बहिष्कृत हितकारिणी सभा (1924) : महाड़ सत्याग्रह और ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज कांग्रेस (1930)

भारतीय इतिहास आधुनिक भारत बहिष्कृत हितकारिणी सभा (1924)
📚 विषय सूची

बहिष्कृत हितकारिणी सभा (1924)

बहिष्कृत हितकारिणी सभा डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर द्वारा वर्ष 1924 में स्थापित एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था थी।

➣ इसका मुख्य उद्देश्य बहिष्कृत वर्गों में शिक्षा, संगठन, आत्मसम्मान और अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा करना था। आगे चलकर यह संस्था अंबेडकर के व्यापक दलित सामाजिक आंदोलन का महत्वपूर्ण आधार बनी।

➣ सभा का उदय ऐसे समय हुआ जब अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के कारण बहिष्कृत वर्गों को समाज के सामान्य जीवन में अनेक प्रकार के भेदभाव का सामना करना पड़ता था।

➣ उन्हें कई स्थानों पर विद्यालयों, सार्वजनिक कुओं और तालाबों, मंदिरों तथा अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के उपयोग से वंचित रखा जाता था। शिक्षा और सरकारी नौकरियों के अवसर भी उनके लिए बहुत सीमित थे।

➣ अंबेडकर का मानना था कि केवल सहानुभूति या ऊँची जातियों के सुधारवादी प्रयासों से इस स्थिति में स्थायी बदलाव नहीं आएगा। बहिष्कृत वर्गों को स्वयं शिक्षित, संगठित और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की आवश्यकता थी। इसी सोच ने आगे चलकर बहिष्कृत हितकारिणी सभा के गठन की पृष्ठभूमि तैयार की।

➣ सभा की गतिविधियाँ आगे चलकर शिक्षा एवं छात्रावासों की व्यवस्था, सामाजिक जागरूकता, सार्वजनिक अधिकारों के लिए संघर्ष और बहिष्कृत समाज के संगठन तक पहुँचीं। महाड़ सत्याग्रह, मनुस्मृति दहन और कालाराम मंदिर सत्याग्रह जैसे आंदोलनों की वैचारिक एवं संगठनात्मक पृष्ठभूमि को समझने में भी इस संस्था की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

पृष्ठभूमि

बहिष्कृत वर्गों की सामाजिक एवं शैक्षिक स्थिति

➣ 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में बहिष्कृत वर्गों के सामने सबसे बड़ी समस्याओं में अस्पृश्यता, सामाजिक अलगाव और शिक्षा से वंचित होना शामिल था। जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था के कारण अनेक स्थानों पर

➣ उन्हें विद्यालयों, सार्वजनिक जलस्रोतों और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के उपयोग में भेदभाव का सामना करना पड़ता था। इससे उनकी आर्थिक उन्नति के अवसर सीमित हो जाते थे।

➣ शिक्षा की कमी इस समस्या को और गंभीर बनाती थी। आधुनिक शिक्षा और सरकारी नौकरियों तक सीमित पहुँच के कारण बहिष्कृत वर्ग प्रशासन, पेशेवर क्षेत्रों और सार्वजनिक जीवन में बहुत कम प्रतिनिधित्व रखते थे।

➣ इसलिए शिक्षा को सामाजिक मुक्ति और आत्मनिर्भरता का आधार बनाना अंबेडकर की प्रारंभिक सामाजिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।

➣ अंबेडकर के दृष्टिकोण में समस्या केवल आर्थिक गरीबी तक सीमित नहीं थी। उनका अनुभव था कि जातिगत भेदभाव स्वयं सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन को पुनः उत्पन्न करता है। इसलिए बहिष्कृत वर्गों के उत्थान के लिए शिक्षा, संगठन और सामाजिक अधिकारों के लिए संघर्ष-तीनों को साथ लेकर चलना आवश्यक था।

अंबेडकर का व्यक्तिगत अनुभव

➣ डॉ. अंबेडकर स्वयं जातिगत भेदभाव के प्रत्यक्ष अनुभव से गुजरे थे। विद्यालयी जीवन से लेकर उच्च शिक्षा और बड़ौदा में नौकरी के दौरान उन्हें अस्पृश्यता और सामाजिक अपमान का सामना करना पड़ा।

➣ विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भारत लौटने पर उन्होंने यह अनुभव किया कि उच्च शिक्षा और व्यक्तिगत योग्यता प्राप्त करने के बावजूद जातिगत पहचान सामाजिक भेदभाव से मुक्ति की गारंटी नहीं देती

1923 में लंदन से भारत लौटने के बाद अंबेडकर ने बहिष्कृत वर्गों के बीच सामाजिक संगठन और जागरूकता के कार्य को अधिक व्यवस्थित रूप देने का निर्णय लिया।

➣ सरकारी स्रोतों के अनुसार इसी दौर में उन्होंने बहिष्कृत वर्गों की शिक्षा, संस्कृति, आर्थिक स्थिति और समस्याओं को उचित मंच पर उठाने के लिए संगठनात्मक प्रयास तेज किए।

बहिष्कृत हितकारिणी सभा की आवश्यकता

➣ 1920 के दशक के प्रारंभ तक अंबेडकर के सामने बहिष्कृत वर्गों की स्थिति सुधारने के लिए तीन परस्पर जुड़े हुए प्रश्न स्पष्ट हो चुके थे-शिक्षा का प्रसार, सामाजिक संगठन और आर्थिक-सामाजिक अधिकारों की प्राप्ति

➣ केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग उठाने से उन समुदायों की मूल सामाजिक स्थिति नहीं बदल सकती थी जिन्हें शिक्षा और सार्वजनिक जीवन से ही बाहर रखा गया था।

➣ इसलिए एक ऐसे केंद्रीय संगठन की आवश्यकता थी जो बहिष्कृत वर्गों के विद्यार्थियों को शैक्षिक सहायता दे, सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना विकसित करे, आर्थिक स्थिति सुधारने के उपाय करे और उनकी शिकायतों को सरकार तथा सार्वजनिक संस्थाओं के सामने प्रस्तुत करे

➣ यही आवश्यकता 1924 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना की तत्काल पृष्ठभूमि बनी।

बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना (1924)

1919 में साउथबरो समिति के सामने साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए अंबेडकर ने बहिष्कृत वर्गों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पृथक निर्वाचक मंडल की आवश्यकता पर जोर दिया।

➣ उनका तर्क था कि यदि राजनीतिक संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं किया गया, तो बहिष्कृत वर्गों की समस्याएँ प्रभावी रूप से सामने नहीं आ सकेंगी। 27 जनवरी 1919 को उन्होंने समिति के सामने अपना पक्ष रखा।

➣ इसके बाद 1920 में अंबेडकर ने मूकनायक नामक मराठी पत्र शुरू किया। इसका उद्देश्य बहिष्कृत समाज की समस्याओं, सामाजिक भेदभाव और उनके अधिकारों से जुड़े प्रश्नों को सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनाना था।

➣ 1920 के दशक के प्रारंभ तक अंबेडकर इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके थे कि बहिष्कृत वर्गों की समस्याओं के समाधान के लिए केवल बाहरी सहानुभूति या परोपकार पर्याप्त नहीं है।

➣ उन्हें अपनी स्वतंत्र और संगठित संस्था की आवश्यकता थी, जो उनकी समस्याओं को स्वयं उनके नेतृत्व में सामने रख सके। शिक्षा, सामाजिक सुधार और राजनीतिक अधिकारों से जुड़े प्रश्नों पर एक साथ काम करने के लिए ऐसे संगठन की जरूरत लगातार महसूस हो रही थी।

➣ इसी सोच के तहत 9 मार्च 1924 को बंबई के दामोदर हॉल में अंबेडकर ने एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की। बैठक में बहिष्कृत वर्गों की कठिनाइयों पर चर्चा हुई और इस बात पर विचार किया गया कि उनकी

➣ समस्याओं तथा शिकायतों को सरकार के सामने प्रभावी ढंग से रखने के लिए एक केंद्रीय संस्था स्थापित की जानी चाहिए।

➣ इस बैठक में प्रस्तावित संस्था के नाम के रूप में बहिष्कृत हितकारिणी सभा” को स्वीकार किया गया। संस्था का मुख्य कार्यालय बंबई के दामोदर हॉल में रखने का निर्णय हुआ और इसके काम का क्षेत्र तत्कालीन बंबई प्रेसीडेंसी तक रखा गया। अंबेडकर ने स्वयं संस्था के लिए संविधान तैयार किया।

➣ इसके बाद 20 जुलाई 1924 को बहिष्कृत हितकारिणी सभा की औपचारिक स्थापना हुई। संस्था को Indian Societies Registration Act, 1860 (Act XXI of 1860) के अंतर्गत पंजीकृत किया गया।

➣ इस प्रकार 9 मार्च की प्रारंभिक बैठक के लगभग चार महीने बाद अंबेडकर के नेतृत्व में यह संगठन औपचारिक रूप से अस्तित्व में आया।

➣ सभा की प्रारंभिक संगठनात्मक व्यवस्था में सर चिमनलाल हरिलाल सीतलवाड़ को अध्यक्ष बनाया गया। नयेर निसीम उपाध्यक्ष, एस. एन. शिवतारकर सचिव तथा एन. टी. जाधव कोषाध्यक्ष बने। डॉ. बी. आर. अंबेडकर को प्रबंध समिति का अध्यक्ष बनाया गया।

➣ इसके अलावा रुस्तमजी जिनवाला, जी. के. नरीमन, डॉ. आर. पी. परांजपे, डॉ. वी. पी. चव्हाण और बी. जी. खेर जैसे लोग भी प्रारंभिक संगठन से जुड़े थे।

