैधानिक परिवर्तन नहीं:- वक्तव्य में स्पष्ट कहा गया कि जब कॉमनवेल्थ अस्तित्व के संघर्ष में लगा हो, तब मूलभूत संवैधानिक प्रश्नों का निर्णायक समाधान संभव नहीं है। निकाय का गठन युद्ध की समाप्ति के बाद ही होना था। यह कांग्रेस द्वारा अस्वीकृति का एक प्रमुख कारण बना।
➣ भारतीय दलों से आपसी सहमति की अपेक्षा:- ब्रिटिश सरकार ने कहा कि वह भारतीय नेताओं द्वारा उठाए गए हर सच्चे और व्यावहारिक कदम का स्वागत करेगी, जिससे युद्धोत्तर निकाय के स्वरूप एवं कार्यप्रणाली तथा संविधान के सिद्धांतों एवं रूपरेखा पर आपसी सहमति बन सके। इससे गतिरोध दूर करने का भार भारतीय दलों पर डाल दिया गया।
➣ प्रमुख समुदाय द्वारा अस्वीकृत व्यवस्था को सत्ता न सौंपना (वीटो):- ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट किया कि वह अपनी वर्तमान जिम्मेदारियाँ ऐसी किसी शासन-व्यवस्था को नहीं सौंप सकती, जिसके अधिकार को भारत के राष्ट्रीय जीवन के बड़े और शक्तिशाली तत्त्व सीधे अस्वीकार करते हों, और न ही वह ऐसे तत्त्वों को बलपूर्वक उसके अधीन करने में सहभागी बनेगी। ध्यान दें: शब्द सामान्य थे और किसी भी बड़े तत्त्व पर लागू हो सकते थे, परंतु व्यवहार में इसका लाभ मुस्लिम लीग को मिला और उसे वीटो जैसी स्थिति प्राप्त हो गई।
भारतीय नेताओं एवं राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
➣ कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव का विरोध इसलिए किया क्योंकि उसमें तत्काल उत्तरदायी सरकार का प्रावधान नहीं था, जबकि मुस्लिम लीग ने प्रारंभ में इसके उस प्रावधान का स्वागत किया, जिसमें प्रमुख समुदाय द्वारा अस्वीकृत व्यवस्था को सत्ता न सौंपने का आश्वासन था (जिसे प्रायः अल्पसंख्यकों की सहमति कहा जाता है), किंतु पाकिस्तान की माँग पर स्पष्टता न होने के कारण इसे स्वीकार नहीं किया।
➣ यही अंतर आगे चलकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग की राजनीतिक रणनीतियों में और अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
अगस्त प्रस्ताव (1940) पर कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया : समानता एवं असमानता
| आधार | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | मुस्लिम लीग |
|---|---|---|
| अंतिम निर्णय | अगस्त प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। | प्रारंभ में वीटो-आश्वासन का स्वागत किया, परंतु पाकिस्तान पर स्पष्टता के अभाव में इसे स्वीकार नहीं किया (लीग कार्यसमिति, 1-2 सितम्बर 1940)। |
| मुख्य आपत्ति | तत्काल उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार एवं सत्ता हस्तांतरण का प्रावधान नहीं था। | प्रस्ताव उसकी सभी राजनीतिक अपेक्षाओं को पूरा नहीं करता था तथा कोई अंतिम संवैधानिक समाधान प्रस्तुत नहीं करता था। |
| अल्पसंख्यकों का प्रश्न | प्रमुख समुदाय द्वारा अस्वीकृत व्यवस्था को सत्ता न सौंपने की वीटो जैसी शर्त का विरोध किया, क्योंकि इससे राष्ट्रीय निर्णय बाधित हो सकते थे। | वीटो जैसी शर्त का स्वागत किया और इसे अपने राजनीतिक हितों की सुरक्षा माना। |
| राजनीतिक दृष्टिकोण | भारत में तत्काल उत्तरदायी एवं राष्ट्रीय सरकार के गठन पर बल दिया। | भविष्य के संवैधानिक निर्णयों में मुस्लिम लीग की निर्णायक भूमिका सुनिश्चित करना चाहती थी। |
