सांप्रदायिक निर्णय और पूना पैक्ट : परिचय
➢ सांप्रदायिक निर्णय (कम्युनल अवार्ड) और पूना पैक्ट, 1932 भारतीय संवैधानिक इतिहास में दलितों (तत्कालीन दलित वर्ग, वर्तमान में संवैधानिक रूप से अनुसूचित जाति) के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े दो महत्वपूर्ण एवं परस्पर जुड़े घटनाक्रम थे।
➢ यह विषय UPSC/PCS पाठ्यक्रम में आधुनिक भारत के इतिहास (राष्ट्रीय आंदोलन) और भारतीय राजव्यवस्था एवं सामाजिक न्याय (आरक्षण व्यवस्था की उत्पत्ति)-दोनों खंडों से जुड़ता है, इसलिए इसका महत्व दोहरा है।
➢ सांप्रदायिक निर्णय में दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था की गई, जबकि पूना पैक्ट ने इस व्यवस्था को बदलकर संयुक्त निर्वाचक मंडल के साथ आरक्षित सीटों का प्रावधान किया। यही परिवर्तन इस पूरे प्रकरण की केंद्रीय संकल्पना है।
➢ सांप्रदायिक निर्णय की घोषणा 16 अगस्त 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने की। इसके अंतर्गत विभिन्न समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था के साथ दलित वर्ग को भी पृथक निर्वाचक मंडल प्रदान किया गया।
➢ इस प्रावधान का महात्मा गांधी ने विरोध किया, क्योंकि उनकी दृष्टि में यह हिंदू समाज को स्थायी रूप से विभाजित कर देता। उन्होंने 20 सितंबर 1932 को यरवदा जेल में इसके विरुद्ध आमरण अनशन प्रारंभ किया।
➢ इसके बाद डॉ. बी. आर. आंबेडकर सहित दलित वर्ग के प्रतिनिधियों और हिंदू नेताओं के बीच गहन वार्ताएँ हुईं। इन वार्ताओं के परिणामस्वरूप 24 सितंबर 1932 को पूना पैक्ट हुआ, जिसमें पृथक निर्वाचक मंडल के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन तथा दलित वर्ग के लिए आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाकर देने की व्यवस्था स्वीकार की गई।
➢ पूना पैक्ट की व्यवस्था बाद में भारत शासन अधिनियम, 1935 में सम्मिलित की गई और स्वतंत्रता के बाद यही सिद्धांत (संयुक्त निर्वाचन के भीतर आरक्षित सीटें) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330 एवं 332 के अंतर्गत अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण का आधार बना। इस दृष्टि से यह प्रकरण औपनिवेशिक काल की एक अस्थायी व्यवस्था मात्र नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत की सामाजिक न्याय एवं प्रतिनिधित्व नीति की नींव है।
| बिंदु | सांप्रदायिक निर्णय | पूना पैक्ट |
|---|---|---|
| तिथि | 16 अगस्त 1932 | 24 सितंबर 1932 |
| प्रकृति | ब्रिटिश सरकार की एकपक्षीय घोषणा | भारतीय पक्षों (गांधी-आंबेडकर) के बीच समझौता |
| दलित वर्ग हेतु व्यवस्था | पृथक निर्वाचक मंडल + दोहरा मत | संयुक्त निर्वाचक मंडल + आरक्षित सीटें |
सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की पृष्ठभूमि और दलित प्रतिनिधित्व का प्रश्न
भारत में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का विकास – 1909 से 1919
➢ भारत में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की औपचारिक शुरुआत भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 अर्थात मार्ले-मिंटो सुधार से हुई।
➢ इस अधिनियम के अंतर्गत मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था की गई। इसके अनुसार मुस्लिम मतदाता अपने समुदाय के लिए निर्धारित निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम प्रतिनिधियों का चुनाव करते थे।
➢ इस प्रकार पहली बार धार्मिक समुदाय के आधार पर निर्वाचन को भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में वैधानिक मान्यता मिली।
➢ पृथक निर्वाचक मंडल की माँग की पृष्ठभूमि में 1906 का शिमला मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल महत्वपूर्ण था। मुस्लिम नेताओं ने यह तर्क दिया कि उनकी राजनीतिक स्थिति और हितों की सुरक्षा के लिए उन्हें सामान्य निर्वाचन व्यवस्था से अलग विशेष प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। ब्रिटिश सरकार ने इस माँग को स्वीकार करते हुए 1909 के सुधारों में पृथक निर्वाचन की व्यवस्था लागू की।
➢ 1909 के बाद सांप्रदायिक आधार पर प्रतिनिधित्व भारतीय राजनीति का स्थायी प्रश्न बन गया। भारत सरकार अधिनियम, 1919 अथवा मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों ने निर्वाचन व्यवस्था का विस्तार किया और पृथक प्रतिनिधित्व को आगे बनाए रखा। इस अवधि में विभिन्न समुदायों के लिए राजनीतिक सुरक्षा, प्रतिनिधित्व और निर्वाचन व्यवस्था संबंधी माँगें अधिक स्पष्ट होने लगीं।
➢ इस विकास का व्यापक प्रभाव यह हुआ कि भारतीय संवैधानिक राजनीति में यह प्रश्न प्रमुख बन गया कि क्या सभी भारतीयों के लिए एक समान निर्वाचन व्यवस्था होनी चाहिए अथवा धार्मिक और सामाजिक रूप से विशिष्ट समुदायों को अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए। आगे चलकर यही बहस दलित वर्गों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न से भी जुड़ गई।
दलित प्रतिनिधित्व का प्रश्न और डॉ. आंबेडकर का राजनीतिक उदय
➢ सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के इसी विकसित होते ढाँचे में दलित वर्ग अर्थात तत्कालीन दलित वर्गों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न सामने आया।
➢ ये वर्ग सामाजिक भेदभाव, अस्पृश्यता और सार्वजनिक जीवन में अनेक प्रकार के प्रतिबंधों का सामना कर रहे थे। इसलिए उनके लिए केवल सामाजिक सुधार पर्याप्त नहीं माना गया। राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक सुरक्षा भी महत्वपूर्ण प्रश्न बन गए।
➢ दलित प्रतिनिधित्व से जुड़ा मूल प्रश्न यह था कि क्या दलितों का प्रतिनिधित्व सामान्य हिंदू निर्वाचन व्यवस्था के माध्यम से प्रभावी ढंग से हो सकता है।
➢ दलित नेताओं का एक तर्क यह था कि सामाजिक रूप से शक्तिशाली समूहों के प्रभुत्व वाली संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था में दलित उम्मीदवारों को स्वतंत्र राजनीतिक आवाज प्राप्त करना कठिन हो सकता है। इसलिए उनके लिए ऐसी व्यवस्था आवश्यक थी जिसमें वे अपने राजनीतिक प्रतिनिधियों को अधिक प्रभावी ढंग से चुन सकें।
➢ इसी पृष्ठभूमि में डॉ. बी. आर. आंबेडकर 1920 के दशक में दलित वर्गों के प्रमुख सामाजिक एवं राजनीतिक नेता के रूप में उभरे। उन्होंने दलितों की समस्याओं को केवल सामाजिक सुधार के प्रश्न के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे राजनीतिक अधिकार, प्रतिनिधित्व और सत्ता में भागीदारी से जोड़ा।
➢ 1924 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना के माध्यम से आंबेडकर ने दलितों की शिक्षा, सामाजिक उन्नति और राजनीतिक हितों के लिए संगठित प्रयास प्रारंभ किए।
➢ इसके बाद 1927 का महाड़ सत्याग्रह जैसे आंदोलनों ने दलितों के नागरिक अधिकार और सामाजिक समानता के प्रश्न को व्यापक सार्वजनिक विमर्श में ला दिया।