सभा के उद्देश्य एवं कार्यक्षेत्र

  • बहिष्कृत वर्गों में शिक्षा का प्रसार करना। इसके लिए छात्रावास खोलने तथा विद्यार्थियों की शिक्षा के लिए आवश्यक अन्य साधन उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया।
  • बहिष्कृत वर्गों में संस्कृति और बौद्धिक चेतना का विकास करना। इसके लिए पुस्तकालय, सामाजिक केंद्र, कक्षाएँ तथा अध्ययन मंडल स्थापित करने की योजना बनाई गई।
  • बहिष्कृत वर्गों की आर्थिक स्थिति में सुधार करना। इसके लिए औद्योगिक एवं कृषि विद्यालय शुरू करने का उद्देश्य रखा गया, ताकि शिक्षा को रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ा जा सके।
  • बहिष्कृत वर्गों की शिकायतों और समस्याओं को उचित मंच पर प्रस्तुत करना तथा उनके समाधान के लिए सरकार और संबंधित संस्थाओं का ध्यान आकर्षित करना।
  • ऐसे क्लब, संघों और सामाजिक आंदोलनों को संगठित करना या उनकी सहायता करना, जो बहिष्कृत वर्गों में सामान्य जागरूकता, सामाजिक उन्नति और आर्थिक सुधार लाने में सहायक हों।

शिक्षा और संस्थागत निर्माण

बहिष्कृत हितकारिणी सभा ने शिक्षा को बहिष्कृत वर्गों की सामाजिक उन्नति का सबसे महत्वपूर्ण साधन माना। इसलिए सभा ने केवल शिक्षा के प्रचार की बात नहीं की, बल्कि छात्रावास, अध्ययन की सुविधाएँ, वाचनालय और विद्यार्थियों के लिए सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में व्यावहारिक काम शुरू किया।

➣ सभा के कार्यक्रम में बहिष्कृत वर्गों के विद्यार्थियों के लिए छात्रावास खोलना महत्वपूर्ण स्थान रखता था। इसका उद्देश्य ऐसे विद्यार्थियों को रहने और पढ़ने की सुविधा देना था, जिन्हें आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक भेदभाव के कारण शिक्षा जारी रखने में परेशानी होती थी।

➣ सभा ने 4 जनवरी 1925 को सोलापुर में बहिष्कृत वर्गों के हाई स्कूल विद्यार्थियों के लिए छात्रावास शुरू किया। इसके प्रबंधन की जिम्मेदारी जीवप्पा सुबा आयडले को दी गई, जो सोलापुर के सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय निकाय से जुड़े व्यक्ति थे। यह सभा की शिक्षा के क्षेत्र में पहली महत्वपूर्ण व्यावहारिक पहलों में से एक थी।

➣ छात्रावास में रहने वाले विद्यार्थियों के भोजन, कपड़े और स्टेशनरी जैसे खर्चों में भी सहायता दी जाती थी। इसके रखरखाव के लिए सोलापुर नगरपालिका ने 40 रुपये की सहायता प्रदान की।

यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि सभा का काम केवल छात्रावास उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं था, बल्कि विद्यार्थियों की पढ़ाई जारी रखने के लिए आर्थिक सहायता भी दी जाती थी।

➣ सभा ने विद्यार्थियों में केवल सामान्य शिक्षा ही नहीं, बल्कि ज्ञान प्राप्त करने, अध्ययन की रुचि और सामाजिक सेवा की भावना विकसित करने का भी प्रयास किया।

➣इसके लिए बहिष्कृत वर्ग के विद्यार्थियों से संबंधित एक संस्था शुरू की गई। उसके मार्गदर्शन में विद्यार्थियों ने सरस्वती विलास नामक मासिक पत्रिका भी निकाली। इससे विद्यार्थियों में लेखन, अध्ययन और सामाजिक प्रश्नों पर विचार करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला।

➣ शिक्षा को समाज के व्यापक स्तर तक पहुँचाने के लिए सभा की योजनाओं में पुस्तकालय, सामाजिक केंद्र, कक्षाएँ और अध्ययन मंडल भी शामिल थे। इनका उद्देश्य बहिष्कृत समाज में पढ़ने की आदत, सामाजिक जागरूकता और अपने अधिकारों के प्रति समझ विकसित करना था।

➣ सभा ने बंबई में निःशुल्क वाचनालय जैसी सुविधाएँ भी शुरू कीं, ताकि बहिष्कृत वर्गों के लोगों को अध्ययन और समाचार-पत्रों तक पहुँच मिल सके। इस प्रकार शिक्षा का अर्थ केवल विद्यालय में पढ़ाई तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि स्व-अध्ययन और बौद्धिक विकास को भी महत्व दिया गया।

➣ सामाजिक जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए सभा ने महार हॉकी क्लब जैसी पहल भी की। इसका उद्देश्य युवाओं को खेलों और स्वस्थ सामाजिक गतिविधियों की ओर प्रोत्साहित करना था तथा उन्हें जुआ, शराब और अन्य सामाजिक बुराइयों से दूर रखने का प्रयास करना था।

➣ सभा के मूल कार्यक्रम में औद्योगिक और कृषि विद्यालय शुरू करने की योजना भी थी। इसका उद्देश्य शिक्षा को केवल साक्षरता तक सीमित न रखकर व्यावसायिक कौशल, रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ना था।

➣ इस शिक्षा-केंद्रित कार्य ने आगे चलकर अंबेडकर के व्यापक शैक्षिक आंदोलन के लिए आधार तैयार किया। बाद में उन्होंने 14 जून 1928 को Depressed Classes Education Society स्थापित की, जिसके माध्यम से विभिन्न स्थानों पर छात्रावासों की व्यवस्था की गई।

अंबेडकर की पत्रकारिता और बहिष्कृत समाज का संगठन

बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना के बाद डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने यह महसूस किया कि सामाजिक संगठन को मजबूत बनाने के लिए एक ऐसे माध्यम की भी आवश्यकता है, जिसके द्वारा बहिष्कृत समाज की समस्याएँ सीधे जनता तक पहुँचाई जा सकें।

➣इसी उद्देश्य से उन्होंने पत्रकारिता, सार्वजनिक सभाओं और स्वयंसेवी संगठनों को अपने सामाजिक आंदोलन का महत्वपूर्ण साधन बनाया। साथ ही इन पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से बहिष्कृत वर्गों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता और संगठन की भावना विकसित की गई।

मूकनायक : बहिष्कृत समाज की पहली संगठित आवाज

31 जनवरी 1920 को अंबेडकर ने मूकनायक (Mooknayak) नामक मराठी साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन शुरू किया। इसका अर्थ था मूक लोगों का नेता”। इसका उद्देश्य उन लोगों की समस्याओं को आवाज देना था, जिनकी सामाजिक व्यवस्था में अपनी बात रखने के साधन बहुत सीमित थे।

➣ मूकनायक में जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता, शिक्षा, सामाजिक सुधार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे प्रश्न उठाए गए। इसके माध्यम से अंबेडकर ने बहिष्कृत वर्गों को केवल सुधार के लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले नागरिक के रूप में प्रस्तुत किया।

➣ मूकनायक ने अंबेडकर के प्रारंभिक सामाजिक आंदोलन को एक व्यापक सार्वजनिक मंच दिया। यही पत्रकारिता आगे चलकर बहिष्कृत हितकारिणी सभा की गतिविधियों और सामाजिक आंदोलनों के प्रचार में महत्वपूर्ण आधार बनी थी।

बहिष्कृत भारत और सामाजिक आंदोलन का विस्तार

3 अप्रैल 1927 को अंबेडकर ने बहिष्कृत भारत नामक पाक्षिक पत्र शुरू किया। इसका प्रकाशन ऐसे समय हुआ जब बहिष्कृत समाज के अधिकारों को लेकर अंबेडकर का आंदोलन अधिक सक्रिय हो रहा था और महाड़ सत्याग्रह की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी।

➣ बहिष्कृत भारत के माध्यम से अंबेडकर ने अस्पृश्यता, सामाजिक अन्याय, महाड़ आंदोलन और बहिष्कृत समाज के अधिकारों से जुड़े प्रश्नों को विस्तार से उठाया।

➣ बहिष्कृत भारत के माध्यम अपने आंदोलन से जुड़े लोगों को सामाजिक घटनाओं और संगठन की गतिविधियों से परिचित कराया। इससे विभिन्न स्थानों पर रहने वाले बहिष्कृत वर्गों के बीच साझी सामाजिक चेतना विकसित करने में सहायता मिली।

समता और समानता का विचार

1928 में अंबेडकर से जुड़े समता संघ के विचारों को प्रचारित करने के लिए समता पत्रिका शुरू की गई। 29 जून 1928 को इसका पहला अंक प्रकाशित हुआ।

➣ इसके प्रधान संपादक के रूप में देवराव विष्णु नाईक की नियुक्ति की गई, जबकि अंबेडकर स्वयं इसके विचारों से जुड़े प्रमुख मार्गदर्शक थे।

➣ समता का केंद्रीय विचार सामाजिक समानता था। इसके माध्यम से जातिगत ऊँच-नीच, सामाजिक भेदभाव और समान अधिकारों से जुड़े प्रश्नों को उठाया गया। इस प्रकार अंबेडकर की पत्रकारिता धीरे-धीरे केवल “बहिष्कृतों की समस्याओं” को बताने से आगे बढ़कर समानता आधारित समाज की अवधारणा को सामने रखने लगी।

जनता और व्यापक सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन

➣ बाद में 24 नवंबर 1930 को जनता नामक पत्र का पहला अंक प्रकाशित हुआ। यह अंबेडकर की पत्रकारिता के अगले चरण का प्रतिनिधित्व करता था।

➣ इसका दायरा पहले की पत्र-पत्रिकाओं की तुलना में अधिक व्यापक था और इसमें सामाजिक प्रश्नों के साथ राजनीतिक, आर्थिक और संवैधानिक मुद्दों पर भी चर्चा की गई।

➣ इस प्रकार मूकनायक , बहिष्कृत भारत , समता , जनता की क्रमिक परंपरा ने अंबेडकर की पत्रकारिता को एक निरंतर सामाजिक आंदोलन से जोड़े रखा। इन पत्रों के माध्यम से बहिष्कृत समाज के प्रश्नों को अलग-अलग समय में बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार सामने रखा गया।

मूकनायक (1920), बहिष्कृत हितकारिणी सभा (1924), बहिष्कृत भारत (1927), महाड़ आंदोलन (1927), समता (1928), जनता (1930)

महाड़ सत्याग्रह (1927)