| प्रमुख नेता का दृष्टिकोण | कांग्रेस ने प्रस्ताव को अपर्याप्त एवं निराशाजनक माना। गांधीजी ने कहा कि इससे राष्ट्रवादी भारत और ब्रिटिश शासकों के बीच की खाई और चौड़ी हो गई, तथा नेहरू ने डोमिनियन स्टेटस की अवधारणा को निष्प्राण बताया। | मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में लीग ने वीटो-आश्वासन का स्वागत किया, किन्तु पाकिस्तान की स्पष्ट मान्यता के बिना प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। |
| समानता | दोनों दल अगस्त प्रस्ताव (1940) से पूर्णतः संतुष्ट नहीं थे। परिणामस्वरूप भारत का संवैधानिक गतिरोध बना रहा और आगे क्रिप्स मिशन (1942) जैसे प्रयास हुए। | |
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य: कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव का विरोध तत्काल सत्ता हस्तांतरण के अभाव के कारण किया, जबकि मुस्लिम लीग ने वीटो जैसी शर्त का स्वागत किया, परंतु पाकिस्तान की माँग पर स्पष्टता न होने के कारण उसे स्वीकार नहीं किया।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रतिक्रिया
➣ अस्वीकृति कई चरणों में हुई। कांग्रेस कार्यसमिति (वर्धा) ने 21 अगस्त 1940 को प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए पूर्ण स्वतंत्रता की माँग दोहराई और 15-16 सितम्बर 1940 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (बम्बई) ने भी इसे अस्वीकार कर दिया।
➣ इससे पहले पूना-दिल्ली प्रस्तावों में कांग्रेस ने राष्ट्रीय सरकार की शर्त पर युद्ध-सहयोग का प्रस्ताव रखा था और गांधीजी अहिंसा के आधार पर उससे असहमत होकर नेतृत्व से अलग हो गए थे। बम्बई प्रस्ताव (सितम्बर 1940) द्वारा पूना प्रस्ताव वापस ले लिया गया और कांग्रेस ने पुनः गांधीजी को नेतृत्व सौंपा।
➣ इस अवधि में कांग्रेस के भीतर नीति को लेकर बहस चली। राजगोपालाचारी जैसे नेता सशर्त युद्ध-सहयोग की नीति के समर्थक माने जाते हैं, जबकि गांधीजी अहिंसा के आधार पर युद्ध में किसी भी प्रकार के सहयोग के विरुद्ध थे। अगस्त प्रस्ताव के अस्वीकार होने के बाद यह बहस गांधीजी की पद्धति के पक्ष में निपटी।
➣ कांग्रेस की सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि प्रस्ताव में तत्काल उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार, स्वशासन अथवा सत्ता हस्तांतरण का कोई प्रावधान नहीं था। ब्रिटिश सरकार ने केवल भविष्य के संवैधानिक सुधारों का अस्पष्ट आश्वासन दिया था। कांग्रेस का मानना था कि यदि ब्रिटेन वास्तव में भारतीयों का सहयोग चाहता है, तो उसे पहले भारतीयों को वास्तविक राजनीतिक अधिकार सौंपने चाहिए।
➣ कांग्रेस ने इस बात का भी विरोध किया कि भविष्य की संवैधानिक व्यवस्था को प्रमुख समुदाय की अस्वीकृति से जोड़ दिया गया था (वीटो जैसी शर्त)। उसके अनुसार इससे किसी भी एक समुदाय को संवैधानिक परिवर्तन रोकने का प्रभावी अधिकार मिल सकता था, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया तथा राष्ट्रीय एकता प्रभावित होती।
➣ महात्मा गांधी ने अगस्त प्रस्ताव को असंतोषजनक बताया। उन्होंने कहा कि इस घोषणा ने राष्ट्रवादी भारत और ब्रिटिश शासकों के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया है। उनका मत था कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों से युद्ध में सहयोग तो चाहती है, किंतु उन्हें वास्तविक सत्ता देने के लिए तैयार नहीं है।