➢ 1920 के दशक के अंत तक आंबेडकर का राजनीतिक दृष्टिकोण अधिक स्पष्ट हो चुका था। उनका मानना था कि सामाजिक रूप से वंचित वर्गों को केवल बहुसंख्यक समाज की सद्भावना पर निर्भर नहीं रहना चाहिए,
➢ बल्कि उन्हें संवैधानिक और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होना चाहिए। यही विचार आगे चलकर दलितों के पृथक निर्वाचक मंडल की माँग का आधार बना।
1930 तक सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का विकसित स्वरूप
➢ 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों से शुरू हुई पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था 1919 के बाद भारतीय संवैधानिक राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी थी।
➢ इस दौरान विभिन्न समुदायों ने अपने राजनीतिक हितों की सुरक्षा के लिए अलग या विशेष प्रतिनिधित्व की माँगें उठाईं। परिणामस्वरूप सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व और अल्पसंख्यक अधिकार भारतीय संवैधानिक प्रश्न के प्रमुख विषय बन गए।
➢ इसी राजनीतिक वातावरण में दलित वर्गों ने भी अपने प्रतिनिधित्व के प्रश्न को अधिक संगठित रूप से उठाया। डॉ. आंबेडकर ने इस बात पर जोर दिया कि दलितों को ऐसी राजनीतिक व्यवस्था मिलनी चाहिए जिससे वे अपने हितों की रक्षा करने वाले प्रतिनिधियों का प्रभावी रूप से चुनाव कर सकें। इस प्रकार दलित प्रश्न धीरे-धीरे भारतीय संवैधानिक सुधारों की बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
➢ प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930-31) का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने बहिष्कार किया था, इसलिए इसमें कांग्रेस का कोई प्रतिनिधि शामिल नहीं हुआ। इसके विपरीत विभिन्न अल्पसंख्यक एवं सामाजिक समूहों के प्रतिनिधियों ने इसमें भाग लिया।
➢ इस सम्मेलन में डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने राव बहादुर आर. श्रीनिवासन के साथ मिलकर दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने दलितों को केवल हिंदू समाज के भीतर एक सामाजिक समूह मानने के बजाय ऐसे वर्ग के रूप में प्रस्तुत किया जिसे स्वतंत्र राजनीतिक सुरक्षा और प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है।
➢ आंबेडकर एवं श्रीनिवासन द्वारा प्रस्तुत 1930 के राजनीतिक सुरक्षा संबंधी ज्ञापन में दलित वर्ग के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व तथा अपने प्रतिनिधियों को स्वयं चुनने के अधिकार की माँग की गई, जिसमें पृथक निर्वाचक मंडल को प्रारंभिक अवधि के लिए एक उपाय के रूप में प्रस्तावित किया गया।
➢ इस प्रकार 1930 के प्रथम गोलमेज सम्मेलन तक डॉ. आंबेडकर दलित वर्गों के प्रमुख प्रतिनिधि के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर के संवैधानिक विमर्श में अपनी बात रख चुके थे।
➢ उन्होंने दलित वर्ग के लिए राजनीतिक अधिकारों, पर्याप्त विधायी प्रतिनिधित्व और संवैधानिक सुरक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया। इससे दलित प्रतिनिधित्व का प्रश्न ब्रिटिश सरकार के सामने औपचारिक संवैधानिक मुद्दे के रूप में स्थापित हुआ। साथ ही कांग्रेस की अनुपस्थिति के कारण प्रथम गोलमेज सम्मेलन भारत की प्रमुख राष्ट्रवादी शक्ति के साथ व्यापक समझौता नहीं कर सका, जिससे सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न अनसुलझा रहा।
➢ इस प्रकार 1909 की पृथक निर्वाचक मंडल व्यवस्था, 1919 में उसका विस्तार, विभिन्न समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बढ़ती माँग, दलित वर्गों का संगठित राजनीतिक प्रतिनिधित्व, डॉ. आंबेडकर का नेतृत्व, 1930 के गोलमेज सम्मेलनों में दलित प्रश्न-इन घटनाओं ने आगे चलकर सांप्रदायिक निर्णय (1932) की पृष्ठभूमि तैयार की।
भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की औपचारिक शुरुआत 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों से हुई, जबकि 1920 के दशक में डॉ. बी. आर. आंबेडकर के नेतृत्व में दलित वर्ग के स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न प्रमुखता से उभरा। 1930 तक यह प्रश्न भारतीय संवैधानिक सुधारों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था और आगे चलकर सांप्रदायिक निर्णय तथा पूना पैक्ट के विवाद का आधार बना।
अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व और सांप्रदायिक प्रश्न
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का प्रश्न
➢ प्रथम गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस की अनुपस्थिति के कारण ब्रिटिश सरकार के लिए यह स्पष्ट हो गया था कि संवैधानिक प्रश्न पर आगे बढ़ने हेतु भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की भागीदारी आवश्यक है।
➢ इसी क्रम में गांधीजी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच वार्ता हुई और गांधी-इरविन समझौते (1931) के बाद कांग्रेस ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर सहमति दी।
➢ द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में महात्मा गांधी ने कांग्रेस के एकमात्र आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया, जबकि डॉ. आंबेडकर दलित वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित थे।
➢ इस सम्मेलन में भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के भविष्य पर चर्चा के साथ-साथ सबसे जटिल प्रश्नों में से एक अल्पसंख्यकों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का था।
➢ विभिन्न धार्मिक और सामाजिक समुदाय चाहते थे कि भावी संविधान में उनके राजनीतिक हितों और प्रतिनिधित्व की पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
➢ इस संदर्भ में मुसलमान, सिख, भारतीय ईसाई, एंग्लो-इंडियन, यूरोपीय तथा दलित वर्ग जैसे समूहों की राजनीतिक माँगें सामने आईं।
➢ इनके बीच मतभेद मुख्यतः इस बात को लेकर थे कि प्रतिनिधित्व संयुक्त निर्वाचन से हो या विभिन्न समुदायों को पृथक अथवा विशेष निर्वाचन व्यवस्था प्रदान की जाए।
➢ इस प्रकार सांप्रदायिक प्रश्न केवल हिंदू-मुस्लिम विवाद तक सीमित नहीं था, बल्कि भावी भारतीय संविधान में विभिन्न समुदायों के राजनीतिक अधिकार और सुरक्षा का व्यापक प्रश्न बन चुका था।
तीनों गोलमेज सम्मेलन : एक दृष्टि में
➢ परीक्षा की दृष्टि से तीनों गोलमेज सम्मेलनों को दलित प्रतिनिधित्व के संदर्भ में एक साथ याद रखना उपयोगी है-
| सम्मेलन | अवधि | कांग्रेस की भागीदारी | दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व |
|---|---|---|---|
| प्रथम गोलमेज सम्मेलन | नवंबर 1930 – जनवरी 1931 | बहिष्कार (अनुपस्थित) | डॉ. बी. आर. आंबेडकर एवं आर. श्रीनिवासन |
| द्वितीय गोलमेज सम्मेलन | सितंबर – दिसंबर 1931 | गांधी-इरविन समझौते के बाद भागीदारी (गांधीजी एकमात्र आधिकारिक प्रतिनिधि) | डॉ. बी. आर. आंबेडकर |