महाड़ सत्याग्रह डॉ. बी. आर. अंबेडकर के नेतृत्व में बहिष्कृत वर्गों के लिए सार्वजनिक संसाधनों पर समान अधिकार की मांग को लेकर चलाया गया एक ऐतिहासिक आंदोलन था।

➣ इसका मुख्य केंद्र महाड़ का चावदार तालाब था, जहाँ अस्पृश्य माने जाने वाले लोगों को पानी लेने से रोका जाता था। इस आंदोलन को बहिष्कृत हितकारिणी सभा ने संगठन, जनजागरण और सम्मेलन के माध्यम से महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया।

➣ महाड़ सत्याग्रह का महत्व इस बात में था कि अंबेडकर ने अस्पृश्यता के प्रश्न को केवल सामाजिक सुधार या धार्मिक सुधार का विषय न रखकर समान नागरिक अधिकार का प्रश्न बनाया।

उनका तर्क था कि यदि किसी व्यक्ति को सार्वजनिक जलस्रोत का उपयोग करने का अधिकार नहीं है, तो उसे समाज में समान नागरिक मानना केवल कागजी बात होगी।

महाड़ सत्याग्रह की पृष्ठभूमि

➣ महाड़ में बहिष्कृत वर्गों को सार्वजनिक जलस्रोतों के उपयोग में लंबे समय से भेदभाव का सामना करना पड़ता था। इस स्थिति को बदलने की दिशा में 4 अगस्त 1923 को बंबई विधान परिषद में समाज सुधारक एस. के. बोले (S. K. Bole) ने एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा।

➣ इसमें सरकार द्वारा संचालित या सार्वजनिक धन से बनाए एवं संचालित सार्वजनिक जलस्रोतों, धर्मशालाओं, विद्यालयों, अदालतों, कार्यालयों और औषधालयों का उपयोग बहिष्कृत वर्गों को भी उपलब्ध कराने की सिफारिश की गई।

➣ इसके बाद 11 सितंबर 1923 को बंबई सरकार ने संबंधित विभागों को निर्देश जारी किया कि सार्वजनिक स्थानों के संबंध में इस निर्णय को लागू किया जाए। इसी वातावरण में महाड़ नगरपालिका ने भी चावदार तालाब को बहिष्कृत वर्गों के लिए खोलने का निर्णय लिया।

➣ लेकिन स्थानीय उच्च जाति के लोगों के विरोध के कारण सरकारी और नगरपालिका निर्णय व्यवहार में लागू नहीं हो सका।

➣ इस स्थिति ने अंबेडकर और उनके साथियों को यह अनुभव कराया कि केवल सरकारी आदेश या नगरपालिका प्रस्ताव पर्याप्त नहीं हैं। जब तक बहिष्कृत वर्ग स्वयं अपने अधिकारों का दावा नहीं करेंगे, तब तक कागजी निर्णयों का वास्तविक जीवन में कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

➣ इसलिए अधिकार को व्यवहार में स्थापित करने के लिए प्रत्यक्ष आंदोलन की आवश्यकता महसूस हुई।

महाड़ सम्मेलन और सत्याग्रह की तैयारी

19–20 मार्च 1927 को महाड़ में कोलाबा जिला बहिष्कृत वर्ग सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय लिया गया। इस आयोजन में डॉ. अंबेडकर और बहिष्कृत हितकारिणी सभा से जुड़े कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी। बड़ी संख्या में बहिष्कृत वर्गों के लोग महाड़ पहुँचने लगे।

➣ सम्मेलन का उद्देश्य केवल भाषण या सामाजिक सभा आयोजित करना नहीं था। इसका एक प्रमुख उद्देश्य बहिष्कृत वर्गों को यह समझाना था कि वे सार्वजनिक सुविधाओं पर अपना समान अधिकार स्वयं स्थापित करें। सभा से जुड़े कार्यकर्ताओं ने लोगों को संगठित किया और सत्याग्रह के लिए आवश्यक तैयारी की।

➣ सम्मेलन में अंबेडकर ने सामाजिक समानता और आत्मसम्मान पर जोर दिया। उन्होंने बहिष्कृत वर्गों को अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर आगे आने का संदेश दिया। इस प्रकार महाड़ का सम्मेलन आगे होने वाले प्रत्यक्ष सत्याग्रह का संगठनात्मक आधार बना।

चावदार तालाब सत्याग्रह (20 मार्च 1927)

20 मार्च 1927 को सम्मेलन में शामिल हजारों लोगों के साथ डॉ. अंबेडकर चावदार तालाब की ओर बढ़े। उनके साथ अनेक प्रमुख कार्यकर्ता भी थे।

➣ इनमें अनंतराव चित्रे, बापूसाहेब सहस्रबुद्धे, संभाजी गायकवाड़ और रामचंद्र मोरे जैसे कार्यकर्ताओं की भूमिका उल्लेखनीय थी।

➣ अंबेडकर और उनके साथियों ने चावदार तालाब का पानी पिया और इस प्रकार उस सार्वजनिक जलस्रोत पर बहिष्कृत वर्गों के समान अधिकार का प्रत्यक्ष दावा किया।

➣ यह कार्य प्रतीकात्मक भी था और व्यावहारिक भी-इसका संदेश था कि सार्वजनिक संसाधन किसी जाति विशेष की निजी संपत्ति नहीं हो सकते

➣ इस घटना ने रूढ़िवादी सामाजिक समूहों में तीखी प्रतिक्रिया पैदा की। कुछ लोगों ने तालाब को “अपवित्र” मानते हुए उसके शुद्धिकरण की रस्म तक आयोजित की।

➣ इससे यह स्पष्ट हुआ कि समस्या केवल पानी के उपयोग की नहीं थी, बल्कि जातिगत ऊँच-नीच की उस सामाजिक व्यवस्था की थी जो बहिष्कृत वर्गों को सार्वजनिक जीवन में समान स्थान देने से इंकार कर रही थी।

सत्याग्रह के बाद कानूनी और सामाजिक प्रतिक्रिया

➣ महाड़ में हुए आंदोलन के बाद स्थानीय विरोध और अधिक तीव्र हो गया। बहिष्कृत वर्गों के तालाब उपयोग के अधिकार को लेकर कानूनी विवाद खड़ा हुआ। इस कारण चावदार तालाब का प्रश्न तत्काल स्थायी रूप से हल नहीं हो सका और आंदोलन को आगे भी संघर्ष करना पड़ा।

➣ स्थानीय विरोध के दबाव में 4 अगस्त 1927 को महाड़ नगरपालिका ने वह पुराना निर्णय वापस ले लिया जिसके तहत चावदार तालाब को बहिष्कृत वर्गों के लिए खोलने का रास्ता तैयार हुआ था। इस घटना से स्पष्ट हुआ कि सामाजिक अधिकारों की वास्तविक स्थापना केवल प्रशासनिक आदेश से नहीं, बल्कि लंबे सामाजिक संघर्ष से ही संभव होगी।

➣ महाड़ आंदोलन के बाद बहिष्कृत हितकारिणी सभा और अंबेडकर के आंदोलन में यह विचार और मजबूत हुआ कि सामाजिक सम्मान और समानता को व्यवहार में स्थापित करने के लिए सार्वजनिक स्थानों, जलस्रोतों तथा अन्य नागरिक सुविधाओं पर समान अधिकार प्राप्त करना जरूरी है।

बहिष्कृत हितकारिणी सभा की भूमिका

➣ महाड़ सत्याग्रह में बहिष्कृत हितकारिणी सभा की भूमिका केवल आयोजन तक सीमित नहीं थी। सभा ने बहिष्कृत समाज में जागरूकता, संगठन और सम्मेलन के लिए लोगों को जुटाने का काम किया। इसके माध्यम से अंबेडकर के सामाजिक आंदोलन को ऐसा संगठनात्मक आधार मिला जिससे बड़ी संख्या में लोग महाड़ तक पहुँच सके।

➣ सभा के माध्यम से पहले से चल रही शिक्षा, संगठन और अधिकार-जागरूकता की गतिविधियों ने भी सत्याग्रह के लिए सामाजिक आधार तैयार किया। इसलिए महाड़ सत्याग्रह को सभा की पिछली गतिविधियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

➣ महाड़ आंदोलन ने बहिष्कृत हितकारिणी सभा के कार्य की दिशा को भी अधिक स्पष्ट किया। अब संगठन के सामने केवल शिक्षा और सामाजिक सुधार का प्रश्न नहीं था, बल्कि सार्वजनिक अधिकारों को प्रत्यक्ष रूप से स्थापित करने का प्रश्न भी प्रमुख हो गया।

महाड़ सत्याग्रह का व्यापक महत्व

➣ महाड़ सत्याग्रह का सबसे बड़ा महत्व यह था कि इसने अस्पृश्यता के खिलाफ संघर्ष को समान नागरिक अधिकार के प्रश्न से जोड़ दिया। अंबेडकर ने यह स्पष्ट किया कि बहिष्कृत वर्गों को मंदिर, तालाब, सड़क या अन्य सार्वजनिक सुविधाओं से वंचित रखना केवल सामाजिक भेदभाव नहीं, बल्कि उनके नागरिक अधिकारों का उल्लंघन है।

➣ इस आंदोलन ने बहिष्कृत समाज में आत्मसम्मान और अधिकार चेतना को मजबूत किया। लोगों ने पहली बार बड़ी संख्या में एकत्र होकर सार्वजनिक संसाधन पर अपने अधिकार का प्रत्यक्ष दावा किया। इस दृष्टि से महाड़ सत्याग्रह अंबेडकर के नेतृत्व में उभरते संगठित दलित आंदोलन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था।

➣ महाड़ सत्याग्रह ने यह भी दिखाया कि कानून और सामाजिक व्यवहार के बीच बड़ा अंतर हो सकता है। जब कानून या नगरपालिका का निर्णय बराबरी का अधिकार देता है, लेकिन समाज उसका पालन करने से इंकार करता है, तब केवल कानूनी आदेश पर्याप्त नहीं होता। इसीलिए अंबेडकर के आंदोलन में सामाजिक संगठन और प्रत्यक्ष संघर्ष का महत्व बढ़ता गया।