➣ जवाहरलाल नेहरू ने भी प्रस्ताव की तीव्र आलोचना की। उन्होंने कहा कि डोमिनियन स्टेटस की अवधारणा अब मृतप्राय (“dead as a doornail”) हो चुकी है। उनका मत था कि यह प्रस्ताव भारत की स्वतंत्रता के प्रश्न को टालने का प्रयास मात्र है और इसमें भारतीय जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का समुचित सम्मान नहीं किया गया है।
➣ इस प्रकार कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव को भारत की स्वतंत्रता की माँग के अनुरूप न मानते हुए अस्वीकार कर दिया। आगे चलकर इसी असंतोष की पृष्ठभूमि में महात्मा गांधी के नेतृत्व में व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940–41) प्रारम्भ किया गया।
मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया
➣ मुस्लिम लीग ने अगस्त प्रस्ताव (1940) के वीटो-आश्वासन का प्रारंभ में स्वागत किया। मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में लीग का मत था कि अल्पसंख्यकों के विचारों को पूरा महत्व देने तथा प्रमुख तत्त्वों द्वारा अस्वीकृत व्यवस्था को सत्ता न सौंपने का आश्वासन उसकी राजनीतिक माँगों के अनुकूल था।
➣ इससे लीग को विश्वास हुआ कि भविष्य के संवैधानिक निर्णयों में उसकी सहमति निर्णायक होगी और कांग्रेस अकेले पूरे भारत की प्रतिनिधि संस्था होने का दावा नहीं कर सकेगी।
➣ प्रस्ताव ने अप्रत्यक्ष रूप से लीग को भारत के प्रमुख राजनीतिक पक्षों में से एक के रूप में स्वीकार किया, जिससे जिन्ना की स्थिति सुदृढ़ हुई और आगे की वार्ताओं में लीग की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई।
➣ फिर भी लीग ने अगस्त प्रस्ताव को अंतिम समाधान के रूप में स्वीकार नहीं किया क्योंकि लाहौर प्रस्ताव (1940) में रखी गई पृथक मुस्लिम राष्ट्र की माँग पर प्रस्ताव में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था।
➣ लीग कार्यसमिति (1-2 सितम्बर 1940) ने अल्पसंख्यक-संबंधी खंडों की सराहना की, किंतु स्पष्ट किया कि लाहौर प्रस्ताव की भावना के विरुद्ध कोई योजना स्वीकार्य नहीं होगी। लीग ने अपनी इस माँग को पूर्ववत् बनाए रखा।
➣ जुलाई 1941 में कार्यकारिणी परिषद् के विस्तार और राष्ट्रीय रक्षा परिषद् के गठन के बाद लीग से जुड़े सिकंदर हयात खाँ तथा सादुल्ला ने राष्ट्रीय रक्षा परिषद् से त्यागपत्र दे दिया (ब्रिटिश संसद के हैंसार्ड, 11 सितम्बर 1941 में इसका उल्लेख है)। इसे जिन्ना द्वारा स्वयं को भारतीय मुसलमानों का एकमात्र प्रवक्ता सिद्ध करने और लीग की सौदेबाज़ी की स्थिति दिखाने के प्रयास से जोड़कर देखा जाता है।
अन्य नेताओं एवं ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया
➣ लॉर्ड लिनलिथगो का विश्वास था कि इस प्रस्ताव के माध्यम से भारतीय नेताओं को संवैधानिक प्रक्रिया में शामिल किया जा सकेगा तथा युद्धकाल में ब्रिटिश सरकार को आवश्यक राजनीतिक सहयोग प्राप्त होगा।
➣ दूसरी ओर, हिंदू महासभा सहित कुछ राष्ट्रवादी नेताओं ने प्रस्ताव की आलोचना करते हुए कहा कि वीटो जैसी शर्त जोड़कर ब्रिटिश सरकार ने भारत की राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने का प्रयास किया है। उनके अनुसार इससे किसी एक राजनीतिक समुदाय को संवैधानिक परिवर्तन रोकने का प्रभावी अधिकार मिल गया।
➣ अनेक संवैधानिक विशेषज्ञों का भी मत था कि अगस्त प्रस्ताव में तत्काल उत्तरदायी सरकार, पूर्ण स्वशासन अथवा स्वतंत्रता का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था। इसलिए यह प्रस्ताव भारतीयों की तत्काल राजनीतिक आकांक्षाओं को पूरा करने में सक्षम नहीं था।