| तृतीय गोलमेज सम्मेलन | नवंबर – दिसंबर 1932 | बहिष्कार (सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः प्रारंभ हो चुका था) | सीमित भारतीय प्रतिनिधित्व; इसी अवधि में सांप्रदायिक निर्णय व पूना पैक्ट पहले ही हो चुके थे |
घटनाक्रम याद रखें: प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930-31) में आंबेडकर ने दलित वर्ग के राजनीतिक अधिकारों का प्रश्न प्रमुखता से उठाया → गांधी-इरविन समझौते (1931) के बाद कांग्रेस ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया → द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में गांधीजी और आंबेडकर के बीच दलित प्रतिनिधित्व एवं पृथक निर्वाचक मंडल पर गंभीर मतभेद सामने आए → सांप्रदायिक प्रश्न पर सहमति नहीं बनी → ब्रिटिश सरकार द्वारा स्वयं निर्णय देने की स्थिति बनी → 16 अगस्त 1932 : सांप्रदायिक निर्णय।
दलित वर्ग को लेकर गांधीजी और डॉ. आंबेडकर का मतभेद
➢ दलित वर्ग के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न इस बहस का विशेष रूप से महत्वपूर्ण हिस्सा था।
➢ डॉ. बी. आर. आंबेडकर का तर्क था कि दलितों को अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करने की पर्याप्त स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, क्योंकि केवल संयुक्त निर्वाचन में उन्हें बहुसंख्यक सामाजिक समूहों के राजनीतिक प्रभाव से पूरी तरह स्वतंत्र प्रतिनिधित्व मिलना कठिन हो सकता है।
➢ आंबेडकर के अनुसार दलित वर्गों की सामाजिक स्थिति को देखते हुए उन्हें विशेष राजनीतिक सुरक्षा की आवश्यकता थी। वे केवल नाममात्र के प्रतिनिधित्व के बजाय ऐसी व्यवस्था चाहते थे जिसमें दलित वर्ग अपने राजनीतिक हितों की रक्षा करने वाले प्रतिनिधियों को प्रभावी रूप से चुन सके।
➢ इसके विपरीत महात्मा गांधी दलित वर्ग को हिंदू समाज से अलग राजनीतिक समुदाय के रूप में स्वीकार करने के विरोधी थे। गांधीजी का मानना था कि दलितों को पृथक राजनीतिक निर्वाचन देने से हिंदू समाज का स्थायी राजनीतिक विभाजन हो सकता है। उनका जोर अस्पृश्यता के उन्मूलन और हिंदू समाज के भीतर सामाजिक सुधार पर था।
➢ इस प्रकार दोनों के बीच मूल मतभेद यह था कि दलितों की समस्या का समाधान स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से किया जाए या उन्हें हिंदू समाज के भीतर रखते हुए संयुक्त राजनीतिक व्यवस्था और सामाजिक सुधार पर बल दिया जाए।
सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व पर व्यापक राजनीतिक मतभेद
➢ द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में सांप्रदायिक प्रश्न पर केवल गांधीजी और आंबेडकर के बीच ही मतभेद नहीं थे। विभिन्न अल्पसंख्यक समुदाय अपने-अपने राजनीतिक हितों की सुरक्षा के लिए अलग-अलग माँगें रख रहे थे।
➢ मुस्लिम प्रतिनिधि पृथक निर्वाचक मंडल और राजनीतिक सुरक्षा के अपने अधिकारों पर जोर दे रहे थे, जबकि अन्य अल्पसंख्यक समूह भी अपने प्रतिनिधित्व को लेकर आश्वासन चाहते थे।
➢ दूसरी ओर, कांग्रेस की ओर से गांधीजी का दृष्टिकोण यह था कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को विभिन्न समुदायों को अलग-अलग राजनीतिक इकाइयों में विभाजित करने के बजाय राष्ट्रीय आधार पर देखा जाना चाहिए। इसलिए वे सांप्रदायिक निर्वाचन की बढ़ती व्यवस्था को लेकर चिंतित थे।
➢ परिणामस्वरूप सम्मेलन में एक ऐसी सर्वमान्य व्यवस्था तैयार नहीं हो सकी जो बहुसंख्यक समुदाय, अल्पसंख्यकों और दलित वर्ग की राजनीतिक माँगों के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
➢ इस स्थिति में ब्रिटिश सरकार ने यह रुख अपनाया कि यदि भारतीय राजनीतिक दल और विभिन्न समुदाय स्वयं किसी समझौते तक नहीं पहुँचते हैं, तो ब्रिटिश सरकार सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर निर्णय देगी।
➢ आगे चलकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड द्वारा 1932 में घोषित सांप्रदायिक निर्णय (कम्युनल अवार्ड) इसी पृष्ठभूमि का परिणाम था।
सांप्रदायिक निर्णय (कम्युनल अवार्ड), 1932
सांप्रदायिक निर्णय की घोषणा
➢ चूँकि द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के दौरान सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर भारतीय नेताओं के बीच सहमति नहीं बन पाई थी। इसलिए ब्रिटिश सरकार ने विभिन्न समुदायों के लिए निर्वाचन और प्रतिनिधित्व की व्यवस्था निर्धारित करने के लिए कम्युनल अवार्ड प्रस्तुत करने का निर्णय लिया।
➢ सांप्रदायिक निर्णय (कम्युनल अवार्ड) की घोषणा ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने 16 अगस्त 1932 को की। इसका उद्देश्य भारत में विभिन्न समुदायों के लिए विधानमंडलों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व और निर्वाचन व्यवस्था निर्धारित करना था।
➢ यह निर्णय विशेष रूप से अल्पसंख्यक समुदायों और दलित वर्ग के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से संबंधित था। इसमें विभिन्न समुदायों के लिए पृथक या विशेष निर्वाचन की व्यवस्था निर्धारित की गई।
प्रमुख प्रावधान
➢ कम्युनल अवार्ड के अंतर्गत पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था को विभिन्न समुदायों के लिए जारी रखा गया। इसके अनुसार संबंधित समुदाय के मतदाता अपने समुदाय के लिए निर्धारित प्रतिनिधियों के चुनाव में भाग लेते थे।
➢ मुसलमानों, सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों तथा यूरोपीय आदि समुदायों के लिए विधानमंडलों में पृथक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गई।
➢ दलित वर्ग को पहली बार पृथक निर्वाचक मंडल प्रदान किया गया। इसके अंतर्गत दलित वर्गों के मतदाता अपने समुदाय के लिए निर्धारित उम्मीदवारों के चुनाव में विशेष भूमिका निभाते थे।
➢ दलित वर्ग के लिए प्रांतीय विधानसभाओं में 71 सीटें निर्धारित की गई थीं। बाद में पूना पैक्ट के माध्यम से इस व्यवस्था में परिवर्तन हुआ और आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाई गई।
➢ दलित वर्ग के मतदाताओं को दोहरी मतदान व्यवस्था (Double Vote) का अधिकार दिया गया था। वे अपने पृथक निर्वाचन के माध्यम से दलित वर्ग के प्रतिनिधि चुन सकते थे तथा सामान्य निर्वाचन में भी मतदान कर सकते थे।
➢ कम्युनल अवार्ड ने प्रांतीय विधानसभाओं में विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व की संख्या और निर्वाचन की व्यवस्था निर्धारित की। सीटों का वितरण अलग-अलग प्रांतों तथा समुदायों की राजनीतिक स्थिति के अनुसार किया गया।
➢ इस व्यवस्था में वेटेज (Weightage) का सिद्धांत भी कुछ समुदायों के प्रतिनिधित्व में प्रयोग किया गया, जिसके अंतर्गत किसी समुदाय को उसकी जनसंख्या के अनुपात से अधिक या कम राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल सकता था।