20 मार्च 1927 की चावदार तालाब की घटना आगे के अंबेडकरवादी आंदोलनों के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बनी। इसी संघर्ष की अगली कड़ी में दिसंबर 1927 में महाड़ में दूसरी बड़ी सभा आयोजित हुई, जहाँ जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था के वैचारिक आधार के विरुद्ध मनुस्मृति दहन की ऐतिहासिक घटना हुई।

मनुस्मृति दहन और सामाजिक समानता का संघर्ष

महाड़ सत्याग्रह (मार्च 1927) ने बहिष्कृत वर्गों के सार्वजनिक अधिकारों के प्रश्न को सामने रखा था। लेकिन चावदार तालाब के अधिकार को लेकर हुए विरोध और सामाजिक भेदभाव ने डॉ. बी. आर. अंबेडकर को इस निष्कर्ष की ओर भी प्रेरित किया कि समस्या केवल सार्वजनिक सुविधाओं तक सीमित नहीं है। इसके पीछे जाति-आधारित सामाजिक व्यवस्था और उसे उचित ठहराने वाली विचारधारा भी महत्वपूर्ण थी। इसी पृष्ठभूमि में दिसंबर 1927 का महाड़ सम्मेलन और मनुस्मृति दहन सामने आया।

➣ अंबेडकर के लिए सामाजिक समानता का अर्थ केवल बहिष्कृत वर्गों को कुएँ, तालाब या मंदिर जैसी सार्वजनिक सुविधाओं तक पहुँच दिलाना नहीं था। वे ऐसी सामाजिक व्यवस्था को भी चुनौती देना चाहते थे जिसमें जन्म के आधार पर व्यक्ति की सामाजिक स्थिति तय होती थी। इसलिए उन्होंने जातिगत ऊँच-नीच के धार्मिक एवं वैचारिक आधार पर भी प्रश्न उठाया।

दिसंबर 1927 का महाड़ सम्मेलन

➣ महाड़ में चावदार तालाब के अधिकार को लेकर कानूनी विवाद चल रहा था। 12 दिसंबर 1927 को रूढ़िवादी पक्ष ने महाड़ सिविल कोर्ट में डॉ. अंबेडकर और उनके साथियों के विरुद्ध अस्थायी निषेधाज्ञा की मांग की। 14 दिसंबर 1927 को अदालत ने ऐसा आदेश जारी कर दिया, जिसके कारण अंबेडकर और उनके साथियों के लिए उस समय चावदार तालाब में प्रवेश करना कानूनी रूप से रोक दिया गया।

➣ इसके बावजूद अंबेडकर ने 25–27 दिसंबर 1927 को महाड़ में सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय लिया। उन्होंने उस समय तालाब में प्रवेश करने के बजाय सामाजिक समानता और जाति-व्यवस्था के प्रश्न को आंदोलन के केंद्र में रखने का निर्णय किया। 25 दिसंबर को सम्मेलन में बड़ी संख्या में बहिष्कृत वर्गों के लोग एकत्र हुए।

➣ अंबेडकर ने स्पष्ट किया कि महाड़ आंदोलन का उद्देश्य केवल तालाब का पानी प्राप्त करना नहीं है। उनके लिए चावदार तालाब पर अधिकार जताना इस बात की घोषणा थी कि बहिष्कृत वर्ग भी अन्य लोगों की तरह मनुष्य हैं और सार्वजनिक संसाधनों पर उनका समान अधिकार है। इस विचार ने महाड़ आंदोलन को व्यापक सामाजिक समानता के संघर्ष से जोड़ दिया।

मनुस्मृति दहन (25 दिसंबर 1927)

25 दिसंबर 1927 को महाड़ सम्मेलन के दौरान मनुस्मृति की एक प्रति का सार्वजनिक रूप से दहन किया गया।

➣ इस घटना का उद्देश्य किसी व्यक्तिगत धार्मिक विश्वास का अपमान करना मात्र नहीं था, बल्कि अंबेडकर के आंदोलन की दृष्टि से जातिगत ऊँच-नीच और असमानता को वैधता देने वाली सामाजिक विचारधारा के प्रतीकात्मक विरोध के रूप में इसे किया गया।

➣ अंबेडकर के लेखन और बाद के वक्तव्यों में मनुस्मृति दहन को सामाजिक अन्याय के प्रतीक के विरोध के रूप में समझाया गया। सरकारी संकलित लेखन में उनके 1938 के एक साक्षात्कार का उल्लेख मिलता है, जिसमें उन्होंने कहा कि मनुस्मृति को जलाना जानबूझकर किया गया था क्योंकि वे इसे उस अन्याय का प्रतीक मानते थे जिसके नीचे बहिष्कृत वर्ग सदियों से दबे हुए थे।

➣ मनुस्मृति दहन को इसलिए महाड़ सत्याग्रह की अगली वैचारिक कड़ी माना जाता है। मार्च 1927 में सार्वजनिक जलस्रोत पर अधिकार का प्रश्न प्रमुख था, जबकि दिसंबर 1927 में आंदोलन ने उस सामाजिक विचारधारा को चुनौती दी जिसे अंबेडकर जातिगत असमानता की वैचारिक पृष्ठभूमि से जोड़ते थे।

सामाजिक समानता के लिए प्रस्ताव

➣ महाड़ के दिसंबर सम्मेलन में केवल मनुस्मृति दहन ही नहीं हुआ। सम्मेलन में सामाजिक समानता और जाति-आधारित भेदभाव को समाप्त करने से संबंधित विभिन्न प्रस्तावों पर भी चर्चा हुई।

➣सभा का उद्देश्य यह स्पष्ट करना था कि बहिष्कृत वर्गों को समान सामाजिक और नागरिक अधिकार मिलने चाहिए।

➣ सम्मेलन में धार्मिक पुरोहिताई के प्रश्न पर भी चर्चा हुई। एक प्रस्ताव में हिंदू पुरोहित बनने के लिए प्रतियोगी परीक्षा आयोजित करने और केवल सफल व्यक्तियों को पुरोहिताई का लाइसेंस देने की बात रखी गई। इसका उद्देश्य जन्म के आधार पर पुरोहिताई के अधिकार को चुनौती देना था।

➣ इस प्रकार अंबेडकर का आंदोलन केवल सार्वजनिक सुविधाओं तक पहुँच प्राप्त करने तक सीमित नहीं रहा। वह सामाजिक बराबरी, जाति-विरोध और धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं में जन्म आधारित विशेषाधिकारों की आलोचना की दिशा में आगे बढ़ने लगा।

मनुस्मृति दहन का वैचारिक महत्व

➣ मनुस्मृति दहन का महत्व इस बात में था कि इसने जातिगत भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष को सामाजिक व्यवस्था की मूल वैचारिक आलोचना से जोड़ दिया। अंबेडकर का तर्क था कि यदि समाज में जन्म के आधार पर ऊँच-नीच को स्वीकार करने वाली धारणाएँ बनी रहेंगी, तो केवल कानून बनाकर समानता स्थापित करना कठिन होगा।

➣ इस घटना ने बहिष्कृत समाज में आत्मसम्मान और सामाजिक अधिकार की भावना को मजबूत किया। अंबेडकर ने अपने अनुयायियों को यह संदेश दिया कि उन्हें अपने ऊपर थोपे गए सामाजिक दर्जे को स्वीकार करने के बजाय समानता और सम्मान के आधार पर अपने अधिकारों का दावा करना चाहिए।

➣ मनुस्मृति दहन के बाद अंबेडकर के आंदोलन में सामाजिक सुधार और सामाजिक पुनर्निर्माण का प्रश्न और अधिक केंद्रीय हो गया। जाति-व्यवस्था के विरुद्ध उनका संघर्ष आगे चलकर जाति के उन्मूलन और सामाजिक लोकतंत्र की व्यापक विचारधारा से जुड़ा।

महाड़ आंदोलन का कानूनी संघर्ष और अंतिम परिणाम

➣ चावदार तालाब का कानूनी विवाद भी लंबे समय तक चलता रहा। बहिष्कृत पक्ष का तर्क था कि तालाब महाड़ नगरपालिका का सार्वजनिक संसाधन है और इसलिए सभी नागरिकों को उसका उपयोग करने का अधिकार है।

➣दूसरी ओर विरोधी पक्ष परंपरागत सामाजिक प्रथा के आधार पर बहिष्कृत वर्गों के प्रवेश को रोकना चाहता था।

➣ मुकदमा कई वर्षों तक चलता रहा। अंततः 1937 में न्यायालयों ने बहिष्कृत वर्गों को तालाब के उपयोग से रोकने वाली कथित पुरानी प्रथा के आधार पर विरोधी पक्ष के दावे को स्वीकार नहीं किया।

➣इस प्रकार लगभग एक दशक तक चले कानूनी संघर्ष के बाद अंबेडकर के पक्ष को कानूनी विजय मिली।

➣ यह कानूनी परिणाम महाड़ आंदोलन के सामाजिक महत्व को और मजबूत करता है। आंदोलन ने एक ओर सार्वजनिक संसाधनों पर समान नागरिक अधिकार का प्रश्न उठाया और दूसरी ओर जाति-आधारित सामाजिक व्यवस्था के वैचारिक आधार को चुनौती दी।

मंदिर प्रवेश आंदोलन और नासिक का कालाराम मंदिर सत्याग्रह

महाड़ सत्याग्रह के बाद डॉ. बी. आर. अंबेडकर के सामाजिक आंदोलन का अगला महत्वपूर्ण चरण मंदिर प्रवेश आंदोलन था।

➣ अंबेडकर का मानना था कि सार्वजनिक जलस्रोतों और दूसरी नागरिक सुविधाओं पर समान अधिकार के साथ-साथ धार्मिक स्थलों में प्रवेश का अधिकार भी सामाजिक समानता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

➣ इसी विचार के तहत उन्होंने नासिक के कालाराम मंदिर में बहिष्कृत वर्गों के प्रवेश के लिए आंदोलन शुरू किया।

➣ कालाराम मंदिर सत्याग्रह की विशेषता यह भी थी कि इसमें महिलाओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया। वे जुलूसों, धरनों और सत्याग्रह की अन्य गतिविधियों में शामिल हुईं। कई महिलाओं को गिरफ्तार भी किया गया।

