फॉरवर्ड ब्लॉक (1939)
➣फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना 3 मई 1939 ई. को सुभाष चंद्र बोस ने की थी। इसका उद्देश्य भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर सभी वामपंथी, समाजवादी, किसान, मजदूर तथा राष्ट्रवादी शक्तियों को एक मंच पर संगठित कर स्वतंत्रता आंदोलन को अधिक संघर्षशील और गतिशील बनाना था।
➣फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन ऐसे समय हुआ, जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर स्वतंत्रता प्राप्ति की रणनीति को लेकर गंभीर वैचारिक मतभेद उभर चुके थे।
सुभाष चंद्र बोस का मत था कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, विशेषकर निकट आते द्वितीय विश्व युद्ध, का लाभ उठाकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष प्रारम्भ किया जाना चाहिए। इसके विपरीत कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग महात्मा गांधी के नेतृत्व में चरणबद्ध, अहिंसक एवं संवैधानिक आंदोलन की नीति का समर्थक था।➣इन्हीं मतभेदों की परिणति त्रिपुरी संकट (1939), सुभाष चंद्र बोस के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़े तथा अंततः फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना के रूप में हुई। इस प्रकार फॉरवर्ड ब्लॉक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर उभरी वैचारिक एवं रणनीतिक बहस का परिणाम था।
स्थापना की पृष्ठभूमि
➣ 1930 के दशक के उत्तरार्ध में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुँच चुका था। सविनय अवज्ञा आंदोलन की समाप्ति के बाद कांग्रेस ने अपने संगठन को पुनः सुदृढ़ करने का प्रयास किया।
➣ इसी बीच भारत शासन अधिनियम, 1935 लागू हुआ, जिसके अंतर्गत 1937 ई. में प्रांतीय चुनाव आयोजित किए गए। इन चुनावों में कांग्रेस को उल्लेखनीय सफलता मिली और उसने कई प्रांतों में अपनी सरकारें गठित कीं।
➣ यद्यपि कांग्रेस की प्रांतीय सरकारों ने अनेक जनहितकारी कार्य किए, फिर भी कांग्रेस के भीतर यह प्रश्न उठने लगा कि क्या केवल संवैधानिक एवं प्रांतीय शासन के माध्यम से भारत को पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त हो सकती है।
➣ कांग्रेस के एक वर्ग का मत था कि ब्रिटिश सरकार के साथ सीमित प्रशासनिक सहयोग पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता के लिए अधिक सक्रिय और संघर्षपूर्ण नीति अपनाई जानी चाहिए।
➣ इसी समय अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ भी तेजी से बदल रही थीं। यूरोप में राजनीतिक तनाव बढ़ रहा था और द्वितीय विश्व युद्ध की आशंका स्पष्ट दिखाई देने लगी थी।
➣ सुभाष चंद्र बोस का विचार था कि यदि द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ होता है, तो ब्रिटेन की कमजोरी का लाभ उठाकर भारत में व्यापक राष्ट्रीय संघर्ष छेड़ा जा सकता है। इसके विपरीत महात्मा गांधी तथा कांग्रेस के अधिकांश वरिष्ठ नेता स्वतंत्रता आंदोलन को अहिंसक एवं चरणबद्ध ढंग से आगे बढ़ाने के पक्षधर थे।
➣ स्वतंत्रता प्राप्ति की रणनीति को लेकर यही वैचारिक मतभेद धीरे-धीरे कांग्रेस के भीतर स्पष्ट होने लगे। आगे चलकर यही मतभेद हरिपुरा अधिवेशन (1938), कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव (1939), त्रिपुरी संकट तथा अंततः फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की पृष्ठभूमि बने।
हरिपुरा अधिवेशन (1938)
➣ 1938 ई. में गुजरात के हरिपुरा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 51वाँ वार्षिक अधिवेशन आयोजित हुआ।
➣ इस अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस सर्वसम्मति से कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हुए। उनके अध्यक्ष चुने जाने से कांग्रेस के भीतर युवा, समाजवादी तथा वामपंथी विचारधारा को नई ऊर्जा मिली।