➢ केंद्र के संबंध में भी विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व और राजनीतिक हितों की सुरक्षा का प्रावधान संवैधानिक योजना का हिस्सा था, लेकिन कम्युनल अवार्ड का सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद प्रावधान दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल था।
सांप्रदायिक निर्णय पर गांधीजी एवं राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
गांधीजी की प्रतिक्रिया
➢ सांप्रदायिक निर्णय में दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल के प्रावधान का महात्मा गांधी ने सबसे अधिक तीव्र विरोध किया। उनका विरोध दलितों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के विचार के विरुद्ध नहीं, बल्कि उन्हें पृथक राजनीतिक निर्वाचन इकाई के रूप में मान्यता दिए जाने के विरुद्ध था।
➢ गांधीजी का मानना था कि दलित वर्ग को हिंदू समाज से अलग राजनीतिक समुदाय के रूप में स्थापित करने से हिंदू समाज का स्थायी विभाजन हो जाएगा। उनके अनुसार इससे अस्पृश्यता समाप्त करने के प्रयासों को भी नुकसान पहुँच सकता था।
➢ गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार को स्पष्ट किया कि वे दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल को स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने इस प्रावधान को बदलने के लिए अपने जीवन तक दाँव पर लगाने की बात कही और बाद में इसी के विरोध में आमरण अनशन का निर्णय लिया।
➢ हालांकि गांधीजी को दलित वर्ग के लिए संयुक्त निर्वाचन के भीतर आरक्षित प्रतिनिधित्व से मूलतः आपत्ति नहीं थी। उनका मुख्य विरोध पृथक निर्वाचक मंडल के कारण हिंदू समाज के राजनीतिक विभाजन से था।
कांग्रेस की प्रतिक्रिया
➢ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सांप्रदायिक निर्णय को स्वीकार नहीं किया। हालांकि कांग्रेस ने तत्काल इसे औपचारिक रूप से पूर्णतः अस्वीकार करने का निर्णय भी नहीं लिया और उसका रुख यह रहा कि विभिन्न समुदायों की सहमति के बिना इस प्रश्न का अंतिम समाधान उचित नहीं होगा।
➢ कांग्रेस के राष्ट्रवादी दृष्टिकोण में भारत की भावी राजनीतिक व्यवस्था का आधार राष्ट्रीय एकता होना चाहिए। इसलिए सांप्रदायिक आधार पर पृथक राजनीतिक निर्वाचन के लगातार विस्तार को लेकर कांग्रेस में गंभीर चिंता थी। विशेष रूप से दलित वर्ग को हिंदुओं से अलग राजनीतिक समूह के रूप में मान्यता देने का विचार कांग्रेस के लिए स्वीकार्य नहीं था।
➢ अनेक राष्ट्रवादी नेताओं ने भी कम्युनल अवार्ड की इस व्यवस्था का विरोध किया और इसे भारतीय समाज में सामुदायिक विभाजन को और गहरा करने वाला माना।
मुस्लिम लीग और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की प्रतिक्रिया
➢ कम्युनल अवार्ड का मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व के बीच स्वागत मुख्यतः इसलिए हुआ क्योंकि इसमें मुसलमानों के पृथक निर्वाचक मंडल को बनाए रखा गया और उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था को मान्यता मिली।
➢ हालांकि मुस्लिम लीग की माँगों की तुलना में अवार्ड की व्यवस्था पूरी तरह संतोषजनक नहीं थी। बाद में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने स्पष्ट किया कि वह इसे स्वीकार कर रही है, लेकिन अपनी शेष राजनीतिक माँगों को छोड़ नहीं रही है।
➢ इस प्रकार मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया को पूर्ण संतुष्टि के रूप में नहीं, बल्कि व्यावहारिक स्वीकृति और आगे की माँगों के लिए राजनीतिक अधिकार सुरक्षित रखने के रूप में समझना अधिक उचित है।
➢ अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लिए भी कम्युनल अवार्ड में पृथक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था होने के कारण इसका सामान्यतः सकारात्मक या स्वीकारात्मक दृष्टिकोण सामने आया। विशेष रूप से वे समुदाय अपनी राजनीतिक सुरक्षा के लिए पृथक प्रतिनिधित्व को महत्वपूर्ण मानते थे।
डॉ. आंबेडकर और दलित वर्ग की प्रतिक्रिया
➢ डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल के प्रावधान का समर्थन किया। उनके लिए यह व्यवस्था दलितों को स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने और बहुसंख्यक सामाजिक समूहों के राजनीतिक प्रभाव से उनकी रक्षा करने का साधन थी।
➢ आंबेडकर के दृष्टिकोण से कम्युनल अवार्ड ने पहली बार दलितों की राजनीतिक समस्या को एक विशिष्ट संवैधानिक और प्रतिनिधित्व संबंधी प्रश्न के रूप में मान्यता दी। इसलिए वे गांधीजी के इस तर्क से सहमत नहीं थे कि पृथक निर्वाचक मंडल केवल हिंदू समाज को विभाजित करने का माध्यम है।
➢ आंबेडकर का तर्क था कि यदि दलितों को वास्तव में अपने हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता चाहिए, तो उन्हें ऐसे प्रतिनिधियों के चयन पर प्रभावी अधिकार मिलना चाहिए। उनके लिए पृथक निर्वाचक मंडल राजनीतिक सुरक्षा का प्रश्न था, न कि केवल निर्वाचन पद्धति का।
अन्य राजनीतिक एवं सामाजिक प्रतिक्रियाएँ
➢ कम्युनल अवार्ड के विरोध में कई हिंदू एवं राष्ट्रवादी संगठनों ने अभियान चलाया। उनका विशेष विरोध दलित वर्ग को पृथक निर्वाचक मंडल देने के निर्णय से था।
➢ उनका तर्क था कि दलितों को हिंदू समाज से अलग राजनीतिक अल्पसंख्यक के रूप में मान्यता देना हिंदू समाज की एकता को कमजोर करेगा। इलाहाबाद यूनिटी कॉन्फ्रेंस जैसी पहलों में पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन की माँग उठाई गई।
➢ दूसरी ओर, दलित वर्ग के भीतर भी कम्युनल अवार्ड को लेकर एकमत प्रतिक्रिया नहीं थी। कुछ नेताओं ने पृथक निर्वाचक मंडल को दलितों के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक सुरक्षा माना,
➢ जबकि कुछ अन्य नेताओं ने इसे हिंदू समाज के भीतर स्थायी विभाजन पैदा करने वाला कदम माना। एम. सी. राजाह ने पृथक निर्वाचक मंडल को खतरनाक और आत्मघाती बताया था।
➢ इस प्रकार कम्युनल अवार्ड ने भारतीय राजनीति में एक व्यापक राजनीतिक विभाजन पैदा कर दिया-जहाँ गांधीजी और अनेक राष्ट्रवादी नेता दलित वर्ग के पृथक निर्वाचन का विरोध कर रहे थे, वहीं आंबेडकर इसे दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक अधिकारों के लिए आवश्यक मान रहे थे।
गांधीजी का आमरण अनशन, वार्ताएँ और पूना पैक्ट की पृष्ठभूमि
गांधीजी का आमरण अनशन और उसकी शुरुआत
➢ सांप्रदायिक निर्णय में दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल के प्रावधान के विरोध में महात्मा गांधी ने 20 सितंबर 1932 को यरवडा जेल में आमरण अनशन प्रारंभ किया। गांधीजी पहले से स्पष्ट कर चुके थे कि वे दलितों के लिए पृथक निर्वाचन को स्वीकार नहीं करेंगे।
➢ गांधीजी के लिए यह केवल निर्वाचन व्यवस्था का प्रश्न नहीं था। उनका मानना था कि दलित वर्ग को हिंदुओं से अलग निर्वाचन इकाई बनाने से हिंदू समाज का राजनीतिक विभाजन स्थायी हो सकता है।