➣ कालाराम मंदिर भगवान राम को समर्पित नासिक का एक प्रसिद्ध मंदिर था। मंदिर में बहिष्कृत वर्गों को प्रवेश की अनुमति नहीं थी। अंबेडकर ने मंदिर प्रवेश के प्रश्न को केवल धार्मिक अधिकार के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे समानता, आत्मसम्मान और सामाजिक नागरिकता के प्रश्न से जोड़ा।

कालाराम मंदिर सत्याग्रह की तैयारी

➣ नासिक में मंदिर प्रवेश के प्रश्न पर अंबेडकर के समर्थकों ने पहले से संगठन और जनजागरण का काम शुरू कर रखा था। 1930 की शुरुआत में आंदोलन को व्यवस्थित रूप दिया गया और बड़ी संख्या में बहिष्कृत वर्गों के लोगों को नासिक में एकत्र करने की तैयारी की गई।

➣ आंदोलन का उद्देश्य केवल मंदिर के दरवाजे पर जाकर विरोध करना नहीं था। इसका लक्ष्य यह स्पष्ट करना था कि यदि मंदिर सार्वजनिक धार्मिक जीवन का हिस्सा है, तो जन्म के आधार पर किसी व्यक्ति को वहाँ प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता

कालाराम मंदिर सत्याग्रह (2 मार्च 1930)

2 मार्च 1930 को नासिक में कालाराम मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक बड़ा सत्याग्रह आयोजित किया गया। डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में लगभग 15,000 बहिष्कृत वर्गों के लोग इस आंदोलन में शामिल हुए। इसमें पुरुषों के साथ बड़ी संख्या में महिलाओं ने भी भाग लिया।

➣ सत्याग्रहियों ने मंदिर में प्रवेश की मांग की, लेकिन मंदिर के द्वार उनके लिए बंद रखे गए। आंदोलनकारियों ने शांतिपूर्ण ढंग से अपना विरोध जारी रखा। इस प्रकार कालाराम मंदिर के सामने चल रहा संघर्ष धीरे-धीरे एक बड़े सामाजिक समानता आंदोलन का रूप लेने लगा।

➣ अंबेडकर ने इस आंदोलन के माध्यम से यह संदेश दिया कि अस्पृश्यता के कारण किसी व्यक्ति को धार्मिक जीवन से अलग रखना सामाजिक न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है। मंदिर प्रवेश उनके लिए समान सामाजिक सम्मान का प्रतीक बन गया।

रथ खींचने की घटना और संघर्ष का विस्तार

➣ कालाराम मंदिर से जुड़ी वार्षिक धार्मिक परंपराओं के दौरान रथ खींचने का कार्यक्रम भी महत्वपूर्ण विवाद का विषय बना। सत्याग्रहियों ने मंदिर की धार्मिक गतिविधियों में समान भागीदारी की मांग की।

➣ एक समय ऐसा प्रयास हुआ कि बहिष्कृत वर्गों के लोगों को भी रथ खींचने का अवसर दिया जाए, लेकिन इस पर विरोध हुआ और स्थिति तनावपूर्ण हो गई।

➣ इसके बाद मंदिर प्रवेश का प्रश्न और अधिक व्यापक हो गया। आंदोलनकारियों ने मंदिर के सामने धरना, सभाएँ और शांतिपूर्ण प्रदर्शन जारी रखे। इस लंबे संघर्ष ने नासिक और आसपास के क्षेत्रों में अस्पृश्यता के प्रश्न को सार्वजनिक बहस का महत्वपूर्ण मुद्दा बना दिया।

लंबा संघर्ष और आंदोलन का परिणाम

➣ कालाराम मंदिर सत्याग्रह एक तात्कालिक आंदोलन नहीं रहा। सत्याग्रहियों ने लगभग पाँच वर्षों तक मंदिर प्रवेश के अधिकार के लिए संघर्ष जारी रखा। मंदिर के द्वार बहिष्कृत वर्गों के लिए नहीं खोले गए, लेकिन आंदोलन ने सामाजिक भेदभाव के प्रश्न को व्यापक स्तर पर उठाया।

➣ इस दौरान अनेक कार्यकर्ताओं को जेल जाना पड़ा और आंदोलनकारियों को सामाजिक विरोध का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद आंदोलन ने संगठन और अनुशासन बनाए रखा। इससे बहिष्कृत समाज में सामूहिक संगठन, आत्मसम्मान और अधिकार चेतना को मजबूती मिली।

➣ अंततः मंदिर प्रवेश का तत्काल उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। लेकिन अंबेडकर के लिए आंदोलन का महत्व केवल मंदिर में प्रवेश प्राप्त करने में नहीं था। उनका उद्देश्य समाज को यह चुनौती देना था कि क्या कोई धार्मिक व्यवस्था जन्म के आधार पर मनुष्य को समान अधिकारों से वंचित कर सकती है? इस प्रश्न ने मंदिर प्रवेश आंदोलन को व्यापक सामाजिक समानता के संघर्ष में बदल दिया।

अंबेडकर के आंदोलन में कालाराम सत्याग्रह का महत्व

➣ कालाराम मंदिर सत्याग्रह ने अंबेडकर के आंदोलन में सामाजिक अधिकारों की सीधी कार्रवाई को और मजबूत किया। महाड़ में उन्होंने सार्वजनिक जलस्रोत पर अधिकार का प्रश्न उठाया था,

➣ जबकि नासिक में उन्होंने धार्मिक संस्थाओं में समान प्रवेश का प्रश्न सामने रखा। स्वयं अंबेडकर ने बाद में महाड़, कालाराम और गुरुवायूर के आंदोलनों को प्रत्यक्ष कार्रवाई के उदाहरणों के रूप में देखा।

➣ आंदोलन ने यह भी दिखाया कि केवल कानून या सामाजिक सुधार के उपदेश से अस्पृश्यता समाप्त करना कठिन है। अंबेडकर के अनुसार सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन के लिए संगठित और प्रत्यक्ष संघर्ष आवश्यक था। कालाराम सत्याग्रह इसी रणनीति का महत्वपूर्ण उदाहरण था।

➣ इस आंदोलन का एक अन्य महत्वपूर्ण परिणाम यह था कि अंबेडकर का दृष्टिकोण धीरे-धीरे केवल मंदिर प्रवेश से आगे बढ़कर धर्म और सामाजिक समानता के व्यापक प्रश्नों तक पहुँचा।

➣ जब धार्मिक संस्थाओं के भीतर भी जातिगत भेदभाव बना रहा, तो अंबेडकर ने हिंदू सामाजिक व्यवस्था की मूल संरचना पर और गंभीर प्रश्न उठाने शुरू किए।

सभा से व्यापक दलित राजनीतिक आंदोलन की ओर

बहिष्कृत हितकारिणी सभा ने अंबेडकर के आंदोलन को शिक्षा, संगठन और सामाजिक अधिकारों के क्षेत्र में मजबूत आधार दिया। लेकिन 1920 के दशक के अंत तक अंबेडकर के सामने यह स्पष्ट हो गया कि केवल सामाजिक सुधार और शैक्षिक संस्थाओं के माध्यम से बहिष्कृत वर्गों की स्थिति में स्थायी बदलाव नहीं लाया जा सकता।

➣ उनके लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व, कानून बनाने वाली संस्थाओं में भागीदारी और सरकारी सेवाओं में उचित स्थान भी उतने ही आवश्यक थे।

➣ इसी कारण अंबेडकर का आंदोलन धीरे-धीरे सामाजिक संगठन से राजनीतिक संगठन की ओर बढ़ने लगा। बहिष्कृत हितकारिणी सभा ने शिक्षा और सामाजिक जागरूकता का आधार तैयार किया, जबकि आगे के संगठनों ने बहिष्कृत वर्गों के राजनीतिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व को सीधे राजनीतिक मुद्दा बनाया।

1928 में नई दिशा : शिक्षा और राजनीतिक संगठन का अलगाव

14 जून 1928 को बहिष्कृत हितकारिणी सभा को बंद कर दिया गया। इसके बाद अंबेडकर ने Depressed Classes Education Society की स्थापना की, जिसका प्रमुख ध्यान बहिष्कृत वर्गों के विद्यार्थियों की शिक्षा और छात्रावासों पर था।

➣ इस प्रकार शिक्षा संबंधी काम एक अलग संस्था के माध्यम से आगे बढ़ाया गया, जबकि अंबेडकर का राजनीतिक आंदोलन अब अधिक स्वतंत्र रूप से विकसित होने लगा।

➣ इस परिवर्तन का अर्थ यह नहीं था कि बहिष्कृत हितकारिणी सभा का महत्व समाप्त हो गया। सभा ने जिस शिक्षित नेतृत्व, सामाजिक चेतना और संगठनात्मक आधार को तैयार किया था, वही आगे चलकर अंबेडकर के राजनीतिक आंदोलन की शक्ति बना।

ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज कांग्रेस (1930)

ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज कांग्रेस (All India Depressed Classes Congress) को इस chapter में बहिष्कृत हितकारिणी सभा के अंदर की शाखा या उसी संस्था का दूसरा नाम नहीं समझना चाहिए। यह अंबेडकर के आंदोलन के आगे विकसित हुए अखिल भारतीय राजनीतिक मंच के रूप में अलग से समझने योग्य है।

➣ इसका पहला अधिवेशन 8–9 अगस्त 1930 को नागपुर में हुआ और इसकी अध्यक्षता डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने की। उपलब्ध मूल अभिलेखों में फरवरी 1930 में नागपुर में इस कांग्रेस को बुलाने की तैयारी और अंबेडकर से परामर्श का उल्लेख मिलता है।

➣ कांग्रेस का मुख्य जोर बहिष्कृत वर्गों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक सुरक्षा और सरकारी सेवाओं में उचित प्रतिनिधित्व जैसे प्रश्नों पर था। नागपुर अधिवेशन में विधानमंडलों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व तथा सार्वजनिक सेवाओं में उचित अनुपात में आरक्षण/प्रतिनिधित्व जैसी मांगें रखी गईं।