➣ देशी रियासतों के प्रतिनिधियों को प्रस्ताव के अनुसार युद्ध सलाहकार परिषद् में स्थान मिलना था और 1941 की राष्ट्रीय रक्षा परिषद् में भी उन्हें प्रतिनिधित्व दिया गया (हैंसार्ड के अनुसार उसमें नौ रियासती प्रतिनिधि थे)। इस प्रकार रियासतों को इस चरण में सहयोगी पक्ष के रूप में जोड़े रखा गया।
➣ समग्र रूप से अगस्त प्रस्ताव न तो कांग्रेस का विश्वास प्राप्त कर सका और न ही मुस्लिम लीग की सभी राजनीतिक अपेक्षाओं को पूरा कर पाया। परिणामस्वरूप भारत का संवैधानिक गतिरोध बना रहा और ब्रिटिश सरकार को आगे चलकर पुन: प्रयास करने पड़े।
अगस्त प्रस्ताव की असफलता के कारण
कांग्रेस की दृष्टि से
➣ वास्तविक सत्ता हस्तांतरण का अभाव:- अगस्त प्रस्ताव में उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार अथवा सत्ता हस्तांतरण का कोई प्रावधान नहीं था। तत्काल केवल वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् में कुछ प्रतिनिधि भारतीयों को शामिल करने और युद्ध सलाहकार परिषद् बनाने की बात थी, परंतु यह विस्तार वायसराय के मनोनयन पर आधारित था, उसके प्रति उत्तरदायी नहीं। शेष सुधार युद्ध के बाद के लिए टाल दिए गए, जिससे भारतीय नेताओं में निराशा उत्पन्न हुई।
➣ पूर्ण स्वतंत्रता के स्थान पर डोमिनियन स्टेटस:- प्रस्ताव में तत्काल स्वतंत्रता या स्वशासन का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं था। केवल भविष्य में डोमिनियन स्टेटस एवं संवैधानिक पुनर्गठन का आश्वासन दिया गया, जिसे कांग्रेस ने अपर्याप्त माना। नई व्यवस्था ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के भीतर तथा ब्रिटेन के दायित्वों के अधीन रखी गई थी, जबकि कांग्रेस पूर्ण स्वराज चाहती थी।
➣ पूना-दिल्ली प्रस्तावों की उपेक्षा:- कांग्रेस ने राष्ट्रीय सरकार की शर्त पर युद्ध-प्रयास में सहयोग का प्रस्ताव रखा था। अगस्त प्रस्ताव ने इस माँग का सीधा उत्तर नहीं दिया, जिससे कांग्रेस के भीतर सहयोग-नीति के समर्थकों की स्थिति कमज़ोर हुई और गांधीजी की अहिंसक विरोध-नीति को बल मिला।
➣ संविधान सभा की माँग की अनदेखी:- कांग्रेस रामगढ़ (1940) में संविधान सभा की माँग को औपचारिक रूप से अपना चुकी थी, परंतु प्रस्ताव में केवल युद्धोत्तर “प्रतिनिधि निकाय” की बात कही गई, जो वयस्क मताधिकार से चुनी गई संविधान सभा नहीं थी।
मुस्लिम लीग की दृष्टि से
➣ पाकिस्तान की माँग पर स्पष्ट आश्वासन का अभाव:- मुस्लिम लीग ने वीटो जैसी शर्त का स्वागत किया, परंतु लाहौर प्रस्ताव (1940) की माँग पर कोई स्पष्ट आश्वासन न मिलने के कारण उसने प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।
संरचनात्मक एवं ब्रिटिश पक्ष के कारण
➣ युद्ध के दौरान कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं, और सहमति का भार भारतीय दलों पर:- प्रस्ताव ने स्पष्ट कर दिया कि युद्ध के दौरान मूलभूत संवैधानिक परिवर्तन संभव नहीं है। युद्धोत्तर निकाय के लिए यथासंभव शीघ्र से आगे कोई निश्चित समय-सीमा भी नहीं दी गई थी।
➣ साथ ही युद्धोत्तर निकाय के स्वरूप और संविधान की रूपरेखा पर सहमति बनाने का दायित्व भी भारतीय दलों पर डाल दिया गया। इससे गतिरोध दूर करने के बजाय कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के मतभेद ही केंद्र में आ गए।