➢ 18 अगस्त 1932 को गांधीजी ने रैम्ज़े मैकडोनाल्ड को पत्र लिखकर अपने प्रस्तावित अनशन के संबंध में सूचित किया था। इसके बाद 20 सितंबर को अनशन शुरू हुआ जोकि 26 सितम्बर तक चला। गांधीजी के स्वास्थ्य को लेकर देशभर में चिंता बढ़ने लगी और राजनीतिक नेताओं पर समझौता कराने का दबाव बढ़ा।
➢ गांधीजी के अनशन ने सांप्रदायिक निर्णय को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद को तत्काल एक गंभीर मानवीय और राजनीतिक संकट में बदल दिया। अब मुख्य प्रश्न यह था कि दलित वर्ग के राजनीतिक हितों की रक्षा करते हुए पृथक निर्वाचक मंडल के स्थान पर कोई वैकल्पिक व्यवस्था तैयार की जा सकती है या नहीं।
गांधीजी और डॉ. आंबेडकर के बीच वार्ताएँ
➢ गांधीजी के अनशन के बाद विभिन्न हिंदू नेताओं तथा दलित वर्ग के प्रतिनिधियों ने समझौते का रास्ता खोजने के लिए प्रयास तेज किए।
➢ इस प्रक्रिया में डॉ. बी. आर. आंबेडकर की भूमिका निर्णायक थी, क्योंकि वे दलित वर्ग के प्रमुख राजनीतिक प्रतिनिधि थे और पृथक राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर उनका रुख अत्यंत महत्वपूर्ण था।
➢ प्रारंभ में आंबेडकर गांधीजी के अनशन से अपने राजनीतिक मत पर पीछे हटने के लिए तैयार नहीं थे। उनका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि किसी भी समझौते में दलित वर्ग को वास्तविक और प्रभावी राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिले। इसलिए केवल पृथक निर्वाचक मंडल समाप्त कर देना उनके लिए पर्याप्त समाधान नहीं था।
➢ दूसरी ओर गांधीजी का आग्रह था कि पृथक निर्वाचक मंडल समाप्त किया जाए, लेकिन दलितों के प्रतिनिधित्व के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है जिससे उन्हें विधानमंडलों में पर्याप्त स्थान प्राप्त हो। इस प्रकार वार्ता का केंद्र धीरे-धीरे पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन में आरक्षित प्रतिनिधित्व की ओर बढ़ने लगा।
➢ समझौते के प्रयासों में मदन मोहन मालवीय सहित अनेक नेताओं ने मध्यस्थता और वार्ता में भूमिका निभाई। विभिन्न प्रस्तावों पर विचार किया गया और दलित वर्ग के लिए अधिक संख्या में आरक्षित सीटें देने तथा उनके प्रतिनिधियों के चयन में विशेष प्रक्रिया अपनाने के विकल्पों पर चर्चा हुई।
समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण मोड़
➢ वार्ताओं के दौरान यह समझ विकसित हुई कि गांधीजी की मुख्य आपत्ति पृथक निर्वाचक मंडल पर है, जबकि आंबेडकर की प्राथमिक चिंता दलितों के प्रभावी राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करना है। इसलिए ऐसा राजनीतिक समाधान खोजा जाने लगा जिसमें दोनों पक्षों की प्रमुख चिंताओं को किसी हद तक संबोधित किया जा सके।
➢ प्रस्तावित समाधान में संयुक्त निर्वाचक मंडल को स्वीकार करते हुए दलित वर्ग के लिए विधानमंडलों में आरक्षित सीटें बढ़ाने की दिशा में सहमति बनने लगी।
➢ इस व्यवस्था के साथ दलित मतदाताओं को अपने प्रतिनिधियों के चयन की प्रक्रिया में विशेष भूमिका देने का विचार भी शामिल था।
➢ इस समझौते का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि दलित वर्ग को कम्युनल अवार्ड में प्रस्तावित 71 सीटों की तुलना में अधिक संख्या में प्रतिनिधित्व दिया जाए।
➢ अंततः बातचीत में प्रांतीय विधानसभाओं के लिए 148 आरक्षित सीटों पर सहमति बनी।
➢ इस प्रकार वार्ता ने धीरे-धीरे उस समझौते का रूप लेना शुरू किया जिसमें पृथक निर्वाचक मंडल के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन तथा अधिक आरक्षित प्रतिनिधित्व को स्वीकार किया गया। यही समझौता आगे चलकर पूना पैक्ट के रूप में सामने आया।
पूना पैक्ट, 1932 : प्रमुख प्रावधान
पूना पैक्ट का परिचय और समझौते की तिथि
➢ पूना पैक्ट (Poona Pact) 1932 में दलित वर्ग के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर गांधीजी और डॉ. बी. आर. आंबेडकर के बीच हुए समझौते का परिणाम था।
➢ इसका उद्देश्य दलित वर्ग के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखते हुए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था के स्थान पर एक वैकल्पिक निर्वाचन व्यवस्था स्थापित करना था।
➢ समझौते पर 24 सितंबर 1932 को सहमति बनी। यह समझौता दलित वर्ग के प्रतिनिधियों तथा सवर्ण हिंदू नेताओं के बीच हुआ।
➢ डॉ. बी. आर. आंबेडकर दलित वर्ग की ओर से प्रमुख प्रतिनिधि थे, जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय सहित अन्य हिंदू नेताओं ने दूसरी ओर से समझौते में भाग लिया।
➢ पूना पैक्ट का मूल उद्देश्य दलित वर्ग को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना था, लेकिन उनके लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था को स्वीकार करने के बजाय संयुक्त निर्वाचन और आरक्षित सीटों की व्यवस्था अपनाई गई।
पृथक निर्वाचक मंडल के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन
➢ पूना पैक्ट की सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल नहीं होगा।
➢ इसके स्थान पर विधानमंडलों में उनके लिए आरक्षित सीटें होंगी और इन सीटों का अंतिम चुनाव संयुक्त निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाएगा।
➢ इसका अर्थ था कि आरक्षित सीट पर उम्मीदवार दलित वर्ग से होगा, लेकिन अंतिम चुनाव में केवल दलित वर्ग के मतदाता ही नहीं, बल्कि सामान्य निर्वाचन क्षेत्र के सभी मतदाता भाग लेंगे। इस प्रकार पूना पैक्ट ने पृथक निर्वाचन की जगह संयुक्त निर्वाचन के भीतर आरक्षित प्रतिनिधित्व का मॉडल स्थापित किया।
प्रांतीय विधानसभाओं में आरक्षित सीटें
➢ पूना पैक्ट के अंतर्गत दलित वर्ग के लिए प्रांतीय विधानसभाओं में कुल 148 सीटें आरक्षित की गईं। इन सीटों का प्रांतवार वितरण इस प्रकार था-
| प्रांत | आरक्षित सीटें |
|---|---|
| मद्रास | 30 |
| बंबई एवं सिंध | 15 |
| पंजाब | 8 |
| बिहार एवं उड़ीसा | 18 |
| मध्य प्रांत | 20 |
| असम | 7 |
| बंगाल | 30 |
| संयुक्त प्रांत | 20 |
| कुल | 148 |
➢ इस प्रकार कम्युनल अवार्ड में दलित वर्ग के लिए प्रस्तावित 71 सीटों की तुलना में पूना पैक्ट के अंतर्गत प्रांतीय विधानसभाओं में आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाकर 148 कर दी गई।
प्राथमिक निर्वाचन और उम्मीदवारों के चयन की व्यवस्था
➢ संयुक्त निर्वाचन को प्रभावी बनाने के लिए पूना पैक्ट में प्राथमिक निर्वाचन की विशेष व्यवस्था की गई। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में सामान्य मतदाता सूची में पंजीकृत दलित वर्ग के मतदाता एक निर्वाचक मंडल के रूप में कार्य करते थे।
➢ यह निर्वाचक मंडल प्रत्येक आरक्षित सीट के लिए दलित वर्ग से संबंधित चार उम्मीदवारों का एक पैनल चुनता था।