➣ अपने अध्यक्षीय भाषण में सुभाष चंद्र बोस ने स्पष्ट किया कि भारत की पूर्ण स्वतंत्रता कांग्रेस का सर्वोच्च लक्ष्य होना चाहिए। उनका मत था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए केवल नैतिक दबाव पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर संगठित एवं योजनाबद्ध संघर्ष की भी आवश्यकता है।
➣ हरिपुरा अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस ने स्वतंत्र भारत के आर्थिक एवं औद्योगिक विकास पर विशेष बल दिया। उनके आग्रह पर राष्ट्रीय योजना समिति के गठन का निर्णय लिया गया तथा इसके अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू बनाए गए। इस समिति का उद्देश्य स्वतंत्र भारत के आर्थिक विकास की दीर्घकालीन योजना तैयार करना था।
➣ सुभाष चंद्र बोस का विश्वास था कि स्वतंत्र भारत के निर्माण में औद्योगीकरण, वैज्ञानिक अनुसंधान, आर्थिक नियोजन तथा सुदृढ़ केंद्रीय शासन की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
➣ इस कारण उनका दृष्टिकोण कांग्रेस के अनेक पारंपरिक नेताओं की अपेक्षा अधिक आधुनिक एवं दूरदर्शी माना जाता है।
➣ यद्यपि हरिपुरा अधिवेशन सफल रहा, फिर भी स्वतंत्रता प्राप्ति की रणनीति तथा कांग्रेस की भावी दिशा को लेकर सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गांधी के विचारों में अंतर स्पष्ट होने लगा था। यही वैचारिक मतभेद आगे चलकर 1939 के कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव तथा त्रिपुरी संकट का प्रमुख कारण बने।
कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव (1939)
➣1939 ई. में कांग्रेस अध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त होने पर नए अध्यक्ष के चुनाव का प्रश्न उठा। सुभाष चंद्र बोस लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए अध्यक्ष बनना चाहते थे, ताकि वे अपने राजनीतिक एवं आर्थिक कार्यक्रमों को आगे बढ़ा सकें।
➣दूसरी ओर कांग्रेस के अधिकांश वरिष्ठ नेता, विशेषकर महात्मा गांधी के निकट सहयोगी, उनके पुनः निर्वाचन के पक्ष में नहीं थे।
➣महात्मा गांधी के समर्थन से डॉ. पट्टाभि सीतारमैया को कांग्रेस अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाया गया। इसके विपरीत सुभाष चंद्र बोस ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का निर्णय लिया।
➣इस प्रकार यह चुनाव केवल दो व्यक्तियों के बीच का मुकाबला नहीं था, बल्कि कांग्रेस के भीतर दो भिन्न राजनीतिक दृष्टिकोणों की परीक्षा भी बन गया।
➣29 जनवरी 1939 ई. को हुए चुनाव में सुभाष चंद्र बोस ने डॉ. पट्टाभि सीतारमैया को पराजित कर लगातार दूसरी बार कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव जीत लिया।
➣बोस को 1,580 तथा पट्टाभि सीतारमैया को 1,377 मत प्राप्त हुए। यह परिणाम कांग्रेस की राजनीति की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना माना जाता है।
➣चुनाव परिणाम आने के बाद महात्मा गांधी ने कहा-पट्टाभि सीतारमैया की हार मेरी हार है। इस कथन से स्पष्ट हो गया कि यद्यपि बोस चुनाव जीत गए थे, फिर भी कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व और कार्यसमिति का अधिकांश भाग गांधीजी के साथ था। परिणामस्वरूप कांग्रेस के भीतर वैचारिक एवं संगठनात्मक तनाव और अधिक बढ़ गया।
➣यद्यपि सुभाष चंद्र बोस लोकतांत्रिक ढंग से पुनः अध्यक्ष निर्वाचित हुए, किन्तु उनके लिए कांग्रेस संगठन का प्रभावी नेतृत्व करना कठिन हो गया। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर त्रिपुरी संकट (1939) का कारण बनीं।
त्रिपुरी संकट (1939)
➣ मार्च 1939 ई. में मध्य प्रदेश के त्रिपुरी (जबलपुर के निकट) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 52वाँ वार्षिक अधिवेशन आयोजित हुआ।
➣ यद्यपि सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव जीत चुके थे, फिर भी कांग्रेस के अधिकांश वरिष्ठ नेता तथा कार्यसमिति के सदस्य महात्मा गांधी की नीति के समर्थक थे। परिणामस्वरूप त्रिपुरी अधिवेशन कांग्रेस के इतिहास के सबसे गंभीर आंतरिक राजनीतिक संकटों में बदल गया।