➣ प्रमुख समुदाय के वीटो की शर्त:- ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की कि वह ऐसी किसी व्यवस्था को सत्ता नहीं सौंपेगी, जिसके अधिकार को भारत के राष्ट्रीय जीवन के बड़े और शक्तिशाली तत्त्व सीधे अस्वीकार करते हों।
कांग्रेस का मत था कि इससे मुस्लिम लीग को अप्रत्यक्ष रूप से संवैधानिक परिवर्तनों पर वीटो जैसा अधिकार मिल गया और राष्ट्रीय एकता कमज़ोर हुई।➣ दोनों प्रमुख दलों का विश्वास न मिल पाना:- कांग्रेस ने तत्काल सत्ता हस्तांतरण के अभाव में तथा मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान पर स्पष्टता के अभाव में प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इस प्रकार यह प्रस्ताव किसी भी प्रमुख राजनीतिक दल का विश्वास प्राप्त नहीं कर सका।
➣ युद्धकालीन राजनीतिक परिस्थिति:- फ्रांस के पतन के बाद संकटग्रस्त ब्रिटेन का प्रमुख उद्देश्य भारतीयों का सहयोग और संसाधन प्राप्त करना था, न कि भारत को वास्तविक राजनीतिक अधिकार देना। इसलिए भारतीय नेताओं ने अगस्त प्रस्ताव को व्यावहारिक समाधान के बजाय युद्धकालीन राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य: अगस्त प्रस्ताव की असफलता का मूल कारण यह था कि उसमें तत्काल सत्ता हस्तांतरण नहीं था (कांग्रेस की आपत्ति), पाकिस्तान पर कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं था (मुस्लिम लीग की आपत्ति), और यह पूना-दिल्ली प्रस्तावों का उत्तर देने के बजाय ब्रिटेन की युद्धकालीन रणनीति का हिस्सा माना गया।
अगस्त प्रस्ताव का महत्व
➣ भारतीयों के संविधान निर्माण के अधिकार की पहली औपचारिक स्वीकृति:- मानक स्रोतों के अनुसार अगस्त प्रस्ताव का सबसे बड़ा महत्व यह था कि ब्रिटिश सरकार ने पहली बार आधिकारिक रूप से स्वीकार किया कि भारत के भविष्य के संविधान के निर्माण की प्रमुख जिम्मेदारी भारतीयों की ही होगी।
➣ यद्यपि यह स्वीकृति सशर्त थी (कॉमनवेल्थ के भीतर, ब्रिटिश दायित्वों के अधीन, युद्ध के बाद) और प्रक्रिया अस्पष्ट थी, फिर भी यह भारतीय संवैधानिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
➣ संविधान सभा की दिशा में पूर्व-चरण:- कांग्रेस रामगढ़ (1940) में संविधान सभा की माँग को औपचारिक रूप से अपना चुकी थी। अगस्त प्रस्ताव में संविधान सभा शब्द का प्रयोग नहीं हुआ और केवल प्रतिनिधि निकाय की बात कही गई, फिर भी संविधान निर्माण के भारतीय अधिकार का सिद्धांत स्थापित हुआ। स्पष्ट रूप से संविधान सभा की अवधारणा क्रिप्स प्रस्तावों (1942) में आई और उसके बाद कैबिनेट मिशन (1946) के अंतर्गत साकार हुई।
➣ तत्काल परिणाम (1940-41):- कांग्रेस ने बम्बई प्रस्ताव (सितम्बर 1940) द्वारा पूना प्रस्ताव वापस लिया और नेतृत्व पुनः गांधीजी को सौंपा, जिसके बाद व्यक्तिगत सत्याग्रह आरंभ हुआ।
➣ दूसरी ओर जुलाई 1941 में कार्यकारिणी परिषद् का विस्तार हुआ, जिसके बाद वायसराय के अतिरिक्त उसमें 8 भारतीय और 4 यूरोपीय सदस्य थे, तथा लगभग 30 सदस्यों वाली राष्ट्रीय रक्षा परिषद् बनी। इस प्रकार प्रस्ताव के सीमित प्रावधान लागू हुए, परंतु कांग्रेस ने इन्हें अपनी माँगों की पूर्ति नहीं माना।
➣ डोमिनियन स्टेटस की अवधारणा का अंत:- प्रस्ताव के बाद कांग्रेस ने डोमिनियन स्टेटस की अवधारणा को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया (नेहरू का कथन)। इससे पूर्ण स्वतंत्रता की माँग और सुदृढ़ हुई, जो आगे चलकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि का एक हिस्सा बनी।