➣ इसलिए इसे अंबेडकर के आंदोलन में सामाजिक संगठन से अखिल भारतीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व की ओर बढ़ते चरण के रूप में पढ़ना अधिक सही है। इसका संबंध बहिष्कृत हितकारिणी सभा से आंदोलन की व्यापक निरंतरता के स्तर पर था, संगठनात्मक रूप से दोनों एक ही संस्था नहीं थे।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न और गोलमेज सम्मेलन

1930–32 के गोलमेज सम्मेलनों के दौरान अंबेडकर ने बहिष्कृत वर्गों की ओर से एक स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में अपनी भूमिका स्थापित की।

➣ उन्होंने यह तर्क दिया कि बहिष्कृत वर्गों की समस्याओं का समाधान तभी संभव है जब उन्हें अपनी राजनीतिक आवाज और अपने प्रतिनिधि चुनने का वास्तविक अधिकार मिले।

➣ अंबेडकर ने बहिष्कृत वर्गों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की मांग की। उनका तर्क था कि यदि उनके प्रतिनिधि केवल सामान्य निर्वाचन क्षेत्र में बहुसंख्यक मतदाताओं पर निर्भर रहेंगे, तो वे वास्तव में बहिष्कृत वर्गों के स्वतंत्र हितों का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाएँगे। इसलिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सामाजिक मुक्ति का महत्वपूर्ण साधन माना गया।

इस दौर में अंबेडकर की राजनीति का दायरा स्पष्ट रूप से व्यापक हो गया। अब आंदोलन केवल कुआँ, तालाब, मंदिर और शिक्षा जैसे सामाजिक अधिकारों तक सीमित नहीं था, बल्कि विधानमंडल, मताधिकार और संवैधानिक सुरक्षा तक पहुँच चुका था।

कम्यूनल अवॉर्ड और पूना समझौता (1932)

16 अगस्त 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने कम्यूनल अवॉर्ड की घोषणा की। इसमें बहिष्कृत वर्गों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था स्वीकार की गई। यह अंबेडकर की लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।

➣ लेकिन इस व्यवस्था का विरोध होने के बाद राजनीतिक परिस्थिति तेजी से बदली और 20 सितंबर 1932 को गांधी ने यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू किया।

➣ इसके बाद अंबेडकर और अन्य नेताओं के बीच बातचीत हुई और 24 सितंबर 1932 को पूना समझौता हुआ।

➣ पूना समझौते में पृथक निर्वाचक मंडल की जगह संयुक्त निर्वाचन स्वीकार किया गया, लेकिन बहिष्कृत वर्गों के लिए विधानमंडलों में आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाई गई।

➣ प्रांतीय विधानसभाओं में कुल 148 सीटें बहिष्कृत वर्गों के लिए आरक्षित की गईं। केंद्रीय विधानमंडल में सामान्य निर्वाचन की सीटों में से 18 प्रतिशत सीटें उनके लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया। साथ ही शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं में उनके हितों की रक्षा से संबंधित प्रावधान भी किए गए।

➣ पूना समझौते के बाद अंबेडकर के सामने नया प्रश्न यह था कि संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था के भीतर बहिष्कृत वर्गों की स्वतंत्र राजनीतिक आवाज किस प्रकार मजबूत रखी जाए।

➣ इसी कारण उन्होंने संगठित राजनीतिक दल और व्यापक राजनीतिक आधार तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ना शुरू किया।

इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (1936)

1936 में अंबेडकर ने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (Independent Labour Party – ILP) की स्थापना की। यह केवल बहिष्कृत वर्गों तक सीमित दल नहीं था।

➣ इसका उद्देश्य दलितों के साथ-साथ भूमिहीन मजदूरों, गरीब किसानों, खेतिहर मजदूरों और किरायेदारों जैसे श्रमिक एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के हितों को राजनीतिक मंच देना था।

➣ इस प्रकार अंबेडकर की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है। पहले उनका संगठन मुख्यतः बहिष्कृत वर्गों की सामाजिक मुक्ति पर केंद्रित था, जबकि इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी ने जातिगत अन्याय के साथ-साथ आर्थिक शोषण, श्रम अधिकार और किसान-मजदूर प्रश्न को भी राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा बनाया।

1937 के प्रांतीय चुनावों में इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी ने बंबई प्रेसीडेंसी में चुनाव लड़ा और उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। अंबेडकरवादी दलित राजनीति के लिए यह महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे साबित हुआ कि सामाजिक आंदोलन को चुनावी राजनीति में भी बदला जा सकता है।

ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन (1942)

➣ आगे चलकर अंबेडकर ने दलित राजनीतिक संगठन को अखिल भारतीय स्तर पर मजबूत करने का प्रयास किया। 17–20 जुलाई 1942 को नागपुर में अखिल भारतीय डिप्रेस्ड क्लासेज सम्मेलन आयोजित हुआ।

19 जुलाई 1942 को सम्मेलन में ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन (All India Scheduled Castes Federation – AISCF) की स्थापना का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ। इसका संविधान 7 सितंबर 1942 को सार्वजनिक किया गया।

➣ इसका उद्देश्य अनुसूचित जातियों को अखिल भारतीय राजनीतिक मंच देना तथा उनके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों के लिए संगठित संघर्ष करना था।

➣ संगठन ने विधानमंडलों और स्थानीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व, सरकारी सेवाओं में उचित भागीदारी तथा शिक्षा के लिए विशेष प्रावधान जैसी मांगों को महत्व दिया।

➣ इस प्रकार बहिष्कृत हितकारिणी सभा → डिप्रेस्ड क्लासेज एजुकेशन सोसाइटी → इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी → ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन की यात्रा से अंबेडकर के आंदोलन का विस्तार समझा जा सकता है।

➣ पहले चरण में जोर शिक्षा और सामाजिक संगठन पर था, फिर आंदोलन ने सामाजिक अधिकार, संवैधानिक प्रतिनिधित्व और चुनावी राजनीति का रूप लिया और अंततः अखिल भारतीय दलित राजनीतिक संगठन का स्वरूप ग्रहण किया।

➣ इस पूरी प्रक्रिया में बहिष्कृत हितकारिणी सभा की ऐतिहासिक भूमिका एक आधार तैयार करने वाली संस्था की थी। उसने बहिष्कृत समाज में शिक्षा, संगठन और आत्मसम्मान की जो चेतना विकसित की, उसी के आधार पर अंबेडकर आगे चलकर बड़े सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों को संगठित कर सके।

➣ इस प्रकार 1924 की बहिष्कृत हितकारिणी सभा से शुरू हुई संगठनात्मक यात्रा ने अंबेडकर के नेतृत्व में बहिष्कृत समाज की राजनीति को स्थानीय सामाजिक सुधार से उठाकर अखिल भारतीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों के व्यापक आंदोलन में बदल दिया।

बहिष्कृत हितकारिणी सभा और ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज कांग्रेस में अंतर

आधार बहिष्कृत हितकारिणी सभा ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज कांग्रेस
स्थापना/आयोजन 1924 1930
स्थान बंबई (दामोदर हॉल) नागपुर
स्वरूप सामाजिक एवं शैक्षिक संस्था अखिल भारतीय राजनीतिक सम्मेलन/मंच
मुख्य नेतृत्व डॉ. बी. आर. अंबेडकर के नेतृत्व में डॉ. बी. आर. अंबेडकर की अध्यक्षता में
मुख्य उद्देश्य शिक्षा, संगठन, सामाजिक जागरूकता, आत्मसम्मान और बहिष्कृत वर्गों की सामाजिक-आर्थिक उन्नति बहिष्कृत वर्गों के राजनीतिक अधिकार, प्रतिनिधित्व और संवैधानिक सुरक्षा के प्रश्नों को अखिल भारतीय स्तर पर उठाना
कार्य का क्षेत्र मुख्यतः तत्कालीन बंबई प्रेसीडेंसी अखिल भारतीय स्तर
प्रमुख फोकस शिक्षा, छात्रावास, सामाजिक संगठन और सार्वजनिक अधिकार राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक safeguards और बहिष्कृत वर्गों की राजनीतिक आवाज
महत्व अंबेडकर के सामाजिक एवं संगठनात्मक आंदोलन की आधारशिला अंबेडकर के अखिल भारतीय राजनीतिक नेतृत्व को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण मंच
आपस में संबंध दोनों डॉ. अंबेडकर के बहिष्कृत वर्गों के आंदोलन से जुड़े थे, लेकिन ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज कांग्रेस, बहिष्कृत हितकारिणी सभा का दूसरा नाम या उसकी शाखा नहीं थी। यह आंदोलन के सामाजिक-शैक्षिक चरण से आगे बढ़कर राजनीतिक प्रतिनिधित्व की दिशा को दर्शाती है।

▪ बहिष्कृत हितकारिणी सभा (1924) = शिक्षा + सामाजिक संगठन
▪ ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज कांग्रेस (1930) = अखिल भारतीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व + संवैधानिक सुरक्षा

बहिष्कृत हितकारिणी सभा की सीमाएँ

➣ सभा का कार्यक्षेत्र मुख्यतः बंबई प्रेसीडेंसी और उसके आसपास के क्षेत्रों तक सीमित रहा। इसलिए यह शुरुआत से ही पूरे भारत के बहिष्कृत वर्गों को एक ही संगठन के अंतर्गत संगठित नहीं कर सकी। बाद में अंबेडकर को अखिल भारतीय स्तर पर अलग राजनीतिक संगठन बनाने की आवश्यकता महसूस हुई।

➣ दूसरी सीमा यह थी कि उस समय बहिष्कृत वर्गों की साक्षरता, आर्थिक स्थिति और संगठनात्मक क्षमता बहुत कमजोर थी। इसलिए बड़े पैमाने पर छात्रावास, शिक्षा केंद्र और सामाजिक संस्थाएँ चलाने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन जुटाना कठिन था। उपलब्ध अभिलेखों में सभा और उसके आंदोलनों के लिए चंदा तथा स्वयंसेवकों को जुटाने के प्रयासों का उल्लेख मिलता है।