➣ अधिवेशन के समय सुभाष चंद्र बोस अस्वस्थ थे और तेज़ बुखार के कारण वे कार्यवाही में सक्रिय रूप से भाग नहीं ले सके। दूसरी ओर महात्मा गांधी स्वयं अधिवेशन में उपस्थित नहीं थे, किन्तु उनके समर्थक नेता संगठन पर प्रभाव बनाए हुए थे। इससे कांग्रेस के भीतर नेतृत्व संबंधी विवाद और अधिक गहरा गया।
➣ त्रिपुरी अधिवेशन में गोविंद बल्लभ पंत ने एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव (पंत प्रस्ताव) प्रस्तुत किया। इस प्रस्ताव में कहा गया कि कांग्रेस अध्यक्ष ऐसी कार्यसमिति का गठन करें, जिस पर महात्मा गांधी का विश्वास हो और जो उनकी नीतियों के अनुरूप कार्य करे। यह प्रस्ताव कांग्रेस द्वारा पारित कर दिया गया।
➣ सुभाष चंद्र बोस का मत था कि कांग्रेस अध्यक्ष को कार्यसमिति के गठन में स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, जबकि गांधी समर्थक नेताओं का विचार था कि संगठन की एकता बनाए रखने के लिए महात्मा गांधी के नेतृत्व एवं नीतियों का पालन आवश्यक है। इस प्रश्न पर दोनों पक्षों के बीच समझौता नहीं हो सका।
➣ त्रिपुरी संकट के परिणामस्वरूप कांग्रेस के भीतर वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आ गए। एक ओर सुभाष चंद्र बोस तत्काल और अधिक संघर्षपूर्ण स्वतंत्रता आंदोलन के पक्षधर थे, जबकि दूसरी ओर महात्मा गांधी और उनके समर्थक चरणबद्ध, अहिंसक तथा संगठनात्मक एकता पर आधारित रणनीति को उचित मानते थे।
➣ इस प्रकार त्रिपुरी संकट (1939) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। इसी संकट ने आगे चलकर सुभाष चंद्र बोस के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़े तथा फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
सुभाष चंद्र बोस का इस्तीफ़ा
➣त्रिपुरी संकट के बाद सुभाष चंद्र बोस के लिए कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में प्रभावी ढंग से कार्य करना अत्यंत कठिन हो गया। पंत प्रस्ताव पारित होने के कारण वे अपनी इच्छानुसार कार्यसमिति का गठन नहीं कर सके, जबकि गांधी समर्थक अधिकांश वरिष्ठ नेता उनके साथ कार्य करने के लिए तैयार नहीं थे।
➣ऐसी परिस्थितियों में सुभाष चंद्र बोस ने 29 अप्रैल 1939 ई. को कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया। उनके इस्तीफ़े के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद को कांग्रेस का नया अध्यक्ष चुना गया।
➣अध्यक्ष पद से हटने के बावजूद सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस की सदस्यता नहीं छोड़ी। उनका मानना था कि कांग्रेस ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे बड़ा राष्ट्रीय संगठन है, किंतु उसके भीतर अधिक संघर्षशील, राष्ट्रवादी तथा वामपंथी विचारधारा को संगठित करने की आवश्यकता है।
➣इसी उद्देश्य से उन्होंने कांग्रेस के भीतर सभी वामपंथी, समाजवादी, किसान, मजदूर तथा राष्ट्रवादी शक्तियों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया। यही प्रयास आगे चलकर 3 मई 1939 ई. को फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना के रूप में सामने आया।
➣इस प्रकार सुभाष चंद्र बोस का इस्तीफ़ा केवल एक व्यक्तिगत या संगठनात्मक घटना नहीं था, बल्कि यह कांग्रेस के भीतर स्वतंत्रता प्राप्ति की रणनीति को लेकर उभरे वैचारिक मतभेदों का परिणाम था। इसी घटना ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में एक नए राजनीतिक संगठन-फॉरवर्ड ब्लॉक-के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।
फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना (1939)
➣ 29 अप्रैल 1939 ई. को कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने के बाद सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस के भीतर सभी वामपंथी, समाजवादी, किसान, मजदूर तथा राष्ट्रवादी शक्तियों को एक मंच पर संगठित करने का निर्णय लिया। इसी क्रम में 3 मई 1939 ई. को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की गई।