➢ प्राथमिक निर्वाचन में सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाले चार उम्मीदवार अंतिम चुनाव के लिए उम्मीदवार बनते थे। इसके बाद इन चार उम्मीदवारों में से अंतिम चुनाव संयुक्त निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता था।
➢ इस प्रकार निर्वाचन की प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होती थी-पहला चरण : दलित वर्ग द्वारा प्राथमिक निर्वाचन और दूसरा चरण : संयुक्त निर्वाचक मंडल द्वारा अंतिम निर्वाचन।
➢ प्राथमिक निर्वाचन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि आरक्षित सीट के लिए अंतिम उम्मीदवार दलित वर्ग में से ही चयनित हों।
केंद्रीय विधानमंडल में प्रतिनिधित्व
➢ पूना पैक्ट ने केंद्रीय विधानमंडल में भी दलित वर्ग के लिए प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया। यहाँ भी प्रतिनिधित्व का आधार संयुक्त निर्वाचक मंडल और आरक्षित सीटें था। उम्मीदवारों के चयन के लिए प्रांतीय विधानसभाओं के समान प्राथमिक निर्वाचन की प्रक्रिया अपनाई जानी थी।
➢ केंद्रीय विधानमंडल में ब्रिटिश भारत के सामान्य निर्वाचन के लिए आवंटित सीटों में से 18 प्रतिशत सीटें दलित वर्ग के लिए आरक्षित की गईं।
शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं से संबंधित प्रावधान
➢ पूना पैक्ट केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं था। इसमें दलित वर्ग की सामाजिक और शैक्षिक स्थिति सुधारने के लिए भी प्रावधान किए गए।
➢ प्रत्येक प्रांत के शैक्षिक अनुदान में से पर्याप्त राशि दलित वर्ग के सदस्यों के लिए शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने हेतु निर्धारित करने की बात कही गई।
➢ सार्वजनिक सेवाओं और स्थानीय निकायों से संबंधित मामलों में दलित वर्ग के सदस्य होने के आधार पर किसी प्रकार की अयोग्यता या भेदभाव नहीं लगाया जाना था।
➢ साथ ही, उनकी उचित एवं निष्पक्ष प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए प्रयास करने का प्रावधान किया गया, बशर्ते सार्वजनिक सेवाओं के लिए निर्धारित शैक्षिक योग्यताएँ पूरी की जाएँ।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व की अवधि
➢ पूना पैक्ट में प्राथमिक निर्वाचन की व्यवस्था को पहले दस वर्षों के लिए लागू किया गया था। समझौते के अनुसार इसे दस वर्ष पूरे होने से पहले भी संबंधित समुदायों की पारस्परिक सहमति से समाप्त किया जा सकता था।
➢ दूसरी ओर, प्रांतीय और केंद्रीय विधानमंडलों में दलित वर्ग के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था तब तक जारी रहने की बात कही गई जब तक संबंधित समुदाय आपसी सहमति से इसमें परिवर्तन करने का निर्णय न लें।
➢ इस प्रकार प्राथमिक निर्वाचन और आरक्षित सीटों की अवधि को एक ही रूप में निर्धारित नहीं किया गया था।
पूना पैक्ट और कम्युनल अवार्ड में सीटों का परिवर्तन
| आधार | कम्युनल अवार्ड | पूना पैक्ट |
|---|---|---|
| दलित वर्ग की निर्वाचन व्यवस्था | पृथक निर्वाचक मंडल | संयुक्त निर्वाचक मंडल |
| प्रांतीय विधानसभाओं में सीटें | 71 | 148 |
| अंतिम चुनाव | पृथक निर्वाचन व्यवस्था | संयुक्त निर्वाचन |
| उम्मीदवार चयन | दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचन | प्राथमिक निर्वाचन के बाद संयुक्त निर्वाचन |
| केंद्रीय विधानमंडल | कम्युनल अवार्ड की व्यवस्था | सामान्य निर्वाचन की 18% सीटें दलित वर्ग के लिए आरक्षित |
➢ इस तुलना से स्पष्ट है कि पूना पैक्ट ने पृथक निर्वाचक मंडल को समाप्त किया, लेकिन इसके बदले दलित वर्ग को मिलने वाले आरक्षित प्रतिनिधित्व की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की।
पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर करने वाले प्रमुख पक्ष और प्रतिनिधि
➢ पूना पैक्ट पर दलित वर्ग और सवर्ण हिंदू नेताओं की ओर से अनेक प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए। प्रमुख हस्ताक्षरकर्ताओं में डॉ. बी. आर. आंबेडकर, पंडित मदन मोहन मालवीय, एम. आर. जयकर, तेज बहादुर सप्रू, सी. राजगोपालाचारी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, एम. सी. राजाह, जी. डी. बिड़ला, देवदास गांधी और राव बहादुर आर. श्रीनिवासन आदि शामिल थे।
➢ महात्मा गांधी स्वयं पूना पैक्ट के हस्ताक्षरकर्ता नहीं थे। समझौते के समय वे यरवदा जेल में थे और अनशन पर थे ( 20 सितंबर से)। ध्यान दें द्वितीय गोलमेज सम्मलेन से असंतुष्ट होकर उन्होंने पुन: सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारभ कर दिया था जिसके कारण ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इसलिए समझौते पर संबंधित पक्षों के प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए थे।
➢ पूना समझौते के बाद संबंधित प्रस्ताव ब्रिटिश सरकार के समक्ष भेजे गए। ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा समझौते को स्वीकार किए जाने के बाद गांधीजी ने 26 सितंबर 1932 को अपना आमरण अनशन समाप्त किया।
सांप्रदायिक निर्णय और पूना पैक्ट : तुलनात्मक अध्ययन
| आधार | सांप्रदायिक निर्णय, 1932 | पूना पैक्ट, 1932 |
|---|---|---|
| घोषणा/समझौता | 16 अगस्त 1932 | 24 सितंबर 1932 |
| स्वरूप | ब्रिटिश सरकार द्वारा घोषित निर्णय | महात्मा गांधी एवं डॉ. भीमराव आंबेडकर के बीच समझौता |
| दलित वर्ग के लिए निर्वाचन व्यवस्था | पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorate) | संयुक्त निर्वाचक मंडल (Joint Electorate) के साथ आरक्षित सीटें |
| दलित वर्ग की प्रांतीय सीटें | 71 | 148 |
| उम्मीदवारों का चयन | पृथक निर्वाचन व्यवस्था | प्राथमिक निर्वाचन में दलित वर्ग के मतदाताओं द्वारा पैनल का चयन, उसके बाद संयुक्त निर्वाचन |
| प्राथमिक निर्वाचन | पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था | प्रत्येक आरक्षित सीट के लिए चार उम्मीदवारों का पैनल चुना जाता था |
| केंद्रीय विधानमंडल | दलित वर्ग के लिए पृथक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था | सामान्य निर्वाचन की सीटों में से 18% सीटें आरक्षित |
| दोहरा मत (Double Vote) | दलित वर्ग को पृथक निर्वाचन और सामान्य निर्वाचन, दोनों में मतदान का अधिकार | पृथक निर्वाचन समाप्त होने के कारण यह व्यवस्था समाप्त |
| गांधीजी का दृष्टिकोण | दलित वर्ग के पृथक निर्वाचक मंडल का विरोध | संयुक्त निर्वाचन के साथ आरक्षित सीटों को स्वीकार किया |
| डॉ. आंबेडकर का दृष्टिकोण | पृथक निर्वाचक मंडल को दलितों की राजनीतिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना | समझौते के रूप में संयुक्त निर्वाचन के साथ अधिक संख्या में आरक्षित सीटें स्वीकार कीं |
| मुख्य उद्देश्य | विभिन्न समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का निर्धारण | दलित प्रतिनिधित्व एवं हिंदू समाज की एकता के बीच संतुलन स्थापित करना |
| परिणाम | गांधीजी का आमरण अनशन प्रारम्भ हुआ | अनशन समाप्त हुआ तथा नई प्रतिनिधित्व व्यवस्था लागू हुई |