➣ सभा के सामने सामाजिक विरोध भी एक बड़ी बाधा था। केवल कानूनी या नगरपालिका निर्णयों के बावजूद महाड़ जैसे मामलों में सामाजिक व्यवहार बदलना कठिन साबित हुआ।

इससे स्पष्ट हुआ कि सदियों से चली आ रही अस्पृश्यता को केवल संगठन या सरकारी आदेश से तुरंत समाप्त नहीं किया जा सकता।

➣ सभा की एक और सीमा यह थी कि इसका मुख्य नेतृत्व और संगठनात्मक गतिविधियाँ अंबेडकर के आसपास केंद्रित थीं। इसलिए इसका विस्तार काफी हद तक अंबेडकर के व्यक्तिगत नेतृत्व और उनके उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर रहा। बाद में बड़े राजनीतिक संगठनों की आवश्यकता इसी कारण भी सामने आई।

ऐतिहासिक विरासत

1924 की बहिष्कृत हितकारिणी सभा ने भारतीय समाज में बहिष्कृत वर्गों के प्रश्न को एक नए ढंग से सामने रखा। इसने शिक्षा और सामाजिक सहायता को अधिकार और आत्मसम्मान के प्रश्न से जोड़ा और आगे चलकर महाड़, मनुस्मृति दहन तथा कालाराम मंदिर सत्याग्रह जैसे आंदोलनों के लिए सामाजिक आधार तैयार किया।

➣ सभा की गतिविधियों ने यह भी दिखाया कि सामाजिक समानता के लिए केवल ऊपर से किए गए सुधार पर्याप्त नहीं हैं। वंचित समुदाय का स्वयं संगठित होना और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना आवश्यक है। यही विचार आगे चलकर अंबेडकर की दलित राजनीति की केंद्रीय विशेषता बना।

➣ बाद में अंबेडकर ने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी और ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन जैसे राजनीतिक संगठनों के माध्यम से अपने आंदोलन को व्यापक राजनीतिक रूप दिया। इस दृष्टि से बहिष्कृत हितकारिणी सभा को उनके आंदोलन की सामाजिक एवं संगठनात्मक आधारशिला के रूप में देखा जा सकता है।

महात्मा गांधी और डॉ. अंबेडकर की विचारधारा में अंतर

महात्मा गांधी और डॉ. बी. आर. अंबेडकर दोनों अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव के विरोधी थे, लेकिन दोनों के विचारों और संघर्ष की पद्धति में महत्वपूर्ण अंतर था।

➣ गांधी सामाजिक सुधार को मुख्यतः हिंदू समाज के भीतर सुधार के रूप में देखते थे, जबकि अंबेडकर का जोर जाति-व्यवस्था को समाप्त करके सामाजिक समानता और स्वतंत्र राजनीतिक अधिकार स्थापित करने पर था। इसी अंतर के कारण दोनों के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर मतभेद हुए।

जाति और अस्पृश्यता के प्रश्न पर अंतर

➣ गांधी अस्पृश्यता को हिंदू समाज की एक गंभीर बुराई मानते थे और उसके उन्मूलन के लिए व्यापक अभियान चलाते थे। उन्होंने अस्पृश्यता के विरुद्ध जनजागरण, सामाजिक संपर्क और हरिजन सेवा को महत्व दिया।

➣ 1932 के पूना समझौते के बाद हरिजन सेवक संघ की स्थापना भी इसी व्यापक अभियान का हिस्सा थी।

➣ अंबेडकर की दृष्टि इससे आगे जाती थी। उनके अनुसार अस्पृश्यता केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि जाति-व्यवस्था की उपज थी। इसलिए केवल अस्पृश्यता समाप्त करने से समस्या का पूरा समाधान नहीं होगा।

जाति-व्यवस्था की मूल संरचना को समाप्त करना आवश्यक है। उन्होंने बाद के अपने लेखन में स्पष्ट किया कि बहिष्कृत वर्गों की मुक्ति जाति-व्यवस्था के विनाश के बिना संभव नहीं है।

वर्ण व्यवस्था के संबंध में अंतर

➣ गांधी के विचार समय के साथ बदले, लेकिन लंबे समय तक वे वर्ण व्यवस्था को श्रम-विभाजन से जुड़ी सामाजिक व्यवस्था के रूप में देखते रहे और जाति तथा वर्ण के बीच अंतर करते थे। वे अस्पृश्यता का विरोध करते हुए हिंदू समाज के भीतर सुधार की संभावना पर जोर देते थे।

➣ अंबेडकर ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया। उनके अनुसार जन्म पर आधारित सामाजिक विभाजन स्वयं असमानता का आधार है। इसलिए केवल अस्पृश्यता हटाना पर्याप्त नहीं, बल्कि जाति के आधार पर बनी सामाजिक श्रेणियों को ही समाप्त करना आवश्यक है। यही दृष्टिकोण बाद में उनकी पुस्तक जाति का उन्मूलन (Annihilation of Caste) में और स्पष्ट रूप से सामने आया।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न

➣ गांधी का मानना था कि बहिष्कृत वर्गों का हित व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन और हिंदू समाज के सुधार के माध्यम से सुरक्षित किया जा सकता है। वे उन्हें हिंदू समाज से अलग एक स्वतंत्र राजनीतिक समुदाय के रूप में अलग निर्वाचन व्यवस्था देने के विरोधी थे।

➣ अंबेडकर का विचार था कि सामाजिक रूप से दबे हुए समुदायों को अपने स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मिलना चाहिए। उनका तर्क था कि यदि प्रतिनिधि बहुसंख्यक समाज के वोट पर निर्भर होंगे, तो वे जरूरी नहीं कि बहिष्कृत वर्गों के वास्तविक हितों की रक्षा कर पाएँ। इसी कारण उन्होंने पृथक निर्वाचक मंडल की मांग की।

कम्यूनल अवॉर्ड और पूना समझौते पर मतभेद

16 अगस्त 1932 के कम्यूनल अवॉर्ड में बहिष्कृत वर्गों को पृथक निर्वाचक मंडल देने का प्रावधान किया गया। अंबेडकर ने इसे बहिष्कृत वर्गों के स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना, जबकि गांधी ने इसका विरोध किया और 20 सितंबर 1932 को यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू किया।

➣ इसके बाद 24 सितंबर 1932 को अंबेडकर और गांधी के बीच पूना समझौता हुआ और पृथक निर्वाचक मंडल के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन के साथ आरक्षित सीटों की व्यवस्था स्वीकार की गई। यह समझौता दोनों के बीच राजनीतिक मतभेद का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण बना।

➣ अंबेडकर ने समझौते को स्वीकार किया, लेकिन बाद के वर्षों में वे संयुक्त निर्वाचन की व्यवस्था के आलोचक बने रहे। उनका अनुभव था कि केवल आरक्षित सीटें पर्याप्त नहीं हैं; यह भी आवश्यक है कि चुने जाने वाले प्रतिनिधि वास्तव में बहिष्कृत वर्गों के स्वतंत्र हितों को व्यक्त करें।

सामाजिक सुधार की पद्धति में अंतर

➣ गांधी सामाजिक सुधार के लिए जनजागरण, नैतिक अपील, आत्मशुद्धि, सामाजिक संपर्क और सेवा पर जोर देते थे। उनका प्रयास था कि ऊँची जातियों के लोग स्वयं अस्पृश्यता को पाप और सामाजिक बुराई समझें तथा समाज के भीतर से परिवर्तन आए।

➣ अंबेडकर का जोर कानूनी अधिकार, संगठन, शिक्षा, राजनीतिक शक्ति और प्रत्यक्ष सामाजिक संघर्ष पर था। महाड़ सत्याग्रह और कालाराम मंदिर सत्याग्रह में उन्होंने दिखाया कि सामाजिक अधिकार केवल अपील से नहीं, बल्कि संगठित होकर अपने अधिकारों का दावा करने से भी प्राप्त किए जाने चाहिए।

धर्म और सामाजिक मुक्ति के प्रश्न पर अंतर

➣ गांधी अस्पृश्यता के उन्मूलन को हिंदू समाज के आंतरिक सुधार से जोड़ते थे। वे हिंदू धर्म की मूल नैतिक शिक्षाओं में विश्वास रखते हुए उसके भीतर से सुधार करना चाहते थे।

➣ अंबेडकर का अनुभव अलग था। उन्हें लगता था कि यदि किसी धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था में जातिगत असमानता गहराई से जुड़ी हुई है, तो केवल सुधार की अपील पर्याप्त नहीं होगी।

1935 के येवला सम्मेलन में उन्होंने हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा करते हुए अपनी प्रसिद्ध दिशा स्पष्ट की कि वे हिंदू के रूप में जन्म लेने को बदल नहीं सकते, लेकिन हिंदू के रूप में मरना उनके हाथ में है। यह उनके विचारों में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत था।

राज्य की भूमिका और अधिकारों की दृष्टि

➣ गांधी सामाजिक परिवर्तन में समाज और समुदाय की नैतिक जिम्मेदारी को बहुत महत्व देते थे। वे राज्य के साथ-साथ समाज के आत्म-सुधार को आवश्यक मानते थे।

➣ अंबेडकर का जोर कानून और राज्य की शक्ति पर अधिक था। उनका मानना था कि केवल सामाजिक सद्भाव की अपील से उन समुदायों की रक्षा नहीं की जा सकती जिनके साथ सदियों से भेदभाव हुआ है।

➣ इसलिए शिक्षा, सरकारी सेवाओं, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और कानून में संवैधानिक सुरक्षा आवश्यक है। यही सोच आगे चलकर उनके संवैधानिक लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के विचार में दिखाई देती है।