➣ प्रारम्भ में फॉरवर्ड ब्लॉक को कांग्रेस से अलग राजनीतिक दल के रूप में स्थापित नहीं किया गया था। सुभाष चंद्र बोस का उद्देश्य कांग्रेस के भीतर राष्ट्रवादी एवं वामपंथी शक्तियों को संगठित कर स्वतंत्रता आंदोलन को अधिक प्रभावी एवं संघर्षशील बनाना था।
➣ संगठन की सदस्यता उन सभी राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं के लिए खुली थी, जो फॉरवर्ड ब्लॉक के सिद्धांतों एवं कार्यक्रमों का समर्थन करते थे। इसके संगठन का विस्तार अखिल भारतीय स्तर पर किया गया तथा विभिन्न प्रांतों में इसकी शाखाएँ स्थापित की गईं, ताकि किसानों, मजदूरों, युवाओं एवं अन्य राष्ट्रवादी संगठनों के बीच व्यापक जनसंपर्क स्थापित किया जा सके।
➣ फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना ऐसे समय हुई, जब भारत में राजनीतिक मतभेद गहरे हो रहे थे और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ भी तेजी से बदल रही थीं।
➣ यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध के बादल मंडरा रहे थे तथा विश्व राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुकी थी। इन परिस्थितियों ने संगठन की भविष्य की राजनीतिक दिशा को भी प्रभावित किया।
➣ इस प्रकार फॉरवर्ड ब्लॉक का उदय केवल एक नए राजनीतिक संगठन की स्थापना नहीं था, बल्कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर उभरे वैचारिक एवं रणनीतिक मतभेदों का परिणाम था। आगे चलकर इस संगठन ने सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उद्देश्य
➣फॉरवर्ड ब्लॉक का उद्देश्य भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को अधिक प्रभावी दिशा देना तथा भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए संगठित राष्ट्रीय संघर्ष को सशक्त बनाना था।
➣सुभाष चंद्र बोस का विश्वास था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत का सामाजिक एवं आर्थिक पुनर्निर्माण भी समान रूप से आवश्यक है-
- पूर्ण स्वतंत्रता को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का सर्वोच्च लक्ष्य बनाना तथा उसकी शीघ्र प्राप्ति के लिए संघर्ष करना।
- ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध व्यापक जनसंघर्ष का संगठन करना तथा जनता की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना।
- किसानों, मजदूरों एवं युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन का सशक्त आधार बनाना और उनके सामाजिक एवं आर्थिक हितों की रक्षा करना।
- स्वतंत्र भारत में वैज्ञानिक नियोजन, औद्योगीकरण, सामाजिक न्याय तथा समाजवादी आर्थिक व्यवस्था की स्थापना का समर्थन करना।
- सांप्रदायिकता, प्रांतीयता एवं जातिगत विभाजन का विरोध कर राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना।
- एक शक्तिशाली एवं आधुनिक राष्ट्रीय राज्य के निर्माण का समर्थन करना, जो देश की सुरक्षा, आर्थिक विकास और सामाजिक प्रगति सुनिश्चित कर सके।
➣इन उद्देश्यों से स्पष्ट होता है कि फॉरवर्ड ब्लॉक केवल एक राजनीतिक संगठन नहीं था, बल्कि वह स्वतंत्र भारत के लिए एक राष्ट्रवादी, समाजवादी तथा योजनाबद्ध राज्य की परिकल्पना प्रस्तुत करने वाला आंदोलन भी था।
इस प्रकार फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन त्रिपुरी संकट और सुभाष चंद्र बोस के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़े के बाद हुआ।
प्रमुख गतिविधियाँ
➣फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना के बाद सुभाष चंद्र बोस ने संगठन को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सक्रिय राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बनाया। इसी दौरान सितंबर 1939 ई. में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ हुआ, जिसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा को भी प्रभावित किया।