➢ दोनों व्यवस्थाओं में सबसे मूलभूत अंतर निर्वाचन के स्वरूप को लेकर था। सांप्रदायिक निर्णय ने दलित वर्ग को पृथक निर्वाचक मंडल दिया, जबकि पूना पैक्ट ने इस व्यवस्था को समाप्त करके संयुक्त निर्वाचक मंडल के भीतर आरक्षित सीटों की व्यवस्था की।
➢ सीटों की संख्या के स्तर पर पूना पैक्ट ने दलित वर्ग को सांप्रदायिक निर्णय की तुलना में अधिक प्रतिनिधित्व दिया। प्रांतीय विधानसभाओं में सीटों की संख्या 71 से बढ़कर 148 हो गई।
➢ मूल पूना पैक्ट के अनुसार सीटों का प्रांतवार कुल 148 था, जिसमें बॉम्बे एवं सिंध के लिए 15 सीटें शामिल थीं।
➢ हालांकि केवल सीटों की संख्या की तुलना पर्याप्त नहीं है। सांप्रदायिक निर्णय में पृथक निर्वाचक मंडल और दोहरा मत के कारण दलित वर्ग को अपने राजनीतिक प्रतिनिधियों के चयन में अधिक स्वतंत्रता मिलती थी।
➢ पूना पैक्ट में सीटें अधिक होने के बावजूद अंतिम चुनाव संयुक्त निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाना था। इस अंतर को डॉ. आंबेडकर के दृष्टिकोण से विशेष महत्व प्राप्त हुआ।
गांधीजी और डॉ. आंबेडकर के दृष्टिकोण में अंतर
➣ गांधीजी और आंबेडकर दोनों दलितों के उत्थान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के समर्थक थे, लेकिन उनके समाधान का तरीका अलग था। गांधीजी सामाजिक एकता और संयुक्त निर्वाचन पर जोर देते थे, जबकि आंबेडकर स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक सुरक्षा को अधिक महत्वपूर्ण मानते थे।
| आधार | महात्मा गांधी | डॉ. बी. आर. आंबेडकर |
|---|---|---|
| दलितों की राजनीतिक स्थिति | दलितों को हिंदू समाज का अभिन्न हिस्सा मानते थे। | दलितों को स्वतंत्र राजनीतिक हितों वाले वंचित वर्ग के रूप में देखते थे। |
| पृथक निर्वाचक मंडल | दृढ़ विरोध किया। | प्रारंभ में समर्थन किया। |
| मुख्य चिंता | हिंदू समाज के राजनीतिक विभाजन को रोकना। | दलितों को प्रभावी और स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिलाना। |
| प्रतिनिधित्व का तरीका | संयुक्त निर्वाचन के भीतर आरक्षित प्रतिनिधित्व। | पृथक निर्वाचन के माध्यम से स्वतंत्र प्रतिनिधित्व। |
| सामाजिक सुधार | अस्पृश्यता उन्मूलन और हिंदू समाज के भीतर सुधार पर जोर। | सामाजिक सुधार के साथ राजनीतिक शक्ति और संवैधानिक सुरक्षा पर जोर। |
| सांप्रदायिक निर्णय पर दृष्टिकोण | दलित वर्ग के पृथक निर्वाचन का विरोध। | दलित वर्ग के पृथक निर्वाचन का समर्थन। |
| पूना पैक्ट पर दृष्टिकोण | संयुक्त निर्वाचन और आरक्षित सीटों को स्वीकार किया। | पृथक निर्वाचन की मूल माँग छोड़कर अधिक आरक्षित सीटों वाला समझौता स्वीकार किया। |
➣ पूना पैक्ट के बाद गांधीजी ने दलित प्रश्न को केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित न रखते हुए अस्पृश्यता उन्मूलन और सामाजिक सुधार को भी अपने कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।
➣ इसी दिशा में आगे चलकर हरिजन आंदोलन के माध्यम से उन्होंने अस्पृश्यता के विरुद्ध व्यापक सामाजिक अभियान चलाया। इस प्रकार पूना पैक्ट के राजनीतिक समझौते के बाद हरिजन आंदोलन गांधीजी के सामाजिक सुधार कार्यक्रम का महत्वपूर्ण चरण बना।
पूना पैक्ट का ऐतिहासिक महत्व एवं आलोचनात्मक मूल्यांकन
ऐतिहासिक महत्व एवं दीर्घकालिक प्रभाव
➢ पूना पैक्ट में स्वीकृत सिद्धांत (संयुक्त निर्वाचन के भीतर आरक्षित सीटें) को ब्रिटिश सरकार ने संशोधन के साथ भारत शासन अधिनियम, 1935 में सम्मिलित किया। इसके फलस्वरूप दलित वर्ग को छोड़कर मुसलमानों, सिखों तथा अन्य समुदायों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल आगे भी जारी रहा, लेकिन दलितों के लिए यह व्यवस्था स्थायी रूप से समाप्त हो गई।
➢ स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा में डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में ही अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए संयुक्त निर्वाचन के भीतर आरक्षित सीटों की व्यवस्था को संविधान का हिस्सा बनाया गया (अनुच्छेद 330 एवं 332)। इस अर्थ में पूना पैक्ट का सिद्धांत ही आधुनिक भारत की राजनीतिक आरक्षण व्यवस्था का प्रत्यक्ष पूर्वज माना जाता है।
➢ पूना पैक्ट ने दलित वर्ग के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को पहली बार शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं में उचित प्रतिनिधित्व जैसे व्यापक सामाजिक न्याय के प्रश्नों से भी जोड़ा, जो आगे चलकर स्वतंत्र भारत की आरक्षण नीति में और विस्तृत हुआ।
आलोचना और सीमाएँ (कमियाँ)
➢ डॉ. आंबेडकर ने बाद में अपनी पुस्तक “व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स” (1945) में पूना पैक्ट की तीखी आलोचना की। उनका कहना था कि गांधीजी का अनशन एक प्रकार का नैतिक दबाव था, जिसने दलित वर्ग के सामने वास्तव में कोई वास्तविक विकल्प नहीं छोड़ा था।
➢ आंबेडकर के अनुसार पृथक निर्वाचक मंडल की समाप्ति से दलित प्रतिनिधियों को चुनाव जीतने के लिए बहुसंख्यक (सवर्ण हिंदू) मतदाताओं पर निर्भर रहना पड़ता, जिससे वे स्वतंत्र राजनीतिक आवाज बनने के बजाय बहुसंख्यक समाज के हितों के प्रति भी उत्तरदायी हो जाते।
➢ दलित राजनीति में इस दृष्टिकोण को बहुजन नेता कांशीराम ने अपनी पुस्तक चमचा युग में और आगे बढ़ाया। उनका तर्क था कि पूना पैक्ट के बाद संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था में दलित प्रतिनिधि प्रायः बहुसंख्यक-प्रभुत्व वाली पार्टियों के चमचे (अनुयायी) बनकर रह गए, न कि दलित समाज के स्वतंत्र प्रतिनिधि।
➢ कुछ इतिहासकारों का यह भी तर्क है कि संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था के कारण सवर्ण हिंदू बहुल कांग्रेस के प्रभाव में दलित प्रतिनिधित्व वास्तविक रूप से सीमित हो गया, जिसे आलोचक राजनीतिक वंचना की संज्ञा देते हैं।
➢ इस प्रकार पूना पैक्ट का मूल्यांकन दो विपरीत दृष्टिकोणों से किया जाता है – एक ओर इसे सामाजिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक एवं व्यावहारिक कदम माना जाता है, तो दूसरी ओर इसे दलित वर्ग की राजनीतिक स्वायत्तता पर एक समझौता भी बताया जाता है। UPSC मुख्य परीक्षा की दृष्टि से दोनों पक्षों को संतुलित रूप से समझना आवश्यक है।
पूना पैक्ट ने दलित राजनीतिक प्रतिनिधित्व को स्थायी संवैधानिक आधार देकर भारत शासन अधिनियम, 1935 तथा बाद में संविधान के अनुच्छेद 330-332 की नींव रखी। किंतु डॉ. आंबेडकर के अपने बाद के लेखन (1945) और कांशीराम के “चमचा युग” जैसे विश्लेषणों में इसे दलितों की स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति पर समझौता भी माना गया है।
महत्वपूर्ण तथ्य
➣ सांप्रदायिक निर्णय (कम्युनल अवार्ड) की घोषणा 16 अगस्त 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड द्वारा की गई थी।