➣ सांप्रदायिक राजनीति पर प्रभाव:- प्रमुख समुदाय द्वारा अस्वीकृत व्यवस्था को सत्ता न सौंपने की शर्त ने व्यवहार में मुस्लिम लीग को वीटो जैसी शक्ति दे दी और जिन्ना की सौदेबाज़ी की स्थिति सुदृढ़ हुई।
➣ जुलाई 1941 में लीग से जुड़े कुछ सदस्यों द्वारा राष्ट्रीय रक्षा परिषद् से त्यागपत्र दिया जाना इसी बढ़ती सौदेबाज़ी का संकेत माना जाता है। कई इतिहासकार इस शर्त को विभाजन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानते हैं, क्योंकि आगे की सभी वार्ताओं में लीग की सहमति एक निर्णायक तत्त्व बन गई और कांग्रेस-लीग मतभेद स्पष्ट हो गए।
➣ क्रिप्स मिशन (1942) का संदर्भ:- अगस्त प्रस्ताव के बाद भी संवैधानिक गतिरोध बना रहा। दिसम्बर 1941 में जापान के युद्ध में उतरने के बाद भारत के संसाधनों का महत्व और बढ़ गया, जिससे ब्रिटिश सरकार पर राजनीतिक समाधान का दबाव बना और मार्च 1942 में क्रिप्स मिशन भेजा गया।
➣ ब्रिटिश उद्देश्य एवं नीति में परिवर्तन का संकेत:- यह प्रस्ताव फ्रांस के पतन और ब्रिटेन पर बढ़ते सैन्य दबाव के समय भारत के संसाधनों एवं सहयोग को सुरक्षित रखने की रणनीति भी था, जिसे भारतीय नेताओं ने वास्तविक सत्ता-हस्तांतरण के बजाय युद्धकालीन राजनीतिक चाल के रूप में देखा।
➣ फिर भी इससे यह संकेत मिला कि ब्रिटिश सरकार अब भारत के संवैधानिक भविष्य पर भारतीय नेताओं से विचार-विमर्श की आवश्यकता को स्वीकार करने लगी थी, जो आगे की योजनाओं-क्रिप्स मिशन, वेवल योजना एवं कैबिनेट मिशन-में और स्पष्ट दिखाई देती है।
तुलनात्मक अध्ययन : अगस्त प्रस्ताव, क्रिप्स मिशन एवं कैबिनेट मिशन
| आधार | अगस्त प्रस्ताव (1940) | क्रिप्स मिशन (1942) | कैबिनेट मिशन (1946) |
|---|---|---|---|
| समय / प्रस्तावक | 8 अगस्त 1940; वायसराय लिनलिथगो | मार्च 1942; सर स्टैफर्ड क्रिप्स | 1946 (मार्च में आगमन, 16 मई की योजना); पैथिक लॉरेंस, क्रिप्स, ए.वी. अलेक्जेंडर |
| संविधान निर्माण | युद्धोपरांत “प्रतिनिधि निकाय”; संविधान सभा शब्द का प्रयोग नहीं | प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व से चुनी संविधान सभा; रियासतों के प्रतिनिधि मनोनीत | संविधान सभा (389 सदस्य: 296 ब्रिटिश भारत, 93 रियासतें) |
| भारत की स्थिति | डोमिनियन स्टेटस का लक्ष्य, कॉमनवेल्थ के भीतर | डोमिनियन स्टेटस, कॉमनवेल्थ से अलग होने का अधिकार | स्वतंत्रता की ओर; तीन विषयों (विदेश, रक्षा, संचार) वाला संघ |
| तत्काल व्यवस्था | कार्यकारिणी परिषद् में भारतीयों को शामिल करना; युद्ध सलाहकार परिषद् | युद्ध के दौरान रक्षा ब्रिटेन के हाथ में; भारतीय नेताओं की सीमित भागीदारी | अंतरिम सरकार (वायसराय और कमांडर-इन-चीफ के अलावा सभी भारतीय) |
| अल्पसंख्यक / प्रांत | प्रमुख समुदाय द्वारा अस्वीकृत व्यवस्था को सत्ता नहीं | कोई प्रांत नई व्यवस्था से बाहर रह सकता था | प्रांतों के समूह (A, B, C); पृथक पाकिस्तान अस्वीकृत |
| परिणाम | कांग्रेस ने अस्वीकार किया; लीग ने अंतिम समाधान नहीं माना | कांग्रेस एवं लीग दोनों ने अस्वीकार किया | संविधान सभा का चुनाव हुआ; समूहन की व्याख्या पर कांग्रेस-लीग विवाद |