➣फॉरवर्ड ब्लॉक ने इस युद्ध तथा ब्रिटिश सरकार की नीतियों के संबंध में कांग्रेस से भिन्न दृष्टिकोण अपनाया और अनेक महत्वपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों का नेतृत्व किया।
द्वितीय विश्व युद्ध के प्रति दृष्टिकोण
➣ सितंबर 1939 ई. में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ होने पर तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने भारतीय नेताओं से परामर्श किए बिना भारत को भी युद्धरत राष्ट्र घोषित कर दिया। इस निर्णय का फॉरवर्ड ब्लॉक ने तीव्र विरोध किया।
➣ सुभाष चंद्र बोस का मत था कि यह युद्ध भारत के लिए ब्रिटिश शासन से पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने का अनुकूल अवसर है। उनका विश्वास था कि युद्ध में उलझे ब्रिटेन पर संगठित राष्ट्रीय दबाव डालकर स्वतंत्रता आंदोलन को निर्णायक चरण तक पहुँचाया जा सकता है।
➣ फॉरवर्ड ब्लॉक ने स्पष्ट किया कि भारत किसी भी प्रकार का सहयोग तभी देगा, जब ब्रिटिश सरकार भारत को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करे। इसलिए संगठन ने युद्धकाल में ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध करते हुए व्यापक जनसंघर्ष का समर्थन किया।
➣ फॉरवर्ड ब्लॉक की इस संघर्षपूर्ण नीति के कारण ब्रिटिश सरकार ने सुभाष चंद्र बोस तथा उनके सहयोगियों पर कड़ी निगरानी रखनी प्रारम्भ कर दी। सरकार ने संगठन की सभाओं, जुलूसों और प्रचार अभियानों पर विभिन्न प्रकार के प्रतिबंध लगाए।
➣ सुभाष चंद्र बोस के भाषणों, यात्राओं और राजनीतिक गतिविधियों पर भी कड़ी निगरानी रखी जाने लगी। ब्रिटिश सरकार का मानना था कि उनकी गतिविधियाँ युद्धकाल में ब्रिटिश शासन की सुरक्षा तथा प्रशासनिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं।
➣ दमनात्मक नीतियों के बावजूद फॉरवर्ड ब्लॉक ने अपने राजनीतिक अभियान जारी रखे। इससे ब्रिटिश सरकार और अधिक कठोर हो गई तथा अंततः उसने सुभाष चंद्र बोस के विरुद्ध प्रत्यक्ष कार्रवाई की, जिसके परिणामस्वरूप उनकी गिरफ्तारी और बाद में नजरबंदी (House Arrest) हुई।
सुभाष चंद्र बोस की गिरफ्तारी, नजरबंदी एवं आमरण अनशन
➣ ब्रिटिश सरकार की दमनात्मक नीतियों के बावजूद फॉरवर्ड ब्लॉक ने अपने राजनीतिक अभियान जारी रखे। इससे ब्रिटिश सरकार और अधिक कठोर हो गई तथा अंततः उसने सुभाष चंद्र बोस के विरुद्ध प्रत्यक्ष कार्रवाई करने का निर्णय लिया।
➣ 2 जुलाई 1940 ई. को ब्रिटिश सरकार ने सुभाष चंद्र बोस को रक्षा भारत नियम (Defence of India Rules) के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया। सरकार का आरोप था कि वे युद्धकाल में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनमत तैयार कर रहे हैं तथा उनकी गतिविधियाँ प्रशासनिक सुरक्षा के लिए चुनौती बन गई हैं।
➣ गिरफ्तारी के बाद सुभाष चंद्र बोस को प्रेसीडेंसी जेल, कलकत्ता में रखा गया। कारावास के दौरान भी उन्होंने ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध जारी रखा और बिना किसी मुकदमे के अनिश्चितकाल तक बंदी बनाए जाने का विरोध किया।
➣ अपनी गिरफ्तारी को अन्यायपूर्ण बताते हुए 29 नवंबर 1940 ई. को सुभाष चंद्र बोस ने आमरण अनशन प्रारम्भ कर दिया। उनका स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगा, जिससे ब्रिटिश सरकार पर भारी राजनीतिक दबाव उत्पन्न हो गया। सरकार को आशंका थी कि यदि जेल में उनकी मृत्यु हो गई, तो पूरे देश में व्यापक जनाक्रोश फैल सकता है।
➣ सुभाष चंद्र बोस की बिगड़ती स्वास्थ्य-स्थिति को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने 5 दिसंबर 1940 ई. को उन्हें जेल से रिहा कर दिया, किंतु उन्हें उनके पैतृक निवास 38/2 एल्गिन रोड, कलकत्ता (वर्तमान नेताजी भवन) में कड़ी पुलिस निगरानी में रखा गया। उनके आवागमन, आगंतुकों तथा पत्राचार पर भी सरकार की कड़ी निगरानी थी।