➣ सांप्रदायिक निर्णय की पृष्ठभूमि द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में अल्पसंख्यकों और विभिन्न समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर सहमति न बन पाने से जुड़ी थी।
➣ सांप्रदायिक निर्णय के अंतर्गत मुसलमानों, सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों और यूरोपीय समुदाय सहित विभिन्न समुदायों के लिए पृथक अथवा विशेष राजनीतिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गई थी।
➣ सांप्रदायिक निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद प्रावधान दलित वर्ग (दलित वर्ग) के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था था।
➣ सांप्रदायिक निर्णय में दलित वर्ग के लिए प्रांतीय विधानसभाओं में 71 सीटें निर्धारित की गई थीं।
➣ महात्मा गांधी ने दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल का विरोध किया। उन्होंने 20 सितंबर 1932 को यरवदा केंद्रीय कारागार, पुणे में इसके विरोध में आमरण अनशन प्रारम्भ किया।
➣ गांधीजी का विरोध दलितों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के विरुद्ध नहीं, बल्कि उन्हें हिंदू समाज से अलग पृथक राजनीतिक निर्वाचन इकाई के रूप में मान्यता दिए जाने के विरुद्ध था।
➣ डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने प्रारम्भ में दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल का समर्थन किया। उनका तर्क था कि इससे दलितों को अपने राजनीतिक प्रतिनिधियों के चयन में अधिक स्वतंत्रता और प्रभावी प्रतिनिधित्व मिल सकेगा।
➣ गांधीजी के अनशन के बाद विभिन्न नेताओं के बीच वार्ताएँ हुईं और अंततः 24 सितंबर 1932 को पूना पैक्ट पर समझौता हुआ। गांधीजी उस समय यरवदा जेल में थे। वे स्वयं इस समझौते के हस्ताक्षरकर्ता नहीं थे।
➣ पूना पैक्ट के अंतर्गत दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल समाप्त कर संयुक्त निर्वाचक मंडल के साथ आरक्षित सीटों की व्यवस्था स्वीकार की गई।
➣ पूना पैक्ट के अंतर्गत प्रांतीय विधानसभाओं में दलित वर्ग के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 71 से बढ़ाकर 148 कर दी गई।
➣ पूना पैक्ट में आरक्षित सीटों के उम्मीदवारों के चयन के लिए प्राथमिक निर्वाचन की व्यवस्था की गई। इसमें दलित वर्ग के मतदाता पहले उम्मीदवारों का एक पैनल चुनते थे, जिसके बाद संयुक्त निर्वाचन द्वारा अंतिम प्रतिनिधि का चुनाव किया जाता था।
➣ पूना पैक्ट के अंतर्गत केंद्रीय विधानमंडल में भी दलित वर्ग के लिए 18 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया।
➣ पूना पैक्ट में दलित वर्ग के लिए शैक्षिक सुविधाओं हेतु विशेष ध्यान देने तथा सार्वजनिक सेवाओं में उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का प्रावधान भी किया गया।
➣ सांप्रदायिक निर्णय और पूना पैक्ट के बीच मूल अंतर यह था कि सांप्रदायिक निर्णय में दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल था, जबकि पूना पैक्ट में संयुक्त निर्वाचक मंडल + आरक्षित सीटों की व्यवस्था स्वीकार की गई।
➣ पूना पैक्ट का सिद्धांत आगे चलकर भारत शासन अधिनियम, 1935 में शामिल किया गया और स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330 एवं 332 के अंतर्गत अनुसूचित जातियों/जनजातियों के आरक्षण का आधार बना।
➣ डॉ. आंबेडकर ने बाद में अपनी पुस्तक “व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स” (1945) में पूना पैक्ट को गांधीजी के अनशन के दबाव में हुआ समझौता बताया था, जबकि बहुजन नेता कांशीराम ने इसे “चमचा युग” की शुरुआत कहा।
भ्रम बिंदु
➣ सांप्रदायिक निर्णय और पूना पैक्ट एक ही घटना नहीं हैं। 16 अगस्त 1932 ई. को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने सांप्रदायिक निर्णय की घोषणा की थी, जबकि 24 सितम्बर 1932 ई. को महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अम्बेडकर के बीच हुए समझौते को पूना पैक्ट कहा जाता है।
➣ पूना पैक्ट ने पृथक निर्वाचन की व्यवस्था लागू नहीं की थी। पृथक निर्वाचन की व्यवस्था सांप्रदायिक निर्णय में प्रस्तावित की गई थी, जबकि पूना पैक्ट ने इसे समाप्त कर संयुक्त निर्वाचन की व्यवस्था स्वीकार की।
➣ महात्मा गांधी ने सांप्रदायिक निर्णय का पूर्णतः विरोध नहीं किया था। उनका विरोध केवल दलितों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था से था।
➣ डॉ. भीमराव अम्बेडकर प्रारम्भ में दलितों के लिए पृथक निर्वाचन के समर्थक थे, क्योंकि वे इसे उनके राजनीतिक अधिकारों की सुरक्षा का प्रभावी माध्यम मानते थे। बाद में गांधीजी के अनशन तथा वार्ता के परिणामस्वरूप उन्होंने पूना पैक्ट पर सहमति व्यक्त की।
➣ पूना पैक्ट के बाद दलितों का आरक्षण समाप्त नहीं हुआ था। इसमें पृथक निर्वाचन समाप्त किया गया, जबकि प्रांतीय विधानसभाओं में आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ा दी गई।
➣ पूना पैक्ट केवल महात्मा गांधी और ब्रिटिश सरकार के बीच हुआ समझौता नहीं था। यह महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अम्बेडकर तथा अन्य हिन्दू एवं दलित प्रतिनिधियों के बीच हुआ समझौता था।
➣ महात्मा गांधी ने 20 सितम्बर 1932 ई. को यरवदा केंद्रीय कारागार (पुणे) में दलितों के लिए पृथक निर्वाचन के विरोध में आमरण अनशन प्रारम्भ किया था।
➣ सांप्रदायिक निर्णय केवल दलितों से संबंधित नहीं था। इसमें मुस्लिम, सिख, भारतीय ईसाई, एंग्लो-इंडियन, यूरोपीय तथा दलित सहित अनेक समुदायों के लिए निर्वाचन संबंधी प्रावधान किए गए थे।
➣ सांप्रदायिक निर्णय (1932) और भारत शासन अधिनियम, 1935 एक ही नहीं हैं। सांप्रदायिक निर्णय निर्वाचन व्यवस्था से संबंधित घोषणा थी, जबकि भारत शासन अधिनियम, 1935 एक व्यापक संवैधानिक अधिनियम था।
➣ परीक्षा की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण अंतर यह है कि सांप्रदायिक निर्णय ने दलितों के लिए पृथक निर्वाचन का प्रावधान किया था, जबकि पूना पैक्ट ने संयुक्त निर्वाचन के साथ आरक्षित सीटों की व्यवस्था स्वीकार की।
➣ पूना पैक्ट ने दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचन लागू नहीं किया था। इसके विपरीत, इसने सांप्रदायिक निर्णय द्वारा दिए गए पृथक निर्वाचन को समाप्त कर संयुक्त निर्वाचन की व्यवस्था स्वीकार की थी।
➣ पूना पैक्ट के अंतर्गत दलित वर्ग की आरक्षित सीटें घटाई नहीं गई थीं। इसके विपरीत, सांप्रदायिक निर्णय में निर्धारित 71 सीटों को बढ़ाकर 148 सीटें कर दिया गया था।
➣ पूना पैक्ट किसी ब्रिटिश कानून या सरकारी अधिनियम का नाम नहीं है। यह महात्मा गांधी एवं डॉ. भीमराव आंबेडकर के मध्य हुआ एक राजनीतिक समझौता था।
➣ पूना पैक्ट लंदन में नहीं हुआ था। यह 24 सितंबर 1932 को यरवदा केंद्रीय कारागार (पुणे) में हुई वार्ताओं के परिणामस्वरूप संपन्न हुआ था।
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