पहलू महात्मा गांधी डॉ. बी. आर. अंबेडकर
अस्पृश्यता सामाजिक और नैतिक बुराई, इसे हिंदू समाज के भीतर सुधार के माध्यम से समाप्त करना। जाति-व्यवस्था से जुड़ी संरचनात्मक समस्या, स्थायी समाधान के लिए जाति का उन्मूलन आवश्यक।
जाति व्यवस्था समय के साथ दृष्टिकोण में परिवर्तन, जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता का विरोध जन्म-आधारित जाति व्यवस्था के मूल ढाँचे का विरोध।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व बहिष्कृत वर्गों को व्यापक राष्ट्रीय समाज का हिस्सा मानते हुए अलग राजनीतिक निर्वाचन का विरोध स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व को दलित मुक्ति का महत्वपूर्ण साधन मानना।
पृथक निर्वाचक मंडल विरोधी समर्थक, 1932 में कम्यूनल अवॉर्ड के अंतर्गत इसे स्वीकार किया गया था।
सामाजिक सुधार की पद्धति नैतिक अपील, जनजागरण, सेवा और सामाजिक सुधार शिक्षा, संगठन, कानूनी अधिकार, राजनीतिक शक्ति और प्रत्यक्ष आंदोलन
धर्म के प्रति दृष्टिकोण हिंदू समाज के भीतर सुधार की संभावना पर जोर। यदि धर्म सामाजिक समानता नहीं देता तो उसके त्याग की संभावना को स्वीकार किया।
मुख्य लक्ष्य अस्पृश्यता समाप्त कर सामाजिक एकता और सुधार सामाजिक समानता, आत्मसम्मान, स्वतंत्र प्रतिनिधित्व और जाति का उन्मूलन

डॉ. अंबेडकर और कांग्रेस की विचारधारा में अंतर

➣ डॉ. अंबेडकर और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दोनों ब्रिटिश शासन से मुक्ति के प्रश्न से जुड़े थे, लेकिन उनकी प्राथमिकताएँ और राजनीतिक दृष्टिकोण पूरी तरह समान नहीं थे।

➣ कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य राष्ट्रीय स्वतंत्रता और स्वशासन था, जबकि अंबेडकर के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक समानता और दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण थे।

➣ अंबेडकर को आशंका थी कि यदि केवल ब्रिटिश शासन समाप्त कर दिया गया और भारतीय समाज की जातिगत संरचना बनी रही, तो सत्ता एक प्रकार के प्रभुत्व से निकलकर दूसरे सामाजिक प्रभुत्व के हाथों में जा सकती है।

➣इसलिए वे स्वतंत्र भारत कैसा होगा? के प्रश्न को भारत स्वतंत्र कब होगा? के प्रश्न जितना ही महत्वपूर्ण मानते थे।

➣ कांग्रेस के भीतर अस्पृश्यता विरोधी कार्य अवश्य चल रहा था, लेकिन अंबेडकर का मानना था कि दलितों का प्रतिनिधित्व स्वयं दलितों के हाथ में होना चाहिए।

➣ इसी कारण वे कांग्रेस के ऐसे दावे के प्रति आलोचनात्मक रहे कि वह पूरे राष्ट्र या पूरे हिंदू समाज की ओर से दलितों का प्रतिनिधित्व कर सकती है।

➣ राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर यह अंतर सबसे स्पष्ट दिखाई दिया। अंबेडकर ने पृथक निर्वाचक मंडल की मांग की, जबकि कांग्रेस नेतृत्व का प्रमुख रुख इसके विरोध में था। यही मतभेद 1932 के पूना समझौते का महत्वपूर्ण कारण बना।

➣ अंबेडकर कांग्रेस के सामाजिक सुधार कार्यक्रम की आलोचना इसलिए भी करते थे कि उनके अनुसार सिर्फ अस्पृश्यता हटाने से जाति समाप्त नहीं होगी। उनके लिए सामाजिक लोकतंत्र का आधार स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व था तथा राजनीतिक लोकतंत्र को टिकाऊ बनाने के लिए सामाजिक लोकतंत्र भी आवश्यक था।

➣ इस प्रकार अंबेडकर और कांग्रेस के बीच अंतर को केवल ब्रिटिश विरोध बनाम ब्रिटिश समर्थन के रूप में समझना गलत होगा। अंबेडकर स्वयं औपनिवेशिक शासन की आलोचना करते थे, लेकिन उनकी प्राथमिक चिंता यह थी कि स्वतंत्र भारत की राजनीतिक व्यवस्था में दलितों को वास्तविक सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक समानता मिले।

➣इसी कारण उन्होंने स्वतंत्र राजनीतिक संगठन भी बनाए और बाद में संवैधानिक अधिकारों को सामाजिक न्याय का प्रमुख आधार बनाया।

पहलू डॉ. बी. आर. अंबेडकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
मुख्य प्राथमिकता राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक समानता, दलित अधिकार और संवैधानिक सुरक्षा राष्ट्रीय स्वतंत्रता, स्वशासन और औपनिवेशिक शासन का अंत मुख्य प्राथमिकता।
दलित प्रतिनिधित्व दलितों का स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व आवश्यक; अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार होना चाहिए। दलितों को व्यापक राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा मानते हुए अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग का सामान्यतः विरोध।
पृथक निर्वाचक मंडल समर्थन; इसे दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व का साधन माना। विरोध; इसे हिंदू समाज के राजनीतिक विभाजन का कारण माना गया।
अस्पृश्यता अस्पृश्यता को जाति-व्यवस्था की संरचनात्मक समस्या से जोड़कर देखा। अस्पृश्यता को सामाजिक बुराई मानकर उसके विरुद्ध सुधार और जनजागरण पर जोर।
जाति व्यवस्था जाति-व्यवस्था के उन्मूलन पर जोर। जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता के विरोध पर जोर; जाति के प्रश्न पर दृष्टिकोण अंबेडकर से अलग रहा।
सामाजिक परिवर्तन का साधन शिक्षा, संगठन, राजनीतिक शक्ति, कानून और प्रत्यक्ष आंदोलन जनजागरण, सामाजिक सुधार, नैतिक अपील और राष्ट्रीय आंदोलन
राज्य की भूमिका सामाजिक न्याय के लिए कानूनी और संवैधानिक हस्तक्षेप आवश्यक। राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक सुधार और सार्वजनिक आंदोलन पर अधिक जोर।
राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति दृष्टिकोण ब्रिटिश-विरोधी संघर्ष के साथ-साथ यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण कि स्वतंत्र भारत में दलितों की स्थिति क्या होगी राष्ट्रीय स्वतंत्रता को केंद्रीय राजनीतिक लक्ष्य बनाया।
स्वतंत्र संगठन बहिष्कृत हितकारिणी सभा, इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी, ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन जैसे स्वतंत्र संगठन बनाए। कांग्रेस को व्यापक राष्ट्रीय राजनीतिक संगठन के रूप में विकसित किया।
मूल दृष्टिकोण राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक लोकतंत्र” राष्ट्रीय स्वतंत्रता के माध्यम से स्वशासन”

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

वर्ष / तिथि महत्वपूर्ण तथ्य
1919 डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने साउथबरो समिति के समक्ष बहिष्कृत वर्गों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग रखी।
31 जनवरी 1920 अंबेडकर द्वारा मूकनायक साप्ताहिक पत्र का पहला अंक प्रकाशित।
9 मार्च 1924 बंबई के दामोदर हॉल में बहिष्कृत वर्गों की केंद्रीय संस्था बनाने के लिए महत्वपूर्ण बैठक।
20 जुलाई 1924 बहिष्कृत हितकारिणी सभा की औपचारिक स्थापना।
1924 सभा का मुख्य केंद्र बंबई और कार्यक्षेत्र तत्कालीन बंबई प्रेसीडेंसी रहा।
सभा के प्रमुख उद्देश्य बहिष्कृत वर्गों में शिक्षा, संस्कृति और आर्थिक उन्नति को बढ़ावा देना तथा उनकी शिकायतों को उचित मंच तक पहुँचाना।
4 जनवरी 1925 सोलापुर में बहिष्कृत वर्गों के हाई स्कूल विद्यार्थियों के लिए छात्रावास शुरू किया गया।
जीवप्पा सुबा आयडले सोलापुर छात्रावास के प्रारंभिक प्रबंधन से जुड़े प्रमुख व्यक्ति।
₹40 सोलापुर नगरपालिका द्वारा छात्रावास के रखरखाव के लिए प्रारंभिक आर्थिक सहायता।
1925 सभा की शैक्षिक गतिविधियों में छात्रावास, वाचनालय और अध्ययन संबंधी कार्यों का विस्तार।
4 अगस्त 1923 एस. के. बोले ने सार्वजनिक जलस्रोतों और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं को बहिष्कृत वर्गों के लिए खोलने के संबंध में बंबई विधान परिषद में प्रस्ताव रखा।
1927 बहिष्कृत भारत का प्रकाशन अंबेडकर की सामाजिक पत्रकारिता के नए चरण का महत्वपूर्ण माध्यम बना।
20 मार्च 1927 महाड़ सत्याग्रह के दौरान अंबेडकर और उनके अनुयायियों ने चावदार तालाब से पानी लेकर समान सार्वजनिक अधिकार का दावा किया।
25 दिसंबर 1927 महाड़ में मनुस्मृति दहन; जातिगत असमानता के वैचारिक आधार के विरोध का प्रतीक।
1928 बहिष्कृत हितकारिणी सभा का कार्य समाप्त कर शिक्षा संबंधी कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए Depressed Classes Education Society की स्थापना की गई।
29 जून 1928 समता पत्रिका का पहला अंक प्रकाशित।
2 मार्च 1930 नासिक में कालाराम मंदिर सत्याग्रह का प्रारंभ।
24 नवंबर 1930 जनता पत्र का पहला अंक प्रकाशित।
1930–32 अंबेडकर ने गोलमेज सम्मेलनों में बहिष्कृत वर्गों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न उठाया।
16 अगस्त 1932 कम्यूनल अवॉर्ड में बहिष्कृत वर्गों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था की गई।
24 सितंबर 1932 पूना समझौता – पृथक निर्वाचक मंडल के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन और आरक्षित सीटों की व्यवस्था स्वीकार हुई।
1936 अंबेडकर ने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना की; दलित प्रश्न को श्रमिक और आर्थिक प्रश्नों से भी जोड़ा।
1937 इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी ने बंबई प्रेसीडेंसी के चुनावों में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की।
19 जुलाई 1942 ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन के गठन का प्रस्ताव नागपुर में पारित किया गया।

📚 Chapters

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    Swipe left/right to change content

    Share This Page

    WhatsApp Telegram