➣ यद्यपि सुभाष चंद्र बोस औपचारिक रूप से जेल से मुक्त हो चुके थे, फिर भी वे वास्तव में ब्रिटिश सरकार की कठोर नजरबंदी (House Arrest) में थे। इसी नजरबंदी के दौरान उन्होंने भारत से गुप्त रूप से निकलने की योजना बनाई, जो आगे चलकर उनके ऐतिहासिक महान पलायन का आधार बनी।
महान पलायन (1941)
➣कड़ी पुलिस निगरानी में नजरबंद रहने के बावजूद सुभाष चंद्र बोस ने भारत से गुप्त रूप से निकलकर विदेश में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय समर्थन प्राप्त करने की योजना बनाई।
➣16–17 जनवरी 1941 की मध्यरात्रि को सुभाष चंद्र बोस अपने एल्गिन रोड, कलकत्ता स्थित निवास से गुप्त रूप से निकल गए। इस अभियान में उनके भतीजे शिशिर कुमार बोस ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अपनी कार से बोस को गोमो रेलवे स्टेशन (वर्तमान नेताजी सुभाष चंद्र बोस गोमो जंक्शन, झारखंड) तक पहुँचाया।
➣पुलिस की पहचान से बचने के लिए सुभाष चंद्र बोस ने पठान का वेश धारण किया और मोहम्मद जियाउद्दीन नाम से यात्रा की। गोमो से वे रेलमार्ग द्वारा पेशावर पहुँचे। वहाँ से भूमिगत राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं की सहायता से वे ब्रिटिश भारत की सीमा पार कर अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पहुँचे।
➣काबुल में कुछ समय गुप्त रूप से रहने के बाद सुभाष चंद्र बोस विदेशी संपर्कों की सहायता से सोवियत संघ होते हुए मार्च 1941 ई. में जर्मनी पहुँचे। वहाँ उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने का प्रयास किया तथा आगे चलकर फ्री इंडिया सेंटर और इंडियन लीजन के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
➣सुभाष चंद्र बोस का यह पलायन ब्रिटिश गुप्तचर व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती सिद्ध हुआ। कड़ी निगरानी के बावजूद उनका सफलतापूर्वक भारत से निकल जाना ब्रिटिश प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था की बड़ी विफलता माना गया।
➣महान पलायन के बाद सुभाष चंद्र बोस का स्वतंत्रता संघर्ष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुँच गया। आगे चलकर दक्षिण-पूर्व एशिया में उनके नेतृत्व में आज़ाद हिंद फौज (INA) का पुनर्गठन हुआ, जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा प्रदान की।
सुभाष चंद्र बोस के पलायन के बाद फॉरवर्ड ब्लॉक
➣ 1941 ई. में सुभाष चंद्र बोस के भारत से प्रस्थान के बाद फॉरवर्ड ब्लॉक का प्रत्यक्ष नेतृत्व उनके सहयोगियों ने संभाला।
➣ यद्यपि संगठन अपने संस्थापक के करिश्माई नेतृत्व से वंचित हो गया, फिर भी उसने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपने राजनीतिक अभियान जारी रखे।
➣ ब्रिटिश सरकार ने युद्धकाल में फॉरवर्ड ब्लॉक की गतिविधियों को संदेह की दृष्टि से देखा। संगठन के अनेक नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया, सभाओं और जुलूसों पर प्रतिबंध लगाए गए तथा उसकी गतिविधियों पर निरंतर निगरानी रखी गई। इन दमनात्मक उपायों के कारण संगठन का विस्तार अपेक्षित गति से नहीं हो सका।
➣ दूसरी ओर, विदेश में सुभाष चंद्र बोस की गतिविधियों तथा आगे चलकर आज़ाद हिंद आंदोलन में उनकी बढ़ती भूमिका ने फॉरवर्ड ब्लॉक के विचारों को नई पहचान दिलाई। यद्यपि संगठन की सक्रियता भारत में सीमित रही, फिर भी उसके समर्थकों ने राष्ट्रवादी आंदोलन में अपना योगदान जारी रखा।
➣ 1947 ई. में भारत की स्वतंत्रता के बाद फॉरवर्ड ब्लॉक ने एक स्वतंत्र राजनीतिक दल के रूप में कार्य करना जारी रखा। स्वतंत्र भारत में इसने विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु तथा कुछ अन्य राज्यों में अपनी राजनीतिक उपस्थिति बनाए रखी और समय-समय पर विभिन्न लोकतांत्रिक गठबंधनों का हिस्सा भी बना।
➣ इस प्रकार फॉरवर्ड ब्लॉक केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक संगठन भर नहीं रहा, बल्कि स्वतंत्र भारत में भी सक्रिय रहने वाला एक प्रमुख राजनीतिक दल के रूप में अपनी पहचान बनाए रखी।