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ अगस्त प्रस्ताव की घोषणा 8 अगस्त, 1940 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने शिमला से की थी।
➣ 17 अक्टूबर, 1939 का लिनलिथगो का वक्तव्य और 8 अगस्त, 1940 का अगस्त प्रस्ताव दोनों वायसराय के वक्तव्य थे; अगस्त प्रस्ताव ने अक्टूबर 1939 की घोषणा में किए गए संवैधानिक आश्वासनों को अधिक स्पष्ट रूप दिया।
➣ जनवरी 1940 में लिनलिथगो ने भारत के लिए वेस्टमिंस्टर प्रकार के डोमिनियन स्टेटस को लक्ष्य बताया था। डोमिनियन स्टेटस को भारत के संवैधानिक विकास के लक्ष्य के रूप में इरविन घोषणा (1929) में भी स्पष्ट किया गया था।
➣ मई 1940 में विंस्टन चर्चिल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री तथा एल. एस. एमरी भारत सचिव बने। अगस्त प्रस्ताव को कांग्रेस के पूना-दिल्ली प्रस्तावों के संदर्भ में ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है।
➣ अगस्त प्रस्ताव में पहली बार ब्रिटिश सरकार ने सिद्धांततः स्वीकार किया कि युद्ध के बाद भारतीय अपने संविधान के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाएँगे। इसके लिए युद्ध के बाद एक प्रतिनिधि निकाय के गठन की बात कही गई थी; इसमें संविधान सभा शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था।
➣ प्रस्ताव में वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् में अधिक भारतीयों को शामिल करने तथा युद्ध सलाहकार परिषद् के गठन का प्रावधान किया गया। युद्ध सलाहकार परिषद् में रियासतों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाना था।
➣ ब्रिटिश सरकार ने आश्वासन दिया कि भविष्य की किसी संवैधानिक व्यवस्था को भारत के बड़े और शक्तिशाली वर्गों की सहमति के बिना लागू नहीं किया जाएगा। इस प्रावधान ने मुस्लिम लीग को संवैधानिक मामलों में प्रभावी वीटो जैसी स्थिति प्रदान की।
➣ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। कांग्रेस कार्यसमिति ने 21 अगस्त, 1940 को तथा अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने 15-16 सितंबर, 1940 को इसे अस्वीकार किया।
➣ कांग्रेस की मुख्य आपत्ति थी कि अगस्त प्रस्ताव में तत्काल उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार तथा तत्काल सत्ता हस्तांतरण का प्रावधान नहीं था।
➣ मुस्लिम लीग ने अल्पसंख्यकों की सहमति संबंधी आश्वासन का स्वागत किया, लेकिन पाकिस्तान की माँग पर स्पष्ट आश्वासन न मिलने के कारण अगस्त प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। लीग कार्यसमिति ने 1-2 सितंबर, 1940 को इस पर अपना रुख स्पष्ट किया।
➣ अगस्त प्रस्ताव की अस्वीकृति के बाद कांग्रेस ने व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू किया। 17 अक्टूबर, 1940 को विनोबा भावे ने पवनार से पहला व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू किया; जवाहरलाल नेहरू दूसरे सत्याग्रही थे।
➣ व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान “दिल्ली चलो” का नारा उन सत्याग्रहियों से संबंधित था जिन्हें गिरफ्तारी न होने पर दिल्ली की ओर जाने का निर्देश था।
➣ जुलाई 1941 में वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् का विस्तार किया गया। इसमें वायसराय के अतिरिक्त 8 भारतीय और 4 यूरोपीय सदस्य थे। इसी समय लगभग 30 सदस्यों वाली राष्ट्रीय रक्षा परिषद् का गठन किया गया।
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