उपलब्धियाँ
- संघर्षशील राष्ट्रवाद को नई दिशा प्रदान की – फॉरवर्ड ब्लॉक ने स्वतंत्रता आंदोलन में अधिक सक्रिय, साहसपूर्ण एवं निर्णायक संघर्ष की नीति का समर्थन किया।
- वामपंथी एवं राष्ट्रवादी शक्तियों को संगठित किया – संगठन ने कांग्रेस के भीतर तथा बाहर सक्रिय समाजवादी, किसान, मजदूर एवं उग्र राष्ट्रवादी समूहों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया।
- पूर्ण स्वतंत्रता की माँग को सशक्त बनाया – फॉरवर्ड ब्लॉक ने ब्रिटिश शासन से किसी प्रकार के समझौते के बजाय तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता की माँग पर बल दिया।
- द्वितीय विश्व युद्ध को राजनीतिक अवसर के रूप में देखा – सुभाष चंद्र बोस ने युद्धकालीन परिस्थितियों का उपयोग कर ब्रिटिश शासन पर निर्णायक दबाव बनाने की रणनीति प्रस्तुत की, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्रता आंदोलन का विस्तार – सुभाष चंद्र बोस के महान पलायन के बाद भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली और विदेशी समर्थन प्राप्त करने के प्रयासों को गति मिली।
- स्वतंत्र भारत में भी राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखा – स्वतंत्रता के बाद भी फॉरवर्ड ब्लॉक एक राजनीतिक दल के रूप में सक्रिय रहा और भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी उपस्थिति बनाए रखी।
➣इस प्रकार फॉरवर्ड ब्लॉक की उपलब्धियाँ केवल स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उसने भारतीय राष्ट्रवादी राजनीति तथा लोकतांत्रिक परंपरा के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
प्रमुख व्यक्तित्व
| व्यक्तित्व | योगदान / महत्व |
|---|---|
| सुभाष चंद्र बोस | फॉरवर्ड ब्लॉक के संस्थापक; कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष; संघर्षशील राष्ट्रवाद के प्रमुख प्रवर्तक। |
| महात्मा गांधी | कांग्रेस के प्रमुख नेता; अहिंसक संघर्ष एवं जन-आंदोलन के समर्थक; त्रिपुरी संकट के समय उनके विचारों से मतभेद उभरे। |
| पट्टाभि सीतारमैया | 1939 के कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव में गांधीजी के समर्थित उम्मीदवार। |
| डॉ. राजेंद्र प्रसाद | सुभाष चंद्र बोस के इस्तीफ़े के बाद कांग्रेस अध्यक्ष बने। |
| जवाहरलाल नेहरू | हरिपुरा अधिवेशन (1938) में गठित राष्ट्रीय योजना समिति के अध्यक्ष। |
| गोविंद बल्लभ पंत | त्रिपुरी अधिवेशन (1939) में प्रसिद्ध पंत प्रस्ताव प्रस्तुत किया। |
| शिशिर कुमार बोस | महान पलायन (1941) के दौरान सुभाष चंद्र बोस को सुरक्षित गोमो रेलवे स्टेशन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। |
| लॉर्ड लिनलिथगो | द्वितीय विश्व युद्ध के समय भारत के वायसराय; भारत को बिना परामर्श युद्ध में शामिल किया तथा सुभाष चंद्र बोस के विरुद्ध दमनात्मक कार्रवाई की। |
तुलना : महात्मा गांधी एवं सुभाष चंद्र बोस के विचार
| आधार | महात्मा गांधी | सुभाष चंद्र बोस |
|---|---|---|
| स्वतंत्रता प्राप्ति का माध्यम | अहिंसक सत्याग्रह एवं जन-आंदोलन | निर्णायक राष्ट्रीय संघर्ष तथा आवश्यकता पड़ने पर सशस्त्र प्रतिरोध का समर्थन |
| ब्रिटिश शासन के प्रति दृष्टिकोण | अहिंसक एवं नैतिक दबाव द्वारा परिवर्तन | ब्रिटिश शासन को शीघ्र समाप्त करने के लिए अधिक संघर्षपूर्ण नीति |
| द्वितीय विश्व युद्ध के प्रति नीति | अहिंसक दृष्टिकोण एवं नैतिक सिद्धांतों पर बल | युद्ध को भारत की स्वतंत्रता के लिए राजनीतिक अवसर मानते थे |
| आर्थिक दृष्टिकोण | ग्रामोद्योग, कुटीर उद्योग एवं विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था | औद्योगीकरण, वैज्ञानिक नियोजन एवं आधुनिक औद्योगिक विकास |
| राज्य की अवधारणा | विकेंद्रीकृत ग्राम स्वराज | शक्तिशाली एवं आधुनिक राष्ट्रीय राज्य |
| कांग्रेस में मतभेद का परिणाम | कांग्रेस के पारंपरिक नेतृत्व का प्रतिनिधित्व | 1939 में फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना |
कुछ महत्वपूर्ण भ्रम-बिंदु
➣ राष्ट्रीय योजना समिति का गठन फॉरवर्ड ब्लॉक ने नहीं किया था। इसका निर्णय हरिपुरा अधिवेशन (1938) में कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सुभाष चंद्र बोस के कार्यकाल में लिया गया था तथा इसके अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू बनाए गए थे।
➣ सुभाष चंद्र बोस 1939 ई. का कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव हारे नहीं थे। उन्होंने पट्टाभि सीतारमैया को पराजित कर लगातार दूसरी बार कांग्रेस अध्यक्ष का पद प्राप्त किया था।
➣ पट्टाभि सीतारमैया की हार को महात्मा गांधी ने अपनी व्यक्तिगत हार बताया था, किन्तु उस समय गांधीजी कांग्रेस अध्यक्ष नहीं थे। वे कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेता अवश्य थे।
➣ त्रिपुरी अधिवेशन (1939) में फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना नहीं हुई थी। इसकी स्थापना बाद में 3 मई 1939 ई. को कलकत्ता में की गई थी।
➣ फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना प्रारम्भ से कांग्रेस से अलग राजनीतिक दल के रूप में नहीं की गई थी। इसका उद्देश्य कांग्रेस के भीतर वामपंथी एवं राष्ट्रवादी शक्तियों को संगठित करना था।
➣ गोविंद बल्लभ पंत ने फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना नहीं की थी। उन्होंने त्रिपुरी अधिवेशन में पंत प्रस्ताव प्रस्तुत किया था, जबकि फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना सुभाष चंद्र बोस ने की थी।
➣ फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नहीं हुई थी। इसकी स्थापना 3 मई 1939 ई. को, स्वतंत्रता से लगभग आठ वर्ष पहले हुई थी।
➣ फॉरवर्ड ब्लॉक का मुख्य उद्देश्य केवल चुनाव लड़ना नहीं था। इसका उद्देश्य पूर्ण स्वतंत्रता के लिए व्यापक राष्ट्रीय संघर्ष को संगठित करना था।
➣ सुभाष चंद्र बोस को 5 दिसंबर 1940 ई. को पूर्ण स्वतंत्रता नहीं मिली थी। उन्हें जेल से रिहा करने के बाद एल्गिन रोड (कलकत्ता) स्थित उनके घर में नजरबंद (House Arrest) रखा गया था।
➣ महान पलायन के समय सुभाष चंद्र बोस जेल में नहीं थे। वे एल्गिन रोड स्थित अपने घर में नजरबंद थे।
➣ सुभाष चंद्र बोस सीधे भारत से जर्मनी नहीं पहुँचे थे। उनका मार्ग कलकत्ता → गोमो → पेशावर → काबुल → जर्मनी था।
➣ महान पलायन के दौरान सुभाष चंद्र बोस ने अपना वास्तविक नाम प्रयोग नहीं किया था। उन्होंने मोहम्मद जियाउद्दीन नाम तथा पठान का वेश धारण किया था।
➣ शिशिर कुमार बोस फॉरवर्ड ब्लॉक के संस्थापक नहीं थे। वे सुभाष चंद्र बोस के भतीजे थे और महान पलायन के दौरान उन्हें गोमो रेलवे स्टेशन तक पहुँचाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
➣ द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान फॉरवर्ड ब्लॉक ने ब्रिटिश सरकार की युद्ध नीति का समर्थन नहीं किया था। उसने इसका विरोध किया और इसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को तेज़ करने का अवसर माना।
➣ सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फौज के गठन के बाद फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना नहीं की थी। फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना 3 मई 1939 ई. में हुई थी, जबकि आज़ाद हिंद फौज से उनका नेतृत्व बाद की घटनाओं से संबंधित है।
➣ फॉरवर्ड ब्लॉक और आज़ाद हिंद फौज (INA) एक ही संगठन नहीं थे। फॉरवर्ड ब्लॉक एक राजनीतिक संगठन था, जबकि आज़ाद हिंद फौज एक सैन्य संगठन थी।
➣ फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन केवल बंगाल के लिए नहीं किया गया था। इसका उद्देश्य पूरे भारत की वामपंथी, राष्ट्रवादी तथा किसान-मजदूर शक्तियों को एक मंच पर संगठित करना था।
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